Saturday, July 14, 2018

देश का किसान है बेहाल --- 14-7-18

किसानो के सब्सिडी की असलियत

कृषि सब्सिडी अर्थात खाद , बीज , सिंचाई आदि पर दी जाने वाली सरकारी सहयाता को कृषि व किसानो को दी जाने वाली बड़ी सहायता के रूप में प्रचारित किया जाता है | रासायनिक खादों पर दी जाने वाली सब्सिडी केंद्र सरकार द्वारा और सिंचाई , बिजली पर सब्सिडी प्रांतीय सरकारों द्वारा दी जाती रही है | नि:संदेह कृषि क्षेत्र में मिल रही सब्सिडी से किसानो को उनके लागत के महंगे सामानों की खरीद में कुछ राहत मिलती है | हालांकि उन्हें सब्सिडी के प्रचारों से धोखा भी दिया जाता रहा है | इसमें पहला धोखा तो यही है कि यह सब्सिडी किसानो को खाद , बिजली , सिंचाई को कम मूल्य पर उपलब्द्ध कराने के लिए ही दी जाती है | जाहिर तौर पर यह बात ठीक भी लगती है | हालाकि सब्सिडी वाले मालो - सामानों के मालिको बाजारी दाम और उन मालो - सामानों के मालिको के लाभ में कोई कमी नही आती है | उन्हें न केवल सब्सिडी का पैसा मिल जाता है बल्कि सब्सिडी के चलते उन मालो - सामानों का बिक्री बाजार भी बढ़ जाता है | यह मालो के मालिको के लाभ मुनाफे का एक और स्रोत बन जाता है | अत: कृषि सब्सिडी , किसानो से कही ज्यादा धनाढ्य कम्पनियों को सहयाता पहुचाने का काम करता है | उनके लाभ एवं बाजार को बढाने का काम होता है |
सब्सिडी के सम्बन्ध में सरकारों और प्रचार माध्यमो द्वारा एक दूसरा धोखा रासायनिक खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा के बारे में दिया जाता रहा है | उदाहरण - केंद्र सरकार द्वारा रासायनिक खाद पर 1999-2000 में दी गयी - 13 हजार 244 करोड़ रूपये की सब्सिडी 2008 -2009 में 76 हजार करोड़ 609 करोड़ रूपये तथा 2015 - 16 में 72 हजार 438 करोड़ हो गयी | स्पष्ट है कि अब उसकी मात्रा में पहले जैसा बढाव नही हो रहा है | फिर बढती मात्रा बढती मात्रा में दी जाती रही सब्सिडी भी किसानो के लिए दरअसल राहतकारी नही हो पा रही है | उसका प्रमुख कारण 1991 - 92 के बाद से रासायनिक खादों के मूल्य पर लगे हुए सरकारी नियंत्रण का हटाना हो रहा है | उसके फल स्वरूप खादों के दामो में अचानक वृद्धि हुई जो लगातार बढती रही है | उदाहरण - 24 जुलाई 1991 को तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा रासायनिक खादों खासकर पोटाश , दाई पर मूल्य नियंत्रण हटाने के साथ उसके थोक मूल्य में 40% की वृद्धि कर दी गयी थी | बाद के सालो में भी रासायनिक खादों के बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों का बहाना लेकर देश में खादों के दामो में वृद्धि की जाती रही है | फलत: खादों पर दी जाने वाली 25% से 35% की सब्सिडी निष्प्रभावी ही नही बल्कि ऋणात्मक भी साबित होती रही | कयोकी सब्सिडी के मुकाबले खादों के मूल्य में वृद्धि कही ज्यादा हुई |
तीसरा धोखा कृषि सब्सिडी में खाद बिजली सिंचाई पर दी जाने वाली सब्सिडी के साथ खाध्ययान्न सुरक्षा योजना के अंतर्गत दी जाने वाली खाद्ययान सब्सिडी को मिलाकर कृषि सब्सिडी के प्रचारों द्वारा दिया जाता रहा है | असलियत यह है कि खाद्ययान सुरक्षा योजना के तहत दी जाने वाली सब्सिडी से कृषि उत्पादन वृद्धि में अथवा कृषि उत्पादों के बिक्री बाजार में कोई मद्दद नही मिलती | जबकि खाद्यान्न सुरक्षा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी का लगभग आधा है | 2015-16 में कृषि क्षेत्र को कुल मिलाकर दी गयी लगभग 2.5 लाख करोड़ की सब्सिडी में खाद्ययान योजनाओं की सब्सिडी 1.35 लाख करोड़ थी | फिर खाद्यान सुरक्षा योजना के अंतर्गत भरी सब्सिडी के जरिये अत्यंत कम मूल्य पर गेंहू - चावल की व्यापक वितरण प्रणाली से खाद्यान्नो के बाजार मूल्य भाव पर किसानो की दृष्टि से नकारत्मक असर पड़ता रहा है | उसके मूल्य भाव से अप्रत्यक्ष रूप में कमी आती रही है | स्वभावत: इसका घाटा आम किसानो पर ही पड़ता रहा है और पड़ रहा है | सब्सिडी के बारे में उपरोक्त धोखाधड़ी भरे प्रचारों को जान्ने - समझने के साथ आम किसानो को यह जरुर जानना चाहिए की किसान के लिए सब्सिडी से कही ज्यादा आवश्यक मामला खाद - बीज - बिजली - सिंचाई आदि के मूल्य नियंत्रण का है | उनकी कीमतों को उच्चतम लाभ देने वाली कीमतों से घटाकर औसत लाभ देने वाली कीमत पर लाने व नियंत्रित करने का है | अगर सरकारे खाद , बिजली , सिंचाई से जुडी कम्पनियों को अधिकतम लाभ कमाने के लिए उच्च मूल्य निर्धारण की छूटे व अधिकार न देती तो कृषि लागत के उपरोक्त मालो - सामानों पर सब्सिडी देने की दरअसल कोई जरूरत ही नही पड़ती | वस्तुत: किसानो को लागत के मालो - सामानों के बेहिसाब बढ़ते मूल्यों पर नियंत्रण चाहिए | सब्सिडी की किसानो को तभी तक जरूरत है , जब तक लगत के औद्योगिक मालो - सामानों के दाम को न्यूनतम स्तर पर नही ला दिया जाता |
इन मांगो को अगर किसान सगठित तौर पर नही उठाते है तो किसानो को मिलती रही सब्सिडी को काटा घटाया जाना निश्चित है | अत: किसानो को न केवल सब्सिडी देने बढाने की ही मांग करनी चाहिए अपितु खाद , बीज सिंचाई बिजली आदि मूल्यों को नियंत्रित किये जाने की मांग प्रमुखता से उठाना चाहिए |

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - चर्चा आजकल

Friday, July 13, 2018

किसान आन्दोलन व किसान सगठन की ऐतिहासिक - दशा - दिशा 14-7 -18

किसान आन्दोलन व किसान सगठन की ऐतिहासिक - दशा - दिशा

किसान आन्दोलन की शुरुआत ब्रिटिश गुलामी के समय से हुई थी | वह आन्दोलन बदलते रूप एवं चारित्रिक विशेषताओं के साथ 1947 - 50 के बाद भी चलता रहा | बीते समय के साथ किसान आन्दोलन के बदलते मुद्दों मांगो एवं समस्याओं के साथ किसान सगठनों के भी रूप बदलते रहे | किसान आंदोलनों एवं सगठनों के इतिहास के बारे में फिलहाल यहाँ हम एक मोटी रूपरेखा प्रस्तुत कर रहे है , ताकि आम किसान उससे प्रेरणा लेकर वर्तमान समय की अपनी समस्याओं को लेकर किसान समुदाय को सगठित करने का काम कर सके | साथ ही अपनी मांगो एवं आंदोलनों का निर्धारण भी कर सके |
ब्रिटिश शासन काल में किसान आन्दोलन मुख्यत" जमींदारों व महाजनों के अधिकाधिक लगान और अधिकाधिक सूदखोरी के विरोध में चलते रहे थे | साथ ही ये आन्दोलन इन जमींदारों महाजनों के साथ खड़े ब्रिटिश शासन - व्यवस्था के दमन उत्पीडन के विरुद्ध भी चलते रहे थे | इसके अलावा वे आन्दोलन आदिवासी क्षेत्र के भूमि पर ब्रिटिश शासन और उनके जमींदारों के अतिक्रमण व कब्जे के विरोध में तथा नील , चाय जैसी नयी खेती के मालिको द्वारा उसमे श्रम करने वाले किसानो व श्रमिको के भारी शोषण दमन के विरुद्ध भी चले | 1850 से लेकर 20 वी शताब्दी के शुरूआती वर्षो में ये सभी किसान एवं भूमि आंदोलनों क्षेत्रीय आन्दोलन ही बने रहे | इन आंदोलनों मव 1855-56 का स्थल विद्रोह 1857 के महा विद्रोह में किसानो की सबसे व्यापक भागीदारी 1860 में बंगाल में नील किसानो का विद्रोह 1875 में दक्षिण भारत में किसानो द्वारा मारवाड़ी एवं गुजराती साहुकारो के विरुद्ध विद्रोह के साथ ही साथ महाराष्ट्र में कपास किसानो का महाजनों व्यापारियों के विरुद्ध किया गया विद्रोह प्रमुख था 1895 में पंजाब के किसान समुदाय द्वारा बढती ऋणग्रस्तता के परिणाम स्वरूप उनकी जमीनों का सूदखोर महाजनों एवं अन्य गैर कृषक हिस्सों के पास हस्तांतरण के विरोध में सगठित विरोध किया गया | इसके फल स्वरूप ब्रिटिश हुकूमत को ''पंजाब भूमि अन्याकरण अधिनयम ' पास करना पडा |

