Friday, April 12, 2019

महत्वपूर्ण सबक

ब्रिटिश राज से अब तक के चुनाव भागीदारी से महत्वपूर्ण सबक -


ब्रिटिश राज में चुनावी भागीदारी की शुरुआत 1857 के महान आन्दोलन के बाद शुरू किये गये सवैधानिक सुधारों के जरिये हुई थी | यह शुरुआत 1857 के संग्राम और उसके बाद हिन्दुस्तानियों द्वारा अपने अधिकारों की मांगो के साथ चलाए जा रहे आंदोलनों के साथ 1905 के बाद स्वराज एवं स्वतंत्रता की मांगो के साथ खड़े आंदोलनों संघर्षो के चलते ही 1903 , 1919 और फिर 1935 के सवैधानिक सुधार लाये गये | इन सवैधानिक सुधारों के जरिये ही सम्पत्तिवान , सुशिक्षित एवं पद - पदवी प्राप्त भारतीयों को मतदाता एवं शासकीय प्रतिनिधि बन्ने के अधिकार मिलते रहे | इस प्रक्रिया की परिणिति 1950 में देश को गणतंत्र घोषित किये जाने के बाद से देश के सभी व्यस्क लोगो को मिले मताधिकार के रूप में आया |
चुनावी भागीदारी बढ़ने और उसका जनसाधारण समाज तक विस्तारित होने के इस इतिहास से यह सबक निकालन मुश्किल नही है कि चुनाव में भागीदारी के अधिकार का मिलना ब्रिटिश राज्विरोधी आंदोलनों संघर्षो का परिणाम था | चुनावी भागीदारी बढ़ने के साथ हिन्दुस्तानियों के , खासकर धनाढ्य एवं उच्च वर्ग के हिन्दुस्तानियों के अधिकारों में वृद्धि होती रही है | जनसाधारण के लिए अधिकारों में वृद्धि की एक बड़ी परिणिति 1950 के तुरंत बाद लागू किये गये जमींदारी उन्मूलन कानून एवं कई अन्य सवैधानिक अधिकारों के रूप में हुई | इसके वावजूद 1950 के बाद चुनावी भागीदारी के साथ बढती समस्याओं को लेकर ज्नान्दोअलन का सिलसिला कमोवेश चलता रहा | जिसके फलस्वरूप भी जनसाधारण के जीविकोपार्जन के अवसरों को कुछ बढ़ावा मिलने के साथ शिक्षा , चिकित्सा जैसे आवश्यक सेवाओं में भी वृद्धि होती रही | पर 1980 - 85 के बाद लगातार घटते जन आंदोलनों के साथ जनसाधारण के उपरोक्त जनतांत्रिक अधिकारों में लगातार कटौती होती रही | हालाकि उसके मतदान के अधिकारों में अभी प्रत्यक्ष कटौती नही हुई है , पर उसमे भी अचानक कटौती का परिलक्षण 1975 में लगे आपातकाल के दौरान हो चूका है | फिर अब उसका एक दुसरा परिलक्षण , धर्म , जाति के पहचानो के मुद्दों पर मताधिकार को संकुचित सक्रीण बनाये जाने के रूप में लगातार किया जा रहा है | 1947-50 से पहले और उसके बाद के जन आंदोलनों के अभाव में जन साधारण को मिले मतदान के अधिकार को भी को संकुचित बनाया जाना या कभी आवश्यकता पड़ने पर खत्म किया जाना लगभग निश्चित है | इसलिए जन साधारण को अपने व्यापक एवं बुनियादी हितो में मांगे उठाना और उसके लिए आन्दोलन करना आवश्यक हो गया है || साथ ही मतदान के अधिकार को भी अपने बुनियादी एवं व्यापक समस्याओं के साथ जोड़ना आवश्यक हो चूका है ||
इसके लिए पहली आवश्यकता तो यह है की जनसाधारण किसान , मजदुर एवं अन्य समस्याग्रस्त श्रमजीवी अपने शारीरिक एवं मानसिक श्रमजीवी पहचानो मुद्दों को प्रमुखता देते हुए मतदान करें | अगर कोई पार्टी प्रत्याक्षी जनहित का प्रतिनिधित्व करता नही मिल पाता तो वे सभी पार्टियों के विरुद्ध मतदान करें | इस विरोध को घोषित करने के साथ ''नोटा ''पर मतदान जनविरोध का व्यक्त करने का एक विकल्प बन सकता है | फिर कल मतदान के रूप में खड़े जनविरोध को जनसमस्याओ के विरुद्ध जनांदोलन में बदला जा सकता है और बदल देना चाहिए | जनहित के लिए जनांदोलन को बहुआयामी बनाने की शुरुआत अगर ब्रिटिश काल में ब्रिटिश राज विरोधी आंदोलनों से हुई थी तो आज की शुरुआत चुनाव में जनविरोधी नीतियों के जनविरोध की अभिव्यक्ति के साथ ''नोटा '' पर मतदान के रूप में की जा सकती है |

Monday, April 8, 2019

बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है" -- भगत सिंह

बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है"

