Thursday, November 29, 2018

स्वतंत्र सद्गुरु -- लल्ला

स्वतंत्र सद्गुरु -- लल्ला

इसीलिए कश्मीरी लोग कहते थे , ''हम दो ही नाम जानते है ; एक अल्लाह और दुसरा लल्ला |'

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योग मार्ग स्त्री - पुरुष , दोनों के लिए समान रूप से उपलब्ध है | लेकिन न जाने क्यों स्त्रिया उस मार्ग पर बहुत कम चली | और जो चली भी उनमे पहुचने वाली अत्यंत कम है | कश्मीरी रहस्यदर्शी स्त्री ''लल्ला ' ऐसी अद्दितीय स्त्रियों में से एक है | वह योगिनी थी इसलिए उसे नाम मिला , लल्ला योगेश्वरी |
लल्ला की एक और अद्दितीयता यह थी कि वह आजीवन नग्न रही | शायद विश्व में एक मात्र ऐसी स्त्री होगी जो निवस्त्र होकर बीच बाजार रही | पुरुष भी इतनी हिम्मत नही कर पाते जो आज से सात सौ साल पहले एक भारतीय स्त्री ने की | स्त्रियों के लिए अपनी देह के पार जाना असम्भव है | एक लल्ला ही अनोखी थी जो विदेह अवस्था में मुक्त मन से विचरती रही | इसीलिए कश्मीरी लोग कहते थे , ''हम दो ही नाम जानते है ; एक अल्लाह और दुसरा लल्ला |''चौदहवी सदी का कश्मीर आज के कश्मीर से बिलुकल अलग था | उस समय हिन्दू शासन था और शिव की उपासना खूब होती थी | मुसलमान राज की शुरुआत होने के साथ लल्ला का जन्म हुआ | लड़की बहुत ही बुद्धिमान थी इसलिए उसने बचपन से ही गीता , वेद, उपनिषद कठंस्थ किये | अपनी पढ़ाई के बारे में लल्ला लिखती है :
''परान-परान ज्यब ताल फजिम ''
पढ़ते - पढ़ते जीभ और तालू घिस गये |
चूँकि उन दिनों बाल - विवाह का चलन था , लल्ला का विवाह भी छोटी उम्र में हो गया | उस समय उनका नाम पदमावती था | सास सौतेली थी सो उसने और लल्ला के पति ने मिलकर लल्ला पर बेहद अत्याचार किये | वे अत्याचार लल्ला ने अपूर्व धैर्य के साथ सहे | लेकिन उससे वह पागल सी हो गयी | और वही स्थिति उसकी आत्म खोज का कारण बनी |
लाला स्वंय लिखती है :
सम्सारस आयस तपसैइ
ब्व्द्दी प्रकाश लोबुम सहज
'' मैं संसार में तपस्वनी की तरह आई और बुद्धि के प्रकाश से मैंने सहज को पा लिया |
योग साधना करते - करते लल्ला ने सिद्धि पा ली | उसकी वजह थी उसकी पूर्व जन्म की तपस्या | लल्ला के गीतों में चन्द्रमा का प्रतीक कई बार आता है | चन्द्रमा को वह ''शशि कला '' कहती है | लल्ला का स्त्री हृदय खोज भी करता है तो किसी दूर गगन में बसे हुए परमात्मा की नही , अपने अन्दर में बैठे चन्द्रमा की |
अद्रिय आयस चन्द्ररुय गारान
अंतर्मन में चन्द्रमा की खोज करते - करते मैं बाहर आई | यही लल्ला की अद्दितीयता है | आम तौर पर स्त्रिया गहने , कपडे , साज - सिंगार परिवार या ज्यादा से ज्यादा प्रेम को खोजती है ; लेकिन लल्ला की खोज अलौकिक थी |
लल्ला जो जन्म में पद्मावती थी , लल्ला कैसे हुई ? उसकी कहानी इस तरह है : कश्मीरी भाषा में लल्ला यानी पेट का मांस | कहानी है कि वह नग - धडंग घुमती थी | कुछ लोगो ने उससे कहा ''एक स्त्री इस तरह घुमे यह अच्छा नही लगता | कम से कम पेट के नीचे के अंग को ढंक ले "' उस पर लल्ला ने पेट का मांस खीचकर अपने गुप्त अंग को ढांके और बालो से छाती को छुपा लिया | इससे उसका नाम लल्ला पडा | जैसे संतो के सम्बन्ध में जनमानस में कहानिया तैरती रहती है , वैसे लल्ला के सम्बन्ध में भी कई कहानिया है |
वह उन्मनी दशा में गाँव गाँव घुमती रहती बच्चे उसे चिढाते | वे उसे पागल ही समझते | एक गाँव में एक कपडे का दूकानदार उसका भक्त था | उसने जब लडको को उसे चिढाते हुए देखा तो उन्हें बुलाकर खूब डाट लगाई | लल्ला उसके पास गयी और एक कपड़ा माँगा | दुकानदार ने फ़ौरन एक कपडा दे दिया | लल्ला ने उसे दो समान टुकड़े कर एक बाए और दूसरा दाहिने कंधे पर डाला फिर वह बाजार में घुमने लगी | रास्ते में कोई उसे गाली देता , कोई उसे नमस्कार करता | जैसे ही कोई गाली देता वह दाए कंधे के कपड़े में गाठ बाधती और जब कोई नमस्कार करता वह बाये कंधे पर रखे कपड़े पर गाठ बाधती | शाम होते होते वह लौटकर उस दूकानदार के पास गयी और उसे दोनों कपड़ो का वजन करने को कहा | दोनों बराबर थे , तब लल्ला ने उसे समझाया , देख आज मुझे जितनी गाली मिली उतना ही सम्मान मिला है | तो क्या फ़िक्र करनी | कोई पत्थर फेंके या फूल हिसाब बराबर |
लल्ला कश्मीरी साहित्य की पहली कवियत्री है | उन्होंने संस्कृत जैसी प्रतिष्ठित भाषा को त्यज कर आम लोगो की कश्मीरी भाषा को अपनी अभिव्यक्ति के लिए अपनाया | कश्मीरी साहित्य के समीक्षक शम्भुनाथ भट्टा ''हलीम '' उसके बारे में लिखते है : लल्लेश्वरी की वाणी को लोगो ने इतना पसंद किया कि वह आज तक काश्मीर के हर पढ़े लिखे और अनपढ़ की जबान पर है | कश्मीर के खेतो में काम करने वाला किसान या बोझ ढोने वाला मजदुर बलबूट काढने वाला कारीगर हो या नाव खेने वाला माझी सभी लल्लेश्वरी का कोई न कोई बाख स्वर में गाने की चाह मौजूद है | कश्मीर की संगीत सभाओं का आरम्भ लल्ला - वाक्य से किया जाता है | लल्ला - वाक्य कश्मीरी भाषा के मुहावरे और सुक्तिया बने है |