बाद के सालो में कांग्रेस पार्टी ने भी किसानो के दमन अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठायी पर उसने रियाया व प्रजा किसानो के हितो के लिए कानून बनाने की मांग नही की | 1915 में गांधी जी के आगमन के बाद उन्होंने और कांग्रेस पार्टी ने बिहार के चम्पारण के नील किसानो के शोषण - दमन के विरोध में तथा महाराष्ट्र के खेडा क्षेत्र के किसानो के साथ भारी सूखे के बावजूद महाराष्ट्र सरकार द्वारा भारी कर वसूली के विरोध में सत्याग्रह आन्दोलन के जरिये भागीदारी निभाई | इससे कृषक समुदाय को थोडा बल जरुर मिला था | पर गांधी जी और कांग्रेस ने किसान आन्दोलन को अपने राष्ट्रीय एवं जनांदोलन का हिस्सा कभी नही बनाया | बाद में कांग्रेस के सोशलिस्ट धड़े ने तथा कम्युनिस्ट पार्टी ने स्वत: स्फूर्त ढंग से उठते किसान आन्दोलन का समर्थन करने के साथ उसे संगठित करने का भी काम किया | उसके फलस्वरूप जमींदारी , महाजनी तथा उसके सरक्षक बने ब्रिटिश राज के विरुद्ध 1920 के बाद से बंगाल , पंजाब , उत्तर प्रदेश बिहार में किसान सभाओं का गठन किया |
1928 में आंध्र प्रांतीय रैयत सभा और 1936 में बिहार जमींदारों के अपनी काश्त कही जाने वाली कृषि भूमि पर रियाया के शोषण के विरुद्ध 'बाकाश्त भूमि विरुद्ध आन्दोलन '' शुरू किया गया | वहाँ की किसान सभा ने जमींदारों द्वारा बेदखल किये गये किसानो को सगठित व आंदोलित करने में अग्रणी भूमिका निभायी | अखिल भारतीय किसान सभा के 1936 में लखनऊ अधिवेशन में कृषको पर चढ़े कर्ज की वसूली स्थगित करने , कम उपजाऊ जमीनों पर भूमि कर हटाने , कृषि मजदूरो का न्यूनतम वेतन निश्चित करने , गन्ना व अन्य व्यापारिक फसलो का उचित मूल्य भाव तय करने सिंचाई के साधनों को मुहैया करने आदि की मांग की गयी | इसके साथ ही किसान सभा किसानो से स्वतंत्रता आन्दोलन में भी भाग लेने का भी आव्हान किया |
किसान सभाओं के गठन एवं आन्दोलन के दबाव में कांग्रेस ने भी 1936 के बाद के अधिवेशनो में खासकर करांची एवं फैजपुर अधिवेशनो में लगान कम करने का , पुराने चढ़े लगान व ऋण को समाप्त करने का , कृषि मजदूरो के लिए न्यूनतम वेतन की मांग का प्रस्ताव किया | जमींदारों के भूमि बेदखली के विरोध में किसानो के चल रहे मांगो आंदोलनों के दबाव में कांग्रेस पार्टी ने जोतने वालो को जमीन का मालिकाना देने का नारा जरुर दिया पर तब तक जमींदारी उन्मूलन को उन्होंने कृषि कार्यक्रम का हिस्सा नही घोषित किया था | 1847 से ठीक पहले के सालो में तीन बड़े आन्दोलन के रूप में बंगाल का ''तेभागा आन्दोलन'' , हैदराबाद का ''तेलगाना आन्दोलन'' पश्चिमी भारत का ''वरली आन्दोलन'' प्रमुख थे |
तेलगाना आन्दोलन तो 1947 के बाद तक चलता रहा | वह आन्दोलन वहां के शासक निजाम और बड़े भूस्वामियो के विरुद्ध 1945 से शुरू हुआ था | इसके फलस्वरूप वहाँ भूमि हदबंदी पहले 500 एकड़ फिर 100 एकड़ का निर्धारण करने के बाद निकली जमीनों को भूमिहीन एवं गरीब किसानो में बाटा गया | उस समय की अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी इस आन्दोलन की अगुवा शक्ति थी | इसके अलवा पटियाला के रियाया किसान का आन्दोलन भी 1945 से शुरू हुआ था | इसने रियाया कृषको एवं भूस्वामियो के बीच होते रहे लम्बे एवं कटु संघर्ष को पटियाला ''मुजरा आन्दोलन'' के रूप में जाना गया | नक्सलबाड़ी आन्दोलन के नाम से विख्यात आन्दोलन भी मुल्त: किसान आन्दोलन ही था | वह आन्दोलन दरअसल भूस्वामियो के विरुद्ध भूमिहीन एवं छोटे किसानो का सगठित एवं सशक्त आन्दोलन था , भारी दमन के चलते तथा आन्दोलन के नेतृत्व में बढ़ते फूट के चलते यह आन्दोलन किसान आन्दोलन के रूप में कमजोर पड़ता गया और ग्रामीण एवं कृषक आन्दोलन की जगह शहरी प्रगतिशील एवं मध्यमवर्गीय आन्दोलन के रूप में सीमित हो गया | आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में भी बड़े भूस्वामियो के विरुद्ध नक्सलबाड़ी जैसा सशत्र कृषक आन्दोलन शुरू हुआ था , जिसे बाद में दबा दिया गया | इन आंदोलनों में आधुनिक खेती के खड़े हो रहे नए पूजीवादी शोषको का विरोध नही हो पाया | आधुनिक खेती को अपनाए जाने के साथ ही नए किसान आन्दोलन का जन्म हुआ 1980 में महाराष्ट्र के ''शेतकारी सगठन'' ने प्याज व गन्ने के बेहतर मूल्य को लेकर किसानो को सगठित व आंदोलित किया | 1986 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन , तमिलनाडू में ''विवसगल संगम आन्दोलन'' ने लाखो किसानो को आन्दोलन में उतारा | इन सगठनों ने विभिन्न कृषि उत्पादों के मूल्य भाव बढाने बिजली सिंचाई के दर रेट घटाने कृषि ऋण माफ़ करने आदि की मांग को आगे करके किसानो को सगठित व आंदोलित करने का काम किया था | विडम्बना यह है कि इन किसान आंदोलनों को गैर राजनीतिक कहते और प्रचारित किये जाने के वावजूद सभी सगठन विभिन्न राजनीतिक दलों व नेताओं के समर्थक बनते गये |साथ ही इन सगठनों के किसान सगठन और किसान आन्दोनो में गिरावट आई |

1991 में लागू की गयी आर्थिक नीतियों एवं 1995 में स्वीकार किये गये डंकल प्रस्ताव के बाद ये सभी किसान सगठन एवं आन्दोलन लगातार कमजोर पड़ते गये या कमजोर किये जाते रहे | इस दौर में किसान सगठन एवं आन्दोलन को ही नही बल्कि मजदूरो एव अन्य जनसाधारण के आंदोलनों एवं सगठनों को भी कमजोर किया गया | उसमे सागठनिक टूटन को विभिन्न रूपों में बढ़ावा दिया गया | क्योकि इन आर्थिक नीतियों तथा डंकल प्रस्ताव में देश विदेश के धनाढ्य वर्गो के दबाव में सभी पार्टियों की सरकारों द्वारा जनविरोधी नीतियों को लागू करने तथा बढाने हेतु जन आंदोलनों व सगठनों को तोड़ना जरूरी हो गया था जैसा आज भी हो रहा है इसका परीलक्षण सभी प्रमुख राजनीतिक दल के अपने ट्रेड यूनियनों एवं किसान सगठनों के कमोवेश निष्क्रिय होते जाने के रूप में भी सामने आ रहा है | अब उनका मुख्य कार्य पार्टी के लिए किसानो को उनके वोट बैंक को जोड़ना रह गया है | किसानो की बढती समस्याओं संकटो के विरुद्ध किसानो को सगठित एवं आंदोलित करना उनका कार्यभार कदापि नही रह गया है | वर्तमान समय में बहुप्रचारित किसान आन्दोलन कई बार तो विपक्षी पार्टियों या फिर गैर सरकारी सगठनों द्वारा या कही कही स्थानीय किसानो द्वारा चलाए गये छोटे - छोटे आंदोलनों के रूप में सामने आ रहा है | कृषि भूमि के अधिग्रहण के विरुद्ध 3 - 4 साल पहले विभिन्न क्षेत्रो में खड़ा होता आन्दोलन भी अब सरकारों द्वारा दिए जा रहे मुआवजे की भारी एवं अप्रत्याशित काम के जरिये धाराशायी कर दिया जा रहा है | ऐसी स्थित में समस्याग्रस्त किसानो उनके समर्थको को किसान सगठन व आन्दोलन की नयी शुरुआत करने की जरूरत है | अपनी समस्याओं मांगो को लेकर सभी धर्मो जाति के श्रमजीवी किसानो को स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर किसान सगठनों समीतियो के रूप में सगठित होने की अनिवार्य आवश्यकता खड़ी हो गयी है |कारण है कि अब विभिन्न पार्टियों के उच्च नेतागण प्रचार माध्यमो के उच्च स्तरीय प्रवक्ता किसान विरोद्शी नीतियों को लागू करने के साथ अपने आप को किसान हितैषी के रूप में प्रचारित करने के साथ किसानो को धर्म जाति क्षेत्र की परस्पर विरोधी गोलबन्दियो में बाटने तोड़ने में लगातार लगे हुए है | इसीलिए अब किसानो को उनकी समस्याओं के कारणों को जानने समझने तथा किसानो को जागृत संगठित एव आंदोलित करने का दायित्व सक्रिय प्रबुद्ध किसानो तथा किसान समर्थको का ही है | याद रखने की जरूरत है कि वे यह काम किसान की पहचान को प्रमुखता देकर ही कर सकते है |

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक ''चर्चा आजकल ''