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आज ही के दिन 1929 को भगतसिंह व् बटुकेश्वर दत्त ने"बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है"के मुख्य वक्तव्य के साथ असम्बली में बम फेका था। साथ में फेका था यह पर्चा।जिसको पढ़ा जाना आज भी सबसे ज्यादा जरूरी है। 8 अप्रैल, सन् 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अंग्रेजी पर्चे का हिन्दी अनुवाद।-
असेम्बली हॉल में फेंका गया पर्चा
8 अप्रैल, सन् 1929 को असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बाँटे गए अंग्रेजी पर्चे का हिन्दी अनुवाद।- सं.
‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना’
सूचना
“बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की आवश्यकता होती है,” प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
पिछले दस वर्षों में ब्रिटिश सरकार ने शासन-सुधार के नाम पर इस देश का जो अपमान किया है उसकी कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं और न ही हिन्दुस्तानी पार्लियामेण्ट पुकारी जानेवाली इस सभा ने भारतीय राष्ट्र के सिर पर पत्थर फेंककर उसका जो अपमान किया है, उसके उदाहरणों को याद दिलाने की आवश्यकता है। यह सब सर्वविदित और स्पष्ट है। आज फिर जब लोग ‘साइमन कमीशन’ से कुछ सुधारों के टुकड़ों की आशा में आँखें फैलाए हैं और इन टुकड़ों के लोभ में आपस में झगड़ रहे हैं,विदेशी सरकार ‘सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक’ (पब्लिक सेफ्टी बिल) और ‘औद्योगिक विवाद विधेयक’ (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) के रूप में अपने दमन को और भी कड़ा कर लेने का यत्न कर रही है। इसके साथ ही आनेवाले अधिवेशन में ‘अखबारों द्धारा राजद्रोह रोकने का कानून’ (प्रेस सैडिशन एक्ट) जनता पर कसने की भी धमकी दी जा रही है। सार्वजनिक काम करनेवाले मजदूर नेताओं की अन्धाधुन्ध गिरफ्तारियाँ यह स्पष्ट कर देती हैं कि सरकार किस रवैये पर चल रही है।
राष्ट्रीय दमन और अपमान की इस उत्तेजनापूर्ण परिस्थिति में अपने उत्तरदायित्व की गम्भीरता को महसूस कर ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र संघ’ ने अपनी सेना को यह कदम उठाने की आज्ञा दी है। इस कार्य का प्रयोजन है कि कानून का यह अपमानजनक प्रहसन समाप्त कर दिया जाए। विदेशी शोषक नौकरशाही जो चाहे करे परन्तु उसकी वैधनिकता की नकाब फाड़ देना आवश्यक है।
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़ कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रांति के लिए तैयार करें। हम विदेशी सरकार को यह बतला देना चाहते हैं कि हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे हैं।
हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्जवल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर मिल सके। हम इन्सान का खून बहाने की अपनी विवशता पर दुखी हैं। परन्तु क्रांति द्वारा सबको समान स्वतन्त्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति में कुछ-न-कुछ रक्तपात अनिवार्य है।


इन्कलाब जिन्दाबाद !
ह. बलराज
कमाण्डर इन चीफ

Sunday, April 7, 2019

सूक्ष्म अंहकार -

सूक्ष्म अंहकार -

बोध कथा
एक सम्राट विश्वविजेता हो गया | तब उसे खबर मिलने लगी कि उसके बचपन का एक साथी बड़ा फकीर हो गया है | दिगम्बर फकीर नग्न रहने लगा है | उस फकीर की ख्याति सम्राट तक आने लगी | सम्राट ने निमंत्रण भेजा कि आप कभी आये राजधानी आये ; पुराने मित्र है , बचपन में हम साथ थे , एक साथ स्कूल में पढ़े थे ,एक पट्टी पर बैठे थे ; बड़ी कृपा होगी आप आये |
फकीर आया | फकीर तो पैदल चलता था , नग्न था , महीनों लगे | जब फकीर ठीक राजधानी के बाहर आया तो कुछ यात्री जो राजधानी से बाहर जा रहे थे , उन्होंने फकीर से कहा कि तुम्हे पता है ; वह सम्राट अपनी अकड तुम्हे दिखाना चाहता है | इसलिए तुम्हे बुलाया है | फकीर ने कहा , कैसे अकड ! क्या अकड दिखाएगा ? तो उन्होंने कहा , वह दिखला रहा है अकड , पूरी राजधानी सजाई गयी है , रास्तो पर मखमली कालीन बिछाए गये है , सरे नगर में दीप जलाए गये है , सुगंध छिडकी गयी है , फूलो से पाट दिए है रास्ते , सारा नगर संगीत से गुन्जायेमान हो रहा हैं | वह तुम्हे दिखाना चाहता है कि देख , तू क्या है , एक नगा फकीर ! और देख , मैं क्या हूँ ! फकीर ने कहा , तो हम भी दिखा देंगे |
वे यात्री तो चले गये | फिर सांझ जब फकीर पहुचा और राजा , सम्राट द्वार तक लेने आया उसे नगर के - अपने पूरे दरबार के साथ आया था | उसने जरुर राजधानी खूब सजाई थी , उसने तो सोचा भी नही था कि यह बात इस अर्थ में ली जायेगी | उसने तो यही सोचा था कि फकीर आता है , बचपन का साथी , उसका जितना अच्छा स्वागत हो सके ! शायद छिपी कहीं बहुत गहरे में यह वासना भी रही होगी -- दिखाऊं उसे - मगर यह बहुत चेतन नही थी | इसका साफ़ - साफ़ होश नही था | गहरे में हरुर रही होगी | हमारी गहराइयो का हमीं को पता नही होता | जब फकीर आया तो फकीर नग्न था ही , उसके घटने तक पैर भी कीचड़ से भरे थे | सम्राट थोड़ा हैरान हुआ , क्योकि वर्षा तो हुई नही | वर्षा के लिए तो लोग तड़प रहें है | रस्ते सूखे पड़े है , वृक्ष सूखे जा रहे है , किसान आसमान की तरफ देख रहा हैं | वर्ष होनी चाहिए और हो ही नही रही है , समय निकला जा रहा है | इतनी कीचड़ कहाँ से मिल गयी की घटने तक कीचड़ से पैर भरे है ! लेकिन सम्राट ने वहां द्वार पर तो कुछ न कहना उचित समझा | महल तक ले आया | और फकीर उन बहुमूल्य कालीनो पर कीचड़ उछलता हुआ चलता गया | जब राजमहल में प्रविष्ट हो गये और दोनों अकेले रह गये तब सम्राट ने पूछा की मार्ग में जरुर कष्ट हुआ होगा , इतनी कीचड़ आपके पैरो में लग गयी | कहाँ तकलीफ पड़ी ?क्या अड़चन आई ?
तो उसने कहा , अड़चन ? अड़चन कोई भी नही | तुम अगर अपनी दौलत दिखाना चाहते हो तो हम अपनी फकीरी दिखाना चाहते है | हम फकीर है | हम लात मारते है तुम्हारे बहुमूल्य कालीनो को | सम्राट हंसा और उसने कहा , मैं तो सोचता था की तुम बदल गये होगे लेकिन तुम वही के वही , आओ गले मिलो | जब हम अलग हुए थे स्कूल से , तब से और अब में कोई फर्क नही पडा है | हम एक ही साथ , हम एक जैसे | अंहकार के रस्ते बड़े सूक्ष्म है | फकीरी भी दिखलाने लगता है | इससे थोडा सावधान होना जरूरी है | और जब अंहकार परोक्ष रस्ते लेता है तो ज्यादा कठिन हो जाता है | सीधे सीधे रस्ते तो बहुत ठीक होते है

