Sunday, July 21, 2019

मेरठ बगावत के एक महीने बाद

तहरीके जिन्होंने जंगे - आजादी - ए - हिन्द को परवान चढाया

लहूँ बोलता भीं हैं


मेरठ बगावत के एक महीने बाद
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देघर बिहार के रोहणी में 12 जून 1857 को पांचवी देशी घुड़सवार सेना के कुछ जवानो ने बगावत कर दी | बिहार सूबे में सन 1857 की यह पहली वारदात थी | बागी सैनिको ने नौकरशाहों से बदला लेने के तहत मेजर मैकडोनाल्ड के घर रात 9 बजे अचानक हमला बोलकर वहां मौजूद लेफ्टिनेंट सर नार्मन लेसली और डाक्टर ग्रांट को तलवार से जख्मी करके मार डाला | इस हमले से बुरी तरह घायल मेजर मैकडोनाल्ड बच गया | इस अचानक हमले से अंग्रेज अफसर बौखला गये | सेना की जांच में बागी सैनिको की कयादत करने वाले के रूप में जो नाम सामने आया , वह मेजर इमाम खान का था | वक्ती तौर पर इमाम खान तो पकड़ में नही आये , लेकिन उनके साथ के टीम सैनिक सलामत अली , अमानत अली , और शेख हारून गिरफ्तार कर लिए गये जिन्हें मेहर मैकडोनाल्ड ने खुद ही कोर्ट मार्शल किया और सरकार से कोई आर्डरलिए बिना उन्हें फांसी का हुकम दे दिया | मेजर ने तीनो शहीदों को हाथी पर खड़ाकर पेड़ पर लटकाने के लिए खुद उनके गर्दन में रस्सी बाँधी और हाथी को दौड़ा दिया | इस तरह उन तीनो बहादुरों की सहादत हुई | लेकिन हर कोशिश के बाद भी मेजर इमाम खान को अंग्रेज गिरफ्तार नही कर पाए | सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर इनाम का एलान भी कर दिया | मेजर इमाम खान ने कुछ सैनिको को साथ लेकर देवघर में लेफ्टिनेंट एस सी ए कपूर के घर पर हमला बोलकर कपूर और असिस्टेंट कमिश्नर आर ई रोनाल्ड को मौत के घाट उतार दिया और बंगले में आग लगा दिया | इस हमले में मौजूद तीसरा अफसर ले रैनी घायल हालात में बच निकला | उसे दो सैनिक डोली में बिठाकर दूर एक गाँव में लेकर गये , जहां से उन्ही सैनिको की मदद से रैनी अपने हेडक्वाटर पहुचा | मेजर इमाम खान के बारे में इसके बाद कही कोई खबर नही मिलती | बिहार में सन 1857 की बगावत की कुछ किताबो में से सिर्फ एक जगह मेजर इमाम खान को गोली मारे जाने की बात कही गयी है , लेकिन तारीख और महीना वहां अंदाजन जुलाई सन 1857 लिखा गया है |
पार्ट - 2
भागलपुर में भी अक्तूबर सन 1857 की बगावत की खबर फैली | अंग्रेजी फ़ौज के अफसर सहादत अली का कत्ल हुआ , लेकिन उसके बाद बगावत को दबा दिया | इस कत्ल के इल्जाम में भागपुर के ही अह्दु खान वुद्घू खान , बहादुर खान , याद अली उम्र 16 साल गिरफ्तार किये गये | बगावत में हामिल होने और अंग्रेज अफसर के कत्ल के इल्जाम में चारो मुस्लिम शहीदों को 10 -12 अक्तूबर 1857 को फांसी दे दी गयी | इसी केस में पांच अन्य सैनिको को फांसी दे दी गयी |
पार्ट - 3
मुंगेर जिले के मोहनपुर गाँव में पठान जमींदारों ने अगस्त 1857 में अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ बगावत कर दी | उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करके कचहरी पे हमला कर दिया और सरकारी दस्तावेजो को लुट लिया साथ ही वहां पर आग लगा दिया | इस बगावत के इल्जाम में दस लोग गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया गया जिसमे क्रीम खान की पुलिस पिटाई से जेल में मौत हो गयी रज्जू खान को उम्रकैद की सजा हुई | इन पठानों के साथ गाँव के पांच और अन्य लोगो पर मुकदमा चला उनमे से दो को 14 - 14 और - को 9 - 9 साल की सजा हुई |

