Thursday, November 15, 2018

राफेल - बोफोर्स - का माजरा ?

राफेल - बोफोर्स - का माजरा ?

फ्रांस के राफेल विमान सौदे की चर्चा पिछले दो - तीन माह से लगातार चल रही है | इस सौदे के जरिये वर्तमान केन्द्रीय सरकार तथा प्रधानमन्त्री पर इस सौदे के भारतीय भागीदार रिलायंस डिफेन्स कम्पनी के मालिक अनिल अम्बानी को अधिकतम एवं अवाछ्नीय लाभ पहुचाने का आरोप लग रहा है | अक्तूबर के शुरुआत में यह मामला उच्चतम न्यायालय में पहुच गया है | राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार के साथ उद्योगपति अनिल अम्बानी को लाभ पहुचाने के चलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमन्त्री को इस रक्षा सौदे का भागीदार बताते रहे है |
इस आरोप को निराधार नही कहा जा सकता | इस सन्दर्भ में तथ्यगत बात है कि 2012 में कांग्रेस नेतृत्व की संप्रग सरकार द्वारा 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए 54 हजार करोड़ के तय सौदे को अप्रैल 2015 में भाजपा नेतृत्व की वर्तमान सरकार द्वारा 36 राफेल विमानों के लिए 58 हजार करोड़ के सौदे को बदल दिया गया | उस समय के तय सौदे में एक विमान के 526 करोड़ रूपये के कीमत को अप्रैल 2015 में एक विमान की 1670 करोड़ रूपये की कीमत में बदल दिया गया | जाहिर है कि 2012 से लेकर 2015 तक के महज तीन सालो में अंतरराष्ट्रीय कीमतों मेवृद्धि से तथा अप्रैल 2015 तक रूपये के अवमूल्यन से भी विमान की कीमत में तीन गुना की मूल्य वृद्धि नही हो सकती |
कोई भी समझ सकता है कि तीन गुना मूल्य वृद्धि के साथ 126 लडाकू विमानों के 54 हजार करोड़ की जगह अब 36 विमानों के 58 हजार करोड़ के सौदे से राफेल विमान निर्माता एवं विक्रेता फ्रांसीसी कम्पनी डसाल्ट का लाभ अब पहले से कई गुना बढ़ जाना है | इसके साथ ही इस सौदे में भागीदारी बने भारतीय कम्पनी रिलायंस डिफेन्स को भारी लाभ मिलना निश्चित है | साथ ही अंतरराष्ट्रीयव राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा हथियारों सौदों के उच्च स्तरीय दलालों , रक्षा क्षेत्र के बड़े अधिकारियो को जरुर लाभ मिलना है | इसके अलावा इस सौदे से सरकार के उच्च पदों पर बैठे लोगो को भी प्रत्यक्ष भ्रष्टाचारी लाभ मिलना तय है | वैसे तो अंतरराष्ट्रीय सौदों में खासकर उच्च तकनीकी के मशीनों उपकरणों के आयात की सौदेबाजी में सरकार की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष भूमिका के साथ अत्यधिक लाभ एवं भ्रष्टाचार का होना आम बात है | फिर रक्षा सौदों में यह मामला इसलिए और ज्यादा होता है कि ऐसे सौदों के साथ राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर गोपनीयता का मामला आगे कर दिया जाता है | सौदों के बारे में भी कुछ ऐसा ही कहा भी जा रहा है | राफेल विमान सौदे की असलियत सामने आय या न आय , पर रक्षा सौदे के सन्दर्भ में असली बात तो यही है कि इनके अंतरराष्ट्रीय खरीद बिक्री में उच्चस्तरीय मुनाफाखोरी , दलाली एवं अन्य भ्रष्टाचार का काम पहले से होता रहा है | आधुनिक हथियारों लडाकू विमानों एवं अन्य सैन्य साजो - सामानों की मालिक अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यी कम्पनिया वैश्विक बाजार में भयंकर प्रतिद्वंदिता के चलते इस भ्रष्टाचार को बड़े स्तर पर बढ़ावा देती रही है | फिर उसे इस देश की और अन्य देशो की सरकारे स्वीकारती भी रही है | हाँ , अब इसमें एक महत्वपूर्ण अंतर जरुर आ गया है | 1990-95 तक सभी रक्षा सौदों में विकसित साम्राज्यी देशो की हथियार एवं लडाकू विमान आदि की निर्माता कम्पनियों के साथ अंतरराष्ट्रीय दलाल तथा भारत सरकार के मंत्री अधिकारी रक्षा विशेषज्ञ एवं उच्च सैनिक अधिकारी ही शामिल रहते थे | पर अब खासकर 2000 के बाद रक्षा क्षेत्र में निजीकरणवादी नीतियों को लागू करने के बाद से देश की निजी धनाढ्य कम्पनियों को भी रक्षा क्षेत्र में उद्पादन व व्यापार की छुट दे दी गयी है | इसलिए पहले के सौदों में लाभ खोरी के साथ भ्रष्टाचार में और ज्यादा उछाल आना लाजिमी है | कयोकी भारतीय रक्षा कम्पनी के रूप में अब इसमें एक नया मुनाफाखोर वर्ग शामिल हो गया है | यही कारण है कि 1980 के दशक में हुए बोफोर्स सौदे में अंतरराष्ट्रीय इटैलियन दलाल क्वालोची तथा भारतीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के साथ भारतीय दलाल बिन चड्डा , रक्षा सचिव एस के भटनागर को उस भ्रष्टाचार के लिए आरोपित किया गया था | पर अब रक्षा क्षेत्र में लागू किये गये निजीकरण के साथ प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी , रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण तथा 10 अप्रैल 2015 को हुए राफेल डील से महज 15 दिन पहले बनी उद्योगपति अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेन्स कम्पनी को मुख्य रूप से आरोपित किया जा रहा है | यह बात भी लगभग निश्चित है कि देश के रक्षा क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण के साथ आने वाले दिनों में रक्षा सौदों में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार एवं अवांछित लाभ के और ज्यादा मामले सामने आयेंगे | उच्च तकनीक वाले बोफोर्स तोप डील और राफेल ल;डाकू विमान डील जैसे रक्षा सौदों में इस भ्रष्टाचार का आधार आधुनिकतम हथियारों , लडाकू जहाजो पनडुब्बियो आदि के निर्माण व व्यापार में दुनिया के चंद देशो की अतिधनाढ्य कम्पनिया और उनमे वैश्विक बाजार के लिए चलती रही भयंकर प्रतिद्वंदिता है | इस प्रतिद्वंदिता में अमेरिका , रूस , इंग्लैण्ड , फ्रांस व अन्य देशो की साम्राज्यी कम्पनियों के साथ वहाँ की सरकारे शामिल रहती है | उन देशो की सरकारे अपने यहाँ के रक्षा सामानों की अंतरराष्ट्रीय सौदों का प्रतिनिधत्व भी करती रहती है | अपने बिक्री बाजार को बढाने के लिए ये कम्पनियों अपने और खरीददार देशो के सरकारों के प्रतिनिधियों मंत्रियों अधिकारियो को सीधे - सीधे या फिर अंतरराष्ट्रीय दलालों के जरिये अपने पक्ष में कर लेने का हर भ्रष्टाचार करती है | भारत जैसे तमाम पिछड़े व विकासशील देशो की सैन्य या गैर सैन्य औद्योगिक मालो - सामानों के उत्पादन - व्यापार में लगी धनाढ्य कम्पनिया भी इन देशो की सरकारों पर रक्षा सौदों के लिए दबाव बनती रहती है | फिर भारत जैसे देशो में उच्च तकनिकी के सिने साजो - सामानों के बढ़ते आयात का दुसरा आधारभूत कारण इन देशो में तकनिकी पिछड़ेपन के साथ हर क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकी विकास को प्रोत्साहन न देना या उसे हतोत्साहित करते रहना था और है |इन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आधारों के साथ अंतर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर निजी साम्राज्यी व पूजीवादी कम्पनियों को अधिकाधिक छुट देने बढाने के फलस्वरूप रक्षा क्षेत्र में करोड़ो अरबो के होने वाले अत्यधिक व अवांछित लाभों भ्रष्टाचारो को रोका जाना कदापि सम्भव नही है | हाँ उसे उठाकर इस उस सरकार को निशाना जरुर बनाया जा सकता है | उसके राजनितिक इस्तेमाल के साथ उसको चुनावी मुद्दा बनाकर सत्तासीन पार्टी को अपदस्थ करने का कम भी किया जा सकता है | पर उस भ्रष्टाचार को रोका नही जा सकता |

एक बात और -
रक्षा सौदों में अत्यधिक लाभ एवं भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात की अनदेखी करने या उस पर पर्दा डालने का सबसे बड़ा सबूत यह है की ऐसे हर भ्रष्टाचार में उस भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा लाभ कमाने वाली तथा उसे बढावा देने वाली अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों पर कोई इल्जाम नही लगता | उदाहरण तोप सौदे में दलाली करवाने और देश के अधिकारियो की करोड़ो का घुस खिलाने वाली स्विट्जरलैंड की बोफोर्स कम्पनी को लगभग मुक्त रखा गया | उसी तरह राफेल लडाकू विमान की ड्सालट कम्पनी पर कोई इल्जाम नही लगाया जा रहा है | सारा इल्जाम बिचौलियों पर ही लगाया जा रहा है | जाहिर है ऐसे लोगो से आप राष्ट्रहित जनहित की आशा भी नही कर सकते |

Wednesday, November 14, 2018

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार
नौजवानों का असहयोग आन्दोलन से मोहभंग और क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश
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1915 में दक्षिण अफ्रिका से लौटने के बाद गांधी जी ने भारतवर्ष की राजनीति में भी हलचल पैदा करना शुरू कर दिया था |
उधर 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक के निधन के बाद गांधी जी के हाथ में कांग्रेस की बागडोर आ गयी | दिसम्बर 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने घोषणा की कि यदि सब लोग तन - मन - धन से उनके कार्यक्रम को सहयोग दें तो वे एक वर्ष के अन्दर देश को स्वतंत्रत करा सकते है |
गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार को यह अल्टीमेटम दे दिया 31 दिसम्बर 1921 तक भारत को यदि औपनिवेशिक स्वराज नही मिला तो वे सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन शुरू कर देंगे | 31 दिसम्बर आया और चला गया सरकार ने इस अल्टीमेटम की कोई परवाह नही की | परिणाम स्वरूप देशभर में जलूस जनसभाओ और गिरफ्तारिया का दौर चला पडा |
5 फरवरी , 1922 को चौरीचौरा गोरखपुर में शानातिपूर्ण जलूस पर गोली चलाने के कारण लोगो ने थाने में आग लगा दिया जिसमे कई पुलिसकर्मी मारे गये | हिंसा से छुब्ध गांधी जी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया | इसकी देशभर में प्रतिक्रिया हुई | विशेषकर युवाओं की भावना को अत्यधिक ठेस पहुची और वे क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ने के लिए उतावले हो उठे |
इधर क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल ( शचिन दादा ) पुरे उत्तर भारत में विशेषकर उत्तर प्रदेश ( संयुकत प्रांत ) बंगाल और पंजाब में एक शक्तिशाली क्रांतिकारी दल के गठन हेतु अत्यधिक सक्रिय थे | शचिन दादा 1915 में 'बनारस षड्यंत्र केस ' में आजीवन काले पानी के अंतर्गत अंडमान भेज दिए गये थे | प्रथम विश्व युद्ध के बाद आम माफ़ी के सिलसिले में वे 20 फरवरी 1920 को रिहा कर दिए गये | जेल से रिहा होते ही वे बनारस आ गये और पुन: क्रांतिकारी दल को संगठित करने के कार्य में जी जान से जुट गये | पहले कुछ समय तक इन्होने अपने दल का नाम ''यंगमेंस एसोसिएशन'' रखा | शचिन दादा ने 1923 में दिल्ली में कांग्रस अधिवेशन में भाग लेने के बाद अपने क्रांतिकारी दल का नया नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एच आर ए ) रख दिया | देखते ही देखते क्रांतिवीर राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी , जोगेश चन्द्र चटर्जी ,शचीन्द्र नाथ बख्शी .,मन्मथ नाथ गुप्त , मुकुन्दी लाल ,सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य , कुंदन लाल गुप्ता , राजकुमार सिन्हा ,विष्णु शरण दुबलिश ,गोविन्द चरण कर एवं प्रणवेश चटर्जी एच आर ए के प्रमुख सदस्य बन गये | उन दिनों बनारस व शाहजहाँपुर क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र था , जहां शचिन दादा राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्ला खा आदि क्रांतिकारी पहले से ही सक्रिय थे | आगे चलकर प्रणवेश चटर्जी ने बनारस में सक्रिय श्री चन्द्रशेखर आजाद को भी पार्टी से जोड़ा | आजाद ने भी उन दिनों बनारस में संस्कृत का अध्ययन कर रहे युवा उदासीन साधू स्वामी गोविन्द प्रकाश ( श्री राम कृष्ण खत्री ) को पार्टी का सक्रिय सदस्य बनाया | दल की सदस्यता के लिए अपना पूरा समय और आवश्यकता पड़ने पर अपना जीवन उत्सर्ग कर देने को तत्पर रहने की योग्यता निश्चित की गयी थी | नेता का हुकम मानना सबके लिए अनिवार्य था | बिना कमांडर की आज्ञा के वह न कही जा सकता था और न किसी दूसरी संस्था का सदस्य ही हो सकता था | दल से विश्वासघात का दंड पार्टी से निष्कासन या सजाये मौत थी | दल के सदस्यों को हुकम था कि वे अपने राजनीतिक विकास के लिए अध्ययनशील हो और भावी क्रान्ति के लिए सब प्रकार की तैयारी में जुटे | प्रत्येक सदस्य शचीन्द्र नाथ सान्याल की ''बंदी जीवन '' के साथ ही महाराणा प्रताप - छत्रपति शिवाजी - रानी लक्ष्मी बाई - गैरीबाल्डी - मैजिनी व मैक्स्विनी आदि क्रान्तिकारियो की जीवनिया आयरिश क्रान्ति पर किताबे व रौलेट कमिशन की रिपोर्ट अनिवार्य रूप से पढ़ना था |

Sunday, November 11, 2018

क्रान्ति तीर्थ काकोरी -- भाग तीन

क्रान्ति तीर्थ काकोरी -- भाग तीन

व्यापक क्रान्ति आन्दोलन का सूत्रपात्र
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क्रान्ति के रथं विस्फोट के कुछ ही वर्ष बाद ऐसी परिस्थितिया बनी जिनसे क्रान्ति की उस श्रृखला का आरम्भ हुआ जिसकी कडिया देश में और देश से बाहर जुडती चली गयी | 1903 में इंग्लैण्ड की सरकार ने घोर साम्राज्यवादी और तानाशाही मनोवृति के लार्ड कर्जन को भारत का गवर्नर जनरल एवं वायसराय नियुक्त कर दिया | हम उसके सभी कार्यो के लेखा जोखा नही लेंगे केवल इतना कहेंगे की सात वर्ष के अल्प समय में उसने भारत के लोगो को जितना छुब्द्द कर दिया , उतना शायद ही कोई और कर सकता | उसका सबसे बड़ा काम था बंगाल का विभाजन | वैसे तो बिहार , बंगाल उड़ीसा और असम तक फैले अति विशाल बंगाल प्रांत को दो भागो में विभाजित करने का प्रस्ताव पुराना था परन्तु कर्जन को उसे क्रियान्वित करने में लाभ ही लाभ दिखाई दे रहा था | बंगाल के मुस्लिम बाहुल पूर्वी भाग को असम ( जिसमे उस समय वर्तमान उत्तर - पूर्व के सभी राज्य सम्मलित थे ) में मिलाकर बनने वाले राज्य में मुसलमानों का बहुमत होगा और दुसरे भाग में गैर बंगाली ( उड़ीसा तथा बिहार ) बड़ी संख्या में होंगे | इस प्रकार जहां हिन्दू और मुसलमान एक जुट नही रह सकेंगे वही सार्वजनिक - सामाजिक चेतना का नेतृत्व करने वाले बंगाली भी दो प्रान्तों में बटकर प्रभावशाली नही रह जायेंगे | कर्जन बंग - भंग को लागू करने की इतनी हडबडी में था कि उसने 19 जुलाई 1905 को इसका निश्चय किया और 16 अक्तूबर 1905 को इसे लागू कर दिया | इस पर सम्पूर्ण बंगाल में रोष का ज्वार उमड़ पड़ना स्वाभाविक था | बंगाल में नेताओं ने तत्काल ही घोषणा कर दी -- ' जब तक बंग - भंग लागू रहेगा और बंगाल पुन: एक न हो जाएगा तब तक बंग - भंग का विरोध जारी रहेगा |" इस विरोध का पहला कदम विदेशी सामन के बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओ के उपयोग की घोषणा था | इसी आन्दोलन में 'वन्दे मातरम् ' गीत और नारा लोगो के कंठ में मन्त्र की तरह बैठ गया | फिर तो यह भारत के सम्पूर्ण स्वतंत्रता आन्दोलन का आधार बना |
इसी आन्दोलन के दौरान बंगाल में ''युगांतर '' और वन्दे मातरम् '' नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू किया गया जिन्होंने पुरे बंगाल को शासन के विरुद्ध जागृत कर दिया | इसी दौरान 1906 में मास्टर अश्वनी कुमार दत्त ने ढाका में ''अनुशीलन समिति '' नाम से एक गुप्त क्रान्ति संस्था गठित की | आगे चलकर महान क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सन्याल भी इसके सम्पर्क में आये ( ये वही शचीन्द्र नाथ सान्याल है जिन्होंने कालान्तर में संयुकत प्रांत उत्तर प्रदेश में ''हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ' नामक एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की स्थापना किया था जिसकी चर्चा हम आगे करंगे |

बंग - भंग आन्दोलन के दौरान ही बंगाल में प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री अरविन्द घोष पर 'वन्दे मातरम् ' पत्र के सम्पादन के अभियोग में मुकदमा चला और 26 अगस्त 1907 को कलकत्ता की एक अदालत द्वारा उन्हें छ: माह की सजा दी गयी | जब उन्हें अदालत से बहार लाया गया तो बाहर हजारो की संख्या में खड़े जनसमूह ने वन्दे मातरम् के जोरदार उद्घोष से आकाश को गुंजायमान कर दिया | इस पर पुलिस ने जनसमूह पर बुरी तरह लाठी चार्ज आरम्भ कर दिया | यह दृश्य देखकर 15 वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ( जो आगे चलकर शहीद हुए ) से रहा नही गया | उसने लाठी चार्ज के जिम्मेदार एक अंग्रेज सार्जेंट को अपने शक्तिशाली मुक्को की मार से बुरी तरह मारा | अगले दिन उसे चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने 15 बेंत मारने की सजा सुनाई | हर बेंत की मार के साथ वह बालक 'वन्दे मातरम् ' और भारत माता की जय ' का नारा लगाता रहा | खून से सना हुआ जब यह बालक जेल से बहार आया तो वहाँ एकत्र युवको में दो - खुदी राम बोस और प्रफुल्ल चाकी इतने उत्तेजित हो उठे कि उन्होंने किंग्सफोर्ड को मारकर इस अत्याचार का बदला लेने का निश्चय किया | वे दोनों उसके पीछे लगे रहे | उन्हें बदला लेने का मौक़ा मिला मुजफ्फरपुर में , जहाँ वह डिस्ट्रिक्ट जज नियुक्त हो गया था | 30 अप्रैल 1908 को उसके बंगले के बाहर इन युवको ने उसकी बग्घी पर बम फेंका परन्तु भाग्य उसके साथ था , उस बग्घी में दो अंग्रेज महिलाये बैठी थी जिनकी मृत्यु हो गयी | 20 वी शताब्दी के क्रांतिकारी आन्दोलन का यह पहला प्रभावशाली बम धमाका था और यहाँ से जो सिलसिला शुरू हुआ , वह चलता ही चला गया | मुजफ्फरपुर बमकांड के आरोपी प्रफुल्ल चाकी ने पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए स्वय को गोली मार ली और 17 वर्षीय खुदीराम बोस को इस अपराध के लिए 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गयी | इस बहादुर नवयुवक ने हँसते - हँसते वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुए फाँसी का फंदा चूम लिया | वास्तव में बंग - भंग आन्दोलन हमारे देश के लिए एक वरदान के रूप में उभरकर सामने आया | अगर यह आन्दोलन प्रारम्भ न होता तो भारत के कोने - कोने में राष्ट्रीयता की चेतना उत्पन्न न होती |

और न हमारे क्रांतिवीर भाई - बन्धु एवं बहिने अपना जीवन देश के लिए होम करते |
बंगाल विभाजन के विरुद्ध आन्दोला की उग्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अन्तत: 1911 में जार्ज पंचम के भारत आगमन पर दिल्ली में जो राज दरबार किया गया उसमे बंग - भंग को समाप्त करने की विधिवत घोषणा की गयी | साथ ही भारत की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर देने की घोषणा की गयी | परन्तु वायसराय के दिल्ली पहुचने से पहले ही उनका स्वागत करने के लिए क्रांतिकारी वहां उपस्थित थे | 23 दिसम्बर 1912 को जिस समय वाइसराय लार्ड हार्डिंग की शोभा - यात्रा चाँदनी चौक पहुची , अचानक भयानक बम विस्फोट हुआ और हार्डिंग के पीछे बैठा अंगरक्षक वही ढेर हो गया | इस अपराध के लिए बसंत कुमार विशवास मास्टर अमीरचंद , अवध बिहारी तथा बालमुकुन्द को फांसी की सजा मिली | परन्तु इस योजना के सूत्रधार रासबिहारी बोस पकडे नही गये | यह दुसरा विस्फोट था जिसने संसार का ध्यान भारत के क्रांतिवीरो के आन्दोलन की तरफ खीचा | अब क्रान्ति की आग उत्तर भारत में भी पहुच गयी थी | उधर 1913 में अमेरिका के सैन्फ्रान्सिको नगर में लाला हरदयाल के नेतृत्व में गदर पार्टी की स्थापना हुई जिसे प्रवासी भारतीयों का पूरा सहयोग मिला |

धीरे - धीरे गदर पार्टी की शाखाए अनेक देशो में खुल गयी | इसके सदस्य अपने देश से विदेशी सत्ता समाप्त करने के लिए बेचैन थे | 1914 में विश्युद्ध आरम्भ हुआ तो अवसर का लाभ उठाने के लिए क्रांतिकारी भारत में सैनिक विद्रोह कराने को आतुर हो उठे | उसी वर्ष जापानी जहाजो से क्रान्तिकारियो के जत्थे भारत के लिए रवाना हुए परन्तु अधिकाँश भारतीय बंदरगाहों पर ही गिरफ्तार कर लिए गये | क्रान्ति के लिए 21 फरवरी 1915 तय की गयी परन्तु भेदिये ने प्रशासन को सुचना दे दी | रासबिहारी बोस और शचीन्द्र नाथ सान्याल तो पुलिस के हत्थे नही चढ़े परन्तु अन्य 63 लोग पकडे गये | ''प्रथम लाहौर षड्यंत्र केस'' के नाम से प्रसिद्ध इस केस में 26 क्रांतिवीरो को फांसी , 24 को आजन्म कालापानी तथा शेष को दो अलग - अलग अवधि की सजा सुनाई गयी | एक साथ 26 क्रांतिवीरो को मृत्यु दंड सुनाये जाने पर सारे देश में व्यापक प्रतिक्रिया होने लगी | वायसराय लार्ड हार्डिंग ने स्थिति भापकर यह मामला प्रिवी काउन्सिल में भेज दिया | दो माह बाद 14 नवम्बर 1915 को प्रिवी काउन्सिल ने अन्तत: अपने फैसले में 19 क्रांतिवीरो के मृत्युदंड को आजीवन काले पानी में बदलकर शेष सातो क्रांतिवीरो - करतार सिंह सराभा , विष्णु गणेश पिंगले ,बख्शीश सिंह , हरनाम सिंह ( स्यालकोट ) जगत सिंह , सुरेन सिंह ( पुत्र -ईशर सिंह ) एवं सुरेन सिंह ( पुत्र - भुर सिंह ) को मृत्यु दंड बहाल रखा |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार समीक्षक
आभार ---- हमारा लखनऊ पुस्तक माला से

Saturday, November 10, 2018

काकोरी - क्रान्तितीर्थ भाग - दो

काकोरी - क्रान्तितीर्थ भाग - दो


भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन की पृष्ठभूमि
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भारत में अंग्रेजी राज का इतिहास उनके छल और बल की कथा है तो वह हमारी यानी भारत के लोगो की कमजोरी , चरित्र की गिरावट के साथ उनके त्याग , तपस्या और बहादुरी की दास्ताँ भी है | 1600 ई. में इंग्लैण्ड में स्थापित ईस्ट इंडिया कम्पनी नाम की संस्था व्यापार करने भारत आई परन्तु हमारे आपसी द्देष तथा अन्य कमजोरियों का लाभ उठाकर भारत की शासक बन बैठी | 1757 में प्लासी की लड़ाई जीतकर कम्पनी ने बंगाल की नबावी को अपनी मुठ्ठी में कर लिया और 1764 में बक्सर ( बिहार ) की लड़ाई में बंगाल के नवाब मीर कासिम और उनके सहायक मुग़ल सम्राट शाह आलम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला को हराकर बंगाल की दीवानी तो ले ही ली , उत्तर भारत की राजनीति में अपना सिक्का जमा लिया | धीरे धीरे साम -दाम - दंड और भेद से अंग्रेजो ने भारत के बहुत बड़े भूभाग को अपने अधिकार में ले लिया | 1856 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर उनके राज्य पर कब्जा करके अंग्रेजो ने जोर - जबरदस्ती की सारी हदे पार कर दी| तब तक उनके व्यवहार , आचरण , नीतियों और कानूनों ने भारतीय समाज के लगभग सभी वर्गो को इतना नाराज कर दिया था कि उनका गुस्सा 1857 की क्रान्ति में फूट पडा | बड़ी कठिनाई से अंग्रेज उसे दबा पाए और 1858 में ईस्ट इंडिया कम्पनी को हटाकर ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया | ईस्ट इंडिया कम्पनी के राज में प्रशासन की नीति कम्पनी के आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर तैयार की जाती थी , अब महारानी विक्टोरिया के राज्य में इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट में बहुतमत पाने वाली पार्टी भारत सम्बन्धी नीति तय करती थी | जब इंग्लैण्ड की सत्ता पर लिबरल पार्टी ( उदारवादी पार्टी ) का अधिकार होता था तो भारत का प्रशासन नरम हो जाता था और जब कंजर्वेटिव पार्टी ( अनुदार दल ) का बहुमत होता था तो प्रशासन कठोर रुख अपनाता था और साम्राज्यवादी रवैया प्रबल हो उठता था | यह नीति महारानी विक्टोरिया के 1856 के घोषणा पत्र के विपरीत थी | 1857 की क्रान्ति के बाद जब सत्ता ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथ में ली तो ईंग्लैंड की महारानी ने एक घोषणा कि जिसमे बड़े स्नेहपूर्ण शब्दों में भारत के निवासियों को आशाजनक आश्वासन दिए गये थे | इस घोषणा का अंग्रेजी पढ़े - लिखे लोगो ने स्वागत किया | इसी वर्ग के लोगो का सहयोग लेकर ए.ओ . ह्युम ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी | ये वर्ग महारानी की घोषणा से कितना प्रभावित था , इसका अनुमान 1886 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी के भाषण से लगाया जा सकता है जिसमे उन्होंने कहा , ''मुझे यह दोहराने की आवश्यकता नही है कि वह यशस्वी घोषणा - पत्र हमारे हृदयों पर गहरे अक्षरों में अंकित है | किन्तु मैं समझता हूँ कि वह हमारी स्वाधीनता का ऐसा शानदार और यशस्वी चार्टर है कि प्रत्येक भारतवासी बच्चे को जो समझदार होकर अपनी मातृ- भाषा में तुतलाकर बोलना आरम्भ करे , उसे याद कर लेना चाहिए |''
1857 के बाद क्रान्ति का प्रथम विस्फोट
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यह तो रही घोषणा के 28 वर्ष बाद अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगो के एक वर्ग की प्रतिक्रिया | इसके विपरीत भारतवासियों का एक बड़ा वर्ग व्यवहार में अंग्रेज अधिकारियो की कार्यपद्धति , उनके दृष्टिकोण और नीतियों को घोषणा पत्र के पूर्णत: विरुद्ध पाता था | व्यापार , सरकारी नौकरियों न्याय व्यवस्था , इसाई धर्म के विषय में नीति , सभी क्षेत्रो में भारतीयों की अवमानना - घोषणा - पत्र के विपरीत उनका तिरस्कार , अंग्रेज सरकार के इरादों पे संदेह पैदा करता था | ऐसे असंतोष के वातावरण में 1896 में संयुकत प्रांत वर्तमान उत्तर प्रदेश , मध्य प्रांत बंगाल , मद्रास बिहार राजस्थान तथा वर्मा के उत्तरी भाग जो उस समय भारत का अंग था में अकाल पडा तो सरकार की लापरवाही से लगभग साढ़े सात लाख व्यक्ति काल के गाल में समा गये | इसी समय भारत में प्लेग से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी का प्रकोप हुआ | सरकार ने लोगो को कैम्प में रखने , घरो की सफाई कराने और टीका लगाने की योजना बनाई | परन्तु जनता को विशवास में न लेने के कारण लोगो के मन में यह बात बैठ गयी कि सारा जीवन आयोजन धर्म - परिवर्तन के लिए किया जा रहा है | दूसरी तरफ महाराष्ट्र के महान राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक और उनके समाचार पत्र ''केसरी ' ने लोगो को इस बीमारी का बहादुरी और बुद्धिमानी से सामना करने को प्रेरित किया और रोग से बचने के उपाय बताये | इसी समय कुछ बाते ऐसी हो गयी जिनके कम से कम पश्चिम भारत का राजनीतिक वातावरण बहुत गरम हो गया | एक रात पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड और लेफिटनेंट आयसट की हत्या हो गयी | उसकी जो रिपोर्ट आदि 'केसरी ' में प्रकाशित हुई , उस पर राजद्रोह के अपराध में मुकदमा चला और तिलक को 18 मॉस के कठोर कारावास की सजा दी गयी | अंग्रेज अधिकारियो की हत्या के आरोप में 1998 - 99 में एक ही माँ के तीन बेटो -- दामोदर हरि चापेकर , बालकृष्ण हरि चापेकर एवं वासुदेव हरि चापेकर तथा महादेव विनायक रानाडे को पूना में फाँसी पर चढा दिया गया | सौ वर्षो से अधिक समय बीत जाने के कारण हम इस घटना की महत्ता आज भी नही समझ पायेंगे परन्तु 1917 में 'उग्रवादी ( क्रांतिकारी ) आन्दोलन की जांच - पड़ताल के लिए नियुक्त ''रोलेट कमिशन '' ने इस घटना को '' भारतीय उग्रवाद '' का पहला विस्फोट बताया था |
प्रस्तुती -- सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
आभार - हमारा लखनऊ पुस्तक से

Wednesday, November 7, 2018

भारत ऐसे भविष्य के लिए तैयार रहे जहाँ जीवन ही नही होगा

विकास की लपट में झुलसता हुआ विश्व

भारत ऐसे भविष्य के लिए तैयार रहे जहाँ जीवन ही नही होगा


यदि हम इस विश्व में फ़ैल रहे प्र्दुष्ण की बात करे तो औध्योगिक क्रान्ति का समय आधार रेखा माना जाता है | तब से आज तक धरती का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है जो महासागरो के स्तर को ऊँचा उठाने में व खौफनाक तूफ़ान और बाढो को जन्म देने में पर्याप्त सक्षम है |

आने वाले कुछ वर्ष मनुष्यता के इतिहास में अति महत्वपूर्ण है | इस समय मनुष्य द्वारा किये गये कृत्य इस बात का निर्णय करंगे कि इस धरती पर जीवन सम्भव है अथवा नही |
पिछले सौ - सवा सौ वर्षो में जो हमने इस धरती के साथ किया है उसके भुगतान का समय आ चुका है | अब दो विकल्प बचे है : एक , कि हम अपने भूतकाल के सारे कृत्यों को धो डाले और आने वाली महाप्रलय को टाल दें | दूसरा, हम यह भुगतान बाद में चक्रवर्ती व्याज के साथ करें | एक ही अंतर है इन दोनों में पहले वाला बलिदान कर हम अपने जीवन की रक्षा करंगे दूसरा भुगतान हमे स्वंय अपने जीवन से करना होगा | 8 नवम्बर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक रिपोर्ट जारी कि जो सम्पूर्ण विश्व के लिए अंतिम चेतावनी है | इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वैश्विक जलवायु के सम्पूर्ण सर्वनाश से बचना है तो समाज और विश्व अर्थव्यवस्था को एक महा रूपांतरण से गुजरना होगा | इसके लिए कारगर कदम उठाने का समय समाप्त हो चला है |
यदि हम इस विश्व में फ़ैल रहे प्रदुषण की बात करें तो औध्योगिक क्रान्ति का समय आधार रेखा माना जाता है | तब से आज तक धरती का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चूका है , जो महासागरो के स्तर को उंचा उठाने में व खौफनाक तूफ़ान और बाढो को जन्म देने पे पर्याप्त सक्षम है | इस समय मनुष्यता जितनी मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण में फेंक रही है . हम वर्ष 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा रेखा पार कर जायेंगे |
धरती के तापमान वाली यह नगण्य - सी दिखने वाली वृद्धि एक आने वाले भयावह भविष्य का संकेत है | आज हम धरती के वातावरण में 40 अरब टन कार्बन डायआक्साइड हर वर्ष जमा कर रहे है | पूर्व की वैज्ञानिक खोजे मानती थी कि धरती के वातावरण में 2 डिग्री का बढना एक सुरक्षित सीमा है लेकिन ऐसा गलत प्रमाणित हुआ है | एक महाविपत्ति अनुमान से पूर्व ही दस्तक देने लगी है | लगभग 6000 वैज्ञानिक अध्ययनों के पश्चात एक 400 पन्नो की रिपोर्ट तैयार की गयी है जिसके अनुसार धरती को कार्बन तटस्थ करना होगा और यह कार्य वर्ष 2050 तक पूरा हो जाना चाहिए | इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हम एक टन कार्बन जलवायु में फेंकते है तब एक टन कार्बन निकालनी भी होगी | इस स्थिति में भी मात्र 50% प्रतिशत सम्भावना है कि हम इसमें सफल हो संके | इस रिपोर्ट के अनुसार आगामी 2 वर्षो से हमे ऊर्जा की खपत कम करनी होगी | एक क्रांतिकारी कदम चाहिए और हमे फासिल इधनो जैसे कोयला , पेट्रोल और डीजल के उपयोग से बचना होगा | इसके लिए बायो - इधनो का प्रयोग प्रारम्भ करना होगा , लेकिन इसके लिए भारत के क्षेत्रफल से दुगने क्षेत्र में बायो इधन की फसले उगानी होंगी , जिसमे हम वातावरण से 12 अरब टन कार्बन निकल पायेंगे |
जागतिक उष्मा को 1.5 डिग्री सेल्सियस के अन्दर रखने के लिए मनुष्यता को एक बड़ी कीमत चुकानी है जो प्रतिवर्ष 2.4 खराब डालर होगी | यह कीमत वर्ष २2035 तक अदा करनी होगी जो सम्पूर्ण विश्व की आय का 2.5 %प्रतिशत है | इस प्रकरण में भारत , अफ्रीका और चीन जैसे देशो की भूमिका बहुत बड़ी और संगीन है | यहाँ लगातार बढ़ते विकास के साथ प्रदुषण का तूफ़ान सा आ रहा है | जहाँ आइसलैंड , तजाकिस्तान , स्वीडन , फ्रांस स्विट्जरलैंड , नार्वे और न्यूजीलैंड जैसे देशो ने अपनी निर्भरता तेजी से फासिल इधन पर कम कर दी है और स्वंय को हरे देशो की सूचि में शामिल कर दिया है ,वही दक्षिण अफ्रिका , मंगोलिया , चीन , भारत जैसे देश बिजली के उत्पादन के लिए भारी मात्रा में कोयला जला रहे है | वर्ष 2017 में भारत के नीति आयोग ने 3 वर्षीय योजना तैयार की है जिसमे कोयले के खननं और उत्पादन को बढाने पर जोर दिया हैं | नीति आयोग की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत के 30 करोड़ लोग बिना बिजली कि सुविधा कर रह रहे है | भारत की तीन चौथाई बिजली कोयले को जला कर ही प्राप्त होती है और आने वाले कई दशको तक कुछ भी बदलने वाला नही |
विडम्बना यह है कि हमारे पास दशको का समय नही है , जो भी उठाने है , तुरंत उठाने होंगे अन्यथा इसका भुगतान अगली पीढ़ी को अपना जीवन देकर करना होगा | जैसे ही इस धरती का वातावरण 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार करेंगा धरती पर उगने वाली फसले बर्बाद होने लगेगी , धरती को सर्वाधिक आक्सीजन देने वाले अमेजन के जंगल समाप्त हो जायेंगे | 2 डिग्री उष्मा की बढ़ोत्तरी समुद्रो के स्तर को 9 फुट बढ़ा देगी और तटीय क्षेत्रो में बसे लोग खतरे में आ जायेंगे | मैदानी इलाको में बसे लोग शीतल जगहों पर पलायन करने लगेंगे क्योकि बढ़ते हुए तापमान के कारण आग के थपेड़ो जैसी हवाय हम पर आक्रमण करने लगेंगी | यह आने वाले भविष्य की एक भयावह तस्वीर है क्योकि इससे विश्व भर की अर्थव्यवस्थाए ताश के पत्तो के महल की तरह धाराशायी होंगी और हमारा सामाजिक ढांचा पूरी तरह तहस - नहस हो जाएगा | विकास और विकास - यह अंधी दौड़ हमे छोडनी होगी | फासिल इधनो पर हमारी निर्भरता एक भयावह अव्यवस्था को जन्म देने जा रही है | हमारे पास दो विकल्प है कि हम अपने उपभोग पर अभी लगाम लगाये या फिर ऐसे भविष्य के लिए तैयार रहें जिसमे इस पृथ्वी पर जीवनसंभव ही नही होगा |

Saturday, October 13, 2018

''नोटा'' पर मतदान : बौद्धिक विलासिता या आक्रोश विरोध का हथियार !!

''नोटा'' पर मतदान : बौद्धिक विलासिता या आक्रोश विरोध का हथियार !!



बिहार विधान सभा अध्यक्ष श्री विजय कुमार चौधरी का ''नोटा'' के विरोध में लिखा लेख 29 अगस्त के हिंदी दैनिक 'हिन्दुस्तान ' में प्रकाशित हुआ था | लेखक ने सभी पार्टियों प्रत्याशियों को नकार कर 'नोटा' के चुनावी बटन पर मतदान को बौद्धिक बिलासिता की उपज बताते हुए लेख की शीर्षक टिपण्णी में कहा है कि 'चुनाव किसी व्यक्ति के चयन के लिए होता है | किसी एक या सभी उम्मीद्व्वारो को खारिज कर देना तो चुनाव का उदेश्य नही हो सकता |' लेखक ने 27 सितम्बर 2013 को उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव में ''नोटा'' का विकल्प देने के निर्णय के बारे में बताने के साथ इसके विरोध में अपने तर्क प्रस्तुत किये है |
लेखक के अनुसार नो'नोटा के प्राविधान को लागू हुए लगभग पाँच वर्ष हो चुके है और इस बीच हुए लोकसभा व राज्यसभा चुनावों में 'नोटा' का इस्तेमाल अधिक से अधिक दो प्रतिशत लोगो ने किया है | साफ़ है कि 'नोटा' का विकल्प किसी समस्या अथवा परिस्थिति का समाधान नही हो सकता | यह केवल विरोध या आक्रोश प्रदर्शित करने का हथियार बन सकता है | उपर से चुनाव आयोग द्वारा इसे रद्द मतो की श्रेणी में रख देने से इसका कोई अर्थ नही रह जाता है | लेखक ने चर्चा के साथ कई प्रश्न खड़े किये है | उनका कहना है कि 'अगर नोटा विकल्प ही अधिकाश लोगो की पसंद बन जाए तो फिर चुनाव के नतीजे क्या होंगे ? आखिरकार इन्ही उम्मीदवारों में कोई अल्प मत के आधार पर जीतेगा , चाहे उसकी जमानत क्यों न जप्त हो जाए | चुनावों में अगर मतदाता उम्मीद्वाओ को चुनने के बजाए खारिज करते चले जायेंगे , तो यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था चलेगी कैसे ?
बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद पर बैठे विजय कुमार चौधरी जी का यह सवाल उनके लिए सभी सत्ताधारियो एवं सत्तावादियो के लिए सौ फीसदी उचित है | यह सवाल सत्ता सरकारों से सर्वाधिक लाभ पाते उठाते धनाढ्य एवं सुविधा प्राप्त माध्यम वर्गीय के लिए भी उचित है | क्योकि इन सभी के लिए ही तो प्रजातांत्रिक व्यवस्था भली भाँती चल रही है लेकिन यह सवाल बहुसंख्यक जनसाधारण के लिए कैसे सही या उचित हो सकता है . जिनके हितो के लिए वर्तमान चुनावी एवं जनतांत्रिक प्रणाली नकारा या लगभग नकारा बना दी गयी है |
इसके सबसे बड़ा परिलक्षण यह है कि अब इस चुनावी प्रणाली के अंतर्गत विभिन्न पार्टियों के जन प्रतिनिधि और उनकी केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारे व्यापक एवं बुनियादी जन समस्याओं को अर्थात बेरोजगारी , महगाई तथा शिक्षा स्वास्थ्य जैसी गंभीर समस्याओं को उपेक्षित करने में जुटी हुई है | वे तो अब इन्हें अपना प्रमुख मुद्दा ही नही मानती | उसकी जगह वे जन विरोधी आर्थिक नीतियों प्रस्तावों को चरणबद्ध रूप से लागू करते हुए विदेश तथा देश प्रदेश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो के स्वार्थी हितो की ही अधिकाधिक पूर्ति में लगी हुई है | इसके लिए तथा अपने सत्ता स्वार्थ की पूर्ति के लिए भी वे जनसाधारण को धर्म ,सम्प्रदाय ,जाति ,उपजाति तथा क्षेत्र , भाषा व लिंग के आधार पर विखंडित करती जा रही है | मुख्यत: इन्ही सामुदायिक पहचानो आधारों पर उनका चुनावी समर्थन तथा वोट लेने का प्रयास करती है |
इसके फलस्वरूप किसानो , मजदूरो , एवं अन्य शारीरिक , मानसिक श्रमजीवी जनसाधारण में इन सत्ताधारियों एवं सत्तावादियो द्वारा संचालित चुनाव प्रणाली और उसके जरिये चुने जाते रहे प्रतिनिधियों के प्रति बैठा विशवास एवं आशा लगातार टूटता रहा है | भले ही वह धर्म , जाति, क्षेत्र , भाषा आदि के आधारों पर विभिन्न पार्टियों , प्रतिनिधियों को चुनावी मत देता रहा है , किन्तु उसे अब किसी भी सत्ताधारी पार्टी के प्रति जनहित में काम करने का विशवास नही रह गया है |
जनसाधारण का यह टूटता विशवास स्वभावत: उसमे सत्ताधारी पार्टियों , दलों एवं जनप्रतिनिधियों के प्रति आक्रोश व विरोध को खड़ा कर देगा | उन्हें देर सबेर चुनावी मतदान में सभी पार्टियों के विरुद्ध मतदान करने के लिए भी तैयार कर देगा | साथ ही वह समस्याग्रस्त श्रमजीवी हिस्सों को देर सबेर धर्म , जाति, आदि के आधारों पर विखंडित करने की कूटनीतियों के विरोध में तथा शिक्षा स्वास्थ्य के कटते छटते जनतांत्रिक छुटो , अधिकारों के भी विरोध में मतदान के लिए जरुर प्रेरित करेगा | आम समाज के प्रबुद्ध एवं ईमानदार राजनीतिक सामजिक हिस्से इस विरोध को संगठित करने और उसे व्यक्त करने का भी प्रयास जरुर करेंगे और कर भी रहे है |
इसका थोड़ा सा आभास तो चौधरी साहब को भी है | उन्होंने अपने लेख में यह स्वीकार किया है कि ''नोटा'' का इस्तेमाल केवल विरोध व आक्रोश प्रदर्शित करने का हथियार बन सकता है ''| हालाकि उन्होंने इस बात पर कोई चिंता चर्चा नही की है कि आखिर लोग ''नोटा '' को अपने विरोध आक्रोश का हथियार क्योकर बनायेंगे ? और दो प्रतिशत लोग चुनावी प्रणाली के प्रति अपना विरोध क्यो जता रहे है ? हालाकि यही सवाल खुद उनके समझने और बताने लायक सवाल था | वे इस बात को सोचे या न सोचे , लेकिन सभी पार्टियों प्रत्याशियों को नकार कर ''नोटा'' पर मतदान के समर्थक , प्रचारक उसे जरुर सोचेंगे और बतायेंगे भी कि वर्तमान दौर की जनविरोधी अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय आर्थिक कुटनीतिक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक नीतियों के विरुद्ध तथा उनको लागू करती रही सभी पार्टियों , प्रतिनिधियों के विरुद्ध सभी धर्म , जाति, क्षेत्र भाषा के बहुसंख्यक श्रमजीवी जनसाधारण के लिए ''नोटा'' एक कारगर हथियार बनाया जा सकता है प्रमुख नीतियों के विरोध में नोटा का इस्तेमाल स्वभावत: अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय धनाढ्य पुजीवान वर्गो के विरोध में भी जरुर जाएगा | क्योकि ये नीतिया उन्ही के स्वार्थी हितो को अधिकाधिक बढावा देने और जनसाधारण के हितो को काटने घटाने की नीतिया है | लेखक ने सवाल खड़ा किया है कि अगर ''नोटा '' का विकल्प अधिकाश लोगो की पसंद बन जाए तो ही चुनावी नतीजे में अल्पमत पाने वाला उम्मीदवार जीत जाएगा | उनकी यह बात एकदम ठीक है | लेकिन चौधरी जी इस बात को समझ सकते है कि अल्पमत पाकर जीते हुए प्रत्याशी आम जनता का प्रतिनिधि कहलाने और उसका समर्थन पाने का दावा एवं अधिकार भी गँवा बैठेगे | फलस्वरूप उनका प्रतिनिधित्व न केवल मूल्यहीन साबित हो जाएगा , बल्कि उसे जनविरोध का सामना भी करना पडेगा | इसके अलावा चुनावी मतदान पर इस चर्चा के साथ उन्हें ब्रिटिश काल के इतिहास भी जरुर देखना चाहिए | 1907 से पहले या सही मायनों में कहे तो 1919 से पहले जो भारतीय प्रतिनिधियों को सीमित मताधिकार के जरिये भी वायसराय एवं गवर्नर कौंसिल में चुने जाने का आधिकार नही था | उनके पास ब्रिटिश राज एवं उसकी नीतियों के प्रति आक्रोश विरोध एवं आन्दोलन ही एक मात्र हथियार था | उसी हथियार के बल पर उन्हें अन्य सवैधानिक अधिकारों के साथ वायसराय एवं गवर्नर काउन्सिल में जाने का अधिकार तथा 1937 में प्रांतीय सरकार बनाने का भी अधिकार हासिल था | अगर आज देश की सभी पार्टिया और उनकी सरकारे उन्ही साम्राज्यी देशो की पूंजियो तकनीको के साथ उनकी वैश्वीकरणवादी नीतियों के जरिये जनसाधारण की व्यापक एवं बुनियादी समस्याओं को तेजी से बढाती जा रही है , तो जनसाधारण अपना चुनावी मत उन पार्टियों , प्रत्याशियों को क्यो दें ? उन नीतियों के विरुद्ध अपने आन्दोलन की एक नयी शुरुआत क्यो न करें ? ? नीतियों के विरुद्ध ''नोटा'' पर मतदान के नारे के साथ सभी पार्टियों प्रत्याशियों को नकारने का आव्हान क्यों न करे ?
बहुत सम्भव है कि यह चुनावी विरोध एक आम जन विरोध की शक्ल अख्तियार कर लें | लोगो में जाति- धर्म , क्षेत्र की पहचानो से उपर उनके श्रमजीवी वर्ग की पहचान को अर्थात मजदुर , किसान एवं अन्य शारीरिक - मानसिक श्रमजीवी वर्ग की पहचानो को प्रमुखता से खड़ा कर दें | उनमे अपने सामुदायिक अंतरविरोधो के बावजूद वर्गीय आधार पर एकजुट होने की सजगता खड़ी कर दें | उन्हें जनविरोधी नीतियों एवं धनाढ्य व उच्च वर्गो के विरोध के साथ अपने व्यापक एवं बुनियादी हितो की माँगो को लेकर संगठित और आंदोलित होने की आवश्यकता व आधार खड़ा कर दें |
बताने की जरूरत नही है कि ऐसे किसी जनविरोध की स्थितियों - परिस्थितयो में ही जनहित की पार्टी एवं प्रतिनिधियों का उदय हो सकता है | ऐसे सच्चे एवं ईमानदार तथा संघर्षशील प्रतिनिधि खड़े हो सकते है जिन्हें आज की संघर्षविहीन स्थितियों में ढूढ़ कर उन्हें ''नोटा'' की जगह वोट देने और जनप्रतिनिधि बनाने की वकालत चौधरी जी द्वारा अपने लेख में किया गया है | फिलहाल आज की ऐसी स्थिति में जनहित में ऐसे विश्वनीय लोगो को ढूढना और उनको प्रतिनिधि बनाया जाना लगभग असम्भव है | लेकिन सभी पार्टियों नेताओं को उनके द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी नीतियों के विरोध में ''नोटा'' पर मतदान के जरिये उन सभी को नकारा जाना एकदम सम्भव है | इस विरोध के लिए बहुसंख्यक जनसाधारण को खड़ा करना उनमे सीमित राजनीतिक एकजुटता बढ़ाना एकदम सम्भव है | जहाँ तक ''नोटा '' के वोटो को रद्द किये जाने की बात है , तो चौधरी जी को इस बात पर तो खुश ही होना चाहिए | उन्हें चिंता करने की जरूरत करने की जरूरत ही नही पड़नी चाहिए | इसके बावजूद वे चिंता - चर्चा कर रहे है , तो इसलिए की अगर ''नोटा'' पर बहुसंख्यक वोट धनाढ्य वर्गीय नीतियों के विरुद्ध पड़ गया तो किसी पार्टी के जनप्रतिनिधि के पास जनसाधारण में जाने तथा अपने आपको उनका प्रतिनिधि कहने का मुंह नही रह जाएगा | जनसाधारण को अपना प्रतिनिधि अपनी पार्टी बनाने का आधार व प्रोत्साहन मिल जाएगा | वस्तुत: इसी कारण सभी प्रमुख पार्टिया द्वारा ''नोटा '' को नकारत्मक कहकर इसका विरोध किया जा रहा है |

Monday, September 17, 2018

आंकड़ो के खेल में भारत 6ठवें अमीर देशो में

आंकड़ो के खेल में भारत 6ठवें अमीर देशो में



दिनाक 21 मई 2018 के समाचार पत्रों में अफ्रोशिया बैंक की ताजा रिपोर्ट प्रकाशित हुई है | इस रिपोर्ट में भारत का विश्व का 6 ठवां अमीर देश बताया गया है | इस रिपोर्ट में 62 हजार अरब डालर से भी अधिक दौलत वाला अमेरिका पहले नम्बर पर है | दूसरे , तीसरे चौथे और पांचवे पर चीन जापान ब्रिटेन जर्मनी काबिज है | छठे नम्बर पर भारत है | भारत की दौलत विकसित देशो में शामिल फ्रान्स -कनाडा - आस्ट्रेलिया -इटली से भी ज्यादा है | जबकि भारत आज भी अल्प विकसित या विकासशील देशो की श्रेणी में शामिल है | अल्पविकसित या विकासशील देश होने के चलते न केवल इस देश के प्रति व्यक्ति की आय बहुत कम है . बल्कि इस देश में तथा अन्य कुछ दौलतमन्द - विकासशील देशो में भी गरीबी कही ज्यादा है | 2016 के अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुसार इस देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है | स्पष्ट है कि एक तिहाई आबादी के पास अपने श्रम या संसाधन के बूते जीने खाने का वांछित या न्यूनतम आधार अवसर नही है | देश की व्यापक आबादी के भरण पोषण के लिए चलाई गयी खाधयान्नसुरक्षा योजना इस बात का सबूत देती है किइस आबादी का बड़ा हिस्सा अपना पेट भर पाने के लिए आवश्यक कमाई करने अक्षम है |मानव विकास सूचकांक की स्थितियाँभी इसी की पुष्टि करती है | 2016 में विश्व के 188देशो के मानव सूचकांक में सबसे ऊँचे स्थान पर यूरोपीय देश नार्वे को बताया गया है | वहाँ प्रत्येक नागरिक के मानव विकास की स्थिति सबसे बेहतर बताई गयी है , जबकि भारत उसी सूचि में 133वें स्थान पर था | स्पष्ट है कि भारत का स्थान काफी नीचे था और आज भी है | इसकी कुल दौलत 6230 अरब डालर बताई गयी है | भारत की दौलत विकसित देशो में शामिल बहुआयामी निर्धनता के वैश्विक माप की ऐसी ही स्थिति है | निर्धनता के इस अंतर्राष्ट्रीय सूची से तो अमेरिका. इंग्लैण्ड .फ्रांस .जर्मनी .जापान आस्ट्रेलिया .कनाडा .नार्वे .स्वीडन जैसे धनाढ्य एवं विकसित देश बाहर ही है | क्योकि इन देशो में ऐसी निर्धनता है ही नही | इन देशो को छोड़कर विश्व के निर्धन गरीब तथ अल्पविकसित या विकासशील देशो के 102 सदस्यों में भारत भी शामिल है | मानव विकास सूचकांक की रिपोर्ट के अनुसार 2016 में देश की कुल जनसख्या का 55.3% हिस्सा बहुआयामी निर्धनता से पीड़ित बताया गया है | यह स्थिति दो एक साल या चंद सालो में नही खड़ी हुई है | वह देश के आधुनिक विकास के साथ बढती रही है | खासकर पिछले 20 - 25 सालो से उसमे तीव्र गति से बढ़ोत्तरी होती रही है | कयोकी इन सालो में देश के घोषित तीव्र आर्थिक विकास के नाम पर बहुसंख्यक आबादी की गरीबी घटाने की जगह थोड़े से धनाढ्य उच्च एवं सुविधा सम्पन्न हिस्से की अमीरी बढाने का ही काम किया गया है | देश - विदेश के धनाढ्य उच्च हिस्सों के उदारवादी वैश्वीकरणवादी - निजीकरण वादी छूटो व अधिकारों को बढाते हुए उनकी पूंजियो परिसम्पत्तियो को तथा उच्चस्तरीय वेतन भत्तो सुख सुविधाओं को अंधाधुंध बढावा दिया गया है | इसी का नतीजा है कि एक तरफ यह देश विश्व के सबसे दौलतमन्द देशो की सूची में काफी उंचाई पर 6ठवें पर पहुचं गया है | धनाढ्यता की बढ़त का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 55% गरीब और 40-42% औसत आय के खाते - पीते लोगो की अर्थात इन्हें मिलाकर 90-92% की आबादी के धन सम्पत्ति के कही कम जमाजोड़ के वावजूद यह देश विश्व के दौलतमन्द देशो की श्रेणी में खड़ा हो गया | स्वभावत: वह आबादी 8-10 % लोगो के अत्यधिक तेजी के साथ अत्यधिक धनवान बनते जाने के चलते ही सम्भव हुआ है | इसका एक और सबूत अभी दो तीन माह पहले प्रकाशित एक सूचना में मौजूद है | इस सूचना के अनुसार देश के कुल संसाधनों के 70% से अधिक हिस्से पर 1 % आबादी का मालिकाना मौजूद है | बाकी ९९% आबादी के हिस्से में देश का 30% संसाधन छोटे बड़े हिस्से में बटा हुआ है | प्रश्न है कि अत्यंत छोटे हिस्से के बढ़ते मालिकाने एवं बढती धनाढ्यता के साथ देश में सम्पत्तिहीनो गरीबो की आबादी लगातार बढती जा रही है क्यों ? क्योकि पुराने युगों की तरह ही आधुनिक युग के धनाढ्य के बढ़ने का एक ही रास्ता है | वह रास्ता श्रमजीवी जनसाधारण के श्रम के शोषण के साथ उनके छोटे छोटे संसाधनों को तोड़ने और लूटने का रास्ता है | यही कारण है कि चंद लोगो की अमीरी बहुसंख्यक लोगो की गरीबी की स्थिति में धकेलते हुए ही आगे बढ़ रही है | चंद लोगो का भाग्योदय बहुतेरे लोगो को अभगा बनाते हुए हो पाता है और यही आज हो रहा है | धनाढ्यता निर्धनता की यह स्थितिया वस्तुत: धनाढ्य वर्ग एवं श्रमजीवी जनसाधारण श्रमजीवी वर्ग के बीच असाध्य वर्ग विरोध का सबूत है | यही वर्ग विरोध देश के वर्तमान दौर के आधुनिक विकास के अंतर्गत देश के सर्वाधिक धनी देशो के 62वें नम्बर पर पहुचने तथा विश्व के मानव विकास सूचकांक एवं बहुआयामी दरिद्रता सूचकांक में इस देश का काफी निचले स्तर पर बने रहने के परस्पर विरोधी रूपों में मौजूद है | स्पष्ट है कि देश की बढती अमीरी की सूचना देश के अमीर बनते लोगो को तथा उनके सेवक बने राजनीतिक. प्रचार माध्यमि एवं बौद्धिक सांस्कृतिक हिस्सों को तो आह्लादित कर सकती है और करती भी है | पर वह देश में गरीबी रेखा पर या उससे नीचे या कुछ उपर जी रहे लोगो को संकटग्रस्त एवं भयाक्रांत ही करेगी | क्योकि वह उन्हें ज्यादा साधनहीन एवं सुविधाहीन बनाती जायेगी | इस सन्दर्भ में यह सवाल उठ सकता है कि अगर थोड़े से लोगो में अमीरी बढ़ने के साथ बहुसंख्यक लोगो में गरीबी का बढ़ना लाजिमी है , तो वह काम अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे विकसित देशो में क्यों नही होता ? उनके देश में अमीरी बढ़ने के साथ गरीब अभावग्रस्त लोगो की आबादी में वृद्धि क्यो नही होती ? उन देशो का मानव विकास सूचकांक इतना ऊँचा क्यो बना रहता है ? वे देश बहुआयामी गरीब देशो की सूची में क्यो नही है ? इन प्रश्नों का उत्तर एक दम सीधा है और यह है कि ये देश केवल धनाढ्य एवं विकसित देश नही है बल्कि साम्राज्यी देश है | इनकी साम्राज्यी पूंजी का तथा इनके मालो मशीनों तकनीको एव अन्य सेवाओं का उच्च मूल्यों एवं उच्च ब्याजदरो पर निर्यात दुनिया के सभी देशो में होता रहा है | फलस्वरूप इन देशो के धनाढ्य वर्गो के शोषण लूट का दायरा पूरे विश्व में फैला हुआ है | विश्व के विभिन्न देशो के श्रम एवं संसाधनों के शोषण दोहन का फल इन देशो में पहुचता रहता है | वह उनके धनाढ्यो को और ज्यादा धनाढ्य बनाने के साथ - साथ वहाँ के जनजीवन एवं उपभोग के स्तर को भी बेहतर बनाये रखता है | उसके परिणाम स्वरूप साम्राज्यी देश और ज्यादा अमीर होने के साथ गरीबी की वैश्विक माप व सूची से बाहर रहते है | जबकि इन साम्राज्यी देशो के लूट के साथ बंधे भारत जैसे तमाम देशो के जनगण और ज्यादा गरीब एवं साधनहीन बना रहता है | निसंदेह इन साम्राज्यी सम्बन्धो में ही भारत जैसे देशो के धनाढ्य उद्योगपति एवं व्यापारियों का हिस्सा भी उसी शोषण - लूट से अधिकाधिक धनाढ्य बनता गया है | इस सन्दर्भ में ब्रिटिश राज के दौरान ब्रिटेन के धनाढ्य वर्गो की बढती धनाढ्यता के साथ वहाँ के मजदूरो की बेहतर होती स्थितियां तथा इस देश के बहुसंख्यक जनसाधारण की बदहाल होती स्तिथियों के साथ इस देश के उद्योग व्यापार के मालिको की बढती रही धनाढ्यता भी इसी बात का सबूत प्रस्तुत करती है | स्पष्ट है कि विकसित साम्राज्यी देशो की बढती धनाढ्यता सम्पन्नता का वर्गीय परिणाम मुख्यत: कम विकसित पिछड़े व विकासशील देशो के जनसाधारण की बढती गरीबी व साधनहीनता में ही आता है | वर्तमान दौर के बढ़ते वैश्वीकरणवादी व निजीकरण के साथ उसका परीलक्षण विदेशियों की बढती धनाढ्यता बेहतर मानव विकास एवं गरीबी के अभाव तथा भारत जैसे देशो के 1-2% लोगो की बढती धनाढ्यता साधन सम्पन्नता और बहुसंख्यक लोगो में बहुआयामी गरीबी के रूप में तेजी के साथ हो रहा है )
( लेख में दिए गये आंकड़े पूरी एवं मिश्र की पुस्तक ''भारतीय अर्थव्यवस्था से लिए गये है )