Friday, April 5, 2019

अम्बेडकर बौद्ध क्यो बने ?

अम्बेडकर बौद्ध क्यो बने ?

यह आकस्मिक नही है कि अबेडकर बौद्ध हुए | यह पच्चीस सौ साल के बाद शुद्रो का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना , या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ मुड़ना , बौद्ध होने की आकाक्षा , बड़ी सूचक है | इससे बुद्ध के सम्बन्ध में खबर मिलती है |
हिन्दू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नही है | वर्ण व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा | यह कुछ आकस्मिक बात नही थी कि डा अबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शुद्रो को बौद्ध होने का निमत्रण दिया | इसके पीछे कारण है | अबेडकर ने बहुत बाते सोची थी | पहले उन्होंने सोचा कि ईसाई हो जाए , क्योकि हिन्दुओ ने तो सता डाला है , तो ईसाई हो जाए | फिर सोचा कि मुसलमान हो जाए | लेकिन यह कोई बात जमी नही , क्योकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव हैं | वर्ण के नाम से न होगा तो शिया - सुन्नी का है | अंतत: अबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जैम गयी अबेडकर को कि शुद्र को सिवाए बुद्ध के साथ और कोई उपाए नही है | क्योकि शुद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध है -- और कोई राजी नही हो सकता -- जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नही , मनुष्य का चरम मूल्य है |
यह आकस्मिक नही है कि अबेडकर बौद्ध हुए | यह पच्चीस सौ साल के बाद शुद्रो का फिर बौद्धत्व की तरफ मुड़ना , बौद्ध होने की आकाक्षा , बड़ी सूचक है | इससे बुद्ध के सम्बन्ध में खबर मिलती है | बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी | जवान , युवको को सन्यास दे दिया | हिन्दू नाराज हुए | सन्यस्त तो आदमी होता है आखिर अवस्था में मरने के करीब | अगर बचा रहा तो पचहत्तर साल के बाद उसे सन्यस्त होना चाहिए | तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नही | अगर बच गये तो पचहत्तर साल के बाद उर्जा नही बचती जीवन में | तो हिन्दुओ का सन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है , जो आखरी घड़ी में कर लेना है | मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा सम्बन्ध नही है | बुद्ध ने युवको को सन्यास दे दिया , बच्चो को सन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नही है , लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा | अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भो परमात्मा को खोजने की , सत्य को खोजने की , जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकाक्षा जगी है , तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरुरत नही इ | वह अपनी आकाक्षा को सुने , वह अपनी अपनी आकाक्षा से जाए | प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकाक्षा से जिए | उन्होंने सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए , मनुष्य प्रमुख हो गया | तो वे सैद्धांतिक नही है , विधिवादी नही है | लीगल नही है उनकी पकड़ा , उनके धर्म की पकड़ मानवीय है | कानून इतना मूल्यवान नही है , जितना मनुष्य मूल्यवान है | और हम कानून बनाते इसलिए की वो मनुष्य के काम आये | इसलिए जब जरूरत हो तो कानून बदला जाए | जब मनुष्य की हित में हो ठीक है , जब अहित में हो जाए तो तोड़ा जा सकता है | कोई कानुन्शाश्वत नही है , सब कानून उपयोग के लिए है |बुद्ध नियमवादी नही है , बोधवादी है | अगर बुद्ध से पूछो , क्या अच्छा है , क्या बुरा है तो बुद्ध उत्तर नही देते है | बुद्ध यह नही कहते कि यह काम बुरा है और यह कम अच्छा है | बुद्ध कहते है , जो बोधपूर्वक किया जाए , वह अच्छा , जो बोधहीनता से किया जाये , बुरा |
इस फर्क को ख्याल में लेना | बुद्ध यह नही कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है | कभी कोई बात पूण्य हो सकती है और कभी कोई बात पाप हो सकती है | इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के उपर लगे हुए लेबिल नही है | तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का ? बुद्ध ने एक नया आधार दिया | बुद्ध ने आधार दिया -- बोध जागरूकता | इसे ख्याल में लेना | जो मनुष्य जागरूकता पूर्वक कर पाए , जो भी जागरूकता में ही किया जा सके , वही पूण्य है और जो बात केवल मूर्च्छा में ही की जा सके , वही पाप है |
बुद्ध असहज के पक्षपाती नही है सहज के उपदेष्टा है | बुद्ध कहते है कठिन के ही कारण आकर्षित मत हो | क्योकि कठिन में अहंकार ला लगाव है |इसे तुमने कभी देखा कभी ? जितनी कठिन बात , लोग करने को उसमे उतने उत्सुक होते है | क्योकि कठिन बात में अंहकार को रस आता है मजा आता है | तो बुद्ध असहजवादी नही है | बुद्ध कहते है सहज पर ध्यान दो | जो सरल है सुगम है उसको जियो | जो सुगम है , वही साधना है | जीवन तो सुगम है सरल है | सत्य सुगम और सरल ही होगा | तुम नैसर्गिक बनो और अंहकार के आकर्षणों में मत उलझो |

