Friday, January 17, 2020

आजादी के पहले दिन रहे भूखे

राष्ट्रपुरुष चंद्रशेखर
आजादी के पहले दिन रहे भूखे
देश का बटवारा हुआ | हालाकी बाहरी दुनिया की घटनाओ के प्रति मैं बहुत सचेत नही था , लेकिन मानसिक रूप से मुझे बहुत दुख पहुचा | जो सयुकत परिवार से आया है , उसे परिवार का टूटना बुरा लगेगा ही | यह देश का टूटना था , इससे तकलीफ होनी स्वाभाविक थी | अनेक लोग कहते है कि सुभाषचंद्र रहते तो इस बटवारे को रोकते | मैं यह तो नहीं कहता की वे बटवारा रोक सकते थे , लेकिन वे प्रबल विरोध जरूर करते | गांधी जी भी इसके विरोधी थे | लेकिन सरदार पटेल , मौलाना आजाद और जवाहर लाल ने ऐसी परिस्थितिया पैदा कर दी थी की सबने विवशता मे बटवारे का विचार किया | अब 15 अगस्त । 1947 को आजादी आई तो अपने दोस्तो के साथ मैं बलिया मे था | उस दिन जलूस निकला था | मेरे साथ थे , गौरीशंकर राय और पारसनाथ मिश्र | शायद विश्वनाथ चौबे भी थे | हम लोग जलूस मे शामिल नही थे | सिर्फ अगल - बगल से देख रहे थे | जब दोपहर हो गयी तो हमे भूख लगी | लेकिन हमारे पास खाने के लिए पैसे नही थे | मैंने सोचा की यह कैसी आजादी आई की पहिले ही दिन भूखा रहना पड़ रहा है | शायद यह एक संकेत था की यह आजादी क्या लेकर आने वाली है | बाद मे हमे किसी मंत्री के एक सचिव मिल गए | बलिया के सुखपुर गाँव के थे ,पारसनाथ जी के परिचित थे | उन्होने पैसे दिये तो हम लोगो ने खाना खाया | जब गांधी की हत्या की गयी तो बड़ी तीव्र प्रतिकृया हुई | लोग हिन्दू महासभा और आर एस एस के सदस्यो पर हमला करने के लिए तैयार थे | हमारे यहाँ डा गुरु हरख सिंह जी थे | वे एक जाने - माने चिकित्सक थे | उन्ही के यहाँ हिन्दू महासभा के नेता महंत दिग्विजयनाथ जी ठह्र्रते थे | उनके घर पर हमला करने के लिए भीड़ जाने वाली थी | गौरीशंकर राय और मुझे यह खबर लगी तो हमने कुछ साथियो के साथ मिलकर यह घोषणा कर दी की किसी के घर पर कोई हमला नही करेगा , हालाकी हम लोग आर एस एस के बहुत खिलाफ थे | इस इलाके मे हम युवाओ का इतना दबदबा या असर था की किसी तरह का कोई हमला नही हुआ | हमारा कहना था की जो लोग हत्या से नही जुड़े है उन पर हमला गलत है | गांधी को जिसने मारा वह होगा कोई आर एस एस वाला , लेकिन उसके लिए आर एसे एस के पूरे समुदाय पर हमला गलत है |

Wednesday, January 15, 2020

गांधी जी का नाम 1940 मे सुना

राष्ट्रपुरुष चंद्रशेखर

गांधी जी का नाम 1940 मे सुना

उन्ही दिनो मैं आर्यसमाज के गहरे संपर्क मे आया | मऊ का आर्यसमाज मंदिर काफी सजग और सचेत था | आर्यसमाज के लोग राष्ट्रीय आंदोलनो से बहुत ही गहरे जुड़े हुये थे | वही पर मैंने आर्यसमाजियों के साथ पहले पहल प्रभात फेरिया निकाली | राष्ट्रीय भावना के बारे मे मैं आर्यसमाज के कारण ही सचेत हुआ | एक और कारां था । 1940 का व्यक्तिगत सत्याग्रह | मेरे गाँव के एक समछ्बीला सिंह मेरे चाचा थे | उन्होने मेरे दरवाजे पर ही सत्याग्रह किया | उन दिनो मेरे लिए आजादी का मतलब थोड़ा - बहुत स्पष्ट हो चुका था | लोगकहते थे की अंग्रेज़ चले जाएँगे तो देश से गरीबी चली jaayegi | angrej देश को लूट रहे है | इस एहसास की वझ से मैं सत्याग्रह से अपना लगाव महसूस करता था | उन्ही दिनो मैंने कांग्रेसकी पहली मीटिंग देखि थी | सुंदर व्यक्तित्व ए एक युसुफ कुरेशी थे | वे बहुत अच्छा गाते थे | सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है , देखना है ज़ोर कितना बाजू -ए - कातिल मे है | तब मेरी पहचान के दूसरे सत्याग्रही थे अवध बिहारी पाण्डेय जी पास के सुलगनीपुर गाँव के थे | पाण्डेय जी जाने - माने कांग्रेसी नेता थे | पहली बार गांधी जी का नाम मैंने 1940 मे ही सुना होगा | हो सकता है , उससे पहले भी सुना हो | गांधी जी को देख नही पाया | उनके बारे मे उत्सुकता बहुत थी | वे वे जेबी बिहार जाने वाले थे तो उनके दर्शन के लिए मैं पटना जाने को तैयार था ,लेकिन जा नही पाया |

