Thursday, February 26, 2015

अंहकार ---- 27-2-15

अंहकार ----


एक गाँव में एक गरीब किसान रहता था | एक बार किसान की पूरी फसल चौपट हो गयी | फलत: वह मेहनत - मजदूरी की तलाश में शहर चला गया | शहर से कुछ कमाई करने के बाद जब वह गाँव लौट रहा था उसे रास्ते में एक ऊँटनी और उसका छोटा बच्चा  नजर आया | किसान उन्हें अपने घर ले आया | कुछ दिन बाद एक कलाकार ग्रामीण जीवन के चित्रं हेतु उसी गाँव में आया | पेंटिंग्स के ब्रश बनाने के लिए वह किसान के घर आकर ऊँट के बच्चे की दुम के बाल ले जाता | इधर ऊँटनी खूब दूध देने लगी तो किसान उसका दूध बेचने लगा | एक दिन वही कलाकार गाँव लौटा और किसान को काफी सारे पैसे दे गया , कयोकी उसके चित्र अच्छी कीमतों में बीके थे | किसान को लगा कि जबसे ऊँटनी और उसका बच्चा उसकी जिन्दगी में आये है , उसकी किस्मत सवर गयी है | उसने एक सुन्दर - सी घंटी लाकर ऊँट के बच्चे के गले में पहना  दी | किसान ने कुछ और ऊँट भी पाल लिए | किसान इन ऊँटो को चरने के लिए दिन में छोड़ देता और वे शाम तक जंगल में पत्ते वगैरह चरकर वापस आते | ऊँट का बच्चा कुछ बड़ा हुआ तो वह भी बाहर चरने जाने लगा | लेकिन वह खुद को सबसे ख़ास समझता और ऊँटो की टोली से प्राय: दूर - दूर ही चलता | उसके एक साथी ऊँट ने उससे कहा भी | ' तुम हमसे दूर - दूर क्यों रहते हो ? हम सब साथ मिलकर चले तो कितना अच्छा रहे | इस पर वह घंटीधारी  ऊँट अकड़ते हुए बोला -- क्या तुम जानते नही कि मैं मालिक का सबसे दुलारा ऊँट हूँ ? मैं अपने से ओछे ऊँटो में शामिल होकर अपना मान  नही खोना चाहता | उसी इलाके में वन में एक शेर रहता था , जो इन ऊँटो की टोली को जंगल में आते - जाते देखता रहता था | वह ऊँटो के झुण्ड पर तो आक्रमण नही कर सकता था , लेकिन जब उसने घंटीधारी ऊँट को अकेले चलते हुए देखा तो उसकी बाछे खिल उठी | दूसरे दिन जब ऊँटो का दल चरकर लौट रहा था , तो घात लगाये बैठा शेर घंटी की आवाज को निशाना बनाकर दौड़ा और उस  अकेले ऊँट को मारकर जंगल में खीच ले गया | इस तरह उस घंटीधारी ऊँट को अपने अंहकार की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पडा | जो स्वंय को सबसे श्रेष्ठ और दुसरो को हीन समझता है , उसका अहंकार शीघ्रः  ही उसे ले डूबता है |

Wednesday, February 25, 2015

धोबन का ज्ञान ------------------ 25-2 15

धोबन का ज्ञान

नर्मदा के किनारे रामपुर गाँव में एक पंडित जी रहते थे वो रोज प्रात: नदी में स्नान के बाद ईश्वर को अर्घ्य देते हुए बुदबुदा रहे थे -- '' प्रीति बड़ी माता की और भाई का बल | ज्योति बड़ी किरणों की और गंगा का जल ' | यह सुनकर वह से गुजर रही गाँव की बूढी धोबन हँस पड़ी | पंडित जी को धोबन का यू हँसना अपना अप्माआं लगा | उन्होंने तुरंत जाकर गाँव के सरपच से इस बात की शिकायत करते हुए धोबन को दंड देने की मांग की | सरपच ने पंडित जी से कहा  - यदि धोबन ने आपका अपमान किया है तो उसे दंड जरुर मिलेगा  | अगले दिन पचायत बुलाई गयी | पचायत में सरपच ने धोबन से कहा -- ' पंडित जी ने शिकायत की है कि तुमने उनका अपमान किया है | तुम्हे इस बारे में क्या कहना है ? धोबन हाथ जोड़कर बोली ' हुजुर ; मेरी क्या औकात जो मैं पंडित जी का अपमान करूं | जरुर उन्हें गलतफहमी हुई है ' | तब पंडित जी बोले - ' कल सुबह तुम जो मुझ पर हंसी थी , क्या वह मेरा अपमान नही था ? धोबन ने नजरे झुकाए जबाब दिया = ' विप्रवर , मैं आप पर नही , आपकी बात सुनकर हंसी थी ' पंडित जी बोले मैंने तो यही कहा था कि प्रीती माता की और भाई का बल | ज्योति बड़ी किरणों की और गंगा का जल ' | इस पर सरपच ने कहा - पंडित जी का कहना सही तो है | इसमें हँसने की बात क्या है ? धोबन बोली - पंडित जी की बात सिर्फ सत्य प्रतीत होती है परन्तु है नही | उनके जैसा ज्ञानी यह बात करे इसीलिए मुझे हंसी आई | तब सरपच ने उससे पूछा तो तुम्हारी नजर में सही क्या है ? धोबन बोली - ' सच तो यह है कि '   प्रीति बड़ी त्रिया ( स्त्री ) की और बाहों का बल | ज्योति बड़ी नयनो की और मेघो का जल | ' कयोकी बात अगर पिता और पुत्र में फंसे तो मां   पुत्र का साथ नही देगी , परन्तु पत्नी किसी भी हाल में साथ होगी |  जब बैरी अकेले में घेर लेगा तो भाई का नही , अपनी बाहों का ही बल काम आयेगा | ज्योति नयनो की  इसीलिए बड़ी है कि जब आँखे ही न हो तो सूरज की किरणों की रौशनी या अमावस का अँधेरा सब बराबर है | गंगा जी पवित्र भले ही है , लेकिन वे मेघो के समान न तो जन - जन की प्यास बुझा सकती है , न ही सभी खेतो में फसलो की सिचाई कर सकती है | यह सुनकर सरपच ने पंडित से कहा - अब आप क्या कहते है ? पंडित जी बोले - मुझे समझ में आ गया किसिर्फ किताबी ज्ञान पाना काफी नही | अभी बहुत कुछ सीखना है |

Monday, February 23, 2015

कब्र के छ: फुट उपर की जिन्दगी 24-2-15

कब्र के छ: फुट उपर की जिन्दगी
साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में भिन्न राष्ट्रों के नागरिको के जीवन स्तर का यथार्थ इस खबर से स्पष्ट हो जाता है | खबर फिलिपाईन्स के मनिला शहर की है जहा 1904 में निर्मित 130 एकड़ के फैले हुए रोमन कैथलिक कब्रिस्तान में गरीबो की बस्ती बस गयी है | उस बस्ती के सभी लोग रबर शीट या गत्ता बिछाकर सोते है , कब्रों के उपर खाना बनाते है और वही बर्तन धुल लेते है | कुछ कब्र ऐसी भी है जहा कमरे भर की जगह है | यदि कब्रों के खानदान के मालिको की अनुमति मिल जाती है तो कुछ लोग उन जगहों का इस्तेमाल आवास के लिए भी कर लेते है , पास के कुवि से पानी ले लेते है और पौधों को पानी देने वाले शावर से नहा धो लेते है | उनकी सबसे बडो परेशानी यह है कि उन्हें यह सब काम खुले आसमान के नीचे करना पड़ता है जहा निजता और गोपनीयता का सर्वथा आभाव होता है | कुछ महिलाये तो ऐसी भी है जो अपने पति के कब्र के उपर ही सोती है | आश्चर्य की बात यह है कि मुर्दों की कब्रों पर जिदा लोगो की कालोनी बसी हुई है जिसमे नवजात बच्चे भी उन्ही कब्रों पर सोते है | वाह के निवासी शिफ्टो में काम करते है | बड़े परिवार वाले लोग अस्थायी घरो में बारी - बारी विश्राम करते है तथा बच्चे पास के स्कुलो में पढ़ते है | इन कब्रों के अधिकतम निवासी कब्रिस्तान के कब्रों की देखभाल करते है और शव पेटिका ढोते है | वर्ष में एक दिन '' आल सोल्स डे '' का वे सब बेसब्री से इन्तजार करते है क्योकि उस दिन मृतको के परिवार वालो से उन्हें कुछ रकम मिल जाती है और भरपेट भोजन मिल जाता है | यह दिन इन लोगो के लिए क्रिसमस के त्यौहार जैसा होता है