Tuesday, February 26, 2019

साझी विरासत - ऐतिहासिक दृष्टिकोण

साझी विरासत - ऐतिहासिक दृष्टिकोण

{अंग्रेजी शासन से पहले इस देश के मुसलमानों में शासक होने और हिन्दुओ में शासित होने के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण के साथ अन्य कई ऐतिहासिक मुद्दे पर ऐसे ही भिन्न व् विरोधी दृष्टिकोण मौजूद है | उन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है | यह पुनर्विचार वर्तमान समय में हिन्दुओ मुसलमानों के बीच मौजूद धार्मिक साम्प्रदायिक अंतरविरोधो को घटाने - मिटाने के लिए नितांत आवश्यक है }---

जहाँ तक इस देश के मुसलमानों में देश का शासक होने और हिन्दुओ में शासित होने की बात है , तो यह दोनों बाते सही नही है | वास्तविकता यह है कि इस देश के मुसलमान जो हिन्दू से मुसलमान बने , और जिनमे मुसलमान बनने के बाद भी जातीय विभाजन मौजूद रहा है . वे इस देश के कभी भी सर्वोच्च शासक या बड़े क्षेत्रीय शासक भी नही रहे | अगर उस समय छोटे - मोटे - राज्यों जागीरो के रूप में कुछ हिन्दुस्तानी मुसलमान शासक थे , तो ऐसे हिन्दू राजा जागीरदार भी मौजूद थे . और वे दोनों ही बाहर से आये अफगानी , तूरानी एवं इरानी सरदारों के अधीन थे | उनसे विद्रोह करके हिन्दू राज्य या सिख राज्य बनाने या फिर मुग़ल सरदारों के बीच के झगड़ो का लाभ उठाकर हिन्दुस्तानी मुसलमान कहे जाने वाले सैयद बंधुओ का मुग़ल शासन पर प्रभाव - प्रभुत्व खड़ा करने का इतिहास बाहरी मुस्लिम शासको के विरुद्ध संघर्ष का इतिहास रहा है और यह इतिहास देश के सभी धर्मावलम्बियों का रहा है |
देश के मुसलमानों द्वारा बाहरी मुसलमानों से अपने धर्म के आधार पर जोड़ने का या हिन्दुओ द्वारा दोनों मुसलमानों को एक करके देखने का दृष्टिकोण न ही इतिहास की तथ्यगत सच्चाई है और न ही उचित है | वस्तुत: यह दृष्टिकोण , धर्म को आगे करके समूचे इतिहास को सतही धार्मिक दृष्टिकोण से देखने का द्योतक है | इस दृष्टिकोण के चलते देश के हिन्दुओ मुसलमानों में एक दुसरे के प्रति शासित ( हिन्दू ) और शासक ( मुसलमान ) होने का पूर्वाग्रही धारणा बनी रही है | यह धारणा भी हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता के बढ़ने का एक बड़ा आधार बना है |
जहाँ तक देश के मुस्लिम समुदाय में बाहर से आये मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासको के प्रति धार्मिक आधार पर लगाव का मामला है , तो यह लगाव भी सभी मुस्लिम शासको के साथ एक जैसा नही है | उसमे भिन्नता मौजूद है | उदाहरण सुन्नी मुसलमानों में अकबर को इस्लाम धर्म से विचलित शासक मानने और औरंगजेब को इस्लाम का प्रतिनिधि शासक मानने की धारणा आज तक मौजूद है | इसके विपरीत हिन्दू समुदाय में धार्मिक तथा शासकीय आधार पर अकबर को बेहतर एवं औरंगजेब को बदतर शासक मानने की धारणा बनी हुई है | दोनों समुदायों के इस विरोधी दृष्टिकोण को घटाने - मिटाने का एक मात्र रास्ता है कि दोनों समुदायों में इस ऐतिहासिक तथ्य को समझा व समझाया जाए कि सभी मुस्लिम शासक बाहरी मुस्लिम एवं सामन्ती शासक थे और देश के हिन्दू मुसलमान उनके शासित प्रजा थे | इस सन्दर्भ में यह ऐतिहासिक तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि बाहरी शासक मुसलमान भी एक दुसरे के साथ एकजुटता नही , बल्कि एक दुसरे के प्रति कट्टर विरोधी प्रदर्शित करते रहे है | अफगानी और तूरानी ( यानि मुग़ल ) एक दुसरे के कट्टर विरोधी बने रहे | उसी तरह शिया व सुन्नी मुसलमानों के बीच मौजूद ऐतिहासिक विरोध का परिलक्षण सुन्नी मुग़ल शासको तथा उनके शासन में मौजूद शिया धर्मावलम्बी सरदारों के बीच होता रहा |
बाहरी मुस्लिम शासको में यह विरोध सत्ता के विरोध के साथ - साथ उनके बीच मौजूद धार्मिक क्षेत्रीय एवं नस्ली विरोध को भी प्रदर्शित करती रही है |इसीलिए भी दुसरे देशो से आये मुसलमानों एवं मुस्लिम शासको के साथ इस देश के मुसलमानों में धार्मिक लगाव एवं एकजुटता को उचित नही कहा जा सकता | उसी तरह से हिन्दुओ में देश के मुसलमानों को बाहरी मुस्लिम शासको की पीढिया मानना या फिर बाहरी और देशी मुसलमानों को एक जैसा मानना भी ठीक नही है |
इस सन्दर्भ में यह बात महत्वपूर्ण जिसे याद रखना चाहिए कि इस देश के हिन्दू से मुसलमान बने और जातियों में बटे हिन्दुस्तानी मुसलमानों तथा अफगानी तूरानी और इरानी मुसलमानों के साथ सामजिक समरसता एवं एक जुटता की कोई जगह नही थी | उदाहरण - बाहरी मुसलमानों में जातीय विभाजन नही था | फिर उन्होंने इस देश पर सदियों तक शासन करने के वावजूद जाति व्यवस्था को अपनाया भी नही था | इसलिए जातिव्यवस्था के साँचे में पड़े रहे हिन्दुस्तानी मुसलमान बाहरी मुसलमानों से सामजिक , सांस्कृतिक संरचना को थोड़े सुधार बदलाव के साथ अपनाए रहे | इसलिए भी देश के मुसलमानों द्वारा अपने को सामाजिक रूप से बाहरी मुसलमानों के साथ जोड़कर देखना और हिन्दुओ द्वारा उन्हें वैसा ही मानना कही से ठीक नही है |