Tuesday, June 19, 2018

अतीत के झरोखो में - आजमगढ़ 19-6-18

अतीत के झरोखो में - आजमगढ़ - vol -1

कल बड़े भाई साहब के घाट कार्यक्रम के अवसर पर गौरीशंकर घाट जाना हुआ , वो घाट मेरे लिए स्मृतियों का पन्ना है , वहाँ पर पीपल की छाँव के नीचे बैठकर पंडित जी द्वारा वैदिक कार्यो को देखता रहा और स्मृतियों में खो गया , मैं अक्सर डा शान्ति स्वरूप जी से मिलने जाता रहता था कला के क्षेत्र में नई जानकारियाँ लेने के सन्दर्भ में एक बार मैंने उनसे पूछा कुछ इस शहर के बारे में बताये तो उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि एक बार मेरे मारीशस के चित्रकार मित्र ' तुलसी ' जी मेरे पास आये वे लैंड स्केप के एक सफल चित्रकार थे वे किला का दृश्य बनाना चाहते थे लेकिन उन्हें किले का चित्र बनाने की अनुमति नही मिली मगर किला घुमने की इजाजत मिल गयी | चर्चा आगे बढती है वे बताते है कि राजा आजमशाह ने अपने दोनों सेनापतियो को अपनी छत्रछाया में ही बसाया था | आज उन मुहल्लों का नाम बाज बहादुर एवं जालंधरी है | किले के अगल बगल को कोट मुहल्ला कहा जाने लगा बाद में यह भी एक मुहल्ले में परिवर्तित हो गया | किला बन जाने और जागीर का मुख्यालय बनने के बाद स्वाभाविक था कि यहाँ बस्ती फिर बाजार बसने थे | आजमशाह ने किला के सामने के पुल का विचार त्याग दिया लेकिन पश्चिम तरफ एक बड़ी मस्जिद और उसके बगल में घाट सहृदयता से बनवाया | मस्जिद शाही मस्जिद कही जाती थी , बाद में इसे दलालघाट की मस्जिद कहा जाने लगा | घाट के किनारे शंकर जी का मंदिर बनवाया गया और पुरोहित गौरीशंकर पाण्डेय के नाम पर इसे गौरीशंकर घाट कहा जाने लगा | सीताराम सेठ किला निर्माण के दौरान राशन की सप्लाई करते थे बाद में उनकी सेवाओं को देखते हुए राजकर्मचारी का दर्जा दिया गया वहाँ वे भंडार अधिकारी जीवन पर्यंत बने रहे | उन्ही की कृषि भूमि और निवास के आधार पर यह बाद में मुहल्ला सीताराम हुआ , जो आज भी है | मुंशी अन्नत प्रसाद मुल्त: फतेहपुर के कायस्थ थे , उनके पुरखे यहाँ मुंशीगिरी में आये थे | वे राज के खर्चा का लेखा जोखा रखते थे , उन्हें अनन्तपुरा मुहल्ले में निवास के साथ जमीन दी गयी थी | राजा के सलाहकार गुरु पंडित बलदेव मिश्र को गुरुटोला में निवास हेतु भूमि दी गयी थी | गुरुघाट और वहाँ के मंदिर जो अजमतशाह के समय में बने उनके लिए बनवाये गये थे |पंडित दयाशंकर मिश्र ने कुछ पुराने लोगो के आधार पर पता लगाया था और भौगोलिक पर्यवेक्षण से भी कुछ तथ्य सामने आई कि तीन चार सौ वर्ष पहले तमसा का घाट पश्चिम में बिहारी जी के मदिर तक था | गौरीशंकर घाट के शिव मंदिर के पुजारी शुरू से ही गिरी लोगो के हाथो में रहा | मच्छरहट्टा के पास शिव कुमार गिरी के घर तक तमसा बहती थी | सारा कालीनगंज एलवल जलमय था वेस्ली स्कुल आज भी उंचाई पर है , तब भी उंचाई पर था ; उससे पश्चिम ही बस्ती थी , बाद में नदी पूरब को गहरी होती गयी और ये जमीन रिहाइशी हो गयी | मुख्य बस्ती बदरका से मातबरगंज तक थी | बीच में बच्छराज खत्री एक बड़े व्यापारी थे उन्होंने कई पक्के कुंए खुदवाए और सदाव्रत चलाते थे | इस आधार पर इस मुहल्ले को सदावर्ती कहा गया उन्होने बाजार बसाने की दृष्टि से व्यापारियों को सुविधाओं का एलान किया फलत: पश्चिम से बहुत मारवाड़ी और अग्रवाल लोग यहाँ आकर अपना व्यापार करने लगे | मिश्र जी के अनुसार ये लोग दूकान नही बल्कि खेती का व्यापर करते थे | आजमशाह के ही समय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के रहने तथा भरण पोषण के लिए उत्तरी हिस्से में जमीन दी गयी उस समय के प्रचलन के अनुसार वे ''गुलाम '' कहे जाते थे और उनके गाँव को गुलामी का पूरा नाम दिया गया | राजा आजमशाह एक आदर्श राजा थे विचार उदार तथा हृदय विशाल उनके समन्वयवादी स्वभाव के नाते हिन्दू - मुसलमान सभी उन्हें अपूर्व आदर करते थे | वे सचमुच प्राचीन राजाओं की तरह पूज्यनीय थे | वे कानून सुरक्षा एवं न्याय के पर्याय थे | यदि कोई विवाद होता तो स्वंय त्वरीत फैसला कर देते थे | अठठेसी का विद्रोह भी मद्धिम पड़ गया कयोकि बहुत से ठाकुरों का दल उन्हें आदर करने लगा | उनकी न्यायप्रियता जौनपुर गोरखपुर फैजाबाद तक प्रसिद्ध हो गयी थी ,यह प्रसिद्धि दिल्ली तक पहुची बादशाह औरंगजेब तकउसने आजमशाह को बुला भेजा और महत्वपूर्ण सलाहकार मंडल का सदस्य बनाया मिर्जा राजा जयसिंह से संधि प्रस्ताव के दल में आजमशाह को भी शिवाजी के पास भेजा गया - इस संधि के बाद आजमशाह को संदेह ही नही विशवास भी हो गया कि धोखे से शिवाजी को कैद कर लिया जाएगा | इन्साफ पसंद आजमशाह को यह बात बुरी लगी वे कन्नौज में ही रुक गये - इस बात से औरंगजेब सशंकित हो उठा | इसके पहले कि औरंगजेब आजमशाह को सफाई देने के लिए बुलाता शिवाजी अपने बुद्धिबल से फरार हो गये इस पर औरंगजेब और कुंठित हो गया | उसने कन्नौज में ही आजमशाह को कैद करा लिया जहाँ उन्हें भीषण यातनाये दी गयी | अपनी जन्मभूमि और राजभूमि से बहुत दूर आजमशाह एकांत में घुट घुट कर दिन काटते रहे यातना गृह में ही उनकी मृत्यु हो गयी | बाद में उनका शव यहाँ लाया गया और जनता ने पुरे सम्मान के साथ राजघाट से उस पार बाग़ लाखरांव में उनको दफन कर दिया | भाग्य में जो लिखा रहता है वही होता है | आदमी वक्त के हाथो का खिलौना भर है |आजमगढ़ की स्थापना के साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से आजमशाह - अजमत शाह ने औरंगजेब से सहमती लेकर अपने क्षेत्र बाट लिए थे | आजमशाह ने पूर्वी हिस्से में अपनी देख रेख बनाया और अजमत शाह ने पश्चिमी | इसकी वजह कुंडलाकार तमसा नदी है | बिरली नदियों में इतनी कुंडली मिलती है | नगर को उसने बाहुपाश में ऐसे जकड़ रखा है जैसे कोई सर्पनी अपनी नागमणि को | नगर के चौक पर खड़े हो जाइए उत्तर को छोड़कर आप किसी भी दिशा पूरब पश्चिम दक्षिण में भागे तो यह नदी आपको रोक लेगी | नदी पार कर इन तीनो दिशाओं से आप आकर अपराध कर भाग भी सकते है यदि तैरना जानते हो तो नरौली रोड पर गिरजाघर मोड़ पर पूरब पश्चिम मार्ग का मिलन बिंदु है | यही स्थिति कदाचित सत्रहवी शताब्दी के मध्य में भी थी तभी आजमशाह मुख्य सड़क जो शेरशाह ने बनवाई थी से पूरब हिस्से में देखभाल करते थे | पश्चिम में नदी कोदर क्म्हैनपुर से दक्षिण वर्तमान ज्योति स्कुल से आगे जाकर कोल पाण्डेय गुरुटोला होती नगरपालिका कचहरी होते रैदोपुर कालोनी होती नदी की मुख्य धारा आकर पूर्व धारा से मिल जाती थी | इसलिए बीच के पश्चिमी हिस्से के देखरेख के लिए अजमत शाह ने कोडर में अपना निवास बनवाया इसे आज अजमतपुर कोडर कहते है | अजमत शाह ने भी कुछ महत्वपूर्ण कार्य किये उन्होंने नदी के किनारे घाट और आवागमन के लिए फेरी बनवाया | इसे राजघाट कहा गया | बाद में यहाँ एक मंदिर बनवाया गया लेकिन अजमत शाह के जमाने में नही | उन्होंने तो राजघाट से पश्चिम एक मंदिर बनवाने की स्वीकृति दी थी | यह राज मन्दिर खा जाता है इसमें विष्णु की मूर्ति थी इसे विशुनपुर राजमंदिर कहा जाने लगा इस क्षेत्र के लीलाधर उपाध्याय महावत खा के समय 1703 इ में बहादुर सेनापति थे जिन्होंने मिर्जा शेरवां को हराया था तब से इस गाँव का नाम लीलाप[उर प्रसिद्ध हो गया \ राजघाट लम्बे समय तक उपेक्षित पड़ा रहा 1750 इ के करीब गुलाल साहब यहाँ आये तो राजघाट में रुके तबसे यह उदासीन सम्प्रदाय के लोगो का एक प्रमुख मठ हो गया इसकी पुरानी शैली पर और अपित सुरंगे आज भी मौजूद है |