लल्ला के पार्थिव शरीर का अंत कब और कैसे हुआ ? इसके इर्द गिर्द फिर एक बार अफवाहों की धुंध है | हिन्दू कहते है , वह आग की लपट बन गयी , और मुसलमान कहते है , उसे बिजबिहाडा मस्जिद के पास दफनाया गया | जो भी हो कश्मीर के हिन्दू - और मुसलमान दोनों ही एक दिल से उसके मुरीद है , काश कश्मीर के आज खौफनाक मंजर में एक दुसरे के दुश्मन बने हुए वहाँ बसने वाले लोग लल्ला को याद करे और उसके साथ उन दिनों को जब भाईचारा मजहब की हदों को पार कर अनहद में बिसराम कर सकता था लल्ला की ममतामयी याद कश्मीर के जख्मो पर मरहम लगा सकती है लल्ला - बाख कश्मीरी :
अमि पनसोदरस नावि छ्यसलमान |
कति बेजि दय म्योन म्यती डाई तार ||
आम्यान टाक्य्नपौज जन शमान|
जब छुम भ्रमान घर गछ हाँ ||
अनुवाद - सागर के कच्चे धागे से मैं नैया खीच रही हूँ | काश , दई( ईश्वर ) मेरी सुने और मुझे पार लगा दे | मेरी दशा उस कच्चे मिटटी के बर्तन की सी है जो सदा पानी चूसता रहता है | मेरा जी कर रहा है अपने घर चली जाऊं |कन्धो पर पताशो की गठरी है , उसकी रस्सी ढीली पड़ गयी है | बोझ ढोकर देह कमान जैसी झुक गयी |
( नोट -- यह बाख एक प्रतीक रूप है | पांच तत्व , दस इन्द्रिया और ग्यारहवा मन - ये सब मिलकर व्यक्ति को सब दिशाओं में खीचते है | और उसे आत्मा से , अपने केंद्र से अलग करते है |
ओशो का नजरिया :
कश्मीर के लोग लल्ला से इस कदर प्रेम करते है कि वे आदरवश कहते है ;'हम दो ही शब्द जानते है , एक अल्लाह और दूसरा लल्ला |" कश्मीर में निन्यानबे प्रतिशत मुसलमान है | फिर भी वे अल्लाह के साथ लल्ला को जोड़ते है | यह महत्वपूर्ण है | लल्ला ने कभी किताब नही लिखी वह इतनी हिम्मतवर थी कि जीवन भर निवस्त्र रही और ध्यान रहे , यह सैकड़ो साल पुरानी बात है | और पूरब में घटी है | लल्ला सुंदर स्त्री थी | कश्मीरी सुन्दर होते है | भारत में वही जाति वास्तविक सुन्दर होती है | लल्ला बहुत सुन्दर थी | वह नाचती और गाती थी | उसके कुछ गीत बचाए गये है | मुसलमान लोग किसी को अपनी औरतो का चेहरा भी नही देखने देते | तुम मुसलमान औरतो की सिर्फ आँखे देख सकते हो और कुछ भी नही | लेकिन वे अल्लाह के बराबर लल्ला की इबादत करते है | इस स्त्री ने पुरे कश्मीर को प्रभावित किया होगा | मैंने पुरे कश्मीर की यात्रा की है मैंने बार बार ये दो नाम दोहराए देखा ''अल्लाह और लल्ला | वह एक महान सद्गुरु थी | उसके कई शिष्य थे | उसका बहुत बड़ा गुण था जो मुझे बेहद पसंद है : वह स्वतंत्र सद्गुरु थी | फिर भी अन्य धर्मो के लोग उसे प्यार करते है उसे मानते थे - माने वगैर नही रह सकते थे |
ओशो -- दि स्वोर्ड एंड दि लोटस

Wednesday, November 21, 2018

सवाल वोटो का ?

सवाल वोटो का ?



समाज केवल अधिकाधिक सम्पन्न एवं साधनहीन बनते वर्गो में ही नही बटा है , बल्कि वह चुनावी वोट लेकर शासन सत्ता पर चढने वाले राजनेताओं पार्टियों तथा उन्हें वोट देकर शासन सत्ता पर पहुचने वाले बहुसंख्यक जनता में भी बटा हुआ है | वोट लेने वाले राजनेताओं पार्टियों के साथ उनके नजदीकी पार्टी कार्यकर्ताओं एवं समर्थको की जमात भी शामिल रहती है | इनके अलावा समाज का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा भी अपने धनाढ्यवर्गीय स्वार्थो की पूर्ति के लिए सभी सत्ताधारी पार्टियों , नेताओं के साथ घनिष्ट सम्बन्ध बनाये रखता है | सभी प्रमुख पार्टियों को राजनितिक एवं चुनावी चंदे के साथ उनका आमतौर पर समर्थन करता रहता है | बताने की जरूरत नही है कि चुनावी वोट लेने वाले राजनेताओं , उनके करीबी समर्थको तथा धनाढ्य वर्गो की ताकत शासन सत्ता और उसके जुड़े बहुसंख्यक जनसाधारण इन सम्बन्धो से बाहर रहते है | इनकी ताकत तो चुनावी वोट तक ही सीमित रहती है | इसके अलावा उनकी ताकत अपने व्यापक हितो के लिए जाने वाले आंदोलनों संघर्षो में ही व्यक्त होती है | जहां तक जनसाधारण के वास्तविक चुनावी ताकत का सम्बन्ध है , तो उसका वास्तविक परीलक्षण इस या उस पार्टी की सरकार बदलने के रूप में तो तब तक नही हो सकता , जब तक बहुमत जनसाधारण अपने व्यापाक एवं बुनियादी हितो के प्रति सजग सचेत नही होता | वर्तमान समाज के राज एवं शासन व्यवस्था के बारे में तथा उसके अंतर्गत बढ़ते विभिन्न समस्याओं के प्रति मोटे तौर पर सजग सचेत होकर मतदान नही करता | वर्तमान समय में तो बहुसंख्यक मतदाता की स्थिति इस अपेक्षित आवश्यकता एकदम विपरीत है |
साथ ही उसके हितो की विरोधी भी है | उदाहरण - सभी धर्म , जाति,क्षेत्र की सबसे बड़ी संख्या में मौजूद किसानो के हितो की अनदेखी सभी पार्टियों की केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारों द्वारा की जाती रही है | डंकल प्रस्ताव को सभी पार्टियों द्वारा लागू किये जाने के साथ किसानो की समस्याओं , संकटों को खुलेआम और तेजी के साथ बढाया जाता है | इसके वावजूद किसान समुदाय इन सभी पार्टियों के नेताओं के विरोध में मतदान करने की जगह धर्म - सम्प्रदाय - जाति-क्षेत्र के नाम पर विखण्डित होकर इन पार्टियों के पक्ष में मतदान करता रहा है || इस तरह बड़ी संख्या में मजदूरो की पहले से भी ज्यादा बढती साधनहीनता विपन्नता के लिए सभी पार्टियों की सरकार द्वारा लागू की जाती रही वैश्वीकरणनीतियों को लेकर प्रमुख पार्टियों के विरोध में मतदान करने की जगह व्यापक मजदुर वर्ग भी धर्म , जाति,क्षेत्र आदि के रूप में विखण्डित होकर वोट देता है | यही स्थिति बहुसंख्यक बुनकरों दस्तकारो दुकानदारों तथा पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों से लेकर कलर्क , अध्यापक , वकील , डाक्टर इन्जीनियर जैसे मानसिक श्रमजीवी समाज की भी है | वस्तुत: चुनावी वोट के प्रति व्यवहार में इस समय शिक्षित एवं अशिक्षित जनसमुदाय में कोई भेद नही रह गया है |हालाकि जनसमुदाय के सभी सामजिक हिस्सों की बहुसंख्यक समस्याग्रस्त जनसमुदाय में अपने कमाओ , पेशो की स्तिथियों तथा जीवन की अन्य बुनियादी समस्याओं को लेकर असंतोष आक्रोश मौजूद है , पर वह अंसतोष आक्रोश लगातार बढती जनसमस्याओ के लिए जिम्मेवार नीतियों पार्टियों एवं नेताओं के विरोध की जगह विभिन्न पार्टियों नेताओं धर्मवादी जातिवादी क्षेत्रवादी समर्थन के वोट में बदल जाता है लेकिन क्यो? कयोकी पिछले 30 - 40 सालो से राजनितिक पार्टियों , नेताओं प्रचार तंत्र बौद्धिक हिस्सों द्वारा बहुसंख्यक श्रमजीवी जनसमुदाय से धर्म , जाति , क्षेत्र के आधार पर चुनावी समर्थन एवं वोट लेकर विभिन्न पार्टियों की या उसके गठबंधन की सरकार बनाने का काम लगातार किया जा रहा है | उसको लगातार बढ़ावा दिया जाता रहा है फिर इसी के साथ श्रमजीवी जनसमुदाय को अपनी जीविकोपार्जन एवं जीवन की बुनियादी एवं व्यापक समस्याओं के विरोध में एकजुट एवं आंदोलित होने से रोकने का भी काम किया गया है | उनके बढ़ते आक्रोश असंतोष को धर्म , जाति क्षेत्र आदि के साम्प्रदायिक आधार पर बाटा- तोड़ा जा रहा है इन्ही प्रचारों और अपने भीतर बैठे धर्म , जाति , क्षेत्र आदि के सदियों पुराने लगावो , विरोधो के फलस्वरूप समस्याग्रस्त जनसमुदाय अपनी बढती समस्याओं के लिए जिम्मेवार प्रमुख नीतियों और उसे लागू करने वाले नेताओं पार्टियों के विरुद्ध मतदान करने की जगह उनके समर्थन में तथा अपने श्रमजीवी वर्ग हितो के विरुद्ध मतदान करता रहा है | नतीजे के रूप में जनसाधारण श्रमजीवी वर्ग के चुनावी वोट की ताकत अधिकाधिक एकजुट होने की जगह विखंडित होती चली गयी और हो भी रही है |