क्षेत्र , नस्ल .राज व समाज व्यवस्था में लगाव के वावजूद धार्मिक आधार पर बाहरी मुसलमानों के साथ एकजुटता का नजरिया देश के ज्यादातर मुसलमानों में आज भी बाहरी मुस्लिम शासको द्वारा किये जाते रहे भेदभाव एवं उत्पीडन को स्वीकार नही करने देता | उन्हें यह मानने ही नही देता कि बाहरी मुसलमानों द्वारा बहुदेववादी हिन्दुओ के प्रति भेदभाव व धार्मिक सामाजिक उत्पीडन का व्यवहार किया जाता रहा है | कई बार तो मुस्लिम शासको के ऐसे कृत्यों को देश के मुस्लिम बुद्धिजीवी विभिन्न रूप में उचित ठहराने लग जाते है | जबकि पुरे मध्य युग की यह विशेषता रही है कि किसी राजा या आद्शाह का राज रहा या बादशाह के धर्म अनुसार संचालित राज रहा है . कही का किसी धर्म का राजा बादशाह रहा हो , उसके शासन के नियमो कानूनों का प्रमुख आधार उस राजा द्वारा अपनाया गया धर्म ही होता था | इस देश के हिन्दू धर्म , बौद्ध धर्म और इस्लाम धर्म के शासको के दौर में यह प्रत्यक्ष विद्यमान था | स्वभावत: उस राजा द्वारा दुसरे धर्म , सम्प्रदाय के लोगो के साथ खुलेआम भेदभाव एवं धार्मिक उत्पीडन भी जरुर हुआ होगा | इससे इनकार करना मध्य युग के धर्म आधारित राज्य के तथा विभिन्न धर्म शासको के ऐतिहासिक एवं तथ्यगत क्रिया - कलापों से इंकार करना हैं | दुसरे धर्म के पूजास्थलो को तोड़ना , उन पर धार्मिक - आर्थिक कर लगाना या उनकी धार्मिक सामजिक चलन पर जबरिया रोक लगाना , मध्य युग का आम नियम था | यह हो सकता है कि थोड़ा उदार शासक इसे कुछ कम कड़ाई या कुछ उदारता के साथ लागू करता रहा हो दृष्टिकोण मध्य युग से लेकर वर्तमान आधुनिक युग में चले आ रहे हैं | मुस्लिम समुदाय में बाहरी मुस्लिम शासको के प्रति प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष पक्षधरता ने इस विरोध की तीव्रता को बनाये रखने में अहम भूमिका निभाई है कारना या फिर उसे ये सांगत बनता कही से उचित नही ई | समझा जा सकता है की देश के हिन्दू मुसलमानों में इस तरह के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण मध्य युग से लेकर वर्तमान आधुनिक युग में हले आ रहे | मुस्लिम समुदाय में बाहरी मुस्लिम हासको के प्रति प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष पक्षधर्ता ने इस विरोध की तीव्रता को बनाये रखने में हम भूमिका निभाई है | साथ ही हिन्दू समुदाय में बाहरी मुस्लिम शासको के प्रति विरोध को देश के मुसलमानों के प्रति वैसे ही विरोध ने भी वही भूमिका निभाई है | देश का बहुसंख्यक धार्मिक सामाजिक समुदाय होने के आवजूद हिन्दू समुदाय ने इस इस विरोध को घटाने - मिटाने में अपनी अग्रणी भूमिका का निर्वहन नही किया है | वर्तमान दौर में बढाई जा रही धार्मिक , साम्प्रदायिक राजनीति और उसके चलते अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते साम्प्रदायिक विवाद व संघर्ष ने इसे और ज्यादा बढाने का काम किया हैं | इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि इतिहास के तथ्यगत सच्चाई को उस मध्य युग की सच्चाई मानकर न तो उसका अंधपक्षधरता दिखाई आये और न ही धार्मिक दृष्टिकोण से उसका प्रतिकार ही किया जाय | इस सच्चाई को कबूला जाय कि विभिन्न धर्मो को मानते हुए ही हम मध्य युग के कूप - मण्डूक प्रजा नही , बल्कि आधुनिक युग के फैलते बढ़ते सामाजिक ज्ञान - विज्ञान की कम या ज्यादा सोच - व्यवहार रखने वाले नागरिक समाज के अंग हैं | इसलिए हमे अपने आप को उस युग से अलग करके देखना होगा | विभिन्न धर्म के जनसाधारण की जनतांत्रिक एवं राष्ट्रीय अधिकार को स्वीकार करते हुए ही मध्ययुग के बारे पूर्वाग्रही दृष्टिकोण को छोड़ना पडेगा | लेकिन यह याद रखनी चाहिए कि देश - विदेश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से , उच्च प्रचार माध्यमि विद्वान् बुद्धिजीवी हिस्से , सत्ताधारी पार्टियों के उच्चस्तरीय नेता अपने आर्थिक एवं राजनीतिक लाभ के लिए हिन्दुओ - मुसलमानों के बीच बैठे परस्पर विरोधी विचारो एवं व्यवहारों को बढाने में मशगुल है | इसलिए अब अपने देश के आम आदमी हिन्दू - मुसलमान समुदाय को ही अपने जनतांत्रिक एवं राष्ट्रीय पहचानो सम्बन्धो को प्रमुखता देकर साझी विरासत को बचाना होगा |

सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक


साभार -- चर्चा आजकल की

Friday, January 25, 2019

'' सिर्फ जीना ही नही है जिन्दगी ,

'' सिर्फ जीना ही नही है जिन्दगी ,
लोग मर कर भी जिया करते है |''

स्नेही साथियो
आज आपसे आजमगढ़ के स्वाधीनता आन्दोलन की बात करना चाहता हूँ , उसी क्रम में आज से आजमगढ़ का स्वाधीनता इतिहास लिखने की कोशिश कर रहा हूँ |

कुइट इंडिया ( अंग्रेजो , भारत छोडो ) और डू - आर - डाई


करो या मरो

क्रांतियो की पृष्ठ भूमि
वर्धा के प्रस्ताव की सरकारी प्रतिक्रिया - जुलाई 42 में वर्धा में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक 'कुइट इंडिया ' अंग्रेजो भारत छोडो कर देशवासियों करो या मरो - का जो प्रस्ताव सर्व सम्मति से पारित हुआ , यद्धपि वह अत्यंत गोपिनिय रखा गया था , फिर भी सरकार ने अपने सधे , मंजे गुपत्च्रो की सुरागरसी द्वारा उसका भेद जान लिया | पता पाते ही भारत से लन्दन तक मिनटों में तार दौडाए गये और तुरंत इस बात पर दृढ निश्चय कर लिया गया कि चाहे जिस कीमत पर हो , उसे जनता तक पहुचने से रोका जाए | उसे रोकने और शासन द्वारा देश को रौदने की तभी से तैयारिया होने लगी | शासन के सभी अंग चुस्त कर दिए गये और दमन की समस्त कार्य - प्रणाली निश्चित कर ली गयी | कयोकी सरकार को यह तो ज्ञात हो चुका था की कार्य समिति के उअक्त पारित प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक आगाली ८ अगस्त को बम्बई में बुलाई जा चुकी है | यदि बम्बई की बैठक में प्रस्ताव पास होकर देश भर में प्रसारित हो जाएगा तो फिर कंट्रोल करना कठिन होगा |
बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक -
कांग्रेस महासमिति की बम्बई वाली 8 अगस्त 42 की ऐतिहासिक बैठक में सम्मलित होने के लिए देश भर के अखिल भारतीय सदस्यों के अतिरिक्त बहुत से नेतागण भी बड़ी उमंगो के साथ गये हुए थे | महाराष्ट्र के तो प्राय: सभी कांग्रेस जन वहां उपस्थित थे | उस बैठक में वर्धा वाले कार्य समिति के प्रस्ताव को पास होने में देर न लगी | जब एक स्वर से '' भारत छोडो '' का नारा पास हो गया और देश वासियों के लिए ''करो या मरो '' का संदेश सुना दिया गया तो हुकूमत ने उसे पांडाल से बाहर बहने वाली हवा से भी स्पर्श न होने देने के प्रयास में जुट गया | साड़ी तैयारिया तो पहले से हो चुकी थी | अत: 9 अगस्त को प्रात: पाव फटने से पूर्व ही उसने बैठक के पांडाल पर धावा बोल दिया और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों के साथ देश के कोने - कोने से गये हुए अन्य प्रमुख नेताओं एवं बम्बई के 40 प्रमुख कांग्रेस जानो को भी गिरफ्तार कर लिया | सबको गिरफ्तार करने के बाद विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन पर खड़ी स्पेशल ट्रेन पर पंहुचा दिया गया | गिरफ्तारिया ऐसे अचानक ढंग से हुई की बहुत से लोग अपना ऐनक , बटुआ , झोला पुस्तके तथ कपडे आदि भी भली भांति नही ले पाए | कुछ थोड़े से लोग ही बच निकले जिन्होंने देश के विभिन्न भागो में पहुच कर बम्बई का संदेश प्रसारित किया | उसके बाद से अफवाहे उडनी आरम्भ हुई की उन्हें पूर्वी अफ्रिका युगांडा में जलावतन किया जाएगा | किन्तु बाद में ज्ञात हुआ था की महात्मा गांधी को यरवदा जेल के पास एक बंगले में और बम्बई वालो को स्पेशल ट्रेन सुतार कर यरवदा - जेल ले जाकर बंद कर दिया गया था | शेष लोगो को टोंड स्टेशन से उतार कर अहमद नगर वाले चान्द्बिबी के किले में बंद किया गया था | यह जानते हुए की जनता पहले से विद्रोह की भावना विद्यमान हो चुकी है , सरकार ने स्वंय ही ऐसा कर के विद्रोह को और प्रज्ज्वलित कर दिया | हुकूमत की तरफ से यह कार्य इतनी संजीदगी के साथ किया गया की किसी को उस समय यह पता ही न चल सका की गिरफ्तारी के बाद नेता को कहाँ भेझा जाएगा | बस उसके बाद से देश भर में जबरदस्त हड़ताले हुई और उस बीच तरह - तरह की जो अफवाहे उडनी शुरू हुई उनके अनुसार कहीं पर यह अनुमान लगाया की नेताओं को गोलिया मार दी गयी , कहीं पर - फांसिया दे दी गयी और कहीं - कहीं पर उनको देश निकला कर दिए जाने की भी खबरे आने लगी | जिसे देखिये वही भरी चिंता में व्यग्र दिखाई पडा | यह भी नही की उसके बाद सरकारी रवैया चुपकी साधने का रहा हो | बल्कि 9 अगस्त की शाम को अल्न्दन से भारत - मंत्री मिस्टर एमरी ने अपने ब्राडकास्ट - भाषण द्वारा जो वक्तव्य दिया उसमे स्वंय ही बताया - किर्प्स - मिशन की असफलता के बाद कांग्रेस - नेताओं के दुराग्रह वाले रुख के कारण बातचीत असफल हो गयी | ब्रिटेन के प्रस्तावों को ठुकरा देने के परिणाम यह हुआ की उससे भारतीय लोकमत अत्यधिक निराश हुई और कांग्रेस के नेतृत्व से उसका विश्वास बुरी तरह उठ गया है | साथ ही उन्होंने कांग्रेस द्वारा अपनाए जाने वाले कार्यक्रमों का केट करते उए यह भी बता दिया की कांग्रेस ध्व्सात्मक कार्य करने लगी है और उसने यातायात के साधनों को नष्ट करके सरकारी दफ्तरों पर अधिकार जमाने का कार्य किया है | एमरी तो इससे प्रसन्न थे की उन्होंने गांधी जी तथा अन्य नेताओं को एक दुसरे से अलग करके जनता अ भी सम्पर्क छोड़ा दिया है विस्फोट की कड़ी को काट दिया है | वे इसलिए भी अत्यधिक संतुष्ट थे की वाइसराय की शासन - परिषद के तत्कालीन 15 सदस्यों में से 11 भारतीयों ने भी नेताओं की इस गिरफ्तारी का म्र्थान किया था मि एमरी का उक्त ब्राडकास्ट सुन कर अधिक शंकाए बढ़ गयी | फिर तो बम्बई के बाद देश भर में एक साथ ही हर छोटे बड़े स्थानों में कांग्रेस के लोग जो धुआधार गिरफ्तारिया शुरू हुई और कांग्रेस के दफ्तरों पर जिस मुस्तैदी के साथ प्पुलिस के छापे पड़ने लगे और ताले जेड जाने लगे उन्हें देखकर देश की जनता के कोर्ध और बढ़ गये | जो 10 - 11 तारीख में बम्बई से बच क्र निकल आये थे वो देश भर में फ़ैल गये |जब तक तत्कालीन अध्यक्ष सरदार बल्लभ भाई पटेल के नामाकं सहित जिला कमेटियो तक सुचना पहुचती तब तक मि एमरी के ब्राडकास्ट ने पुरे देश में भूचाल खड़ा कर दिया उसके अनुसार देश भर में आन्दोलन शुरू हो गये | क्रमश -- भाग एक