ऐसी थी वह बेबसी , एक अभाव की जिन्दगी | राष्ट्रपुरुष चन्द्र्शेखर

राष्ट्रपुरुष चन्द्र्शेखर

पढ़ने के लिए रोज पैदल जाता था दस किलोमोटर
ऐसी थी वह बेबसी , एक अभाव की जिन्दगी |

ज़िंदगी की जो पहली घटना जो मुझे याद है वह 1934 की है | उसी साल भूकंप आया था | 1934मे सात वर्ष की उम्र मे पहली बार स्कूल गया | उसके पहले ननिहाल मे था एक मुंशी दयाशंकर जी थे ए मुझे पकड़कर स्कूल ले ज्ञे थे | वह ज़िंदगी का पहला दृश्य था , जो मुझे याद है | दूसरी घटना भूकम्प से जुड़ी है | मेरे गाँव को भूकम्प का मामूली झटका लगा था | मैं सुनता था कि दूसरी जघो पर बहुत लोग मरे है |
मुंशी दयाशंकरमुझे पहली बार जिस स्कूल मे ले गए थे , वह इब्राहिम पट्टी का पुराना प्रामरी स्कूल था | मेरे बड़े भाई ने भी वही से पढ़ाई की थी | वह स्कूल चौथे दर्जे तक था | उस समय दर्जा चार तक ही प्राइमरी स्कूल होता था | दर्जा पाँच पढ़ने के लिए मैं भीमपुरा गया | प्राइमरी स्कूल मे मेरे पहले शिक्षक वंशीधर मिश्र थे , जिनहे मैं मोटका पंडित जी कहते थे | उन्होने मुझे वर्णमाला सिखाई | बाबू परमेश्वरी सिंह उसी स्कूल मे प्र्धानाचार्य थे | वे मेरी पत्तिदारी के थे | स्कूल के ही नही बल्कि सारे गाँव और इलाके के लड़के उनका बहुत सम्मान करते थे | उनके पुत्र देवेन्द्रनाथ सिंह ( रामसूरत सिंह ) मेरे सहपाठी थे | अब वे नही रहे | लेकिन आरम्भिक शिक्षको मे जिंका प्रभाव मेरे ऊपर सबसे ज्यादा पड़ा , वे काशीनाथ मिश्र थे | स्कूल से उनका घर 4-5 किलोमीटर दूर था | एचएम लोगो को दर्जा चार मे पढ़ाते थे | 5 बजे छुट्टी करके अपने घर जाते थे | 8 बजे रात मे लौटकर फिर से हमे पढ़ाते थे | इस त्राह लालटेन की धीमी रोशनीमे मेरी पढ़ाई की शुरुआत हुई | पढ़ाई मे मेरी काफी रुचि थी | प्राइमेरी स्कूल मे मैं पढ़ने मे सबसे अच्छा था | प्राइमेरी के बाद मिडिल स्कूल भीमपुरा का मेरे घर से 10-11 किलोमीटर दूर था | मैं रोज पैदल यह दूरी तय करता था | सवेरे या रात का बना बासी खाना खाकर स्कूल जाता था | दिन मे खाने के लिए चना - चबेना साथ मे ले जाता था | उन्हे भड़भूजे के यहाँ भुजवाता था || वही मेरा डोफार का भोजन था घर लौटते हुये शाम हो जाती थी | उस सामी के मेरे सहपाठियो मेन ऋषिदेव सिंह , देवेन्द्र सिंह तथा बुद्धू शाह थे | ऋषिदेव सिंह एचएम लोगो से बड़े थे | कक्षा मे भी आगे थे | पढ़ाई मे उनकी दिलचस्पी नही थी | उनके पिता प्रसिद्ध नारायण सिंह मेरे गाँव के सबसे बड़े जमींदार थे | उनका स्वभाव मनमौजी किस्म का था | देवेन्द्र जी की रुचि पढ़ाई मे बहुत कम थी | दूरी की वीजेएच से हमे उल पाहुचने मे अक्सर देर हो जाती थी | ऋषिदेव इनह हमे सलाह देते की अब तो देर हो गयी जाएँगे तो बहुत मार पड़ेगी | इसलिए अक्सर हम लोग भीमपुरा के पास