चित्र - साभार गूगल से

Monday, November 19, 2018

किसानो का राजधानी --, मार्च - प्रदर्शन

किसानो का राजधानी --, मार्च - प्रदर्शन

{क्या यह किसानो को उनकी समस्याओं मांगो के प्रति जागरूक , संगठित व आंदोलित कर सकेगा ? }

किसानो की समस्याओं व मांगो को लेकर किये जाते रहे प्रचारों में आते रहे किसान मोर्चो आंदोलनों से सार्थक परिणाम निकलने की कोई आशा नजर नही आ रही है | इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि वर्तमान केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकारों के साथ पिछले 20 - 25 सालो से सत्तासीन रही सभी केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारे कृषि क्षेत्र की उपेक्षा के साथ कृषि व किसान के संकटो , समस्याओं को बढ़ावा देती रही है | इसका परिणाम खेती किसानी में बढती टूटन के साथ देश के विभिन्न भागो में बढ़ते रहे किसान आत्महत्याओं के रूप में हमारे सामने आता रहा है | विपक्ष में बैठी पार्टियों द्वारा कृषि एवं किसानो की समस्याओं संकटों पर रोना - धोना मचाने और फिर उन्ही पार्टियों के सत्ता में आने के बाद कृषि समस्याओं संकटो को नीतिगत एवं योजनाबद्ध रूप से बढाने का काम पिछले 25 सालो से लगातार एवं खुले रूप में किया जा रहा है |
निसंदेह विभिन्न सत्ताधारी पार्टियों की सत्ता सरकारों के कृषि व किसान विरोधी क्रिया - कलाप इन सभी पार्टियों के उच्चस्तरीय नेताओं द्वारा वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्तावों के लागू किये जाने के साथ खुले आम बढाये जाते रहे है | इन नीतियों - प्रस्ताव के अंतर्गत विदेशी एवं देशी पूजी के धनाढ्य मालिको को अधिकाधिक छुट व अधिकार देने के साथ आम किसानो एवं अन्य श्रमजीवी हिस्सों के छुटो अधिकारों को लगातार काटा घटाया जाता रहा है |कृषि लागत के मालो मशीनों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के साथ कृषि उत्पादों के मूल्य भाव बिक्री बाजार को तुलनात्मक रूप में घटाया गिराया जाता रहा है |