प्रस्तुती -- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
साभार -- सैय्यद शाहनवाज हमद कादरी

Saturday, July 20, 2019

होमरूल मूवमेंट

तहरीके जिन्होंने जंगे -आजादी -ए- हिन्द को परवान चढाया
लहूँ बोलता भी हैं
स्वदेशी आन्दोलन
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स्वदेशी आन्दोलन का मकसद था ब्रिटेन में बने सामानों का बाईकाट करना और भारत में बने सामानों को बढावा देकर ब्रिटेन को नुक्सान पहुचना था | इससे हिन्दुस्तानियों को अपने रोजगार का मौका भी मिला | उसी दौरान बंगाल में बंगाल के बटवारे के खिलाफ माहौल गरम होने लगा था | बंगाल के आसपास ये दोनों आन्दोलन एक साथ चले | इससे अंग्रेजो को बहुत नुक्सान हुआ | इस आन्दोलन की कामयाबी को देखते हुए इसके लिए बनाई गयी कमेटियो को महात्मा गांधी के कहने पर जंगे - आजादी के मूवमेंट को तेज करने के लिए कांग्रेस के साथ शामिल कर दिया गया | इस आन्दोलन को मौलाना अबुल कलाम आजाद , अरविन्द घोष रविन्द्रनाथ टैगोर , बाल गंगाधर तिलक की मुश्तरका कयादत माना जाता हैं | दिली और आसपास के इलाको में सैय्यद हैदर राजा की कयादत ने इस आन्दोलन को बखूबी अंजाम दिया | यह आन्दोलन 1905 - 1911 तक चला |
होमरूल मूवमेंट
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अंग्रेजो ने कांग्रेसी नेताओं और आंदोलनकारियो को यह यकीन दिलाया था कि पहली जंगे - अजीम जो की तब तक शुरू हो चुकी थी में अगर भारत के लोग मदद करते है , तो जंगे - अजीम के बाद ब्रिटेन भारत को आजाद कर देगा | इस लालच में उस वक्त कांग्रेस और बाकी तंजीम फंस गयी जो जंगे - आजादी का हिस्सा थी | इस पर पूरी कमेटी दो हिस्सों में बत्ती दिखाई देने लगी | एक गुर इससे मानने पर अदा हुआ था , लेकिन दुसरा गुट इसे ब्रिटेन की चाल समझता था इसलिए इसे मानने से इनकार करके आन्दोलन का दूसरा रास्ता खोजने पर जोर देता था | यही होमरूल मूवमेंट की वजह बनी | सन 1915-1916 के बीच होमरूल लीग बनी | पुणे में होमरूल लीग की कयादत बाल गंगाधर तिलक ने की जबकि मद्रास में होमरूल लीग एनीबेसेंट की कयादत में बनी | बाद में ये दोनों ही कांग्रेस के साथ मिल गयी | इस आन्दोलन का मकसद असलहो या खून -खराबे के बिना ही स्वराज हासिल करना था | इस आन्दोलन में मुसलमानों ने अहम् किरदार निभाया | हालाकि यह आन्दोलन भी और आन्दोलन की तरह बहुत असरदार नही रहा |

प्रस्तुती - सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

साभार -- सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी

Friday, July 19, 2019

खुदाई खिदमतगार ( लाल कुर्ती मूवमेंट )

