Wednesday, June 17, 2015

कुपुत्र उड़ाते आस्था का मजाक --- दम तोडती गंगा 18-6-15

कुपुत्र उड़ाते आस्था का मजाक --- दम तोडती गंगा



18 जून के काशी वार्ता में डा के . के शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार
गंगा शब्द जेहन में आते ही आँखों के सामने अविरल बहती आस्थाए जुड़ जाती है ऐसे मोक्ष दायिनी गंगा को अपने ही कुपुत्रो की वजह से उदगम स्थल से निकलने के बाद उसके प्रवाह स्थलों के तीन शहरों कानपुर , इलाहाबाद , काशी में उसे कई बार दम तोड़ना पड़ता है | एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़ इन तीनो शहरों से 3 हजार 23 एमएलडी गंदा पानी इस नदी में गिरता है | जिसके चलते इस पानी में 7 हजार 38
वीओडी का भार बढ़ जाता है | जिसके कारण आज गंगा जल आचमन के योग्य भी नही रह गया है | गौरतलब है कि गंगा उत्तराखंड से होकर कानपुर से उन्नाव होते हुए फतेहपुर , रायबरेली और तब मिर्जापुर से होकर इलाहाबाद व वाराणसी तक गुजरने की यात्रा में अनेको बार मृत्यु - तुल्य कष्ट सहती है | नदी को अपने अपशिष्टो को शुद्द करने का कोई मौक़ा ही नही मिलता | क्योकि इसके प्रवाह खंड के किनारे पर स्थित शहरों और उद्योगों द्वारा नदी में लगातार अपने स्वार्थ के चलते जहर उगलने वाले कचड़े प्रवाहित करते रहते है | मिर्जापुर से आकार जब गंगा इलाहाबाद में यमुना से मिलती है तब इसमें कुछ साफ़ पानी मिल जाता है जो दिल्ली से अपनी यात्रा करने के दौरान कुछ स्वस्थ्य होकर यहाँ आ कर मिलती है | उल्लेखनीय है कि कानपुर - वाराणसी खंड में नदी में 3 हजार एमएलडी अपशिष्ट गंदा जल छोड़ा जाता है |
सीपीसीबी ने बीओडी वाले 30 नालो की पहचान की थी | जिनसे गंगा में रोज कई हजार लीटर गन्दा पानी गिरता है | इस खंड की 33 में से 7 नालिया तो बुरी तरह से प्रदूषण फैलाती है | ये नालिया मिलकर कानपुर - वाराणसी खंड के कुल वीडीओ भार में 94% तक योगदान करती है | इसमें कानपुर की सबसे बुरी हालत में है |
इस प्रवाह खंड में दस नालिया बीस प्रतिशत गंदा जल निस्तारित करती रहती है | इस कारण से स्पष्ट तौर पर इसे पहले साफ़ करने की आवश्यकता है | इस सर्वे से यह पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि गंगा में गिरने वाला हर नाला गंदे अपशिष्ट ही लेकर आता है | कानपुर की आज स्थिति यह है कि 217 एमएलडी की स्थापित क्षमता वाला शहर केवल 100 एमएलडी गंदे जल का शुद्दिकरण कर पाता है | क्योकि या तो प्लांट काम नही करते या फिर अपशिष्ट प्लांट तक नही पहुचते | कानपुर शहर का सबसे प्रदूषित नाला सीसामऊ है | वाराणसी में 400 किमी , सम्बद्द का नेटवर्क मुख्य रूप से पुराने शहर और घाट इलाके में फैला है | जो की 100 साल पुराना है | शहर की अस्सी प्रतिशत आबादी झोपड़ियो में रहती है और खुले में शौच करती है | इनके अलावा गंगा में आने वाले खुले नालो पर भी बैठकर शौच करने की वजह से मलजल गंगा में गिरता रहता है | जरूरत है की डोर तू डोर शौचालय बनाये जाए | इनके अलावा जब तक कड़ाई से नियमो का पालन करते हुए नालो में गिरने वाले फैक्ट्रियो के कचरों को ट्रीटमेंट प्लान से साफ़ नही किया जाएगा | गंगा की इस बदहाली को कोई नही रोक पायेगा |

Saturday, June 13, 2015

अप्रत्यक्ष कर संग्रह में तेज वृद्दि ?



अप्रत्यक्ष कर संग्रह में तेज वृद्दि ?

बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को ।   ------ आदम गोंडवी


अंग्रजी दैनिक द हिन्दू ( 13 ) मई में प्रकाशित सूचनाओं के अनुसार अप्रत्यक्ष कर की संग्रह में 46.2% की वृद्दि दर्ज की गयी है | यह अप्रैल 2014 में यह कर संग्रह 2,661 करोड़ रूपये था | उसकी तुलना में अप्रैल 2015 में यह संग्रह 47,747 करोड़ पहुच गया है | अभी जून में यह संग्रह और ज्यादा हो जाना है | क्योकि 1 जून से बजट में प्रस्तावित सेवाकर में वृद्दि की घोषणा को लागू हो जानी है | अभी यह सेवा कर 12.36 % की दर से लग रही है | पहली जून से न केवल इसकी दर 14% हो जाएगी , बल्कि कर दायरे का भी विस्तार हो जाएगा | उदाहरण आन लाइन बस  व हवाई टिकट लेने होटलों में भोजन करने सैलून में बाल कटवाने व्यूटी पार्लर की सेवा लेने मैरेज लान या मैरेज हाल बुक करने आदि जैसे क्षेत्रो में सेवाकर का दायरा विस्तारित हो जाएगा | बजट घोषणा में वित्तमंत्री जी 2015-16 के इस वित्त वर्ष में कुल 6 लाख 46 हजार 267 करोड़ रूपये के अप्रत्यक्ष राजस्व कर संग्रह का लक्ष्य रखा है | अप्रैल महीने में पिछले साल के मुकाबले 46.2% की भारी वृद्दि को देखते हुए तथा एक महीने में 47 हजार 747 करोड़ रूपये की प्राप्ति के साथ जून में सेवा कर में विस्तार एवं वृद्दि को देखते हुए सरकार के अप्रत्यक्ष कर संग्रह का यह लक्ष्य आसानी से हासिल हो जाना है | अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार लक्ष्य से ज्यादा संग्रह कर लेगी | इसकी सुनिश्चिता इसलिए ज्यादा है कि अप्रत्यक्ष कर में आमतौर चोरी नही होती | प्रत्यक्ष कर के मुकाबले बहुत कम होती है | यह कर वस्तुओ सेवाओं के उत्पादन व बिक्री के साथ वसूल होती रहती है | इसीलिए इस कर को अप्रत्यक्ष कर भी कहा जाता है | इसकी देनदारी प्रत्यक्ष करो की तरह धनाढ्य वर्गो तथा उच्च वेतनभोगी तबको को ही नही बल्कि समस्त अमीर - गरीब जनता को करना रहता है | धनाढ्य एवं उच्च लोगो तथा बेहतर आमदनियो के लोगो द्वारा वस्तुओ एवं सेवाओं को कही ज्यादा खरीदने व उसका उपभोग करने के वावजूद व्यापक आबादी ( एक अरब से उपर की जनसाधारण आबादी ) द्वारा वस्तुओ एवं सेवाओं की खरीद धनाढ्य एवं उच्च हिस्से से सैकड़ो गुना ज्यादा होती है | इसीलिए अप्रत्यक्ष कर का खासा बड़ा हिस्सा देश के व्यापक जनसाधारण द्वारा ही दिया जाता है | इसके विपरीत आयकर , निगम कर न्यूतम वैकल्पिक कर एवं अन्य करो के रूप में लिए जाने वाले प्रत्यक्ष कर की देनदारी  धनाढ्य उच्च एवं बेहतर आय के हिस्सों से लिया जाना है | इन प्रत्यक्ष करो में विभिन्न रूपों में कर चोरियों के साथ कर निलम्बन और कर अवकाश से छुट का काम हमेशा ही चलता रहता है | हालाकि सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों या गैर सरकारी उच्च वेतनभोगीयो में उनके घोषित वेतन भत्तो में कर चोरी की गुंजाइश नही रहती | पर उनकी इधर उधर की भ्रष्टाचारी कमाई ( जो अक्सर ज्यादा होती है ) इस टैक्स के दायरे से बाहर ही रहती है | इसके अलावा उन्हें अपना टैक्स बचाने के कई कानूनी रस्ते ( उदाहरण जैसे बीमा व विकास पत्र आदि के रास्ते ) भी रहते है |

इन टैक्सों के कानूनी बचाव में टैक्स अदालतों के साथ साथ स्वंय सरकार भी मौजूद रहती है | सरकारे धनाढ्य वर्गो को विभिन्न रूपों में टैक्सों की छुट देती रहती है | धनाढ्य वर्गो एनम कम्पनियों द्वारा की जाती रही टैक्स चोरिया देश व विदेश में काले धन के बड़े हिस्से के रूप में मौजूद है | इसके अलावा उन्हें घोषित तौर पर सरकारों द्वारा दी जाती रही छुटो का अनुमान इस बात से भी लगा सकते है कि देश की विभिन्न मोर्चो की सरकारों ने 2004—05 से लेकर 2014 तक देश के धनाढ्य हिस्से को 42 लाख करोड़ की घोषित छुट दिया हुआ है | स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष कर की वसूली एक तो धनाढ्य एवं उच्च वर्गो के वास्तविक आय व लाभ आदि के फर्जी झूठे आकड़ो के चलते उनके अनुमानित निर्धारण से कही कम हो पाती है , दुसरे उस निर्धारण राशि में भी सरकारे उन्हों धनाढ्य करदाताओ को लाखो करोड़ की छुट देती रहती है |

अत: स्पष्ट है कि प्रत्यक्ष कर के मुकाबले अप्रत्यक्ष कर की प्राप्ति कही ज्यादा सुनिश्चित रहती है | अब इसी अप्रत्यक्ष कर में वृद्दि के साथ इसका विभिन्न क्षेत्रो में विस्तार किया जा रहा है | फलस्वरूप अप्रत्यक्ष कर संग्रह में रिकार्ड वृद्दि के साथ इसके परिणाम स्वरूप जनसाधारण पर कर भार का रिकार्ड बोझ भी बढ़ जाना है | यह रिकार्ड बोझ मालो सामानों एकं सेवाओं की बढती रिकार्ड महगाई के रूप में बढना है | फिर यह रिकार्ड बोझ जनसाधारण को अपने आवश्यक उपभोग को भी काटने घटाने के लिए मजबूर करता रहेगा , जैसा की हो भी रहा है |