कृषि व्यव के लिए कृषि ऋण की मात्रा को सभी पार्टियों की सरकारों द्वारा प्रमुखता से बढ़ावा दिया जाता रहा है |सार्वजनिक या सरकारी सहायता सहयोग बढाये बिना ही कृषि ऋण पर दी जाती व्याज सब्सिडी को तथा कभी कभार कृषि ऋण माफ़ी को ही बड़ी सरकारी सहयाता के रूप में प्रचार किया जाता रहता है | नामी गिरामी किसान सगठनों के नेताओं एवं किसान मार्च आन्दोलन के संयोजको द्वारा भी इन मुद्दों को लेकर गाँवों में रह रहे किसानो को जागरूक व संगठित करने का कोई ठोस प्रयास नही चल रहा है | हाँ , इन किसान सगठनों और संयोजको समितियों के नेताओं द्वारा अपने समर्थक किसान व गैर किसान हिस्सों के साथ मुख्यत: कृषि ऋण माफ़ी एवं कृषि उत्पादों की मूल्य वृद्धि को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में खासकर राजधानी नगरो में जलूस प्रदर्शन जरुर किया जाता रहा है | पिछले दो सालो में दिल्ली मार्च , मुंबई मार्च एवं अन्य राजधानी नगरो में मार्च के साथ विभिन्न प्रान्तों में छिटपुट एवं बहुप्रचारित किसान आंदोलनों का ऐसा ही परीलक्षण होता रहा है | फलस्वरूप आम किसानो के बढ़ते रहे संकटों समस्याओं में तो कोई कमी नही हुई और न वह हो ही सकती थी | पर इन किसान सगठनों एवं संयोजक समितियों के नेताओं का नाम जरुर आगे बढ़ गया | इन आंदोलनों के अगुआ एवं प्रवक्ता के रूप में उनका रूतबा और चढ़ गया | बताने की जरूरत नही कि इन आंदोलनों प्रदर्शनों का यह एक अघोषित लक्ष्य भी रहा है | लेकिन इससे यह बात भी साफ़ है कि इस लक्ष्य के साथ आम किसानो को जागरूक एवं सगठित करने का काम नही हो सकता और हो भी नही रहा है | इसीलिए विभिन्न क्षेत्रो के किसानो के हो रहे बहुप्रचारित मार्चो - प्रदर्शनों को किसानो के वास्तविक आन्दोलन के रूप में देखना तब तक ठीक नही है , जब तक यह आन्दोलन किसानो के व्यापक हितो , समस्याओं एवं मांगो को लेकर उन्हें जागरूक नही करता | इस जागरूकता के साथ किसानो को सगठित करने के काम को प्रमुखता नही देता उसका विस्तार नही करता | इसीलिए इन किसान नेताओं और संयोजको को यह बात भी दिखाई नही पड़ती की आम किसान समुदाय इन आयोजित किसान मार्चो - प्रदर्शनों के जरिये किसान के रूप में सगठित होने कहीं ज्यादा धर्म , जाति, क्षेत्र आदि राजनितिक रुझानो पहचानो , गोलबंदियो में सगठित होता रहा है |इन्ही आधारों पर विभिन्न राजनितिक पार्टियों के साथ समर्थन में खड़ा होकर उनका चुनावी वोट बैंक बनता रहा है | कोई भी समझ सकता है कि किसान समुदाय निजी तौर पर खेती में काम करते हुए तथा अपनी खेती की समस्याओं से जूझते हुए या फिर किसानो के धरना - प्रदर्शन गोष्ठी आदि में भागीदारी निभाते हुए तात्कालिक रूप में भले ही अपनी किसान की पहचान व समस्या को ज्यादा महत्व देता हो , लेकिन राजनितिक , सामजिक रूप में वह अपने धर्म , जाति , क्षेत्र की पहचानो के मुद्दों से कहीं ज्यादा जुड़ता है | उसे ज्यादा महत्व देता है | क्या किसान सगठनों एवं संयोजको समितियों के नेतागण इसे नही जानते ? पूरी तरह जानते है | इसके वावजूद वे किसानो से अपनी खेती किसानी की समस्याओं के साथ अपनाने किसान की पहचान को सर्वाधिक महत्व देने की कोई अपील नही करते | उन्हें किसान के रूप में राजनितिक , सामजिक रूप से जागरूक एवं सगठित करने का कोई प्रयास नही करते है | ऐसा न करना असंगठित विखंडित किये जाने की प्रक्रिया के प्रति घोर उपेक्षा का द्योतक है |अत: किसानो को अपनी समस्याओं के साथ अब किसान की पहचान को प्रमुखता देने के प्रति जागरूक करना , प्रबुद्ध किसानो व किसान समर्थको का सबसे बड़ा दायित्व है | इसे अपनाकर ही किसानो को सगठित एवं आंदोलित किया जा सकता है | इसका कोई शार्टकट रास्ता नही है |
चित्र साभार गूगल से

Thursday, November 15, 2018

राफेल - बोफोर्स - का माजरा ?

राफेल - बोफोर्स - का माजरा ?