Thursday, January 24, 2019

हसीद दर्शन का प्रकाश स्तम्भ -------------- बालशेम तोव


हसीद दर्शन का प्रकाश स्तम्भ -------------- बालशेम तोव

बालशेम की कहानियों से जिस हसीद पंथ का निर्माण हुआ वह एक बहुत सुन्दर खिलावट है जो आज तक हुई है | ह्सीदो की तुलना में यहूदियों ने कुछ भी नही किया है | हसीद पंथ एक छोटा -- सा झरना है -- अभी भी जीवित , अभी भी खिलता हुआ |

हसीद की धारा कुछ चंद रहस्यदर्शियो की रहस्यपूर्ण गहराइयो से पैदा हुई | बालशेम उनमे सबसे प्रमुख है | हसीद पंथ का जो भी दर्शन है वह शाब्दिक नही है , बल्कि उसके रहस्यदर्शियो के जीवन में , उनके आचरण में प्रतिबिम्बित होता है | इसलिए उनका साहित्य सदगुरु के जीवन की घटनाओं की कहानियों से बना है | हसीदो के गुरु को जाधिकिम कहा जाता है | हसीदो की मान्यता है कि ईश्वर का प्रकाश स्तम्भ स्वभावत: दिव्य प्रकाश से रोशन है |

बालशेम तोव ह्सीदियो का सर्व प्रथम सदगुरु है | बालशेम तोव असली नाम नही है , वह एक खिताब है जो इजरेलेबन एलिएजर नाम के रहस्यदर्शी को मिला हुआ था |
हसीद परम्परा में उसे बेश्त कहा जाता है | इसका अर्थ है : दिव्य नामो वाला सदगुरु बालशेम एक यहूदी रबाई था जिसके पास गुह्य शक्तिया थी | वह गाँव – गाँव घूमता था और अपनी स्वास्थ्यदायी आध्यत्मिक शक्तियों से लोगो को स्वस्थ करता था | उसने अपनी शक्तिया तब तक छुपा रखी थी जब तक कि खुद को आध्यत्मिक सदगुरु घोषित नही किया | वह किस्से – कहानियों में अपनी बात कहता था | हसीद साहित्य में बहुत गुरु गम्भीर ग्रन्थ नही है | हसीद मिजाज यहूदियों से बिलकुल विपरीत है | यहूदी लोग गम्भीर और व्यवहारिक होते है , और हसीद मस्ती और उन्मादी आनन्द में जीते है | हसीदो को ‘ प्रज्वलित आत्माए “ कहा जाता है |