तहरीके जिन्होंने जंगे -आजादी -ए- हिन्द को परवान चढाया

लहूँ बोलता भी हैं



गदर मूवमेंट
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भोपाल के बरकतुल्लाह ने सैन -फ्रांसिस्को में गदर पार्टी के नाम से एक तंजीम बनाई | इस तंजीम का मकसद भारत और भारत के बाहर जहाँ भी ब्रिटिश - मुखालिफ तंजीमे थी , उन सबके साथ एक नेटवर्क बनाकर अंडरग्राउण्ड क्रान्ति के जरिये अंग्रेजो को भारत से खदेड़ना था | सैय्यद शाह रहमत ने फ्रांस में रहकर कुछ अंडरग्राउण्ड आन्दोलन शुरू किये थे , लेकिन गदर मूवमेंट कामयाब नही हो सका | गदर के आरोप में बरकतुल्लाह गिरफ्तार हुए और सन 1915 में इसी इल्जाम में फांसी की सजा पाकर शहीद हुए | इसके बाद मुल्क के बाहर गदर पार्टी का काम जौनपुर के सैय्यद मुजतबा हुसैन और फैजाबाद के अली अहमद सिद्दीकी ने मिलकर सम्भाला | मलाया और बर्मा में ब्रिटिश - मुखालिफ बगावत की प्लानिग बनाई गयी लेकिन यह भी किसी वजह से कामयाब नही हो सकी | बगावत के जुर्म में दोनों लोग 1917 में गिरफ्तार किये गये और फांसी पर लटका दिए गये |


खुदाई खिदमतगार
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खान अब्दुल गफ्फार खान ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ताईद में जंगे आजादी की लड़ाई के लिए सीमा सरहद के लोगो को मुकामी पैमाने पर मुत्तहिद करके खुदाई खिदमतगार के नाम से एक तंजीम बनाई जिसकी वर्दी लाल - कुर्ती थी | इसलिए इसे लाल कुर्ती मूवमेंट के नाम से भी जाना जाता हैं | यह आन्दोलन बहुत तेजी से फैला | नतीजन अंग्रेज घबरा गये और उन्होंने खान अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार करके तीन साल के लिए कैद कर लिया | इसके बाद तो जैसे खान साहब को मुसीबतों व तकलीफ सहने की आदत सी पड़ गयी
जेल से आकर उन्होंने और ज्यादा मजबूती से पठानों को मुत्तहिद करके मूवमेंट को और तेज कर दिया | सन 1937 में नये आर्डिनेंस के जरिये कराए गये चुनावों में लाल - कुर्ती की ताईद से कांग्रेस पार्टी को अक्सरियत मिली और कांग्रेस ने गफ्फार खान के भाई की कयादत में वजारत बनाई | जो की सन १९४७ तक चली | बाद में उन लोगो को भारत और पाकिस्तान में से किसी एक नये मुल्क के हक में चुनाव करना पडा | चुनाव के नतीजे सीमांत प्रांत को पाकिस्तान में मिलने के हक में हुआ | खान अब्दुल गफ्फार खान ( सरहदी गांधी के नाम से मशहूर थे | सरहदी गांधी नेशनलिस्ट के थे उन्होंने 95 साल की उम्र में से 45 साल तो जेल में बिताए |


प्रस्तुती सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक


आभार - सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी

रेशमी रुमाल तहरीक

लहूँ बोलता भी हैं
तरीके जिन्होंने जंगे - आजादी -ए - हिन्द को परवान चढाया
रेशमी रुमाल तहरीक