इसके विपरीत धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा की जाती रही प्रत्यक्ष कर चोरियों और उन्हें सरकारों द्वारा दिए जाते रहे प्रत्यक्ष कर छुटो रियायतों के फलस्वरूप इन वर्गो की धनाढ्यता तथा बेहतर आय के माध्यम वर्गीय हिस्सों तक की सुविधा सम्पन्नता आदि में लगातार वृद्दि होती जानी है जैसा की हो रहा है |

इन परस्पर विरोधी कराधान की स्थितियों से भी यह बात समझी जा सकती है की देश का सर्वाधिक धनाढ्य एवं साधन सम्पन्न हिस्सा अपने प्रत्यक्ष करो में कमी करवाने करो में छुट लेने के उद्देश्य से भी सरकारों पर अप्रत्यक्ष करो को बढाने का दबाव डालता रहा है | इसलिए भी अप्रत्यक्ष कर में वृद्दि व विस्तार को लेकर विरोधी पार्टिया एवं प्रचार माध्यमो में कोई हो हल्ला नही मचा रहा है |

सांसद निधि बढ़ाने का औचित्य ?


सांसद निधि बढ़ाने का औचित्य ?

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में ---- अदम गोंडवी


देश की आधी से ज्यादा आबादी फटेहाल है और देश के संसद में पांच करोड़ की सांसद निधि में पांच गुना वृद्दि करके उसे पच्चीस करोड़ किये जाने का प्रस्ताव किया गया है | यह प्रस्ताव सम्भवत: पारित भी हो चूका है | हालाकि सांसदों की मांग इसे पचास करोड़ तक कर देने की रही है | सांसद निधि में इस वृद्दि को लेकर तथा इसमें और ज्यादा वृद्दि किये जाने की मांग को लेकर पक्ष - विपक्ष में कोई मतभेद नही है | इस बात पर वे सभी एक जुट है | हालाकि दो  - तीन साल पहले कुछ नेताओं ने सांसद निधि - विधायक निधि को बढाये जाने का विरोध किया था | लेकिन इस बार किसी पार्टी या नेता का कोई ऐसा विरोध सुनाई नही पडा | उम्मीद  कीजिए कि सांसद एवं विधायक निधि के बढती रकम के साथ सभी पार्टियों के सांसद विधायक इसके पक्ष में और ज्यादा एकजुट हो जायेगे | उसे लेने और उसमे वृद्दि करवाते रहने को अपना बुनियादी अधिकार ही माँग  लेंगे |

अभी चार वर्ष पहले 2011में संसद और सांसदों द्वारा सांसद निधि को दो करोड़ प्रतिवर्ष से बढाकर पांच करोड़ रूपये प्रतिवर्ष कर दिया गया था | सांसद निधि में उस समय ढाई गुना 150% की वृद्दि का कारण विकास कार्यो में वृद्दि के साथ - साथ उसकी लागत में हुई वृद्दि को बताया गया था | ऐसा ही कुछ तर्क इस बार की सांसद निधि में वृद्दि के लिए भी दिया गया होगा | इन विकास कार्यो के अंतर्गत निर्माण कार्य , निर्वाचन क्षेत्र में सड़क , नाली ,खड़जा ,सामुदायिक भवन निर्माण , पेयजल शिक्षा स्वास्थ्य आदि के लिए आधारभूत ढाँचे व अन्य ससाधनो के निर्माण को शामिल किया गया है |

बताने की जरूरत नही है कि इन निर्माण कार्यो में तेजी से बढती मंहगाई के वावजूद उसके लागत मूल्य में पांच गुना की वृद्दि नही हुई है | लिहाजा लागत मूल्य बढने के चलते सांसद निधि को बढाने की बात तो कही से भी ठीक नही है | रह गयी बात क्षेत्र के विकास कार्यो में अर्थात निर्वाचन क्षेत्रो में किये जाने वाले निर्माण कार्यो में वृद्दि तो ऐसी वृद्दियो से इनकार नही किया जा सकता | लेकिन उन कामो में 4 - 5 गुना वृद्दियो की भी बात स्वीकारी भी नही जा सकती | फिर विभिन्न सांसदों - विधायको के खस्ताहाल विकास कार्यो के प्रचार माध्यमो में आते रहे लेखे - जोखे को देखते हुए तो उसे कदापि नही स्वीकारा जा सकता |
उसका लेखा - जोखा केवल सडक निर्माण व अन्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए खस्ता हाल निर्माण के रूप में ही नही है , बल्कि विभिन्न क्षेत्रो के निर्माण कार्यो में आम तौर पर 40% की अघोषित कमीशन खोरी के रूप में भी मौजूद है | इसे जनसाधारण भी जानता है | यही हाल विधायक निधि के जरिये किये जाते रहे है | क्या इसे शासन - प्रशासन में बैठे लोग तथा उच्च प्रचार माध्यमी हिस्से नही जानते ? खूब जानते है इसके वावजूद वे सांसद निधि के निर्धारण और उसमे होने वाली वृद्दियो पर चू तक नही करते है |
क्या वे केवल इसलिए चुप रहते है कि यह विभिन्न क्षेत्रो के विकास से जुडा मामला है | यह बात सही नही है | असली व प्रमुख बात है कि इन निधियो को मुख्यत: विकास के नाम पर सांसदों विधायको को सौपने का कारण एकदम दूसरा रहा है | इसे देने का असली उद्देश्य जनसाधारण के हितो की अनदेखी करने उसमे कटौतिया करने आदि की चलने वाली प्रक्रियाओं पर सांसदों विधायको को खामोश रखकर उनका समर्थन व सहयोग लेना रहा है | उनमे जनसाधारण की पक्षधरता को छोड़कर धनाढ्य वर्ग का खुलेआम पक्षधर बनाने का रहा है | इसके पीछे अगर देखा जाए तो देश - विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के छुटो अधिकारों को खुले आम बढ़ावा देना तथा मजदूरो किसानो बुनकरों छोटे - छोटे कारोबारियों आदि के अनुदानों सुविधाओं को काटने - घटाने वाली नीतियों का विरोध न करने के लिए विभिन्न पार्टियों के सांसदों को तैयार करना था और है | उन नीतियों के प्रति सांसदों में समर्थन बढाने और उन्हें देश के विकास की नीतिया बताते हुए भरपूर समर्थन के साथ लागू करना था और है |

उसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि सांसद निधि व विधायक निधि देकर सांसदों विधायको को अपने क्षेत्र का विकास करवाने का यह काम 1993 में शुरू किया गया था | याद रखने की जरूरत है की 1993 का काल देश में 1991से लागू उपरोक्त आर्थिक नीतिया ( उदारीकरण , वैश्वीकरणवादी , निजीकरणवादी नीतियों - के खुले समर्थन और खुले विरोध का काल था | केंद्र में और विभिन्न प्रान्तों में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी जहा इन नीतियों के समर्थन में थी , वही वामपंथी एवं कई अन्य पार्टिया इसके विरोध में थी | संसद से सडक तक विरोध व आन्दोलन का माहौल बना हुआ था | ऐसे समय में क्षेत्रीय विकास के नाम पर सांसद निधि और फिर विधायक निधि का भारी भरकम तोहफा देकर सभी पार्टियों के सांसदों विधायको में इस विरोध को कम करने का काम किया गया | जिसमे सरकार सफल भी रही |

इसके अलावा 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के साथ धार्मिक साम्प्रदायिक मुद्दों - मसलो को तथा उस समय के कई चर्चित भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठा दिया गया | विभिन्न पार्टियों को उन जनविरोधी एवं धनाढ्य वर्गीय नीतियों को प्रमुखता देने की जगह इन्ही मुद्दों की राजनीति को प्रमुखता देने दिलवाने का काम भी चालू करवा दिया गया | इस काम में आसानी इसलिए भी हो गयी कि देश में धर्मवादी सम्प्रदायवादी एवं जातिवादी क्षेत्रवादी राजनीति का चलन 80 – 85 के बीच बढ़ गया था |

राजनीति के इन मुद्दों के साथ सांसद निधि के भारी भरकम तोहफे ने भी कमोवेश सभी पार्टियों के सांसदों को 1995- 96 तक आते - आते इन नीतियों का समर्थक बना दिया | हालाकि कई पार्टिया द्वारा इन नीतियों का जबानी विरोध तब भी किया जाता रहा | लेकिन वे पार्टिया भी केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों में बैठकर उन नीतियों को आमतौर पर लागू करवाने का काम करती रही |

क्या उपरोक्त राजनीतिक स्थितियों और उनमे हुए बदलावों को देखते हुए सांसद निधि को राजनितिक आर्थिक भ्रष्टाचारी निधि नही कहा जाना चाहिए | इसी कारण  इससे ज्यादातर सांसद और विधायक अपना विकास कर रहे है साथ ही में उनके पत्नियों और करीबी लोगो के पास निजी विद्यालय महाविद्यालयों एवं अन्य ससाधनो का खड़ा होना और बढ़ते जाना लाजिमी है और वही हो रहा है |

गौर तलब बात है इन नीतियों के बढ़ते चरणों में विभिन्न पार्टियों के सांसदों विधायको के इस समर्थन की ओर ज्यादा जरूरत बढती जा रही है | किसानो , आदिवासियों की जमीने छीनकर धनाढ्य कम्पनियों को देने व छोटे कारोबारियों एव आम दुकानदारों के कारोबारों को कम्पनियों के लिए हडपने तथा शिक्षा स्वास्थ्य आदि क्षेत्रो को निजी मालिको को और ज्यादा सौपने के लिए लागू की जा रही नीतियों के अगले चरण में ऐसे समर्थन की और ज्यादा जरूरत है | इसीलिए इन निधियो में वृद्दि बढनी जरूरी है ताकि कही भी कोई विरोध के स्वर पार्टियों द्वारा ना उठे |
एक और बात – सांसद और विधायक निधि से क्षेत्र के सांसदों विधायको के क्षेत्रो के विकास के प्रचारों से भी जनसाधारण को यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि अब जनसाधारण के हितो की दृष्टि से विकास के काम से खेती – किसानी से लेकर शिक्षा स्वास्थ्य आदि के विकास के कामो से – देश की सरकारे अपना हाथ खिचती जा रही है | उसके लिए सरकारी खजाने से धन खर्च करने योजनाये व कार्यक्रम बनाने व लागू करने का काम भी छोडती जा रही है | अब सरकार वह काम इन सांसद विधायक निधियो पर तथा बहुप्रचारित जनकल्याणकारी कार्यक्रमों आदि पर डालती जा रही है | सरकारी या राष्ट्रीय धन के अधिकाधिक हिस्से को धनाढ्य वर्गो एवं कम्पनियों की सेवा में लगाकर जन सेवा के दायित्व से मुंह मोडती जा रही है | इसीलिए सांसद निधि , विधायक निधि को क्षेत्रीय विकास के नाम पर सांसदों – विधायको को जनविरोधी नीतियों का पक्षधर बनाने वाली निधियो के साथ – साथ जनहित की दृष्टि से विभिन्न क्षेत्रो के वास्तविक विकास के लिए आवश्यक सरकारी धन व सरकारी प्रयासों का काटने घटाने वाली निधि के रूप में भी देखा समझा जाना चाहिए |
 सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Friday, April 10, 2015