एक बगीचे मे बैठ जाते थे | वहाँ दिन भर खेलते और शाम को घर लौट आते थे | साथ मे लाये हुये चावल और चना चिड़ियो को खिला देते | घर आकार कहते थे की स्कूल से आ रहे है | इस तरह बहानेबाजी मे 8-10 दिन बीत ज्ञे | मैंने सोचा की अगर रोज स्कूल नही जाऊंगा तो पढ़ूँगा कैसे ? ऋषिदेव जी ने मुझे डराया की इतने दिन बाद जाओगे तो सजा मिलेगी | इस पर मैंने उनसे कहा की अब चाहे सजा ही कायो न मिले लेकिन मैं तो स्कूल जाऊंगा | उसके बाद मैं स्कूल जाने लगा | लेकिन ऋषिदेव जी ने पढ़ाई छोड़ दी |
मिडिल स्कूल जाने का हमारा रास्ता एक पगडंडी भर था | अगर देर हो जाती तो इस पगडंडी पर दौड़ते हुये मैं स्कूल पाहुचता था | मेरे पास जूते नही थे | रास्ते मे एक फरही नाला था | इसमे बरसात के डीनो मे पानी भर जाता | रास्ता रुक जाने के बाद बरसात मे 10-15 दिन एचएम स्कूल के बोर्डिंग हाउस मे रह जाते थे | उन डीनो की एक पीड़ा मैं कभी भुला नही सका | मेरी जांघ मे एक फोड़ा हो गया | सारी जांघ फूल कर लाल हो ज्ञी | बीच मे उभरी हुई जगह के अंदर असहनीय दर्दठा | गाँव मे कोई डाक्टर नही था | पास के गाँव से एक पंडित रछपाल ही उन्होने कहा सारी आंघ मवाद से भरी है इसे निकालना होगा | एक चिरा लगाना होगा | बिना कोई सावधानी बरते दो लोगो ने मेरे हाथ कड़े और दो ने पैर | नाई के छुरे से उन्होने चिरा लगा दिया | केवल एक सावधानी बरती की छुरे को नीम की पत्तियों के साथ उबाल उसके बाद एक महीने तक साफ कपड़े को नीम की पत्तियों को उबाल कर घाव मे डालते रहे | घाव डॉ से भर्ता या और फोड़ा ठीक हो गया | उस माय जांघ मे जो जघ खराब हो ज्ञी थी उसका एक भाग आज भी गहरा है | उस आय मैं पैर मोड कर ही रखे रहता था , उसे सीधा करने मे डेढ़ महिना लगा | उपचार मे केवल सूअर के तेल की मालिश धूप मे करनी होती | बाद मे मेरे छोटे भाई बद्रीनारायण को ई ही ओग हुआ पर उस समय हालात बदल ज्ञे थे | उनका आपरेशन बलिया के अस्पताल मे हुआ | मैं उस समय इलाहाबाद मे पढ़ता था | उसे देखने के लिए बलिया आया | कुल चार आ छ उपये का खर्च | पर परिवार के लोग इससे दुखी हुये | ऐसी थी वह बेबसी , एक अभाव की जिन्दगी | भीमपुरा स्कूल मे हमारे शिक्षक भी रहते थे | इस उल मे 5वी -6वी और सातवी करने के एडी यही से मैंने अङ्ग्रेज़ी मे भी इडिल पास किया | उसके अतिरिकत मऊ के डी।ए वी मे नौवी नही थी | इसलिए 9-10 वी जीवनराम हाईस्कूल से पड़ी | मऊ मे मै अपने चाचा के मित्र प जटाशंकर पाण्डेय के साथ हा | इसी स्कूल से मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास किया | उन दिनो मेरे बड़े भाई रामनगीना सिंह रगुन मे रहते थे | वहाँ कोई नौकरी करते रहे होंगे | 20-25 रुपए आता रहा होगा | वे थोड़ा बहुत पैसा ही वो भेज पाते थे | उसी से काम चलता था |