फ्रांस के राफेल विमान सौदे की चर्चा पिछले दो - तीन माह से लगातार चल रही है | इस सौदे के जरिये वर्तमान केन्द्रीय सरकार तथा प्रधानमन्त्री पर इस सौदे के भारतीय भागीदार रिलायंस डिफेन्स कम्पनी के मालिक अनिल अम्बानी को अधिकतम एवं अवाछ्नीय लाभ पहुचाने का आरोप लग रहा है | अक्तूबर के शुरुआत में यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुच गया है | राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार के साथ उद्योगपति अनिल अम्बानी को लाभ पहुचाने के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमन्त्री को इस रक्षा सौदे का भागीदार बताते रहे है |
इस आरोप को निराधार नही कहा जा सकता | इस सन्दर्भ में तथ्यगत बात है कि 2012 में कांग्रेस नेतृत्व की संप्रग सरकार द्वारा 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए 54 हजार करोड़ के तय सौदे को अप्रैल 2015 में भाजपा नेतृत्व की वर्तमान सरकार द्वारा 36 राफेल विमानों के लिए 58 हजार करोड़ के सौदे को बदल दिया गया | उस समय के तय सौदे में एक विमान के 526 करोड़ रूपये के कीमत को अप्रैल 2015 में एक विमान की 1670 करोड़ रूपये की कीमत में बदल दिया गया | जाहिर है कि 2012 से लेकर 2015 तक के महज तीन सालो में अंतरराष्ट्रीय कीमतों मेवृद्धि से तथा अप्रैल 2015 तक रूपये के अवमूल्यन से भी विमान की कीमत में तीन गुना की मूल्य वृद्धि नही हो सकती |
कोई भी समझ सकता है कि तीन गुना मूल्य वृद्धि के साथ 126 लडाकू विमानों के 54 हजार करोड़ की जगह अब 36 विमानों के 58 हजार करोड़ के सौदे से राफेल विमान निर्माता एवं विक्रेता फ्रांसीसी कम्पनी डसाल्ट का लाभ अब पहले से कई गुना बढ़ जाना है | इसके साथ ही इस सौदे में भागीदारी बने भारतीय कम्पनी रिलायंस डिफेन्स को भारी लाभ मिलना निश्चित है | साथ ही अंतरराष्ट्रीयव राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा हथियारों सौदों के उच्च स्तरीय दलालों , रक्षा क्षेत्र के बड़े अधिकारियो को जरुर लाभ मिलना है | इसके अलावा इस सौदे से सरकार के उच्च पदों पर बैठे लोगो को भी प्रत्यक्ष भ्रष्टाचारी लाभ मिलना तय है | वैसे तो अंतरराष्ट्रीय सौदों में खासकर उच्च तकनीकी के मशीनों उपकरणों के आयात की सौदेबाजी में सरकार की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष भूमिका के साथ अत्यधिक लाभ एवं भ्रष्टाचार का होना आम बात है | फिर रक्षा सौदों में यह मामला इसलिए और ज्यादा होता है कि ऐसे सौदों के साथ राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गोपनीयता का मामला आगे कर दिया जाता है | सौदों के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा भी जा रहा है | राफेल विमान सौदे की असलियत सामने आय या न आय , पर रक्षा सौदे के सन्दर्भ में असली बात तो यही है कि इनके अंतरराष्ट्रीय खरीद बिक्री में उच्चस्तरीय मुनाफाखोरी , दलाली एवं अन्य भ्रष्टाचार का काम पहले से होता रहा है | आधुनिक हथियारों लडाकू विमानों एवं अन्य सैन्य साजो - सामानों की मालिक अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यी कम्पनिया वैश्विक बाजार में भयंकर प्रतिद्वंदिता के चलते इस भ्रष्टाचार को बड़े स्तर पर बढ़ावा देती रही है | फिर उसे इस देश की और अन्य देशो की सरकारे स्वीकारती भी रही है | हाँ , अब इसमें एक महत्वपूर्ण अंतर जरुर आ गया है | 1990-95 तक सभी रक्षा सौदों में विकसित साम्राज्यी देशो की हथियार एवं लडाकू विमान आदि की निर्माता कम्पनियों के साथ अंतरराष्ट्रीय दलाल तथा भारत सरकार के मंत्री अधिकारी रक्षा विशेषज्ञ एवं उच्च सैनिक अधिकारी ही शामिल रहते थे | पर अब खासकर 2000 के बाद रक्षा क्षेत्र में निजीकरणवादी नीतियों को लागू करने के बाद से देश की निजी धनाढ्य कम्पनियों को भी रक्षा क्षेत्र में उद्पादन व व्यापार की छुट दे दी गयी है | इसलिए पहले के सौदों में लाभ खोरी के साथ भ्रष्टाचार में और ज्यादा उछाल आना लाजिमी है | कयोकी भारतीय रक्षा कम्पनी के रूप में अब इसमें एक नया मुनाफाखोर वर्ग शामिल हो गया है | यही कारण है कि 1980 के दशक में हुए बोफोर्स सौदे में अंतरराष्ट्रीय इटैलियन दलाल क्वालोची तथा भारतीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के साथ भारतीय दलाल बिन चड्डा , रक्षा सचिव एस के भटनागर को उस भ्रष्टाचार के लिए आरोपित किया गया था | पर अब रक्षा क्षेत्र में लागू किये गये निजीकरण के साथ प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी , रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तथा 10 अप्रैल 2015 को हुए राफेल डील से महज 15 दिन पहले बनी उद्योगपति अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेन्स कम्पनी को मुख्य रूप से आरोपित किया जा रहा है | यह बात भी लगभग निश्चित है कि देश के रक्षा क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण के साथ आने वाले दिनों में रक्षा सौदों में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार एवं अवांछित लाभ के और ज्यादा मामले सामने आयेंगे | उच्च तकनीक वाले बोफोर्स तोप डील और राफेल ल;डाकू विमान डील जैसे रक्षा सौदों में इस भ्रष्टाचार का आधार आधुनिकतम हथियारों , लडाकू जहाजो पनडुब्बियो आदि के निर्माण व व्यापार में दुनिया के चंद देशो की अतिधनाढ्य कम्पनिया और उनमे वैश्विक बाजार के लिए चलती रही भयंकर प्रतिद्वंदिता है | इस प्रतिद्वंदिता में अमेरिका , रूस , इंग्लैण्ड , फ्रांस व अन्य देशो की साम्राज्यी कम्पनियों के साथ वहाँ की सरकारे शामिल रहती है | उन देशो की सरकारे अपने यहाँ के रक्षा सामानों की अंतरराष्ट्रीय सौदों का प्रतिनिधत्व भी करती रहती है | अपने बिक्री बाजार को बढाने के लिए ये कम्पनियों अपने और खरीददार देशो के सरकारों के प्रतिनिधियों मंत्रियों अधिकारियो को सीधे - सीधे या फिर अंतरराष्ट्रीय दलालों के जरिये अपने पक्ष में कर लेने का हर भ्रष्टाचार करती है | भारत जैसे तमाम पिछड़े व विकासशील देशो की सैन्य या गैर सैन्य औद्योगिक मालो - सामानों के उत्पादन - व्यापार में लगी धनाढ्य कम्पनिया भी इन देशो की सरकारों पर रक्षा सौदों के लिए दबाव बनती रहती है | फिर भारत जैसे देशो में उच्च तकनिकी के सिने साजो - सामानों के बढ़ते आयात का दुसरा आधारभूत कारण इन देशो में तकनिकी पिछड़ेपन के साथ हर क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकी विकास को प्रोत्साहन न देना या उसे हतोत्साहित करते रहना था और है |इन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आधारों के साथ अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर निजी साम्राज्यी व पूजीवादी कम्पनियों को अधिकाधिक छुट देने बढाने के फलस्वरूप रक्षा क्षेत्र में करोड़ो अरबो के होने वाले अत्यधिक व अवांछित लाभों भ्रष्टाचारो को रोका जाना कदापि सम्भव नही है | हाँ उसे उठाकर इस उस सरकार को निशाना जरुर बनाया जा सकता है | उसके राजनितिक इस्तेमाल के साथ उसको चुनावी मुद्दा बनाकर सत्तासीन पार्टी को अपदस्थ करने का कम भी किया जा सकता है | पर उस भ्रष्टाचार को रोका नही जा सकता |

एक बात और -
रक्षा सौदों में अत्यधिक लाभ एवं भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात की अनदेखी करने या उस पर पर्दा डालने का सबसे बड़ा सबूत यह है की ऐसे हर भ्रष्टाचार में उस भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा लाभ कमाने वाली तथा उसे बढावा देने वाली अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों पर कोई इल्जाम नही लगता | उदाहरण तोप सौदे में दलाली करवाने और देश के अधिकारियो की करोड़ो का घुस खिलाने वाली स्विट्जरलैंड की बोफोर्स कम्पनी को लगभग मुक्त रखा गया | उसी तरह राफेल लडाकू विमान की ड्सालट कम्पनी पर कोई इल्जाम नही लगाया जा रहा है | सारा इल्जाम बिचौलियों पर ही लगाया जा रहा है | जाहिर है ऐसे लोगो से आप राष्ट्रहित जनहित की आशा भी नही कर सकते |