बनारसी पान ------------------------ 10-4-15

मलंग पान खाता नही मेरे मित्र शारिक साहब पान के शौक़ीन है आज की यह पोस्ट उनको समर्पित करता हूँ |
बनारसी पान ----
बनारसी पान को पूरी दुनिया जानती है इसकी प्रसिद्दी सम्पूर्ण विश्व में है अमिताभ बच्चन की फिल्म '' डान '' इसकी अलग तरह से प्रस्तुती दी है फिलहाल आये चलते है बनारसी पान की तरफ | बनारस में पान की खेती नही होती | फिर भी बनारसी बीडो की महत्ता सभी स्वीकार करते है | लगभग सभी किस्मो के पान यहाँ , जगरनाथी जी , गया और कलकत्ता आदि स्थानों से आते है | पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केंद्र बनारस है , शायद उतना बड़ा केंद्र विश्व का कोई नगर नही है | काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मुहल्ले बसे हुए है | सुबह सात बजे से लेकर ग्यारह बजे तक इन बाजारों में चहल- पहल रहती है | केवल शहर के पान विक्रेता ही नही , बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय पान खरीदने आते है | यहाँ से पान ' कमाकर ' विभिन्न शहरों में भेजा जाता है | ' कमाना ' एक बहुत ही परिश्रमपूर्ण कार्य है -- जिसे पान का व्यवसायी और उसके घर की महिलाये करती है , यही ' कमाने ' की क्रिया ही बनारसी पान की ख्याति का कारण है | इस समय भी बनारस में बीस हजार से अधिक पुरुष और स्त्रिया कमाने का कार्य करती है | कमाने का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि इस समय जो पान बाजार में हरी देशी पत्ती के नाम पर चालू है , उसे ही लोग एक साल तक पकाते हुए उसकी ताजगी बनाये रखते है | ऐसे ' पानो ' को मगही ' कहा जाता है
मगही जब सस्ता होता है तब पैसे में बीड़ा मिलता है , लेकिन जब धीरे धीरे स्टाक खत्म होने लगता है तब करीब दस रूपये तक यह पान बिकता है | यो बनारस जनता मगही पान के आगे अन्य पान को ' घास ' या बड़ का पत्ता ' सज्ञा देती है , किन्तु मगही के अभाव में उसे जगरनाथी पान का आश्रय लेना पड़ता है , अन्यथा प्रत्येक बनारसी मगही पान खाता है | इसके अलावा साँची - कपूरी या बंगला पान की खपत यहाँ नाम मात्र की होती है | बंगला पान बंगाली और मुसलमान ही अधिक खाते है | मगही पान इसीलिए अधिक पसंद किया जाता है कि वह मुंह में जाते ही घुल जाता है |
पान खाने की सफाई ----
बनारस के अलावा अन्य जगह पान खाया जाता है , लेकिन बनारसी पान खाते नही घुलाते है | पान घुलाना साधारण क्रिया नही है | पान का घुलाना एक प्रकार से यौगिक क्रिया है | यह क्रिया केवल असली बनारसियो द्वारा ही सम्पन्न होती है | पान मुंह में रखकर लार को इकठ्ठा किया जाता है और यही लार जब तक मुंह में भरी रहती है पान घुलता है | कुछ लोग उसे नाश्ते की तरह चबा जाते है , जो पान घुलाने की श्रेणी में नहीं आता है | पान की पहली पीक फेंक दी जाती है ताकि सुरती की निकोटीन निकल जाए | इसके बाद घुलाने की क्रिया शुरू होती है | अगर आप किसी बनारसी का मुंह फुला हुआ देख लें तो जाए कि वह इस समय पान घुला रहा है | पान घुलाते समय वह बाद करना पसंद नही करता | अगर बात करना जरूरी हो जाए तो आसमान की तरफ मुंह करके आपसे बात करेगा ताकि पान का , चौचक जम गया होता है , मजा किरकिरा न हो जाए | शायद ही ऐसा कोई बनारसी होगा जिसके रुमाल से लेकर पायजामे तक पान की पीक से रंगी न हो | गलियों में बने मकान कमर तक पान की पीक से रंगीन बने रहते है | सिर्फ इसी उदाहरण से स्पष्ट है कि बनारसी पान से कितनी पुरदर्द मुहब्बत करते है | भोजन के बाद तो सभी पान खाते है , लेकिन कुछ बनारसी पान जमाकर निपटने ( शौच करने ) जाते है , कुछ साहित्यिक पान जमाकर लिखना शुरू करते है और कुछ लोग दिन - रात गाल में पान दबाकर रखते है |
                                                              प्रस्तुती - सुनील दत्ता -      
आभार ' बना रहे बनारस '' पुस्तक से

Tuesday, April 7, 2015

श्रेष्ठ काव्य सृजन ------- रवीन्द्रनाथ टैगोर -------------------------- 8-4-15




एक बार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ  टैगोर और अंग्रेजी के महान कवि विलियम बटलर यीट्स के मध्य इस बात को लेकर चर्चा हो रही थी कि श्रेष्ठ काव्य का सृजन कैसे होता है | महाकवि यीट्स ने श्रेठ काव्य के बारे में अपने विचार रखते हुए  बोला --- ' कविता तो एक प्रवाह है , ह्रदय के भावनात्मक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है  | कविता में व्यक्ति के मन के भाव प्रगट होते है  | दूसरे शब्दों में कहे तो भावनात्मक अवस्था में कविता फूट पड़ती है , इसके स्वर माधुर्य निखरने लगते है और अपनी लय के संग प्रवाहित होने लगते है | इस प्रवाह की लय बनी रहनी चाहिए  , तभी श्रेठ कविता का सृजन होता है | '   गुरुदेव ने उनकी बातो से सहमति जताते हुए कहा -- ' तुमने सही कहा मित्र , काव्य तो वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए | किन्तु यहाँ पर मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि जब कवि अपनी चेतना के शिखर पर आरूढ़ होता है तो उस समय कविता रूपी उद्दार उसकी चेतनात्मक लौ को स्पर्श करते है  | फिर वहा  से कविता नि:सृत होती है , झरनों के समान झरती है | ऐसी कविता के माध्यम से चेतना के उच्च स्तर  तक पँहुचा जा सकता है | ऐसी कविता की हरेक पंक्तिया मन्त्र बन जाती है | यदि मैं भारतीय महाकाव्यों की बात करूँ तो ऋग्वेद  ऐसा प्रथम महाकाव्य है , जिसकी हरेक रिचाए छंदबद्द  एवं मंत्रात्मक है | ' इसके बाद रवीन्द्रनाथ  टैगोर ने यीट्स से सवालिया लहजे में कहा -- ' आप यह तो जानते ही होंगे कि इन ऋचाओं के रचयिता को ऋषि कहा जाता है ? यीट्स बोले -- ' ऋषि ही कवि होते है | इन्हें तो सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है | ' रवीन्द्रनाथ  ने कहा -- ' हाँ मित्र , ऋषि विलक्षण कवि होते है , जिनकी दृष्टि प्रकृति के आर - पार होती है | वे द्रष्टा  होते है , जो जीव , प्रकृति एवं परमात्मा के दिव्य सम्बन्धो के अनुभव को कहते है | यही दिव्य एवं परम अनुभव छंदबद्द होकर प्रवाहित होता है और अपने सानिध्य में आने वालो को दिव्य ऊर्जा से सरोबोर कर देता है | यही सच्ची एवं श्रेष्ठ कविता है | रामायण . महाभारत व गीता जैसे ग्रन्थ इसी श्रेणी में आते है | ' रवीन्द्रनाथ  की बाते यीट्स के ह्रदय में उतर रही थी और वे अनुभव कर रहे थे कि जब तक मनुष्य भावनाओं की श्रेष्ठता तक नही पहुचेगा , तब तक उसके जीवन में समस्वरता नही आएगी और न ही वह किसी काव्य प्रवाह का माध्यम बन सकेगा |


                                                                                                                 ----------------- कबीर

Wednesday, April 1, 2015

सुबहे बनारस ------------------------------ 2-4-15

किसी के जुबान से आप सुन सकते है कि अगर आपने बनारस की सुबह और अवध की शाम नही देखी तो आपने कुछ नही देखा |


बनारस की सुबह - इलाहाबाद की दोपहर , अवध की शाम और बुन्देलखण्ड की रात सारे भारत में प्रसिद्द है  | कहा जाता है कि आत्महत्या के लिए उद्यत व्यक्ति को यदि सुबह बनारस में , दोपहर को इलाहाबाद में शाम अवध में और रात को बुन्देलखण्ड में घुमाया जाए तो उसे अपने जीवन के प्रति अवश्य मोह उत्पन्न हो जाएगा और शायद उसमे कवित्व की भावना भी जागृत हो जाए | उत्तर प्रदेश के साहित्यिक गढ़ इसके प्रमाण है |



यदि आपने बनारस की सुबह नही देखि है तो कुछ नही देखा | बनारस का असली रूप यहाँ की सुबह को ही देखने को मिलता है | अब सवाल यह है कि बनारस में सुबह होती कब है  ? अंग्रेजी सिद्दान्त के अनुसार या हिन्दू ज्योतिष के अनुसार , इसका निर्णय करना कठिन है | लगे हाथ उसका उदाहरण भी ले लीजिये | अपने राम पैदाइशी ही नही , खानदानी बनारसी है , इस शहर की गलियों में नगे होकर टहले है  , छतो पर कनकौवे उडाये है  , पान घुलाया है , भान्फ़ छानी है और गहरेबाजी भी की है | लेकिन आज तक हम खुद ही नही जान पाए किबनारस की सुबह होती कब है  ?

दो - तीन वर्ष पहले की बात है  , हम काशी के कुछ साहित्यिको के साथ कवी सम्मेलन से लौट रहे थे | जाड़े की अँधियारी रात | बाढ़ बज चुके थे  | घात किनारे नाव लगी | हमने आश्चर्य के साथ देखा -- एक आदमी दातों कर रहा था | जब यह पूछा गया कि इस समय दातों करने का क्या तुक है , तब उसने एक बार आसमान की ओर देखा और फिर कहा  , '' सुकवा उगल बाय , अब भिनसार में कितना देर बाय | '' अर्थात शुक्र तारे का उदय हो गया है , अब सबेरा होने में देर ही कितनी है ? इतना कहकर उसने कुल्ला किया और बम महादेव की आवाज लगाता हुआ दुबकी मार गया | यह दृश्य देखकर कोट - चादर के भीतर हमारे बदन कॉप  उठे  | 


सुबह के चार बजे से सरे शहर के मंदिरों के देवता अँगड़ाई लेते हुए स्नान और जलपान की तैयारी में जुट जाते है | मंदिरों में बजने वाले घड़ियालो और घंटो की आवाज से सारा शहर गूंज उठता है | सड़क के फुत्पाठो पर  , दूकान की पटरियों पर सोयी हुई जीवित लाशें कुनमुना उठती है | फिर धीरे - धीरे बीमार तथा बूढ़े व्यक्ति - जिन्हें डाक्टरों की ख़ास हिदायत है कि सुबह जरा टहला करे -- सडको पे दिखाई देने लगते है  | मकानों के वातायन से छात्रो के अस्पष्ट स्वर  , गंगा जाने वाले स्नानर्थियो की भीड़ और घ्रेबाज इक्को और रिक्शो के कोलाहल में सारा शहर खो जाता है |

कंचनजघा की सूर्योदय की छटा अगर आपने न देखि हो अथवा देखने की इच्छा हो तो आप बनारस अवश्य चले आइये  | यह दृश्य आप काशी के घाटो के किनारे देख सकते है  | मेढक की छतरियो जैसी घुटी हुई अनेक खोपडिया , जिन्हें देखकर चपतबाजी खेलने के लिए हाथ खुजलाने लगत अ है , नाइयो के पास लेते हुए मालिश कृते हुए जवान पठ्ठे , आठ - आठ घंटे स्पीड के साथ माला फेरते हुए भक्त , ध्यान में मगन नाक दबाए भक्तिने , कमंडल में अक्षत -- फूल लिए सन्यासियों तथा स्नानर्थियो का समूह , अशुद्द और अस्पष्ट मन्त्रो का पाठ करती दक्षिणा संभालती हुई पंडो की जमात , साफा लगानेवाले नवयुवको की भीड़ और बाबा भोलानाथ की शुभकामनाओं का टेलीग्राफ पहुचाने वाले भिखमंगो की भीड़ -- सब कुछ आपको काशी के गातो के किनारे सुबह देखने को मिलेगा |  


मिर्जा ग़ालिब की वकालत ----


अगर आपको मेरी बात का यकीन न हो तो नजमुद्दौला , निजाम जंग मिर्जा असदुल्ला बेग खा उर्फ़ मिर्जा ग़ालिब का ब्यान ले लीजिये ----

त आल्ल्ला बनारस चश्मे बद दूर
बहिश्ते खुर्रमो फिरदौसे मामूर
इबातत खानए नाकसिया अस्त
हमाना कावए हिन्दोस्ता अस्त



( हे परमात्मा , बनारस को बुरी दृष्टि से दूर रखना क्योकि यह आनन्दमय स्वर्ग है  | यहाँ घंटा बजानेवालो अर्थात हिन्दुओ की पूजा का स्थान है यानी यही हिन्दुस्तान का काबा है |)




बुतानशरा हयूला शोलए तूर
सरापा नूर , ऐजद चश्म बद दूर
मिया हां ना.जुको दिल हां तुवाना
जे नादानी बकारे ख्वशे दाना
तबस्सुम बस कि दर दिल हां तिबी ईस्त
दहन हा रश्के गुल हाए रबी ईस्त
जे अगेजे कद अन्दाजे खरामे
बी पाये गुल बुने गुस्तरद: दामे


( यहाँ के बुतों अर्थात और बुतों अर्थात सुन्दरियों की आत्मा तूर के पर्वत की ज्योति के समान है | वह सिर से पाँव तक इश्वर का प्रकाश है | इन पर कुदृष्टि न पड़े | इनकी कमर तो कोमल है , किन्तु ह्रदय बलवान है | यो इनमे सरलता है , किन्तु अपने काम में बहुत चतुर है  | इनकी मुस्कान ऐसी है कि हृदय पर जादू का काम करती है  | इनके मुखड़े इतने सुन्दर है कि रबी अर्थात चैत के गुलाब को भी लजाते है  | इनके शरीर की गति तथा आकर्षक कोमल चाल से ऐसा जान पड़ता है कि गुलाब के समान पाँव के फूलो का जाल बिछा देती है | )


ज ताबे जलवये ख्वेश आतिश अफरोज
बयाने बुतपरस्तो बरहमन सोज
बी लुफ्ते मौजे गौहर नर्म रु तर
बी नाज अज खूने आशिख गर्म रु तर


( अपनी ज्योति से  , जो अग्नि के समान प्रज्वलित है , यह बुतपरस्त तथा बरहमन की बोलने की शक्ति भस्म कर देती है अर्थात यह इनका सौन्दर्य देखकर मूक हो जाते है | पानी में उनका विलास मोती की लहरों से भी नर्म और कोमल जान पड़ता है | पानी में स्नान करनेवाली जो अठखेलिया करती है  , उनसे जो पानी के छीटे उठते है , उनकी ओर कवी का संकेत है | उनका नाज अर्थात हास - विलास आशिक के खून से  भी गर्म है | )