कारोबारी मन्त्र ------------------------------- 24-2-15

कारोबारी मन्त्र


एक किसान अपने खेत में भुट्टे पैदा करता  था  | उसका एक ही पुत्र था | पुत्र जब नौ साल का हुआ तो किसान उसे भी अपने साथ कभी - कभार खेतो  में ले जाने लगा  | ऐसे ही एक बार वह अपने बेटे को खेत पर लेकर गया | खेत में भुट्टे पक  चुके थे और किसान उन्हें तोड़कर बाजार ले जाने की तैयारी  कर रहा था | खेत में पहुचकर किसान के बेटे ने उससे - कहा पिताजी क्या मैं भी काम में आपकी कुछ मद्दद कर सकता हूँ ? इस पर किसान ने कहा -- हाँ - हाँ , जरूर  कर सकते हो | हम ऐसा करते है  कि मैं खेत में से भुट्टे तोड़ - तोड़ कर निकालता जाउंगा और तुम एक - एक दर्जन भुट्टो की अलग - अलग ढेरिया बनाते जाना | यह सुनकर बेटा खुश हो गया | इसके बाद वे दोनों काम पर जुट गये | किसान भुट्टे तोड़कर बेटे को देता और बेटा उन्हें ढेरियो में इकठ्ठा करता जाता | दोपहर होने पर दोनों ने वही साथ में बैठकर खाना खाया | इसके बाद किसान ने बेटे द्वारा बनाई ढेरियो पर नजर मारी | इन्हें देखने के बाद किसान खेत से कुछ और भुट्टे तोड़कर लाया और हरेक  ढेरी में एक एक भुट्टा बढा दिया | यह देखकर किसान का बेटा  बोला -- पिताजी , मुझे गिनती आती है | एक दर्जन का मतलब बारह होता है | मैंने हरेक  ढेरी में गिनकर बारह भुट्टे ही रखे है | अब तो ये तेरह हो गये | उसकी बात सुनकर किसान ने मुस्कुराते हुए कहा - बेटा तुम ठीक कहते हो कि एक दर्जन का मतलब बारह होता है | लेकिन जब हम भुट्टे बेचने निकलते है तो एक दर्जन में तेरह भुट्टे होते है | बेटे ने पूछा -- ' ऐसा क्यों पिताजी ? तब किसान ने उसे समझाते हुए कहा - देखो , हम सिर्फ अच्छे भुट्टे बेचते है | भुट्टे के उपर छिलका होता है , तो हमारे ढेर में एक भुट्टा खराब भी निकल सकता है , जिसके बारे में हमे पता नही होता | इसीलिए हम अपने ग्राहकों को दर्जन पर एक अतिरिक्त भुट्टा देते है | हम चाहते है कि हमारे ग्राहक ये न समझे कि हमने उन्हें धोखा दिया | फिर हम यह भी चाहते है कि जो भी हमारा भुट्टा  खरीदे , वह अपने पड़ोसियों को भी बताये कि ये कितने अच्छे है | इस तरह हमारे भुट्टे अधिक बिकेगे और हमारी आमदनी भी बढ़ेगी | यह बात सुनकर बेटा  संतुष्ट हो गया | इस तरह किसान ने बातो - बातो में बेटे को कारोबार का यह अहम सबक भी सिखा दिया कि ग्राहक की संतुष्टि सर्वोपरी है | आप ग्राहक को कुछ अतिरिक्त देकर उसका विश्वास अर्जित करने के अलावा बहुत कुछ पा सकते है |

Sunday, February 22, 2015

भगतसिंह फांसी के समय -- 22-2-15

भगतसिंह फांसी के समय --
लाहौर जेल के चीफ वाडर सरदार चतर सिंह ने बताया कि 23 मार्च , 1931 को शाम तीन बजे ,जब उसे fफाँसी का पता चला तो वह भगतसिंह के पास गया और कहा कि "मेरी केवल एक प्राथना है कि अंतिम समय में वाहे गुरु का नाम ले ले और गुरुवाणी का पाठ कर ले '|
भगत सिंह ने जोर से हंस कर कहा 'आप के प्यार को शुक्रगुजार हूँ |लेकिन अब जब अंतिम समय आ गया में ईश्वर को याद करू तो वह कहेगा कि में बुजदिल हूँ |सारी उम्र तो उसे याद नहीं किया और अब मौत सामने नजर आने लगी हैं तो ईश्वर को याद करने लगूँ| इसलिए यही अच्छा होगा कि मैंने जिस तरह पहले अपना जीवन जीया हैं ,उसी तरह अपना अंतिम समय भी गुजारूं | मेरे उपर यह आरोप तो बहुत लगायेंगे कि भगत सिंह नास्तिक
था और उसने ईश्वर में विश्वास नही किया ,लेकिन यह आरोप तो कोई नही लगायगा कि भगतसिंह कायर व बेईमान भी था और अंतिम समय उसके पैर लड़खड़ाने लगे |'
(भगतसिंह - प्रो ० दीदार सिंह , पन्ना 346 ) दूसरे व्यक्ति ,जो अंतिम दिन भगतसिंह से मिले ,वे उनके परामर्शदाता वकील प्राणनाथ मेहता थे |एकदिन पहले भगतसिंह ने लेलिन
की जीवनी की मांग की थी , सो अंतिम दिन मेहता जी लेलिन की जीवनी भगतसिंह को दे गये |
आखरी पलो तक वे बड़ी निष्ठा और एकाग्रचित से लेलिन की जीवनी पढ़ रहे थे | जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने आये तो उन्होंने कहा 'ठहरो एक क्रांतिकारी के दूसरे क्रांतिकारी से मिलने में बाधा न डालो | और फिर 23 मार्च 1931 को संध्या समय सरकार ने उनसे साँस लेने का अधिकार छीनकर अपनी प्रतिहिंसा की प्यास बुझा ली |अन्याय और शोषण के विरुद्ध विद्रोह करने वाले तीन तरुणों की जिन्दगिया जज्लाद के फंदे ने समाप्त कर दी | फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए भगतसिंह ने अग्रेज मजिस्ट्रेट को सम्बोधित करते हुए कहा 'मजिस्ट्रेट महोदय आप वास्तव में बड़े भाग्यशाली हैं कयोकि आपको यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा हैं कि एक भारतीय क्रन्तिकारी अपने महान आदर्श के लिए किस प्रकार हँसते -हँसते मृत्यु का आलिगन करता हैं |फांसी से कुछ पहले भाई के नाम अपने अंतिम पत्र में उसने लिखा था ,मेरे जीवन का अवसान समीप है प्रात; कालीन प्रदीप टिमटिमाता हुआ मेरा जीवन -प्रदीप भारत के प्रकाश में विलीन हो जायेगा |हमारा आदर्श हमारे विचार सारे संसार में जागृती पैदा कर देंगे |फिर यदि यह मुठ्ठी भर राख विनष्ट हो जाये तो संसार का इससे क्या बनता बिगड़ता है |जैसे -जैसे भगतसिंह के जीवन का अवसान समीप आता गया देश तथा मेहनतकश जनता के उज्जवल भविष्य में उसकी आस्थ गहरी होती गयी | मुर्त्यु से पहले सरकार सरकार के नाम लिखे एक पत्र में उसने कहा था ,' अति शीघ्र ही अंतिम संघर्ष के आरम्भ की दुन्दुभी बजेगी | उसका परिणाम निर्णायक होगा | साम्राज्यवाद और पूजीवाद अपनी अंतिम घडिया गिन रहे हैं |हमने उसके विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था और उसके लिए हमे गर्व हैं
....सुनील दत्ता

Saturday, February 21, 2015

संगत ------------ 22-2-15

संगत  ------------

हकीम लुकमान अक्सर अपने बेटे को संगत के बारे में बताते रहते थे , लेकिन वह नादाँन  उनकी बातो को समझता नही था | एक दिन हकीम लुकमान ने अपने बेटे को पास बुलाया और कहा -- बेटा , आज मैं तुम्हे समझाउंगा कि अच्छी या बुरी संगत हमारे व्यक्तित्व पर किस तरह असर डाल सकती है |
अच्छा यह बताओ कि सामने जो धूपदान रखा है , उसमे क्या है ? बेटा बोला - अब्बा , हुजुर उसमे तो चन्दन का चूरा है |हकीम लुकमान बोले - तुमने बिलकुल ठीक कहा | अब ऐसा करो कि एक मुठ्ठी चूरा ले आओ | यह सुनकर बेटा धूपदान में से एक मुठ्ठी चन्दन का चूरा ले आया | इसके बाद हकीम लुकमान ने सामने चूल्हे में पड़े बुझे हुए कोयले की ओर इशारा करते हुए बेटे से कहा -- ' अब दूसरे हाथ की मुठ्ठी में थोडा कोयला भी ले आओ | बेटा कोयला भी लेकर आ गया | तब हकीम लुकमान ने अपने बेटे से कहा - अब तुम ऐसा करो कि इन दोनों चीजो को वापस इनकी जगह रख  आओ | बेटे ने वैसा ही किया और आ कर पुन: अपने पिता के पास खड़ा हो गया | तब हकीम लुकमान ने उससे पूछा - ' क्या तुम्हारे हाथ में अब भी कुछ है ? बेटा  बोला - नही अब्बा , मेरे तो दोनों हाथ खाली  है | हकीम लुकमान ने कहा -- नही बेटा , ऐसा नही है | तुम अपने हाथो को गौर से देखो , तुम्हे इनमे पहले के मुकाबले कुछ फर्क नजर आयेगा | बेटे ने अनुभव किया कि जिस हाथ में वह चन्दन का चुरा लेकर आया था , उससे अब भी चन्दन की महक आ रही थी , जबकि जिस हाथ से कोयला रखा , उसमे कालिख लगी है | इसके बाद हकीम लुकमान ने कहा - बेटा , चन्दन का चूरा अब भी तुम्हारे हाथ को खुशबु दे रहा है , जबकि कोयले का टुकडा तुमने जिस हथेली में लिया , वह काली  हो गयी और उसे फेंक देने के बाद भी तुम्हारी हथेली काली है | यही है अच्छी और बुरी संगत का असर | दुनिया में कुछ लोग चन्दन की तरह होते है , जिनके साथ जब तक रहो , तब तक हमारा जीवन महकता रहता है और उनका साथ छुट जाने पर भी वह महक हमारे जीवन से जुडी रहती है | वही कुछ लोग ऐसे भी होते है . जिनका साथ रहने से और साथ छूटने पर भी जीवन कोयले की तरह कलुषित होता है |

हकीम लुकमान अक्सर अपने बेटे को संगत के बारे में बताते रहते थे , लेकिन वह नादाँन  उनकी बातो को समझता नही था | एक दिन हकीम लुकमान ने अपने बेटे को पास बुलाया और कहा -- बेटा , आज मैं तुम्हे समझाउंगा कि अच्छी या बुरी संगत हमारे व्यक्तित्व पर किस तरह असर डाल सकती है |
अच्छा यह बताओ कि सामने जो धूपदान रखा है , उसमे क्या है ? बेटा बोला - अब्बा , हुजुर उसमे तो चन्दन का चूरा है |हकीम लुकमान बोले - तुमने बिलकुल ठीक कहा | अब ऐसा करो कि एक मुठ्ठी चूरा ले आओ | यह सुनकर बेटा धूपदान में से एक मुठ्ठी चन्दन का चूरा ले आया | इसके बाद हकीम लुकमान ने सामने चूल्हे में पड़े बुझे हुए कोयले की ओर इशारा करते हुए बेटे से कहा -- ' अब दूसरे हाथ की मुठ्ठी में थोडा कोयला भी ले आओ | बेटा कोयला भी लेकर आ गया | तब हकीम लुकमान ने अपने बेटे से कहा - अब तुम ऐसा करो कि इन दोनों चीजो को वापस इनकी जगह रख  आओ | बेटे ने वैसा ही किया और आ कर पुन: अपने पिता के पास खड़ा हो गया | तब हकीम लुकमान ने उससे पूछा - ' क्या तुम्हारे हाथ में अब भी कुछ है ? बेटा  बोला - नही अब्बा , मेरे तो दोनों हाथ खाली  है | हकीम लुकमान ने कहा -- नही बेटा , ऐसा नही है | तुम अपने हाथो को गौर से देखो , तुम्हे इनमे पहले के मुकाबले कुछ फर्क नजर आयेगा | बेटे ने अनुभव किया कि जिस हाथ में वह चन्दन का चुरा लेकर आया था , उससे अब भी चन्दन की महक आ रही थी , जबकि जिस हाथ से कोयला रखा , उसमे कालिख लगी है | इसके बाद हकीम लुकमान ने कहा - बेटा , चन्दन का चूरा अब भी तुम्हारे हाथ को खुशबु दे रहा है , जबकि कोयले का टुकडा तुमने जिस हथेली में लिया , वह काली  हो गयी और उसे फेंक देने के बाद भी तुम्हारी हथेली काली है | यही है अच्छी और बुरी संगत का असर | दुनिया में कुछ लोग चन्दन की तरह होते है , जिनके साथ जब तक रहो , तब तक हमारा जीवन महकता रहता है और उनका साथ छुट जाने पर भी वह महक हमारे जीवन से जुडी रहती है | वही कुछ लोग ऐसे भी होते है . जिनका साथ रहने से और साथ छूटने पर भी जीवन कोयले की तरह कलुषित होता है |

Thursday, February 19, 2015

विवेकशीलता -------------------------------- 20-2-15

विवेकशीलता


एक गाँव में एक कथावाचक पंडित रहता था | उसके चार बेटे थे और चारो ही बिलकुल नालायक | एक दिन पंडित को एक श्रद्दालु ने कथावाचन के उपरान्त ढेर सारा धन व उपहार देकर विदा किया | यह देख उसके बेटो ने भी कथावाचक बनने की सोची | पंडित ने पुत्रो को समझाया कि इसके लिए पहले घोर अध्ययन जरूरी है , तभी तुम कथावाचन के लायक बन सकोगे | लेकिन पुत्र नही माने और पडोस के गाँव के मुखिया के यहाँ कथा वाचन करने निकल पड़े | पंडित ने यह देख अपने विश्वासपात्र नाई को उनके साथ भेज दिया | पंडित जानता था कि यदि कुछ ऊँच - नीच हुई तो नाई बात को सम्भाल सकता है |
मुखिया के घर पहुचकर उन्होंने कथा कुछ यू प्रारम्भ की | पहला बोला ' राजा पूछेगे तो क्या बोलूंगा | ' दूसरा बोला ' जो तेरी गति सो मेरी गति | ' तीसरे ने कहा -- ' ये चतुराई कितने दिन चले | ' चौथा बोला -- जितने दिन चले , उतने दिन चले | ' मुखिया समेत गांववालों ने उनसे कहा -- कृपया इन बातो का आशय भी बता दे ? इस पर चारो भाई चुप ! यह देखकर मुखिया नाराज हो गया और उसने अपने आदमियों से कहा कि ये पोंगा पंडित हमे मुर्ख बना रहे है | इन्हें पीटकर गाँव से बाहर खदेड़ दो | तब उनके साथ गया नाई बोला -- ' इन चारो ने गूढ़ ज्ञान की बाते कही है | जो आम लोगो की समझ से बाहर है | पहले पंडित के कथन ' राजा पूछेगे तो क्या बोलूँगा का सन्दर्भ है कि सुमंत जब राम से अयोध्या वापस चलने का अनुरोध करने लगे और रामजी ने वापिस जाने से इंकार किया , तब सुमंत ने रामजी से पूछा कि यदि महाराज दशरथ पूछेगे तो मैं क्या जबाब दूंगा ? दूसरे कथन ' जो तेरी गति , सो मेरी गति का अर्थ है कि जब सुग्रीव विभीषण से मिले तो उनसे बोले की तुम्हारी जैसी ही मेरी गति है | तुम भी भाई के मरने के बाद राजा बने और मैं भी | तीसरे और चौथे  पंडित के कथन रावण -- मदोदरी के सम्वाद का हिस्सा है | ये चतुराई कितने दिन चले का तात्पर्य तब से है जब मदोद्दरी ने रावण से पूछा कि सीता को आपने जो यहाँ बंदी बना कर रखा है , ये कब तक चलेगा | तब रावण ने कहा कि ' जब तक चलेगा . तब तक चलेगा ! ये बात मुखिया और गांववालों को भा गयी और उन्होंने चारो को धन देकर गाँव से विदा किया | इस तरह नाई ने अपनी चतुराई से उन चारो की लाज बचाई | इसके बाद उन चारो ने प्रण लिया कि वे दूसरो को उपदेश देने से पहले खुद घोर अध्ययन कर ज्ञानार्जन करेगे |