Saturday, February 18, 2017

शहीद नगरी बेवर से --- हम लड़ेंगे जिन्दगी के वास्ते अंधेरो से 19 - 2-2017

शहीद नगरी बेवर से --- हम लड़ेंगे जिन्दगी के वास्ते अंधेरो से



कभी मुठ्ठियों की हरकत से
घर – घर नया उजाला होगा
फिर बारी आई है
बुझी मशाल जलाने की
हम लड़ेंगे
जिन्दगी के वास्ते
अंधेरो से
रौशनी के वास्ते
इसी रौशनी के वास्ते शहीद नगरी बेवर में विगत पैतालीस वर्षो से शहीद मेला का आयोजन उन महान क्रांतिवीर शहीदों को हमेशा दिल में संजोये रखने के लिए प्रति वर्ष नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन 23 जनवरी से शुरू होता है हम आपको बताते चले कि यह क्रान्ति मेला की शुरुआत 1972 में कामरेड जगदीश नरायण त्रिपाठी ने एक दिवसीय मेले के रूप में इसका सूत्रपात किया था | आज यह मेला उनके भतीजे राज त्रिपाठी के नेतृत्त्व में 20 दिन का मेला हो गया है |
23 जनवरी 2017 को इस शहीद मेला का उद्घाटन करने क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर – संदीप थापर इसके साथ ही शहीदे ए वतन अशफाक उल्ला खा के पौत्र अशफाक उल्ला ने इस मेले का मशाल जलाकर विधिवत उदघाटन किया |
क्रांतिवीर चचा अशफाक उल्ला खा के पौत्र ने जनमानस को सम्बोधित करते हुए कहा कि शहीदों की मूर्ति लगाने से कुछ नही होगा , बल्कि उनको हमे रिश्तो से जोड़ने की जरूरत है , जब हम उन्हें रिश्तो से जोड़ेगे तब वो हमारे दिल के बहुत करीब होंगे ऐसे में हमेशा उनकी याद बनी रहेगी और वो प्रेरणा देते रहेगे ,|
चचा क्रांतिवीर सुखदेव के भतीजे अशोक थापर ने अपने सम्बोधन में कहा कि देश को आजादी के उजाले में लाने वाले शहीदों की सहादत की तुलना करना ठीक नही | ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आजादी के संघर्ष में अपनी आहुति देने वाले वीर एक समान है उनका सम्मान एक जैसा होना चाहिए | सुखदेव के दुसरे भतीजे संदीप थापर ने कहा कियह दुनिया शहीदों को जातीय खांचे में ना बाटे क्रांतिवीरो की कोई जाती नही होती है बस उनका एक धर्म था देश को अंग्रेजो से मुक्ति दिलाकर आम हिनुस्तान के आम आदमी को आजादी दिलाना इसी आजादी के लिए वो सारे हमारे पुरखे हँसते – हँसते फांसी के फंदों को चूम लिया उन्होंने अपना वर्तमान हमारे भविष्य के लिए कुर्बान कर दिया इस शहीद मेले से सरकार को एक अपील की गयी कि क्रांतिवीर सुखदेव की प्रतिमा संसद भवन में लगे | शिवचरण लाल शर्मा के पुत्र सरल कुमार शर्मा के पुत्र ने कहा कि देश की जंग ए आज़ादी के नायकों को सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया जिसके वो हकदार थे। उन्होंने आगे कहा कि पुरे भारत में शहीदों के कुर्बानियों पे कही भी इस तरह के मेले का आयोजन नही होता है | मेला को सुचारू रूप से गति प्रदान करने वाले शहीद जमुना प्रसाद त्रिपाठी के पौत्र और मेला प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने कहा कि हमारे पूर्वज कामरेड जगदीश नरायन त्रिपाठी ने इस मेले की परम्परा की नीव डाली है अब यह पौधा बनकर खिल रहा है इसे वट वृक्ष का स्वरूप हम नौजवान देंगे उन्होंने आगे बताया कि मेले का उद्देश्य सिर्फ मेला लगाना नही है हमारा उद्देश्य है कि 1857 से निकली चिंगारी जो 19 शातब्दी में आग बन चुकी थी उसमे हमारे पुरखो ने देश की आजादी के अपनी आहुति दी है उन पुरखो को आगे के समय में आने वाली पीढ़ी से अवगत करना है कि किस जज्बे और हौसले से हमे आजादी मिली है जिसके कारण हम इस आजाद मुल्क में अपनी बात को कह सकते है और आजादी में सांस लेते है |
शहीद मेला करीब 19 दिन चलता है इस मेले की ख़ास बात यह है कि शहीद मंच से विभिन्न भिन्न कार्यक्रमों की प्रस्तुती दी जाती है 24 - 25- को समाज में जागरूकता लाने के लिए सांस्कृतिक माध्यमो से सनेश दिया गया 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर बेवर नगर के सदर चौराहे से साझी विरासत के तहत झंडा रोहन के बाद हजारो की संख्या में जलूस में परिवर्तित होकर लोग शहीद क्रान्ति मंदिर और समाधि स्थल पर माल्यापर्ण कर यह जलूस शहीद मेला स्थल पर राजा तेज सिंह के किला में लगे क्रांतिवीरो शहीदों की प्रदर्शनी स्थल पर समाप्त हुआ | दिनाक 27 को सिविल पेंशनर जिला सम्मेलन के माध्यम से जानकारी दी गयी 28 जनवरी को नारी शक्ति महिला सम्मेलन व शुशी प्रदर्शनी के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गयी आज की नारी अबला नही है आज नारी सबल हो गयी है | तारिक 29 को धर्मदृष्टि परिवार की ओर से ‘’ कलम उनकी जय बोल ‘’ के माध्यम से समाज में फैले भ्रांतियों के साथ अंध विश्वास पर जबर्दस्त प्रहार किया गया | 30 जनवरी को बेवर नगर के सुभाष चौक से शहीदों की याद में शहीद राज कलश यात्रा के माध्यम से उन सार शहीदों को श्रद्दांजली अर्पित किया गया | 31 जनवरी विधिक साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से अवाम को विधिक जानकारी दी गयी |
1 फरवरी को साक्षरता सम्मेलन के माध्यम से शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला गया |
2 फरवरी स्वतंत्रता सेनानी सम्मेलन के माध्यम से स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी व्यथा को व्यक्ति किया | अमर शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद के भतीजे सुजीत आज़ाद व् पौत्र अमित आज़ाद ने कहा कि आज के इस दौर में शहीदों के व्यक्तित्व और कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचित कराता और उनकी स्मृतियों को संजोता ये शहीद मेला पूरे देश के लिए एक मिसाल है। शहीद मेला का मुख्य आकर्षण रहा राष्ट्रीय कवि सम्मेलन को आगे बढाते हुए संदेश चौहान ने पढ़ा , हमने विरोध जुल्म का किया , जाति का नही इतिहासों से पूछो यदि हो संदेह कही आलोक भदौरिया ने पढ़ा , कई घर बार जलते है , कई लाशें भी गिरती है इसी कीमत पे मिलता है नये सरदार का चेहरा | मेले के समापन के अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काकोरी काण्ड के क्रांतिवीर रामकृष्ण खत्री के पुत्र उदय खत्री ने कहा कि आजादी के जंग में जिन पुरोधाओं के बल पर आज हम लोग आजादी की सांस ले रहे है मैं उन अनाम व नाम क्रांतिवीरो को इस मंच से नमन करता हूँ , उन्होंने शलभ श्रीराम की पंक्तियों से हिन्दोस्तां की शान है अशफाक व बिस्मिल ,दो जिस्म है इकजान है अशफाक व बिस्मिल , इस देश के दो लाडलो के नाम से ज़िंदा ,दो सूरते – ईमान है अशफाक व बिस्मिल समापन समारोह की अध्यक्षता कार्न्तिवीर पंडित गेंदा लाल दीक्षित के प्रपौत्र मधुसुदन दीक्षित ने कहा कि मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ ऐसा शहीद मेला पुरे भारत के किसी अंचल में नही लगता है धनी है बेवर की धरती जहा 15 अगस्त 1942 में ही विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने थाने पर तिरंगा लहरा दिया जिसका नेतृत्त्व जमुना प्रसाद त्रिपाठी व सीताराम गुप्त ने अपने प्राणों की आहुति दे दी ऐसी है यह बेवर की धरती हम इसको शत – शत नमन करते है | समापन समारोह में मेला श सयोजक इन्द्रपाल सिंह यादव , हाजी इदरीश अली , भगवान दास मिश्रा श्याम स्नेही श्याम त्रिपाठी रमेश गुप्ता गगन भारत , बिपिन चतुर्वेदी , डा रामधन राठौर उमेश राठौर , अजय सिंह भास्कर ने अपने विचार व्यक्त किये जी एस एम् विद्यालय के बच्चो द्वारा समर्पित अनेकता में एकता के माध्यम से शहीद मेला के समापन को यादगार बना दिया |
समापन के अंत में शहीद मेला के प्रबन्धक राज त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि ‘’ नही सदा इतिहास सिर्फ शमशीर लिखा करती है , नही वक्त के साथ सदा तकदीर चला करती है |

गदर लहर का रोशन चिराग -- 18-2-2017

गदर लहर का रोशन चिराग --


क्रांतिवीर करतार सिंह सराभा


जो कोई पूछे कि कौन हो तुम , तो कह दो बागी है नाम मेरा |
जुल्म मिटाना हमारा पेशा , गदर करना है काम अपना |
नमाज संध्या यही हमारी , और पाठ पूजा सभी यही है ,
धरम- करम सब यही है हमारा , यही खुदा और राम अपना | सराभा

बेशक सराभा के बचपन के बारे में अधिकतर विवरण उपलब्ध नही है , फिर भी यह जरूरी पता लगता है कि करतार सिंह 24 मई 1896 को लुधियाना जिले के गाँव सराभा में सरदार मंगल सिंह और बीबी साहिब कौर के घर पैदा हुआ और कम उम्र में ही उसे ही माँ - बाप की मृत्यु का आघात सहना पडा | उसकी परवरिश की जिम्मेदारी पूरी तरह उसके दादा सरदार बदन सिंह पर आन पड़ी थी | करतार सिंह अपने माँ - बाप का इकलौता पुत्र था | उसकी एक बहन भी थी , जिसका नाम था धन कौर | दादा करतार से बेहद प्रेम करते थे | वह उसे खेती बाड़ी के काम में नही डालना चाहते थे उनकी इच्छा थी कि करतार पढ़ लिख कर किसी अच्छे रोजगार में लग जाए | करतार का गाँव के प्राथमिक स्कूल में दाखिला करवा दिया गया | प्राथमिक शिक्षा के बाद वह गुजरवाल के वर्नैकुलर मिडल स्कूल का विद्यार्थी बना , फिर लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल में जा दाखिला लिया |स्कूल की पढ़ाई के दौरान करतार सिंह साथियो का अगुवा और हरमन प्यारा विद्यार्थी था | चुस्त चालाक भी बहुत था | वह हंसमुख और मसखरे स्वभाव का भी था | उसकी सर्वप्रियता के कारण दूसरे विद्यार्थी उसका साथ पाने के लिए उतावले रहते थे | वास्तव में होनहार चुस्त और होशियार करतार सिंह शुरू से ही नेतृत्व के गुण थे | उसकी इसी योग्यता के कारण उसके साथी उसे 'अफलातु ' कहकर बुलाते थे | 'अफलातु ' कहने का भाव था कि उसमे अजीब और अनहोनी बाते करने की योग्यता और दिलेरी थी | उम्र के अगले पड़ाव में उसने अपने इन्ही गुणों का भरपूर प्रदर्शन किया | कई साथी उसकी फुर्ती और तेजी से प्रभावित होकर मजाक में उसे ' उड़ता साँप' भी कहते थे |

मालवा स्कूल में सातवी कशा में पढ़ते हुए उसने भोलेपन वाली चुस्ती और होशियारी के चलते सोचा कि क्यों झूठा सार्टिफिकेट बनाकर नौवी में दाखिला ले लिया जाए और उच्च शिक्षा का लक्ष्य एक दो साल पहले ही पूरा कर लिया जाए |
उसने मालवा स्कूल से सातवी का सार्टिफिकेट लिया और उसे नौवी का बनाकर आर्य स्कूल में दाखिल हो गया | पहले तो स्कूल वालो को कुछ पता ही नही लगा , बाद में पता लगने पर स्कूल वालो ने एक्शन लेने की सोची तो करतार को भनक लग गयी | आगे की पढ़ाई के लिए वह उड़ीसा में अपने चाचा बख्शीश सिंह के पास चला गया और वहा जाकर दसवी पास करने के बाद कालिज में दाखिला ले लिया | नया से नया ज्ञान हासिल करने की तलब के चलते वे पाठ्य पुस्तके पढने के अलावा और भी बहुत सारा साहित्य पढता रहा था | सार्टिफिकेट में बदलाव करके नौवी में दाखिल होने की कोशिश से उसके स्वभाव के इस पक्ष का पता चलता है कि उसे ऊँची मंजिल छूने की ' कितनी चाहता थी और वह जल्दी से जल्दी बड़ा मुकाम हासिल करने का अभिलाषी था |
चाचा के पास रहकर पढ़ते हुए उसे अंग्रेजी बोलने और लिखने का अच्छा अभ्यास हो गया | वह अंग्रेजी साहित्य पढने में दिलचस्पी लेने लगा | उस समय बंगाल और उड़ीसा आदि इलाको में बहुत हद तक राजनितिक चेतना पैदा हो चुकी थी | सराभा स्कूली पुस्तको के अलावा चूँकि दुसरे साहित्य भी पढता रहता था | इसलिए उस पर इस राजनितिक जागृति का भी प्रभाव पड़ना शुरू हो गया | देश प्रेम और देश सेवा भावना उसके अन्दर कुलबुलाने लगी |

Sunday, January 1, 2017

‘ मातृवेदी ‘ सगठन के सौ बरस 1-1-17

पंडित गेंदालाल दीक्षित जी लोग आप को भले न जाने हम चंद सिरफिरे आप को सलाम करते है – आने वाला कल आपको जानेगा जरुर !
‘ मातृवेदी ‘ सगठन के सौ बरस

पंडित गेंदा लाल दीक्षित ---
लेखन – रामप्रसाद ‘बिस्मिल ‘
( काकोरी एक्शन के नायक )
आपको बताते चले की मातृवेदी संगठन बना कैसे
इसकी जानकारी से पहले महानायक पंडित गेंदालाल दीक्षित जी को जाना होगा |
तीस नवम्बर सन 1888 ई को आगरा जिले की ‘ वाह ‘ तहसील के ‘’मई ‘’ ग्राम में इनका जन्म हुआ था | अभी आप तीन वर्ष के थे कि आपकी माता का देहांत हो गया | आपके पिtता का नाम पंडित भोलानाथ दीक्षित है | हिंदी मिडिल पास करने के बाद कुछ् दिनों तक आप इटावा के हाईस्कूल में पढ़ते रहे फिर आगरा चले गये और वही से इंटर पास किया | इच्छा होते भी आप आगे न पढ़ सके और औरया में डी.ए.वी पाठशाला के अध्यापक हो गये | बंग – भंग के दिन थे | स्वदेशी आन्दोलन चल रहा था | आप लोकमान्य तिलक के भक्त तो थे ही , इधर महाराष्ट्र में भी शिवाजी के उत्सव मनाने का आन्दोलन चल खड़ा हुआ | समय की लहर से प्रभावित होकर हमारे नायक ने भी ‘’शिवाजी समिति ‘’ नाम की एक संस्था स्थापित की | इसका उद्देश्य नवयुवको में स्वदेश के प्रति प्रेम तथा भक्ति के भाव को उत्पन्न करना था | कुछ दिनों तक तो पुस्तको तथा समाचार पत्रों द्वारा ही प्रचार कार्य होता रहा , किन्तु बाद में बंगाली युवको को प्राणों की किंचित मात्र चिंता न करते हुए बम तथा रिवाल्वर का प्रयोग करते देख पंडित गेंदालाल ने भी उसी नीति के अनुसरण करने का निश्चय किया | बाद में उस नीति के अनुसार कार्य करने के उपयुक्त साधन न मिल सके , अतएव आपने शिवाजी के मार्ग का अनुसरण करने का निश्चय किया |
कार्य आरम्भ करने पर आपको यू .पी के शिक्षित समाज से बड़ी निराशा हुई | किसकी आशाओं पर कार्य आरम्भ होगा , यही चिंता उन्हें दिन रात घेरे रहती थी | बहुत कुछ विचार करने पर ध्यान आया कि देश में एक ऐसा भी दल है जिसमे अब भी वीरता के कुछ चिन्ह पाए जाते है | पाठक डरे नही , वह डाकुओ का दल था | इन लोगो के पास बहुधा अच्छे – अच्छे शस्त्र भी होते है | देश का सभी समाज इन लोगो से इसलिए घृणा करता है कि ये लोग जीवन – निर्वाह तथा दुरेच्छा – पूर्ति के लिए ही डाके डालते तथा चोरी करते है | जो हो पंडित गेंदालाल जी ने इन्ही लोगो को संगठित करने का निश्चय लिया | उनका विचार था कि इन लोगो का संग्रह कर अमीरों को लूटकर धन एकत्रित किया जाए , जिसके द्वारा शिक्षा का प्रचार हो और उस दल के लोगो को भी सदाचार की शिक्षा दी जावे ताकि वे गरीब तथा निर्बलो पर अत्याचार न कर सके और इसी प्रकार धन एकत्रित कर अस्त्र – शस्त्र का संग्रह कर सरकार को भयभीत करते रहे |
कुछ दिनों तक इसी प्रकार कार्य होता रहा | समिति के बहुत से सदस्य बन गये , किन्तु सब अशिक्षित थे | पंडित जी को इससे कुछ शान्ति मिली | आप कुछ अध्ययन करने के लिए बम्बई गये | वहा से लौटने पर आपको कुछ ऐसे युवको से मिले जिनसे आपको आशा बंधी कि संयुकत प्रांत में भी बंगाल की भाँती राजद्रोही समिति की नीव डाली जा सकती है | इन्ही दिनों पंडित जी की एक युवक से भेट हुई | आप भी पुलिस के अत्याचारों से व्यथित होकर घर से निकल पड़े थे | आपने एक प्रसिद्द धनुर्धर से शिक्षा प्राप्त की थी | इनके मिलने से समिति का कार्य जोरो से चलने लगा | इन महाशय का नाम सुविधा के लिए हम ‘’ब्रम्हचारी जी ‘’ धरे देते है | इन्होने चम्बल तथा यमुना के बीहड़ो में रहने वाले डाकुओ को संगठित किया और ग्वालियर – राज्य में निवास करने लगे | थोड़े ही दिनों में इनके पास एक बहुत बड़ा दल हो गया और धन भी खूब एकत्रित किया गया | इसी बीच गेंदालाल जी ने भी अपने कार्य को कुछ विस्तार दिया | बहुत से शिक्षित युवक भी दल में सम्मिलित हो चुके थे | कुछ कार्य भी किया गया था | किन्तु धन की कमी ने बाधा उपस्थित कर दी | ब्रम्हचारी जी का दल बहुत धन एकत्रित कर चुका था | अस्तु पंडित जी ने उनसे मिलकर धन लाने का निश्चय किया | इस निश्चय के पूर्व ही ‘’मातृवेदी ‘’ नामक संस्था का संगठन किया जा चुका था | यही संस्था आगे चलकर मैनपुरी – षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्द हुई | उक्त संस्था के कार्यकर्ता भी चुने जा चुके थे |
मातृवेदी का संगठन करने के बाद आप ब्रम्हचारी जी से मिलने ग्वालियर गये . उस समय ब्रम्हचारी जी के दल को गिरफ्तार करने के पूरे प्रयत्न हो रहे थे | दल के एक व्यक्ति हिन्दू सिंह को प्रलोभन दिया गया कि यदि वह किसी भाँती इस दल को गिरफ्तार करा दे तो उसे राज्य की ओर से इनाम भी मिलेगा और जायदाद भी दी जायेगी | वह राजी हो गया और दल को पकडवाने का षड्यंत्र रच डाला | डाका डालने का एक स्थान निश्चय किया गया | निवास स्थान से जगह इतनी दूरी थी कि पहुचने में दो दिन लगे और एक पडाव जंगल में देना पडा | उस समय केवल दल में केवल 80 मनुष्य थे | जब एक रात चलकर सब थक गये और भूख भी लगी तो राज्य के भेदिये जाकर सबको निश्चित जंगल में ठहरा दिया और स्वंय अपने किसी सम्बन्धी के यहाँ भोजन लेने लगा | सब सामान पहले से ठीक था | थोड़ी देर में गर्मा –गरम पुडिया आ गयी | आज कुछ होना ही ऐसा था कि जो ब्रह्मचारी जी कभी किसी के यहाँ का भोजन न करते थे उन्होंने ने भी विश्वासघाती के आग्रह करने पर पुडिया ले ली | खाते जी जबान ऐठने लगी | उसी समय विश्वासघाती ने पानी लेने के बहाने वहा से चल दिया | पूड़ियो में इतना जहर मिला था कि पेट में पहुचते ही अपना असर दिखाया | ब्रम्हचारी जी ने सबको पुडिया न खाने का आदेश कर विश्वासघाती पर गोली चलाई , किन्तु विष की हलाहल के कारण निशाना खाली गया | बन्दुक की आवाज सुनते ही अन्य साथी सम्भाल भी न पाए थे कि चारो और से सैकड़ो बन्दूको की आवाजे सुनाई दी | जंगल में पाच सौ सवार छिपे खड़े थे | दोनों और से खूब गोली चली | जब तक इनमे कुछ होश रहा तब तक गोलिया चलती रही | ब्रम्हचारी जी के यो तो हाथ पैर में कई गोलिया लगी , किन्तु अंत में एक गोली से हाथ बिलकुल घायल हो गया और बन्दुक हाथ से गिर गयी पंडित गेंदालाल जी को कई छर्रे लगे | एक छर्रा उनके बाई आँख में लगा जिसके कारण वह आँख जाती रही उस समय दल ले लगभग 35 मनुष्य खेत रहे | पंडित गेंदालाल ब्रम्हचारी जी तथा उनके अन्य साथी पकडकर ग्वालियर के किले में बंद किये गये | गिरफ्तारी का समाचार सुनकर ‘’मातृवेदी ‘’ के कुछ सदस्य किले में जाकर महल देखने के बहाने से पंडित जी से मिले | सब हाल जानकार निश्चय किया गया की जैसा भी हो पंडित जी ko kaise छुडाया जाए | नेता की गिरफ्तारो से शिक्षित युवको के हृदय पर बड़ा प्रभाव पडा | वे दूने उत्साह से काम करने लगे | कार्य ने अच्छा विस्तार पाया | शक्ति का भी संगठन हो गया था , किन्तु कई असावधानियो के कारण मामला खुल गया और गिरफ्तारिया शुरू हो गयी | मामला बहुत बढ़ गया और मैनपुरी – षड्यंत्र के नाम से कोर्ट में अभियोग चला | सरकारी गवाह सोमदेव ने पंडित गेंदालाल को इस षड्यंत्र का नेता बताते हुए ग्वालियर में उनके गिरफ्तार होने का हाल कह सुनाया | अस्तु आप ग्वालियर से मैनपुरी लाये गये | किले में बंद रहने तथा अच्छा भोजन न मिलने के कारण आपका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था | आप इतने दुर्बल हो गये की ग्वालियर से मैनपुरी जेल जाने में ( केवल एक मील ) आठ जगह बैठना पड़ा | आपको तपेदिक का रोग हो गया | जेल पहुचकर आपको सारा हाल मालूम पडा | आपने पुलिस वालो से कहा कि तुम लोग इन बच्चो को क्यों गिरफ्तार किया है | बंगाल तथा बम्बई के विद्रोहियों में से बहुतो के साथ मेरा सम्बन्ध है | मैं बहुतो को गिरफ्तार करवा सकता हूँ इत्यादि | दिखावे के लिए दो – चार नाम भी बता दिए | पुलिस वालो को निश्चय हो गया कि किले के कष्टों के कारण यह सारा हाल खोल देगा | अब क्या था , पंडित जी सरकारी गवाह समझे जाने लगे | उन्हें जेल से निकाल कर सरकारी गवाहों के साथ कर दिया गया | आधी रात के समय जब पहरा बदल गया तो कमरे में अन्धेरा था | लालटेन जलाने पर मालूम हुआ कि पंडित गेंदालाल एक और सरकारी गवाह रामनरायन के साथ गायब है | बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी कुछ फल न हुआ और उनमे से कोई भी बाद को पुलिस के हाथ नही आया |
पंडित गेंदालाल रामनरायन के साथ भागकर कोटा पहुचे वहा आपके सम्बन्धी थे , उन्होंने आपकी बड़ी सहायता की | किन्तु आपकी वहा भी बड़ी तलाश हो रही थी अतएव उस जगह अधिक दिन न ठहर सके | कोटा से विदा होने के पूर्व एक विशेष घटना और घटी | रामनरायन का मष्तिष्क फिर बिगड़ गया , उसके दिल में न जाने क्या सूझी पंडित जी भाई ने जो रूपये और कपड़े दिए थे वो पंडित जी को कमरे में बंद कर के भाग गया | पंडित जी उस कोठरी में तीन दिन तक बिना खाना खाए पड़े रहे रोग का जोर निर्बलता , यह पंडित जी का ही साहस का ही साहस था अंत में व्यथित होकर किसी तरह से वहा से मुक्त हुए | जो व्यक्ति एक मील चलने में आठ बार बैठा हो , वह किस प्रकार इस अवस्था में पैदल सफर कर सकता है ? एक पैसा पास में न हो किन्तु फिर भी जैसे – तैसे आगरा पहुचे | आगरा में दो – एक मित्रो ने कुछ सहायता दी | रोग सांघातिक रूप धारण कर लिया था | कोई भी ऐसा न था , जिसके यहाँ एक दिन भी ठहर सकते सभी मित्रो पर आपत्ति आई हुई थी | अस्तु – कही भी ठहरने का स्थान न मिलने पर विवश हो आप घर चले आये आपको देखकर सब बड़े भयभीत हुए | सोचा , पुलिस को बुलाकर आपको गिरफ्तार करा दिया जाए | इस पर आपने अपने पिता को बहुत कुछ समझाया और कहा –‘’ आप घबडाए नही ‘ मैं बहुत शीघ्र आपके यहाँ से चला जाउंगा ‘’ अंत में दो – तीन बाद आपको घर त्यागना पडा | उस समय आपको दस कदम चलने पर मूर्छा आ जाती थी | आपने दिल्ली जाकर जीवन – निर्वाह के लिए एक प्याऊ पर नौकरी कर | स्वास्थ्य दिनोदिन बिगड़ रहा | अस्तु अपनी अवस्था का परिचय देते हुए आपने अपने एक निकट आत्मीय को पत्र लिखा | पत्र पाते वह सज्जन आपकी पत्नी को लेकर देहली आ गये |
बहुत कुछ पर्यटन करने पर भी अवस्था दिनोदिन खराब होती गयी और आपको घड़ी – घड़ी पर मूर्च्छा आने लगी | | दुखिया भारत की स्थिति देखकर मेरी अवस्था हो गयी है | तुम लोग दुःख मत करना | यदि देश – सेवा हेतु मेरे प्राण चले गये तो मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया | यदि तुम लोग इस कार्य में सहायता करोगे तो मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी |
फिर पत्नी को सम्बोधन किया – तुम रोती क्यों हो ? पत्नी ने रोते हुए उत्तर दिया मेरा संसार में कौन है ?
पंडित जी ने एक ठंठी सांस ली मुस्कुराकर कहने लगे – ‘’ आज लाखो विधवाओं का कौन है ? लाखो अनाथो का कौन है ? 22 करोड़ भूखे किसानो का कौन है ? दासता में जकड़ी हुई भारत माता का कौन है ? जो इन सबका मालिक है वही तुम्हारा भी | तुम अपने आपको परम सौभाग्वती समझना , यदि मेरे प्राण इसी प्रकार देश – प्रेम की लगन में निकल जावे और मैं शत्रुओ के हाथ न आऊ | मुझे तो दुःख तो केवल इतना है कि मैं अत्याचारियों को अत्याचार का बदला न दे सका , मन ही मन में रह गयी | मेरा यह शरीर नष्ट हो जाएगा , किन्तु मेरी आत्मा इन्ही भावो को लेकर फिर दूसरा शरीर धारण करेगी | अबकी बार नवीं शक्तियों के साथ जन्म लेंगे शत्रुओ का नाश करूंगा ‘’
उस समय उनके मुख पर एक दिव्य ज्योति का प्रकाश छा गया | आप फिर कहने लगे रहा खाने – पीने का , सो तुम्हारे पिता जीवित है | तुम्हारे भाई है , मेरे कुटुम्बी है ; और फिर मेरे मित्र है जो तुम्हे अपनी माता समझ तुम्हारा आदर करेंगे | पंडित जी को अस्पताल भर्ती कराकर उनकी स्त्री को यथास्थान कर आये | जब लौटकर लोग आये तो देखा पंडित जी आत्मलीन हो चुके थे , कवक उनका शरीर पड़ा था उस समय दिन को दो बजे थे और दिसम्बर 1920 की 21 वी तारीख थी |
जिस देश के लिए सर्वस्त्र त्यागा , सारे कष्ट सहे और अंत में प्राण दे दिए , उस देश में किसी ने यह भी न जाना कि पंडित गेंदालाल कहा विलीन हो गये ! किन्तु जब भी क्रांतिवीरो का इतिहास फिर से लिखा जायेगा उस समय देशवासी आपके बलिदानों को जानेगे और आपका नाम सुनहरे हर्फो में लिखा होगा |
प्रस्तुती --- सुनील दत्ता ----- स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक

Thursday, November 24, 2016

हद हो गईल नोट बंदी के सबकर इज्जत दांव पर -- मगरू

अपना शहर मगरुवा

हद हो गईल नोट बंदी के सबकर इज्जत दांव पर -- मगरू
आखिर कल मगरुवा संजय जी के बगल में आकर बैठ गया दुआ सलाम किया और लगा पूछने संजय बाबू से कि नोट बंदी पे राय का ह आपके ? संजय बाबू लगे कहने यार का बताई गयनी हम आपन पइसा निकाले जब हमार नम्बर आइल तब खिड़की बंद हो गएल सरवा अब का करी न्योता कैसे होई लगली सोचे तबले उ बैंक वाला कहलस रेजगारी हवे पांच हजार दू रुपया वाला लेबा त बोला
का करती उहे लेहनी संजय राय से बात कईनि उ कहने भइया खुदे हमारे खचिया भर के सिक्का ह कौउनो तरीके से हमार मित्र लोगन सम्मान बचा लेहने | अब का बताई नोट बंदी पर इ कौन सम्विधान में लिखल बा की तोहार जमा पइसा बस इतने निकली एतना जरा कही लिखल ह त बतावा तबले रंजन बोल देहने की हम त अपने दुकान में इ कह देहनी की जेकरे पइसा न हवे उ दवाई ले जाये ओकरे जब होई तब दे देइ मगरू ने मुस्कुरा के कहा बहुत बड़ा काम कईला भाई लेकिन आज तक भूमिहारन के एक्को पइसा केहू पचा न पईलस -- बगले एक एगो लोकनिर्माण के बाबू सुधीर श्रीवास्तव जी चाय पियत रहने फट्टे बोलने भइया तोके किस्स्वा मालुम हवे की ना बनारस में एक जगह सब बिरादरी के खोपड़ी टंगल रहे एकगो खोपड़ी में ताला बंद रहे ए गो विदेशी आयेल उ लगल खोपड़ी देखे सब बिरादरी के खोपड़ी जब देख लेहलस आख़री में पुछ्लस कि इसमें ताला क्यों बंद है ? जे देखावत रहे उ कहलस यह खोपड़ी भूमिहार की है |मगरू ने कहा वैसे रंजन राय जहा झूठन गिरा देवेने उ नेता एम् एल ए एम् पी मंत्री बन जालाल कुछ दिन पहिले एक जगह जूठन गिरउने उहो बड़ा नेता हो गयिने | जय हो - जय हो

Sunday, November 13, 2016

आजादी या मौत --- vol - 2 13-11-16



विदेशो में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन



‘’ अप्रवास की परिधि से बाहर , राजनितिक कार्यो के कारण मुकदमो के शिकार , निष्कासन की धमकियों से त्रस्त , नागरिकता से वंचित , भूमि के स्वामित्व से विहीन , यहाँ तक कि उन राज्यों द्वारा , जहा अधिकांशत: वे रहते थे , जीवन साथी के चयन में भी बंधित भारतीय अब उस लघु समुदाय के अंग रह गये थे , जो अमेरिकनों से एक विशाल श्वेत दीवार से अलग कर दिए गये थे ‘’| - जोंन  जैसन
पैसेज फ्राम इंडिया

दिन रात बढती रही भारतीयों अप्रवासियो की त्रासदी | संचार यंत्रो का विष वमन , संस्थाओं का उनके विरोध में धुँआधार प्रचार , उनके तथा जन प्रतिनिधियों के द्वारा निरंतर भारतीयों के निष्कासन की माँग , कानूनों द्वारा नये भारतीय अप्रवासियो के कनाडा और अमेरिका में प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध |  देश से दस हजार मील दूर संख्या में इतने कम , जहा उनको सुनने वाला न अपना देश , न उनके देश पर शासन करने वाली फिरंगी सरकार और न वह इंग्लैण्ड , जिसके साम्राज्यों की आधी संख्या ने सैनिको के रूप में किया निष्ठा भरा समर्पित बलिदान |
उन्हें यह समझते देर न लगी कि गोर साम्राज्य को अपनी सेवाए अर्पित कर यह समझना कि उन्हें उस साम्राज्य के हर उपनिवेश को अपना घर बनाने का अधिकार मिल गया था , मात्र एक भ्रम था वे कनाडा , आस्ट्रेलिया आदि की रक्षा में अपने प्राण तो गंवा सकते थे , पर उन गोरो के प्रदेशो में बसकर उनकी शुद्दता को नष्ट करने की कल्पना भी साम्राज्य को स्वीकार न थी | पग पग पर अपमानित करके यह अहसास उन्हें दिन रात दिलाया जाता था | अपनी सुरक्षा और अल्पमत अधिकारों की माँग को रखने के लिए उन्होंने कनाडा और अमेरिका में अलग अलग नीतिया अपनाई |

