Saturday, August 17, 2019

बादशाह खान -- भाग तीन

बादशाह खान -- भाग तीन

बादशाह खान समाज में महिलाओं की व्यापक भूमिका , स्वतंत्रता के संघर्ष में उनकी सक्रिय भागीदारी पर जोर देते थे | उनकी खुद की बहनों ने परदे के बहार आकर उनके आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई | 1930 में उनकी बहने सीमांत के एक क्षेत्र से दुसरे क्षेत्र में यात्राए करते हुए जन जागरण द्वारा आजादी का संदेश देती रही | पठान औरतो को सम्बोधित करते हुए 1931 में खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा था ''भगवान ने आदमी और औरत में कोई अंतर नही बनाया है यदि इनमे से कोई दूजे से उपर उठ सकता है तो केवल अपने अच्छे कर्मो और नैतिक गुणों के बल पर | अगर आप इतिहास पढ़ेंगी तो पाएगी की औरतो में कई विधुशी और कवित्री हुई है | औरतो को कम अंक कर हमने बहुत बड़ी गलती की हैं | उन्होंने मुस्लिम महिलाओं का आव्हान किया '' यदि तुम इस्लाम के इतिहास का अध्ययन करो तो तुम पाओगे की पुरुष और स्त्री ने एक साथ मिलकर इस्लाम की सेवा की हैं | इसलिए तुम्हे हमारे साथ मिलकर देश की सेवा में जुट जाना चाहिए "'| 1934 में बम्बई में उन्होंने खा था .. यदि भारतीय महिलाए जागरूक हो जाए ;तो धरती पर कोई भी शक्ति नह रहेगी जो भारत को गुलाम रख सके ''| सीमांत प्रांत में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा व सामाजिक सुधार के उद्देश्यों के लिए खान अब्दुल गफ्फार खान के अनुरोध पर गांधी जी ने 1939 में वहाँ मीरा बहन व बीबी अम्तुस सलाम को भेजा था | बादशाह खान ने अपने क्षेत्र में नागरिक अवज्ञा आन्दोलन में शामिल हो इसी अपील को फैला रहे थे और वे गिरफ्तार कर लिए गये उन्हें तीन साल की सजा हुई | पेशावर समेत सीमांत क्षेत्र में अन्य इलाको में सरकार ने पठानों पर विशेषकर खुदाई खिदमतगारो पर भयंकर कहर ढाया | इसी दौर में भारतीय इतिहास की एक यादगार घटना घटी थी | पेशावर में निहत्थी भीड़ पर गोलिया चलाने से चन्द्रसिंह गढवाली के नेतृत्व में गढवाल राइफल्स की एक पलटन ने इनकार कर दिया | अपने अफसरों से उन्होंने साफ़ कहा की चाहे उन्हें ही गोलियों से क्यो न भुन दिया जाए ;पर वे निह्ठो भाइयो पर गोलिया नही चलाएंगे | इन साहसी सिपाहियों को बाद में कड़ी सजा दी गयी | जेल से रिहा होने के बाद बादशाह खान खुदाई ख्द्मात्गारो को पुन: संगठित करने में जुट गये | एक सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए बादशाह खान अपने सबदेश फैलाते हुए निरंतर एक गाँव से दुसरे गाँव की यात्रा करते रहे | अंग्रेजो ने उन पर कई तरह की बंदिशे लगाई , उनके बारे में गलत अफवाह फैलाई गयी ; पर कोई बाधा उन्हें न ओके सकी | अंतत:उन्हें पुन: गिरफ्तार करके बिहार की जेल में एकांतवास में भेज दिया गया | सीमांत क्षेत्र से बाहर भी बादशाह खान ने अपने व्यक्तित्व की विशेष छाप छोड़ी | अगस्त 1934 में उन्होंने पटना में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए साम्प्रदायिकता एकता पर बल दिया | बंगाल के युवको को उन्होंने अपना खुद का एक खुदाई -खिदमतगार आन्दोलन चलाने को प्रोत्साहित किया | 1938 में गांधी जी ने सीमांत क्षेत्र में दो बार दौरा किये और वे खुदाई ख्द्मात्गारो से काफी प्रभावित हुए | उन्होंने सीमांत क्षेत्र में रचनात्मक कार्यक्रम पर बल देने की सलाह दी | बादशाह खान को उनकी सलाह थी की पठानों को अंहिसात्मक ढंग से लड़ना तो आता है , पर अब खान अब्दुल गफ्फार खान को उन्हें अहिंसात्मक तरीके से जीना भी सिखाना है | क्रमश:

Friday, August 16, 2019

खान अब्दुल गफ्फार खान - बादशाह खान - 2

खान अब्दुल गफ्फार खान - बादशाह खान - 2

'' मेरा मानना है कि इस्लाम अमन , यकीन और मोहब्बत का नाम है ....''
---------------------------------------- बादशाह खान


खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म पेशावर से लगभग 24 मील दूर स्थित उत्तमजई गाँव के समृद्द परिवार में हुआ था उनके पिता बहराम खान अपने गाँव के मुखिया थे | अपने आसपास के माहौल के विपरीत वे एक शांत प्रवृत्ति के बदले की जगह माफ़ कर देने वाले इंसान थे | उन्होंने स्थानीय मुल्लाओ के विरोध के वावजूद अपने बेटो को गाँव से बाहर हाई स्कूल में पढने भेजा | अब्दुल गफ्फार खान अपनी शिक्षा पूरी करके स्थानीय ब्रिटिश सेना में गाइड की नौकरी करने लगे थे , पर एक अंग्रेज अफसर के हाथो अपने एक साथी का अपमान देखकर उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी | उन्होंने कुछ समय तक खेतो में काम किया , अलीगढ़ जाकर पढ़ाई जारी रखी ; पर वे पठानों में व्याप्त अज्ञानता ,पिछड़ेपन और हिंसा से व्यथित हो सुधार के लिए कुछ करने के लिए परेशान रहते | कुछ समय तक उन्होंने सीमांत क्षेत्र के प्रमुख समाज सुधारक हाजी अब्दुल वाहिद साहिब की छत्रछाया में काम किये | शुरूआती दौर में खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपने गाँव उत्तमजई और उसके आस पास के अन्य गाँव में स्कूल खोलकर उदार शिक्षा का प्रसार करना शुरू किया | जाहिर है इससे अंग्रेजो और रुढीवादियों मुल्लाओ दोनों को परेशानी हुई कयोकि सीमांत क्षेत्र में जागरूकता फैलना उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता था | अत: गफ्फार खान को कई कठिनाइयो का सामना करना पडा | देश के कुछ मुस्लिम नेताओं की सलाह पर बादशाह खान ने कई पहाड़ी कबीलाई इलाको में शिक्षा - प्रसार के प्रयास शुरू किये | इस कार्य में वे बिलकुल अकेले पड़ गये पर अपने आंतरिक मनोबल को मजबूत बना लिया | अपने गाँव लौटने पर अंग्रेजो द्वारा बंद किये स्कूल को पुन: चालु करने में लग गये | स्कूलों की पुनर्स्थापना , नए स्कूल खोलने और पठानों की सर्वोमुखी उन्नति के लिए वे एक के बाद एक पठान गाँव की यात्राये करते रहे | इन्ही दिनों इनकी पत्नी बीमार हो गयी जिनसे उनकी मौत हो गयी |
1919 की राजनीतिक हलचलों के दौरान सीमांत क्षेत्र में जब मार्शाल ला लगाया गया तो बादशाह खान को गिरफ्तार कर लिया गया | जेल से छूटने पर माता -पिता की आग्रह पर उन्होंने दूसरी शादी की | सीमांत क्षेत्र में सुधार कार्यो के लिए एक गैर राजनीतिक संस्था ''अंजुमन - ए-इस्लाह - उल -अफगीना '' के गठन का मार्गदर्शन अब्दुल गफ्फार खान ने किया और वे पख्तूनो की तालीम हेतु स्थापित आजाद स्कूल के विस्तार में लग गये | खिलाफत आन्दोलन के दौरान खान अब्दुल गफ्फार खान से सीमांत क्षेत्र की खिलाफत समिति की अध्यक्षता ग्रहण करने का लोगो ने आग्रह किया | हिजरत आन्दोलन के तहत वे अफगानिस्तान गये | यह आन्दोलन विफल हो गया और खान अब्दुल गफ्फार खान ने पुन: भारत लौटकर अपना ध्यान शिक्षा के प्रसार में लगाया | अंग्रेजो द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बंद किये गये स्कूलों की पुनर्स्थापना और नये स्कूल खोले जाने के कारण बादशाह खान से अंग्रेज बेहद चिढ गये और दिसम्बर 1921 में उन्हें गिरफ्तार करके तीन वर्ष का कठोर कारावास की सजा सूना दिया गया | 1924 तक खान अब्दुल गफ्फार खान का समय उत्तरपश्चिमी क्षेत्र की कई जेलों में गुजरा | इस दौरान उन्हें कई तरह की प्रताड़ना व अपमान सहना पडा भारी बेडियो से पांवो के छलनी होने से लेकर भूखे - प्यासे रख जाने दूषित और बुनियादी सुविधाओं से रहित माहौल में रहने एकांतवास के कठोर श्रम व अपमान सहने जैसे कई बुरे अनुभवो में उन्होंने अपने दिन गुजारे | इन सबके बीच जेल की दशा सुधारे जाने के लिए और जेल प्रशासन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध बादशाह खान ने शालीनता से अपनी आवाज बुलंद किया | अपने बंदी जीवन में उन्होंने विभिन्न धार्मिक ग्रंथो का अध्ययन किया | उनका स्वास्थ्य गिरता गया और उनकी माँ के मौत की खबर बहुत बाद में उन्हें मिली | 1926 में अपनी पिता की मृत्यु के बाद बादशाह खान ने अपने परिवार के साथ हज यात्रा आरम्भ किया | यरूशलम में उनकी पत्नी एक दुर्घटना में गुजर गयी | मध्य पूर्व की यात्रा से लौटने के बाद खान अब्दुल गफ्फार खान ने पश्तून जिरगाह नाम से पठान युवको की एक लीग गठित की जो सामजिक - शैक्षिक व राजनीतिक सुधारों के लिए थी | 1927 में देश में साम्प्रदायिकता की जो लहर चली उस वक्त बादशाह खान ने दृढ़ता से अपना मत रखा कि '' मेरा मानना है कि इस्लाम अमन , यकीन और मोहब्बत का नाम है ....'' 1928 में उन्होंने ''पख्तून '' नामक समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया | यह पश्तो भाषा का मासिक अखबार था जिसमे पख्तूनो की विभिन्न समस्याओं को उठाने के अतिरिक्त सामान्य सामजिक मुद्दों पर भी लेख होते __ क्रमश:

Thursday, August 15, 2019

बादशाह खान

बादशाह खान ( खान अब्दुल गफ्फार खान )

देश की आजादी और उत्तर - पश्चिम सीमांत क्षेत्र की पठान आबादी के सर्वोमुखी विकास जैसे उदात्त उद्देश्यों के लिए जीवन भर अहिंसक संघर्ष जारी रखने वाले बादशाह खान सही मायने में मानवता के सच्चे खिदमतगार थे | उन्होंने अपना सारा जीवन अंग्रेजो के शोषण से मुक्ति , पठानों के जीवन में सुधार और पठानों के भीतर हिन्दा द्द्वेश को कम करने में लगाया | जीवन भर अनेक कष्टों - अन्यायों को सहते हुए भी बादशाह खान ने गहरी सहनशीलता ,दृढ़ता और लक्ष्य के पीटीआई अटूट निष्ठा का परिचय दिया | गांधी जी से प्रभावित बादशाह खान ने सार्वजनिक जीवन में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य प्रतिष्ठित करने की ऐसी मिसाल कायम की जो आज भी प्रेरणादायक है | लोगो ने प्यार व सम्मान से उन्हें बादशाह खान व सीमांत गांधी फ्रन्टियर गांधी के नाम से संबोधित किया |
पाकिस्तान - अफगानिस्तान की वही सरहदी जमीन जहाँ आज आतंकवादियों और कट्टरपंथियों का खौफ मौजूद है और हिंसा का बोलबाला रहा है ; उसी इलाके में कभी गुजें थे खुदा के बन्दों के रूप में मानवता की सच्ची खिदमत करने वाले अहिंसक सेनानियों के गीत | इसी पठान इलाके से निकला था खुदा का वह नेक बन्दा जिसने मानवता की खिदमत के लिए अहिंसक तरीके से जीवन भर संघर्ष किया था | पठानों के बदले की भावना , हिंसा की प्रवृत्ति काफी प्रबल थी विभिन्न कबीले और कबीलों के भीतर भी विभिन्न गुट व परिवार आपसी दुश्मनियो की हिंसा से बुरी तरह तरसत थे | छोटी - छोटी बातो पर कलह , कबीलों - गुटों के बीच षड्यंत्र लड़ाई - झगड़े काफी आम बात थी और इसी पठान समाज को अन्दर से कमजोर कर दिया था | स्वाभिमान को लगी जरा सी ठेस को बदले की आक्रोशपूर्ण भावना में तब्दील हो हिंसक लड़ाइयो का रूप लेते देर नही लगती थी | अंग्रेजो से पठान कबीलों की छिटपुट संघर्ष तो चलते ही रहते थे ; पर सम्पूर्ण देश की आजादी के व्यापक उद्देश्यों का यहाँ अभाव था | पठान कबीलों पर अपना कठोर नियंत्रण रखने वाले मुल्लाओ को न्ग्रेजो ने इतनी छुट दे राखी थी कि वे पठानों में किसी राजनितिक - सामाजिक सुधार को होने से रोके | इस वातावरण में पठानों में सामाजिक सुधार का बीड़ा उठाना और हिंसक प्रवृत्ति के पठानों को देश की आजादी जैसे व्यापक उद्देश्यों के लिए अहिंसक सैनिको में तब्दील करना सचमुच बेहद आश्चर्यजनक उपलब्द्धि थी | खान अब्दुल गफ्फार खान ने यही प्रयास किया और इसलिए वे पठानों के ही नही सम्पूर्ण देशवासियों के दिलो के बादशाह बन गये | पठानों में छिपे साहस , दृढ़ता , स्वाभिमान और अनुशासन को पूर्णत: अहिंसक संघर्ष में तब्दील करके बादशाह खान ने सही मायने में ''अहिंसा ' के सिद्दांत को प्रतिपादित किया | क्रमश :

Monday, August 12, 2019

अहिंसा का देवदूत - बादशाह खान

अहिंसा का देवदूत - बादशाह खान


वास्तव में अफगानिस्तान की सीमा से लगे अविभाजित भारत के सीमांत प्रांत में बादशाह खान उनके द्वारा बनाई गयी खुदाई खिदमतगार सगठन ने जो उपलब्द्धि हासिल किया था वह देश ही नही पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मिशाल थी आज इतना लम्बा समय बीतने के बाद भी यह प्रेरणा का एक स्रोत बना हुआ है | महात्मा ने लिखा है '' सीमांत प्रांत मेरे लिए एक तीर्थ रहेगा , जहां मैं बार - बार जाना चाहूँगा | लगता है कि शेष भारत सच्ची अहिंसा दर्शाने में भले ही असफल हो जाए ; तब भी सीमांत प्रांत इस कसौटी पर खरा उतरेगा ....|
सीमांत प्रांत एक ऐसा क्षेत्र था जो हिंसा से बुरी तरह त्रस्त था | एक तरह अंग्रेज शासको का अन्याय व उत्पीडन था तो दूसरी तरफ पठान कबीलों की आपसी हिंसा थी | बदले की भावना से बड़े - बड़े अपराध होते | पर हिंसा के इस क्षेत्र में भी बादशाह खान ने यह सपना देखा और जिया कि वो बड़ी संख्या में आम लोगो को अहिंसा की राह पर ले आये उन्होंने आम आदमी के जीवन मूल्यों में बुनियादी सुधार किया अहिंसक सघर्ष से अंग्रेजो शासको के अन्याय व अत्याचार का भी विरोध किया | इस तरह यह अन्याय से लड़ने के साथ जीवन - मूल्यों में बदलाव का एक अद्भुत प्रयोग किया था उन्होंने जो हिंसा की जमीन में अहिंसा के फुल उगाना चाता था |
कल्पना कीजिये कि उस समय जब विरोध की जरा सी आहात सुनते ही विदेशी शासक किसी भी व्यक्ति को जेल में डाल देते और कई अत्याचार करते थे उस समय यह कार्य कितना कठिन रहा ओगा कि गाँव - गाँव में जाकर लोगो को नये तरह के संघर्ष नये तरह के जीवन मूल्यों के लिए तैयार करना कितना कठिन रहा होगा पर बादशाह खान ने न केवल यह साहस किया , अपितु उन्होंने इसमें आश्चर्यजनक हद तक सफलता को प्राप्त भी किया | महात्मा गांधी ने कहा था , ' बाद्शाह खान '' मैं आपको मुबारकबाद देता हूँ | मैं यही प्रार्थना करूंगा की सीमांत के पठान न केवल भारत को आजाद कराए बल्कि सारे संसार को अहिंसा का अमूल्य संदेश भी देवे .....'' बादशाह खान की सफलता का एक बड़ा आधार यह था कि उनके अपने कार्य के प्रति और अपने लोगो के लिए बहुत गहरी निष्ठा थी | उन्होंने कहा था , ''मैं इन बहादुर , देशभक्त लोगो को उन विदेशियों के आतंक से निकालना चाहता हूँ जिन्होंने इनके स्वाभिमान को टेस पहुचाई है |.... मैं इनके लिए एक ऐसे आजाद संसार का निर्माण करना चाहता हूँ , जहाँ यह शान्ति से रह संके, जहां ये हँस सके और खुश रहें | मैं इन ओगो के कपड़ो पर से खून के धब्बे मिटाना चाहता हूँ .. मैं इनके घरो को खुद अपने हाथो से साफ़ करना चाहता हूँ कि ये पहाड़ी लोग कितने खुबसूरत और सभी है .....|
एक सच्चे जन आन्दोलनकारी में यह सामर्थ्य होना चाहिए कि उपरी परत को हटाकर वह अपने लोगो में छुपे हुए गुणों को पहचानकर व फिर इन गुणों को प्रेरित और जागृत कर उन्हें दे कार्यो के लिए तैयार कर सकें | यही बादशाह खान और उनके बहादुर साथियो ने खुदाई खिदमतगार संगठन के माध्यम से किया | दुनिया हैरानी इ देखती रह गयी जो क्षेत्र हिंसा की बड़ी पहचान रखता था वहां से खबरे आई की अब लोग यहाँ अंहिंसा को मानने लगे है | खुदाई खिदमतगारो का यह संघर्ष बहुत प्रेरक था जो हिन्दू -मुस्लिम एकता की एक बड़ी मिशाल भी कायम किया |सभी धर्मो में सद्भावना स्थापित करना खुदाई खिदमतगारो का एक मुख्य उद्देश्य था | बादशाह खान ने कहा , ''मजहब तो दुनिया में इंसानियत , अमन , मोहब्बत , प्रेम , सच्चाई और खुदा की मखलूक की खिदमत के लिए टा है ... जमाते तो सेवाओं के लिए बनाई जाती है और हर एक का दावा भी यही है | फिर आपस में झगड़ा क्यों हो ?


सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Sunday, August 11, 2019

अलमस्त फकीर

अलमस्त फकीर --------------------- अमीर खुसरो
तीर , तलवार , दरबार , सरकार से हटकर भी एक ऐसी दुनिया है इस जहांन में जहा सिर्फ हर ओर एक नगमा है प्यार का हर सांसो का एक एहसास है , एक ऐसी रूहानी दुनिया जहा सिर्फ मुहब्बत है प्यार है और उस प्यार में खोने का कोई एहसास नही बस समर्पण है जहा चाह कोई नही है वह है फकीरों की दुनिया जिसमे न दीन का पता न जाति का पता न ही किसी राजकाज का पता वहा तो अलमस्ती है प्यार के एहसास का --------------------------------------
ऐसे ही एक फकीर का आस्ताना
ऐ री सखी मोरे पिया घर आए
भाग लगे इस आँगन को
बल-बल जाऊँ मैं अपने पिया के, चरन लगायो निर्धन को।
ऐसे मस्ती में जीने वाले अलमस्त फकीर अमीर खुसरो जैसे मोहब्बत भरे दिल के आत्मा को शान्ति मयस्सर आई ये हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन की खानकाही फजा थी | दिल्ली की ग्यास्पुरी बस्ती में जहा अब जमुना किनारे हुमांयू का मकबरा है | यही पर रहते थे वो अकला मस्त फकीर जिन्होंने आम आवाम के मन की शान्ति के लिए दीनी प्रेम के एहसास को आम पैगाम बनाया | अमीर खुसरो अपने पीर ख्वाजा निजामुद्दीन के हमदम और हमराज भी रहे | ख्वाजा निजामुद्दीन की बानबे बरस की ब्रम्हचारी मुजर्रत जिन्दगी में खुसरो रंग और आवाजे बिखेतरे रहे और उनसे टूटकर इश्क किया |
खुसरो कहते है -- ऐ पीर निजामुद्दीन तुम हुस्नो जमाल के बादशाह हो और खुसरो तुम्हारे दर का फकीर | इस फकीर पर रहम करो | करम की नजर से इसे नवाज दो | नजरे क्रम कुन | खुसरो अपने पीर से फकीर व औलिया निजामुद्दीन से राज ओ नियाज की बाते करते और रूहानी शान्ति की दौलत समेत करते | कभी एक गुफ्तगू के दौरान हजरत निजामुद्दीन ने कहा ' खुसरो हमने तुम्हे तुर्क अल्लाह का खिताब दिया है | बस चलता तो वसीयत कर जाते कि तुम्हे हमारी कब्र में ही सुलाया जाए | तुम्हे जुदा करने को जी नही चाहता , मगर दिन भर कमर से फटका बाधे दरबार करते हो | जाओ कमर खोलो | आराम करो | तुम्हारी नफ्स ( अस्तित्व ) को भी तुम पर हक़ है | शब्बा खैर | ''

आम आवाम इस सूफी शायर की यही मुहब्बत आम लोगो की देसी - जुबानो में इसने मजे - मजे के दोहे कहे | अमीर खुसरो ने अपनी रचना शिल्प को एक आयाम दिया फकीरी का उन्होंने कहमुकरनियो- गीत - गजल , पहेलियाँ लिखे जो हिन्दुस्तान के गाँव - गाँव आज भी गूजता है | सावन के गीत , चक्की के गीत , शादी व्याह के गीत , पनघट के गीत , जो किताबो में लिपिब्द्द नही मिलते जो लोगो की जुबानो पर मिलते है |
अमीर खुसरो ने ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया के न रहने पर यह मार्मिक दोहा कहा |
'' गोरी सोवे मेज पे मुख पर डाले केस ,
चल खुसरो घर आपने रेन भई चंहु देस |
खुसरो अपनी फकीरी में कहते है
' खुसरो रेन सोहाग की , सो जागी पी के संग |
तन मोरा मन पीहू का , सो दोनों एक ही रंग || -------------------- सुनील दत्ता  कबीर