व सामाने गुलिस्ता बर लबे गंग
ज ताबे रुख चिरागा वर लबे गंग
रसाद: अज अदाए शुस्त व शूए
बी हर मौजे नवेदे आबरुए
कयामत कामता , मिजगा दराजा
ज मिजगा बर सफे - दिल तीर: बाजा
बी मस्ती मौज रा फरमुद: आराम
ज नगजे आब रा बखशिन्दा अन्दाम

( गंगा किनारे यह क्या आ गयी , एक उद्यान आ गया है | इनके मुख के प्रकाश से गंगा के किनारे दीपावली का दृश्य हो गया है | उनके नहाने -- धोने की अदा से प्रत्येक मौज को आबरू का आमन्त्रण मिलता है | इन सुन्दर डील - डौलवाली तथा बड़ी - बड़ी पलकोवाली सुन्दरियों से कयामत आती है | यह दिल की पंक्ति पर अपनी बड़ी बरौनियो से तीर चलाती है  | अपनी मस्ती से इन्होने गंगा की लहरों को शांत कर दिया है | अपनी सुन्दरता से इन्होने पानी को स्थिर कर दिया है | )

फताद: शौरिशे दर कालिबे आब
ज माही सद दिलश दर सीना बेताब
ज ताबे जलवा हां बेताब गश्त:
गोहर हां दर सदफ हा आव गश्त:
ज बस अर्जे तमन्ना मी कुनद गंग
ज मौजे आबहा वा मी कुनद गंग


( पुन: पानी के शरीर के अन्दर इन्होने हलचल उत्पन्न  कर दी और सीने में सैकड़ो  दिल मछली के समान छटपटाने लगे  | अपने सौन्दर्य की उष्णता से विकल होकर वह पानी में चली गयी और ऐसा जान पड़ता है जैसे सीप में मोती हो  | गंगा भी अपने ह्रदय की अभिलाषा प्रकट करती है और पानी की अपनी लहरों को खोल देती है कि आओ इसमें स्नान करो | )
बनारस की सुबह की तारीफ़ में मिर्जा ग़ालिब का यह कलाम पेश करने के बाद यह जरूरी नही कि ऐरो - गैरो की भी गवाही पेश करूं  | गोकि एक शायर ने यह तक़रीर पेश की है कि सुबह के वकत आसमान के सारे बादल बनारस की गंगा में दुबकी लगाकर पानी पीते है और फिर उसे सारे हिन्दुस्तान में ले जाकर बरसा देते है | उस शायर का नाम याद नही आ रहा है , इसके लिए मुझे दुःख है |


प्रस्तुती सुनील दत्ता            --------- आभार बना रहे बनारस से

अनूठे उस्ताद 1-4-15


काशी नगर के बाहर एक महन्त का आश्रम था  | उनके पास कई लोग अपनी समस्याए लेकर आते और वे उनका   उचित समाधान करते | एक दिन एक शिष्य ने महन्त से प्रश्न किया -- गुरुदेव , आपके गुरु कौन है  ?  आपने  किससे शिक्षा ग्रहण की है  ?  महंत मुस्कुराए और बोले -- '  मेरे एक नही , सैकड़ो गुरु है , जिनसे मैंने सीखा  है  | पर मैं यहाँ तुम्हे दो गुरुओ के बारे में बताता हूँ | इतना कहकर महंत थोडा रुके , फिर बोले - गर्मी  के दिन थे  | मैं एक रोज एक निर्जन मार्ग पर जा रहा था  | राह में चलते हुए मुझे प्यास लगने लगी और मैं पानी की तलाश में घूम रहा था | मुझे वहा  एक पोखरा नजर आया और मैं उस ओर बढ़ गया |  तभी वहा  पर एक कुत्ता आया | वह भी प्यासा था  | जैसे ही वह पानी पीने के लिए पोखरे के नजदीक पहुचा , उसे पानी में एक और कुत्ता नजर आया जो कि वास्तव में उसकी परछाई थी  | कुत्ता उसे देखकर डर गया और भौकते हुए पीछे हट गया | थोड़ी देर बाद वह फिर आया , लेकिन परछाई को देख कर पुन: पीछे हट गया | ऐसा कई बार हुआ | कुत्ता परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता | लेकिन जब उससे प्यास सहन नही हुई तो अंतत: वह अपने डर के वावजूद पोखरे में कूद पडा | उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गयी  |  यह देखकर उस कुत्ते से मुझे एक बड़ी सीख  मिली कि सफलता उसे ही मिलती है , जो डर का साहस से मुकाबला करता है  | ' शिष्य ने महंत से पूछा -- और आपका दूसरा गुरु कौन था  ? ' मेरा दुसरा गुरु एक छोटा बच्चा था | मैं रात के समय एक गाँव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा जलती मोमबत्ती लेकर जा रहा है  | मैंने उससे पूछा -- क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई  ?  उसके हाँ कहने पर मैंने  उससे कहा ' एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया , जब यह जल गयी | क्या तुम मुझे वह स्रोत दिखा सकते हो , जहा से वह ज्योति आई ? सुनकर बच्चा  हंसा और मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझाते  हुए बोला -- अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है | क्या आप बता सकते है कि वह कहा  गयी ? यह सुनते ही मेरा ज्ञानी होने का अंहकार चकनाचूर हो गया और तबसे मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिया | इसके बाद महंत ने शिष्यों को समझाते हुए कहा -- '' शिक्षा  कही से भी और किसी से भी और कभी भी मिल सकती है | जरूरत इस बात की है कि हम हरदम सीखने  के लिए तैयार रहे |