Friday, January 10, 2020

प्रथम महिला छाताधारी ----डा गीता घोष

प्रथम महिला छाताधारी ----डा गीता घोष

17 जुलाई , 1959 का एक अविस्मर्णीय दिन ! भारतीय महिलाओ की एक और छ्लांग - ऐसी छ्लांग , जो उचाइयों को छूनेवाली सभी पूर्व छ्लांगों से भिन्न थी | भिन्न ई नही अद्दितीय भी --- इस रूप मे की यह छ्लांग ज्ञान - विज्ञान की किसी उचाई को छूने के लिए धरती से आकाश की तरफ नही वरन आकाश मे बहुत उचाई से उठकर वहाँ से धरती की तरफ , धीरे - धीरे शान से , साहस से उतरने की छ्लांग थी | भारतीय वायु सेना की एक डाक्टर कुमारी गीता घोष चांदा ने उस दिन यह छ्लांग लगाकर भारतीय महिलाओ की प्रगति के इतिहास मे एक पन्ना और जोड़ दिया | डा गीता घोष पहली भारतीय महिला है जिनहोने वायुयान से छ्तृ द्वारा उतरने का साहसिक अभियान किया था | इस प्रथम ऐतिहासिक कूद के एक दिन पूर्व ही मौसम खराब हो गया था | सारी रात बहुत बारिश होती रही | इतनी तूफानी हवाए चली मानो परकृति भी एक कोमलांगी के ऐसे पुरुषोचित प्रयास को चुनौती दे रही हो | दूसरे दिन सुबह आकाश के घ्तातोपके वावजूद आग्रा हवाई अद्देपर बहुत से लोग इकठ्ठा हो गए थे -- यह देखने के लिए की एक महिला कैसे छ्तृ से उतरने का साहस करती है | पहली बार एक महिला की छ्तरी से कूद ! त्राह - त्राह की श्काए लोगो के मन मे उठ रही थी | उस पर मौसम का रंग देखकर यह शंका और प्रबल हो उठी की या तो आज की कूद स्थगित हो जाएगी या कोई दुर्घटना हो जाएगी | आसमान का रंग अजीब था | कभी बादल घुमड़ आते , कभी हवा उन्हे इधर - उधर छितरा देती | वायु का ज़ोर कम होता फिर बढ़ जाता विंग कमांडर की आखे वायु के रुख एव्न उसकी गति मापने वाले यंत्र पर लगी थी | लोग प्रतीक्षा कर रहे थे | हवा की गति 'पहली कूद ' के अनुकूल नही हो पा रही थी | किन्तु यह क्या ? हवाई जहाज से एक छ्तरी निकली , फिर दूसरी ,विंग कमांडर ने कूदने का आदेश दे दिया था | खतरा न उठाए , डबल्यूएच छाताधारी कैसा ? दूसरी छ्तरी पर अधिक आखे लगी थी | जब तक पैराशूट की डोरिया खुली , उन तीन सेकेंड मे जैसे हवा भी देखने के लिए थम ज्ञी थी | दूसरे ही पल हवा मे लहराती गुड़िया के समान धीरे धीरे उयत्रकार डा गीता जमीन पर आ ज्ञी | उनके जमीन छूने पर जेबी एकाएक कोई हलचल नही हुई तो दर्शको की सांस एक बार फिर रुक ज्ञी , पर अगले क्षण ही पैराशूट से सावन को मुकटकर हसती गीता दर्शको की तरफ बढ़ी और साथ ही बज उठी सैकड़ो हजारो हाथो की तालिया | तालियो के बीच डा गीता ने विशेष मुद्रा के साथ अभिवादन कर अपनी पूर्ण सफलता का संकेत दिया और उसी तरह शांत गंभीर सी एक ओर खड़ी हो गयी |