जहा तक कनाडा में आये भारतीयों का प्रश्न है , उन्होंने प्रतिवेदनो और कानूनों का सहारा लेने का प्रयास किया | उन्होंने कनाडा की सरकार द्वारा प्रस्तावित इस योजना पर भी गंभीर विचार किया कि भारतीय लोग कनाडा न आकर अंग्रेजो के अधीन टापू हाण्डूरस में जाकर बसे |
इसकी सम्भावना को अमली जामा पहनाने से पहले उन्होंने मिस्टर हारकिन नाम के अंग्रेज की छत्रछाया में सरदार नागर सिंह कोटली और सरदार शामसिंह डोगरा नामक दो व्यकियो का प्रतिनिधि मंडल हाण्डूरस भेजा | 1908 में गये इस प्रतिनिधि मंडल ने हाण्डूरस  को नारकीय पाया , जहा बसे कुछ भारतीय गुलामो से भी बत्तर जीवन जी रहे थे | कनाडा में आये भारतीयों को वहा जाकर नर्क का जीवन बिताना किसी भी अवस्था मे स्वीकार न था |

अपने उपर लगे पाबन्दिया के विरोध में 16 अप्रैल 1911 में वैनकुअर गुरुद्वारे में हुई एक विशाल सभा में उन्होंने कई प्रस्ताव पास किये , जिनकी प्रतिलिपिया कनाडा और भारत की सरकारों को भेजी गयी | इसी सभा में भी यह तय किया गया कि दो व्यक्ति भारत जाकर अपने परिवार को लाने का प्रयतन करे | उनके प्रवेश न पाने के आधार पर मुकदमा दायर किया जाए |
खालसा दीवान सोसायटी के प्रधान भाई भागसिंह और गुरुद्वारे के मुख्य ग्रन्थि बलवंत सिंह पंजाब गये | परिवार के साथ वापस वैनकुअर आने पर अधिकारियों ने उन्हें उतरने न दिया | इस पर सारे कनाडा में भारतीयों में रोष फ़ैल गया | प्रस्तावों , पत्रों तारो का अम्बार लग गया | प्रेस ने भी साथ दिया | भारत में और कनाडा में अनेक संस्थाओं ने इस अमानवीय व्यवहार कि निंदा की |
अंत में परिवारों को जमानत देकर प्रवेश मिला और अदालत की शरण ली गयी |
उसी वर्ष 25 नवम्बर को खालसा दीवान सोसायटी और युनैतेद इंडिया लीग ने कनाडा की केन्द्रीय सरकार के पास अपना प्रतिनिधि मंडल ओटावा भेज दिया |
डाक्टर सुन्दर सिंह , संत तेजासिंह , राजासिंह एवं पादरी एल डब्ल्यू हाल का यह मंडल प्रधानमन्त्री से मिला | न्याय का भरोसा दिलाने पर भी मई 1912 में इन परिवारों को देश छोड़ने का आदेश मिला | हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से सरकार ने विशेष रियात कर परिवारों को रहने दिया | कानून नही बदला |
1911 में ही समस्त ब्रिटिश उपनिवेशों का सम्मेलन लन्दन में हुआ | वहा   भारतीयों ने सब देशो के प्रधानमन्त्रियो से न्याय की असफल अपील की | इससे अंग्रेजो की नियत और नीतियाओ का भंडाफोड़ तो हुआ ही |
22 फरवरी 1913 में आयोजित कनाडा और अमरीका में रहने वाले भारतीयों की विशाल सभा ने निर्णय लिया कि भाई नन्दसिंह बलवंत सिंह और नारायण सिंह का एक प्रतिनिधि मंडल लन्दन और भारत भेजा जाए | उन्होंने लन्दन में और भारत के अनेक नगरो में अधिकारियो से भेट की और जनसभाओ को सम्बोधित किया | भारतीयों की त्रासदी पर लेख लिखे समाचार पत्रों को साक्षात्कार दिया | सब धर्मो और राजनितिक दलों के नेताओं से मिले | सब और से जनसमर्थन पर भी परिणाम शून्य ही रहा | यहाँ तक की 24 नवम्बर 1913 को ब्रिटिश कोलम्बिया राज्य की हाई कोर्ट द्वारा भारतीयों के पक्ष में निर्णय दिए जाने पर कनाडियन सरकार की नीतियों में जरा भी अंतर नही पडा |
 यही नही , धीरे धीरे भारतीयों की समझ में यह आने लगा कि ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा / सेवा में चाहे वे अपना तन मन धन सब कुछ न्यौछावर कर दे , तो भी कभी भी किसी गोरो के उपनिवेश में आदर नही पा सकते |
इसी चिंतन ने इन ब्रिटिश सरकार परसत लोगो के मन में राष्ट्रीयता और एकता की भावना को जन्म दिया | विदेशो की धरती पर |
1909 में हिन्दुस्तान एसोसिएशन की स्थापना हुई | बदलती परिस्थितियों में यह संस्था न केवल भारतीयों के हितो की रक्षा के लिए कटिबद्द थी , वरन  अंग्रेजो के विरुद्द भारतीय स्वतंत्रता की पक्षधर भी होती गयी |
इस प्रकार जो लोग राजनीति के प्रति पूर्णत: उदासीन थे , ब्रिटिश साम्राज्य को अपना हितैषी समझते थे , रोजी रोटी कमाना मात्र ही जिनका ध्येय था , जीवन की पाठशाला में शिक्षा पाकर राजनितिक चेतना के अग्रदूत बन गये | बस उन्हें दिशा देने वाले किसी ज्योति स्तम्भ की तलाश थी | अपमानित और आहात होकर एक दिन उन्होंने ब्रिटिश सेना में किये कामो के लिए पाए अलंकरण और वीरता के प्रशस्ति पत्र / तमंचे जिन्हें वे अपने जीवन की अमूल्य उपलब्धि/ निधि मानते थे अग्नि को भेट कर दिए |

और रही सही कसर पूरी कर दी क्रांतिकारी ग्रंथी भाई भगवानसिंह के निष्कासन ने | ज्ञानी भगवान सिंह अमृतसर जिले के वाडिग ग्राम के रहने  वाले थे | उपदेशक कालिज , गुजरांवाला में शिक्षा प्राप्त कर वे वहा अध्यापक भी रहे | वे किसानो के हितो के आंदोलनों से जुड़े | पगड़ी सम्भाल जट्टा ‘’ आन्दोलन के प्रसिद्द नायक अमर शहीद भगतसिंह के चाचा अजित सिंह की गिरफ्तारी और देश निकाले के बाद वे भी हांगकांग चले गये | वहा गुरुद्वारे में तीन साल ग्रंथी रहे | वे एक सफल वक्ता थे लोकप्रिय थे | उनके प्रवचन में भीड़ रहती थी | सिख धर्म और दर्शन के विशेषज्ञ  होने के साथ साथ वे देशभक्ति से ओत प्रोत थे | उनके क्रांतिकारी भाषण के कारण उन्हें दो बार गिरफ्तार किया गया | अंत में अप्रैल 1913 में वे कनाडा आ गये और वैनकुअर गुरुद्वारे के ग्रंथी बन गये |

ज्ञानी  भगवान सिंह ने अपने क्रांतिकारी भाषणों से गुरुद्वारे को राष्ट्रीय आन्दोलन का मजबूत गढ़ बना दिया | लोगो के आक्रोश को और बल मिला | क्नादिओयन सरकार ने उनके कनाडा प्रवेश को अवैध घोषित करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया | जमानत पर छूटकर वे मुकदमा लड़ रहे थे | किन्तु मुकदमे के फैसला होने से पहले ही 18नवम्बर 1913 की रात को उन्हें सोते हुए गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी मुश्क बांधकर एक जापानी जहाज में चढा दिया | जापान जाकर वे टोकियो में हिंदी / उर्दू और इस्लाम धर्म / दर्शन के प्रोफ़ेसर बरकत उल्लाह के पास रहे |
इस प्रकार जहा न्यूयार्क में आयरिश राष्ट्रवादियो से प्रभावित भारतीयों ने अपनी संस्था बनाकर स्वदेशी लोगो में राष्ट्रीयता की भावनाए जगानी शुरू की थी , वही न्यूयार्क से वैनकुअर गये संत तेजासिंह ने यह घोषणा  की उनका मिशन गुरु नानक ने स्वपन में दर्शन देकर निर्धारित किया है , सिख सिपाहियों को आवाहन किया कि वे ब्रिटिश सम्राट को धरती पर प्रभु का प्रतिनिधि न माने और उनकी वफादारी उसके प्रति नही देश के प्रति होनी चाहिए | भारत से आये छात्रो में तो देशभक्ति की भावना भारत में ही पैदा हुई थी |
1907 में भारत से निष्काषित रामनाथ पूरी  ने उर्दू भाषा में सर्कुलर आजादी निकालना शुरू कर दिया | उसके माध्यम से राष्ट्रचेतना को जगाने के साथ भारतीयों को बन्दुक आदि शस्त्रों में प्रशिक्ष्ण देने , जापानी जुडो आदि का अभ्यास कराने और भारत के प्रति अमरीका में हमदर्दी पैदा करने की प्रेरणा दी |
बंगाल में चल रही स्वदेशी की लहर को समर्थन दिया | सियेटल में विश्व विद्यालय के छात्र तारकनाथ दास , जिसे अपने विचारों के कारण ब्रिटिश सरकार के दबाव में अप्रवास विभाग में दुभाषिये की नौकरी से हटाया गया था ने पहले वैनकुअर( कनाडा ) से फिर सियेटन ( वाशिगटन राज्य , अमरीका ) से फ्री हिनुस्तान नाम का मासिक पत्र निकला क्रान्ति के लिए राजनितिक चेतना जगाने के लिए | उसके प्रथम पृष्ठ पर सबसे उपर छपा था --- हरबर्ट स्पैन्सर का वाक्य ,’’ ‘’ अन्याय का विरोध करना प्रभु के आदेश का पालन करना है |’’ उधर भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश से आये गुरुदित्त कुमार जो कलकत्ता में उर्दू पढ़ाने के समय बंगाली क्रान्तिकारियो के सम्पर्क में आये थे , स्वदेश सेवक नाम से पंजाबी पत्र निकालने लगे | उसमे भारत के लिए पूर्ण स्वराज की आवाज उठाई गयी थी | विदेशियों द्वारा लूटमार को समाप्त करके स्वदेशी भावना , व्यापार का विकास करने की प्रेरणा दी | ब्रिटेन में राष्ट्रीय भावनाओं को बढाने के लिए श्याम जी कृष्ण वर्मा के द्वारा इंडिया हाउस की स्थापना से प्रेरणा लेकर जी डी कुमार ने स्वदेश सेवक होम बनाया | श्याम जी कृष्ण वर्मा के पत्र इन्डियन सोशियोलोजिस्ट की तरह था तारकनाथ दास का फ्री हिन्दोस्तान | 1909 में हिन्दुस्तान एसोसियेशन भी बनाई गयी थी , जी डी कुमार उसका मंत्री था जी डी कुमार हरनाम सिंह साहरी भारतीय श्रमिको के साथ छोटी छोटी टोलियों में यहा वहा जाते जहा श्रमिक काम करते थे |
स्वदेश सेवक द्वारा भारतीय विशेषत: सिख सैनिको को क्रान्ति का संदेश दिया जाता था | भारत में बड़ी संख्या में भेजे जाने से अंग्रेजी सरकार की आँखों में काटा बन गया यह पत्र और 1911 में इसके भारत प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | सिएटल आने पर कुमार और दास ने यूनाइटेड इंडिया हाउस कि स्थापना की | इस प्रकार धीरे धीरे वैनकुअर और अमरीका के प्रशांत महासागरीय राज्यों में भारतीयों ने सगठन बनाने शुरू किये एकता और भारत की स्वतंत्रता को समर्पित | १९१२ में पोर्टलैंड ( ओरोगन राज्य ) में  हिन्दुस्तान एसोसियशन आफ दी पैसेफिक कोस्ट बनाई गयी | बाबा सोहन सिंह भकना प्रधान , जी डी कुमार मंत्री और पंडित काशीराम इसके कोषाध्यक्ष चुने गये |साथ ही यह तय किया गया इस संस्था का दी इंडिया नाम का एक पत्र साप्ताहिक उर्दू में निकलेगा , जिसका सम्पादन जी डी कुमार करेंगे |
इस संस्था का उद्देश्य भारत में स्वदेशी भाषाओं के पत्र मंगाकर प्रसारित करना , भारत से छात्रो को बुलाकर उन्हें शिक्षा दिलाकर देश सेवा में जीवन समर्पित करने की प्रेरणा देना , राष्ट्रीय हितो पर विचार करने के लिए साप्ताहिक बैठके करना था | सर्दियों में इस संस्था की एक शाखा एस्टोरिया में स्थापित की गयी | इसके अधिकारी थे भाई केसर सिंह प्रधान , मुंशी करीम बख्श मंत्री और मुंशीराम कोषाध्यक्ष |

असोसिएशन की चार मीटिंग ही हुई थी कि जी डी कुमार बीमार हो गये , उन्हें अस्पताल में भरती कराना पडा | साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ होने से पहले रुक  गया | इसी बीच लाला ठाकुरदास , जो देश निकाला की सजा काट रहे क्रांतिकारी थे , पोर्टलैंड आ गये | उससे पहले वे पेरिस में मैडम कामा तथा एस आर राणा के साथ काम कर रहे थे | जब उन्हें बताया गया कि संस्था 1907 के पंजाब किसान आन्दोलन के नेता भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह का विचार कर रही थी , तो उन्होंने सुझाव दिया कि लाला हरदयाल को बुलाया जाए , जो उस समय अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में ही थे | 1912 की शरद ऋतू में लाला हरदयाल को सेन्टजान ( पोर्टलैंड के निकट ) आने का निमंत्रण दिया गया | उन्होंने यह स्वीकार भी कर लिया |

प्रस्तुती --- सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक
      क्रमश:
आभार आजादी या मौत --- वेद प्रकाश वटुक

Friday, November 11, 2016

मोदी जी मजूरन के घरे चूल्हा न जल्ल -- मगरुवा 12-11-16

अपना शहर मगरुवा


मोदी जी मजूरन के घरे चूल्हा न जल्ल -- मगरुवा
कैफ़ी के इस नज्म के साथ ----
'' कोई तो सूद चुकाए , कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का , जो आज तक उधार सा है '

आज जब सुबह मगरू अपने ठीहा से निकला तो देखा उसके साथी लोग भीड़ में एक व्यक्ति से बात कर रहे थे , भीड़ होने के कारण वो कुछ देख नही पा रहा था सो वो भी भीड़ के अन्दर घुसा - देखा और मुस्कुराकर कर कहा दत्ता बाबू राम - राम मैंने भी उसे देखा और पूछा का हाल बा मगरू भाई क्या हाल है मगरू ने तपाक से जबाब दिया हाल तो बुरा है दादा हर तरफ से ग्र्रेब ही मारा जाता है , एक तो प्रदेश सरकार ने तिहादी माजुरो के लिए कोई ऐसी योजना नही बनाई की उ तीसो दिन काम करके अपने परिवार के भेट भर सके अगर योजना बनल भी ह त एमन्न लेबर आफिस के चक्कर काटत रहा महीना - महिना अउर कोनौवो नेता प्रेत के पकड़ा तब कुछ काम बनी ऐसे कौवनों काम न होके बा जेकर सरकार ओकरे मनई के कम हो जाई बाकी सब भरसाई में जाए तभी वह खड़ा एक मजूर बोला बाबू हम जात के तेली हई का बताई महिना में पाँच या दस दिन तिहाड़ी मिल जात बा आप बताई दूई दू लड़की इकठे लड़का बाबू बतावा आपे सबकर पेट कैसे भर जाए कब्बो चाउर बा त दाल ना कब्बो सब्जी बा त मसाला तेल ना आखिर बाबू प्रदेश सरकार ह्म्हन से वोट त ले लेवे ला सरकार भी बना लेला ओकरे बाद पांच साल बाद फिर पुछेला वही खड़ा मगरू का एक साथी पप्पू यादव जो सठियाव क्षेत्र का रहने वाला है मगरू भाई हमउ बाबू से कुछ कहल चाट हई हमने उससे बोला बताओ
पप्पू यादव ने कहा कि साहब सपा के सरकार बा अखिलेश यादव अउर मुलायम यादव आके चीनी मिल फिर से चालु करने हमन्ने सोचनी चला इही में तिहाड़ी कए के अपने परिवार के पेट पालल जाई पर साहब उहो सर्वा उहा भी तिहाडी मजूर के रूप में काम न ह कब्बो – काम मिलत बा कब्बो ना अब बतावा बाबू हमन्ने का कइल जाए साहब इ सरकार चोर बा अहीरे के नाम पर हमन्न जेसन लोगन से वोट लियेहे ओकरे बाद बडकवा अहीरन के भला करिये ह्म्हं जैसन अदमी का कउन भला ह्म्हन जैसन क कउनो सरकार आवे कउनो भला न बा तभी उसी में से मगरू का एक साथी और चिल्लाया साहब हमरो सुन ला कुछ इन्द्रपत यादव ने कहा साहब कउनो तरीके से हम सब काम क जोगाड़ करके कुछ कमात भी हई टी बड़े साहब लोगन पांच सौ हजार थमा देत बाने साहब बतावल जाए ह्म्ह्ने कहा जाई साहब रोटी के अकाल पड़ गएल बा अउर मोदी जापान भाग गयेने हम सब मजूर भुखमरी के शिकार बनी साहब केहू हमन्ने के बारे में कुछ न सोचत बा हे भगवान कब तक ह्म्हने ऐसे लुटात रहब एकेर कउनो उपाय न बा
तभी उनमे से एक नौजवान ने कहा बा बस इन्कलाब कईले के जरूरत बा ---
तब मंगरू ने एक शेर पढ़ा कैफ़ी का --
'' कोई तो सूद चुकाए , कोई तो जिम्मा ले
उस इन्कलाब का , जो आज तक उधार सा है ''

Monday, October 31, 2016

लियो टालस्टाय ------ 31-10-16

लियो टालस्टाय




टालस्टाय ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि मैं एक दिन जा रहा था एक राह के किनारे से , एक भिखमंगे ने हाथ फैला दिया | सुबह थी , अभी सूरज उगा था और टालस्टाय बड़ी प्रसन्न मुद्रा में था , इनकार न कर सका | अभी - अभी चर्च से प्रार्थना करके भी लौट रहा था , तो वह हाथ उसे परमात्मा का ही हाथ मालुम पडा | उसने अपने खीसे टटोले , कुछ भी नही था | दुसरे खीसे में देखा , वह भी कुछ नही था | वह जरा बेचैन होने लगा | उस भिखारी ने कहा कि नही बेचैन न हो : अपने देना चाहा , इतना ही क्या कम है ! टालस्टाय ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया | और टालस्टाय कहता है , मेरी आँखे आँसुओ से भर गयी | मैंने उसे कुछ भी न दिया , उसने मुझे इतना दे दिया | उसने कहा कि आप बेचैन न हो ! आपने टटोला , देना चाहा - इतना क्या कम है ? बहुत दे दिया !

न देकर भी देना हो सकता है | और कभी - कभी दे कर भी देना नही होता | अगर बेमन से दिया तो देना नही हो पाता | अगर मन से देना चाहा , न भी दे पाया , तो भी देना घाट जाता है --- ऐसा जीवन का रहस्य है |
बाटते चलो ! धीरे - धीरे तुम पाओगे , जैसे - जैसे तुम बाटने लगे ऊर्जा , वैसे - वैसे तुम्हारे भीतर से कही परमात्मा का सागर तुम्हे भरता जाता | नई - नई ऊर्जा आटी , नई तरंगे आती | और एक दफा यह तुम्हे गणित समझ में आ जाए ... यह जीवन का अर्थशास्त्र नही है . यह परमात्मा का अर्थशास्त्र है , यह बिलकुल अलग है | जीवन का अर्थशास्त्र तो यह है की जो है , अगर नही बचाया तो लुटे | इसको तो बचाना , नही तो भीख मागोगे !


कबीर ने कहा : दोनों हाथ उलीचिय ! उलीचते रहो तो नया आता रहेगा | बाटते रहो तो मिलता रहेगा | जो बचाया वह गया ; जो दिया वह बचा | जो तुमने बात दिया और दे दिया , वही तुम्हारा है अंतर के जगत में |