Wednesday, November 14, 2018

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार
नौजवानों का असहयोग आन्दोलन से मोहभंग और क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश
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1915 में दक्षिण अफ्रिका से लौटने के बाद गांधी जी ने भारतवर्ष की राजनीति में भी हलचल पैदा करना शुरू कर दिया था |
उधर 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक के निधन के बाद गांधी जी के हाथ में कांग्रेस की बागडोर आ गयी | दिसम्बर 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने घोषणा की कि यदि सब लोग तन - मन - धन से उनके कार्यक्रम को सहयोग दें तो वे एक वर्ष के अन्दर देश को स्वतंत्रत करा सकते है |
गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार को यह अल्टीमेटम दे दिया 31 दिसम्बर 1921 तक भारत को यदि औपनिवेशिक स्वराज नही मिला तो वे सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन शुरू कर देंगे | 31 दिसम्बर आया और चला गया सरकार ने इस अल्टीमेटम की कोई परवाह नही की | परिणाम स्वरूप देशभर में जलूस जनसभाओ और गिरफ्तारिया का दौर चला पडा |
5 फरवरी , 1922 को चौरीचौरा गोरखपुर में शानातिपूर्ण जलूस पर गोली चलाने के कारण लोगो ने थाने में आग लगा दिया जिसमे कई पुलिसकर्मी मारे गये | हिंसा से छुब्ध गांधी जी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया | इसकी देशभर में प्रतिक्रिया हुई | विशेषकर युवाओं की भावना को अत्यधिक ठेस पहुची और वे क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ने के लिए उतावले हो उठे |
इधर क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल ( शचिन दादा ) पुरे उत्तर भारत में विशेषकर उत्तर प्रदेश ( संयुकत प्रांत ) बंगाल और पंजाब में एक शक्तिशाली क्रांतिकारी दल के गठन हेतु अत्यधिक सक्रिय थे | शचिन दादा 1915 में 'बनारस षड्यंत्र केस ' में आजीवन काले पानी के अंतर्गत अंडमान भेज दिए गये थे | प्रथम विश्व युद्ध के बाद आम माफ़ी के सिलसिले में वे 20 फरवरी 1920 को रिहा कर दिए गये | जेल से रिहा होते ही वे बनारस आ गये और पुन: क्रांतिकारी दल को संगठित करने के कार्य में जी जान से जुट गये | पहले कुछ समय तक इन्होने अपने दल का नाम ''यंगमेंस एसोसिएशन'' रखा | शचिन दादा ने 1923 में दिल्ली में कांग्रस अधिवेशन में भाग लेने के बाद अपने क्रांतिकारी दल का नया नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एच आर ए ) रख दिया | देखते ही देखते क्रांतिवीर राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी , जोगेश चन्द्र चटर्जी ,शचीन्द्र नाथ बख्शी .,मन्मथ नाथ गुप्त , मुकुन्दी लाल ,सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य , कुंदन लाल गुप्ता , राजकुमार सिन्हा ,विष्णु शरण दुबलिश ,गोविन्द चरण कर एवं प्रणवेश चटर्जी एच आर ए के प्रमुख सदस्य बन गये | उन दिनों बनारस व शाहजहाँपुर क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र था , जहां शचिन दादा राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्ला खा आदि क्रांतिकारी पहले से ही सक्रिय थे | आगे चलकर प्रणवेश चटर्जी ने बनारस में सक्रिय श्री चन्द्रशेखर आजाद को भी पार्टी से जोड़ा | आजाद ने भी उन दिनों बनारस में संस्कृत का अध्ययन कर रहे युवा उदासीन साधू स्वामी गोविन्द प्रकाश ( श्री राम कृष्ण खत्री ) को पार्टी का सक्रिय सदस्य बनाया | दल की सदस्यता के लिए अपना पूरा समय और आवश्यकता पड़ने पर अपना जीवन उत्सर्ग कर देने को तत्पर रहने की योग्यता निश्चित की गयी थी | नेता का हुकम मानना सबके लिए अनिवार्य था | बिना कमांडर की आज्ञा के वह न कही जा सकता था और न किसी दूसरी संस्था का सदस्य ही हो सकता था | दल से विश्वासघात का दंड पार्टी से निष्कासन या सजाये मौत थी | दल के सदस्यों को हुकम था कि वे अपने राजनीतिक विकास के लिए अध्ययनशील हो और भावी क्रान्ति के लिए सब प्रकार की तैयारी में जुटे | प्रत्येक सदस्य शचीन्द्र नाथ सान्याल की ''बंदी जीवन '' के साथ ही महाराणा प्रताप - छत्रपति शिवाजी - रानी लक्ष्मी बाई - गैरीबाल्डी - मैजिनी व मैक्स्विनी आदि क्रान्तिकारियो की जीवनिया आयरिश क्रान्ति पर किताबे व रौलेट कमिशन की रिपोर्ट अनिवार्य रूप से पढ़ना था |

Sunday, November 11, 2018

क्रान्ति तीर्थ काकोरी -- भाग तीन

क्रान्ति तीर्थ काकोरी -- भाग तीन

व्यापक क्रान्ति आन्दोलन का सूत्रपात्र
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क्रान्ति के रथं विस्फोट के कुछ ही वर्ष बाद ऐसी परिस्थितिया बनी जिनसे क्रान्ति की उस श्रृखला का आरम्भ हुआ जिसकी कडिया देश में और देश से बाहर जुडती चली गयी | 1903 में इंग्लैण्ड की सरकार ने घोर साम्राज्यवादी और तानाशाही मनोवृति के लार्ड कर्जन को भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय नियुक्त कर दिया | हम उसके सभी कार्यो के लेखा जोखा नही लेंगे केवल इतना कहेंगे की सात वर्ष के अल्प समय में उसने भारत के लोगो को जितना छुब्द्द कर दिया , उतना शायद ही कोई और कर सकता | उसका सबसे बड़ा काम था बंगाल का विभाजन | वैसे तो बिहार , बंगाल उड़ीसा और असम तक फैले अति विशाल बंगाल प्रांत को दो भागो में विभाजित करने का प्रस्ताव पुराना था परन्तु कर्जन को उसे क्रियान्वित करने में लाभ ही लाभ दिखाई दे रहा था | बंगाल के मुस्लिम बाहुल पूर्वी भाग को असम ( जिसमे उस समय वर्तमान उत्तर - पूर्व के सभी राज्य सम्मलित थे ) में मिलाकर बनने वाले राज्य में मुसलमानों का बहुमत होगा और दुसरे भाग में गैर बंगाली ( उड़ीसा तथा बिहार ) बड़ी संख्या में होंगे | इस प्रकार जहां हिन्दू और मुसलमान एक जुट नही रह सकेंगे वही सार्वजनिक - सामाजिक चेतना का नेतृत्व करने वाले बंगाली भी दो प्रान्तों में बटकर प्रभावशाली नही रह जायेंगे | कर्जन बंग - भंग को लागू करने की इतनी हडबडी में था कि उसने 19 जुलाई 1905 को इसका निश्चय किया और 16 अक्तूबर 1905 को इसे लागू कर दिया | इस पर सम्पूर्ण बंगाल में रोष का ज्वार उमड़ पड़ना स्वाभाविक था | बंगाल में नेताओं ने तत्काल ही घोषणा कर दी -- ' जब तक बंग - भंग लागू रहेगा और बंगाल पुन: एक न हो जाएगा तब तक बंग - भंग का विरोध जारी रहेगा |" इस विरोध का पहला कदम विदेशी सामन के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओ के उपयोग की घोषणा था | इसी आन्दोलन में 'वन्दे मातरम् ' गीत और नारा लोगो के कंठ में मन्त्र की तरह बैठ गया | फिर तो यह भारत के सम्पूर्ण स्वतंत्रता आन्दोलन का आधार बना |
इसी आन्दोलन के दौरान बंगाल में ''युगांतर '' और वन्दे मातरम् '' नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया गया जिन्होंने पुरे बंगाल को शासन के विरुद्ध जागृत कर दिया | इसी दौरान 1906 में मास्टर अश्वनी कुमार दत्त ने ढाका में ''अनुशीलन समिति '' नाम से एक गुप्त क्रान्ति संस्था गठित की | आगे चलकर महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सन्याल भी इसके सम्पर्क में आये ( ये वही शचीन्द्र नाथ सान्याल है जिन्होंने कालान्तर में संयुकत प्रांत उत्तर प्रदेश में ''हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ' नामक एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की स्थापना किया था जिसकी चर्चा हम आगे करंगे |