आन्दोलन की जानकारी को खुफिया तरीके से एक - दुसरे तक पहुचाने के लिए इस तहरीक का इजाद किया गया था | खिलाफत मूवमेंट व अदमताऊन तहरीक की वजह से अंग्रेज खुफिया एजेंसी के lओग ज्यादातर मुस्लिम इदाय्रो व मजहबी इदाय्रो के आस - पास निगरानी रखने लगे थे | इससे बचकर मूवमेंट की जरूरी मालूमात एक जगह से दूसरी जगह भेजने की यह कारगर तरकीब साबित हुई | इस तहरीक का नाम रेशमी रुमाल तहरीक पडा | इस तहरीक में एक रेशमी रुमाल पर जरी के काम से जरूरी जानकारी को काढा जाता था उसके बाद इसे किसी भरोसेमंद आदमी के जरिये कपड़ो के व्यापारियों ( जो तिजारत की गरज से हिजाज से हिन्दुस्तान आते थे ) के बण्डल में रखकर भेजा जाता था | इस तहरीक व तरीकेकार को इजाद करनेवालों व जंगे - आजादी में अहम् मुकाम रखनेवाले मौलाना महमुदुल हसन मदनी थे जिन्हें शेख - उल -हिन्द के खिताब से जाना जाता था | मदनी साहब के साथ रहते हुए मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी ने इस तहरीक के लिए बहुत मेहनत व जोखिम उठाकर इसे आगे बढाया | मौलाना सिन्धी रेशमी रुमाल तहरीक के जरिये अफगानिस्तान में रहकर मूवमेंट की मजबूती के लिए बहुत जिम्मेदारी से काम को अंजाम दिया | दुसरे मुल्को से हिन्दुस्तान की जंगे - आजादी के मुहीम में मदद के लिए शेख - उल -हिन्द ने मदीने में तुर्की में मिनिस्टर अनवर पाशा से मुलाक़ात की इस मुलाक़ात में उन्होंने मदद का यकीन दिलाया | उनके वायदे के मुताबिक़ ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने के लिए एक खुफिया स्कीम तैयार हुई | लेकिन इस पर अमल शुरू होने से पहले ही मदीने में शेख - उल हिन्द को सन 1916 में गिरफ्तार कर लिया गया | वहां से मिस्र होते हुए रोम सागर के एक टापू माल्टा पर कैद कर दिया गया | आपके साथ मौलाना वहीद अहमद व कुछ और लोग ही थे | आपकी गिरफ्तारी व अनवर पाशा के लिखे मदद के हट जो रेशमी रुमाल के जरिये हिन्दुस्तान लाये जा रहे थे उन्हें मुबई में ब्रिटिश हुकूमत के अफसरानो ने पकड़ लिया | उसके बाद इस तहरीक से जुड़े ज्यादातर उलमा गिरफ्तार कर लिए गये | यह तहरीक इसके बाद खत्म हो गयी | शेख - उल हिन्द व उनके साथी लोग को चार साल कैद - बा - मशक्कत की सजा खत्म होने के बाद सन 1920 में रिहा कर दिया गया |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
संदर्भ - सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी

''इंदिरा नेहरु को''

                                                                                                                                        ''इंदिरा नेहरु को''
                                                                                                                                     21 फरवरी , 1933
एक पिता का अपनी पुत्री के नाम पत्र 

प्यारी इंदु ,
कल मैंने तुम्हारे पास दो किताबे भेजी है | एक तो बच्चो की किताब है | इसका नाम ''टूटलिओ '' -- मुझे उम्मीद है कि बच्चो के मतलब की किताबन पाना तुम अपनी बढ़ी हुई शान के खिलाफ नही समझोगी | मैंने यह इसलिए भेजी क्योकि मैंने कही पढ़ी था कि वह बहुत अच्छी है और ''एलिस इन वंडरलैंड '' के मुकाबले की है | एलिस को एक जमाने से पसंद करता रहा हूँ इसलिए मैं एक ऐसी किताब मंगाने के लालच से नही बच सका जो इतनी अच्छी समझी जाए कि अमर एलिस से उसका मुकाबला हो | खैर टूटलिओ बिलकुल मुख्तलिफ है , लेकिन मुझे इसमें मजा आया और बहुत - सी तस्वीरो पर हँसी आये बिना नही रह सकी | मुझे उम्मीद है कि इस किताब ने तुम्हारा और दूसरे बच्चो का दिल बहलाया होगा |
दूसरी किताब है ''बर्नाड शा का नाटक 'सेंट जान '' | क्या तुम्हे याद है कि पेरिस में हमने फ्रांसीसी भाषा में इस नाटक को देखा था , जिसमे एक ठिगनी - सी रुसी महिला दिलकश जीन बनी थी ? बाद में हमने यह नाटक अंग्रेजी में भी देखा था , लेकिन मुझे याद नही कि तब तुम हमारे साथ थी या नही | यह एक बहुत अच्छा नाटक है -- इसके कुछ हिस्से तुम्हे जरा फीके लग सकते है | लेकिन कहानी शानदार है और बार बार पढने लायक है | चूँकि जिन तुम्हारी पुरानी चहेती और नायिका है , तुम इसे पसंद करोगी | किताब में एक नाटक और है , जो शायद तुम्हे पसंद ना आये | दोनों लम्बी भूमिकाये भी शायद तुम्हे फीकी मालूम हो |
तुम अपने काम में मशगुल होगी और इम्तिहान की तैयारी में लगी होगी | फिर भी मैं समझता हूँ कि कभी कभी और किताब पढने के लिए कुछ वक्त निकल लेती होगी | यही वजह है कि मैंने तुम्हारे पास 'सेंट जान' भेजी है |
मम्मी ने मुझे लिखा है कि बिरजू भाई के साथ कोई साहब उनसे मिलने के लिए आस्ट्रिया से आये थे और वह तुम्हे पढ़ाई के लिए फ़ौरन वियना ले जाने को तैयार थे | वियना एक अदभुत खुबसूरत जगह है , वह संगीत का नगर है | वियना वाले बड़े मजेदार लोग होते है लेकिन इस वक्त उनका मुल्क एक भयानक मुसीबत में फंसा है | फूफी ने मुझे बताया कि एक जर्मन महिला जो हाल में आनन्द भवन आकर ठहरी थी , तुम्हारी तालीम के लिए जर्मनी में इंतजाम कर देने के लिए उत्सुक थी | तुम्हारे पिता और माता के अलावा ढेर सारे लोग तुम्हारी भावी शिक्षा में दिलचस्पी लेते दीखते है | शायद किसी दिन , जो ज्यादा दूर नही है , तुम हमको यहाँ किसी कदर अकेला छोड़कर दूर देश जाकर अपनी पढ़ाई करोगी | जेल में लम्बी मुद्दते बिताकर हमने अपने को इसकी ट्रेनिग दे ली है | जो भी हो , हम इसे बेशक बर्दाश्त कर लेंगे क्योकि तुमसे बार बार मिलने और तुमको अपने पास रखने की खुदगर्ज ख़ुशी से कही ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि तुम अच्छी ट्रेनिग हासिल करो और तुम्हे हर मौक़ा मिले ताकि तुम्हारे आगे जो काम हो उसके लिए तुम अपने को तैयार कर सको | लेकिन अभी तो यह सब भविष्य की बात है और इसके बारे में ऐन इसी वक्त हमे परेशान होने की जरूरत नही है | फिलहाल तो तुम्हे अपना मौजूदा काम करते रहना है और इसे अच्छी तरह से करना है ताकि तुम किन्ही इम्तिहानो में या इस तरह की किसी भी चीज पर जो तुम्हारे सामने आये आसानी से सफलता हासिल कर सको | और फिलहाल मुझे देहरादून जेल में बने रहना है |
मगर मैं यह पसंद करूंगा कि अपने भविष्य के बारे में अपने निजी विचार तुम मुझे लिखो | तुम्हे याद होगा कि अपने हाल के एक ख़त में इस बारे में मैंने तुमसे पूछा था | आगे जिन्दगी में तुम अपने लिए क्या काम पंसंद करोगी ? किन विषयों में और किस काम में तुम्हारी दिलचस्पी है ? बेशक जैसे - जैसे हम बड़े होते जाते है , हम इसके बारे में अपनी राय बहुत - कुछ बदलते जाते है | छोटे लड़के के जीवन का आदर्श इंजन का ड्राइवर होता है | लेकिन फिर भी अगर तुम कभी - कभी मुझे लिखती रहो कि तुम्हारे नन्हे से दिमाग में कैसे विचार आ रहे है तो मुझे ख़ुशी होगी | मुझे मालूम हुआ है कि बम्बई में तुम्हे दोबारा टीका लगा हैं टीका मुझे नापसंद है , लेकिन मेरा ख्याल है कि इसे लगाना ही पड़ता है |
दोल्म्मा या दादी - अब तुम उन्हें क्या कहती हो ? गालिबन अगले महीने पूना जायेंगी | बापू चाहते है कि वह कुछ अरसे के लिए वहाँ उनके पास ठहरे | कल जब मैं यह ख़त लिख रहा था तो मसूरी के चारो तरफ पहाडियों पर बर्फ गिर रही थी और शाम को मैं जब घुमने निकला तो पहाडियों की चोटियों बर्फ से जगमग थी |
प्यार -- तुम्हार - पापू
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Thursday, July 18, 2019

आनद मरा नही -

बाबू मोशाय --- जिन्दगी लम्बी नही बड़ी होनी चाहिए और जिन्दगी को खुलकर जीना चाहिए
आनद मरा नही ---------- आनद कभी मरते नही ..........
आनद ने सिखाया की मौत तो आनी है लेकिन हम जीना नही छोड़ सकते | जिन्दगी लम्बी नही बड़ी होनी चाहिए |
इस दुनिया में जिन्दगी का एक नया फलसफा गढने वाला '' बाबू मोशाय , ''हम सब तो रंगमंच की कठपुतलिया
है , जिसकी डोर उपर वाले के हाथ में है , कौन कब कहा उठेगा , कोई नही जानता | ' इस फलसफा को देने वाला आनद नहीं है आज अनेको ऐसे अंदाज में जिया आनन्द जो कोई और नही जी सकता |
दुनिया में |भारतीय सिनेमा जगत में पहली बार स्टारडम लाने वाले राजेश खन्ना ही थे | इन्होने ही बताया की सुपर स्टार होता क्या है ? 29 दिसम्बर 1942 को अमृतसर में पैदा हुए राजेश खन्ना को स्कूल और कालेजो से ही अभिनय का शौक था उन्होंने रंगमंच पे भी कार्य किया नए चेहरों की तलाश में सन 1965 में यूनाटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्मफेअर द्वारा टैलेंट हंट से फिल्म इंडस्ट्री में उनका पदार्पण हुआ दस हजार में से आठ लकड़ो का चुनाव हुआ ,जिनमे एक राजेश खन्ना भी थे | राजेश खन्ना ने उस प्रतियोगिता में ही अपने अभिनय की क्षमता को जजों के सामने मनवा दिया और अन्त में जजों ने उनको विजेता घोषित किया | राजेश खन्ना का वास्तविक नाम जतिन खन्ना है | 1969 से 1975 के दरम्यान राजेश ने बहुत सारे सुपर हिट फिल्मे दी |इन्होने फिल्म इंडस्ट्री को नया आयाम दिया सुपर स्टार का वही से सुपर स्टार शब्द प्रचलित भी हुआ |फिल्म इंडस्ट्री उन्हें प्यार से काका कह के बुलाती थी |1967 में' आखरी खत '' सिनेमा से उनके फ़िल्मी पारी की शुरुआत हुई | 1969 में अराधना और दो रास्ते की सफलता के बाद राजेश खन्ना सीधे शिखर पर जा बैठे | उन्हेंसुपर स्टार घोषित कर दिया गया और लोगो के बीच उन्हें अपार लोकप्रियता हासिलहुई वास्तव में ऐसी लोकप्रियता किसी को हासिल नही हुई जो राजेश को हुई |उनके आकर्षण का वह एक अजीब दौर था | स्टूडियो या किसी निर्माता के दफ्तर के बाहर राजेश खन्ना की सफ़ेद कार रूकती थी तो लडकिया उस कार को ही चूम लेती थी राजेश खन्ना ने रोमांटिक हीरो के रूप में बेहद पसंद किया गया | उनकी आँख झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने हो गये |' मेरे सपनोकी रानी और ' रूप तेरा मस्ताना ' जैसे रोमांटिक गीतों के भावो को अपनी जज्बाती अदाकारी से जीवन्त करने वाले राजेश खन्ना ने अपने जमाने में लगातार15 हिट फिल्मे देकर बालीवुड को '' सुपर स्टार '' की परिभाषा दी थी | उनसे पहले के स्टार राज कपूर और दिलीप कुमार के लिए भी लोग पागल रहते थे लेकिनइस बात पे कोई शक नही की जो दीवानगी राजेश खन्ना के लिए थी , वैसी पहले या बाद में कभी नही दिखी 1969 में आई अराधना ने बालीवुड में काका का असली दौर शुरू हुआ इसमें राजेश खन्ना और हुस्न पारी शर्मिला टैगोर की जोड़ी ने सिल्वर स्क्रीन पर रोमांस और जज्बातों का वो गजब चित्रण किया की लाखो युवतियों की रातो की नीद उड़ने लगी | अराधना का वो गीत '' कोरा कागज था ये मन मेरा -लिख लिया नाम इसपे तेरा , सुना आगन था जीवन मेरा बस गया प्यार इसपे तेरा..नारी के सौन्दर्य की अनुभूति को कुछ इस तरह व्यक्त किया रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना ....राजेश खन्ना ने जहा रोमांटिक फिल्मो के किरदार को भरपूर जीया वही उन्होंने ऐसी फिल्मे दी जो भारतीय फिल्मो में मील का पत्थर है उन्होंने जब बाबर्ची का किरदार निभाकर समाज को यह सन्देश दिया की एक संयुक्त परिवार में कैसे रहा जाता है '' भोर आई गया अंधियारा सारे जग में हुआ उजियारा नाचे झूमे ये मन मतवाला वो पूरे समाज को यह भी बता दिया की एक अंधियार के बाद नए सूरज का स्वागत कैसे किया जाता है | जब वो जीवन के फलसफा को कुछ इसतरह बया करते है '' तुम बिन जीवन कैसा जीवन फूल खिले तो दिल मुरझाये , आग लगे जब बरसे सावन जैसे गीत से जिन्दगी की गहरी फालसा को बताया वही काकाने यह भी कहा '' दुनिया में रहना है तो काम करो , हाथ जोड़ो सबको सलाम करो प्यारे इसमें काम के उस तरीके को कहा की प्यार ही दुनिया के लिए है | ''अमर प्रेम के जरिये उन्होंने एक ऐसी प्रेम की परिभाषा गढ़ी जो अपने में बेमिशाल...उन्होंने दुनिया के उन लोगो का जबाब दिया जो बेवजह कही भी टांग अडाते है उन्होंने साफ़ कहा की '' कुछ तो लोग कहेंगेलोगो का काम है कहना छोडो बेकार की बातो में कही बीत ना जाए रैना ..............से प्रेम की पराकाष्ठा व्यक्त किया , दर्द की बेइन्तहा को बया किया न हसना मेरे गम पे इन्साफ करना जो मैं रो पडू तो मुझे माफ़ करना ,जब दर्द नही था सीने मीन , तब ख़ाक मजा  है जीने में ....काका ने दोस्ती की वो निशाल पेश की जो शायद फिल्म इंडस्ट्री में आज तक किसी ने नही किया नमक हराम में एक दोस्त अपने अनमोल दोस्त के लिए हँसते हुए अपनी जान तक कुर्बान कर देता है यह कहते हुए ''दीये जलते है फूल खिलते है ,बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते है ऐसी मिशाल दी काका ने दोस्ती का 

.............राजेश खन्ना ने अपने मर्मस्पर्शी अभिनय के साथ सवाद अदायगी से भारतीय सिनेमा को अनमोल बना दिया और गुरु कुर्ता पहनने वाला आनद समन्दर किनारे जब यह गाता है की जिन्दगी को कैसे ज़िया जाता है '' जिन्दगी कैसी है पहेली हाय कभी तो हसाए कभी ये रुलाये , कभी देखो मन नही चाहे पीछे पीछे सपनो के भागे , एक दिन सपनो का राही चला जाए सपनोसे आगे कहा .......आनद के किरदार के इतने रंगों को राजेश खन्ना ने जिस खूबी सी ज़िया आनद ने सिखाया की मौत तोआनी है लेकिन हम जीना नही छोड़ सकते | जिन्दगी लम्बी नही बड़ी होनी चाहिए | जिन्दगी जितनी जियो , दिल खोलकर जियो | हिन्दी सिनेमा का यह आनद अब हमारे बीच नही रहा लेकिन उसका दिया फलसफा हमेशा हमे याद दिलाता रहेगा की जिन्दगी लम्बी नही बड़ी होनी चाहिए और जिन्दगी को खुलकर जीना चाहिए | काका को मेरा
शत शत नमन
...................सुनील दत्ता '' कबीर ''स्वतंत्र ...पत्रकार... समीक्षक