अतीत के झरोखो में आजमगढ़ -- vol - 2
इतिहास लेख सत्य - असत्य हो सकता है किन्तु मानव मनोविज्ञान के मापदंड अडिग विश्वनीय एवं तर्क सम्मत होते है , इसके दर्पण से कहा जा सकता है कि श्रेष्ठ ऋषियों के देहावसान के बाद ये आश्रम और भूमि उनके अयोग्य शिष्यों के हाथ में आ गये , वहाँ वदाचार भी पलने लगा फलत: क्षेत्रीय जनता ने बाहुबलियों से गुहार लगाईं होगी | उद्धार के बाद सुरक्षा के नाम पर इन बाहुबलियों ने उस पर कब्जा कर लिया होगा , यही राज्यों का प्रारम्भिक रूप जमींदारी थी | एक जमींदारी से दूसरी जमींदारी की टक्कर से युद्ध का जन्म हुआ इससे बचाव के लिए कुछ समन्वय वादियों ने सुलह - समझौते के माध्यम से राज्यों की मेडबंदी कर दी ईसा पूर्व 7वी शताब्दी में इस तरह के बटे हुए सोलह जनपदों का उल्लेख्य मिलता है | इस प्रखंड के चार मुख्य जनपद थे 1 - कोशल 2- काशी 3- मगध 4- मल्ल | इनमे भी बराबर युद्ध होते रहते थे और आजमगढ़ की भूमि इन चारो में टुकड़े - टुकड़े बटी रहती थी | इस बात बखराव् से कई भयंकर परिस्थितियों उत्पन्न हो जाती थी | घर में अगर सुन्दर लड़की उत्पन्न हो गयी तो फांसी का फंदा थी - सयानी होने के बाद वह घर के लिए विपत्ति हो जाती थी | तत्कालीन राजतंत्र में राजा कुट्निया पालते थे जो परिवारों में पैठ बनाकर सुन्दरियों की सुचना पहुचाती थी और उनके अपहरण के बाद इनाम इकराम पाती थी | इसीलिए लडकियों को पैदा होते ही गला दबा कर जमीन में गाड दिया जाता था | केवल दो तरह के लोग बेटियों को नही मारते थे 1- जो शक्ति बल में समर्थ थे 2- जो अनैतिक कार्यो के लिए लडकियों को बेच दिया करते | पुरुष भी त्रस्त थे | जब दो राज्यों के बीच युद्ध होता तो घरो के नौजवानों को जबरन पकड़कर सेना में शामिल किया जाता और दूसरे राज्यों के बीच युद्ध के लिए भेजा जाता था | तब हर आदमी की दशा कुरुक्षेत्र के अर्जुन की तरह सी हो जाती , कोशल के नौजवानों को मगध के अपने ससुर पर हाथ उठाना पड़ता | काशी के लोगो को न चाहते हुए भी मल्ल जनपद के अपने मामा फूफा पर शस्त्र चलाना पड़ता | इन युद्धों को रोकने की महत्वपूर्ण भूमिका तब इश्क निभाता था | एक राज्य की राजकुमारी से दूसरे राज्य के राजकुमार से आँख लड़ गयी आँखों की लड़ाई से तलवार की लडाईया रुक सी जाती | 543 ईसा पूर्व में बिम्बसार ( मगध ) की शादी कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन कोशला से हुआ | राज्य की वार्षिक आय मगध में चली गयी , बाद में फिर विवाद -युद्ध हुआ | राज्य पर राज्य बदलते रहे बिम्बसार के बाद अजातशत्रु - चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य और अशोक मृत्यु 232 ई पू लेकिन जनता की दशा नही बदली , वही विपत्तिया आर्थिक विपन्नता और शोषण | गाँवों के पास आत्मनिर्भरता के सिवा क्या चारा था | समाजोपयोगी जातियों का संकुलन बसाया गया , बढई,- लोहार - कुम्हार ब्राह्मण और अन्य सेवक जातिया | राज्य के कुचक्र अत्याचार हत्या बलात्कार की खबर आम जनता तक नही पहुचती पहुचती भी थी तो गुप -चुप फुसफुस और वही दफन कर दी जाती | बड़ी घटनाए ही सामने आती | बाद के शुंग - देववंश मित्रवंश और कुषाण वंश राज्य था | डा शान्ति स्वरूप जी ने अपने लेख में सर्वहितकारी 17 अक्तूबर 1977 में लिखा है कि पिछली शताब्दी में कर्निघम और कारलाइल ने जो इस परिक्षेत्र में खुदाई कराई थी उसमे कुछ प्राचीन सिक्के मिले थे जिसे मौर्यकालीन काल घोषित किया गया था | इसी खुदाई में अतरौलिया के पास देवराही में मौर्यकालीन सिक्के भी प्राप्त हुए थे इससे सिद्ध होता है कि मौर्यकाल में यह जनपद व्यवस्थित दशा में था | डा ईश्वरी प्रसाद करीब सौ वर्ष का यह अंतराल आजमगढ़ अविभाजित की भूमि सनातन बनाम बौद्ध धर्म युद्ध क्षेत्र मानते है | जनपद की उत्तरी बैल्ट गोरखपुर देवरिया बलिया सनातन ब्राह्मणों की थी जो वेद - पुराण कर्मकांड और लोकाचार से बंधी हुई जिन्दगी जीते थे शैवमत के कारण हिंसा बलि तन्त्र मन्त्र टोना टोटका के ग्रामीण - नागर रूप जनता को पकडे थे | बुद्ध ने इन अन्धविश्वासो लोकाचारो का विरोध किया तब मुख्यत: पूर्वीकोशल और मल्ल गणराज्य गोरखपुर देवरिया पश्चिमी बिहार के ब्राह्मणों ने प्रतिक्रिया स्वरूप मांस भक्षण अपनाया | एक और वे वर्णित विधियों के अनुसार दोनों कानो पर जनेऊ लपेट कर शौच जाते इक्कीस बार मिटटी से हाथ साफ़ करते बगैर सिला वस्त्र पहनते गाय के खुर बराबर चुटिया रखते कई घंटे पूजा विधान का निर्वाह करते लेकिन भोजन में मछली चिड़िया और गोश्त खाते थे | यह प्रवृत्ति मिश्रान ,मलान में घुस आई | लेकिन फूंक से जंगल में लगी आग बुझाई नही जा सकती | अनैतिक धोखेबाज ठग कर्मकांडीयो ने सनातन धर्म का रूप बिगाड़ दिया था कि जनता अन्दर - अन्दर ज्वालामुखी बन गयी और बौद्ध धर्म इस जनपद में प्रतिष्ठित हो गया | अंचल का पूर्वी छोर जहाँ सनातनीगढ़ था वही महागोठ ( महगोठ + गोठा +गोठा )में विशाल बौद्धगढ बन गया | आज इस स्थल की बौद्ध प्रतिष्ठा मान्य है वहाँ एक होटल तथागत स्थापित हो चूका है | कुशीनगर के पास एक गाँव सठियांव है और आजमगढ़ में भी सठियांव है ये दोनों श्रेष्ठिग्राम के तदभव रूप है | यहाँ बौद्धों को आर्थिक सहायता देने वाले बड़े - बड़े सेठ थे उस समय यह सठियांव मुहम्मदाबाद से फूलपुर तक फैला हुआ था सठियांव में गन्ने तिलहन हथकरघा के व्यापार संकुल थे , रानी की सराय - सेठवल सेठअवली + सेठो की परिवृति में गुड फूलपुर में धातु उद्योग चलते थे | देवलास में कुछ मुर्तिया मिली थी जिन्हें बुद्ध से संयुकत किया गया | जिले के अन्य क्षेत्रो में माहुल तक मूर्तिखंड मिले है और तो और लालगंज के पास प्ल्मेहशवरी मन्दिर की मूर्ति को भी राहुल जी ने बुद्ध की मूर्ति कहा | महराजगंज के पास भैरो स्थान के बड़े कुओं को जबकि दक्ष के यज्ञ विध्वंश से जोड़ा जाता रहा है या दशरथ द्वारा खुदवाए कुपो का नाम दिया जाता रहा है राहुल जी ने बौद्ध बिहार के संडास बताये | बौद्ध धर्म ने पूरे संसार में इतनी व्यापकता हासिल की की सनातनी धर्म ने भी बुद्ध का एक अवतार स्वीकार कर लिया | उस समय आजमगढ़ का नजारा क्या रहा होगा ? लोग क्या पहनते ओढ़ते रहे होंगे ? कैसी सवारिया पर आते जाते रहे होंगे ? मनोरंजन व्यापार बाजार दृश्य कैसा रहा होगा ? चन्द्रगुप्त 320 ई.पू के बाद कुमारगुप्त स्कन्दगुप्त इत्यादि हुए जिनका विवरण आजमगढ़ की विभिन्न पुस्तको में दिया गया है | इसी बीच 410 ईस्वी के समय में फाहियान ने भारत यात्रा की थी अपनी यात्रा में वह रामजानकी मार्ग से होता जनपद के पूर्वी भाग से गुजरता सारनाथ गया था उसने तत्कालीन समाज का चित्रण किया है | 465 ई में हूणों के आक्रमण हुआ और हिन्दू साम्राज्य की उपसाहरित कड़ी के रूप में सम्राट हर्षवर्धन का साम्राज्य हुआ जिसकी पूर्वी राजधानी कुडधानी ( कुडधानी - कुडाकुचाई ) आदि थी यही एक खेत में उसका तामपत्र मिला था जिसका विवरण दयाशंकर मिश्र के इतिहास में है | उस तामपत्र की भाषा संस्कृत में है लेकिन संस्कृत जनभाषा नही रही होगी कारण यह कि पाली के प्रभाव से बौद्ध युग से ही भाषा में बदलाव आने लगे थे , फिर प्राकृत और फिर अपभ्रंश भाषा बनती गयी | नागर भाषा से काटकर जनभाषा की अपनी बोली में बोलने के प्रयास में अपभ्रंश की ग्राम्य शाखा भी पूरब पश्चिम के स्टाइल में बात गयी | प्छुअहिया बोली मथुरा तक सिमट कर शौर सेनी और पूरबहिया कोशल - काशी - पटना मगध तक फैलकर मागधी हो गयी | भौगोलिक सांस्कृतिक और स्थानीय प्रभावों के कारण और स्थानीय के कारण कोशल के आसपास की अवधि | काशी पश्चिम बिहार बलिया आरा छपरा की स्टाइल भोजपुरी और पटना और उसके अगल बगल की मागधी मैथली इत्यादि हो गयी | 997 ई में महमूद गजनवी के आक्रमण से लेकर 1024 ई में सोमनाथ मंदिर के आक्रमण तक इन बोलियों ने तुरकाना मेल मिलावट से बचने के लिए अपनी बोली को अपने में सिमटाकर स्वरूप को मजबूत कर लिया | ग्यारहवी शताब्दी में भोजपुरी इस क्षेत्र में बोली जाती थी | गुरु गोरखनाथ की रचनाओं में प्रबल भोजपुरी की झलक है | संत वाणी के कारण उसका रूप बदल गया है |
इतिहास के झरोखे से आजमगढ़ --- vol -  3
आजमगढ़ के संस्थापक राजा आजमशाह जरुर थे , किन्तु इसका जन्मदाता शेरशाह सूरी था , उसी ने यहाँ नीव की ईट रखने का कार्य किया | उसके व्यक्तित्व का निखार जौनपुर में हुआ था इस कारण वह जौनपुर को बहुत प्यार करता था , तब आजमगढ़ जौनपुर राज्य के अधीन था और उजाड़ था , अविकसित बस्तिया थी , चारो और जंगल जैसा परिवेश था | चूँकि शेरशाह की पुत्री मानो बीबी मीरा शाह की मुरीद थी और घोसी के पास उनकी दरगाह में पवित्र जीवन जीते हुए खुदा ही इबादत में लींन रहती थी , अतएव उससे सम्पर्क बनाये रखने के लिए के लिए उसने जौनपुर से दोहरीघाट तक की सडक बनवाई , बीच में पुलों को निर्मित कराया और सडक के किनारे वृक्ष लगवाया | सम्पर्क सूत्र तथा डाक व्यवस्था की दृष्टि से उसने बीच - बीच में कच्ची - पक्की सराए बनवाई | जौनपुर दोहरीघाट के बीच आजमगढ़ में उसके डाक व्यवस्था के सदर फत्तेह खा के नाम से एक सराय बनवाई गयी जहां धीरे धीरे छोटी सी बाजार भी बस गयी | नगर के मध्य बड़ादेव नगरपालिका मार्केट के पीछे स्थित सराय फत्ते खा ही इसका प्राचीनतम चिन्ह है |
जौनपुर - आजमगढ़ में पक्की सराए थे पर उसने दोहरीघाट में कोई पक्की सराय नही बनवाई इसका कारण यह था कि तब सरयू नदी की धारा मीलो दक्षिण होकर बहती थी जिसके किनारे सगोष्ठ ( गोठा ) ग्राम था जहां कृषि एवं गृहस्थी की बड़ी मंडी थी | बौद्धकाल की चर्चा में लिखा जा चुका है कि कभी यह स्थल बड़ा महत्वपूर्ण था और यहाँ विशाल संघाराम था ( आज इस स्थल पर भव्य 'मोटल - तथागत ' है ) सप्ताह में दो दिन आज भी यहाँ बाजार लगती है | सोलहवी शताब्दी तक यह संघाराम नष्ट हो चूका था पर व्यापारियों को रुकने के लिए कच्चे भवनों की श्रृखला जरुर थी | कार्तिक पूर्णिमा और गंगा दशहरा पर भव्य मेला लगता था | इसलिए यहाँ यात्रियों व्यापारियों के ठहरने के लिए पर्याप्त व्यवस्था बनाई गयी थी | यहाँ सराय की आवश्यकता नही थी | आजमगढ़ के अंकुरण की कथा भी बड़ी अनोखी है | कहा जाता है कि आदमी कठपुतली है | उसकी डोर से भवितव्यता नचाती है | बाबर से पहले के आक्रमणकारियों ने यहाँ कारगुजारियो का उद्देश्य ''लूट ' रखा | वे आये लूटा और वापस चले गये | लेकिन बाबर ने राज्य करने के सपने से मुग़ल साम्राज्य की नीव रखी | पानीपत के युद्ध में बारूद के प्रयोग से उसने ऐसा सिक्का जमाया की लोदी वंश समाप्त होने के बाद लोगो की टक्कर लेने की हिम्मत नही रही | परन्तु उसकी मृत्यु के बाद हुमायूँ के शासनकाल में यहाँ के राजाओं - जागीरदारों में साम्राज्य को उलट देने की ललक पैदा हो गयी | हुमायूँ को टक्कर देकर धराशायी करने की शक्ति इन राजाओं ने शेरशाह सूरी में देखा और बहुतेरे उसके साथ हो गये | इनमे फतेहपुर की अर्गल जागिदारी के गौतम वंशीय ठाकुर हरबरन देव भी थे | 1537 ई0 में शेरशाह ने चुनार में युद्ध करके जो किला जीता उसमे हरबरन देव प्रमुख सहायक थे | दुर्भाग्य से शेरशाह का राजकाल कुल 5 वर्षो का रहा , वह दिल्ली का सम्राट 1540 में हुआ था और 1545 में अपने ही अस्त्र में बारूद फटने से शेरशाह बुरी तरह झुलस कर मर गया | हरबरन देव को कोई इनाम इकराम न मिल सका | हुमायूँ भी इनकी शत्रुता को भुला नही था | उसने इनका पता लगाना शुरू किया - यह खबर लगते ही जागीदार हरबरन देव की मृत्यु करीब दिखाई देने लगी | वे भागे भागे जौनपुर आये शेरशाह के पुत्र सलीमशाह की शरण में | सलीमशाह ने इनके एहसानों का ख्याल करते हुए राज के बीच खुट्वा गाँव प्रदान किया - सलीम की योजना थी कि खुट्वा में बसकर हरबरन देव पोशीदगी में किसान जमींदार बनकर वेश बदल कर रहे | गाँव वालो से भी उनकी पहचान छिपी रहे फिर हुमायूँ के सिपाही नही पहचान पायेंगे | लेकिन हर बरन देव अपनी और अर्गल राज में रह रहे अपने विपत्ति से घिरे परिवार की चिंता में घुल घुल कर मृत्यु को प्राप्त हुए | फतेहपुर से उनके बड़े पुत्र सग्राम देव और चन्द्रसेन सिंह जौनपुर आये जहाँ गोमती तट पर उनका दाह संस्कार किया | रविन्द्र सतान ने लिखा है कि आजमगढ़ नगर में एक अभिलेख संस्कृत में एक पथरिया पर पाया गया जो संवत 1609 ( सलीम शाह काल का है )
जब अकबर सिंहासन पर बैठा उसने अपने बल - बुद्धि - विवेक से दृढ मुग़ल सल्तनत स्थापित किया | वह जितना समझदार था उतना ही चालाक भी था लेकिन अपनी चालाकी को उसने हमेशा जनसेवा , मेल - मिलाप समन्वय का रूप दिया | वह न कभी खुदा को भूलता था न अपने दुश्मनों को |हुमायूँ जैसे सरल हृदय वाले शासक को शेरशाह सूरी के कारण ऐसा दुर्दिन भी देखना पडा की चौसा के युद्ध में हारने के बाद जान बचाने के लिए उसे नदी में घोड़े सहित कूद जाना पडा ,ईश्वर की कृपा से एक भिश्ती ने अपनी मशक फेंककर उसकी जिन्दगी बचाई उसे ठोकर खाते हुए भागना पडा | हुमायूँ के भाइयो कामरान और हिन्दाल ने भी धोखा दिया फलत: उसे सिंध के रेगिस्तान की तरफ भागना पडा | जहाँ अमरकोट में अकबर का जन्म हुआ | अकबर ने पिता का बदला लेने के लिए गोपनीय तरीके से हुमायूँ के दुश्मनों को चिन्हित करना शुरू किया जिसमे प्रमुख नाम हर बरन देव का भी था जब तक इनसे बदला लेता उनकी मौत हो चुकी थी | सोलहवी शताब्दी के छठे दशक में सम्राट अकबर अलिकुली खा विद्रोही को दबाने की मंशा से बंगाल की तरफ चला और जौनपुर में रुककर वहाँ उसने सूफी संत निजामुद्दीन का बखान सूना जो पहुचे हुए फकीर थे और निजामाबाद में गद्दी बनाये हुए थे | उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध हिन्दू धर्मस्थल शीतलाधाम के पास अपना डेरा जमाया और मानवतावादी दृष्टिकोण से पूरे जनमानस पर असीम श्रद्धा के साथ | उसमे जनमानस की श्रद्धा की भी थी अतेव उस निजामाबाद परिक्षेत्र में युद्ध की थकान मिटाने का निश्चय किया | चूँकि उसकी जन्मतिथि भी इसी बीच पड़ती थी इसलिए यहाँ जन्मदिन का विशाल महोत्सव मनाया गया ''आईने अकबरी'' में इसका संक्षित उल्लेख्य है चन्दाभारी जो निजामाबाद के अत्यंत निकट है वहाँ पर तुलादान का जलसा मना सम्राट को मुहरो से तुला गया | बीबीपुर में रानियों का डेरा था और खुटौली में घोड़ो को बाधने के लिए विशाल घुडसाल थी | टिकापुर के लोगो ने मुगल बादशाह को विजय हालिस करने का आशीर्वाद से टिका किया |कैफ़ी का गाँव मिजवांन से मिजवा हो ग्या | बताते चले कि अकबर इस महोत्सव से बड़ा प्रसन्न था उसने जब सुबो का पुनर्निर्माण किया तो इस अंचल को सूबे इलाहाबाद में करके जौनपुर सरकार के अधीन किया और सात परगनों में बात दिया 1- चिरैयाकोट 2- सगड़ी 3- घोसी 4- कौडिया 5- गोपालपुर 6- मऊ 7-निजामाबाद | अब्दुर रहीम खानखाना के पुत्र मुनीर खा को जागीरदार बनाया और निजामुद्दीन औलिया के नाम पर निजामाबाद का नामकरण किया | इसी महोत्सव के दौरान कुछ चापलूसों ने खुट्वा गाँव के उत्तराधिकारी के बारे में भी कान भरा यह कहकर की ये लोग हुमायूँ के शत्रु हरबरन देव के पुत्र है दोनों भाई संग्राम सिंह चन्द्रसेन सिंह वहाँ से भाग गये | उनकी शनाख्त कालपी युद्ध के दौरान हुई जहां संग्राम देव पर आक्रमण हुआ वे बुरी तरह घायल हो गये और गुमनामी में मारे गये | चन्द्रसेन सिंह भूमिगत हो गये लाख खोजबीन के बाद भी उनका पता नही चला | सत्रहवी शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षो में जब सलीम ने बगावत की तो अकबर के शासन का सिक्का घिसने लगा था वह बीमार और टूटा भी था तब संग्राम के चन्द्रसेन सिंह पुन: खुट्वा आ गये और मुग़ल शासन से असंतुष्ट ठाकुरों को मिलाकर एक नामवर सरदार बन बैठे | निजामाबाद और उसके निकटवर्ती इलाको में घनी मुस्लिम बस्ती थी , आज भी है ( फूलपुर सरायमीर फरिहा मग्रवा ) इसीलिए चन्द्रसेन सिंह को बहुत विरोध भी सहना पडा | इससे पूरब मेहनगर लालगंज की और श्रीनेत कौशिक बिसेन ठाकुरों का बाहुल्य था पश्चिम में पालीवाल ठाकुरों का आधिपत्य था इसलिए चन्द्रसेन सिंह खुट्वा से हटने की सोचने लगे ! उन्होंने मेहनगर का चुनाव भी किया जो खुट्वा से तीन चार किमी दक्षिण है |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
सन्दर्भ -- आजमगढ़ का इतिहास - राम प्रकश शुक्ल निर्मोही
सन्दर्भ आज़मगढ़ का इतिहास हरी लाल शाह