बंग - भंग आन्दोलन के दौरान ही बंगाल में प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री अरविन्द घोष पर 'वन्दे मातरम् ' पत्र के सम्पादन के अभियोग में मुकदमा चला और 26 अगस्त 1907 को कलकत्ता की एक अदालत द्वारा उन्हें छ: माह की सजा दी गयी | जब उन्हें अदालत से बहार लाया गया तो बाहर हजारो की संख्या में खड़े जनसमूह ने वन्दे मातरम् के जोरदार उद्घोष से आकाश को गुंजायमान कर दिया | इस पर पुलिस ने जनसमूह पर बुरी तरह लाठी चार्ज आरम्भ कर दिया | यह दृश्य देखकर 15 वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ( जो आगे चलकर शहीद हुए ) से रहा नही गया | उसने लाठी चार्ज के जिम्मेदार एक अंग्रेज सार्जेंट को अपने शक्तिशाली मुक्को की मार से बुरी तरह मारा | अगले दिन उसे चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने 15 बेंत मारने की सजा सुनाई | हर बेंत की मार के साथ वह बालक 'वन्दे मातरम् ' और भारत माता की जय ' का नारा लगाता रहा | खून से सना हुआ जब यह बालक जेल से बहार आया तो वहाँ एकत्र युवको में दो - खुदी राम बोस और प्रफुल्ल चाकी इतने उत्तेजित हो उठे कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को मारकर इस अत्याचार का बदला लेने का निश्चय किया | वे दोनों उसके पीछे लगे रहे | उन्हें बदला लेने का मौक़ा मिला मुजफ्फरपुर में , जहाँ वह डिस्ट्रिक्ट जज नियुक्त हो गया था | 30 अप्रैल 1908 को उसके बंगले के बाहर इन युवको ने उसकी बग्घी पर बम फेंका परन्तु भाग्य उसके साथ था , उस बग्घी में दो अंग्रेज महिलाये बैठी थी जिनकी मृत्यु हो गयी | 20 वी शताब्दी के क्रांतिकारी आन्दोलन का यह पहला प्रभावशाली बम धमाका था और यहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ , वह चलता ही चला गया | मुजफ्फरपुर बमकांड के आरोपी प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए स्वय को गोली मार ली और 17 वर्षीय खुदीराम बोस को इस अपराध के लिए 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गयी | इस बहादुर नवयुवक ने हँसते - हँसते वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुए फाँसी का फंदा चूम लिया | वास्तव में बंग - भंग आन्दोलन हमारे देश के लिए एक वरदान के रूप में उभरकर सामने आया | अगर यह आन्दोलन प्रारम्भ न होता तो भारत के कोने - कोने में राष्ट्रीयता की चेतना उत्पन्न न होती |

और न हमारे क्रांतिवीर भाई - बन्धु एवं बहिने अपना जीवन देश के लिए होम करते |
बंगाल विभाजन के विरुद्ध आन्दोला की उग्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अन्तत: 1911 में जार्ज पंचम के भारत आगमन पर दिल्ली में जो राज दरबार किया गया उसमे बंग - भंग को समाप्त करने की विधिवत घोषणा की गयी | साथ ही भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर देने की घोषणा की गयी | परन्तु वायसराय के दिल्ली पहुचने से पहले ही उनका स्वागत करने के लिए क्रांतिकारी वहां उपस्थित थे | 23 दिसम्बर 1912 को जिस समय वाइसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा - यात्रा चाँदनी चौक पहुची , अचानक भयानक बम विस्फोट हुआ और हार्डिंग के पीछे बैठा अंगरक्षक वही ढेर हो गया | इस अपराध के लिए बसंत कुमार विशवास मास्टर अमीरचंद , अवध बिहारी तथा बालमुकुन्द को फांसी की सजा मिली | परन्तु इस योजना के सूत्रधार रासबिहारी बोस पकडे नही गये | यह दुसरा विस्फोट था जिसने संसार का ध्यान भारत के क्रांतिवीरो के आन्दोलन की तरफ खीचा | अब क्रान्ति की आग उत्तर भारत में भी पहुच गयी थी | उधर 1913 में अमेरिका के सैन्फ्रान्सिको नगर में लाला हरदयाल के नेतृत्व में गदर पार्टी की स्थापना हुई जिसे प्रवासी भारतीयों का पूरा सहयोग मिला |

धीरे - धीरे गदर पार्टी की शाखाए अनेक देशो में खुल गयी | इसके सदस्य अपने देश से विदेशी सत्ता समाप्त करने के लिए बेचैन थे | 1914 में विश्युद्ध आरम्भ हुआ तो अवसर का लाभ उठाने के लिए क्रांतिकारी भारत में सैनिक विद्रोह कराने को आतुर हो उठे | उसी वर्ष जापानी जहाजो से क्रान्तिकारियो के जत्थे भारत के लिए रवाना हुए परन्तु अधिकाँश भारतीय बंदरगाहों पर ही गिरफ्तार कर लिए गये | क्रान्ति के लिए 21 फरवरी 1915 तय की गयी परन्तु भेदिये ने प्रशासन को सुचना दे दी | रासबिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल तो पुलिस के हत्थे नही चढ़े परन्तु अन्य 63 लोग पकडे गये | ''प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस'' के नाम से प्रसिद्ध इस केस में 26 क्रांतिवीरो को फांसी , 24 को आजन्म कालापानी तथा शेष को दो अलग - अलग अवधि की सजा सुनाई गयी | एक साथ 26 क्रांतिवीरो को मृत्यु दंड सुनाये जाने पर सारे देश में व्यापक प्रतिक्रिया होने लगी | वायसराय लार्ड हार्डिंग ने स्थिति भापकर यह मामला प्रिवी काउन्सिल में भेज दिया | दो माह बाद 14 नवम्बर 1915 को प्रिवी काउन्सिल ने अन्तत: अपने फैसले में 19 क्रांतिवीरो के मृत्युदंड को आजीवन काले पानी में बदलकर शेष सातो क्रांतिवीरो - करतार सिंह सराभा , विष्णु गणेश पिंगले ,बख्शीश सिंह , हरनाम सिंह ( स्यालकोट ) जगत सिंह , सुरेन सिंह ( पुत्र -ईशर सिंह ) एवं सुरेन सिंह ( पुत्र - भुर सिंह ) को मृत्यु दंड बहाल रखा |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक
आभार ---- हमारा लखनऊ पुस्तक माला से