हसीद कहानियो को बाहर से समझा नही जा सकता , उनके भीतर प्रवेश किया जाता है , तब कही वे समझी जाती है | लगभग दो शताब्दियों तक इजरेल में हसीद कहा निया पीढ़ी – दर – पीढ़ी सुनाई जाती रही | बालशेम कहता था , कहानी इस ढंग से कही जानी चाहिए की वह एक मार्गदर्शन बन जाए | कहानी कहते वक्त बालशेम कूदता –फाद्ता, नाचता था | ये कहानिया बौद्दिक नही है , उसके रोये – रोये प्रस्फुटित होती है | हसीदो का मूल सिद्दांत है --- ऐसा नही है कि परमात्मा है जो कुछ है , परमात्मा ही है | बालशेम परमात्मा के प्रेम से आविष्ट हो जाता था , इतना अधिक की उसकी जबान खामोश हो जाती थी , उसके स्मृति पटल से सब कुछ मिट जाता था | वह रौशनी का एक खाली स्तम्भ हो जाता | बालशेम ने विद्वान् और पंडितो की प्रतिभा को झकझोरा | उसका योगदान यह है कि दींन – दरिद्र साधारण जनों के मुरझाये , कुचले हुए दिलो में दिव्य प्रेम की आग जला सका |
बालशेम बच्चो से बेहद प्यार करता था | दूर – दराज से माँ – बाप अपने बच्चो को बालशेम के पास लाते थे | बालशेम उनका शिक्षक नही , दोस्त बन जाता था | उन्हें उपदेश नही देता , उनके प्राणों में नया जीवन फूंक देता था | उसमे बच्चो जैसी मासूमियत थी | उसकी कोई गद्दी नही थी , न कोई पीठ थी , लेकिन जिस शान के साथ जन साधारण के ह्रदय सिहासन पर विराजमान था , वैसा कोई सम्राट भी कभी नही होगा |

ओशो का नजरिया ---

यह ज्ञात नही है कि परम्परागत , सनातन यहूदी धर्म में भी कुछ महान बुद्दत्व प्राप्त सदगुरु पैदा हुए है , कुछ तो बुद्दत्त्व के पार चले गये | उनमे से एक है बालशेम तोव |
तोव उसके शहर का नाम था | उसके नाम का मतलब इतना ही हुआ तोव शहर का बालशेम | इसलिए हम उसे केवल बालशेम कहेगे |
बालशेम तोव ने कोई शास्त्र नही लिखे | रहस्यवाद के जगत में शास्त्र एक वर्जित शब्द है | लेकिन उसने कई खुबसूरत कहानिया कही है | वे इतनी सुन्दर है की उनमे से मैं तुम्हे सुनाना चाहता हूँ | यह उदाहरण सुनकर तुम उस आदमी की गुणवत्ता का स्वाद ले सकते हो |

बालशेम के पास एक स्त्री आई , वह बाँझ थी , उसे बच्चा चाहिए था | वह निरंतर बालशेम के पीछे पड़ी रही |

‘’ आप आशीर्वाद दे तो सब कुछ हो सकता है | मुझे आशीर्वाद दे , मैं माँ का गौरव प्राप्त करना चाहिती हूँ |

आखिरकार तंग आकर --- हाँ , सताने वाली स्त्री से बालशेम भी तंग आ जाते है – वे बोले , बेटा चाहिए या बेटी ? 
‘ निश्चित ही बेटा | “ 
बालशेम ने कहा , ‘ फिर यह कहानी सुनो | मेरी माँ का भी बच्चा नही था और हमेशा गाँव के र्बाई के पीछे पड़ी रहती | आखिर र्बाई बोला , ‘ एक सुन्दर टोपी ले आ | ‘ 
मेरी माँ ने सुन्दर टोपी बनाई और र्बाई के पास ले गयी | वह टोपी इतनी सुन्दर बनी की उसे बनाकर ही वह त्रिपत हो गयी | और उसने र्बाई से कहा ‘ ‘ मुझे बदले में कुछ नही चाहिए | आपको इस टोपी में देखना ही बहुत अच्छा लग रहा है | आप मुझे धन्यवाद न दे , मैं ही आपको धन्यवाद दे रही हूँ | ‘
और मेरी माँ चली गयी | उसके बाद वह गर्भवती हुई और मेरा जन्म हुआ ‘ बालशेम ने कहानी पूरी की |

इस स्त्री ने कहा ‘’ बहुत खूब ‘’ अब कल मैं सुन्दर टोपी ले आती हूँ | दुसरे दिन वह टोपी लेकर आई , बालशेम ने उसे ले लिया और धन्यवाद तक नही दिया | स्त्री प्रतीक्षा करती रही , फिर उसने पूछा , ‘’ बच्चे के बारे में क्या ?
बालशेम ने कहा , ‘ बच्चे के बारे में भूल जाओ | टोपी इतनी सुन्दर है की मैं आभारी हूँ | मुझे धन्यवाद कहना चाहिए | वह कहानी याद है ? उस स्त्री ने बदले में कुछ न माँगा इसलिए उसे बच्चा मिला – और वह भी मेरे जैसा बच्चा | ‘ 
लेकिन तुम कुछ लेने की चाहत से आई हो इस छोटी – सी टोपी के बदले तू बालशेम जैसा बेटा चाहती है ?
कई बाते ऐसी है जो केवल कहानियो द्वारा कही जा सकती है | बालशेम ने बुनियादी बात कह दी : मांग मत , और मिल जाएगा | ‘ ----------------- ओशो