Monday, June 18, 2018

अपना शहर मगरुवा 18-6-18

अपना शहर मगरुवा
का हो बच्चा ( अध्यक्ष जी ) पोकनी भैइस के जनतादल ( महिला ) के
जिलाअध्यक्ष बना देहला !
लखनऊ प्रवास से कल लौटा आज सोचा कि जरा टहल आते है अपनी मोपेड उठाकर कालीनगंज के रास्ते बढ़ रहा था अचानक मन में ख्याल आया की अध्यक्ष जी के यहाँ हो लूँ , गाडी खड़ी करके अन्दर गया तो देखा हरफन मौला नरेन्द्र सिंह कण्ठी चचा मस्त बैठकर अखबार पढ़ रहे है उनके अगल - बगल तीन चार लोग बैठे है मैं भी धीरे से वहां पहुच गया सामने नजर पड़ गयी मगरू भाई भी विराजमान है , मैंने नरेंद्र चाचा से पूछा की कुछ बतावा चचा - चचा ने बड़े मस्ती भाव से बोला बच्चा तू हमके फसावा मत हम जानत हई की तू कुछ लिख दबा , मगरू भाई ने कहा दादा बैठा ह बतावत हई पूछा , हमने मगरू भाई से पूछा कि यहाँ के मशहूर मिठाई वालो के बारे में बतावा मगरू भाई - मगरू अपने अपने अंदाज में शुरू हुए लगे कहने बीसा चचा जिनकर दूकान पुरानी कोतवाली पर रहे का मिठाई बनावत रहने लबालब देशी घी में इमरती अउर मालपुआ उनकर बहुते मस्त बने शहर के जितने बड़े लोग ओ समय रहने केहू भी ऐइसन न रहे जेकर गाडी - घोड़ा उनके दुकान पे न रुके हम लोग भी इमरती खाए खातिर पहुच जाई , एक बात बताई दादा बहुत अनुशासित रहने बीसा चचा शुद्द देशी घी में सब बनत रहे उनकरे इहा , अब आगे बतावटी हई शंकर जी की मूर्ति पर झटकू चचा रहने उनकर पेडा मशहूर रहे शहर में उनके टक्कर के पेडा कही न मिळत रहे कोट मोहल्ला में विन्ध्याचल हलवाई रहने उ जउन जलेबी बना दे जिलवा में केहू न बना पावे वही रहने सीता हलवाई उनकर छोला बड़ा मशहूर रहे उ आपन ठेला लेके डी.ए.वी. इंटर कालेज में ठेला लगावे जब इंटरवल होक तब कुल लइका एक दमे उनके घेर ले - अब आगे सूना दादा मगरू ने बोला ये शहर में दुई लोग गजब के रहे दिनुमल सिन्धी उ तेरह साल के उमर में कराची से भाग के इहा आयेल रहने पहली उ फेरी लगावे बाद में कुछ पैसा इकठ्ठा करके चौक पर देवी जी के मंदिर के सामने सिन्धी होटल खोल लेहने उन्ही के बगल में लारी गुप्ता के चाय के दूकान रहे लारी चचा बहुत मस्त रहने उनके इहा सबेरे के बेला जलेबी दूध धी मिले चौक पर इ दुई होटल पर शाम के बड़ा जमावड़ा होके- सिन्धी होटल पर नेतन के अउर लारी के इहा जिला के बौद्धिक बैठे ओ समय जिले के नामी गिरामी ठीकेदार भवन बनावे में एक्सपर्ट बाबू साहब दयाल सिंह बाबू लालता सिंह भगवती सिंह सरजू राम यादव जइसंन जिले के दमदार लोगन शाम के लारी के दूकान पर बैठत रहने अब तो एक अउर बात बतावत हई एक बार बच्चा बाबू अध्यक्ष जी के इहा प्रखर समाजवादी नेता आदरणीय चन्द्रशेखर जी अइने ओकरे पहिले उहा पर बच्चा बाबू पदमाकर लाल पूर्वांचल के गांधी बाबू विश्राम राय , समाजवादी विचारक संजय श्रीवास्तव , राजमंगल सिंह यशवंत सिंह नामवर सिंह पतिराम यादव विजयप्रकाश बंश बहादुर सिंह , काह्सी हिन्दू विश्व विधालय की उपाध्यक्ष और तेजतरार महिला नेता अंजना प्रकाश जी मौजूद थी चन्द्रशेखर जी की अगवानी में चन्द्रशेखर जी आकर बच्चा बाबु के बैठका(कच्चे वाले ) में आसन ग्रहण किये कुछ देर बाद राजमंगल सिंह ( जो अतीत से वर्तमान तक अपना ज्यादातर समय महिलाओं के बीच गुजारने का प्रयास करते है ) उन्होंने चन्द्रशेखर जी से इंदिरा सिंह का परिचय कराते हुए कहा कि यह जनतादल की महिला शाखा की जिलाध्यक्ष है , तत्काल चन्द्रशेखर जी ने प्रतिक्रिया दिया का बच्चा महिला जंदल के अध्यक्ष इहे पोकनी भैस मिलल हवे , चन्द्रशेखर जी बड़े नेता थे वो तुरंत सतर्क हो गये और संशोधन करते हुए बोले कि मेरे कहने का आशय था कि कोई तेजतरार - नौजवान कार्न्तिकारी महिला जनतादल की जिलाध्यक्ष होनी चाहिए | आगे आजमगढ़ से चक्रपानपुर , खरिहानी - चिरैयाकोट - एक दर्जन मीटिंगों में उनकी इस बात की चर्चा रही और चिरैयाकोट की मीटिंग समाप्त होने के बाद जब रामगोविंद चौधरी जो वर्तमान में प्रतिपक्ष के नेता है वो चन्द्रशेखर जी की गाडी की और लपके बैठने के लिए तभी उनकी गरदन पकड़कर चन्द्रशेखर जी ने कहा की तुम पिछली गाडी से आओ और अपनी गाडी में श्रीमती अंजना प्रकाश को बिठाया और गाजीपुर की मीटिंग के लिए रवाना हो गये ठीक इसी तरह का वाकया 1996 के विधानसभा स्थानीय जजी के मैदान में हुआ जब भारतीय जनता पार्टी के सदर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी पंडित श्रीकिशुन तिवारी के पक्ष में भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने जन सभा को सम्बोधित किया , जन सभा के समाप्ति के बाद भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष पंडित कलराज मिश्र और वर्तमान अध्यक्ष महेंद्र नाथ पाण्डेय समेत कई लोगो ने अटल जी के गाडी में बैठने का प्रयास किया परन्तु अटल जी ने सबको दरकिनार करते हुए श्रीमती वीणा पाण्डेय ( संयोग से वो भी काशी हिन्दू विश्व विद्यालय की उपाध्यक्ष रही थी और बाद में सदस्य विधान परिषद भी हुई ) को अपनी गाडी में बिठाया और बनारस की तरफ कूच कर गये |