Saturday, November 10, 2018

काकोरी - क्रान्तितीर्थ भाग - दो

काकोरी - क्रान्तितीर्थ भाग - दो


भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन की पृष्ठभूमि
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भारत में अंग्रेजी राज का इतिहास उनके छल और बल की कथा है तो वह हमारी यानी भारत के लोगो की कमजोरी , चरित्र की गिरावट के साथ उनके त्याग , तपस्या और बहादुरी की दास्ताँ भी है | 1600 ई. में इंग्लैण्ड में स्थापित ईस्ट इंडिया कम्पनी नाम की संस्था व्यापार करने भारत आई परन्तु हमारे आपसी द्देष तथा अन्य कमजोरियों का लाभ उठाकर भारत की शासक बन बैठी | 1757 में प्लासी की लड़ाई जीतकर कम्पनी ने बंगाल की नबावी को अपनी मुठ्ठी में कर लिया और 1764 में बक्सर ( बिहार ) की लड़ाई में बंगाल के नवाब मीर कासिम और उनके सहायक मुग़ल सम्राट शाह आलम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला को हराकर बंगाल की दीवानी तो ले ही ली , उत्तर भारत की राजनीति में अपना सिक्का जमा लिया | धीरे धीरे साम -दाम - दंड और भेद से अंग्रेजो ने भारत के बहुत बड़े भूभाग को अपने अधिकार में ले लिया | 1856 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर उनके राज्य पर कब्जा करके अंग्रेजो ने जोर - जबरदस्ती की सारी हदे पार कर दी| तब तक उनके व्यवहार , आचरण , नीतियों और कानूनों ने भारतीय समाज के लगभग सभी वर्गो को इतना नाराज कर दिया था कि उनका गुस्सा 1857 की क्रान्ति में फूट पडा | बड़ी कठिनाई से अंग्रेज उसे दबा पाए और 1858 में ईस्ट इंडिया कम्पनी को हटाकर ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया | ईस्ट इंडिया कम्पनी के राज में प्रशासन की नीति कम्पनी के आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर तैयार की जाती थी , अब महारानी विक्टोरिया के राज्य में इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में बहुतमत पाने वाली पार्टी भारत सम्बन्धी नीति तय करती थी | जब इंग्लैण्ड की सत्ता पर लिबरल पार्टी ( उदारवादी पार्टी ) का अधिकार होता था तो भारत का प्रशासन नरम हो जाता था और जब कंजर्वेटिव पार्टी ( अनुदार दल ) का बहुमत होता था तो प्रशासन कठोर रुख अपनाता था और साम्राज्यवादी रवैया प्रबल हो उठता था | यह नीति महारानी विक्टोरिया के 1856 के घोषणा पत्र के विपरीत थी | 1857 की क्रान्ति के बाद जब सत्ता ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ली तो ईंग्लैंड की महारानी ने एक घोषणा कि जिसमे बड़े स्नेहपूर्ण शब्दों में भारत के निवासियों को आशाजनक आश्वासन दिए गये थे | इस घोषणा का अंग्रेजी पढ़े - लिखे लोगो ने स्वागत किया | इसी वर्ग के लोगो का सहयोग लेकर ए.ओ . ह्युम ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी | ये वर्ग महारानी की घोषणा से कितना प्रभावित था , इसका अनुमान 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी के भाषण से लगाया जा सकता है जिसमे उन्होंने कहा , ''मुझे यह दोहराने की आवश्यकता नही है कि वह यशस्वी घोषणा - पत्र हमारे हृदयों पर गहरे अक्षरों में अंकित है | किन्तु मैं समझता हूँ कि वह हमारी स्वाधीनता का ऐसा शानदार और यशस्वी चार्टर है कि प्रत्येक भारतवासी बच्चे को जो समझदार होकर अपनी मातृ- भाषा में तुतलाकर बोलना आरम्भ करे , उसे याद कर लेना चाहिए |''
1857 के बाद क्रान्ति का प्रथम विस्फोट
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यह तो रही घोषणा के 28 वर्ष बाद अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगो के एक वर्ग की प्रतिक्रिया | इसके विपरीत भारतवासियों का एक बड़ा वर्ग व्यवहार में अंग्रेज अधिकारियो की कार्यपद्धति , उनके दृष्टिकोण और नीतियों को घोषणा पत्र के पूर्णत: विरुद्ध पाता था | व्यापार , सरकारी नौकरियों न्याय व्यवस्था , इसाई धर्म के विषय में नीति , सभी क्षेत्रो में भारतीयों की अवमानना - घोषणा - पत्र के विपरीत उनका तिरस्कार , अंग्रेज सरकार के इरादों पे संदेह पैदा करता था | ऐसे असंतोष के वातावरण में 1896 में संयुकत प्रांत वर्तमान उत्तर प्रदेश , मध्य प्रांत बंगाल , मद्रास बिहार राजस्थान तथा वर्मा के उत्तरी भाग जो उस समय भारत का अंग था में अकाल पडा तो सरकार की लापरवाही से लगभग साढ़े सात लाख व्यक्ति काल के गाल में समा गये | इसी समय भारत में प्लेग से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी का प्रकोप हुआ | सरकार ने लोगो को कैम्प में रखने , घरो की सफाई कराने और टीका लगाने की योजना बनाई | परन्तु जनता को विशवास में न लेने के कारण लोगो के मन में यह बात बैठ गयी कि सारा जीवन आयोजन धर्म - परिवर्तन के लिए किया जा रहा है | दूसरी तरफ महाराष्ट्र के महान राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक और उनके समाचार पत्र ''केसरी ' ने लोगो को इस बीमारी का बहादुरी और बुद्धिमानी से सामना करने को प्रेरित किया और रोग से बचने के उपाय बताये | इसी समय कुछ बाते ऐसी हो गयी जिनके कम से कम पश्चिम भारत का राजनीतिक वातावरण बहुत गरम हो गया | एक रात पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड और लेफिटनेंट आयसट की हत्या हो गयी | उसकी जो रिपोर्ट आदि 'केसरी ' में प्रकाशित हुई , उस पर राजद्रोह के अपराध में मुकदमा चला और तिलक को 18 मॉस के कठोर कारावास की सजा दी गयी | अंग्रेज अधिकारियो की हत्या के आरोप में 1998 - 99 में एक ही माँ के तीन बेटो -- दामोदर हरि चापेकर , बालकृष्ण हरि चापेकर एवं वासुदेव हरि चापेकर तथा महादेव विनायक रानाडे को पूना में फाँसी पर चढा दिया गया | सौ वर्षो से अधिक समय बीत जाने के कारण हम इस घटना की महत्ता आज भी नही समझ पायेंगे परन्तु 1917 में 'उग्रवादी ( क्रांतिकारी ) आन्दोलन की जांच - पड़ताल के लिए नियुक्त ''रोलेट कमिशन '' ने इस घटना को '' भारतीय उग्रवाद '' का पहला विस्फोट बताया था |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार - हमारा लखनऊ पुस्तक से