Wednesday, July 17, 2019

खिलाफत आन्दोलन

तहरीके जिन्होंने जंगे -आजादी -ए-हिन्द को परवान चढाया


खिलाफत आन्दोलन

सन 1919 से 1924 तक चले इस मूवमेंट को मुस्लिम उल्माओ की कयादत में चलाया गया | इस मूवमेंट का मकसद एक तरफ तुर्की के खलीफा की दोबारा ताजपोशी कराना और दूसरी तरफ हिन्दुस्तान से अंग्रेजो को खदेड़ना था | इसके लिए खिलाफत के रहनुमाओं ने नौजवान नस्ल में पहले इस्लाम के खलीफा की बहाली का जज्बा पैदा करके उन्हें मूवमेंट के साथ मुत्तहिद किया , फिर उनमे मुत्तहिदा कौमियत के लिए ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने के लिए तैयार किया | पहली जंगे - अजीम के बाद अंग्रेजो ने तुर्की पर जो जुल्म - ज्यादतिया की इसकी वजह से हिन्दुस्तान ही नही पूरी दुनिया का मुसलमान ब्रिटिश हुकूमत की मुखालिफत में सडको पर उतरकर मुकाबला कर रहा था | दुनिया के मुसलमान तुर्की के खलीफा को ही अपना खलीफा मानते थे जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने हटाकर तुर्की को दो हिस्सों में बाट दिया था | ब्रिटेन की इस कार्यवाही से पूरी दुनिया के मुसलमानों में अंग्रेजो के खिलाफ नफरत व तुर्की के लिए हमदर्दी का जज्बा था | इस आन्दोलन की शुरुआत सन 1919 के शुरू में मौलाना मोहम्मद अली ,मौलाना शौकत अली , मौलाना आजाद - मौलाना हसरत मोहानी और हाकिम अजमल खान के कयादत में खिलाफत कमेटी के तकमील से हुई | इस मूवमेंट ने मुल्क के पैमाने पर धरना - सभाए और मुजाहरा करते हुए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ असहयोग आन्दोलन का रूप ले लिया | नवम्बर 1919 में खिलाफत कमेटी का कौमी कांफ्रेंस दिल्ली में हुआ जिसकी सदारत महात्मा गांधी ने की | इस इजलास में अंग्रेजी सामानों का बाईकाट का फैसला हुआ - साथ ही , यह भी तय किया गया कि जंग के बाद समझौते की शर्त जब तक तुर्की के हक़ में नही बनाई जायेगी तब तक ब्रिटिश सरकार के साथ किसी तरह का ताउँन नही किया जाएगा | भारतीयों के बीच एकता बनाये रखने व सरकार के खिलाफ असहयोग आन्दोलन चलाने के लिए इस कांफ्रेंस से महात्मा गांधी की सदारत में एक मजबूत प्लेटफ्राम तैयार हुआ | जून 1920 में इलाहाबाद में हुए खिलाफत कमेटी के मरकजी इजलास के बाद इसी तंजीम ने स्कुल - कालेजो और अदालतों का बाईकाट का फैसला लिया , जो कि जंगे - आजादी के लिए मील का पत्थर साबित हुआ | इस मूवमेंट में बड़ी तादात में मुस्लिम उल्माओ और मुस्लिम सदस्यों की गिरफ्तारिया हुई | बड़े पैमाने पर माली नुक्सान भी हुआ |

प्रस्तुती -- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
सन्दर्भ --- लहू बोलता भी हैं
आभार - सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी