Sunday, November 10, 2019

भगत सिंह की वैचारिक विरासत -

भगत सिंह की वैचारिक विरासत -
भगत सिंह ने अपने समय के राष्ट्रीय आन्दोलन पर जो आलोचनात्मक टिपण्णी की थी अपने देश काल की जमीन पर खड़े होकर उन्होंने भविष्य की सम्भावनाओं के बारे में जो आकलन प्रस्तुत किया था , कांग्रेसी नेतृत्व का जो वर्ग विश्लेषण किया था , देश की मेहनतकश जनता के सामने छात्रो - युवाओं के सामने और सहयोद्धा क्रान्तिकारियो के सामने क्रान्ति की तैयारी और मार्ग की उन्होंने जो नई योजना प्रस्तुत की थी , उसका आज के स्न्कत्पूर्ण समय में बहुत अधिक महत्व है | जब पूरा देश देशी - विदेशी पूँजी की निर्वाध लूटऔर निरंकुश वर्चस्व तले रौदा जा रहा है , जब श्रम और पूँजी के बीच ध्रुवीकरण ज्यादा से ज्यादा तीखा होता जा रहा है , जब साम्राजय्वाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष ( जिसकी भगत सिंह ने भविष्यवाणी की थी ) विश्व स्टार पर ज्यादा से ज्यादा अवश्यम्भावी बनना प्रतीत हो रहा है , जब कांग्रेस ही नही सभी संसदीय पार्टियों और नकली वामपंथियो का चेहरा और पूरी सत्ता का चरित्र एकदम नगा हो चुका है | भगतसिंह की आशंकाए एकदम सही साबित हो चुकी है और भारत की मेहनतकश जनता व क्रांतिकारी युवाओं को साम्राजय्वाद और देशी पूंजीवाद के विरुद्ध एक नई क्रान्ति की तैयारी के जटिल कार्य के नये सिरे से सन्नद्ध हो जाने का समय अ चुका है भगत सिंह के समय के भारत से आज का भारत काफी बदल चूका है | उत्पादन प्रणाली से लेकर राजनितिक व्यवस्था , सामाजिक सम्बन्ध और संस्कृति तक के स्टार पर चीजे काफी बदल गयी है \ साम्राज्यवादी शोषण -उत्पीडन आज भी मौजूद है , लेकिन प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के दौर से आज इसका स्वरूप काफी बदला है | वर्ग संघर्ष विगत सर्वहारा क्रांतियो और राष्ट्रीय मुक्ति युद्दो के दबाव के चलते तथा अपने भीतर के आंतरिक दबावों के फलस्वरूप साम्राज्यवाद के तौर तरीको में काफी बदलाव आये है | गाँवों में भी बुजुर्वा भूमि सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया ने भूमि सम्बन्धो को मुल्त: बदल दिया है और नये पूंजीवादी भूस्वामी तथा पूंजीवादी फार्मर बन चुके है | भूतपूर्व धनी काश्तकार आज गाँव के मेह्नात्क्शो और छोटे - मझोले किसानो के शोषक की भूमिका में है | मझोले किसानो की भूमिका दोहरी बन चुकी है तथा गाँव के गरीबो को लुटने में देशी -विदेशी वित्तीय एवं औध्योगिक पूँजी की प्रत्यक्ष भूमिका बन रही है | निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत जैसी अगली कतारों के भुँत्पुर्व औपनिवेशिक देश आज पिछड़े पूंजीवादी देश बन चुके है | अब इन देशो के इतिहास के एजेंडे पर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नही बल्कि समाजवाद के लिए संघर्ष है | लेकिन इन महत्वपूर्ण परिवर्तनों के वावजूद साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध अभी जारी है और जैसा कि फाँसी से तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर को फाँसी के बजाए गोली से उडाये जाने की मांग करते हुए लिखे गये अपने पात्र में भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव ने लिखा था : ''यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक की शकतीशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे | चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक अथवा सर्वथा भारतीय ही हो | उन्होंने आपस में मिलकर एक लुट जारी कर राखी है | यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थित में कोई फरक नही पड़ता |'' इस पत्र के अनत में विश्वासपूर्वक यह घोषणा की गयी थी कि ''निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप से लड़ा जाएगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा | साम्राजय्वाद व पूंजीवाद कुछ समय के मेहमान है | यहाँ भगत सिंह की इस प्रकार इतिहास दृष्टि से हमारा साक्षात्कार होता है जो राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को जनमुक्ति - संघर्ष की इतिहास यात्रा के दौरान बीच का एक पड़ाव मात्र मानती थी और साम्राजय्वाद - पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष को ही अंतिम निर्णायक संघर्ष मानती थी | भगत सिंह ने कई स्थानों पर इस बात पर बल दिया है कि इस निर्णायक विश्व ऐतिहासिक महासभा का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ही कर सकता है और पूंजीवाद का एक मात्र विकल्प समाजवाद ही हो सकता है | आज विश्व स्टार पर पूँजी और श्रम श्कतियो एक नये निर्णायक ऐतिहासिक युद्द के लिए आमने - सामने लामबंद हो रही है | तो भारत के युवाओं और मेह्नात्क्शो के लिए साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के भविष्य के बारे में आकलन और भविष्यवाणी का विशेष महत्व हो जाता है | भगत सिंह , भगवतीचरण वोहरा और हिदुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिक असोसिएशन (एच,एस आ .ए ) के ने अग्रणी क्रान्तिकारियो का दृष्टिकोण भारतीय पूंजीपति वर्ग के बारे में एकदम स्पष्ट था | कांग्रेस के नेतृत्व को इन्ही पूंजीपतियों , व्यापारियों का प्रतिनिधि मानते थे और उनकी स्पष्ट धारणा थी कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व यदि कांग्रेस के हाथो में रहा तो उसका अनत एक समझौता के रूप में होगा और इसीलिए वह यह स्पष्ट संदेश देते है कि क्रान्तिकारियो के लिए आजादी का मतलब सत्ता अपर बहुसंख्य मेहनतकश वर्ग का काबिज होना न की लार्ड रीडिंग और लार्ड इरविन की जगह पुरुषोतम दास , ठाकुरदास अथवा गोर अंग्रेजो की जगह काले अंग्रेज का स्तासिं हो जाना | उनकी स्पष्ट घोषणा थी की यदि देशी शोषक भी किसानो -मजदूरो का खून चूसते रहेंगे तो हमारी लड़ाई जारी रहेगी |

साभार --- सामयिक कारवाँ के जुलाई -- दिसम्बर अंक से

Saturday, October 26, 2019

सन्यासी विद्रोह

सन्यासी विद्रोह और उसके सबक ( 1763-1800 )
( क्या आज के सन्यासी , फकीर , महात्मा , धर्मगुरु व धार्मिक नेता सन्यासी विद्रोह के शहीदों व फकीरों से प्रेरणा ले सकेगे ? इन विदेशी साम्राज्यी ताकतों और उनके सहयोगी देश के धनाढ्य वर्गियो से संघर्ष कर सकेगे ? उनके द्वारा लायी गयी और देश के धनाढ्य व हुक्मती हिस्सों द्वारा लागू की गयी नीतियों का विरोध कर सकेगे ? )
बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सत्ता स्थापित ( 1757 ) होने के बाद सत्ता के विरुद्ध देशवासियों का पहला बड़ा विद्रोह सन्यासी विद्रोह के रूप में प्रस्टफूटित हुआ | बकिम चन्द्र के उपन्यास " आनद मठ" का कथानक इसी सन्यासी विद्रोह पर आधारित है |कम्पनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज ने इस विद्रोह को" सन्यासी विद्रोह " का नाम दिया था |सर विलियम हंटर ने स्पष्ट लिखा है कि , सन्यासी विद्रोह की शक्ति मुगल साम्राज्य के बेकार कर दिए गये सैनिक तथा भूमिहीन किसान थे | जीवन यापन का कोई उपाय न रहने पर विद्रोह के रास्ते पर चल पड़े थे |इनमे बहुतेरे लोग गृहत्यागी सन्यासी बन गये थे |उस समय के एतिहासिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि इसी वोद्रोह में मुख्यत: तीन शक्तिया शामिल थी | मुख्य रूप से बंगाल व बिहार के किसान थे , जिन्हें कम्पनी के व्यापार व राज ने लुटकर बर्बाद कर दिया था | दुसरे मरते हुए मुगल साम्राज्य के बेकारी और भूख से पीड़ित सैनिक थे | ये सैनिक खुद भी किसानो के ही परिवारों के थे | तीसरे बंगाल व बिहार के सन्यासी व फकीर थे |सन्यासी व फकीर ही इस विद्रोह के अगुवा थे | पर उनकी मूल शक्ति किसानो , दस्तकारो की तथा विद्रोह में शामिल भूतपूर्व मुगल शासन के सैनिको की थी |सन्यासियों ने अपने यायावरी जीवन को , इस विद्रोह को संगठित करने बढाने में लगा दिया | वे गाँव - गाँव घूमते हुए यह अलख जगाते चल रहे थे कि देश को मुक्त करना ही सबसे बड़ा धर्म है | ये विद्रोही सैकड़ो हजारो की संख्या में ईस्ट इंडिया कम्पनी की कोठियो और जमीदारो की कचहरियो को लुटते और उनसे कर वसूलते , इनका पहला हमला ढाका में कम्पनी की कोठी पर हुआ | यह कोठी ढाका के जुलाहों , बुनकरों और कारीगरों पर जुल्म ढाने का केन्द्र थी | उनकी तबाही और बर्बादी का कारण थी | विद्रोहियों ने रात में कोठी पर धावा बोल दिया | पहरेदार , सौदागर और कोठी के व्यवस्थापक भाग निकले | उस कोठी पर अंग्रेज छ: माह बाद ही दुबारा कब्जा कर पाए और वह भी बड़े सैन्य हमले के बाद | विद्रोहियों का दुसरा हमला राजशाही जिले के रामपुर बोआरिया की अंग्रेज कोठी पर हुआ वंहा का सारा धन लुट लिया गया |आमने -सामने की लड़ाई में अंग्रेजो से पराजित होने पर विद्रोहियों ने छापामार युद्ध की नीति अपनाई|
पटना से लेकर उत्तरी बंगाल के तराई इलाके तक सन्यासी विद्रोह की आग फ़ैल गयी थी | विद्रोहियों ने जलपाईगुड़ी में एक किला भी बनाया हुआ था | 1770 - 71 में पूर्णिया जिले के विद्रोहियों को पराजित कर उन्हें बड़ी संख्या में कैद करने में अंग्रेज शासक सफल हुए | उन्ही कैदियों से अंग्रेज शासको को सन्यासी विद्रोह की और जानकारी मिली | उसी जानकारी के अनुसार मुर्शिदाबाद के रेवन्यू बोर्ड के पास भेजे गये पत्रों में यह दर्ज़ है कि ज्यादातर विद्रोही किसान थे | अंग्रेजी शासन के संगठित हमलो के वावजूद सन्यासी विद्रोह बढ़ता - फैलता रहा | उत्तरी बंगाल से अब उसका फैलाव पूर्वी बंगाल के क्षेत्र मैंमन सिंह की तरफ बढ़ता रहा |जलपाई गुडी के पास महास्थान गढ़ और पौण्डवर्धन में भी दुर्ग बनाये गये | 1771 के शरद काल में सन्यासी विद्रोहियों ने उत्तर बंगाल में अपने धावे तेज़ कर दिए |नारोर के सुपरवाईजर ने 25 जनवरी 1772 को पत्र लिखकर यह सूचित किया कि "बाकुड़ा जिले के सिल्बेरी में फकीरों के एक दल ने जनसिन परगना कि कचहरी को लूट लिया | पत्र में उन्होंने यह भी सुचना दी कि ग्रामीणों ने खुद आगे बढकर विद्रोहियों के खाने - पीने का इंतजाम किया |किसानो ने ब्रिटिश सरकार को कर न देने का निर्णय ले लिया | 1773 में विद्रोहियों का प्रधान कार्यालय रंगपुर था | दमन के लिए अंग्रेज सेनापति टामस बड़ी भारी सेना लेकर आया | 30 सितम्बर 1773 को प्रातकाल: रंगपुर शहर के नजदीक श्यामगंज के मैदान में उसने विद्रोहियों पर आक्रमण कर दिया | विद्रोही शीघ्र ही भागने लगे |अंग्रेजी फ़ौज ने उनका पीछा किया | लेकिन आगे के जंगलो में अंग्रेजी फ़ौज विद्रोहियों से घिर गयी | विद्रोही उन पर टूट पड़े | अंग्रेजी सेना के देशी सिपाहियों ने भी विद्रोह कर दिया | थोड़ी ही देर में अंग्रेजी सेना मरती - कटती भागने लगी |टामस भी मारा गया रंगपुर के सुपरवाइजर ने रेवेन्यु काउन्सिल के पास पत्र भेजा कि किसानो ने हमारी सहायता नही की उल्टे उन्होंने लाठी ,भाला आदि लेकर सन्यासियों की तरफ से हमारे विरुद्ध युद्ध किया | जो अंग्रेज जंगल की लम्बी घास को अंदर छिपे थे , किसानो ने उन्हें खोज कर बाहर निकाला और मौत के घाट उतार दिया| मार्च 1774 को इन विद्रोहियों ने मैंमन सिंह जिले में अंग्रेज सेनापति कैप्टन एडवर्ड की सेना नष्ट कर दी उसमे एडवर्ड मारा गया सिर्फ 12 सैनिक ही बच सके | विद्रोहियों के क्रिया - कलापों और उनके साथ किसानो के सहयोग को बढ़ता देख कर गवर्नर हेस्टिंग्ज ने घोषणा की कि जिस गावं के किसान विद्रोहियों के बारे में ब्रिटिश शासको को खबर देने से इनकार करेंगे और विद्रोहियों के बारे कि मदद करेंगे , उन्हें गुलामो कि तरह बाज़ार में बेच दिया जाएगा | इस घोषणा के बाद कईहजार किसानो को गुलाम बना दिया गया |
कितनो को बीच गाँव में फांसी दे दी गयी | विद्रोहियों का संगठन टूटने लगा 1774 - 75 में सन्यासी फकीर मजनू शाह ने उन्हें फिर से संगठित करने का प्रयास किया | 15 नवम्बर 1776 को मजनू शाह की सेना और कम्पनी की सेना में उत्तर बंगाल में युद्ध हुआ | अंग्रेजो को जंगल में खीच कर विद्रोही उन पर टूट पड़े | इस युद्ध में लेफ्टीनेन्ट राबर्ट्सन विद्रोहियों की गोली से घायल हो गया | मजनू शाह और उनके सन्यासी व फकीर साथी भागने में कामयाब रहे | बाद के कई सालो तक मजनू शाह विद्रोहियों को संगठित करने का प्रयास करते रहे | 29 दिसम्बर 1786 को अंग्रेजो के साथ युद्ध करते हुए यह फकीर बिद्रोही बुरी तरह घायल हो गये और कुछ दिनों बाद ही इस महान विद्रोही फकीर मौत के आगोश में सो गये | इसके बाद मजनू शाह के शिष्य फकीर मुसा शाह इस इंकलाबी विद्रोह के बड़े अगुवा बने |इनके अलावा विद्रोहियों के बड़े नेताओं में भवानी पाठक और देवी चौधरानी आदि के नाम उल्लेख्य्नीय है | युद्ध में भवानी पाठक मारे गये देवी चौधरानी उनके बाद भी लडती रही | ब्रिटिश कम्पनी कई सत्ता के विरोधी विद्रोहों में सन्यासी विद्रोह सबसे पहली व मजबूत कड़ी थी | इस संघर्ष में हिन्दू सन्यासी और मुस्लिन फकीर दोनों कई अगुवाई में किसानो व दस्तकारो का बहुत बड़ा हिस्सा इनके साथ खड़ा था | यह विद्रोह दशको तक चलता रहा और उस विद्रोह को ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा सालो - साल के संघर्षो के बाद ही दबाया जा सका राष्ट्र व समाज में सत्ता के विरुद्ध विद्रोह तक नही खड़े हो सकते है , जब तक उसकी शोषणकारी , दमनकारी व अन्यायी क्रिया - कलापों के चलते जन साधारण में असंतोष व विरोध नही खड़ा हो जाता | इसीलिए ऐसे विद्रोह तब तक खड़े होते भी रहेगे जब तक जनसाधारण किसानो , मजदूरों , दस्तकारो कई लूट चलती रहेगी | उन पर अन्याय व अत्याचार चलता रहेगा चाहे उसका रूप 1770 के जैसा हो या वह आधुनिक युग के छली , कपटी , भ्रष्टाचारी जनतांत्रिक बाजारवाद के जैसा हो | जिस तरह से विदेशी सत्ता के जरिये जन साधारण के शोषण , लूट कि जा रही थी , उसी तरह ही वर्तमान युग में बढ़ते वैश्वीकरण के साथ विदेशी पूंजी , विदेशी नीतियों व प्रस्तावों के जरिये आम किसानो , दस्तकारो के लूट जारी है | राष्ट्र व जन साधारण पर विदेशी साम्राज्यी का बढना जारी है | क्या आज के सन्यासी , फकीर , महात्मा , धर्मगुरु व धार्मिक लीडर सन्यासी विद्रोह के शहीदों व फकीरों से प्रेरणा ले सकेंगे ? इन विदेशी साम्राज्यी ताकतों और उनके सहयोगी देश के धनाढ्य वर्गियो से संघर्ष कर सकेंगे ? उनके द्वारा लायी गयी और देश के धनाढ्य व हुक्मती हिस्सों द्वारा लागू कि गयी नीतियों का विरोध कर सकेंगे ? इसकी संभावना नही है | क्योंकि आज के सन्यासी फकीर भी लक्ष्मीपूजक हो गये है | देशी व विदेशी धन कुबेरों एवं शासक हिस्सों के साथ हो गये है | वे किसानो - मजदूरों के साथ आये न आये , पर चौतरफा बढती जा रही लूट के विरुद्ध आम लोगो को खड़ा होना ही पड़ेंगा | वर्तमान दौर में तो नही लगता कि कोई सन्यासी भी ऐसा है जो इस रास्ते पे आगे चलेगा ....
सुनील दत्ता----- स्वतंत्र पत्रकार --- समीक्षक
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Tuesday, October 15, 2019

भगीरथ की प्रतीक्षा में है माँ गंगा

भगीरथ की प्रतीक्षा में है माँ गंगा
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विश्व के प्राचीनतम ज्ञान सकलन ऋग्वेद में गंगा सहित अनेक नदियों से राष्ट्र कल्याण की प्रार्थना है |गंगा भारत की पहचान है ,आस्था और संस्कृति है |मृत्यु के समय दो बूंद गंगाजल की अभीप्सा सनातन है |गंगा राष्ट्र जीवन का स्पंदन है |पवन में ,प्राण में पृथ्वी ,पाताल और परमधाम तक में चेतना की जो तरल संवेदना तैरती है ,गंगा उसी की एक कंठ -मधुर सज्ञा है |देश की 37% सिंचित क्षेत्रफल गंगा बेसिन में है |गंगा के अभाव में समृद्धि ,सांस्कृतिक भारत की कल्पना नही की जा सकती |तेरहवी शताब्दी के महान कवि विद्यापति ने गंगा विनती में कहा था कि दृष्ट्वा ,स्मृत्वा ,स्पृश्य (दर्शन ,स्मरण ,स्पर्श ) से ही गंगा मैया श्रद्दालुओं के मन में आ बसती है |
भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्रतीक गंगा काशी में उत्तरवाहिनी होकर भगवान भोलेनाथ के मस्तक पर विराजमान होकर अर्द्धचन्द्राकार रूप में अपनी मोहनी छटा बिखेर रही है |काशी में गंगा के उत्तर की ओर बहने के निसंदेह: कुछ वैज्ञानिक कारण भी है |गंगा को एक साधारण नदी मान ले तो यथार्थ के धरातल पर स्थूल धौमिकीय कारण पर्याप्त माने जा सकते है |आइंस्टाइन ने यह सिद्ध करने में कोई कसर नही छोड़ी है कि सारी नदियों का मार्ग सर्पिल आकृति गुरुत्वाकर्षण होती है |
लेकिन हिन्दू -मन गंगा को किसी सामान्य सरिता के रूप में न देखता है न जानता है और न मानता है |वृहत्तर सत्य के संदर्भ में उसे सारे वैज्ञानिक कारण सतही और कामचलाऊ लगते है |उसे गंगा में प्राणों का उल्लास दिखाई देता है | बहन का पवित्र प्यार दिखाई देता है ,माँ कि ममता दिखाई देती है और कुल मिलाकर आत्मा के उत्कर्ष कि सीमा दिखाई देती है |वस्तुत:काशी में गंगा के उत्तर -परवाह का प्रश्न विज्ञान से उतना सम्बन्धित नही है जितना आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि से है |काशी में गंगा के उत्तर की ऑर बहने का एक आध्यत्मिक रहस्य है |हजारो साल पहले एक बार महर्षि अत्रि ने ज्ञानवल्क्य से उपासना के संदर्भ में प्रश्न किया |याज्ञवल्क्य ने महर्षि अत्रि से कहा था कि इसके लिए अविमुक्त कहा अवस्थित है ,किस स्थान पर उनकी प्रतिष्ठा है? तब ज्ञानवक्ल्य ने एक गूढ़ उत्तर दिया था -वर्णाया नास्या च प्रतिष्ठित: | अविमुक्ति क्षेत्र कहा जाता है |यह क्षेत्र वरुणा और नास्या अर्थात वरुणा और अस्सी उपनदियो के बीच स्थित है |यही अविमुक्त क्षेत्र काशी है |आज इसी अविमुक्त क्षेत्र काशी में मोक्षदायनी गंगा का अस्तित्व खतरे में है |इसके लिए प्रकृति नही हम जिम्मेवार है |प्रदूषित गंगा मानवता के हित के लिए कराह रही है और एक भगीरथ का रास्ता देख रही है जो गंगा को मुक्ति दिलाये |हमारे पूर्वजो ने गंगा को माँ कहा |गंगा तट तीर्थ बने ,स्नान ,योग और ध्यान के पीठ बने |भारत के मन ने धरती की गंगा को आकाश में भी बहाने का कौशल निभाया |कृष्ण ने अर्जुन को बताया -पार्थ तारो में आकाश गंगा मैं ही हूँ |धरती की नदियों को आकाश में बहाने का शिल्प भारत का ही प्रज्ञा चमत्कार है |भारतीय पूर्वजो का उद्देश्य गंगा की महता ही बताना था भारत में मन में प्रतिपल गंगा का भाव है |गंगा से जुडा एक विशाल अर्थतंत्र है |तीर्थ है ,तीर्थो से जुड़े व्यापारी और पुजारी है ,मछुवारे है |गंगा से निकलने वाली नहरे है |गंगा एक विपुल क्षेत्र की सिंचाई का साधन है |वर्षा ऋतू की नदी नही है गंगा बारह मॉस हिमखंडो से बहती है ढेर सारी नदियों को आत्मसात करती है |माँ गंगा भारत का काव्य है ,आध्यात्म है अर्थ्य है ,आचमन ,पूजन वन्दन है गंगा |गंगा का परवाह अन्द्ध नाद है |नील टेम्स या डेन्यूब के उदगम स्थलों का दर्शन करने कोई नही जाता ,लेकिन गोमुख का दर्शन भारत में परमलब्धि है |अब तक ऋषिकेश और हरिद्वार तक गंगा जल शुद्ध था ,अब गढ़मुक्तेश्वर तक की यात्रा में इसकी हताशा है ,लेकिन कुमाऊ रूहेलखंड ,मुरादाबाद ,बरेली शाहजहापुर ,हरदोई पार करते गंगा औद्योगिक कचरे के घोल में परिवर्तित होती जा रही है गंगा |गंगा का अविरल प्रवाह देश - काल ,सभ्यता संस्कृति और आस्था अर्थशास्त्र सहित सभी दृष्टियों का आह्वान है |अगर हम सरकारी प्रयासों की बात करे तो हरिद्वार से आगे गंगा की सफाई और इसके पानी को नहाने लायक बनाने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने गंगा एक्सन प्लान की शुरुआत की थी |इस परियोजना पर 1984 से अब तक एक हजार करोड़ रूपये खर्च किए जा चुके है ,लेकिन गंगा जल में कोई सुधार नजर नही आता |ऐसा नही है की गंगा के पानी को स्वच्छ नही किया जा सकता है |ऐसा हो सकता है ,लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ -गंगा आम लोगो को भी अपनी इस धरोहर के प्रति संवेदनशील होना पडेगा |राजनीत मौन है |आश्चर्य है की संसदीय व्यवस्था भी इसी प्रश्न पर कोई साकार ध्यानाकर्षण नही कर पा रही है |विश्व व्यापार संगठन प्रायोजित औद्योगिक घरानों से निर्देशित सरकारी तंत्र को जगाने के लिए जनांदोलन ही एक मात्र विकल्प है |कुछ नि:स्वार्थी लोग आगे आये है |प्रत्येक गंगा भक्त के सामने भगीरथ बन जाने का अमृत अवसर है ...................................माँ गंगा को मोक्षदायनी ,जीवनदायनी ,आइये गंगा को फिर वही स्वरूप देने का काम करे जो गंगा का पहले स्वरूप था .....................

Monday, October 14, 2019

लहू बोलता भी है

लहू बोलता भी है

जमात - ए - उलमा -ए हिन्द और उल्माओ के आन्दोलन भाग

उलेमाओं की राय थी की अब जो हालात है , उसके मुताबिक़ सिर्फ मुसलमानों के आन्दोलन से अंग्रेज को मुल्क से बाहर कर पाना मुश्किल ही नही बल्कि नामुमकिन है | इसी दौरान जालियाँवाला बाग़ के हादसे ने खुद - ब खुद हिन्दू मुसलमान को अंग्रेजो के खिलाफ एक जुट होकर लड़ने की जमीन तैयार कर दी | खिलाफत आन्दोलन के समय महात्मा गांधी के साथ ने भी दोनों कौमो के बीच की दुरी को बहुत हद तक कम कर दिया था | जमीअतुल - उलमा -ए - हिन्द ने भी अपने इजलास में साफ़ तौर पर कहा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद दिन - पर दिन अपनी जड़े मजबूत करता जा रहा है | भारत के हिन्दू और मुसलमान ने अगर मिलकर आन्दोलन नही चलाया , तो अंग्रेजो को मुल्क से बाहर कर पाना नामुमकिन हो जाएगा | महात्मा गांधी ने हकीम अजमल खान को साथ लेकर जमीअतुल -उलमा -ए - हिन्द को आन्दोलन में साथ देने के लिए दावत दी , जिस पर जमात के लोगो ने हामी भर दिया | अब जमीअतुल - उलमा - ए - हिन्द और कांग्रेस ने कंधे - से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता - आन्दोलन में नई जान फूंक दी , लेकिन जब कभी इस्लामिक कानून का कोई पेचीदा मामला सामने आ जाता तब माहौल कुछ असहज हो जाता था | बाद में उसका भी रास्ता निकल जाता - जैसे कि नेहरु की रिपोर्ट , साइमन कमीशन , शुद्दी सगठन और शारदा एक्ट के सवाल पर जमात - ए - उलमा -ए - हिन्द ने मुखालिफत की थी | इस पर कांग्रेस रहनुमाओं ने कोई प्रतिक्रिया नही दी | जमीअतुल - उलमा -ए - हिन्द ने मुस्लिम इशु ( जैसे शरियत बिल , खुला बिल , काजी बिल ) पर कांग्रेस की हिमायत पाने में कामयाबी हासिल कर ली थी | सन 1908 - 1910 के बीच अलीगढ़ कालेज और देवबंद से आलमियत की शिक्षा हासिल किये छात्रो ने एक जमातुल - अंसार - एसोशियेशन बनाकर दोनों ख्यालो के लोगो को एक प्लेटफ़ार्म दिया ताकि ख्यालाती एख्तलाफ दूर करके सभी लोग जंगे - आजादी में पुरे जी जान से जुट सके | दारुल उलूम ( देवबंद ) में 1910 में एक बहुत बड़े जलसा -ए - दस्तारबंदी का एहेतामाम हुआ जिसमे तक़रीबन 30 हजार लोग शामिल हुए | इसकी खासियत एक वजह से और बढ़ गयी थी जब इस जलसे में आफताब अहमद खान की कयादत में अलीगढ़ कालेज के टीचरों और लडको का एक डेलिगेशन शामिल हुआ और हर मामले पर आपस में खुलकर बात हुई | जमातुल अंसार के बाद सन 1913 में एक तंजीम नजरतुल मारिफ के नाम से देहली में बनी | इसमें शेख - उल - हिन्द , मौलाना हुसैन अहमद मदनी , डा मोखतार अहमद अंसारी , नवाब वकारुल मुल्क , हकीम अजमल खान वगैरह शामिल हुए | इस तंजीम को सियासत से दूर खासतौर कुरआन की तालीम की तरक्की के लिए बनाया गया था | मुसलमानों में अब तक़रीबन हर तबका जंगे - आजादी में अपने नजरयाति एख्तलाफ को दूर करने के साथ चलने लगा था | इसी मुहीम में जामिया मिलिल्या इस्लामिया के लोग भी शामिल हुए | अंग्रेजो से लगातार किसी - न किसी महाज पर मुसलमानों की जंग जारी थी |मुजाहिदीन ने यंगिस्तान के दफ्तर को खबर कर दी की हथियारों के साथ खाने - पीने का सामान अब खत्म होने की कगार पर है | इसलिए फौरी तौर पर किसी जंग की गुंजाइश नही बन पा रही है | तब उलेमाओं ने मुस्लिम मुल्को से मदद के लिए कहा | इसके बाद मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी को काबुल भेजा गया और खुद शेख - उल - हिन्द इस्ताम्बुल गये |

प्रस्तुती -- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
लहू बोलता भी है --- सैय्यद शाहनवाज कादरी

Monday, October 7, 2019

जमात - ए - उलमा -ए हिन्द और उल्माओ के आन्दोलन भाग- चार

लहू बोलता भी हैं ---

जमात - ए - उलमा -ए हिन्द और उल्माओ के आन्दोलन भाग- चार

सबकी राय के बाद विद्रोह का फैसला तय हो गया | अब सवाल हुआ कि अमीरुल - मोमनीन किसे बनाया जाए | सबकी इत्तेफाके - राय से हाजी इम्दादुल्लाह सैय्यद बहादुर को अमीरुल - मोमनीन बनाकर मजलिसे - शुरा ने आजादी का एलान कर दिया | हाजी इम्दादुल्लाह महाजिर मक्की ने इस्लामिक सरकार की बुनियाद रखी और उनके अमीर ने इंतजामिया के सारे अख्त्यारात अपने हाथो में रखे - साथ ही , मौलाना रशीद अहमद गंगोही और मौलाना कासिम नानोतवी को नायब बनाया गया | आरजी इस्लामी हुकूमत ने शरियत के मुताबिक़ कुछ फैसले भी लिए | उलमाओं की बैठक अभी खत्म भी नही हुई थी कि खबर मिली की थाना भवन और शामली में अंग्रेज फ़ौज आम लोगो को सडक चलते बिना किसी गलती के जुल्म कर रही है | उलमाओं की फ़ौज फ़ौरन शामली की तरफ रवाना हुई और एक टीम थाना भवन में ही अंग्रेजो से मोर्चा लेने की तैयारी के लिए रुक गयी | बाग़ शेर अली शामली में अंग्रेज सैनिको से उलमाओं की जमकर जंग हुई और थाना - भवन और शामली में अंग्रेज फ़ौज के पैर उखड गये और वे भाग निकले - जो बचे थे - वे जंग में मारे गये | इस जंग में जामिन अली , राशिद अहमद गंगोही , मौलाना कासिम नानोवती ने अंग्रेजो से लड़कर उन्हें परास्त कर दिया | इस पूरी जंग के कमांडर मौलाना कासिम नानोवती थे | इन जंग में काजी इनायत अली और जामिन अली शहीद हो गये , लेकिन उलमाओं की मुजाहेदीन सेना ने ब्रिटिश सेना पर फतह हासिल की | इस हार के बाद अंग्रेजो ने आम मुसलमानों के साथ - साथ गैर - मुस्लिमो पर जुल्मो - ज्यादती बढ़ा दी | न जाने कितने लोगो को किसी जुर्म के बगैर ही सडक के किनारे पेड़ो पर लटकाकर फांसी दे दी | कई लोगो को हाथियों से कुचलवाकर मार डाला गया | उलमाओं को इस कार्यवाही से बहुत गहरा सदमा पहुचा | अभी वे लोग इस मुसीबत का कोई सियासी और मजबूत हल तलाश कर ही रहे थे की सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीव पड़ी | कांग्रेस की तंजीम और मकासिद को देखते हुए आम मुसलमानों ने फौरी कोई राय नही बनाई , लेकिन राष्ट्रीय सोच के उलमाओं ने दो कदम आगे आकर कांग्रेस का खैरमकदम किया और मुसलमानों का झुकाव आहिस्ता - आहिस्ता कांग्रेस की तरफ होता गया | मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ होता देख अंग्रेज नौकरशाह थोडा फिक्रमंद हुए और कांग्रेस की मकबूलियत को कम करने के लिए अलीगढ़ कालेज के प्राचार्य मिस्टर बेक ने कुछ मुसलमानों को साथ लेकर एक नई तंजीम भारतीय देशभक्त सगठन बनाकर कांग्रेस की खुले - आम मुखालिफत शुरू कर दी | बेक ने सर सैय्यद अहमद खान को भी कांग्रेस की मुखालिफत के लिए राजी कर लिया | सर सैय्यद अहमद खान ने अपने हमख्याल मौलानो और मुसलमानों के पढ़े-लिखे तबके को साथ लेकर एक तंजीम अंजुमन मुहिब्बाने वतन के नाम से बना दी और इसी तंजीम के बैनर से कांग्रेस की मुखालिफत करना शुरू कर दिया | इसकी वजह से जिस तेजी से मुसलमान कांग्रेस के साथ जुड़ रहा था , उसमे भी रुकावट आ गयी | सर सैय्यद अहमद ने कुछ उलमाओं से कांग्रेस के खिलाफ फतवा भी जारी कर दिया i

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
लेखक --- सैय्यद शाहनवाज कादरी

Sunday, October 6, 2019

आगरा रेड फोर्ट - भाग दो -

आगरा रेड फोर्ट - भाग दो -
अदभुत है रेड फोर्ट
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इस गेट से अन्दर जाने के बाद सामने ही खुबसूरत महल पर नजर पड़ती है यह है जहाँगीर महल यह लाल पत्थरों की बनी दो मंजिला इमारत है , अकबर ने इसे अपने पुत्र के लिए बनवाया था इसकी छत और दीवारे आकर्षित रंगों से सजी हुई है इसमें सुनहरी रंग भी शामिल है | कुछ समय बाद इसी तरफ की ईमारत जहाँगीर ने बनवाई थी जब उसने अकबर द्वारा जोधाबाई के लिए बनी इमारत नष्ट कर दी | लेकिन कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह इमारत अकबर ने जहाँगीर की पत्नी के लिए बनवाई कारण ऐसी ही एक इमारत फतेहपुर सिकरी में भी है |
इसके चार कोने अलग - अलग कामो के लिए थे जोधाबाई इसका पूर्वी हिस्सा पुस्तकालय के लिए इस्तेमाल करती थी पश्चिमी हिस्सा मंदिर के लिए उत्तरी हिस्सा बातचीत के लिए तथा चित्रकारी के लिए दक्षिण तरफ का हिस्सा प्रयोग करती थी | यह महल हिन्दू तथा मध्य एशिया की कला के संगम का प्रतीक था |
अंगूरी बाग़ --
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यह ख़ास महल के सामने स्थिति है | यह अकबर द्वारा पत्नी तथा अन्य हराम की औरतो के लिए बनवाया गया था | इसके लिए मिटटी कश्मीर से लाइ गयी थी | यह बाग़ दो मंजिला इमारतों से तीन कोनो से घिरा है बाद में जहांगीर ने अंगूर की खेती करवाकर उससे शराब बनवाता था |
ख़ास महल --
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ख़ास महल को शाहजहाँ द्वारा सफेद संगमरमर का शानदार महल बनवाया गया था | यह हरम की औरतो द्वारा इस्तेमाल किया जाता था | इसे आरामगाह भी कहा जाता था | यह शाहजहाँ द्वारा चित्रकारी के लिए तथा सोने के लिए इस्तेमाल किया जाता था | ये कहावत है कि यहाँ सभी मुग़ल राजाओ के चित्र थे जो भरतपुर के जाट रराजा द्वारा नष्ट कर दिए गये |
दीवाने - ए- ख़ास --- दीवान - ए - ख़ास अथवा शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया था यह सफेद संगमरमर से सन 1637 में बनवाया गया यह नदी के किनारे स्थिति है | दीवान - ए- ख़ास एक ऐसी जगह जहाँ बादशाह अपने तमाम मंत्रियो और गुप्त लोगो के बैठकर बाते करते थे | शाहजहाँ का प्रसिद्द मयूर सिंहासन यही पर रखा गया था | कुछ समय उपरान्त यह औरंगजेब द्वारा दिल्ली ले जाया गया | फिर यह सिंहासन कुछ हमला करने वाले लोगो द्वारा हासिल कर लिया गया अब यह तेहरान में मौजूद है |
शीश महल --
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यह जगह हराम की औरतो द्वारा श्रृंगार करने के लिए प्रयोग की जाती थी | यह शाहजहाँ द्वारा सन 1630 में बनवाया गया था , उसने यह अपने परिवार के सदस्यों के लिए बनवाया यह तुर्की ढंग से बना नहाने के घाट जैसा था | जिसमे दो हाल , दो टंकिया - एक गर्म पानी और दूसरा ठंडे पानी के लिए थी | छोटी बत्तियो की रौशनी में मुग़ल बादशाह अपनी पत्नियों के साथ ऐश तथा आराम किया करते थे |
सम्मान बुर्ज --
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जेसमीन टावर , सम्मन बुर्ज मुसम्मन बुर्ज एक ही इमारत का नाम है , जो की जहाँगीर द्वारा अपनी पत्नी नूरजहाँ के लिए बनवाया गया था | कुछ समय बाद यह शाहजहाँ द्वारा मुमताज महल के लिए वापस बनवाया गया | यह काम करिश्मा है , इसमें अमूल्य तथा रागिन पत्थरों का कम किया गया है | यह ही वो जगह है जहां औरंगजेब द्वारा शाहजहाँ को कैद किया गया था | यह शाहजहाँ का मरण स्थान है , जहाँ उसने अपनी आखरी साँसे अपनी प्रिय बेटी जहाँआरा के गोद में ली थी तब वे ताज की तरफ देख रहे थे |
नगीना मस्जिद ---
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नगीना मस्जिद बादशाह औरंगजेब द्वारा सन १६७५ में बनवाई गयी उन्होंने हरम की औरतो के लिए यह मस्जिद बनवाई थी | यह मच्छी के उत्तर पश्चिमी तरफ है इसकी दक्षिण दीवार में एक दरवाजा है जो की मीना बाजार को जाता है |
दीवान -ए - आम -- दीवान -ए आम जनता के लिए हाल का निर्माण लाल पत्थर से अकबर द्वार करवाया गया और यह मच्ची भवन के के पश्चिमी तरफ स्थित है | यह शाहजहाँ द्वारा फिर से बनवाया गया | इसकी वृत्तखंड और छत पर संगमरमर पे कशीदाकारी का कम किया हुआ है |
मीना मस्जिद -- यह बादशाह औरंगजेब द्वारा शाहजहाँ के प्रयोग के लिए बनवाई गयी जब वे आगरा किले में कैद थे | यह सफेद संगमरमर का बना हुआ है | इसके अन्दर का नाम 22 गुना 13 फीट है और इसके आगे 22 स्क्वायर फीट बरामदा है |
मीना बाजार - यह बाजार अकबर द्वारा हरम की सुन्दर औरतो के लिए बनवाई गयी थी | यह लाल पत्थर की बनी थी यह एक बाजार था जहाँ अमूल्य वस्तुए खरीदी और बेचीं जाती | कोई भी मर्द इस बाजार में नही जा सकता था | आगरा रेड फोर्ट देखने के बाद मैं .राज और राजीव बढ़ चले इटावा की तरफ -- जारी

आगरा रेड फोर्ट में -- भाग एक

आगरा रेड फोर्ट में -- भाग एक
24 सितम्बर हम सब भाई एह्तेशाम और मारुफ़ भाई से मिलने के बाद सीधे राज के छोटे भाई के घर पहुचे रात वही पर व्यतीत हुआ दूसरे दिन हम लोग अंशुल के यहाँ गये वहाँ पर राज को शहीद मेला की वेव साईट की प्रगति देखनी थी , सारा काम सम्पन्न होने के बाद वापसी फिर यमुना एक्सप्रेसवे की तरफ बढ़ लिए , उस दिन बारिश भी जमकर हो रही थी , मुझे आगरा का रेड फोर्ट देखना था जब मैंने राज से कहा तो उन्होंने कहा ताजमहल क्यो नही ? मैंने हँसकर जबाब दिया किले में बहुत कुछ मिलेगा , हम सब किरण पाल जी की चर्चा करते हुए यमुना एक्सप्रेस वे पार किया संशय की स्थिति में आगे बढ़ते रहे अन्तोगत्वा राज ने एक ढाबा खोज ही लिया , हम लोग सडक से उतर कर कटीले तारो को पार करके चाय पिने नीचे उतरे संयोग से चाय मिल गयी , फिर यात्रा आगे बढ़ चली , आगरा के मुहाने पर जब हम सब पहुचे तो राज ने पूछा क्या ख्याल है हमने कहा जो आप सब का गाडी आगरे किले की तरफ मुड गयी हम सब रेड फोर्ट पर खड़े थे अचानक सामने एक टूरिस्ट गाइड आ गया , कम बहस में वो किला घुमाने के लिए राजी हो गया हम सब साथ निकल लिए |
{आगरा रेड फोर्ट }
आगरा किला खासकर तीन मुग़ल बादशाहों ने पूरा किया इसकी शुरुआत अकबर ने किया था यह किला इमारतो तथा महलो का म्यूजियम है , इसको अकबर , शाहजहाँ , औरंगजेब द्वारा बनवाया गया था |
आगरा किला यमुना नदी के बायीं तट पर बनाया गया है जो कि आगरा शहर के पूर्वी तरफ है | यहाँ दीवारे मोटे तथा शक्तिशाली लाल पत्थरों से बने गयी है | यह कहावत है कि अकबर ने यह किला पुराने बादलगढ़ के किले के स्थान पर बनवाया | इस किले की बाहर की दीवार 40 फीट ऊँची है और अन्दर की 70 फीट | आगरा का किला दो बड़ी खाइयो से घिरा था | इन दोनों में से अन्दर वाली खाई अब भी मौजूद है , लेकिन बाहर वाली खाई को भर दिया गया है और अब वहाँ सडक है | दोनों खाइयो में डरावने तथा खतरनाक कछुओ और एनी जिव जन्तुओ से भरी थी ताकि कोई दुश्मन इस खाई को आसानी से न पार कर सके | यह किला सन १५६५ में बनना शुरू हुआ और इसे बनाने में साथ साल लगे | इसे बनवाने कि जिम्मेदारी कासिम खान को सौपी गयी जो कि अकबर की सेना का मुख्य गवर्नर था | इस इमारत को बनाने में 35 लाख रूपये लगे थे | प्रसिद्ध साहित्यकार अबुल -फजल ने इस के बारे में कहा है कि इस किले में कम से कम 500 इमारते थी , लेकिन दुर्भाग्यवश अब कुछ ही इमारते बच गयी है नादिरशाह के आक्रमण में इस किले को नष्ट करने की कोशिश की गयी , फिर मराठो तथा जातो ने हमला किया कुछ राजाओं ने तो ताज तथा ने मुग़ल इमारतो में ''भूसा ' भर दिया था |
''अमर सिंह गेट ''
किले के दक्षिण तरफ यह गेट स्थित है जो आम जनता के लिए खुला है | अमर सिंह गेट बादशाह , शाहजहाँ द्वारा बनवाया गया था | इसका नाम राजपूत के बहादुर राव अमर सिंह राठौर जो कि जोधपुर के राजा था , उनके नाम पर रखा गया था | वो शाहजहाँ के दरबार के मान सबदर थे | सन १६४४ में सलाबत खान , राज्य के रक्षक अमर सिंह राठौर की बेइज्जती की , इसलिए गुस्से में आकर उन्होंने सलाबत खान का क़त्ल कर दिया , वो भी मुगलों के दरबार में | इस कारण मुग़ल सेना उनके खिलाफ हो गयी | इस कारण वो अपने घोड़े पर सवार होकर किले की दीवारों की ओर दौड़ते हुए उन्हें फाँद कर जहाँ छलाँग मारी वही अमर सिंह गेट का निर्माण हुआ उन्होंने वो खाई अपने घोड़े की मदद से पार की , जो कि उसे कुछ किलोमीटर तक ही साथ दे पाया , यह घटना सिकन्दरा के पास हुई | घटना को तजा रखने के लिए यहाँ एक घोड़े का बुत बनवा कर उसे स्थापित किया गया दूसरा गुरु ताल और सिकन्दरा के बीच , जहाँ उस घोड़े की मौत हुई थी | आज उस घोड़े का बुत अपनी गर्दन के बगैर आज भी मौजूद है , यह गर्दन अब भी आगरा किले के म्यूजियम में मौजूद है |