Sunday, January 5, 2020

मेहनतकशो का चहेता शायर :मख्दूम

मेहनतकशो का चहेता शायर :मख्दूम
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मेहनतकशो के चहेते इंकलाबी शायर मख्दूम मोहिउद्दीन का शुमार हिन्दुस्तान में उन शख्सियतो में होता है , जिन्होंने अपनी पूरी जिन्दगी आवाम की लड़ाई में गुजार दी | उन्होंने सुर्ख परचम तले आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी की और आजादी के बाद भी उनकी ये लड़ाई असेम्बली व उसके बाहर लोकतांत्रिक लड़ाइयो से जुडी रही , आजादी की तहरीक के दौरान उन्होंने न सिर्फ साम्राजी अंग्रेजी हुकूमत से जमकर टक्कर ली बल्कि आवाम को सामंतशाही के खिलाफ भी बेदार किया | मख्दूम एक साथ कई मोर्चो पर काम कर सकते थे , गोया कि , किसान आन्दोलन ,
दरेड यूनियन , पार्टी और लेखक संघ के संगठनात्मक कार्य सभी में वे बढ़ --चढ़कर हिस्सा लेते और इन्ही मशरुफियतो के दौरान उनकी शायरी परवाज चढ़ी अदब और सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष रत नौजवानों में मखदूम की शायरी इन्ही जन संघर्षो के बीच पैदा हुई थी |
मख्दूम ने जागीरदार और किसान ,
सरमायेदार -- मजदूर , आका -- गुलाम और शोषक -- शोषित की कशमकश और संघर्ष को आपनी नज्मो में ढाला | ये वह दौर था जब किसान और मजदूर मुल्क में इकठ्ठे होकर अपने हुकुक मनवाने के लिए एक साथ खड़े हुए थे | मख्दूम की कौमी नज्मो का कोई सानी नही है | जलसों में जब कोरस की शक्ल में उनकी नज्मे गई जाती तो एक शमा बंध जाता , हजारो लोग आंदोलित हो उठते | मख्दूम की एक नही कई नज्मे
ऐसी है जो आवाम में समान रूप से मकबूल है मसलन हिन्दुस्तान की जय | '' वो हिन्दी नौजवान यानी अलम्बरदार-- ए -- आजादी \ वतन का पासबा वो तेग -- ए -- जौहर दार -- ए आजादी | उनकी नज्म ये जंग है जंग -- ए -- आजादी के लिए ने तो उन्हें हिन्दुस्तानी आवाम का महबूब और मकबूल शायर बना दिया | आज भी कही मजदूरों का कोई जलसा हो और उसमे इसे न गाया जाए ऐसा शायद ही होता है | नज्म की वानगी देखे -- '' लो सुर्ख सबेरा आता है आजादी का , आजादी का \ गुलनार तराना गाता है आजादी का , आजादी का \ देखो परचम लहराता है आजादी का '' , इन नज्मो से जब हजारो आवाजे समवेत होती है तो सभा गूंज उठती है , प्रगतिशील
लेखक संघ के संस्थापक , लेखक , संगठनकर्ता सज्जाद जहीर मख्दूम की नज्मो और दिलकश आवाज पर जैसे फ़िदा ही थे , लो सुर्ख सबेरा आता है ' की तारीफ़ में सज्जाद जहीर ने लिखा है | यह तराना हर हर उस गिरोह और मजमे में आजादी चाहने वाले संगठित आवाम के बढ़ते हुए कदमो की आहात , , उनके दिलो की पुरजोश धडकन और उनके गुलनार भविष्य की रंगीनी पैदा करता था जहा ये तराना उस जमाने में गाया जाता था | ''
4 फरवरी साल 1908 में तेलगाना क्षेत्र के छोटे से गाँव अन्दोल में पैदा हुए अबू सईद मोहम्मद मख्दूम मोहिउद्दीन कुद्री उर्फ़ मख्दूम के सिर से महज चार साल की उम्र में ही पिता का साया उठ गया | चाचा ने उनको पला पोसा | बचपन से संघर्ष का जो पाठ उन्होंने पढ़ा वह जिन्दगी
भर उनके काम आया | पढ़ाई पूरी करने के बाद मख्दूम नौकरी के लिए काफी भटके , आखिरकार हैदराबाद के सिटी कालेज में उर्दू पढ़ाने के लिए उनकी नियुक्ति हुई लेकिन उनका मन आन्दोलन और शायरी में ही ज्यादा रमता , गुलाम वतन में उनका दिल आजादी के लिए तडपता , किसानो और मजदूरो के दुःख -- दर्द उनसे देखे नही जाते थे | गुलाम हिन्दुस्तान में सामन्तीय निजाम की बदतरीम विकृतिया हैदराबाद में मौजूद थी | जाहिर है कि मख्दूम के सामने हालात बड़े दुश्वार थे और इन्ही हालातो में से उन्हें अपना रास्ता बनाना था | मख्दूम के युवाकाल का दौर वह दौर था जब मुल्क में ही नही दुनियावी स्तर पर उथल -- पुथल मची हुई थी | दुनिया पर न सिर्फ साम्राज्यवाद का खतरा मडरा रहा था | बल्कि
फासिज्म का खतरा भी सिर उठाने लगा था | हिन्दुस्तान के पढ़े -- लिखे नौजवान आजादी के साथ -- साथ ऐसे रास्ते की तलाश में थे जो समाजवाद की ओर ले जाए |उस वक्त मुल्क और दुनिया में साम्राज्यवाद और फासिज्म के नापाक गठजोड़ के खिलाफ तरक्की पसंद हलको के मोर्चे की बहुत चर्चा थी | जाहिर है कि मख्दूम भी इस मोर्चे की तरह आकर्षित हुए | लखनऊ के ग्रुप यानी प्र्ह्तिशील लेखक संघ से उनका मेल -- जोल बधा प्रलेस में आने के बाद मख्दूम की सोच में और निखार आया | उनकी कलम से साम्राज्यवाद विरोधी नज्म आजादी -- ए -- वतन वसामन्तवाद विरोधी हवेली , मौत के गीत जैसी रचनाये निकली | बहरहाल ,
मख्दूमके बगावती जेहन ने आगे चलकर उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी और आन्दोलनों की राह पर ला खड़ा किया | 1930 के दशक में हैदराबाद में कामरेड एसोसिएशन का गठन हुआ | मख्दूम इससे शुरू से जुड़ गये , कामरेड एसोसिएशन के जरिये मख्दूम कम्यूनिस्टो के सम्पर्क में आये |