Sunday, June 17, 2018

काशी के हेमन्त दा - जन्मदिन पर 17-6-18

काशी के हेमन्त दा - जन्मदिन पर
''कही दीप जले कही दिल - जरा देख ले आकर परवाने ,
ऋतूराज हेमन्त भारतीय नये वर्ष की शुरुआत हेमन्त अपने आप में निराला - मनमोहक - अल्हड खुशनुमा अन्दाज- प्रकृति का अदभुत सौन्दर्य शायर अपनी कल्पनाओ को शब्दों के रंगों से सजाता है तो कही कविमन हेमन्तराज को अपने शब्दों को उड़ान देते हुए उसके श्रृगार के स्वरूप की अभिव्यक्ति देता है | ऐसे ही संगीत की दुनिया में एक अनमोल बेशकीमती कोहिनूर थे हेमन्त कुमार मुखोपाध्य्या जिन्हें प्यार से उनके करोड़ो चाहने वाले हेमन्त दा बुलाते थे ----- उत्तरायणी बहती माँ गंगे की धारा व श्मशान वासी देवाधि देव महादेव की पावन भूमि ( काशी ) आज का वर्तमान वाराणसी में 16 जून 1920 को जन्म लिया था | हेमन्त दा की प्रारम्भिक शिक्षा कलकत्ता के '' मित्रा विद्यालय में हुई वहा से शिक्षा पूरी करने के बाद वो '' जादवपुर विश्व विद्यालय में इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया -- लेकिन उनका मन वह बेचैन रहता उन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा अधूरी छोड़ दी | हेमन्त दा के कल्पना की उड़ान अलग थी उनका रूह अन्दर से बेचैन था उनके बेचैन रूह की तडप को सकूं दिया संगीत ने और हेमन्त दा ने उस संगीत में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समाहित कर लिया और उन्होंने संगीत को अपना पथ बना कर एक पथिक की तरह इस रास्ते पर निकल पड़े | संगीत क्षेत्र में आने से पहले दादा ने बांग्ला साहित्य में अपने वजूद का एहसास करा दिया था | उन्होंने एक बांग्ला पत्रिका '' देश '' के लिए कार्य प्रारम्भ किया उनकी लिखी कहानिया इसमें प्रकाशित होने लगी | परन्तु दादा का रास्ता तो अलग था सो उन्होंने 1930 आते - आते अपने आप को संगीत में पूर्णतया समाहित कर दिया | दादा के बचपन के मित्र '' सुभाष '' की सहायता से आकाशवाणी कलकत्ता में बांगला गीत गाने का अवसर मिला | हेमन्त दा ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा बंगला संगीतकार '' शैलेश गुप्त से ली उसके बाद शास्त्रीय संगीत की पूर्ण शिक्षा उन्होंने उस्ताद फैयाज खान से प्राप्त किया | 1937 में संगीतकार शैलेश गुप्त के संगीत निर्देशन में '' विदेशी कम्पनी -- '' कोलंबिया लेबल '' के लिए उन्होंने गैर फ़िल्मी गीतों को स्वर दिया उसके बाद उन्होंने '' ग्रामाफोनिक कम्पनी आफ इंडिया '' के लिए अपने सुर दिए | 1940 में कमलदास गुप्त के संगीत निर्देशन में हेमन्त दादा ने पहला हिंदी गीत गया '' कितना दुःख भुलाया तुमने '' गाने का मौका मिला 1941 में बंगला फिल्म के लिए स्वर दिया | 1944 में पहली बार हेमन्त दादा ने एक गैर फ़िल्मी गीत के लिए संगीत दिया इसी वर्ष पंडित अमरनाथ के संगीत निर्देशन में फिल्म '' इरादा '' में प्ले बैक सिंगर का ब्रेक लिया इसके साथ ही कोलंबिया लेबल कम्पनी के लिए कवि गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर के काव्यो को '' रविन्द्र संगीत ' को रिकार्ड कराया | 1947में पहली बार स्वतंत्र संगीतकार के रूप में बांग्ला फिल्म '' अभियात्री '' के लिए संगीत दिया इसी दौरान हेमन्त दादा का रुझान वामपथ की तरफ हुआ वो उस समय '' भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य करने लगे | समय का प्रवाह रुकता नही है वो अपने गति से निरंतर बहता जाता है उसी समय की गति ने हेमन्त कुमार को बांग्ला फिल्म इण्डस्ट्रीज में संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया अब उनकी उड़ान का रास्ता बाकी था इसी दरम्यान हेमेन गुप्त बम्बई आ गये थे और उन्होंने हेमन्त दादा को भी बुला लिया | 1951 में फिल्मिस्तान के बैनर तले बनने वाली फिल्म '' आनन्द मठ '' के लिए हेमेन गुप्त ने हेमन्त कुमार को संगीत देने की पेशकश की | फिल्म '' आनन्द मठ '' की सफलता के बाद हेमन्त बतौर हिंदी सिनेमा के कैनवास पर संगीतकार के रूप में स्थापित हो गये | '' आनन्द मठ के इस गीत को स्वंय हेमन्त दादा व कवि प्रदीप लता जी ने स्वर दिया था '' वन्दे मातरम ''आज भी उस गीत की तेजस्विता उसी तरह बरकरार है कही वो गीत बज रहा हो उस गीत की तरंग कानो तक आती है तो पूरा शरीर मन मस्तिष्क झंकृत हो जाता है | आज भी वो गीत व्यवस्था के विरुद्द संघर्ष का नाद ब्रम्ह बना हुआ है |
1954 का वर्ष हेमन्त दादा के लिए अनोखा वरदान साबित हुआ हेमन्त दादा ने एक संगीत से सजी फिल्म '' नागिन '' के सारे गीतों को अपने संगीत से सजाया ही उसके अलावा उस फिल्म में स्वर भी दिए |
वो जिन्दगी के देने वाले - जिन्दगी के लेने वाले
प्रीत मेरा छीनकर बता तुझे क्या मिला ''
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काशी देखि मथुरा देखि देखे तीरथ सारे
कही न मन का मीत मिला तो आया तेरे द्वारे ''
हेमन्त दा जब संगीतकार हुए उस वक्त देश में बहुत उथल पुथल था ऐसे में वो देश के नौजवानों के लिए वन्देमातरम गा कर ऊर्जा देते है वही दूसरी तरफ नौजवानों के दिलो की बाते मीठे अंदाज में गाते नजर आते है |
फिल्म '' नागिन '' के गीतों ने ऐसी अपार सफलता अर्जित किया हेमन्त कुमार को हिंदी सिनेमा के संगीत के शिखर पर खड़ा कर दिया | नागिन फिल्म का हर गीत उसका संगीत अपने आप में जादू बिखेरता है सुनने वालो के दिलो में आज भी यह गीत गहराइयो तक उतरता है | इस फिल्म के लिए उन्हें ' फिल्म फेयर एवार्ड से सम्मानित किया गया |1959 में हेमन्त कुमार ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा '' हेमन्ता बेला प्रोडेकसन '' नाम की फिल्म कम्पनी की स्थापना की इसके बैनर तले मृणाल सेन के निर्देशन में बांग्ला फिल्म '' नील आकाशेर नीचे का निर्माण किया | यह फिल्म बाक्स आफिस पर अपार सफलता अर्जित की | इस फिल्म को गोल्ड मेडल एवार्ड से सम्मानित किया गया | हेमन्त दादा ने बांग्ला फिल्म '' भूली नाई '' दुई भाई '' आलोर पिपासा '' काँच काटा हीरा '' बालिका बोधु '' देशबोन्धू चित्रजन '' आनंदिता '' दिन आमार होए रोहिलो '' कपाल कुण्डला'' भालोबासा - भालोबासा जैसे बांग्ला फिल्मो में न्धुर संगीत दिया ही इसके साथ ही उन्होंने हिंदी सिनेमा में '' डाकू की लडकी '' बहु '' बिन्दास '' भागवत महिमा '' अनजान '' अर्ब का सौदागर '' दुर्गेश नन्दनी '' एक ही रास्ता '' हमारा वतन '' बन्दी '' चम्पाकली '' एक झलक '' हिल स्टेशन '' कितना बदल गया इंसान '' मिस मेरी '' हम भी इंसान है '' दो मस्ताने '' सहारा '' हेमन्त दा ने जिन भी फिल्मो में संगीत दिया और स्वर दिया वो आज भी अमर है |
बीस साल बाद के वो गीत आज भी लता जी की आवाज में आज भी वो गीत ''कही दीप जले कही दिल - जरा देख ले आकर परवाने , तेरी कौन सी है मंजिल --- ''बेकरार कर के हमे यु न जाइए आपको हमारी कसम लौट आइये --- '' हम तुम्हे इतना प्यार करेगे '' सपने सुहाने लडकपन के मेरे नयनो में डोले भर बन के उनकी यादगार फिल्म ''साहिब बीबी और गुलाम ''
के गीत '' पिया ऐसो जिया में समाए गयो रे कि मैं तन मन की सुध बुध गवा बैठी ''
भवरा बड़ा नादान बगियन का मेहमान है '' इस फिल्म का हर गीत मील का पत्थर है आज भी यह गीत लोगो के होठ पर बरबस ही आ जाते है | '' मझली दीदी के गीत '' उमरिया बिन खेवट की नइया '' फिल्म खामोशी को आज भी दर्शक भूल नही पाया जब हेमन्त दा बोल पड़ते है '' पुकार लो -- तुम्हारा इन्तजार है तुम पुकार लो ख़्वाब चुन रहे है रात बेकरार है से अपने दिल की आवाज को सम्प्रेषित करते है तो वही नायिका से कहवा देते है सात्विक प्रेम की परिभाषा में '' हमने देखि है उन आँखों की महकती खुशबु , हाथ से छूकर इसे रिश्तो का इल्जाम न दो - सिर्फ एहसास है यह रूह से महसूस करो - प्यार को प्यार रहने दो कोई नाम न दो --- जैसे गीत आज भी हृदय के स्पन्दन को बढा देते है इसी फिल्म में जब नायक कल्पना की उड़न भरता है तो अलग अजीब सी रूमानियत छ जाती है इस गीत को सुनते ही '' वो शाम कुछ अजीब थी - ये शाम भी अजीब है वो कल भी पास - पास थी वो आज भी करीब है '' | फिल्म '' उस रात के बाद '' मेरी आवाज किसी शोर में जब डूब गयी मेरी खामोश बहुत दूर बहुत दूर सुनाई देगी फिल्म '' अनुपमा '' के वो गीत '' या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझ को अभी चुप रहने दो - मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूँ - जो कहते है उनको कहने दो '' ऐसे गीतों को भला आज भी लोग कैसे भूल सकते है आज भी वैसे ही तजा है वो गीत जैसे सुबह गुलाब पे गिरे ओस सूरज की रौशनी पाकर चमकते है मोतियों की तरह '' कुछ दिल ने कहा --- कुछ दिल ने सूना ऐसी भी बाते होती है --
1979 में हेमन्त दादा ने बांग्ला फिल्म आनंदिता का निर्देशन किया पर यह फिल असफल रही ---- 1979 में हेमन्त दादा चालीस और पचास के दशक में सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में गाए गीतों को दुबारा रिकार्ड किया उसे लीजेंड आफ ग्लोरी टू के रूप में जारी किया गया |
हेमन्त दादा ने जितने बांग्ला फिल्मो में संगीत दिया उससे ज्या हिंदी फिल्मो के लिए काम किया अन्य भाषाओं में भी उनके गाए गीत इतनी ही मधुरता लिए है ख़ास तौर से इन्होने जो गैर फिल्मो में गीत गाए वो अपूर्व है |
फिल्म '' ममता में गाए उनका यह गीत जहा एक तरफ प्रेम की अतिरेक अभिव्यक्ति देता है वही प्रेम के अदभुत दर्शन को भी निखारता है ---
'' छू प् लो यु दिल में प्यार मेरा जैसे मंदिर में लौ दिए की , तुम अपने चरणों में रख लो मुझको ''
1989 में हेमन्त कुमारको बाग्लादेश के ढाका शहर में '' माइकल मधुसुदन '' एवार्ड से सम्मानित किया गया भारत लौटने के बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वो संगीत की दुनिया का ध्रुव तारा 26 सितम्बर1989 को हम सबसे विदा लेकर एक ऐसी अनन्त यात्रा पे निकल गया और हमारे चिर स्मृतियों में छोड़ गया कुछ अनकहे गीत --
न तुम हमे जानो न हम तुम्हे जाने
आज हेमन्त दादा का जन्म दिन है ऐसे स्वर के जादूगर को मेरा शत शत प्रणाम
सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

Sunday, June 10, 2018

गरीबो से दूर होती चिकित्सा सेवा --- 10-6-18

दवा कम्पनियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नही

डाक्टर जेनरिक दवाइया नही लिखते - कम्पनियों को फायदा पहुचाने के चक्कर में --
आने वाले समय में आम आदमी चिकित्सा सेवा से वंचित होता जाएगा

6 अप्रैल के हिंदी दैनिक ''हिन्दुस्तान में अमरीका का यह समाचार प्रकाशित हुआ है कि आधे से ज्यादा अमेरिकी वहाँ के डाक्टरों के पास नही जाते | एक सर्वे में उन अमेरिकियों ने यह कहा है कि स्वास्थ्य की एक योजना को लेकर वे जितने बिल की उम्मीद रखते है , वह उससे कही ज्यादा आता है | उसे चुकाने में उनकी बचत का एक बड़ा हिसा खर्च हो जाता है | हाँलाकि अमेरिका की बड़ी संख्या स्वास्थ्य बीमाधारक है | इसके बावजूद उनके द्वारा किये गये भुगतान स्वास्थ्य सेवाए नही मिल पाती | फिर उन्हें स्वास्थ्य सेवाए जरूरत के समय नही मिल पाती | अमेरिका जैसे विकसित देश की उन्नत एवं व्यवस्थित स्वास्थ्य सेवा से इस देश की स्वास्थ्य सेवाओं की कोई तुलना ही नही है | इसके वावजूद वहाँ के जनगणके स्वास्थ्य सेवा की उपरोक्त सूचना से इस देश की स्वास्थ्य सेवा का कुछ आकलन किया जा सकता है | इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर 50% अमेरिकी लोग बढ़ते स्वास्थ्य बिल के चलते स्वास्थ्य सेवाओं से दूर है तो भारत जैसे अन्य विकासशील देशो की बहुसंख्यक गरीब एवं साधारण आय वाली खासी बड़ी आबादी ( लगभग 70% या उससे अधिक आबादी ) वांछित स्वास्थ्य सेवाओं से दूर रहना एकदम स्वाभाविक है | यह आबादी या तो योग्य चिकित्सको एवं चिकित्सीय सेवाओं तक पहुँच ही नही पाती या उसे आधे - अधूरे में ही छोड़ देती है | उसका कारण भी चिकित्सको एवं चिकित्सीय सेवाओं से वंचित अमेरिकियों जैसा ही है | चिकित्सकीय सेवाओं को प्राप्त करना दोनों देशो के जनसाधारण के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ है |हाँलाकि उनमे महत्वपूर्ण अन्तर भी है | वह यह कि स्वास्थ्य सेवाओं पर जहां अमेरिकियों की बचत का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है वही इन सेवाओं को पाने के प्रयास में इस देश की जनसाधारण के जीविकोपार्जन के आवश्यक ससाधन जमीन एवं सम्पत्तियों भी गिरवी हो जाती है या बिक जाती है | वह अमेरिकयो की तरह बचतहीन नही बल्कि साधनहीन हो जाता है | सवाल है कि स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सको की इस मँहगाई और जनसाधारण पर उसके बढ़ते बोझ
का कारण क्या है ?

यह कोई छिपी हुई बात नही है कि इसका प्रमुख कारण चिकित्सकी सेवा से जुडी कम्पनियों कारोबारियों तथा योग्य चिकित्सको एवं चिकित्सा सेवा के अन्य पेशेवर कामो में लगे लोगो के बेतहाशा बढ़ता लाभ कमिशन एवं आय है | एक ही दवा के विभिन्न कम्पनियों के पेटेंट मूल्यों में भारी अंतर है | फिर पेटेंट और जेनरिक दवाओं के मूल्यों में तो अन्तर है ही | दिलचस्प बात है कि कम से कम मूल्य वाली किसी जेनरिक दवा कम्पनी को भी उस दवा के उत्पादन व्यापार में खासा लाभ होता है | फिर ज्यादा मूल्य और वह भी पेटेंट मूल्य की दवाओं के लाभ के बारे में पूछना ही कुछ नही है | यही कारण है कि भारतीय अरबपतियो में से सबसे ज्यादा संख्या 20 की संख्या दवा उद्योग से जुड़े अरबपतियो की है | टेक्नोलाजी मीडिया दूरसंचार एवं अन्य क्षेत्रो के अरबपतियो की संख्या उनसे कम है | यह स्थिति चिकित्सकीय सेवा से जुड़े अन्य सहायक साधनों सामानों में भी है | उनके उत्पादन व्यापार प्रचार में भी धनाढ्य कम्पनिया लगी हुई है | वे दवाओं की तरह ही चिकित्सकीय सेवाओं के अन्य मालो सामानों को उनके वास्तविक मूल्य और उसमे निहित साधारण या औसत लाभ पर ही नही बल्कि उससे कई गुना ज्यादा दाम पर बेचती रही है | इनकी मँहगाई इसलिए नही है कि उनका उत्पादन मँहगा है , बल्कि उनकी मँहगाई का वास्तविक कारण उनकी मालिक कम्पनियों का प्रचंड लाभ है | सुशिक्षित एवं योग्य चिकित्सक भी ऊँचे मूल्यों की दवाओं को कही ज्यादा लिखते और बिकवाते है | बदले में उन्हें कम्पनिया हर तरह से खुश करती है | दवा कम्पनियों द्वारा उत्पादित दवाओं के अधिकाधिक मूल्य निर्धारण पर सरकारों का कोई नियंत्रण नही है | इसी तरह सुशिक्षित चिकित्सको एवं जांच करता की फीस और उनकी मनमानी वृद्धियो पर भी कोई नियंत्रण नही है | न ही उनकी फीसो और उसकी वृद्धियो का कोई सिद्धांत या मापदंड ही है | उनमे कोई एकरूपता भी नही है | उनकी फ़ीस निर्धारण का मापदंड साल दर साल की जाती रही मनमानी वृद्धि में ही निहित है | जब की अभी भी देश के नामी चिकित्सको की 80% से अधिक संख्या समस्त जनता से वसूले टैक्सों से स्थापित व्यवस्थित सार्वजनिक क्षेत्र के मेडिकल कालेजो में ही निहित शिक्षित दीक्षित हुई है | उसके लिए बहुत कम खर्चा हुआ है |इसलिए भी उनके द्वारा अपनी फ़ीस को मनमाने ढंग से बढाते हुए मरीजो को चिकित्सकीय सुविधा एवं परामर्श से वंचित कर देना किसी भी तरह ठीक नही है | कोई यह नही कहेगा कि उन्हें साधारण आदमी से बेहतर आय और सुविधा की जरूरत नही है | लेकिन इसका मतलब सीमाहीन अथवा अनियंत्रित आय भी नही है | वह औसत आय या बेहतर आय की जगह अधिकतम वसूली जाने वाली बन गयी है | यही कारण है कि डाक्टर बन जाने के चंद सालो के बाद ही सभी सुशिक्षित डाक्टरों के पास धन , सुख सुविधा और अन्य संसाधनों जमीन मकान अस्पताल का अम्बार लग जाता है | एक तरफ दवा कम्पनिया व अन्य चिकित्सकीय साधनों की कम्पनियों की असीमित लूट वाली मुनाफाखोरी और दूसरी तरफ चिकित्सको एवं अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के पेशेवरो द्वारा निर्ममता के साथ की जाती रही उच्चस्तरीय आय 70% आबादी को चिकित्सकीय सुविधा पाने से वंचित कर देती है | गरीब एवं साधारण आय वाले रोगियों को सुशिक्षित डाक्टरों के पास जाने से रोक देती है या फिर आधे अधूरे इलाज के बाद ही उन्हें उसे छोड़ देने के लिए मजबूर कर देती है | अमेरिका का हेल्थ केयर और हेल्थ इंशोरेंस जैसी योजना वहाँ 50% आबादी के लिए चिकित्सा सेवा तक पहुच नही बना पाया है | इस देश में भी स्वास्थ्य बीमा लागू किये जाने के बाद भी 70% आबादी चिकित्सकीय सेवा में अपनी पहुच नही बना पाएगी | चिकित्सकीय सेवाओं तथा जनसाधारण रोगियों के बीच दूरियों का बढना तक तक निश्चित है , जब तक दवाओं के मूल्यों तथा कम्पनियों के मुनाफो पर नियंत्रण लगाने के साथ चिकिसको एवं चिकित्सा सेवाओं से जुड़े पेशेवर लोगो की मनमानी फ़ीस व कमाई पर नियंत्रण नही लगाया जा सकता | उन पर सरकारों के साथ जन्सदाहरण का संगठित नही डाला जाता देश हर क्षेत्र में नया जन आन्दोलन माँग रही है |


सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Saturday, June 2, 2018

गरीब मेधावी छात्रो को उच्च शिक्षा से वंचित करने की साजिश --- 2-6-18

गरीब मेधावी छात्रो को उच्च शिक्षा से वंचित करने की साजिश

केंद्र सरकार के मानव ससाधन विकास मंत्रालय द्वारा मार्च 2018 में उच्च शिक्षा के 62 संस्थानों को स्वायत्त यानी अपने आप में अधिकार सम्पन्न घोषित कर दिया है | इसमें जे.एन यू , बी एच यू , अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय तथा यूनिवर्सिटी आफ हैदाराबाद जैसे केन्द्रीय विश्व विद्यालयो , प्रांतीय सरकारों के कार्य क्षेत्र के 21 विश्व विद्यालयों को स्वायत्त घोषित किया गया है | यह अधिकार इन सस्थानो की शैक्षिक गुणवत्ता को बढ़ावा देने हेतु इन्हें सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रखने के नाम पर दिया गया है | अब इन शिक्षण सस्थानो को अपने यहाँ छात्रो का प्रवेश लेने अपना पाठ्यक्रम तय करने स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम चलाने शैक्षणिक फीस निर्धारित करने , शिक्षाविदो विशेषज्ञों को प्रोत्साहन आधारित पारिश्रमिक पर नियुक्त करके का अधिकार दे दिया गया है | इसके अलावा इन सस्थानो को विदेशी छात्रो के प्रवेश के नियम बनाने विदेशी शिक्षक नियुक्त करने , अन्य देशो के विश्व विद्यालयो के साथ समझौता करने दूरस्थ शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाने का भी अधिकार दे दिया गया है | प्रचार माध्यमो में केंद्र सरकार के इस निर्णय का कोई उल्लेखनीय विरोध होता दिखाई नही पडा | इस निर्णय पर कुछ किन्तु - परन्तु के साथ इसके समर्थन में सम्पादकीय टिपण्णीयाँ और लेख जरुर प्रकाशित हुए | इस निर्णय की सबसे दिलचस्प बात यह है कि शैक्षणिक गुणवत्ता बढाने के नाम पर दी गयी स्वायत्ता उन विद्यालयो को दी गयी है , जिन्हें शैक्षणिक गुणवत्ता वाले विद्यालयों , कालेजो के रूप में पहले से ही जाना जाता है | अभी हाल में पहले देश के विभिन्न विश्व विद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता के आकलन में जे एन यू को पहला और बी एच यू को दूसरा स्थान मिला था | इसलिए इस निर्णय पर यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि क्या इन अन्य नामी गिरामी विश्व विद्यालयो , कालेजो को स्वायत्तता देने का उद्देश्य सरकार की घोषणा के अनुसार उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता को बढाना है ? अथवा इसका वास्तविक लक्ष्य उच्चस्तरीय शिक्षण सस्थानो को सरकारी नियंत्रण एवं सर्वजन के शैक्षणिक अधिकार क्षेत्र से हटाकर उनके निजीकरण , व्यापारीकरण और अंतरराष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देना है ? स्वायत्ता के इस अधिकार से यह बात कोई भी समझ सकता है कि इन विश्व विद्यालयो पर सरकार यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमिशन के नियंत्रण को समाप्त करना ही नही है , बल्कि सरकारी खजाने से इन विश्व विद्यालयों के वित्त पोषण को घटाना और फिर समाप्त कर देना है , साथ ही इन विश्व विद्यालयो को अपने वित्तीय पोषण का स्वायत्त अधिकार मिलने का सीधा मतलब , उन्हें देश व विदेश के निजी धनाढ्य मालिको के वित्त पोषण पर निर्भर बनाना भी है | इस निजी वित्त पोषण के साथ इन विश्व विद्यालयों पर तथा उसके सचालन नियंत्रण पर धनाढ्य मालिको के प्रभाव दबाव का बढना एकदम स्वाभाविक है |
उच्च शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर लिया गया यह निर्णय दरअसल 1986 से लागू की गयी नई शिक्षा नीति और उसके बाद के शैक्षणिक सुधारों की अगली कड़ी है | 1990 के बाद शिक्षा और स्शिक्ष्ण संस्थाओं का व्यापारीकरण निजीकरण करने अर्थात उन्हें सरकारी नियंत्रण से बाहर करके निजी मालिको के लाभ कमाने वाले सस्थानो के रूप में बदल देने वाले तथाकथित शैक्षणिक सुधारों की वर्तमान कड़ी है | सार्वजनिक शिक्षा के व्यापारीकरण और निजीकरण वाले शैक्षिक सुधारों की प्रक्रिया को खासकर 1995 में डंकल प्रस्ताव को स्वीकार करने के साथ तेज कर दिया गया | उस प्रस्ताव की एक प्रमुख धारा के रूप में मौजूद ''सेवा क्षेत्र में व्यापार का अधिकार '' को अस्वीकार करने के साथ इसके अंतर्गत जनसेवाओ के अन्य क्षेत्रो के साथ शैक्षणिक सेवाओं संस्थानों को भी सरकारी नियंत्रण से हटाने तथा उन्हें निजी क्षेत्र के उद्यम या व्यापार का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया तेज की जाती रही है | शिक्षा व अन्य सेवाओं में विदेशी सस्थानो को भी अधिकार देने के साथ इसके अंतराराष्ट्रीय करण की प्रक्रिया को भी निरंतर आगे बढाया जाता रहा है | इसी का सबूत है कि 1986 - 1995 के दौरान थोड़ी धीमी गति से और 1995 - 1996 के बाद से शिक्षा के व्यापारीकरण , निजीकरण व अंतराराष्ट्रीय करण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढती रही | इन नीतियों प्रक्रियाओं को केंद्र व प्रांत की सभी सरकारों द्वारा तथा उन पर सत्तासीन रही सभी प्रमुख पार्टियों द्वारा इसे आगे बढ़ाया गया | इसके फलस्वरूप देश - प्रदेश के हर क्षेत्र में महानगरो , नगरो कस्बो यहाँ तक की ग्रामीण स्तर पर भी बड़े छोटे निजी शिक्षण संस्थाओं की संख्या तेजी से बढ़ी | अंग्रेजी शिक्षा तथा बेहतर शिक्षा के नाम पर निजी लाभ के लिए संचालित प्राथमिक , माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा के निजी सस्थानो की बाढ़ आती रही | इन या ऐसे ज्यादातर विद्यालयों में मनमानी फीस के साथ शैक्षणिक लूट की प्रक्रिया भी तेज होती रही |
इस सन्दर्भ में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि 1986 से पहले खासकर 1970 के दशक में तमाम निजी प्रबन्धन के विद्यालयों खासकर जूनियर हाई स्कूल से लेकर माध्यमिक विद्यालयों कालेजो का सरकारीकरण किया गया था | वहां पर नियुक्त अध्यापको को सरकारी खजाने से वेतन देने के साथ वहां के प्रबंधको के मनमानेपन पर एक हद तक सरकारी नियंत्रण स्थापित करने की नीति व प्रक्रिया को अपनाया गया था | वह प्रक्रिया 1985 - 86 तक चलती रही | शिक्षा पर सरकारी नियंत्रण को बढ़ावा देने के साथ न केवल ऐसे शैक्षणिक संस्थानों का विकास विस्तार हुआ अपितु उसकी गुणवत्ता में भी सुधार हुआ | 1986 के बाद से शिक्षा के बाजारीकरण व्यवसायीकरण और निजीकरण को बढ़ावा देते हुए उस प्रक्रिया को उलटाया जाता रहा | शिक्षा को व्यापक एवं गुणवत्ता बनाने के नाम पर उसे व्यापारिक लाभ कमाने का और उससे मनमानी लुट का माध्यम बनाया जाता रहा है | इसी निजीवादी और व्यापारवादी प्रक्रिया को अब नामी - गिरामी शिक्षण संस्थाओं को स्वाय्य्त्ता दिए जाने के नाम पर आगे बढाया जा रहा है | इन स्वायत्त शिक्षण संस्थानों के प्रमुख लोगो को अर्थात उनका वित्तीय पोषण व सचालन करने वाले धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों की फीस आदि को निर्धारित एकं सचालित करने का स्वायत्त अधिकार दिया जा रहा है | इसका परिणाम शिक्षा की गुणवत्ता में कितना व कैसा आयेगा यह तो भविष्य की गर्भ में छुपा है , लेकिन उसके पहले की एक प्रमुख सामजिक गुणवत्ता में तत्काल बदलाव जरुर आ जाएगा अभी तक केन्द्रीय और प्रांतीय सरकारों के नियंत्रण वाले इन विश्व विद्यालयो में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थी पर पढ़ाई का खर्च ज्यादा नही आता था | आम समाज में औसत मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे भी प्रतियोगिताओं में सफल होकर अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर लेते थे | लेकिन अब स्वाय्य्त्ता पाए हुए विश्व विद्यालय कालेजो की मनमानी फीस के आगे ऐसे छात्र उच्च शिक्षा से उसी तरह बाहर हो जायेंगे , जैसे समाज के निम्नं हिस्से अपनी कम या अत्यंत कम आय की वजह से आमतौर पर शिक्षा पाने में असमर्थ रहे है | इन विश्व विद्यालयों की उच्च शिक्षा अब दरअसल बेहतर आय एवं सुविधा वाले मध्य वर्गीय के छात्रो के लिए सुरक्षित हो जायेगी | उन्हें विश्व विद्यालय शिक्षा पाने का स्वायत्त अधिकार मिल जाएगा पर औसत या निम्न माध्यम वर्गीय हिस्सों को अब तक मिलता रहा अधिकार छीन जाएगा |इसकी सामाजिक गुणवत्ता में दूसरा महत्वूर्ण बदलाव इन विश्व विद्यालयो को विदेशी विश्व विद्यालयो के साथ समझौता करने , दूरस्थ शिक्षा के नये पाठ्यक्रम तैयार करने , विदेशी शिक्षको को बढावा देने के साथ विदेशी छात्रो को प्रवेश का अधिकार बढाने आदि के फलस्वरूप भी जरुर आयेगा | इस अधिकार से अभी तक अत्यंत सीमित मात्रा में आते रहे विदेशी छात्र की संख्या में वृद्धि के फलस्वरूप इस देश के छात्रो की संख्या में अपेक्षाकृत कमी जरुर आएगी | अपने ही देश में शिक्षा पाने के उनके अवसरों अधिकारों की कटौती हो जायेगी | निचोड़ के रूप में कहें तो 1986 से लेकर 1995 और उसके बाद के दौर में निरंतर बढाये जा रहे नीजिवादी व्यापारवादी अधिकारों से तथा उसी कड़ी में अब उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता के इस निर्णय से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में आम समाज के हितो के विरुद्ध उपरोक्त बदलाव आना अवश्यम्भावी है | इसके अलवा शिक्षा व्यवस्था के बढ़ते अंतर्राष्ट्रीयकरण या वैश्वीकरण के फलस्वरूप पहले की राष्ट्रीय शिक्षा के जरिये छात्रो को इस राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ नागरिको के रूप में शिक्षित दीक्षित करने का उद्देश्य भी 1986-91 के बाद लागू की गयी शिक्षा नीति के जरिये धूमिल पड़ता रहा है | वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में छात्रो में मंहगी होती शिक्षा व्यवस्था के जरिये अपना निजी कैरियर बनाने की सीख दी जाती रही है | उनमे राष्ट्रीय हितो , भावनाओं , लगावो के प्रति उपेक्षा को अप्रत्यक्ष रूप में बढ़ावा दिया जाता रहा है |
अब स्वायत्तता के नाम पर उच्च शिक्षा में बढाये जा रहे वैश्वीकरण के जरिये इस उपेक्षा को और ज्यादा बढ़ा दिया जाएगा | यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि ये शैक्षणिक सुधार 1991 में लागू की गयी वैश्वीकरणवादी एवं निजीकरणवादी आर्थिक नीतियों के साथ बढाये जाते रहे | इन आर्थिक एवं शैक्षणिक नीतियों सुधारों को बढाये जाने के एक जैसी परिणाम भी आते रहे | जिस तरह से आर्थिक नीतियों के जरिये जनसाधारण के आर्थिक हितो को घटाया और देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो के हितो को खुलेआम बढाया जाता रहा है | अर्थ व्यवस्था में बाजारीकरण व निजीकरण के साथ उसके वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया जाता रहा है | उसी तरह शिक्षा , चिकित्सा आदि के क्षेत्र में देश दुनिया के धनाढ्य वर्ग के पूंजी निवेश के साथ उसे निजी लाभ व मालिकाने वाले क्षेत्र में बदला जाता रहा है | 1995 के बाद डंकल प्रस्ताव को स्वीकार करने के साथ इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया | वर्तमान सरकार द्वारा विश्व विद्यालयो की गुणवत्ता बढाने के नाम पर उसी प्रक्रिया को तेज कर दिया गया |स्वभावत: इसका विरोध राष्ट्र व समाज का धनाढ्य व उच्च वर्ग नही करेगा | विभिन्न पार्टियों के नेताओं उच्च स्तरीय प्रचार माध्यमि विद्वान् बुद्धिजीवियों द्वारा इस स्वायत्ता का विरोध न करना तथा उसे शैक्षणिक सुधार के नाम पर समर्थन देना भी इसी का सबूत है | अत: इन जनविरोधी शैक्षिक नीतियों का तथा उच्च शिक्ष्ण संस्थाओं में दिए जा रहे स्वायत्ता का विरोध शिक्षा और उच्च शिक्षा से व्यवहारिक रूप से वंचित किये जा रहे बहुसंख्यक जनसाधारण को ही करना है और वही इसे कर भी सकता है |

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक -