Tuesday, June 11, 2019

जंगे -आजादी -ए-हिन्द पर नजरेसानी - भाग - दो

लहू भी बोलता है -- सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी

जंगे -आजादी -ए-हिन्द पर नजरेसानी - भाग - दो


1857 -- 1847 -- की जंगे - आजादी

1857 की जंगे - आजादी को अंग्रेजो ने हालाकि सिपाही विद्रोह या गदर का नाम दिया था , लेकिन असल में यह जंगे - आजादी ही थी | जिसकी अगुवाई मुग़ल हुकूमत के आखरी बादशाह बहादुर शाह जफर ने ही की थी जो कि उर्दू के माहिर और जाने - माने शायर भी थे | उन्होंने अपनी शेरो - शायरी से जंगे - आजादी के लिए जज्बा पैदा किया | सन 1857 की यह पहली जंगे - आजादी सैनिक छावनियो से शुरू होकर करीब दो साल तक मुल्क के तमाम हिस्सों में फ़ैल गयी और एक बारगी समूचा मुल्क ही इस आन्दोलन में शामिल हो गया |
इस पहली जंगे - आजादी के अजीम म्जाहिद अल्लामा फजले हक़ खैराबादी ने सबसे पहले दिल्ली की जामा मस्जिद से अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया और खुद बादुर्शाह जफ़र के साथ मिलकर इस जंग को परवान चढाया | इस फतवे के बाद तो पुरे मुल्क का मुस्लिम समाज हो या हिदू समाज हो सारे लोग सडको पर उतर कर अपनी पहुच के मुताबिक़ जंगे - आजादी में हिस्सा लेने के लिए बेताब दिखे | मुल्क का ज्यादातर हिस्सा जंग का मैदान नजर आने लगा |
जंग को काबू करने के लिए अंग्रेजो ने आम अवाम को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया | अंग्रेज इतिहासकार लिखते है कि इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने अपना बदला मुसलमानों और खासकर मुस्लिम उल्माओ पर इस कदर उतारा कि हजारो उल्माओ को सरेआम फांसी दे दी गयी ; सैकड़ो को जामा मस्जिद और लाल किले के बीच मैदानों में नागा करके ज़िंदा जलाया गया | कानपुर - फरुखाबाद के बीच जी .टी रोड पर सडक के किनारे जितने भी पेड़ थे , उन सभी पर मौलानाओ को फांसी पर लटका दिया गया और मरने के बाद उन्हें उतारकर कफन - दफ़न की भी इजाजत नही दी गयी | अंग्रेजो का गुस्सा इस जंगे - आजादी में शामिल विद्रोहियों और सिपाहियों तक महदूद नही था बल्कि उनके रिश्तेदारों , औरतो व बच्चो तक को गिरफ्तार करके लाल किले में रखा गया | सभी कैदियों को एक दिन लाल किले के खुनी दरवाजे ( ब्लडी गेट ) से बाहर निकलने को आहा गया | लेकिन बाहर निकलते वक्त उन्हें गोलियों से भुन दिया गया जबकि बचे हुए लोगो को तोप से उड़ा दिया गया | उस वक्त की मंजरकशी शायरे आजम मिर्जा ग़ालिब ने अपने खतूत व शायरी में ब्यान की है | ग़ालिब के इन खतो को आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने ग़ालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स के नाम से साया किया है | इस जंगे - आजादी को दर का नाम देकर अंग्रेजो ने इसमें शामिल लोगो पर जो जुल्म ढाया , उसका आलम यह था की दिल्ली में तब लाल किला व जामा मस्जिद के आस - पास लाशो के ढेर पड़े थे की उनको उठानेवाला कोई नही था | उस वक्त अल्लामा फज्लेह्क खैराबादी ने खुद उन लाशो को उठाने की जिम्मेदारी ली और हजारो - हजार लाशो को तर्को के जरिये दूर - दराज भिजवाकर वहां दफ़न कराया | बाद में इसी जंगे - आजादी की अगुवाई के लिए बगावत की कयादत करने के जुर्म में बहादुरशाह जफर को रागुन ( वर्मा ; मौजूदा म्यामार ) भेज दिया गया जहाँ अप आखरी साँस तक रहे | इस बाबत उनका यह शेर आज भी लोगो की जिबान पर है |
'' है कितना बदनसीब जफर दफ़न के लिए
दो गज जमीं भी न मिली कुएं-यार में
अल्लामा फज्लेह्क खैराबादी को भी कालापानी की सजा मिली , जहाँ उन्हें शहादत हासिल हुई |

सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Wednesday, June 5, 2019

जंगे - आजादी - ए - हिन्द पर नजरेसानी

जंगे - आजादी - ए - हिन्द पर नजरेसानी
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लहू बोलता भी है ---सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी
हिन्दुस्तान की जंगे - आजादी , जिसे आमतौर पर करींब नब्बे सालों की जेद्दोजेहद का सिलसिला माना जाता है , वह दरअसल और पहले से शुरू हो गया था | पहले तो आम तारीखनवीस , जो जाहिरन अंग्रेजी नजरिये के हामी रहे है , सन 1857 के जद्दोजहद को आजादी की लड़ाई मानने से ही गुरेज करते रहे है -- मगर अब हिन्दुस्तानी तारीख़नवीसों के दबाव में उसे पहली जंगे - आजादी करार दिया गया , तब भी इसके सिलसिले को 17वी सदी से न जोड़कर सन 1857 से ही शुरू हुआ अमूमन मान लिया जाता है | जबकि सच यह है कि यह सिलसिला ज्यादा नही तो कम से कम सौ साल और क्बल सन 1757 में प्लासी की जंग से शुरू हो गया था |
जंगे - आजादी - ए - हिन्द पर नजरेसानी के तहत यहाँ पेश है इस बारे में सिलसिलेवार तफसील |
प्लासी की जंग
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यह जंग 23 जून सन 1757 को मुर्शिदाबाद के द्किखन में गंगा - किनारे बसे नदिया जिले के प्लासी के मैदान पर हुई थी | यह जंग इसलिए भी ख़ास मानी जाती है कि इसमें पहली बार खुद ब्रिटिश फ़ौज ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना के तौर पर बंगाल के नवाब की फ़ौज से आमने सामने की लड़ाई लड़ रही थी | कम्पनी की सेना राबर्ट क्लाइब के कयादत में पहले दौर में जब कामयाब नही हुई तो जल्द ही कुटनीतिक चाल चलते हुए लालच देकर नवाब के वजीरे - जंग के अलावा दो दरबारियों और नवाब के भरोसेमंद सलाहकार सेठ जगतनारायण को अपनी तरफ मिला लिया और इस तरह कम्पनी की सेना ने दूसरे दौर की जंग में नवाब को धोखे से हरा दिया | सबूत कहते है राबर्ट क्लाइव और जगत सेठ ने साजिशकर मीर जाफर के बेटे मीर कासिम को खरीदकर नवाब की फ़ौज में भी अपनी खासी पैठ बना ली थी , जिसकी वजह से दूसरे दौर की लड़ाई के वक्त नवाब की आधी फ़ौज जंग में पहुचं ही नही पायी थी और नवाब को नतीजतन हार का मुँह देखना पडा | दोबारा नवाब अपनी फौजी तैयारी कर ही रहे थे कि मीर कासिम ने धोखे से नवाब का कत्ल कर दिया उसके बाद सब कुछ खुद - ब- खुद खत्म हो गया | प्लासी की इस लड़ाई में अंग्रेजो के जरिये नवाब की हार को हिदुस्तान की बदकिस्मती के दिनों की शुरुआत माना जाता है एक तरफ बरतानवी हुकूमत के हौसले बुलंद हुए और दूसरी तरफ हिदुस्तान की गुलामी का दौर शुरू हो गया |
श्रीरंगपट्टनम की जंग -

नवाब सिराजुद्दौला की शिकस्त से मैसूर भी बेखबर नही था | हैदर अली ने हर वाकिये पर बड़ी बारीकी से नजर रखकर हालात का सामना करने की तैयारी कर लिए थे | उन्होंने अंग्रेजो की गन्दी - लालची नजर पढ़ ली थी | हुआ भी आखिरकार वही जिसकी उम्मीद थी - बंगाल की फतह के बाद अंग्रेजी फ़ौज ने मैसूर की तरफ रुख किया , लेकिन मैसूर के तवागार बार्डर पर उन्होंने अंग्रेजो को खदेड़ दिया | इसके बाद तो यह सिलसिला लगातार चलता रहा | बरसों तक हैदर अली की फ़ौज ने वकत - ब- वक्त ब्रिटिश फ़ौज से जमकर मुकाबला किया | इन लड़ाइयो में हैदर अली को नुक्सान तो भारी हुआ , लेकिन अंग्रेजो से किसी तरह का समझौता उन्हें गवारा न हुआ | हैदर अली के इंतकाल के बाद उनके बेटे टीपू सुल्तान ने अंग्रेजो से लोहा लेना जारी रखा | हिन्दुस्तान की तवारीख में टीपू सुल्तान का नाम एक ऐसे बहादुर के तौर पर बाइज्जत लिया जाता है जिन्होंने अपनी सुझबुझ और बहादुरी का लोहा अंग्रेजो से मनवाकर दिखाया | पहली बार की जंग में अंग्रेजो को उनके सामने घुटने टेकने पर मजबूर होना पडा | उनकी बहादुरी और मजबूत इरादे के वजह से ही उन्हें ''शेरे - मैसूर '' कहा जाता है | उनका यह कौल जग जाहिर है कि ''गीदड़ की सौ साल की जिन्दगी जीने से बेहतर है की शेर की तरह एक दिन की जिन्दगी जीना '' | उनकी बहादुरी और शेरे - दिली का आलम यह था कि एक बार तो अंग्रेज सैनिको ने भी मैसूर की जंग में शामिल होने से इन्कार कर दिया , क्योकि उनके मन में टीपू सुल्तान की फ़ौज का डर बैठ गया था | उनके बारे में भारत के राष्ट्रपति रहे ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था की दुनिया का पहला राकेट इजाद करने वाला अगर कोई था तो वह टीपू सुलतान ही था | बादशाह टीपू सुल्तान ने ही मुल्क में बाहरी हमलावर अंग्रेजो के जुल्मो - सितम के खिलाफ बिगुल बजाया और जी - जान की बाजी लगाकर बहुत दिनों तक अंग्रेजो को खदेड़ा भी और अंग्रेजो से कभी समझौता नही किया | अपनी आखरी साँस तक अंग्रेजो से लड़ते ही रहे और महज 48 साल की उम्र में उस वक्त शहीद हो गये जब कर्नाटक के श्रीरंगपट्टनम के मैदाने - जंग में 4 मई सन 1799 को अंग्रेजो ने धोखे से उनका कत्ल करवा दिया | टीपू के मरने के बाद करीब दो दिनों तक पूरी अंग्रेजी सेना आपकी लाश के पास तक जाने से डरती रही | आखिरकार आपकी सहादत की जगह पर पहुचकर अंग्रेजो ने जशन मनाया और आपकी तलवार को बतौर निशानी अपने साथ ब्रिटेन ले गये | इसके बाद ही पूरा सूबा अंग्रेजो के हाथ आ गया अंग्रेजो ने टीपू सुल्तान के बेटो को बंदी बनाकर मैसूर के किले में कैद कर दिया | अंग्रेजो ने अब अपना असली रंग दिखाना शुरू किया | उन्होंने सन 1805 में भारतीय सैनिको की वर्दी बदल दी व हिन्दू - मुसलमान दोनों के मजहबी निशाँन लगाने पर पाबंदी लगा दी : जैसे कि हिन्दू सैनिक अपने माथे पर तिलक न लगाये और मुस्लिम सिपाही दाढ़ी न रखे || हिन्दू - मुसलमान दोनों सैनिको को अंग्रेजी हुकम मानने के लिए मजबूर किया जाने लगा | लेकिन दोनों ही फिरको के सैनिक को यह फैसला पसंद नही आया और उनमे बगावत के जज्बात पैदा होने लगे | जिन सैनिको ने इसकी मुखालिफत की , उनमे से कुछ ख़ास - ख़ास हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों को पकडकर सरेआम 500 - 900 कोड़े मारे गये और फिर उन्हें माफ़ी मागने के लिए मजबूर किया गया लेकिन उनके बीच यह आग धीमे - धीमे सुलगती रही क्योकि एक तो दोनों ही फिरको के यह सैनिक खुद मुलाजमत करते थे और दूसरे उन्हें एक जुट करने वाली असरदार शख्सियत भी तब सामने नही थी .सैनिको की सुलगती हुई यह धीमी आँच तब भड़कर सामने आई जब जुलाई सन 1806 में टीपू की बेटी की शादी थी , जो बेल्लोर के किले से होनी थी | शादी इस मौके के लिए बड़ी तादात में अवाम किले में इकठ्ठा थी | अपने दिल में बगावत का इरादा पाले कई सैनिक भी उन्ही के साथ किले के अन्दर दाखिल हो गये और कई सैनिको ने किले को बाहर बंद करके घेर लिया | इस तरह दो टुकडो में बटकर उन सैनिको ने अपनी योजना को अन्जाम दिया और शादी की रस्म खत्म होते ही टीपू सुल्तान के खानदान को महफूज जगह पहुचाकर किले में मौजूद अंग्रेजी सेना के लोगो को मार डाला , कुछ घायल भी हुए | सुबह होते - होते उन सैनिको ने किले पर मैसूर के सुल्तान का झण्डा पहराकर टीपू के दुसरे बेटे फ़तेह हैदर के राजा होने का एलान कर दिया| इस बीच एक ब्रिटिश अफसर ने एक बागी सैनिक को हीरा - जवाहरात देकर अपनी मदद के लिए राजी कर लिया और किले के खुफिया रास्ते से भाग निकलने में कामयाब हो गया | वह भागकर आर्र्कोर्ट छावनी पहुचा और वहाँ तैनात सर रोलो गिलेस्पी से मिला और उसे सारा हाल बताया दिन ढलने तक गिलेस्पी की अगुवाई में घुड़सवार अंग्रेज सैनिको ने किले पर हमला आकर दिया | यहाँ बड़ी घमासान लड़ाई हुई , जिसमे जिसमे 100 सैनिक व सामान्य भारतीय नागरिक की मौत हुई 350 लोग घायल हुए | इस तरह किले पर फिर से ब्रिटिश हुकूमत का कब्जा हो गया |
सिपाहियों की इस बगावत से सबक लेकर ब्रिटिश फ़ौज के अफसरों ने भारतीय फ़ौज के लिए बनाये गये कायदे - कानूनों को ओर सख्त कर दिया , ताकि भारतीय सैनिको का बगावती तेवर कम हो जाए . और ऐसा हुआ भी भारतीय सैनिको का गुस्सा धीरे - धीरे खत्म होने लगा | ;
क्रमश: भाग - एक
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक |

Tuesday, June 4, 2019

लहू बोलता भी हैं

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी


जंगे - आजादी - ए - हिन्द के मुस्लिम किरदार


इतिहास के अन्याय को दुरुस्त करना समय की मांग


इतिहास में जाति - धर्म के आधार पर काफी पक्षपात हुआ है | इसका एक उदाहरण तब भी सामने आया था जब स्व एल .सी , जैन के पिता ने आजादी के आन्दोलन के बारे में जिन दस्तावेजो को घूम - घूम कर संग्रहित किया था , उनका प्रकाशन हुआ था | स्व मस्तराम कपूर ने इस संकलन को तैयार करने का काम किया था तथा उसमे बताया था कि आजादी के आन्दोलन के सैनिको के साथ किस प्रकार का भेदभाव हुआ है | आजादी के आन्दोलन के ऐसे ही एक नायक थे स्व अब्दुल गनी खान , जिन्हें लोग आम तौर पर गनी चाचा के नाम से जानते थे | वह महात्मा गांधी के आन्दोलन में अनेक बार जेल में रहें | कुछ समय तक मेरे पिता स्व भवानी सिंह और गनी चाचा साथ - साथ जेल में भी रहे | गनी चाचा न केवल स्वतंत्रता - संग्राम - सेनानी व पक्के गांधीवादी और धर्मनिरपेक्ष जेहनियत के व्यक्ति थे , बल्कि जब महात्मा गांधी ने आजादी के आन्दोलन के दौरान गौ - वध - बंदी का समर्थन किया था और बहुत से मुस्लिम - भाइयो को उसका सहयोगी बनाया था तब गनी चाचा भी खुलकर साथ में थे | मध्यप्रदेश के सागर जिले के रतौना नामक गाँव में जब अंग्रेजी हुकूमत गौ - कशी के लिए स्लाटर - हाउस बना रही थी , तब गनी चाचा ने वहाँ जाकर इसका विरोध किया और मुस्लिम - भाइयो को साथ लेकर गौ - वध - बंदी के पक्ष में खड़े हुए तथा इस्लामिक सिद्धांतो और कुरआन की आयतों का उल्लेख करते हुए गौ - वध - बंद कराने के पक्ष में अकाट्य तर्क दिए | दरअसल अंग्रेजी हुकूमत गाय के नाम पर हिन्दू और मुसलमान को बाटना और महात्मा गांधी के आजादी के आन्दोलन को कमजोर करना चाहती थी , मगर गनी चाचा की पहल से अंग्रेजो का यह षड्यंत्र विफल हो गया | उन्होंने गाँव के मसायल पर एक अखबार ''देहाती दुनिया'' भी शुरू किया था जिसे वह लिखते भी थे , छापते भी थे , बाटते भी थे और गाँव - गाँव जाकर महात्मा गांधी के विचारों को जिसके जरिये लोगो तक पहुचाते भी थे | अब्दुल गनी का निवास - स्थान सागर नगर के शनिचरी मुहल्ले में था | वर्ष 2004 - 2005 में मैंने पहल करके सागर के नगर निगम से मांग की कि उनके निवास स्थान से कुछ दुरी पर जो पार्क है उसे उनके नाम कर दिया जाए | निगम के तत्कालीन महापौर ने , जो संघ की पृष्ठभूमि के थे , पहले तो सहमती प्रदान कर दी तथा कुछ प्रक्रिया आगे भी बढाई - मगर कुछ दिनों बाद ही प्रक्रिया थम गयी और यह स्पष्ट हो गया कि संघ के लोग उनके नाम पर पार्क का नामकरण नही होने देना चाहते | वर्ष 2009 में जब भारत सरकार ने सागर के डा0 हरी सिंह गौर विश्व विध्यालय का उन्नयन करके उसे केन्द्रीय विश्व विद्यालय बनाया , तब मैंने उसकी शुरुआत के लिए आये तत्कालीन मानव - ससाधन - मंत्री अर्जुन सिंह से विश्व विद्यालय के स्टेडियम का नाम अब्दुल गनी खान साहब के नाम पर करने का अनुरोध किया | उन्होंने इसे तत्काल स्वीकार किया और नामकरण करने की घोषणा व उसे बनवाने के लिए फौरी तौर पर 3 करोड़ रुपया स्वीकृत भी किया | जब यह खबर सागर के अखबारों में प्रकाशित हुई तो बहुत - सारे राजनेताओं ने , जिनमे धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले लोग भी शामिल थे , मुझे उलाहना देते हुए कहा आपको किसी और स्वतंत्रता - संग्राम - सेनानी का नाम नही मिला | यह है हमारे समाज की छिपी हुई फिरकापरस्ती ! घोषत रूप से फिरकापरस्त जमाते तो पहचान ली जाती है , परन्तु धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा पहने छिपी हुई फिरकापरस्ती ताकते व लोग आम तौर पर पहचान में नही आते | आपातकाल में मैं इंदौर जेल में था | वहां पर बड़ी संख्या में मीसाबंदी थे तथा संघ के तत्कालीन अखिल भारतीय प्रमुख सुदर्शन जी भी थे | विचारधारा को लेकर अक्सर मेरी और तत्कालीन जनसंघ के मित्रो के बीच नोंक - झोंक होती रहती थी तथा वे मुझे अपना शत्रु जैसा मानते थे | सन 1977 में लोकसभा - चुनाव की घोषणा के बाद मैं जेल से रिहा हुआ और नवगठित जनता पार्टी ने मुझे पार्टी का महासचिव मनोनीत किया | मेरे महासचिव बनने के बाद सुदर्शन जी ने -- जो की सुशिक्षित , ईमानदार और भले ( परन्तु अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्ध व कट्टर ) व्यक्ति थे - सिरोंज के संघ - कार्यकर्ताओं को चिठ्ठी लिखी ''रघु ठाकुर'' जैसे अशिष्ट और असभ्य व्यक्ति पार्टी के पदाधिकारी बन गये | कुल मिलाकर , अपने विचारों से असहमति को असभ्यता व अशिष्टता मानना और अपने पीछे चलनेवालो को ही सभ्य व शिष्टाचारी होने का खिताब देना - यही संघ के लोगो का शिक्षण है | मेरी राय में भारत की आजादी के लिए हुए आन्दोलन के इतिहास को पुन: लिखने और सशोधित करने की आवश्यकता है | यह काम सरकार नही करेगी वरन समाज के धर्मनिरपेक्ष लोगो को ही करना होगा | जिन नायको को जाति या मजहबी नजरिये के चलते धकेल दिया गया हैं , उन्हें उनके त्याग और कुर्बानी के साथ सामने लाना होगा -- तथा जिन्हें औचित्य से अधिक स्थान दिया गया है . उसे भी दुरुस्त करना होगा | इस सम्बन्ध में ग्वालियर के स्वतंत्रता - संग्राम - सेनानी स्व गणेशीलाल सेन का उदाहरण देकर मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा | स्व गणेशीलाल सेन साबरमती आश्रम में जाकर गांधी जी से मिले थे और एक प्रकार उन्ही के द्वारा कांग्रेस में प्रवेश भी लिया था | स्व० सेन हजामत का काम करते थे | गांधी जी के आश्रम से लौटने के बाद ग्वालियर के मुरार स्थित अपने मकान को उन्होंने कांग्रेस का कार्यालय बना दिया और खुद सड़क पर अपनी दूकान लगाने लगे | वह स्वतंत्रता आन्दोलन में जेल गये , परन्तु ग्वालियर शहर में उनकी स्मृति में कुछ भी नही है | आजादी के आन्दोलन के विरोधियो के नाम पर , राजा - महाराजाओं के नाम पर चौराहों व मूर्तियों है - परन्तु आजादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान करनेवालों के नाम पर कुछ भी नही है | इतिहास के इस अन्याय को दुरुस्त करना होगा |

प्रस्तुति - सुनील दत्ता ''कबीर ' स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

रघु ठाकुर --- प्रखर समाजवादी चिन्तक - वरिष्ठ लेखक - जननेता
लोहिया सदन 32 नीलम कालोनी , जहांगीराबाद , भोपाल

Monday, June 3, 2019

'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक के नाम

'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक के नाम
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत ने 22 दिसम्बर 1929 को जेल से लिखे 'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक को प्रति -उत्तर में इन्कलाब जिंदाबाद नारे को परिभाषित करते हुए क्रांति से जोड़ा -दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है ,जो सम्भव है भाषा के नियमो एवं कोष के आधार प्र इसके शब्दों से उचित तर्क सम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए ,परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारो को पृथक नही किया जा सकता ,जो इसके साथ जुड़े हुए हैं | ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ का घोतक हैं ,जो एक सीमा तक उनमे पैदा हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमे निहित है |क्रांति (इन्कलाब ) का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नही होता | बम और पिस्टल कभी कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते है | इसमें भी सन्देह नही है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्टल एक महत्त्व पूर्ण साधन सिद्ध होते है ,परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्टल क्रांति के पर्यायवाची नही हो जाते | विद्रोह को क्रांति नही कहा जा सकता ,यद्धपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो |.........क्रांति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन कि भावना एवं आकाक्षा है | लोग साधारण तया जीवन की परम्परा गत दशाओं के साथ चिपक जाते है और परिवर्तन के विचार से ही कापने लगते है |
यह एक अकर्मण्यता कि भावना है , जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जागृत करने कि आवश्यकता हैं |
'क्रांति कि इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए ,जिससे की रुदिवादी शक्तिया मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सके | यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे ,जिससे की एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके | यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रखकर हम इन्कलाब जिंदाबाद का नारा ऊँचा करते है |
साभार भगतसिंह से दोस्ती पुस्तक से
प्रस्तुती ....सुनील दत्ता

Saturday, June 1, 2019

महान क्रांतिकारी मौलवी बरकतुल्लाह

महान क्रांतिकारी मौलवी बरकतुल्लाह
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( 7 जुलाई 1854 - 20 सितम्बर 1927 )
ज्यादातर लोग जानते है कि ब्रिटिश शासन के दौर में बनी पहली हिन्दुस्तानी सरकार आज़ाद हिन्द फ़ौज की सरकार थी | लेकिन सच्चाई यह है कि पहली हिन्दुस्तानी सरकार 1915 में अफगानिस्तान में बनी हिन्दुस्तान की अस्थाई सरकार थी | राजा महेंद्र प्रताप इसके राष्ट्रपति और मौलवी बरकतुल्लाह इसके प्रधानमन्त्री थे | इस तरह बरकतुल्लाह साहब को हिन्दुस्तान का पहला प्रधानमन्त्री बनने का गौरव प्राप्त हैं | उनका जीवन शुरुआत से ही संघर्षो का जीवन रहा है | वह संघर्ष इस्लाम धर्म के धर्मवादी रुझानो से गदर पार्टी के राष्ट्रवादी क्रांतिकारी एवं धर्म निरपेक्षी रुझानो की तरफ बढ़ता रहा | इस्लामी जगत के स्कालर के रूप में अन्तराष्ट्रीय प्रसिद्धि हासिल किए तथा कई भाषाओं के विद्वान् मौलाना राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामी धार्मिक या किसी भी भाषाई संस्थान के उच्च पद पर पहुचने में कही कोई अडचन नही थी | वे लिवरपूल व टोकियो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के रूप में सालो साल काम भी करते रहे थे | लेकिन अन्त में उन्होंने वह सब त्याग कर राष्ट्र के स्वतंत्रता के लिए प्रवासी क्रांतिकारी का जीवन अपनाया | गदर पार्टी के निर्माण में और उसे आगे बढाने में भरपूर योगदान दिया | बाद में अफगानिस्तान में देश की पहली अस्थाई सरकार बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई |ब्रिटिश दासता और उसके शोषण व अन्याय , अत्याचार के विरुद्ध मौलवी बरकतुल्लाह के विचार एवं व्यवहार आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं स्मरणीय है और चौतरफा बढ़ते विदेशी प्रभाव , प्रभुत्व के मौजूदा दौर में अनुकरणीय भी हैं |
मौलवी बरकतुल्ला का पूरा नाम अब्दुल हफ़ीज़ मोहम्मद बरकतुल्ला था | इनके जन्म के समय इनके पिता शुजातुल्लाह एक छोटे से स्कुल में अध्यापन का काम कर रहे थे | बाद में वे नौकरी छूट जाने के बाद वे स्थानीय पुलिस चौकी पर नियुक्त हो गये थे | घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी | इसी लिए बरकतुल्लाह साहब की जन्म तिथि पर भी मतभेद है | कुछ का कहना है की उकी पैदाइस की तिथि 7 जुलाई 1854 थी | जबकि कि दूसरी जगह पर उनकी पैदाइश को 1857 और 1858 के बीच बताया गया हैं | मौलाना ने भोपाल के सुलेमानिया स्कूल से अरबी , फ़ारसी कई माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा प्राप्त की | मौलाना ने यही से हाई स्कूल तक की अंग्रेजी शिक्षा भी हासिल की | शिक्षा के दौरान ही उन्हें उच्च शिक्षित अनुभवी तथा देश दुनिया के बारे में जानकार मौलवियों , विद्वानों से मिलने और उनके विचारों को जानने का अवसर मिला | शिक्षा समाप्त करने के बाद वे उसी स्कूल में शिक्षक नियुक्त हो गये | यही काम करते हुए वे अन्तराष्ट्रीय ख्याति के लीडर शेख जमालुद्दीन अफगानी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए | शेख साहब सभी देशो के मुसलमानों में एकता व भाईचारा के लिए दुनिया के तमाम देशो का दौरा कर रहे थे | मौलवी बरकतुल्लाह के माँ - बाप की मृत्यु भी इसी दौरान हो गयी | इकलौती बहन की शादी हो चुकी थी | अब मौलाना परिवार में एकदम अकेले थे | उन्होंने अचानक और बिना किसी को बताये ह़ी भोपाल छोड़ दिया और बाम्बे चले गये | वो पहले खंडाला और फिर बाम्बे में ट्यूशन पढाने के साथ खुद की अंग्रेजी पढाई जारी राखी | 4 साल में उन्होंने अंग्रेजी भाषा की उच्च शिक्षा हासिल कर ली और 1887 में वे आगे की शिक्षा ज्ञान की तलाश में इंग्लैण्ड पहुच गये | सम्भवत: उन्हें इंग्लैण्ड पहुचने में प्रवासी हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारियो के सबसे बड़े प्रोत्साहक , संरक्षक श्याम जी कृष्ण वर्मा का योगदान था | इंग्लैण्ड में मौलाना का जीवन वहा की चकाचौध व विलासिता से एकदम अछूता रहा | श्याम जी कृष्ण वर्मा और इंग्लैण्ड में रह रहे दूसरे क्रांतिकारियों के सम्पर्क से मौलवी बरकतुल्लाह का , हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के क्रांतिकारी विचारों गतिविधियों से सम्पर्क बढना शुरू हुआ जो लगातार बढ़ता ही रहा | वे कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले से और फिर बाद में बाल गंगाधर तिलक से , उनके ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध में स्वराज्य की मांग से अत्यधिक प्रभावित हुए थे | राष्ट्र स्वतंत्रता के लिए अपनी बढती गतिविधियों के कारण मौलाना अंग्रेजी भाषा की उच्च शिक्षा को तो जारी रख सके लेकिन इसी बीच उन्होंने जर्मनी , फ्रांसीसी , टर्की और जापानी भाषा का ज्ञान जरुर हासिल कर लिया | उर्दू अरबी और फ़ारसी के विद्वान् तथा अंग्रेजी के तो अच्छे खासे जानकार वे पहले से ही थे | अब अरबी , फ़ारसी के विद्वान् के रूप में प्रसिद्धि पाने के साथ - साथ मौलाना की पहचान राजनीति व पत्रकारिता के क्षेत्र में भी स्थापित होने लगी थी | ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हिन्दुस्तान के बिगड़ते आर्थिक हालात पर मौलाना के भाषणों व लेखो को खूब सराहा जाता था | लन्दन में 7 - 8 सालो तक अरबी भाषा के अध्यापक तथा स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करने के बाद मौलाना लिवरपूल यूनिवर्सिटी के ओरियन्टल कालेज में फ़ारसी के प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए | लेकिन राष्ट्र वादी और धर्मवादी विचारधारा को लेकर इंग्लैण्ड के शासकीय हल्के में मौलाना का विरोध बढ़ता रहा | क्योंकि नौजवान बरकतुल्लाह मुस्लिम देशो की शासन सत्ताओ के विरुद्ध ब्रिटिश शासन की नीतियों , कारवाइयो का तथा हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन की लुटेरी नीतियों का लगातार विरोध करते रहे | उस पर खुलकर बोलते व लिखते रहे थे | इसी कारण ब्रिटिश सरकार ने अब उन पर तरह - तरह के प्रतिबन्ध भी लगाना शुरू कर दिया | इसलिए मौलाना के लिए अब वहा टिकना सम्भव नही रह गया | इसी बीच न्यूयार्क के मुसलमानों की तरफ से उन्हें एक मस्जिद व इस्लामिक स्कूल बनवाने के लिए रखे गये सम्मलेन में आने का निमत्रण मिला | इस दौरान मौलाना का परिचय व पहुच विश्व के नामी गिरामी इस्लामी विद्वानों तथा बहुतेरे मुस्लिम राष्ट्रों के शासको में हो चुकी थी | 1899 में अमेरिका पहुचने के बाद बरकतुल्लाह साहब ने वहा के स्कूलो में अरबी पढाने का काम शुरू कर दिया | लेकिन ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध अपनी क्रियाशीलता को वहा भी लगातार जारी रखा | इसका सबूत आप 21 फरवरी 1905 में हसरत मोहानी को लिखे गये एक पत्र में भी देख सकते हैं |बरकतुल्ला ने यह पत्र हसरत मोहानी द्वारा हिन्दू मुस्लिम एकता की जरूरत पर लिखे गये किसी समाचार पत्र के सम्पादकीय को पढकर लिखा था | उन्होंने हसरत मोहानी के विचारों की प्रशंसा करते हुए लिखा था कि"बड़े अफ़सोस की बात है कि, 2 करोड़ हिन्दुस्तानी , हिन्दू मुसलमान भूख से मर रहे हैं , पूरे देश में भुखमरी फैलती जा रही हैं | लेकिन ब्रिटिश सरकार हिन्दुस्तान को अपने मालो - सामानों का बाज़ार बनाने की नीति को ही आगे बढाने में लगी हैं | इसके चलते देश के लोगो के काम -धंधे टूटते जा रहे हैं | ब्रिटिश सरकार खेती के आधुनिक विकास का भी कोई प्रयास नही कर रही है जबकि उसकी लूट निरंतर जारी रखे हुए है | भारतीयों को अच्छे व ऊँचे पदों , ओहदों से भी वंचित किया जाता रहा हैं | इस तरह से ब्रिटिश हुकूमत द्वारा हिन्दुस्तान व उसकी जनता पर हर तरह का बोझ डाला जा रहा हैं | उसकी अपनी धरोहर को भी नष्ट किया जा रहा है |हिन्दुस्तान से करोड़ो रुपयों की लूट तो केवल इस देश में लगाई गयी पूंजी के सूद के रूप में ही की जाती रही है और निरंतर बढती जा रही है | देश की इस गुलामी और उसमे उसकी गिरती दशा के लिए जरूरी है कि देश के हिन्दू मुसलमान एकजुट होकर तथा कांग्रेस के साथ होकर देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए हिन्दू मुस्लिम एकता को बढाया जाना चाहिए "| खुद मौलाना ने 1857 के संघर्ष को याद करते हुए हिन्दू मुस्लिम एकता को आगे बढाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किया | इसी संदर्भ में वे न्यूयार्क से जापान पहुचे | अब ब्रिटिश हुकूमत और उसकी नीतियों के विरोध को आगे बढाने का काम मौलाना और उनके अन्य साथियो , सहयोगियों का सर्वप्रमुख मिशन बन चुका था | मिशन में ब्रिटिश हुकूमत से पीड़ित हर देश के हिन्दू मुसलमान व अन्य धर्मावलम्बी लोग उने साथ खड़े हो रहे थे | 1905 के अन्त में जापान पहुचने के साथ मौलाना की ख्याति एक महान क्रांतिकारी के रूप में हो चुकी थी | वहा उन्होंने जापानी भाषा के साथ कई भाषाओं का अधिकारपूर्ण ज्ञान तथा उर्दू , अरबी , फ़ारसी की विद्वता के चलते टोकियो यूनवर्सिटी में उनकी नियुक्ति उर्दू प्रोफेसर के रूप में हो गयी | लेकिन उनका मुख्य काम ब्रिटिश हुकूमत का विरोध बना रहा | वे हर जगह ब्रिटिश राज को उखाड़ फेकने के लिए खासकर मुसलमानों का आव्हान करते रहे और इस बात पर जोर देकर करते रहे कि मुसलमानों को हिन्दू और सिक्खों से भी इसके लिए एकता बढाने की जरूरत है | इसी के चलते जापान में ब्रिटिश हुकूमत के प्रतिनिधि के दबाव के चलते मौलाना को यूनवर्सिटी से निकाल दिया गया | लेकिन मौलाना का वह विरोध समाचार पत्रों तथा मीटिंगों सम्मेलनों के माध्यम से निरंतर चलता बढ़ता रहा | इसी सिलसिले में वे फ्रांस और फिर दोबारा अमेरिका पहुचे | तब तक अमेरिका के प्रवासी हिन्दुस्तानियों द्वारा गदर पार्टी के निर्माण के लिए प्रयास आरम्भ हो चुका था | यह प्रयास अमेरिका , कनाडा तथा मैकिसकोमें एक साथ शुरू किया गया था | 13 मार्च 1913 को गदर पार्टी और उसके क्रियाकलापों को संगठित और निर्देशित करने के लिए 120 भारतीयों का सम्मलेन बुलाया गया | इसमें सोहन सिंह बहकना , लाला हरदयाल , मौलाना बरकतुल्ला जैसे लोगो ने प्रमुखता से भागीदारी निभाई | गदर पार्टी का उद्देश्य ब्रिटिश राज को सशत्र संघर्ष के जरिये उखाड़ कर देशवासियों के जनतांत्रिक व धर्म निरपेक्ष गणराज्य की स्थापना करना था | गदर पार्टी के इन उद्देश्यों , घोषणाओं को निरुपित करने में बरकतुल्ला ने भी प्रमुख भागीदारी निभाई थी | मौलाना के जीवन का यह मोड़ उनको धर्मवादी , इस्लाम - वादी रुझानो से आगे बढकर राष्ट्रवादी क्रांतिकारी एवं धर्म निरपेक्षी मूल्यों , रुझानो की तरफ बढने वाला साबित हुआ , जो म्रत्यु पर्यंत चलता रहा | अमेरिका में गदर पार्टी के फैलाव और 'साप्ताहिक गदर ' के कई भाषाओं में प्रकाशन के जरिये ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेकने के प्रचार - प्रसार का काम तेज़ हो गया | फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने अमेरिका सरकार पर गदर पार्टी पर रोक लगाने , उसे प्रतिबंधित करने के लिए दबाव डालना शुरू किया | इसके चलते भी बरकतुल्ला , लाला हरदयाल और कई अन्य क्रान्तिकारियो को अमेरिका छोड़ना पडा |इन क्रान्तिकारियो ने जर्मनी पहुच कर वहा से हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के ध्येय को पूरे यूरोप में फैलाने - बढाने के लिए ' बर्लिन पार्टी ' में प्रमुख रूप से चम्पक रामन पिल्लई,लाला हरदयाल बरकतुल्ला , भूपेन्द्रनाथ दत्ता , राजा महेंद्र प्रताप और अब्दुल वहीद खान शामिल थे | यही पर राजा महेंद्र प्रताप और बरकतुल्ला पहली बार मिले और इसके बाद टी वे जीवन- पर्यंत एक दूसरे के साथ तब तक रहे , जब तक मौत ने बरकतुल्ला को अपने आगोश में नही ले लिया | बर्लिन पार्टी का एक मुख्य काम विदेशो में ब्रिटिश सरकार की तरफ से युद्धरत हिन्दुस्तानी सैनिको को ब्रिटिश फ़ौज से बगावत करवाने और फिर उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खड़ा करना था | बर्लिन पार्टी द्वारा बरकतुल्ला व राजा महेंद्र प्रताप को अफगानिस्तान के रास्ते विद्रोही सैनिको को लेकर हिन्दुस्तान की ब्रिटिश सरकार पर हमला करने का कार्यभार सौपा गया |इसी सिलसिले में बरकतुल्ला और महेंद्र प्रताप ने टर्की , बगदाद और फिर अफगानिस्तान का सफर किया | वे वहा के शासको से मिलते , अपना उद्देश्य बताते और हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के लिए सहयोग , सहायता मांगते हुए आगे बड़े रहे थे | प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध कर रही जर्मनी की सरकार ने सफर के दौरान जर्मन सैनिको का एक दस्ता भी उनके साथ कर दिया था |
काबुल पहुचने पर पहले तो उन्हें राजकीय गेस्ट हाउस में नजरबंद करलिया गया | पर बाद में जर्मनी तथा अफगानी हुकमत के प्रधानमन्त्री के दबाव में न केवल इन्हें नजरबंदी से मुक्ति दे दी गयी अपितु हिन्दुस्तान की आजादी के लिए अफगानिस्तान में रहकर क्रिया -कलाप बढाने की छुट मिल गयी | 1915 का अंत होते - होते मौलवी बरकतुल्ला और महेंद्र प्रताप ने अपने सहयोगियों के साथ अफगानिस्तान में हिन्दुस्तान की अस्थाई सरकार के गठन का काम पूरा किया | प्रथम विश्व युद्ध का दौर में ब्रिटिश विरोधी जर्मनी सरकार ने तुरंत ही अफगानिस्तान में हिन्दुस्तानियों की अस्थाई क्रांतिकारी सरकार को मान्यता प्रदान कर दी | महेंद्र प्रताप इस अस्थाई सरकार के अध्यक्ष व बरकतुल्ला प्रधानमन्त्री बने | मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी को इस सरकार का विदेश मंत्री बनाया गया | इस अस्थाई सरकार और अफगानी सरकार में यह समझौता हुआ कि अफगानिस्तान की सरकार उन्हें हिन्दुस्तान को आजाद कराने में पूरा सहयोग देगी | लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दुस्तान की सरकार बलूचिस्तान और पख्तुनी भाषा - भाषी क्षेत्र अफगानिस्तान को सौप देगी |इस अस्थाई सरकार ने हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के लिए हर संभव प्रयास जारी रखा | इस प्रयास से काबुल में हिन्दुस्तानियों की खासी बड़ी जमात इकठ्ठा हो गयी | अस्थाई सरकार के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप ने रूस के सम्राट जार निकोलस द्दितीय से ब्रिटेन से सम्बन्ध तोड़ लेने और हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के लिए अस्थाई सरकार से सहयोग करने का अनुरोध किया | लेकिन जारशाही रूस ब्रिटेन के साथ था | उसने अस्थाई सरकार को कोई सहयोग नही किया |अब अस्थाई सरकार ने हिन्दुस्तान की ब्रिटिश हुकूमत पर आक्रमण करने के लिए सेना का गठन शुरू किया | इस सेना में ज्यादातर सीमावर्ती क्षेत्रो के लोग शामिल थे | सेना के गठन के साथ अस्थाई सरकार द्वारा हिन्दुस्तानियों को देश में बगावत करने , अंग्रेजो की हुकूमत को ध्वस्त करने और अंग्रेजो को पूरी तरह से खत्म कर देने की अपीले जारी कर दी |इसी बीच 1917 की अक्तूबर क्रान्ति के जरिये रूस की जारशाही का तख्ता पलट दिया गया | लेलिन के नेतृत्त्व में बनी सोवियत सत्ता ने अंग्रेजो के साथ हुए गोपनीय समझौतों व संधियों को रुसी जनता के सामने उजागर करते हुए उन्हें रद्द कर दिया मई 1919 में बरकतुल्ला , महेंद्र प्रताप मौलवी अब्दुल रब तथा दिलीप सिंह के साथ हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए मास्को पहुचे | जहा उन्होंने लेलिन से भेट की |लेलिन ने उनके उद्देश्य को न्याय संगत बताते हुए उनका समर्थन किया | बरकतुल्ला और उनके साथी लेलिन से मिलकर और सोवियत सत्ता की व्यवस्था देखकर खासे -प्रभावित हुए |उन्होंने लेलिन की प्रसशा करते हुए यह लिखा कि "लेलिन अकेले ऐसे बहादुर इंसान हैं , जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के साथ जारशाही और बाद की करेनसकी सरकार के गोपनीय संधियों , समझौतों को सबके सामने उजागर करते हुए उन्हें रद्द कर दिया |लेलिन पर लिखे अपने बहुत से लेखो में बरकतुल्ला ने उन्हें मुसलमानों और एशियाई जनगण की मुक्ति के लिए " उगता सूर्य " बताया |बरकतुल्ला की अगुवाई में अस्थाई सरकार तथा प्रवासी हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारियो का सोवियत रूस के साथ सम्पर्क बढ़ता रहा | उन्हें सोवियत रूस से हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता संघर्ष का सीधा समर्थन निरंतर मिलता रहा | अब बढती उम्र और लगातार की भाग - दौड़ के साथ बढते काम के दबाव के कारण मौलाना का स्वास्थ्य गिरने लगा था | लम्बे संघर्ष की निरंतर गतिशीलता ने उन्हें थकने के लिए मजबूर कर दिया | अपने उद्देश्य पूर्ण एवं संघर्ष पूर्ण जीवन की आखरी मंजिल तक पहुचते हुए मौलाना ने अमेरिका जाकर अपने मित्रो से मिलने और भविष्य की रणनीतियो पर विचार - विमर्श करने का निर्णय लिया | वे 70 वर्ष से ज्यादा कि उम्र के थे और मधुमेह रोग से ग्रसित भी थे |कैलिफोर्निया में मौलाना को सुनने के लिए हिन्दुस्तानियों की भारी संख्या इकठ्ठा हुई |वे बोलने के लिए खड़े हुए लेकिन बीमारी , बुढापे और भावावेश में वे अपनी बात देर तक नही रख सके | उन्होंने महेन्द्र प्रताप से सभा को संबोधित करने की बात कह स्वंय को डायस से हटा लिया | चंद दिन बाद 27 सितम्बर 1927 को मौलाना के जीवन का चमकता सूरज चिर- विलीन हो गया |उन्हें अमेरिका के मारवस्बिली में दफन किया गया |उनका अंतिम संस्कार रहमत अली . डॉ0 सैयद हसन , डॉ0 औरगशाह, और राजा महेन्द्र प्रताप द्वारा संयुक्त रूप से सम्पन्न किया गया | मृत्यु से पहले मौलाना द्वारा अपने साथियो के समक्ष निम्नलिखित शब्दों में उनके अपने विचार व्यक्त किया गया था " मैं आजीवन हिन्दुस्तानी स्वतंत्रता के लिए कार्य करता रहा | यह मेरे लिए ख़ुशी की बात हैं कि मेरा जीवन मेरे देश कि बेहतरी के लिए इस्तेमाल हो पाया | अफ़सोस है कि हमारे प्रयास हमारे जीवन में फलीभूत नही हो सके | लेकिन उसी के साथ यह ख़ुशी भी है कि अब हजारो कि तादात में नौजवान देश की स्वतंत्रता के लिए आगे आ रहे हैं | वे ईमानदार भी है साहसी भी | मैं पुरे विश्वास के साथ देश का भविष्य उनके हाथो में छोड़ सकता हूँ | मुझे अली सरदार जाफरी की कुछ लाइन याद आ रही है '
हिन्दुस्तान में इक नयी रूह फूंककर
आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया
शेख़ और बिरहमन में बढ़ाया इत्तिहाद
गोया उन्हें दो कालिब-ओ-यकजान कर दिया
ज़ुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते
क़तरे को आंखों-आंखों में तूफ़ान कर दिया
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सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार --- समीक्षक

Tuesday, May 28, 2019

आशा से भरकर जीवन देखने की कला

कथा -
आशा से भरकर जीवन देखने की कला
कोरिया में एक भिक्षुणी एक रात एक गाँव में भटक कर पहुच गयी | वह रास्ता भटक गयी थी जिस गाँव में उसे जाना था , वहां न पहुच कर दुसरे गाँव पहुच गयी | उसने जाकर एक दरवाजे पर दस्तक दिया | दरवाजा खुला | लेकिन उस गाँव के लोग दुसरे धर्म के मानने वाले थे , वह भिक्षुणी दुसरे धर्म की थी , वहाँ दरवाजा बंद करने वाले ने कहा की : देवी , यह द्वार तुम्हारे लिए नही है | हम इस धर्म को नही मानते है | तुम कही और खोज कर लो और उसने चलते वक्त यह भी कहा कि इस गाँव में शायद ही कोई दरवाजा तुम्हारे लिए खुले , कयोकी इस गाँव के लोग दुसरे ही धर्म को मानते है और हम तुम्हारे धर्म के शत्रु है | आप तो जानते ही है , धर्म धर्म आपस में बड़े शत्रु है | एक गाँव का अलग धर्म है , दुसरे गाँव का अलग धर्म है | एक धर्म वाले को दुसरे धर्म वाले के यहाँ कोई शरण नही , कोई आशा नही , कोई प्रेम नही | द्वार बंद हो जाते है | द्वार बंद हो गये उस गाँव के | वो भिक्षुणी गाँव के दो चार दरवाजे पर दस्तक दिया हर दरवाजे से यही आवाज मिली | सर्द रात थी वह अकेली स्त्री , कहाँ जायेगी ? लेकिन धार्मिक लोग इस तरह की बाते कभी नही सोचते | धार्मिक लोगो ने मनुष्यता जैसी बात कभी नही सोची | वे हमेशा सोचते है , हिन्दू है या मुसलमान ; बौद्ध है या जैन | आदमी का सीधा कोई मूल्य उनकी दृष्टि में कभी नही रहा है | वह स्त्री -- उस गाँव को छोड़ आगे बढ़ गयी आधी रात वह जाकर गाँव के बाहर एक वृक्ष के नीचे सो गयी | कोई दो घंटे बात ठंठ के कारण उसकी नीद खुल गयी | उसने आखें खोली | उपर आकाश तारो से भरा था | उस वृक्ष पर फुल खिल गये थे | रात में खिलने वाले फुल , उसकी सुगंध चारो तरफ फ़ैल रही थी | वृक्ष के फुल चटक रहे थे , आवाज आ रही थी और फुल खिलते चले जा रहे थे | वह आधी घड़ी तक मौन उन फूलो को निहार रही थी उन वृक्षों के फूलो को खिलते देखती रही | आकाश के तारो को देखती रही | फिर वह स्त्री दौड़ पड़ी गाँव की तरफ , फिर जाकर उसने उन दरवाजो को खटखटाया , जिन दरवाजो को उनके मालिको ने बंद कर लिया था |आधी रात को कौन आ गया " उन लोगो ने दरवाजे खोले , वही भिक्षुणी खड़ी है ! उन्होंने कहा : हमने मना कर दिया , यह द्वार तुम्हारे लिए नही है , फिर दुबारा क्यों आ गयी | लेकिन उस भिक्षुणी की आँखों से कृतज्ञता के आसूं बहे जा रहे थे , उसने कहा : नही अब द्वार खुलवाने नही आई मैं , अब ठहरने भी नही आई , केवल धन्यवाद देने आई हूँ | काश , तुम आज मुझे अपने घर में जगह देते तो रात आकाश के तारे और फूलो का चटक कर खिल जाना - मैं देखने से वंचित हो जाती | मैं सिर्फ धन्यवाद देने आई हूँ बड़ी कृपा थी की तुमने द्वार बंद कर लिए और मैं हले आकाश के नीचे सो सकी | तुम्हारी बड़ी कृपा थी की तुमने घर की दीवालो से मुझे बचा लिया और खुले आकाश में मुझे भेज दिया | जब तुमने भेजा था , तब तो मेरे मन को लगा था , कैसे बुरे लोग है | अब मैं यह कहने आई हूँ कि कैसे भले लोग है इस गाँव के | तुम लोगो ने मुझे एक अनुभव की रात दे दी , जो आनन्द मैंने आज जाना , जो फुल मैंने आज खिलते देखा , जैसे मेरे भीतर भी कोई प्राणों की कलि चटक गयी हो और खिल गयी हो | जैसी आज अकेली रात में मैंने आकाश इ तारे देखे है , जैसे मेरे भीतर ही कोई आकाश स्पष्ट हो गया हो ,और तारे खिल गये हो | मैं उसके लिए धन्यवाद करती हूँ भले लोग है तुम्हारे गाँव के लोग |
परिस्थिति कैसी है , इस पर कुछ निर्भर नही करता | हम परिस्थिति को कैसा लेते है , इस पर सब - कुछ निर्भर करता है | | हरेक व्यक्ति को परिस्थिति कैसी लेनी है , यह सिख लेना चाहिए | तब तो राह में पडा पत्थर भी सिधिया बन जाते है और जब हम परिस्थितियों को गलत ढंग से लेने के आदि हो जाते है तो सिधिया भी मंदिर की पत्थर मालुम पड़ने लगती है , दुर्भाग्य अवसर बन सकते है | उसे हम कैसे लेते है , हमारे देखने की दृष्टि क्या है ? हमारी पकड क्या है , जीवन का कोण हमारा क्या है , हम कैसे जीवन को लेते और देखते है ? आशा से भरकर जीवन को देखना चाहिए |

Friday, May 24, 2019

हमारी प्यारी धरती ---- खतरे में

हमारी प्यारी धरती ---- खतरे में


वर्ष 1945 से 2019 के बीच इस विश्व में कुल 2056 आणविक परिक्षण हुए है , जिसमे से संयुक्त राज्य अमरीका में 1030 , रूस में 715 फ्रांस में 210 , चीन में 45 इंग्लैण्ड में 45 नार्थ कोरिया में 6 और भारत में 3 और पाकिस्तान में 2 परीक्षण हुए | आणविक विखण्डन की घटना पहली बार 17 दिसम्बर 1938 को दो जर्मन वैज्ञानिकों - ओटो हाँन व फ्रीटज स्ट्रासमैंन - के समक्ष घटी | युरेनियम के अणुओ की न्यूट्रान से प्रतिक्रिया करवाते हुए उन्हें एक नया तत्व मिला - बेरियम | इस प्रतिक्रिया के दौरान युरेनियम का अणु- विभाजन हो गया और इससे बेरियम के साथ - साथ एक महाऊर्जा उत्पन्न हुई | इसी घटना से पैदा हुए भयंकर तबाही की सम्भावना वाले आणविक हथियार | आज विश्व के 9 देशो के पास 14215 आणविक शस्त्र है जिसमे से 92% अमरीका और रूस के पास है | यह सारे हथियार इस पृथ्वी को कई बार नष्ट करने के लिए पर्याप्त है | विश्व का पहला आणविक परीक्षण अमरीका के न्यू मेकिसको में 16 जुलाई 1945 में किया गया | इसी वर्ष अमरीका के राष्ट्रपति ट्रूमैन ने जापान के दो नगरो - हिरोशिमा और नागासाकी - पर अगस्त 6 और अगस्त 9 -1945 को आणविक बम गिराने का आदेश दिया | ये आणविक विस्फोट मनुष्यता के इतिहास में सर्वाधिक विनाश और संहार के प्रतीक बन गये | लगभग 250000 लोग धरती से मानो लुप्त हो गये |
इन विस्फोटो के दशको पश्चात तक जापान में हजारो लोग आणविक विकिरण के प्रभाव से कैंसर से पीड़ित होते रहे , हजारो लोगो की कैंसर से मौत होती रही जो लोग बचे उन्होंने अपग और रुगण बच्चो को जन्म दिया | विश्व भर में जिन जगहों पर हजारो आणविक परीक्षण हुए वहां उनके प्रभाव में कोई आकंडे उपलब्ध नही है , क्योकि प्रत्येक देश अपनी इन जानकारी को गोपनीय रखता है | इन आणविक परीक्षणों के अतिरिक्त बहुत - सी दुर्घटनाये हुई जिनसे वातावरण में आणविक विकिरण का रिसाव हुआ | वर्ष 1964 में एक अमरीकी सैटेलाईट जिसमे प्लूटोनियम था , अन्तरिक्ष में विस्फोटित हो गया जिससे बड़ी मात्रा में आणविक प्रदूषण धरती के वातावरण में आ गया | वर्ष 1978 में एक रुसी सैटेलाईट जो आणविक ऊर्जा से संचालित था , दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इसके टुकड़े उत्तरी कनाडा में जा गिरा | आणविक हथियार लेकर जाते दो अमरीका वायुयान स्पेन और ग्रीनलैंड में वर्ष 1966 और 1968 में दुर्घटनाग्रस्त होकर गिरे |
इनके अलावा इंग्लैण्ड , अमरीका और स्विट्जरलैंड के आणविक रिएक्टरो में दुर्घटनाये हुई जिनसे भारी नुक्सान हुआ | इन सभी दुर्घटनाओ में से सर्वाधिक भयंकर रही रूस के चेनोर्विल और जापान के फुकुशिमा की आणविक दुर्घटनाये | चेनोर्विल में हुई दुर्घटना से एक लाख से अधिक लोगो ने हमेशा के लिए अपने घर , नौकरिया और सामजिक सुरक्षा गँवा दिए | 1986 में घटी इस भयंकर घटना के कारण हजारो लोग कैंसर के शिकार हुए | इस घटना क दुष्परिणाम के सही सही आकंडे आज भी ज्ञात नही है | जापान के फुकुशिमा में 11 मार्च 2011 को एक तीव्र भूंकप के बाद समुद्र से 15 मीटर सुनामी उठी जिसने फुकुशिमा - दाईची आणविक केंद्र के तीन आणविक सयंत्रो को अपनी चपेट में ले लिया | पहले तीन दिन में यह तीनो सयंत्र पिघल गये और समुद्र के जल में भारी आणविक रिसाव हुआ | इस क्षेत्र से लगभग एक लाख लोगो को निकाला गया और 1000 लोगो की मौत हो गयी | पिछले 8 दशको में हुए इन सभी आणविक विस्फोटो , परीक्षणों और दुर्घटनाओ से धरती के वातावरण में भारी मात्रा में आणविक विकिरण का रिसाव हुआ | यह रेडियोएक्टिव सामग्री बहुत हल्की होती है और हवा के साथ दूर - दूर तक आसानी से फ़ैल जाती है , | वर्षा के चलते तो यह धरती में चली जाती है , लेकिन बात यही नही खतम होती - इस भयानक सामग्री की बहुत बड़ी मात्रा हमारी हिम खंडो में जाकर समा गयी है जो विश्व भर में फैले हैं | मई 2019 में वियना में हुई एक वैज्ञानिक सभा में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने विश्व को एक बड़े खतरे से अवगत कराया | उनके परीक्षणों से पता चला है कि आर्कटिक , आइसलैंड , एल्पस -ककाक्स पर्वतों , ब्रिटिश कोलम्बिया और अन्टार्कटिका के हिम खंडो में रेडियो - एक्टिव तत्व भारी मात्रा में जमा हो गये है | बर्फ एक ऐसा प्रदार्थ है जिसमे आणविक सामग्री कई दशको तक सक्रिय अवस्था में रह सकती है | बढती हुई जागतिक उष्मा से इन हिम - खंडो के पिघलने की सम्भावना तेजी से बढ़ रही है | इन सभी हिम खंडो में रहने वाले प्राणियों के शरीरो में सामान्य से 10 गुना अधिक कैसियम पाया गया है जो एक आणविक प्रदार्थ है | आज भी आये दिन एक दुसरे देश को आणविक हमले की धमकी देता दिखाई देता है | अब विश्व में एक भी आणविक परिक्षण नही होना चाहिए और विश्व भर के देशो के वैज्ञानिकों को इन हिम - खंडो को सुरक्षित रखने के उपाए निकालने होंगे | यदि हमारे राजनेता युद्ध का उन्माद फैलाते या युद्ध की तैयारी करते दिखे तो सबके द्वारा उनका जमकर विरोध होना चाहिए , क्योकि प्रशन किसी को सबक सिखाने या किसी से बदला लेने का नहीं हमारे जीवन और भविष्य का हैं |
आभार ----येस ओशो