1936 नव वव बाकायदा पार्टी मेंबर बन गये | हामिद अली खादरी , इब्राहिम जलीस , नियाज हैदर , शाहिद सिद्दीकी ,श्रीनिवास लाहौरी , कामरेड राजेश्वर राव , सैय्यद आजम , गुलाम हैदर मिर्जा और राजबहादुर गौड़ आदि के साथ आगे चलकर उन्होंने काम किया | 1939 में दुसरी
आलमी जंग छिड़ने के बाद मुल्क में मजदुर वर्ग के आंदोलनों में बड़ी तेजी आई | मख्दूम भी ट्रेड यूनियन आंदोलनों में शामिल हो गये | मजदूरो के बीच काम करने के लिए तो उन्होंने सिटी कालेज की नौकरी से इस्तीफा तक दे दिया और पूरी तरह से ट्रेड यूनियन की तहरीक से जुड़ गये | हैदराबाद की दर्जनों मजदुर यूनियन की रहनुमाई मख्दूम एक साथ किया करते थे | आगे चलकर वे 100 से ज्यादा यूनियनों के संस्थापक अध्यक्ष बने |
आलमी जंग की जब शुरुआत हुई तो मुल्क की आवामी तःरीको पर भी हमला हुआ | लेकिन इन हमलो ने तहरीक को कमजोर करने की बजाए और भी मजबूत किया | साम्राजी त्बाह्कारी और हिंसा व
अत्याचार के माहौल को फैज और मख्दूम ने अपनी नज्मो में बड़े पुरअसर अंदाज में अक्कासी की | साम्राजी जंग के दौर में मुश्किल से आधी दर्जन ऐसी नज्मे कही गयी होंगी जिनसे जंग की असल हकीकत वाजेह होती है और उनमे भी आधी से ज्यादा मख्दूम की है | मसलन जुल्फ - ए - चलीपा , सिपाही , जंग और अन्धेरा |
'' जंग ' पर उनकी तकीद . सिपाही ' नज्म के अन्दर देखिये -----
'' कितने सहमे हुए है नजारे \
कैसे डर -- डर के चलते है तारे \
क्या जवानी का खू हो रहा है \
सूखे है आंचलो के किनारे \
जाने वाले सिपाही से पूछो \
वो कहा जा रहा है ? ......
वही अपनी '' जंग '' नज्म में मख्दूम ने कहा '' निकले धाने टॉप से बरबादियो के राग --बागे
जहा में फ़ैल गयी दोजखो की आग | '' '' जंग '' नज्म उनकी महली सियासी नज्म
थी और फासिज्म के खिलाफ तो ये उर्दू शायरी की पहली सदा -- ए -- एहतेजाज थी |
आजादी की तहरीक के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने के जुर्म
में मख्दूम कई मर्तबा जेल भी गये पर उनके तेवर नही बदले | अंग्रेजी सरकार का जब ज्यादा दबाव बना तो उन्होंने अंडर -- ग्राउण्ड रहकर पार्टी और यूनियनों का काम किया | हिन्दुस्तान की आजादी के बाद भी मख्दूम का संघर्ष खतम नही हुआ | आन्ध्रा में जब तेलगाना के लिए किसान आन्दोलन शुरू हुआ तो मख्दूम फिर केन्द्रीय भूमिका में आ गये | तेलगाना के सशस्त्र संघर्ष में उन्होंने प्रत्यक्ष भागीदारी की | आन्ध्रा और तेलगाना में किसानो को जागृत करने के लिए मख्दूम ने जमकर काम किया | यही नही बाद वे चुनाव भी लादे और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट से असेम्बली भी
पहुँचे | मख्दूम अपनी उम्र के आख़री तक पार्टी की नेतृत्वकारी इकाइयों में बने रहे , मेहनतकशो के लिए उनका दिल धडकता था | मजदुर यूनियन ऐटक के जरिये वे मजदूरो के अधिकारों के लिए हमेशा संघर्षरत रहे | कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व अध्यक्ष कामरेड डांगे ने मख्दूम की शायरी के बारे में कहा था | '' मख्दूम शायरे इन्कलाब है मगर वह रूमानी शायरी से भी दामन नही बचाता बल्कि उसने जिन्दगी की इन दोनों हकीकतो को इस तरह जमा कर दिया है की इंसानियत के लिए मोहब्बत को इन्कलाब के मोर्चे पर डट जानी का हौसला है | ''
कुल मिलाकर मख्दूम मोहिउद्दीन ने न सिर्फ आजादी की तहरीक में हिस्सेदारी की बल्कि अपने तई साहित्यिक और सांस्कृतिक दुनिया को भी आबाद किया | आवामी थियेटर में मख्दूम के गीत जाए जाते | किसान मजदूरो के बीच जब इन्कलाबी मुशायरे होते तो मख्दूम उसमे पेश -- पेश होते | अली सरदार जाफरी , जोश मलीहाबादी , मजाज , मजरुह सुलतान पूरी , कैफ़ी आजमी के साथ मख्दूम अपनी नज्मो से लोगो में एक नया जोश फूंक देते | उनकी आवामी मशरूफियत ज्यादा थी लिहाजा पढ़ना -- लिखना कम हो पाटा था लेकिन उन्होंने जितना भी लिखा , वह अदबी शाहकार है | सुर्ख सबेरा , गुले तर और बिसाते रक्श मख्दूम के काव्य संकलन है जिसमे उनकी नज्म व गजल संकलित है | मख्दूम की मशहूर नज्मे फिल्मो में इस्तेमाल हुई | जिन्हें आज भी उनके चाहने वाले गुन -- गुनाते है , मसलन , आपकी याद आती रही रात भर ( गमन ) फिर छिड़ी रात्बत फूलो की ( बाजार ) एक चमेली के मडवे तले | मेहनतकशो के शोषण और पीड़ा को आवाज देने वाले आवामी शायर मख्दूम ने २५ अगस्त 1969 को इस दुनिया से रुखसती ली | मशहूर फिल्मकार ख्वाजा अहमद अब्बास ने मख्दूम के बारे में क्या खूब कहा है "" मख्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंठी बुँदे भी , वे क्रान्ति के आवाहक थे और पायल की झंकार भी | वे कर्म थे , प्रज्ञा थे , वे क्रान्तिकारी छापामार की बन्दूक थे और संगीतकार का सितार भी वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी | ''
प्रस्तुती सुनील दत्ता .....साभार--------जाहिद खान अभिनव कदम

Saturday, December 28, 2019

अभी भी एक काँटे का ज़ख्‍़म हँसता है

अभी भी एक काँटे का ज़ख्‍़म हँसता है
(उस आदमी के नाम जिसके जन्‍म से कोई संवत शुरू नहीं होता)
वह बहुत देर तक जीता रहा
कि उसका नाम रह सके
धरती बहुत बड़ी थी
और उसका गाँव बहुत छोटा
वह सारी उम्र एक ही छप्‍पर में सोता रहा
वह सारी उम्र एक ही खेत में हगता रहा
और चाहता रहा
कि उसका नाम रह सके
उसने उम्र भर बस तीन ही आवाजें सुनीं
एक मुर्गे की बांग थी
एक पुशओं के हाँफने की आवाज
और एक अपने ही मसूड़ों में रोटी चुबलाने की
टीलों की रेशमी रोशनी में
सूर्य के अस्‍त होने की आवाज उसने कभी नहीं सुनी
बहार में फूलों के चटखने की आवाज उसने कभी नहीं सुनी
तारों ने कभी भी उसके लिए कोई गीत नहीं आया
उम्र भर वह तीन ही रंगों से बस वाकिफ रहा
एक रंग जमीन का था
जिसका कभी भी उसे नाम न आया
ए करंग आसमान का था
जिसके बहुत से नाम थे
लेकिन कोई भी नाम उसकी जुबान पर नहीं चढ़ता था
एक रंग उसकी बीबी के गालों का था
जिसका कभी भी उसने शर्माते हुए नाम न लिया
मूलियां वह‍ जिद से खा सकता था
बढ़कर भुट्टे चबाने की उसने कई बार जीती शर्त
लेकिन खुद वह बिन शर्त ही खाया गया
उसके पके हुए खरबूजों जैसे उम्र के साल
बिना चीरे ही निगले गए
और कच्‍चे दूध जैसी उसकी सीरत
बड़े स्‍वाद से पी ली गई
उसे कभी भी न पता चल सका
वह कितना सेहतमन्‍द था
और यह लालसा कि उसका नाम रह सके
शहद की मक्‍खी की तरह
उसके पीछे लगी रही
वह खुद अपना बुत बन गया
लेकिन उसका बुत कभी भी जश्‍न न बना
उसके घर से कुएँ तक का रास्‍ता
अभी भी जीवित है
लेकिन अनगिनत कदमों के नीचे दब गए
लेकिन कदमों के निशान में
अभी भी एक काँटे का ज़ख्‍़म हँसता है
अभी भी एक काँटे का ज़ख्‍़म हँसता है
- पाश

Sunday, November 10, 2019

भगत सिंह की वैचारिक विरासत -

भगत सिंह की वैचारिक विरासत -
भगत सिंह ने अपने समय के राष्ट्रीय आन्दोलन पर जो आलोचनात्मक टिपण्णी की थी अपने देश काल की जमीन पर खड़े होकर उन्होंने भविष्य की सम्भावनाओं के बारे में जो आकलन प्रस्तुत किया था , कांग्रेसी नेतृत्व का जो वर्ग विश्लेषण किया था , देश की मेहनतकश जनता के सामने छात्रो - युवाओं के सामने और सहयोद्धा क्रान्तिकारियो के सामने क्रान्ति की तैयारी और मार्ग की उन्होंने जो नई योजना प्रस्तुत की थी , उसका आज के स्न्कत्पूर्ण समय में बहुत अधिक महत्व है | जब पूरा देश देशी - विदेशी पूँजी की निर्वाध लूटऔर निरंकुश वर्चस्व तले रौदा जा रहा है , जब श्रम और पूँजी के बीच ध्रुवीकरण ज्यादा से ज्यादा तीखा होता जा रहा है , जब साम्राजय्वाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष ( जिसकी भगत सिंह ने भविष्यवाणी की थी ) विश्व स्टार पर ज्यादा से ज्यादा अवश्यम्भावी बनना प्रतीत हो रहा है , जब कांग्रेस ही नही सभी संसदीय पार्टियों और नकली वामपंथियो का चेहरा और पूरी सत्ता का चरित्र एकदम नगा हो चुका है | भगतसिंह की आशंकाए एकदम सही साबित हो चुकी है और भारत की मेहनतकश जनता व क्रांतिकारी युवाओं को साम्राजय्वाद और देशी पूंजीवाद के विरुद्ध एक नई क्रान्ति की तैयारी के जटिल कार्य के नये सिरे से सन्नद्ध हो जाने का समय अ चुका है भगत सिंह के समय के भारत से आज का भारत काफी बदल चूका है | उत्पादन प्रणाली से लेकर राजनितिक व्यवस्था , सामाजिक सम्बन्ध और संस्कृति तक के स्टार पर चीजे काफी बदल गयी है \ साम्राज्यवादी शोषण -उत्पीडन आज भी मौजूद है , लेकिन प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के दौर से आज इसका स्वरूप काफी बदला है | वर्ग संघर्ष विगत सर्वहारा क्रांतियो और राष्ट्रीय मुक्ति युद्दो के दबाव के चलते तथा अपने भीतर के आंतरिक दबावों के फलस्वरूप साम्राज्यवाद के तौर तरीको में काफी बदलाव आये है | गाँवों में भी बुजुर्वा भूमि सुधारों की क्रमिक प्रक्रिया ने भूमि सम्बन्धो को मुल्त: बदल दिया है और नये पूंजीवादी भूस्वामी तथा पूंजीवादी फार्मर बन चुके है | भूतपूर्व धनी काश्तकार आज गाँव के मेह्नात्क्शो और छोटे - मझोले किसानो के शोषक की भूमिका में है | मझोले किसानो की भूमिका दोहरी बन चुकी है तथा गाँव के गरीबो को लुटने में देशी -विदेशी वित्तीय एवं औध्योगिक पूँजी की प्रत्यक्ष भूमिका बन रही है | निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत जैसी अगली कतारों के भुँत्पुर्व औपनिवेशिक देश आज पिछड़े पूंजीवादी देश बन चुके है | अब इन देशो के इतिहास के एजेंडे पर राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष नही बल्कि समाजवाद के लिए संघर्ष है | लेकिन इन महत्वपूर्ण परिवर्तनों के वावजूद साम्राज्यवाद के विरुद्ध युद्ध अभी जारी है और जैसा कि फाँसी से तीन दिन पहले पंजाब के गवर्नर को फाँसी के बजाए गोली से उडाये जाने की मांग करते हुए लिखे गये अपने पात्र में भगत सिंह , राजगुरु , सुखदेव ने लिखा था : ''यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक की शकतीशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे | चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक अथवा सर्वथा भारतीय ही हो | उन्होंने आपस में मिलकर एक लुट जारी कर राखी है | यदि शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थित में कोई फरक नही पड़ता |'' इस पत्र के अनत में विश्वासपूर्वक यह घोषणा की गयी थी कि ''निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप से लड़ा जाएगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा | साम्राजय्वाद व पूंजीवाद कुछ समय के मेहमान है | यहाँ भगत सिंह की इस प्रकार इतिहास दृष्टि से हमारा साक्षात्कार होता है जो राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को जनमुक्ति - संघर्ष की इतिहास यात्रा के दौरान बीच का एक पड़ाव मात्र मानती थी और साम्राजय्वाद - पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष को ही अंतिम निर्णायक संघर्ष मानती थी | भगत सिंह ने कई स्थानों पर इस बात पर बल दिया है कि इस निर्णायक विश्व ऐतिहासिक महासभा का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ही कर सकता है और पूंजीवाद का एक मात्र विकल्प समाजवाद ही हो सकता है | आज विश्व स्टार पर पूँजी और श्रम श्कतियो एक नये निर्णायक ऐतिहासिक युद्द के लिए आमने - सामने लामबंद हो रही है | तो भारत के युवाओं और मेह्नात्क्शो के लिए साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के भविष्य के बारे में आकलन और भविष्यवाणी का विशेष महत्व हो जाता है | भगत सिंह , भगवतीचरण वोहरा और हिदुस्तान शोसलिस्ट रिपब्लिक असोसिएशन (एच,एस आ .ए ) के ने अग्रणी क्रान्तिकारियो का दृष्टिकोण भारतीय पूंजीपति वर्ग के बारे में एकदम स्पष्ट था | कांग्रेस के नेतृत्व को इन्ही पूंजीपतियों , व्यापारियों का प्रतिनिधि मानते थे और उनकी स्पष्ट धारणा थी कि राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व यदि कांग्रेस के हाथो में रहा तो उसका अनत एक समझौता के रूप में होगा और इसीलिए वह यह स्पष्ट संदेश देते है कि क्रान्तिकारियो के लिए आजादी का मतलब सत्ता अपर बहुसंख्य मेहनतकश वर्ग का काबिज होना न की लार्ड रीडिंग और लार्ड इरविन की जगह पुरुषोतम दास , ठाकुरदास अथवा गोर अंग्रेजो की जगह काले अंग्रेज का स्तासिं हो जाना | उनकी स्पष्ट घोषणा थी की यदि देशी शोषक भी किसानो -मजदूरो का खून चूसते रहेंगे तो हमारी लड़ाई जारी रहेगी |

साभार --- सामयिक कारवाँ के जुलाई -- दिसम्बर अंक से