Sunday, December 13, 2015

अंहकार ------------------ 13-12-15

अंहकार


वन में एक साधू का आश्रम था | उसने ताप के जरिये अनेक सिद्दिया हासिल की थी | इस वजह से उसके मन में तनिक दम्भ उभर आया था | उसके इस दम्भ को चूर करने  के लिए स्वंय ईश्वर एक महात्मा के वेश में उनके आश्रम पहुचे और बोले -- ' मैंने सूना है कि आपने अनेक सिद्दिया प्राप्त की है ?  साधू ने कहा -- ' जी , आपने ठीक सूना है | मैं इन सिद्दियो के बल पर कुछ भी कर सकता हूँ | ' तब महात्मा ने कहा -- ' क्या आप अपनी सिद्दी के जरिये किसी को भी पलभर में मार सकते है ? ' हाँ - हाँ !' साधू का जबाब था | तभी महात्मा ने देखा कि वही आश्रम के पास से एक हाथी  गुजर रहा था | उन्होंने साधू को सम्बोधित करते हुए कहा -- ' क्या आप इस विशाल प्राणी को अभी मार सकते है ? '
साधू ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया -- ' इसमें कौन - सी बड़ी बात है ! यह काम तो मैं चुटकियो में कर सकता हूँ | ' यह कहकर साधू ने जमीन से थोड़ी मिटटी उठाई , उस पर मंत्र फूँका और उसे हाथी की ओर उछल देया | हाथी  तत्काल जमीन पर गिर पडा और थोड़ी देर तडपने के बाद उसके प्राण - पखेरू उड़ गये | महात्मा ने चकित होते हुए साधू से कहा -- वाकई , आपमें तो अपार शक्ति है |
मैंने तो कल्पना भी नही की थी | मुझे क्या पता कि आप वाकई हाथी को मार देंगे |
अब हाथी  की हत्या का पाप मुझे ही लगेगा | ' यह सुनकर साधू बोला -- ' आप व्याकुल ना हो , मैं इसे पुन: जीवित कर सकता हूँ | ' अच्छा , कैसे - कैसे ? महात्मा ने व्यग्र हो पूछा | तब साधू बोला -- आप खुद ही देख ले | ' 
यह कहते हुए साधू ने पहले की तरह पुन: थोड़ी मिटटी उठाई और कुछ मन्त्र पढ़ते हुए हाथी  पर दे मारा | मिटटी पड़ते ही हाथी  पुन: जीवित हो उठा | ' महात्मा हाथी को पुन: जीवित देखकर मुस्कुराए और साधू की ओर देखकर बोले -- ' आप तो कुछ भी  कर सकते है ?
साधू ने छाती फुलाकर कहा -- हाँ - हाँ ! मैं कुछ भी कर सकता हूँ | ' तब महात्मा ने कहा -- किन्तु मुझे आपसे यह पूछना है कि यह जो आपने पहले हाथी को मार दिया , फिर उसे जिला दिया , इससे आपको क्या लाभ मिला ? इससे आपकी स्वंय की कितनी उन्नति हुई ? क्या इससे आप अभी तक भगवान को पा सके ? यदि नही तो फिर इन चमत्कारों का क्या अर्थ है , इन सिद्दियो का क्या प्रयोजन ? इतना कहकर महात्मा वेशधारी भगवान वह से अंतरध्यान हो गये |

Monday, December 7, 2015

कुरान शरीफ ----------------- 7-12-15

कुरान शरीफ
इस्लाम उस परम्परा का हिस्सा है जिसमे यहूदी और ईसाई धर्म पैदा हुए | उसे इब्राहिम का धर्म कहते है | इब्राहिम का बेटा था इस्माइल | इब्राहिम को दूसरी पत्नी सारा से एक बेटा पैदा हुआ -- इसाक | सारा के सौतेलेपन से इस्माइल को बचाने की खातिर इब्राहिम ईस्माइल को लेकर अरेबिया के एक गाँव मक्का चले गये | उनके साथ एक इजिप्त का गुलाम हगर भी था | इब्राहिम और इस्माइल ने मिलकर काबा का पवित्र आश्रम बनाया | ऐसा माना जाता था कि काबा आदम का मूल आशियाना था | काबा में एक पुराना धूमकेतु गिरकर पत्थर बन गया था | कुरान के जिक्र के मुताबिक़ अल्लाह ने इब्राहिम को हुक्म दिया की काबा को तीर्थ बनाया जाए | काबा में बहुत सी पुरानी मुर्तिया भी थी , जिन्हें अल्लाह की बेटिया कहा जाता था | उन देवताओं को काबा के पत्थर से ताकत मिलती थी |
मुस्लिम परम्परा कहती है कि वह इलाका ' अज्ञान ' के युग में डूबा रहा , क्योकि वह इब्राहिम के दर्शन से दूर हट गया | सदिय गुजरी और उस इलाके में रहने वाली एक जमात में एक लड़का पैदा हुआ जिसका नाम मुहम्मद था | पैदा होने से पहले ही उसके वालिद का इन्तेकाल हो गया , और बचपन में माँ मर गयी | एक चरवाहों की टोली की स्त्री ने उसकी परवरिश की |
महम्मद जैसे ही जवान हुए , अपने चाचा के पास लौट आये और उनके साथ घुमने लगे | सफर के दौरान सीरिया की ओर बढ़ते हुए , एक ईसाई पादरी की नजर उन पर पड़ी और उसने मुहम्मद की गहरी आध्यात्मिकता को पहचान लिया | मुहम्मद और उनके चाचा एक अमीर , खुबसूरत और अक्लमंद स्त्री की सेवा में थे ; जिसका नाम था खादिजा | मुहम्मद ने खादिजा का कामकाज इतने बेहतरीन ढंग से सम्भाला कि खुश होकर खादिजा ने उनसे निकाह कर लिया | उस वक्त मुहम्मद पच्चीस साल के थे और खादिजा चालीस की |
काबा पर चल रही बुतपरस्ती से तंग आकर कुछ लोग इब्राहिम के ' एक ही अल्लाह ' वाले धर्म की अभिप्प्सा कर रहे थे | उन्हें ' हुनाफ ' कहा जाता था | मुहम्मद भी उनमे से एक थे | मुहम्मद का उसूल था कि वह हर साल रमजान के महीने में मक्का के करीब , हेरा की पहाडियों पर अपने परिवार के साथ गुफा में जाकर रहते थे और ध्यान में समय बिताते थे |
मुहम्मद जब चालीस के हुए तब की बात है : रमजान के आखरी दिनों में एक घटना घटी | वे या तो सोये हुए थे या फिर तन्द्रा में थे ; तब उन्होंने एक आवाज सुनी : ' पढ़ " |
उन्होंने कहा , ' मैं पढ़ नही सकता | '
फिर से आवाज आई :पढ़ "
मुहम्मद बोले , ' मैं पढ़ नही सकता
आवाज फिर गरजी , ' पढ़ |
मुहम्मद ने पूछा , क्या पढू
पढ़ : अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान और रहम वाला है |
पढो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया |
आदमी को खून की पुटक से बनाया |
पढो और तुम्हारा रब ही सबसे बड़ा करीम है |
जिसने कलम से लिखना सिखाया |
आदमी को सिखाया जो न जानता था .......
जब वे जग गये तो वे अल्फाज उनके जेहन में ऐसे बस गये मानो दिल पर खुद गये हो |
वे गुफा के बाहर गये और पहाड़ी पर उन्होंने फिर से वही दबंग आवाज सुनी :
‘ ऐ मुहम्मद ! तू अल्लाह का पैगम्बर है और मैं जिब्राईल हूँ | ‘
उन्होंने आँखे उपर उठाई तो उन्हें आदमी की हमशक्ल एक फरिश्ता आसमान और जमीन के बीच खड़ा दिखाई दिया | मुहम्मद स्तब्ध खड़े रह गये | जिधर मुँह करे वही उन्हें फरिश्ता दिखाई देता | आखिर जब फरिश्ता विलीन हुआ , मुहम्मद कापते हुए घर आये | खादिजा ने उन्हें बहुत धीरज बढाया | उसे मुहम्मद की पाक रूह में बहुत भरोसा था |
वह मुहम्मद को अपने चचेरे भाई के पास ले गयी जो बहुत बूढ़े और समझदार थे | उन्होंने फरमाया कि जो फरिश्ता पुराने मोजेस के पास आया था वही मुहम्मद के पास आया है और मुहम्मद अपने लोगो के पैगम्बर चुने गये है |
मुहम्मद की परेशानी की वजह यो समझी जा सकती है कि हुनाफा सच्चे मजहब को कुदरत में ढूढ़ते थे और अशरीरी आत्माओं के साथ होने वाले सम्पर्क पर भरोसा नही रखते थे | मुहम्मद यह नही समझ पा रहे थे कि उनका देखा हुआ फरिश्ता अच्छा है या बुरा | मंत्र फेरने वाले , टोना – टोटका करने वाले , यहाँ तक कि उन दिनों शायर भी अ करते थे कि उन पर जिन्न उतरा है | मुहम्मद विनम्र और खामोश तबियत के शख्स थे : अकेले रहना , मौन और शांत जीवन बिताना पसंद करते थे | पूरी मनुष्य जाति में से उन्ही को चुना जाना , उसके बाद इतने बुलंद पैगाम को लेकर इंसानों का अगुवा बनना .... उनमे डर पैदा हुआ |
बहरहाल जैसे – जैसे कुरान का संदेशा , उनके रग – रग में बैठता चला गया वैसे – वैसे उनमे नई ताकत लहराई , उन्हें सौपी गयी जिम्मेदारी का नया अहसास उभरता चला गया | लगभग तेईस साल तक उन पर कुरान की आयते उतरने का सिलसिला जारी रहा | मजेदार वाकया है कि जो पढ़ नही सकता था , उसे पढने का आदेश दिया गया | इस पवित्र किताब को ‘ अलकुरान ‘ कहा गया ; जिसका मतलब है , पढना – उस इंसान का पढ़ना जो पढ़ना नही जानता था |
तकरीबन तीन साल तक मुहम्मद अपना इहलाम अपने परिवार को सम्प्रेषित करते रहे | उनकी सबसे पहली शागिर्द उनकी बीबी खादिजा दूसरा था उनका चचेरा भाई अली , तीसरा अबू बकर ( एक सौदागर ) और चौथा उनका गुलाम झैद| उस दौरान मक्का के लोगबाग तो उन्हें पागल समझते थे | तीसरा साल खत्म होते – होते उन्हें फिर हुक्म हुआ , ‘ उठ और सावधान कर | ‘ तब से मुहम्मद लोगो के बीच जाकर उपदेश देने लगे | वे उन दिनों चल रही मूर्ति पूजा के खिलाफ बोलने लगे कि ‘ रात और दिन , विकास और विनाश , जिन्दगी और मौत , ये शक्तिशाली नियम अल्लाह की ताकत के प्रतीक है , उन्हें छोड़कर क्या मूर्तियों को पूजते फिरते हो ? ‘
बस इस उपदेश से कुरेशो की जमात और मुहम्मद के मानने वालो में चिनगार लगी जो देखते ही देखते आग में भभक उठी | मुहम्मद की शांत और अंतर्मुखी जिन्दगी जंग की बाग्दौद बन गयी | मुहम्मद और उनके मानने वाले बेइन्तहा सताए गये |
कुरान शरीफ इस्लाम का केंद्र बिनु है | कुरान के पहले हिस्सों में एक अल्लाह को कायम किया हुआ है | बाद की आयते सगठन के बारे में और मुस्लिम समूह की समाज व्यवस्था के विषय में है |
जैसे ही मुहम्मद को इलहाम होता था , वे उसे रटते थे और फिर अपने शिष्यों को कठस्थ करने को कहते थे | कुरान को कहने से उन आयतों का संगीत , सौन्दर्य और शक्ति प्रगट होती है | कुरान , कुछ दबी हुई , कुछ उदास आवाज में पढ़ा जाता है , क्योकि उस समय इंसान की जो हालत थी उससे उदास हुए अल्लाह का वह इलहाम है | मुहम्मद कहते थे , जब तुम पढ़ते हो तब रोओं | ‘ कहते है कुरान पढने से तन – मन के सारे जखम भर जाते है , निर्मलता आती है , सब कुछ घुल जाता है , जैसे कोई जादू सा तारी होता है | कुरान में यहूदी और ईसाई इतिहास की कहानिया पायी जाती है | अदम और ईव का किस्सा शुरुआत में ही दर्ज है | वही फरिश्ता जिब्राईल जिसने मुहम्मद को संदेश दिया , मेरी के पास ईसा मसीह के आने का संदेश लेकर गया था |
कुरान शरीफ के पांच वर्ग है :
खुदा क फरमान
जो खुदा ने सुझाया है लेकिन अनिवार्य नही है |
जो खुदा ने कानून औसत ठहराया |
जिसमे खुदा ने इशारा किया कि ठीक नही है , लेकिन उसे करने से मना नही किया |
जो खुदा ने बिल्कुअल मना किया है |
यह किताब कानून की पाश्चात्य धारणा से कही अधिक व्यापक है क्योकि वह जीवन के हर पहलु को छूती है | अधिकतर कानूनों पर मानवीय अदालत अम्ल नही कर सकती थी इसीलिए उसे रब की अदालत पर छोड़ा गया | कुरान शरीर के बुनियादी कानून मुसलमानों के लिए है | खुदाई नूर ने जिस नक्शे को उघाडा है , उसे हर मुस्लिम को निभाने की कोशिश करनी चाहिए |
कुरान के अल्फाज़ अल्लाह के अल्फाज है | ये सत्य के इशारे है |
ओशो का नजरिया -----
कुरान ऐसी किताब नही जिसे पढ़ा जाए , कुरान ऐसी किताब है जिसे गाया जाए | अगर तुम पढोगे तो चुक जाओगे | अगर गाओगे तो इन्शाअल्लाह प् लोगे |
कुरान किसी दार्शनिक या विद्वान् की रचना नही है | मुहम्मद बे पढ़े – लिखे थे | वे अपने नाम के दस्तखत भी नही कर सकते थे , लेकिन खुदा की खुदाई से सरोबोर थे | उनकी मासूमियत की वजह से वे चुने गये और उन्होंने गीत गाना शुरू किया ; और वह गीत है कुरान |
अरेबिक मेरी समझ में नही आती , लेकिन मैं कुरान को समझ लेता हूँ क्योकि कुरान की लय समझता हूँ , और अरेबिक सुरों की लय की खूबसूरती को समझता हूँ | मतलब की फ़िक्र किसे है ? जब तुम एक फूल देखते हो तो क्या मतलब पूछते हो ? फूल होना काफी है | आग की लपट काफी है ; उसकी खूबसूरती ही उसका मतलब है | उसकी अर्थहीनता अगर लयबद्द है तो वही उसका अर्थ है |
कुरान वैसी है | और मैं धन्यवाद देता हूँ कि परमात्मा ने मुझे इजाजत दी ... और ध्यान रहे , कोई परमात्मा नही है , यह सिर्फ कहने का एक ढंग है | कोई मुझे इजाजत नही दे रहा है ... इन्शाअल्लाह इस माला का अंत मैं कुरान से करने जा रहा हूँ – सबसे खुबसूरत , सबसे अर्थहीन , सबसे अर्थपूर्ण लेकिन मनुष्य जाति के इतिहास में सबसे अतार्किक किताब ---
--------------------------- ओशो ------- बुक्स आई हेव लव्ड पुस्तक से

Sunday, December 6, 2015

आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ? 7-12-15

आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ?
छत्रपति शिवाजी अपने कौशल के जरिये दिल्ली के बादशाह के चंगुल से छुट कर लौटे थे | रास्ते में उन्होंने अपना जीवन दाँव पर लगाते हुए एक गाँव को दस्युओ के हाथो लुटने से भी बचाया था | लौटकर आने के बाद उनका यह पहला दरबार था | सिंहासन के दाई ओर अष्ट प्रधानो के ऊँचे और भव्य आसन थे | बायीं ओर सामन्तो की पक्ति थी |
सभी सभासद अपना - अपना स्थान ग्रहण किये हुए थे | शिवाजी के लौटकर आने के बाद कोई गम्भीर समस्या नही आई थी | शत्रु का समाचार न था और नवीन आक्रमण की भी कोई योजना अभी नही थी | यो इन सबके होने पर भी शिवाजी की निष्काम कर्म - वृत्ति उनके मानस पटल पर चिंता की लकीरे नही खीचने देती थी |
सभासदों के बीच चर्चा चल रही थी |
तभी तानाबा ने एक प्रशन पूछा --- ' आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ? ' शिवाजी इस प्रश्न का उत्तर देने वाले थे , तभी उन्हें द्वार पर समर्थ गुरु रामदास के आने की सुचना मिली | छत्रपति तुरंत द्वार की ओर दौड़ पड़े | सभासद भी उनके पीछे हो लिए | शिवाजी ने द्वार पर पहुचकर गुरु को प्रणाम किया , उन्हें सम्मानपूर्वक भीतर लेकर आये और अपने राजसिंहासन पर बिठाया | इसके बाद शिवाजी ने समर्थ गुरु से कहा -- ' प्रभु तानाबा जानना चाहते है कि जीवन का असली मतलब क्या है ? अब आप ही इस प्रश्न का समाधान करे | ' समर्थ गुरु ने शांत स्वर में जबाब दिया -- ' गति और शक्ति ! इन दोनों का संयुकत ही जीवन है और उसका मतलब है सतत जागरूकता | ' दरबार में सभी के नेत्र अब भी समर्थ गुरु के मुख पर इस तरह लगे थे कि वे अभी तृप्त नही हुए है | मूक नेत्र भाषा में सबने कुछ और सुनने की प्रार्थना की | समर्थ गुरु उन सबका मंतव्य समझ गये और बोले -- ' जिज्ञासा , पर्यटन , विचार और त्याग का अविरल प्रवाह ही जीवन है | इनमे से किसी के भी मूर्क्षित होने का मतलब है जीवन की रुग्णावस्था | इनकी निवृत्ति में मृत्यु है और पूर्णता में मोक्ष |

Saturday, November 28, 2015

बड़ा कमाल ---- 29-11-15

बड़ा कमाल


एक सनकी राजा  था | एक बार वह अपने वजीर से किसी बात पर नाराज हो गया और उसे जेल की ऊँची मीनार में कैद कर दिया  |  वजीर के लिए बस बचने की एक ही सम्भावना थी कि वह किसी तरह उस गगनचुम्बी मीनार के ऊपरी तल पर बनी खिड़की के रस्ते बाहर निकले |  उस वजीर को जब कैद करके मीनार की तरफ ले जाया जा रहा था , तो लोगो ने देखा कि वह जरा भी चिंतित व दुखी नही है , बल्कि सदा की भाँती आनन्दित और प्रसन्न है | उसकी पत्नी ने रोते हुए उसे विदा दी और पूछा -- ' तुम्हे राजा  ने कैद करने का हुकम दिया है , ' फिर भी तुम प्रसंन्न हो ? यह सुनकर वजीर बोला -- ' इसमें दुखी होने की क्या बात है ? यह कैद तो बस कुछ दिनों की है | यदि तुम मेरा साथ दो तो , मैं चुटकियो में यहाँ से बाहर निकल सकता हूँ | '' इस पर पत्नी बोली -- हाँ - हाँ बताओ , मैं तुम्हारी किस प्रकार मदद कर सकती हूँ ? तब वजीर ने उससे कहा -- रेशम का एक अत्यंत पतला सूत भी मेरे पास पहुचाया जा सकता , तो मैं स्वतंत्रत हो जाउंगा | ' उसकी पत्नी ने बहुत सोचा , लेकिन उस ऊँची मीनार पर रेशम का पतला सूत पहुचाने का कोई उपाए उसकी समझ में नही आया | तभी उसे एक फकीर मिला | फकीर ने उससे कहा -- ' भृग नाम के कीड़े को पकड़ो और उसके पैर में रेशम के धागे को बाँध दो और उसको मुछो  पर शहद की एक बूंद रखकर उसे मीनार पर चोटी की ओर छोड़ दो | उसी रात को यह उपाए किया गया | वह कीड़ा सामने मधु की गंध पाकर उसे पाने के लोभ में धीर - धीरे उपर चढने लगा | उसने अंतत: एक लम्बी यात्रा पूरी कर ली और उसके साथ रेशम का एक छोर मीनार पर बंद उस वजीर कैदी के हाथ में पहुच गया | उस रेशम के पतले धागे के सहारे ही उसकी मुक्ति की राह खुली क्योकि उससे फिर सूत के धागे से डोरी पहुच गयी और फिर डोरी से मोटा रस्सा पहुँच  गया और रस्से के सहारे वह मीनार से निकलकर बाहर आ गया | यह कथा बताती है कि यदि युक्ति से काम लिया जाए तो छोटी - छोटी चीजो के सहारे भी
बड़ा कमाल किया जा सकता है |

Friday, November 27, 2015

मित्रता का महत्व 28-11-15

मित्रता का महत्व


जंगल के बीचो बीच एक बहुत बड़ा सरोवर था  | उसके उत्तरी तट पर एक मोर रहता था | एक दिन जंगल में घूमते हुए एक मोरनी भी वहा आ गयी | मोरनी को देखकर मोर बहुँत खुश हो ज्ञा | एक दिन मौक़ा पाकर उसने मोरनी के समक्ष प्रणय का प्रस्ताव रखा | मोरनी ने उससे कहा -- मैं तुम्हे अपना जीवन साथी बना लूँ , पर मैं यह जनाना चाहती हूँ कि तुम्हारे मित्र कितने है ? इस पर मोर ने कहा --- ' मेरा तो एक भी मित्र नही है | '  यह सुनकर मोरनी ने उसके साथ जोड़ा बनाने से इनकार कर डिया | अब मोर सोचने लगा कि सुखपूर्वक रहने के लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है | उसने सरोवर के पूर्वी तट पर रहने वाले एक शेर , पश्चिमी तट पर रहने वाले कछुए और बगल में रहने वाली टिटहरी ( जो शेर के लिए शिकार का पता लगाने का काम करती थी ) से दोस्ती कर ली | अब मोर एक बार मोरनी के पास पहुचा और उसने अपने मित्रो के नाम गिनाये | यह जान्ने के बाद मोरनी उसके साथ रहने के लिए तैयार हो गयी | अब उन्होंने वही एक पेड़ पर अपना आशियाना बना लिया और सुखपूर्वक रहने लगे | उस पेड़ पर और भी कई पछियो का बसेरा था | कुछ दिन बाद मोरनी ने घोसले में अंडे दीये | एक दिन जंगल में शिकारी आये | उन्हें दिनभर जंगल में भटकने के बाद वावजूद कोई शिकार नही मिला | आखिर शाम को थक - हार कर वे उसी पेड़ की छाया में आकर ठहर गये और सोचने लगे किपेड़ पर चढ़कर अन्डो - चूजो से भूख मिटाई जाए | यह देखकर मोर दम्पत्ति को बेहद चिंता हुई | मोर सहायता के लिए मित्रो के पास दौड़ा | मोर को मुसीबत में देख टिटहरी ने जोर - जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया | शेर समझ गया कि कोई शिकार है | वह उसी पेड़ के नीचे चला जहा शिकारी बैठे थे | इतने में कछुआ भी पानी से निकलकर बाहर आ गया | शेर से डर कर भागते शिकारियों ने कछुए को ले चलने की बात सोची | जैसे ही उन्होंने कछुए को पकड़ने के लिए हाथ बढाया , कछुआ पानी में खिसक गया और शिकारियों के पैर वही दलदल में फंसकर रह गये | इतने में शेर वह आ गया और उन्हें ठिकाने लगा दिया | यह देख मोरनी ने मोर से कहा --- ' मैंने तुम्हारे साथ जोड़ा बनाने से पूर्व मित्रो के बारे में पूछा था | सो बात काम की निकली ना ! यदि आज ये मित्र ना होते , तो हमारी खैर नही थी | ' मोर ने भी उसकी बात से सहमती जताई और जीवन में मित्रता का महत्व समझाने के लिए उसे धन्यवाद दिया |

क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ? 28-11-15

क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ?
हम आधुनिक युग में जी रहे है | आधुनिक युग की बाज़ार व्यवस्था में जी रहे है | क्योंकि हमारे भोजन - वस्त्र , घर - मकान , शिक्षा - इलाज़ की सभी बुनियादी जरूरते बाज़ार से जुड़ने पर ही मिल पाती है और फिर छोटे - बड़े लाभ - मुनाफे कमाना तो बाज़ार व्यवस्था का अपरिहार्य हिस्सा है और यही बाज़ार व्यवस्था का वास्तविक लक्ष्य भी है | वर्तमान सामाजिक - व्यवस्था को बाज़ार व्यवस्था क्यों कहा जा रहा है ? इसका एकदम सीधा जबाब है कि इस सामाजिक व्यवस्था में राष्ट्र व् समाज के सभी लोगो को खरीद - बिक्री की प्रक्रिया से जुड़ना लाजिमी है | कुछ भी पाने के लिए कुछ बेचना और खरीदना जरूरी है | कुछ बेचे बिना कोई भी कुछ खरीद नही सकता | उदाहरण के लिए मजदूर को अपना भोजन , कपड़ा खरीदने के लिए अपनी श्रमशक्ति को बेचना जरूरी है .अपरिहार्य है | किसानो को अपनी खेती के लिये तथा अपने कपड़े -लत्ते तथा दूसरी जरुरतो के लिए अपने कृषि उत्पाद को या अपने किसी सदस्य की श्रम शक्ति को बेचना जरूरी है | यही स्थिति तमाम छोटे उत्पादकों की है |
इसके अलावा, चिकित्सा , शिक्षा तथा कानून व न्याय के क्षेत्र के लोगो के लिए भी जरूरी है कि वे पहले अपनी बौद्धिक क्षमता को बेचने लायक बने| इसके लिए विभिन्न क्षेत्रो का शिक्षा ज्ञान हासिल करे | फिर अपने शिक्षा ज्ञान का बिक्री - व्यापार करे | चाहे उसका नौकरी के जरिये वेतन आदि के रूप में मूल्य पाए या फिर अपने निजी काम धंधे के जरिये उसका व्यापार करे| अपनी सेवा का कम या ज्यादा मूल्य पाए और फिर उससे अपने जीवन को संसाधनों , सुविधाओं को खरीदे | व्यापारियों , उद्योगपतियों के मालो , सामानों की बिक्री से लाभ - मुनाफे के लिए आवश्यक ही है की वे अपने मालो , सामानों की बिक्री बाज़ार बढाये | इसी लक्ष्य से उत्पादन विनिमय को संचालित करे| यही वह हिस्सा है , जो बाज़ार - व्यवस्था का प्रबल हिमायिती है | उसका संचालक है | इसे आप इस तरह भी कह सकते है कि जंहा व्यापारी , उद्योगपति नही है या छोटे स्तर के है तो वंहा बाज़ार व्यवस्था नही है | अगर कंही व्यापारी व उद्योगपति अत्यंत छोटे स्तर के है तो इस बात का सबूत है कि अभी वंहा छोटे - मोटे बाज़ार तो है , पर बाज़ार व्यवस्था भी नही है | उदाहरण ---- आज से 100 - 200 साल पहले भारतीय समाज में खासकर ग्रामीण समाज में लोगो के आवश्यकताओ कि पूर्ति ग्रामीण समाज में मौजूद श्रम विभाजन से ही पूरी हो जाती थी | किसी ख़ास सामान के लिए ही उन्हें बाज़ार जाना पड़ता था |लेकिन आधुनिक बाज़ार व्यवस्था के आगमन के साथ बाज़ार का यानी खरीद - बिक्री केंद्र का विकास नगर , शहर , कस्बे से होता हुआ हर चट्टी - चौराहे तक फ़ैल गया है | हर आदमी खरीद - बिक्री कि प्रक्रिया से जुड़ गया है और अधिकाधिक जुड़ता जा रहा है |आधुनिक युग कि बाज़ार व्यवस्था ने हर किसी कि महत्ता महानता को चीन लिया है , कयोंकि हर तरह का हुनर , ज्ञान , अनुभव , बिकाऊ माल बन गया है | उसे पाने का लक्ष्य मालो , सामानों कि तरह ही उसकी खरीद - फरोख्त बन गया है |आज कोई आश्चर्य नही कि , मनुष्य का मूल्य उसके गुणों के आधार पर नही बल्कि खरीद - बिक्री की क्षमता के आधार पर किया जा रहा है |इस बाज़ार व्यवस्था का अनिवार्य पहलु यह भी है कि यदि किसी के पास बेचने के लिए कुछ भी नही है या जिसका श्रम - सामान बिकाऊ नही है तो उसके जीने का अधिकार भी नही है |फिर तो वह किसी के सहारे या फिर भीख - दान अथवा ठगी , चोरी के जरिये ही जीवन जी सकता है |बाज़ार व्यवस्था के वर्तमान दौर के विकास में यही हो रहा है |आधुनिक आर्थिक व तकनिकी विकास के दौर में साधारण श्रम और साधारण उत्पादन कि बाज़ार में मांग घटी जा रही है | या तो उनकी बिक्री ही नही हो पा रही है , या फिर उनका मूल्य इतना कम है कि उससे न तो उपभोग के सामानों को खरीदकर श्रम शक्ति का पुनरुत्पादन किया जा सकता है और न ही बढ़ते लागत के चलते उन साधारण मालो , सामानों का ही पुन: उत्पादन किया जा सकता है | साधारण मजदूरों , किसानो ,सीमांत व छोटे किसानो, दस्तकारो तथा छोटे कारोबारियों कि यही स्थिति है| वे बाज़ार में टूटते जा रहे है |
चूँकि वर्तमान दौर की बाज़ार व्यवस्था विश्व - बाज़ार व्यवस्था का एक अंग है | इसका संचालन व नियंत्रण देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से कर रहे है | उसे वे अपने जैसे लोगो के लिए या फिर अपने सेवको के लिए बाज़ार व्यवस्था को बदल रहे है |आम आदमी को उससे बाहर करते जा रहे है |बेकार , बेरोजगार , संकटग्रस्त होकर जीने और मरने के लिए छोड़ते जा रहे है |क्या यह बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण के जीवन- यापन कि उसके बुनियादी हितो कि विरोधी नही है ? क्या जनहित में देश व समाज कि व्यवस्था में जनसाधारण कि आवश्यकतानुसार बदलाव अनिवार्य , अपरिहार्य नही हो गया है ?
क्या इस देश के लोगो को इसपे सोचना नही चाहिए ..............!!
सुनील दत्ता ---- स्वतंत्र पत्रकार -- समीक्षक

Monday, November 23, 2015

मानव पूजी से ही होगा सबका विकास 24-11-15

मानव पूजी से ही होगा सबका विकास

स्वस्थ और सुशिक्षित नागरिक ही किसी देश के विकास की जमानत होते है | अर्थशास्त्र की शब्दावली में इसे मानव पूजी कहा जाता है | अर्थशास्त्र में , आम तरीके से उत्पादन के पांच साधन माने जाते है , जिसमे श्रम व पूजी दो महत्वपूर्ण सक्रिय साधन माने गये है | नोबेल पुरूस्कार विजेता अर्थशास्त्री थ्योडोर शुल्त्ज ने 1961 में पहली बार मानव पूजी का तसव्वुर पेश किया | अमेरिकन इकोनामिक रिव्यू के मार्च 1961 के अंक में प्रकाशित उनके आलेख में उन्होंने व्यक्ति की शिक्षा , प्रशिक्ष्ण , कौशल उन्नयन आदि पर किये जाने वाले सभी व्यव उसकी उत्पादकता कार्यकुशलता , तथा आमदनी में वृद्दि करते है | वही मानव पूजी की भूमिका के बारे में नोबल पुरूस्कार से सम्मानित अमेरिका के ही एक और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री गैरी बेकर ने कहा था कि मानव पूजी का आशय दक्षता , शिक्षा स्वास्थ्य और लोगो को प्रशिक्ष्ण से है | यह पूजी है क्योकि ये दक्षताए या शिक्षा लम्बे समय तक हमारा अभिन्न बनी रहेगी | उसी तरह जिस तरह कोई मशीन , प्लाट या फैक्ट्री उत्पादन का हिस्सा बने रहते है | किस्सा कोताह यह है कि सैद्दांतिक रूप से पूजी दो प्रकार है | पहली वो जो मूर्तरूप में दिखाई देती है -- भौतिक पूजी है | इस पूजी का उत्पादन कार्य में प्रत्यक्ष प्रयोग होता है | दूसरी , मानव पूजी जो मूर्तरूप से दिखाई नही देती लेकिन जो उत्पादन की गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों में वृद्दि करती है | उसमे श्रमिक के श्रम कौशल के साथ - साथ , स्वरोजगार करने वाले व उद्यमी का उद्यमिता कौशल भी शामिल होता है | बेकर कोरिया का उदाहरण देते हुए कहते है कि समूचा कोयला उत्तरी कोरिया में है , दक्षिण कोरिया में नही | कोरियाई युद्द से पहले उत्तरी कोरिया - कोरिया का अपेक्षाकृत समृद्द हिस्सा था | आज उत्तर कोरिया आर्थिक रूप से चरमराया गया है | जबकि दक्षिण कोरिया समृद्द लोकतांत्रिक देश के तौर पर उभरा है | मुझे लगता है कि दक्षिण कोरिया की समृद्दी इसीलिए है कि उसने अपनी आबादी की प्रतिभा को प्रोत्साहन देने और उसका उपयोग करने को लेकर खासा प्रयास किया | मतलब यह है कि मानव पूजी वह महत्वपूर्ण सम्पत्ति है , जिसके जरिये भौतिक संसाधनों की कमी के वावजूद प्रगति का रास्ता तेजी के साथ तय किया जा सकता है |
पिछले हफ्ते विश्व आर्थिक मंच यानी डब्लूईएफ द्वारा जारी ह्यूमन कैपिटल रिपोर्ट 2015 के अनुसार , 124 देशो की सूची में भारत मानव पूजी सुचांक में 57.62 अंक के साथ 100वे स्थान पर है | डब्लूईएफ द्वारा तैयार की गयी मानव पूजी रिपोर्ट के अनुसार भारत , न केवल ब्रिक्स देशो - रूस , चीन , ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रिका से नीचे है , बल्कि भारतीय उपमहादीप के उसके पड़ोसी देशो श्रीलंका , भूटान , तथा बाग्लादेश से भी नीचे है | मानव पूजी के दोनों आयामों - शिक्षा और स्वास्थ्य में भारत की हालत पतली है | हाल ही में साख्यिकी और कार्यक्रम कार्यन्वयन मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय ने 71 वे दौरे के सर्वेक्षण के आकडे जारी किये है | इस दौर का सर्वेक्षण ' सामजिक उपयोग शिक्षा ' विषय पर कराया गया था | इन आकड़ो के मुताबिक़ , ग्रामीण इलाको में साक्षरता दर 71 प्रतिशत है , जबकि इसकी तुलना में शहरी इलाको में यह 86 फीसदी है | साथ ही साठ वर्ष और उससे अधिक उम्र वाली साक्षर महिलाओं की तुलना में पुरुषो में अधिक साक्षरता देखी गयी |
यह तो रही सिर्फ साक्षरता की बात | ध्यान रहे , तकनीकी रूप से साक्षर होने में और वास्तविक साक्षर में बड़ा अंतर है | असलियत में अधिसंख्य साक्षर अर्धसाक्षर ही है | उच्च शिक्षा , जो की मानव पूजी का अहम् हिस्सा है , में भारत का प्रदर्शन काफी निराशाजनक है | आंकड़े बताते है कि ग्रामीण इलाको में 4.5 फीसदी पुरुषो और 2.2 फीसदी महिलाओं ने स्नातक या उससे अधिक स्तर की शिक्षा पूरी की है | वही शहरी इलाको में 17 प्रतिशत पुरुषो और 12 प्रतिशत महिलाओं ने इस स्तर तक शिक्षा पूरी की | मतलब साफ़ है आर्थिक विकास की नित - नई सीढिया चढ़ता भारत अभी भी उच्च शिक्षा के मामले में काफी पीछे है |
दूसरी तरफ , स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी कोई तसल्लीबख्श प्रदर्शन नही है | कुछ समय पहले ' सेव द चिल्ड्रन ' की विश्व की माओ की स्थिति पर जारी एक रिपोर्ट में भारत को दुनिया के 80 कम विकसित देशो में 76 वा स्थान मिला है | इस मामले में भारत कई गरीब अफ़्रीकी देशो से भी पीछे है | रिपोर्ट के मुताबिक़ , भारत में हर 140 महिलाओं में से एक पर बच्चे को जन्म के दौरान मरने का जोखिम रहता है | यह आकडा चीन और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशो की तुलना में कही अधिक है | चीन में हर 1500 महिलाओं में एक महिला पर प्रसव के दौरान मौत का खतरा होता है , वही श्रीलंका में यह आकडा 1100 पर एक और म्यामार में 180 पर एक है | ध्यान रहे की संयुक्त राष्ट्र की ' द पावर आफ 1.8 बिलियन ' नामक रिपोर्ट के मुताबिक़ , कुल जनसंख्या के मामले में हलाकि भारत चीन से पीछे है , लेकिन 10 - 24 साल की उम्र के 35.6करोड़ लोगो के साथ भारत सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है | रिपोर्ट में कहा गया है की अपनी बड़ी युवा आबादी के साथ विकासशील देशो की अर्थव्यवस्थाए नई उंचाई पर जा सकती है , बशर्ते वे युवा लोगो की शिक्षा व स्वास्थ्य में भारी निवेश करे |
अगर देश को दीर्घकालिक विकास के पथ पर ले जाना है तो इसके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रो में पहल तो करनी ही होगी | इस साल के बजट आवटन में इन क्षेत्रो को भारी अनदेखी हुई है | जाहिर है कि अगर मानव पूजी निर्माण करना है तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को और ज्यादा मजबूत और जिम्मेदार बनाना होगा | और ऐतिहासिक तौर पर यह स्वंय - सिद्द तरीका भी है |

Friday, November 20, 2015

अपना शहर - मगरुवा --- रहस्यमयी मुस्कान --- सत्ता के चिथड़ो में लिपटे मगरुवा 21-11-15

अपना शहर -
मगरुवा --- रहस्यमयी मुस्कान --- सत्ता के चिथड़ो में लिपटे मगरुवा
बहुत दिनों बाद हल्की ठढ का असर ,मौसम में गुनगुनाती धूप मजा दे रही थी , ऐसे में मुझे चाय की तलब महसूस हुई अपने स्टूडियो से निकल कर तिलोकी चाय वाले की दूकान की तरफ नजर दौड़ाया कुछ जाने - पहचाने चेहरे नजर आ रहे थे तलब ने कदम आगे बढा दिए स्टूडियो के बगल में पड़े कांक्रीट के पहाड़ो से गुजर कर आगे बढा देखा साथी दीप नारायन , बृजेश सिंह व वेद उपाध्याय पहले से गल - गौच कर रहे है मेरी नजर दीप पर पड़ी वो अपने होठो को दबाकर हल्की मुस्कान फेंक रहे थे उनके इस तरह मुस्कुराने में उनका अलग अंदाज है रहस्यमयी मुस्कान बहुत कुछ कह जाती है ऐसे में दिल के अन्दर उठ रहे गुबार को वो कभी - कभी छुपा नही पाते है और कह जाते है इसी बीच मगरुवा आ गया शायद उसे भी तलब थी चाय की मैं भी वहा पहुच गया और एक मुद्दे पे चर्चा शुरू ही किया था कि दीप का रहस्मयी मुस्कान बदस्तूर जारी था मैंने ही दीपनारायण को छेड़ दिया दीप गजब की मुस्कान मारते हो तब दीपनारायण बोल पड़े जाए देबा मजा मत ला हमने कहा ऐसी कोई बात नही तब तक मेरी नजर सत्ता के चिथड़ो में लिपटे मगरुवा पर पड़ी उससे कुछ पूछता मैं उससे पहले दीपनारायण का गुबार बाहर निकला और उन्होंने मुझसे कहा उनकी आवाज में जहा दर्द था वही आक्रोश भी झलक रहा था मैंने कहा कि दीप आखिर कहना क्या चाहते हो जो कहना चाहते हो वो बया कर दो वहा खड़े सारे लोगो के बीच ' दीप ने अपनी बाते शुरू की दुष्यंत की इन लाइनों ' कहते हुए कल मिला था नुमाइश में वो चिथड़ा ओढ़े हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है ' आज दीप का आक्रोश देखने लायक था वो अपनी रौ में बोल पड़े --- समाजवादी दो रँगे बैनर का चिथड़ा , ओढना कहना गलत होगा , लपेटे खड़ा था मगरुवा , दीप ने पूछा मगरुवा से , इसे क्यों लपेट रखा है तुमने ? ------ उसके चहरे पे कोई विषाद नही था , बड़े बेफिक्री से उसने कहा , इसे इसलिए ओढ़ रखा है कि''' साहब लोगो की निगाह पड़ेगी | वाह क्या बात है उसे पता है कि साहब लोगो को ' बदलते मौसम के साथ कौन सा रंग पसंद है | ' दीप आज मुड में थे कुछ कहने को वो मुखातिब हुए बृजेश सिंह की तरफ और बोले भाई इसे दो रँगे का अर्थ पता है , सत्ता के प्रतीक का चिथड़ा इसके काम आया कि नही , यह पूछना बेमानी है | उसकी बातचीत , उसके बारे में हमारी शुरूआती समझ से ज्यादा जटिल थी | दीप उसे देख रहा था और सातवे वेतन आयोग की सिफारिशो के आईने में उसकी तस्वीर बना रहा था , उसने मुझसे कहा कि मेरी सोच बेवकूफाना है शायद इसे किसी की फ़िक्र नही है , एक आदमी उसे छेड़ रहा था , यह काहिल है कुछ करना ही नही चाहता है ,..... वह बोल पडा लोग जाहिल है , जालिम है कुछ करने ही नही देते है --- जाने कितने धर्मो के प्रतीक मगरुवा ने अपने शरीर पर डाल रखे थे , दुनिया भर के लाकेट -- सिक्के -- माला -- चुल्ला चूड़ी और न जाने क्या - क्या |
दीप उसे बिडम्बना व विद्रूप का नगा साक्ष्य बता रहा था उसके साथ बहुत देर तक नही रहा जा सकता था | उसने भाप लिया | हम चलते इससे पहले मगरुवा चाल पडा यह कहते हुए कि सच्चाई गई बन में , सोचा अपने मन में | उसके जाने के बाद दीप ने कहा ' दादा ' सच्चाई के बन गमन की मगरुवा की उदघोषणा मेरी स्मृति में अब भी गूंज रही है ...............

लौकिक सम्पदा --- 20-11-15

लौकिक सम्पदा

अयोध्या के विशाल गौरवमयी साम्राज्य के अधिपति थे महाराज चक्कवेण | वे जितने रणकुशल थे , उतरने ही नीतिकुशल , न्यायनिष्ठ और दुआर भी थे | भगवान नारायण की भक्ति और सहज  उनका स्वभाव था | इतने बड़े साम्राज्य के अधिपति होते हुए भी वे एक साधारण -- सी कुटिया में रहते हुए अपनी गुजर - बसर करते थे | एक बार उनके महामंत्री ने उनसे अनुरोध किया -- ' महाराज अन्य  राजागण अपनी प्रत्येक क्रिया  में ऐश्वर्य का प्रदर्शन करते है  | इतनी ही नही , वे आपस की चर्चा में यह व्यंग्य भी करते है कि तुम्हारा  राजा दरिद्र है , जो एक साधारण -- सी कुटिया में रहता है | '  महामंत्री के इस कथन पर महाराजा चक्कवेण थोड़ी देर चुप रहे , फिर बोले -- ' मन्त्रिवर ,, आप दुसरो की ऐसी बातो पर ध्यान क्यों देते है ! वैसे सच है कि मैं एक अर्थ में दरिद्र ही हूँ , किन्तु एक अर्थ में वे महादरिद्र है | मैं अपनी तमाम लौकिक सम्पदा को अपनी प्रजा की सेवा में लगा चुका हूँ , परन्तु इसी के साथ मैंने सत्कर्म -- सद्भाव व सद्ज्ञान की सम्पदा पाई भी है | कोई इस सत्य पर विचार कर सकता हो तो कहा जा सकता है कि सेवा से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नही है | जब हृदयपूर्वक सेवा की जाती है , जब ह्रदय दुसरो के दुःख से दुखी होना सिख जाता है , तब एक नए व्यक्तित्व का जन्म होता है | पर दुःख से जब हृदय विदीर्ण  होता है , तब व्यक्तित्व की सीमाए भी विदीर्ण होती है | व्यक्तित्व में पनपती है एक परम व्यापाक्ता | स्वचेतना में प्र्म्चेतना समाती है | नारायण भक्त भी अपने भगवान की तरह व्यापक हो जाता है और ऐसे में निजी लाभ - लोभ की कामनाये चित्त से उसी तरह झड जाती है , जैसे कि पतझड़ आने पर पेड़ से सूखे प[त्ते | मेरे अंत: करण की स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है | ' महामंत्री उनकी बात ध्यान से सुन रहे थे | महाराज ने आगे कहा  - ; जैसे अन्य राजाओं को विलासिता - ऐश्वर्य  में सुख मिलता  है , उसी तरह बल्कि उससे कई गुना अधिक सुख मुझे जनजीवन की सेवा में मिलता है | सेवा में मिलने वाला प्रत्येक कष्ट मुझे गहरी तृप्ति देता है | हर दिन मेरे द्वारा जो भावभरे हृदय से सत्कर्म किये जाते है , मन से जनता की भलाई के लिए योजनाये बनाई जाती है उससे बड़ा तृप्त और कुछ नही |

Saturday, November 14, 2015

कानपुर का '' गरीबखाना '' 14-11-15

कानपुर का '' गरीबखाना ''
जहा सर्वधर्म समभाव बसता है --------
आधुनिकता के इस पागलपन भरे दौड़ में भी कानपूर में एक आशियाना ऐसा भी है जहा भारतीय परम्परा का सयुक्त परिवार सहेज कर रहा है उन मूल्यों को जो पारम्परिक है |
आपने मुसाफिरखाना , यतीमखाना और न जाने कौन - कौन से नाम सुने होंगे लेकिन मैं जिस '' गरीबखाने '' की चर्चा करने जा रहा हूँ वह जगह जहा भारतीय परम्पराओं के साथ जीवन को जीने की लयबद्दता के ताल - मेल को देखा |
जहा दुनिया अपनी परम्पराओं को छोड़कर आधुनिक तौर - तरीको में ढालने की कोशिश कर रही है | वही इस गरीबखाने में भारतीय संस्कृति में जीने वाले लोग एक मिशाल के तौर पर देखे जा सकते है आइये इस गरीबखाने के लोगो से रूबरू होते है , घर की सबसे बड़ी सदस्य माँ फिर पुरुष सदस्यों में सबसे बड़े सुभाष भइया, सुधीर जी , संजय जी इन भाइयो में सामाजिक ताने - बने से लेकर घर के ताने-बाने अदभुत संगम कम शब्दों में मनोभावों की अभिव्यक्ति से बात करते है वैसे ही घर की तीनो बहुए जो एक साथ बहनों की तरह रहती है ,इनकी भी कमेस्ट्री भी अदभुत लगी बाजार भी तीनो एक साथ रसोई में भी तीनो एक साथ यह लगा ही नही तीनो तीन घर से आई हो ऐसा लगा कि तीनो ने इस घर को परम्पराओ व संस्कृति की मजबूत डोर से बाँध रखा है आधुनिकता के लिए कोई स्थान ही न हो घर के बच्चे कुशल , कबीर , नानक सर्वधर्म समभाव का प्रतीक वही दो बेटिया इस चमन के खुबसूरत फूल एक है गेसू तो दूसरी नाजुक इनके बीच चार दिन जीने में इनके जरिये जाना जिन्दगी को इस तरह भी जिया जाता है कही नानक और गेंसू का आपस में प्यार भरा झगड़ा तो कही कबीर और नाजुक में झगड़ा पर वह भी एक दुसरे के प्रेम का प्रतीक इन लोगो के बीच बिताये वह सारे लम्हे स्मरणीय है |


Friday, November 13, 2015

दृढशक्ति -------------- 14-11-15

दृढशक्ति --------------


डोमनपूरा गाँव में रहने वाले दो छोटे बालक सुभाष व अनिल आपस में गहरे मित्र थे | एक रोज वे सुबह - सुबह अकेले बाहर खेलने निकल गये | वे खेलने में इतने मस्त थे कि उन्हें पता ही नही चला कि वे भागते - भागते कब एक सुनसान जगह पर पहुच गये | उस जगह एक पुराना कुआँ था | उनमे से अनिल भागते हुए गलती से उस कुए में जा गिरा | कुए में गिरते ही वह जोर - जोर से बचाओ - बचाओ की आवाज लगानी शुरू की सुभाष भी मदद के लिए आवाज निकालने लगा पर उस सुनसान जगह पर उन दोनों की आवाज सुनने वाला कोई नही था | इस वजह से उन्हें कोई मदद नही मिल पा रही थी | तभी कुए के पास खड़े सुभाष की नजर पास रखी बाल्टी और रस्सी पर पड़ी | उसने तुरंत वह रस्सी उठायी और उसका एक सिरा वह गड़े एक पत्थर से कास कर बांधा और दूसरा सिरा नीचे कुए में फेंक दिया | कुए में गिर अनिल ने रस्सी का सिरा पकड़कर अपनी कमर में लपेट लिया | अब सुभाष अपनी पूरी ताकत लगा कर आखिर कार अनिल को उपर खीच ले आया और अनिल की जन बचाने में सफल रहा | जब गाँव में जाकर उन दोनों ने यह बात बताई तो किसी ने भी उन पर यकीन नही किया | एक आदमी बोला -- ' तुम एक बाल्टी पानी तो कुए से निकल नही सकते , इसको कैसे बहार खीचा होगा ! तुम झूठ बोल रहे हो | ' इस पर एक बुजुर्ग ने उसकी बात काटते हुए कहा -- सुभाष और अनिल सच बोल रहे है हमे इनकी बात पर यकीन करना चाहिए | सुभाष इसलिए अनिल को निकाल पाया क्योकि इसके पास कोई दूसरा रास्ता नही था इसके अलावा वह इसे यह कहने वाला भी नही था कि ' तुम ऐसा नही कर सकते ' | कहानी का निष्कर्ष यही है कि जिन्दगी में सफलता पाने के लिए हमे ऐसे लोगो की बातो पर ध्यान नही देना चाहिए , जो कहते है कि ' तुम इसे नही कर सकते | ' दुनिया में अधिकतर लोग इसलिए सफल नही हो पाते क्योकि वे ऐसे लोगो की बातो में आ जाते है जो न खुद कामयाब होते है और न इस बात में यकीन करते है कि दुसरे कामयाब हो सकते है | इसलिए अपने दिल की सुने  | आप सब कुछ कर सकते है , जो आप करना चाहते है | स्वंय पर संशय करना छोड़े व सफलता की ओर बढ़े |

Tuesday, November 10, 2015

चालीस में पांच नदिया शुद्द है भारत की 11-11-15

चालीस में पांच नदिया शुद्द है भारत की
भारतीय संस्कृति का विकास नदियों के किनारों से हुआ है नदिया हमारी आस्थाओं का केंद्र है तो यह हमारे जीवन से जुडी है , कुछ स्थानों पे आज भी यह सिचाई का साधन है तो भारत के मल्लाहो की जीवन दायिनी है पूरे देश में गंगा , यमुना नदियों के प्रदुषण की चर्चा आये दिन होता रहता है इसके लिए देश के प्रधानमन्त्री से लेकर अन्य लोग सर फोड़ते है लेकिन एक ताजा अध्ययन बताता है कि देश की तमाम नदिया प्रदुषण की चपेट है | केन्द्रीय प्रदुषण बोर्ड
( सी पी सी बी ) ने देश की चालीस नदियों की प्रदुषण जांच कर दावा किया है कि सिर्फ दक्षिण भारत की चार एवं असम की एक नदी ही स्वच्छता के मानको में खरी उतरी है | बाकी 35 नदिया बुरी तरह से प्रदुषण की चपेट में है | इनमे सतलुज से लेकर साबरमती , तुंगभद्रा और दमनगंगा तक शामिल है |
सी पी सी बी ने2005 से लेकर 2013 तक के आकड़ो को आधार बनाया है | इस अवधि में 40 नदियों की 83 स्थानों पर निगरानी की जिसमे चार मानको का ध्यान रखा गया |
एक बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड ( बी ओ डी ) दूसरा , डिजाल्व आक्सीजन ( डी ओ ) तीसरा , टोटल कोलीफार्म ( टी सी ) तथा चौथा मानक टोटल डिजाल्व सॉलिड ( टी डी एस ) | मुल्त: बी ओ डी पानी में आक्सीजन को इस्तेमाल करने वाले तत्वों को दर्शाता है | जबकि डी ओ कुल आक्सीजन की मात्रा को | टी सी कुल बैक्टीरिया की उपस्थिति और टी डी एस पानी में मौजूद ठोस तत्वों को दर्शाता है | पानी में बैक्टीरिया की मात्रा ज्यादा - विभिन्न स्थानों की जांच में पाया गया है कि पानी की गुणवत्ता सबसे ज्यादा खराब इसमें कोलीफार्म बैक्टीरिया की मौजूदगी से हुई है | सिर्फ 11 फीसदी स्थानों पर ही कोलीफार्म बैक्टीरिया मानको के अनुरूप मिले |
बाकी जगहों पर यह तय मानक से ज्यादा थे | नियमो के तहत 100 मिलीलीटर पानी में इस बैक्टीरिया की संख्या 500 से ज्यादा नही होनी चाहिए | लेकिन अधिकतम संख्या यमुना के कई स्थानों पर 17 करोड़ तक पाई गयी है | इसी प्रकार 51 नमूनों में बी ओ डी की मात्रा ज्यादा पाई गयी जबकि 57 स्थानों पर डी ओ की अधिकता के कारण पानी की गुणवत्ता खराब निकली | इसी प्रकार 39 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता टी डी एस के कारण खराब थी | प्रति लीटर पानी में डी ओ 5 मिग्रा एवं बी ओ डी 3 मिग्रा प्रति लीटर या इससे ज्यादा होना चाहिए | जबकि टी डी एस की मात्रा 500 एम् जी से ज्यादा होनी चाहिए | सर्वेक्षण के दौरान सिर्फ पांच नदिया ही ऐसी निकली जिनका पानी मानक के अनुसार है और वही नदिया पूरे भारत में स्वच्छ है |

Monday, November 9, 2015

अर्पण 10-11-15

माँ से सुनी एक कहानी ----
अर्पण
बंगाल में एक सुविख्यात शक्तिसाधक हुए है , जिनका नाम था -- रामप्रसाद | उनकी साधना एवं भक्ति ने बंगाल के जन - मन को विभोर किया | उनके गाये गीत तथा उनके द्वारा कहे व लिखे गये भजन आज भी वहा के घर - घर में प्रेम से गाये जाते है | दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस भी उनके भजनों के बड़े अनुरागी थे | ऐसे परम अनुरागी भक्त के पास एक रोज एक युवा साधक का आना हुआ | उस युवा साधक का नाम था निशिकांत भट्टाचार्य |
वह युवक देखने में तेजस्वी प्रतीत होता था | वह दृढ - निश्चयी और देवी भगवती की साधना के प्रति समर्पित - संकल्पित था | परन्तु न जाने क्यों उसका मन बार - बार साधना से उचटता रहता | वह अपने मन को साधना में एकाग्र करने की भरसक कोशिश करता , पर कही न कही उसका ध्यान भटक जाता रोज पाठ करना उसका नित्य नियम था , उसकी दिनचर्या की प्रत्येक महानिशा या तो पाठ में गुजरती थी अथवा देवी - माँ की नामवली के जप में |
उसके स्वरों में आकुलता एवं विरह झलकता था | फिर भी उसके अस्तित्व के किसी कोने में गहरी पीड़ा छिपी थी | उसने आकर अपनी यह व्यथा रामप्रसाद जी को बताई | उन्होंने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी -- जानते हो तुम्हारी समस्या क्या है ? युवक द्वारा जिज्ञासा प्रगट करने पर उन्होंने कहा -- ' तुम युवा हो , भावुक हो , देवी माँ की कृपा को पाना चाहते हो | परन्तु समस्या यह है कि तुम्हारे मन - बुद्दी से सांसारिक लाभ - हानि का गणित अब तक गया नही है |
जगन्माता के चरणों में तुमने अपनी बुद्दी का अर्पण नही किया | बस यही कमी है | बुद्दी को अपनी आत्मा की अनुगामिनी बनाओ | जब तक तुम बुद्दी का समर्पण - रूपांतरण नही कर लेते , तुम्हारा चित्त यू ही उचटा रहेगा | जब तुम माँ के हो गये , तो फिर तुम्हारी बुद्दी उससे विलग क्यों है | अपनी बुद्दी को उसका बना लो | फिर सारी समस्या सुलझ जायेगी | '

एक अनोखा व्यक्तित्व --- 10-11-15

एक अनोखा व्यक्तित्व ---
1942 के भारत छोडो आन्दोलन के दौरान जब सारे प्रमुख नेता गिरफ्तार किये जा चुके थे तब अरुणा आसफ अली ने अपने निर्भीकता का परिचय देते हुए 9 अगस्त के दिन मुंबई के गवालिया टैंक मैदान में तिरंगा झंडा फहराकर अंग्रेजो को देश छोड़ने की खुली चुनौती दे डाली | इस महान योद्दा का जन्म 16 जुलाई 1909 को हरियाणा ( तत्कालीन पंजाब ) के कालका में हुआ था | लाहौर और नैनीताल से शिक्षा पूरी करने के बाद वह शिक्षिका बन गयी और कोलकाता के गोखले मेमोरियल कालेज में अध्यापन का कार्य करने लगी |
सेनानी आसफ अली से शादी करने के बाद अरुणा भी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रूप से हिस्सेदारी करने लगी | शादी के बाद उनका नाम अरुणा आसफ अली हो गया | सन 1931 में गाँधी इरविन समझौते के तहत सभी राजनितिक बन्दियो को छोड़ दिया गया लेकिन अरुणा आसफ अली को नही छोड़ा गया | इस पर महिला कैदियों ने उनकी रिहाई न होने तक जेल परिसर छोड़ने से इन्कार कर दिया | माहौल बिगड़ते देख अंग्रेजो ने अरुणा को भी रिहा कर दिया | सन 1932 में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया | वहा उन्होंने राजनितिक कैदियों के साथ होने वाले बुरे व्यवहार के खिलाफ भूख हड़ताल की जिसके चलते गोरी हुकूमत को जेल के हालत सुधारने को मजबूर होना पडा | रिहाई के बाद राजनितिक रूप से अरुणा ज्यादा सक्रिय नही रही लेकिन 1942 में जब भारत छोडो आन्दोलन शुरू हुआ तो वह आजादी की जंग में एक नायिका बनकर उभरी | गांधी जी के आव्हान पर 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने मुंबई सत्रमें भारत छोडो आन्दोलन का प्रस्ताव पास हुआ | गोरी हुकूमत ने सभी प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया | ऐसे में अरुणा आसफ अली ने गजब की दिलेरी का परिचय डिया | 9 अगस्त 1942 को उन्होंने अंग्रेजो के चाक - चौबंद व्यवस्था को धत्ता बताकर मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान में तिरंगा झंडा फहरा दिया

ब्रितानी हुकूमत ने उन्हें पकडवाने वाले को पांच हजार रूपये का इनाम देने की घोषणा की | वह जब बीमार पड़ गयी तो गांधी ने उन्हें एक पत्र लिखा कि वह समर्पण कर दे ताकि इनाम की राशि को हरिजनों के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा सके | उन्होंने समर्पण करने से मना कर दिया |1946 में गिरफ्तारी वारंट वापस लिए जाने के बाद वह लोगो के सामने आई |
आजादी के बाद भी अरुणा ने राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए बहुत से काम किये |

Sunday, November 1, 2015

सृष्टि में जो मंगल है , उसका अभिसिंचन - विस्तार हो | 2-11-15

सृष्टि में जो मंगल है , उसका अभिसिंचन - विस्तार हो |


श्रुतिधर ने देखा कि पुराने भवन में मकड़ियो ने जहा - तहा जले बन रखे है | पशुओ ने गोबर फैला रखा है | उन्हें लगा कि इसमें रहना तो नरक के  समान है |
उन्होंने भवन को अमगल कहते हुए उसका परित्याग कर दिया और समीप के गाँव में जाकर रहने लगे | निर्धन ग्रामवासी मैले - कुचैले वस्त्र पहनकर सत्संग में शामिल होते है , यह देखकर उनके मन में पुन: अकुलाहट भर गयी | श्रुतिधर ने गाँव को भी अमगल  कहकर उसका भी परित्याग किया और निर्जन वन में एकाकी कुटी बनाकर रहने लगे | रात शान्ति पूर्वक गुजरी | किन्तु प्रात: उठते ही उन्होंने कुटी के बाहर देखा कि जंगली जानवरों द्वारा आखेट किये हुए वन्य पशुओ की हड्डिया व रक्त के छीटे  इधर - उधर पड़े है |
उन्हें वन में भी अमगल  दिखा | तभी उन्हें सामने श्वेत सलिला सरिता दिखाई दी | वे कुटी का परित्याग कर उसे शीतल पयस्विनी के आश्रय में चले हए |
अंजली बाँध उन्होंने जल ग्रहण किया तो अंत: करण प्रफुल्लित हुआ | तभी उन्होंने देखा कि बड़ी मछली ने छोटी मछली पर आक्रमण  कर उसे निगल लिया |
इस उथल - पुथल से नदी के तट तक हिलोर पहुची , जिससे वहा  रखे मेढक के अंडे - बच्चे पानी में उतराने  लगे | तभी बहते - बहते किसी कुत्ते की लाश वहा आ पहुची |
यह दृश्य देखते ही उनका ह्रदय घृणा से भर गया | अब कहा जाए ? इससे तो अच्छा है कि जीवन ही समाप्त कर लिया जाए | अमगल से बचने का उन्हें यही उपाए शेष लगा |
श्रुतिधर ने लकडियो की चिता बनाई और प्रदक्षिणा कर उस पर बैठने ही वाले थे कि महर्षि वैशम्पायन का उधर से गुजरना हुआ | यह कौतुक देख उन्होंने श्रुतिधर से इसका कारण पूछा | श्रुतिधर ने पूरी व्यथा कह सुनाई |
सुनकर महर्षि हँसे और बोले -- ' चिंता में तुम्हारा शरीर जलेगा , तो उसमे भरे मल भी जलेगे , जिससे अमगल ही तो उपजेगा | ' ऐसे में क्या तुम्हे शान्ति मिल सकेगी ? श्रुतिधर कुछ ना बोल सके | तब महर्षि ने कहा -- ' सृष्टि में अमगल से मगल कही अधिक है | घर में रहकर सुयोग्य नागरिको का निर्माण , गाँव में शिक्षा संस्कृति का विस्तार , वन में उपासना की शान्ति और जल में प्रदुषण का प्रक्षालन , प्रकृति की प्रेरणा यही तो है |
सृष्टि में जो मंगल है , उसका अभिसिंचन - विस्तार हो |
जो अमगल है , उसका शुची - संस्कार किया जाए |

श्रुतिधर ने देखा कि पुराने भवन में मकड़ियो ने जहा - तहा जले बन रखे है | पशुओ ने गोबर फैला रखा है | उन्हें लगा कि इसमें रहना तो नरक के  समान है |
उन्होंने भवन को अमगल कहते हुए उसका परित्याग कर दिया और समीप के गाँव में जाकर रहने लगे | निर्धन ग्रामवासी मैले - कुचैले वस्त्र पहनकर सत्संग में शामिल होते है , यह देखकर उनके मन में पुन: अकुलाहट भर गयी | श्रुतिधर ने गाँव को भी अमगल  कहकर उसका भी परित्याग किया और निर्जन वन में एकाकी कुटी बनाकर रहने लगे | रात शान्ति पूर्वक गुजरी | किन्तु प्रात: उठते ही उन्होंने कुटी के बाहर देखा कि जंगली जानवरों द्वारा आखेट किये हुए वन्य पशुओ की हड्डिया व रक्त के छीटे  इधर - उधर पड़े है |
उन्हें वन में भी अमगल  दिखा | तभी उन्हें सामने श्वेत सलिला सरिता दिखाई दी | वे कुटी का परित्याग कर उसे शीतल पयस्विनी के आश्रय में चले हए |
अंजली बाँध उन्होंने जल ग्रहण किया तो अंत: करण प्रफुल्लित हुआ | तभी उन्होंने देखा कि बड़ी मछली ने छोटी मछली पर आक्रमण  कर उसे निगल लिया |
इस उथल - पुथल से नदी के तट तक हिलोर पहुची , जिससे वहा  रखे मेढक के अंडे - बच्चे पानी में उतराने  लगे | तभी बहते - बहते किसी कुत्ते की लाश वहा आ पहुची |
यह दृश्य देखते ही उनका ह्रदय घृणा से भर गया | अब कहा जाए ? इससे तो अच्छा है कि जीवन ही समाप्त कर लिया जाए | अमगल से बचने का उन्हें यही उपाए शेष लगा |
श्रुतिधर ने लकडियो की चिता बनाई और प्रदक्षिणा कर उस पर बैठने ही वाले थे कि महर्षि वैशम्पायन का उधर से गुजरना हुआ | यह कौतुक देख उन्होंने श्रुतिधर से इसका कारण पूछा | श्रुतिधर ने पूरी व्यथा कह सुनाई |
सुनकर महर्षि हँसे और बोले -- ' चिंता में तुम्हारा शरीर जलेगा , तो उसमे भरे मल भी जलेगे , जिससे अमगल ही तो उपजेगा | ' ऐसे में क्या तुम्हे शान्ति मिल सकेगी ? श्रुतिधर कुछ ना बोल सके | तब महर्षि ने कहा -- ' सृष्टि में अमगल से मगल कही अधिक है | घर में रहकर सुयोग्य नागरिको का निर्माण , गाँव में शिक्षा संस्कृति का विस्तार , वन में उपासना की शान्ति और जल में प्रदुषण का प्रक्षालन , प्रकृति की प्रेरणा यही तो है |
सृष्टि में जो मंगल है , उसका अभिसिंचन - विस्तार हो |
जो अमगल है , उसका शुची - संस्कार किया जाए |

Friday, October 30, 2015

वीतराग ------------- 31-10-15

वीतराग -------------
देवताओं की सभा में एक विवाद चल पडा | विषय था कि धरती पर ऐसा कौन सा - ऋषि है , जो बीतराग है , पूर्णत: राग - आसक्ति से परे है | नारद भी सभा में मौजूद थे | उन्होंने कहा कि ऐसे तीन ऋषियों को तो मैं जानता हूँ | ये है -- पर्वत ऋषि , कुतुक ऋषि व कर्दम ऋषि | ये तीनो प्रख्यात तपस्वी है | तय हुआ कि इन तीनो को परखा जाए | उर्वशी भी वही बैठी थी | वह हंसी और बूली कि जीवन भर हमने यही काम किया है और हमे ऋषिगणों की आसक्ति पर विजय को परखने का मौका डिया जाए | नारद ने कहा -- ' यह ठीक है | ' इससे तीनो की परीक्षा भी हो जायेगी और बीतराग ; की व्याख्या भी सभी की समझ में आ जायेगी | ' देवसभा में तीनो ऋषियों को आमंत्रित कर लिया गया | उर्वशी ने तय किया कि कुमौक नृत्य प्रस्तुत करेगी | संस्कृत में केचुल उतरने को कुमौक कहते है | कुमौक नृत्य का अर्थ होता है क्रमश: अपने वस्त्र उतारते जाना | पहले पर्वत ऋषि आये | नृत्य आरम्भ हुआ | इसे देखते ही वे बोले -- हमे यह दृश्य क्यों दिखा रहे हो ? बंद करो इसे | ' उर्वशी हंसी और बोली -- ये तो पहले प्रहार में ही चले गये | ' अर्थात वीतराग ' स्थिति ' में होते तो इन्हें कोई आपत्ति नही होती | नृत्य चलता रहा कर्दम ऋषि ने अपनी आँखे बंद कर ली , ताकि वह दृश्य न देख सके | उन्हें भी असफल माना गया | जो निरपेक्ष भाव से उस नृत्य को देख ले , वही वीतरागी हो सकता था जो आँखे बंद कर ले , वह कैसा बीतरागी ! वही कुतुक ऋषि प्रसन्न मन से नृत्य देख रहे थे | उन्होंने उर्वशी से कहा ' देवी तुमने तो कहा था कि कुमौक नृत्य दिखाओगी , एक - एक कर केचुल उतारोगी | वह तो तुमने अब तक दिखाया नही ? उर्वशी बोलो ' ऋषिवर आपके सामने ही सारे वस्त्र उतर दिए और आप कहते है कि नृत्य नही दिखाया ! क्या अब भी कुछ बाकी है ? ऋषि बोले -- हे उर्वशी , आत्मा पर भी तो पांच आवरण चढ़े है | अन्नमय कोष , मनोमय कोष प्राणमय कोष , विज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष | वह तो तुमने उतारे नही | अगर वह उतरकर दिखाती तो वस्तुत: आनन्द आता | तुमने पूरा नृत्य दिखाया होता तो ही तुम्हारे नृत्य की सार्थकता थी | पांचो आवरण तो हमे यथावत चढ़े दिखाई दे रहे है | '

पूण्य तिथि पर :सचिन देव बर्मन 31-10-15

पूण्य तिथि पर :सचिन देव बर्मन
'' काहे को रोये सफल होगी तेरी अराधना
दिया टूटे तो ये है माटी जले तो ये ज्योति बने
एक ऐसे सुर साधक व संगीत का चमकता ध्रुव तारा आकाश में पूर्णिमा के चाँद के साथ एक ही बार चमकता है त्रिपुरा के शाही घराने में चमका वो तारा सचिन देव बर्मन के रूप में सचिन दा का बचपन खेतो में लहलहाते सतरंगी आभा से सुनहले चमकते रंगों के बीच गेहू और धान की बालियों में गुजरता हुआ बढ़ता जा रहा था साथ ही गाँव के हम उम्र बच्चो के साथ धुल और मिटटी में जब भी खेलने जाते तो उनके कानो में गाँव के एक बूढ़े किसान के गाने की आवाज आती और वे खेल में ही उस गीत से अनायास जुड़ जाते | उस बूढ़े बाबा किसान के गाये गीत सचिन दा में रच बस गया था और वो अपने जीवन के बसंत पार करते हुए भी उस गीत को न भूल पाए और वो गीत सचिन दा के साथ ही उनके जीवन का प्रवाह बन गया और उनके अन्दर के संगीत के सात सुरों की लय को जगा दिया | और इसके साथ ही वो इस संगीत के महासागर में आ गये | इन्ही मार्मिक सुरों के छाव में महान संगीतकार सचिन देव बर्मन ने संगीत की दुनिया में कदम रखा | एक अक्तूबर सन 1906 में जन्मे कुमार सचिन देव बर्मन के दादा त्रिपुरा के महाराजा थे उनके पिता एक कुशल चित्रकार ,कहानीकार ,रंग शिल्पी , के साथ शात्रीय संगीत के ख्याति लब्ध संगीतज्ञ थे | शास्त्रीय संगीत की पहली तालीम सचिन दा ने अपने पिता से प्राप्त किया | सचिन दा ने लोक संगीत की विधा को अपने महल में रहने वाले दो मुलाजिमो से हासिल किया जिनके नाम माधव् और अनवर था | बचपन से ही बर्मन दा को बंगाल के मधुर लोक संगीत से गहरा लगाव था जिसकी झलक उनके गाये गीतों में साफ़ नजर आता है |
'' ओरे माझी मेरे साजन है उस पार मैं मन मार हूँ इस पार
ओ मेरे माझी अबकी बार ले चल पार
मेरे साजन है उस पार ''
सचिन दा ने इस गीत के माध्यम से उस सुहागन नारी के अन्तर मन की व्यथा को अपने स्वर से ऐसा सहेजा है कि लगता है ये व्यथा स्वंय सचिन दा का हो और वो उसमे डूब गये है | लहरों से जूझते माझी की पुकार ने सचिन दा की आत्मा पर गहरा असर किया |
नतीजा आज भी जब सचिन दा की आवाज आती है तो दिल को छू लेने वाली पुकार की तरह गुजती है |
पिता से शिक्षा प्राप्त करने के बाद सचिन दा ने कलकत्ता में उच्च शिक्षा में दाखिला लिया | सचिन दा के पिता चाहते थे कि दादा वकील बने पर सचिन दादा विदेश में पढ़े और वकील बने | पर सचिन दादा का पूरा मन सुरों के सत-- रंगी जाल में फंस चुका था | लिहाजा वो के सी दे के शागिर्द बन गये और इसके साथ ही रेडियो के लिए गीत गाने लगे |
1932 में उनकी मदभरी आवाज को पहली बार रिकार्ड में सुनाई दिया धीरे -- धीरे इस आवाज का नशा लोगो के जेहन में बसता गया | सचिन दादा लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत गायक के रूप में लोकप्रिय होते चले गये |
इसी दौरान उन्हें सौभाग्य से उस्ताद फैयाज खान , अलाउद्दीन खान और अब्दुल करीम खान , जैसे शास्त्रीय सुर स्तम्भों की सोहबत मिल गयी |
उसके कुछ दिनों बाद बंगला फिल्म में अपने आवाज का हुनर दिखाने का मौक़ा फिल्म '' बंदनी '' से मिला जिसके संगीतकार व मशहूर कवि क्रांतिकारी काजी नजरुल इस्लाम के निर्देशन में गीत गाया |
'' जैसी राधा ने माला जपी श्याम की ''
ठीक वैसे ही उनकी संगिनी ने जपी उनके लिए 1938 में उनकी शागिर्द मीरा दास गुप्ता सचिन दादा के जीवन में प्रवेश की मीरा दास की अहम भूमिका रही सचिन दा के जीवन में उनके संगीत निर्देशन https://www.youtube.com/watch?v=efeDjIA9nYI में गीत गया और सहायक संगीत निर्देशिका के रूप में सहयोग करना | 1939 में इस सुर संगम के मिलाप से राहुल प्राप्त हुए | राहुल देव बर्मन स्वंय बड़े संगीतकार थे | इसी दरमियाँ सचिन दादा ने अपने संगीत का दायरा बढाया और हिन्दी गीतों में कदम रखा |
'' प्रेम का पुजारी हम है रस के भिखारी
हम है प्रेम के पुजारी
'' तारो भरी रात थी
अपनी गली आबाद थी
बचपन की भोली बात थी
पहली -- पहली मुलाक़ात थी ""
''वो न आये फलक , उन्हें लाख हम बुलाये
मेरे हसरतो से कह दो , कि वे ख़्वाब भूल जाए ''
'' याद करोगे याद करोगे एक दिन हमको यद् करोगे
तडपोगे पर याद करोगे ''
'' चल री सजनी अब क्या सोचे
कजरा न बह जाए रोते रोते ''
'' सुन मोरे बन्धु रे सुन मोरे मितवा
सुन मोरे साथी रे
होता सुखी पल मैं तू अमरलता तेरी
तेरे गले माला बन के पड़ी मुस्काती रे ''
डा के गाये गीत जीवन के यथार्थ और संवेदन शीलता के चिरं को दर्शाता है जब सचिन दादा माँ की व्याख्या करते है अपने सुरों से
'' मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में
शीतल छाया तू दुःख के जंगल में
मेरी राहो के दीये तेरी दो अंखिया
गीता से बड़ी तेरी दो बतिया ''
तो सचिन डा सम्पूर्ण नारी जगत के उन सारे संवेदनाओ को उकेरते है \ आज के ही दिन यह निराला सुर साधक अपने अनन्त यात्रा पे चला गया और छोड़ गया अपना स्वर यह कहते हुए '' बिछड़े सभी बारी -- बारी अरे देखे जमाने की यारी
क्या लेके मिले अब दुनिया से
आँसू के सिवा कुछ पास नही
यहाँ फूल -- फूल थे दामन में
यहाँ काटो की भी आस नही
मतलब की दुनिया है सारी
बिछड़े सभी बारी -- बारी ---------------
ऐसे महान संगीत सुर साधक को उनके पूण्य तिथि पर शत शत नमन
-सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक

क्षमाशील 30-=10-15

क्षमाशील
अक्सर मैं अपनी माँ की गोद में सर रखकर उनसे कहानिया सूना करता था एक दिन उन्होंने मुझे यह कहानी सुनाई थी आज सोचा आप लोगो को साझा करूं
एक गाँव के जमीदार ने अपने यहाँ दस खूखार जंगली कुत्ते पाल रखे थे |
यदि वह किसी से नाराज हो जाए ओ उसे अपने इन्ही जंगली कुत्तो के आगे फिकवा देता था और वे उसकी बोटी - बोटी नोचकर उसे ठिकाने लगा देते | इसी वजह से गाँव के जमीदार का काफी खौफ था |
एक बार कुछ ऐसा हुआ कि जमीदार के एक पुराने विश्वासपात्र नौकर से कोई गलती हो गयी | इससे क्रोध में आकर जमीदार ने उसे उन शिकारी जंगली कुत्तो के आगे फिकवाने का आदेश दे डाला | नौकर बुद्दिमान व चतुर था | वह जमीदार के इस फरमान को सुन तनिक भी विचलित नही हुआ और विनम्र स्वर में बोला -- ' हुजुर आपका हुक्म सर - आखो पर | पर मैं दंड भुगतने से पहले दस दिन की मोहलत चाहता हूँ | ' जमीदार ने उसकी बात मान ली | दस दिन बाद जमीदार के अन्य सेवक उस नौकर को लेकर आये और खूंखार कुत्तो के आगे फेक दिए परन्तु घोर आश्चर्य ! कुते उस नौकर पाकर झपटने के बजाए उसके साथ किलोल करने लगे और पूछ हिलाते हुए उसके आगे पीछे घुमने लग | यह देखकर जमीदार समेत वहा मौजूद तमाम लोगो को बेहद आश्चर्य हुआ | जमीदार ने उस नौकर को अपने पास बुलाया और पूछा ' आखिर ये कुत्ते तुम्हे काटने के बजाए तुम्हारे साथ खेल कैसे रहे है ? ये क्या माजरा है ? मुझे सच - सच बताओ | ' हुजुर , मैंने आपसे जो दस दिन की मोहलत ली थी , उसका एक - एक पल इन बेजुबानो की सेवा में लगा दिया " मैं रोज इन कुतो को नहलाता , खाना खिलाता व हर तरह से उनका ख्याल रखता | ये जंगली कुत्ते खूंखार होने के वावजूद मेरी दस दिनों की सेवा को नही भुला पा रहे है , परन्तु खेद है कि आप मेरी दस वर्षो की स्वामिभक्ति भूल गये और मेरी छोटी सी गलती पर इतनी बड़ी सजा सूना दी | ' यह सुनकर जमीदार को अपनी भूल का एहसास हुआ , उसने नौकर को सजा से मुक्त कर दिया | कई बार हम किसी की बरसों की अच्छाई को उसके एक पल की बुराई के आगे भुला देते है | यह कहानी हमे

होना सिखाती है और बताती है कि हम किसी की हजार अच्छाइयो को उसकी एक बुराई के सामने छोटा न होने दे |

Tuesday, October 20, 2015

भारत का जवान भटका नही ------- २१-१०-१५

अपना शहर ---

भारत का जवान भटका नही -------
कैथी ( बनारस ) से वापस आने का मन बनाया था की यहाँ से रेल यात्रा करूंगा सो मैंने वल्लभा भाई से बोला इहा से नजदीक तो मऊ पड़ेगा सो रेल यात्रा ठीक होगा इसी बहाने डेढ़ किलोमीटर दूर रजवारी स्टेशन देखने को मिला , स्टेशन तो बहुत पुराना है पहले यह जगह काशी नरेश का बाग़ था बाद में उन्होंने यहाँ की जमीन रेलवे को दे दिया | रजवारी का स्टेशन अब फिर से नए स्वरूप में आने की तैयारी में है बनारस से पसिंजर आने में देर थी वल्लभ भाई भी साथ थे सोचा स्टेशन घूम लूँ इसी दौरान उनसे बात होने लगी नौजवानों पर मैंने बोला कि भाई अज का नौजवान तो भटका नही है देश की बूढी पीढ़ी की राह अचानक व्यर्थ हो गयी है |
हिन्दुस्तान ने पांच हजार सालो में जमीन पर चलने लायक रास्ता नही बनाया , स्वर्ग पर पहुचने के रास्ते खोजे | स्वर्ग पर पहुचने के रास्ते खोजने में हम पृथ्वी पर रास्ता बनाने भूल गये है |
वल्लभ भाई ने पूछा कहा जाता है कि भारत का जवान राह खो बैठा है | उसे सच्ची राह पर कैसे लाया जा सकता है ?
पहली यह बात ही झूठ है कि भारत का जवान राह खो बैठा है | भारत का जवान राह नही खो बैठा है , भारत की बूढी पीढ़ी की राह अचानक आकर व्यर्थ हो गयी है , और आआगे कोई राह नही है | एक रास्ते पर हम जाते है और फिर रास्ता खत्म हो जाता है , खड्डा आ जाता है | आज तक जिसे हमने रास्ता समझा था वो अचंब्क समाप्त हो गया हैऊ , और आगे कोई रास्ता नही है | और रास्ता न हो तो खोने के सिवाए मार्ग क्या रह जाता है ?
भारत का जवान नही खो गया है , भारत ने अब तक जो रास्ता निर्मित किया था , इस सदी में आकर हमे पता चला है कि वह रास्ता है नही | इसलिए हम बराही खड़े हो गये है | रास्ता तो तब खोया जाता है जब रास्ता हो और कोई रस्ते से भटक जाए | जब रास्ता ही न बचा हो तो किसी को भटकने के लिए जिम्मेवार नही ठहराया जा सकता | ज्वान्ब को रास्ते पर नही लाना है , रास्ता बनाना है | रास्ता नही है आज | और रास्ता बन जाये तो जवान सदा रस्ते पर आने को तैयार है , हमेशा तैयार है | क्योकि जीना है उसे , रस्ते से भटककर जी थोड़े ही सकेगा !
बूढ़े रस्ते से भटके , भटक सकते है | क्योकि उन्हें जीना नही है | और सब रस्ते -- भटके हुए रस्ते भी कब्र तक पहुचा देते है | इसी बीच वल्लभ भाई के गाँव के एक सज्जन मिल गये वो उनका हल चल लेने लगे और मैं इधर उधर देखने लगा तभी एक आधुनिक मगरुवा मुझे दिख गया उसके पास मैं चला गया कुछ बात चीत के सिलसिले में उसका पहनावा बड़ा ही रोचक लगा कान में बुँदे और हाथो में ,मोटे कड़े ,पैर में जूता भी कुछ अलग ही था | मैंने उससे पूछा भाई कहा रहते हो उसने बोला गुजरात में काम क्या करते हो बोला बाप दादे के जमाने से मछली का व्यापार है उसी में लगा हूँ कुछ और पूछने पे बताया की गुजरती लोग समुद्री मछली खाना पसंद करते है मैं बोल रहा अब धंधा थोडा मंदा है काहे कउ की अब बड़े व्यापारी लोग इसमें कूद पड़े है तो भी ठीक - ठाक है | मेरी बात अधूरी रह गयी ही सो मैं वापस अ गया और कहने लगा लेकिन्ब जिसे जीना है वह भटक नही सकता | भटकना मज़बूरी है उसकी | जीना है तो रास्ते पर होना पडेगा , क्योकि भटके हुए रस्ते जिन्दगी की मंजिल तक नही ले सकते है | जिन्दगी की मंजिल तक पहुचने के लिए ठीक रास्ता चाहिए इतने में ट्रेन आ गयी और हमने वल्लभ भाई से विदा लिया आने वाले कल के लिए जल्दी ही लौटूंगा कैथी |

Sunday, October 18, 2015

150 वर्षो की एक कहानी --- बाल साहित्य 19-10-15

अपना शहर --
150 वर्षो की एक कहानी
कल रात अक्टूबर का अहा जिन्दगी अंक पढ़ रहा था उसमे जितेन्द्र द्वारा एक लेख बहुत ही पसंद आया | इस वक्त मेरी सबसे छोटी बेटी श्रुति आई हुई है वो अपनी बड़ी बहनों से ज्यादा गंभीर है |उसने अचानक मुझे पूछा अच्छा बाबा आप बताओ यह बच्चो की कहानी में एक पात्र है ऐलिस आप उसे जानते हो ? संयोग ही था मैं उसी के बारे में पढ़ रहा था मैंने उससे पूछा तुम कैसे जानती हो ? उस पात्र को तब उसने बोला मेरे स्कुल की टीचर बता रही थी उसी ऐलिस को आज भी जिन्दा किये हुए है ''लेविस'' कैरल उसका कुछ अंश आप सबको साझा कर रहा हूँ |
150 वर्षो की एक कहानी
आज जब हम बाल साहित्य की बात करते है , तो बरबस हमारा ध्यान 1862 से पहले के उस साहित्य की ओर चला जाता है , जब वह नीति तथा नैतिकता के बंद गलियारों में कैद था और अक्सर बाल कहानिया यह सीख देने तक सीमित थी कि अच्छे बच्चो को कैसे होना चाहिए और खराब बच्चो को हमेशा अपने बुरे व्यवहार के लिए सजा क्यों मिलती है |
1865 में पहली बार ब्रिटिश साहित्यकार ''लेविस कैरल '' ने अपने पहले उपन्यास '' ऐलिसेज एडवेंचर इन वंडरलैंड ' से उस समय के बाल साहित्य को इन तमाम सीमाओं से बाहर निकाल कर न केवल उसे कल्पना के पंख लगाकर खुले आकाश में विचरण करने के लिए स्वतंत्रत कर दिया ,वरन इस विश्व प्रसिद्द उपन्यास के माध्यम से उन्होंने आधुनिक बाल साहित्य की भी नीव रखी |
4 जुलाई 1862 का वह ऐतिहासिक दिन , जब गणित के एक शर्मीले लेक्चरर चार्ल्स लुटविज डाजसन ( कैरल|का वास्तविक नाम ) अपने आक्सफोर्ड स्थित क्राइस्ट चर्च कालेज के डीन हेनरी लिडेल तथा उनकी तीन नन्ही - मुन्नियो बेटियों - एडिथ , लौरिना तथा ऐलिस के साथ टेम्स नदी में , जो आगे चलकर आईसि नदी में तब्दील हो जाती थी , नौका - विहार के लिए निकले | इस नौका विहार के दौरान ऐलिस ने बाल सहज उत्सुकता के साथ कैरल से कोई कहानी सुनाने का अनुरोध किया | ऐलिस के साथ - साथ उसकी दोनों बहने भी जब इस अनुरोध में शामिल हो गयी , तो फिर भला कैरल उन्हें कैसे निराश कर सकते थे | उन्होंने खुद ऐलिस को ही अपनी कहानी की नायिका बनाते हुए कहानी शुरू की ... वे रहस्य और रोमांच से भरी अपनी कहानी हाथ के हाथ गढ़ते जा रहे थे और बच्चो को सुनाते जा रहे थे | उन तीन बच्चियों के साथ - साथ उनके माता - पिता भी इस अदभुत कहानी में इस कदर खो गये थे कि उनमे से किसी को भी पता ही नही चला कि यह नौका - विहार कब खत्म हो गया था और इस तरह जन्म लिया एक ऐसी अनोखी दास्ताँ ने , जो पिछले डेढ़ सौ सालो से दुनिया भर के अनगिनत बच्चो का मनोरंजन करती आ रही है और जिसके माध्यम से अनजाने में ही कैरल ने आधुनिक बाल - साहित्य के एक गौरवशाली अध्याय की भी शुरुआत कर दी थी |
नौका विहार से लौटने के बाद ऐलिस के साथ - साथ उसके पिता हेनरी लिडेल ने भी डाजसन से अनुरोध किया की वे इस कहानी को उपन्यास का स्वरूप दे , ताकि दुसरे बच्चे भी इस कहानी को पढ़ सके | आखिर डाजसन अपनी इस कहानी को उपन्यास की पांडुलिपि का स्वरूप देने के इस आग्रह को टाल नही पाए , लेकिन उन्हें इसे लिखने में ढाई साल लग गया | उन्होंने न केवल यह कहानी लिखी वरन अपने हाथ से बीच - बीच में इसके चित्र भी बनाये |
खो गयी ऐलिस --
वह ऐलिस , जिसके लिए डाजसन ने नौका -- विहार करते समय यह अमर गाथा गढ़ी थी , बड़ी होकर शादी , परिवार तथा फिर गुमनामी के अँधेरे में कही खो गयी , लेकिन गणित के प्राध्यापक डाजसन के उपन्यास की सात वर्षीय नायिका ऐलिस , जिसने आज से डेढ़ सौ साल पहले एक खरगोश के बिल के मार्ग से एक हैरतअंगेज दुनिया में प्रवेश किया था , जहा एक मशरूम पर बैठा हुक्कापीता कैटरपिलर पूछता है की तुम कौन हो और जो इस अदभुत दुनिया में हैटर , सफेद खरगोश तथा ' आफ विद हिज हैड ' जैसे पात्रो से रूबरू होती है , दुनिया भर के बच्चे , जवान तथा बूढ़े पाठको के दिलो में आज भी ज़िंदा है |

लपोकियो की बहुतायत ---- 18-10-15

अपना शहर

लपोकियो की बहुतायत ----
बहुत दिनों से सोच रहा था चौक जाऊ आज अचानक मन बना कि चलते है देखते है इस वक्त क्या - क्या बदला है अपने शहर में , दुनिया आधुनिकता की ओर अगसर है अपना शहर भी बदल रहा होगा अपनी मोपेड उठाकर निकल गया अपने पुराने अड्डे ( बाटा ) के बगल में विजय रुई वाले के रॉक पे जाकर बैठा | वही बगल में मगरुवा मिल गया | मगरुवा आज कल रिक्शा चला रहा है कभी - कभी मस्ती में रिक्शा खिचता है और पल्लेदारी भी करने लगता है लगा पूछने दत्ता बाऊ बहुत दिन बाद देखात हउआ ? मैंने कहा हां यार नई आर्थिक नीति ने सबका व्यापार बैठा दिया है का करी अपना सुनाओ उसने बोला याद है बाऊ यही सिन्धी होटल के बगल में लारी चाय के होटल कईले रहने का मस्त जमाना रहे उ यहाँ बड़े कांग्रेसी , कम्युनिस्टी , समाजवादी अउर जिला के बड़े खेलाडी आवे अउर बैठे , याद करा इहा स्व बृज भूषण लाल श्रीवास्तव स्व काम ० तेजबहादुर सिंह जयबहादुर सिंह ,झारखंडे राय , बाऊ राम कुवर सिंह सीताराम अस्थाना , रामधन जी , मुक्तिनाथ उपाध्याय डी के दत्ता बी के दत्ता शाह शमीम और भी बहुत सारे नेता लोग अलग अलग समय में बैठते थे | उस समय दो या तीन पत्रकार थे बैरागी जी , पूरी जी और धर्मनाथ गुप्ता जिनकी प्रकाश आर्म्स स्टोर थी इसके साथ ही उस समय दैनिक आज के जिला संवाददाताथे वेस्ली कालेज के हिंदी के अध्यापक बाऊ मुखराम सिंह जी उस समय पत्रकारिता का जमाना था , बाद में महेश्वरी पाडे ने अख़बार देवल दैनिक निकला जो आजमगढ़ की पहली हिंदी दैनिक थी जो चर्चित रही | चौक में अख्खड़ समाजवादी विचारक बड़े भाई विनोद कुमार श्रीवास्तव मिल गये वो लगे बताने जानत हउआ की हमरे बाऊ जी स्व बृज भूषण लाल श्रीवास्तव लरिया के बना देहने सरवा के दुई दुकान करूंउने एक थे कचहरी में दुसर इहा पर लगने बतावे कि राज नरायण के भक्त बच्चा बाबु के सहायक जैसे लोग आजकल जयपाल रेड्डी के नाम से प्रख्यात है उनके विशेष गुणों में वो दिशासूल लोगो को ही अपने हाथो से बनाकर खाना खिलाते है भइया मगरुवा बोललस इह बात मगरुवा बोललस इह एक ऐसन नेता हउये चकाचक कुरता पहिने एक नेता जी देवी के बड़ा भक्त है उ मंदिरे के पास खड़ा होकर आते – जाते देवियों पे गहरी नजर डालेंते उनक्जे कुछ पुराने मित्र उनके घूरने की इस अदा पे उन्हें घुरा सिंह के नाम से पुकारते भी है लारी की दुकान टूटने के बाद स्व कैलाश रुगता की दुकान पर बैठकर बराबर उनको घूरते हुए आप देख सकते है | अब का बताई मगरू भइया तोहके पिछले समय में पूरा शहर अउर गल्ली सब एक दम सीमेंट के बनल रहनी तब नामी - गिरामी लोग नगरपालिका के चेयरमैंन होत रहने बच्चा बाऊ ( त्रिपुरारी पूजन प्रताप सिंह ) के पिता जी बाऊ सूर्य कुमार सिंह बीस साल रहने चेयरमैन --- ओकरे बाद उनकर माता जी श्रीमती भगवती देवी सात साल ड्योढी से अध्यक्ष के कार्य भार देखनी जमाना रहे भइया सबेरे – सबेरे भैसा गाडी कुल कूड़ा उठा ले , झाड़ू वाली सब शहर चिक्कन कर दे | आज इह स्थिति ह शहर के तीन – तीन मंत्री जी लोगन के रहले के वावजूद शहर के सडक पर चलल दुर्गति ह | कूड़ा से पूरा शहर बज - बजात ह पहिले के जमाने में जमादार रहने अब ठीकेदार कुडादार हउये फरक त पड़ी ना अब अपने दीनू भइया के ले ला तभी वहा बैठा रामदुलार पल्लेदार बोल पड़ा का बताई आपके साहब आज के चेयरमैन ‘’मुते ने कम हिलावे ने जादा ‘’सरवा आप देख आई जालंधरी बाजबहादुर गुलामी के पूरा सब जगह कूड़ा बिखरल बा सडक पे अउर गल्ली में अब इहके का बतावल जाई उसका सवाल सही था मैं करता क्या तब फिर वो बोल पड़ा आप त पत्रकार हउआ हमने कहा हाँ उसने पूछा काहे न आप लोगन लिखता कैसे लिखबा आप लोगन के बड़ा व्यापार बंद हो जाई दुनिया गरीबे के सतावे ले ओकर सुधि बहुत कम जनी लेवे ने | ओ समय कम्युनिस्ट पार्टी के बोलबाला रहे इहे चन्द्रजीत यादव नया – नया वकील बनल रहने दीवानी कचहरी में अउर कम्युनिस्ट पार्टी के नौजवान सभा के नेता रहने उनकी दोस्ती कोट मुहल्ले में कामरेड आले हसन और हरी कोयले जामा मस्जिद वाले से रहे | चन्द्रजीत यादव शुरू से थोडा नफासत पसंद नेता रहने उ भी आवे इहा सिन्धी के होटल पर चौक पर अलग अलग तीन राजनितिक गोल बैठत रहे |सिन्धी होटल पर साम्यवादियो की लारी के होटल पर मध्य मार्गियो की और प्रभु पंडित सनबीम से पहिले चाय की दुकान थी वहा पर समाजवादी खेमा बैठता था कभी कभी सारे दलों के लोग बैठ लिया करते थे इहा सूड फैजाबादी अउर प्रगतिशील शायर कैफ़ी भी अपनी महफिल जमाते थे सूड के हाथी का जन्म ठीक बाटा के सामने श्याम अग्रवाल की दुकान पर हुआ जो आज हमारे जिले के हास्य व्यंग के एक लौटे कम उम्र के कवि है | एक बुजुर्ग पत्रकार से एक वामपंथी ने पूछा कि आजकल अखबारों में आपके लेख नही आ रहे है तो उन्होंने तपाक से जबाब दिया जब से बिना किसी अख़बार में रहे लपोकी अपने को पत्रकार बताते है और प्रेस क्लब उन्हें पदाधिकारी भी बना रखा है तबसे पत्रकारिता से मन उचाट हो गया है

Saturday, October 17, 2015

अल हिल्लाज मंसूर --------- 18-10-15

अल हिल्लाज मंसूर ---------

अल हिल्लाज मंसूर को कत्ल किये जाने से नौ वर्ष पूर्व ही कारागार में बंदी बनाकर डाल दिया गया था | और वह अत्यधिक प्रसन्न था क्योकि उसने नौ वर्षो का उपयोग निरंतर ध्यान करने में किया | बाहर  तो वह हमेशा शोर - व्यवधान , मित्र , शिष्य , समाज , संसार और हजारो चिंताए थी | वह बहुत प्रसन्न था | जिस दिन उसे कारागार में बंद किया गया , उसने हृदय  से इसके लिए उस परमशक्ति  को धन्यवाद दिया | उसने कहा -- तू मुझसे इतना अधिक प्यार करता है , तभी तो तूने संसार भर से मुझे बचाने के लिए ही इतनी ऐसी सुरक्षा दी है कि वहा  अब तेरे और मेरे सिवा और कुछ भी नही बचा | तभी तो वैसा मुझे घटा , तभी तो उस मिलन में पिघल कर मैं  पूरी तरह से मिट गया |

वे नौ वर्ष अत्यधिक तल्लीनता के वर्ष थे | और उन वर्षो के बाद आखिर यह तय किया गया कि उसे कत्ल  किया जाना है , क्योकि इस सजा से वह जरा भी नही बदला , बल्कि उसके  विपरीत वह उसी दशा में और अधिक बढ़ गया | उसके आगे बढने की दिशा थी कि उसने यह घोषणा करना शुरू कर दिया -- ' मैं परमात्मा हूँ -- अनअलहक | मैं ही सत्य हूँ  | मैं ही अस्तित्व हूँ | '

उसके गुरु अल जुन्नैद ने कई तरह से उसे समझाने कि कोशिश  की -- ' तू इस तरह की चीजो की घोषणा मत कर . उस बात को अपने अन्दर ही रख , क्योकि लोग उसे नही समझेगे और तू अनावश्यक  रूप से मुसीबत में पड़ जाएगा | ' लेकिन यह मंसूर के वश के बाहर की बात थी | वह जब भी उस विशिष्ठ दशा में होता था , वह नाचना - गाना शुरू कर देता था | और वे वाक्य अथवा उसका गाना या कुछ भी कहना , अतिरेक से छलकते उदगार थे , जिन पर नियंत्रण करने वाला कोई था ही नही | जुन्नैद उसकी स्थिति को समझता था , लेकिन वह दुसरे लोगो की भी चित्त  दशा को भली भांति जानता था कि देर - सबेर मंसूर को धर्म विरोधी समझा जाएगा | उसकी घोषणा  -- '' मैं परमात्मा हूँ '' एक  तथ्य  था उसके पीछे उसका अनुभव ही यह घोषणा कर रहा था | इसलिए अंतिम रूप से यह निर्णय लिया गया कि उसे फाँसी पर लटका दिया जाए , उसे मृत्यु दंड दिया जाए |


जब वे लोग उसे कारागार की कोठरी  से बाहर निकालने  के लिए गये , तो बहुत मुश्किल उत्पन्न हो गयी -- क्योकि वह ' फना ' की रहस्यमय स्थिति में डूबा हुआ था | अब वह एक व्यक्ति नही रह गया था वह केवल शुद्दतम उर्जा पुंज था |


उस शुद्द उर्जा पुंज को बहार घसीट कर कैसे लाया जाए ? जो लोग उसे बाहर निकालने गये थे वे हतप्रद और मूक बने रह गये | उस अंधरी कोठरी में जो कुछ घट रहा था , वह इतना अधिक अदभुत था , वह  इतना अधिक प्रकाशवान था की मंसूर के चारो ओर से इस संसार का नही , जैसे कोई दैवी आभा मंडल घेरे हुए है | मंसूर वह एक व्यक्ति  की भांति मौजूद नही था | सूफियो के पास इस स्थिति के लिए दो शब्द है -- एक है ' बका ' और दूसरा है ' फना ' 'बका' का अर्थ होता है तुम अपनी अस्मिता को सीमाबद्द कर रहे हो 'फना' का अर्थ है की तुम अब पिघल रहे हो |   ---=----- ओशो ----------------- कबीर

अपनी माँ से सुनी एक छोटी कहानी याद आ गई ---- 18-10-15

अपनी माँ से सुनी एक छोटी कहानी याद आ गई ----

श्रमरहित - पराश्रित जीवन विकास के सारे  द्वार बंद कर देता है |

पुराणों  में एक कथा आती है  |  महर्षि वेदव्यास एक बार किसी राह से गुजर रहे थी , तभी उन्होंने एक कीड़े को तेजी से भागते हुए देखा | उन्होंने कीड़े से पूछा -- ' हे क्षुद्र जन्तु  , तुम इतनी तेजी से कहा जा रहे हो ? उनके इस प्रश्न ने कीड़े के मन को तनिक चोट पहुचाई  और वह बोला - ' हे महर्षि  आप तो ज्ञानी है | यहाँ क्षुद्र कौन है और महान कौन है ? क्या इस प्रश्न और उसके उत्तर की सही - सही परिभाषा सम्भव है ? ' कीड़े की इस बात ने महर्षि  को निरुतर कर दिया  |  फिर उन्होंने पूछा -- ' अच्छा चलो यह बताओ कि तुम इतनी तेजी से कहा भागे जा रहे हो ? इस पर कीड़े ने कहा -- मैं तो अपनी  जान बचाने के लिए भाग रहा हूँ | देख नही रहे कि पीछे से कितनी तेजी से बैलगाड़ी चली आ रही है | ' कीड़े   के उत्तर ने महर्षि को तनिक चौकाया और वे बोले -- ' पर तुम तो इस कीट योनि में पड़े हो | यदि मर गये तो तुम्हे दूसरा और बेहतर शरीर  मिलेगा | ' इस पर कीड़ा बोला -- महर्षि , मैं तो इस कीट योनि में रहकर कीड़े का आचरण कर रहा हूँ परन्तु ऐसे प्राणी तो असख्य है , जिन्हें विधाता ने शरीर तो मनुष्य का दिया  है , पर वे मुझ कीड़े से भी गया गुजरा आचरण कर रहे है | मेरे पास  तो शरीर ही ऐसा है कि अधिक ज्ञान नही पा सकता , पर मानव तो श्रेष्ठ् शरीरधारी है , परन्तु उनमे से ज्यादातर ज्ञान से विमुख होकर कीड़ो की तरह आचरण कर रहे है | ' कीड़े  की बातो में महर्षि को सत्यता नजर आई | वे सोचने लगे कि वाकई जो मानव जीवन पाकर भी देहासिक्त और अंहकार  से बंधा है , जो ज्ञान पाने की असीम क्षमता पाकर भी ज्ञान से विमुख है , वह कीड़े से भी बदतर है | महर्षि कुछ देर उस नन्हे जीव के कथन को विचारते रहे , फिर उन्होंने उससे कहा -- ' हे नन्हे जीव , चलो हम तुम्हारी सहायता कर देते है | ' किस तरह की सहायता ? ' कीड़े  ने पूछा | तब महर्षि बोले -- ' तुम्हे अपने हाथ में उठाकर मैं उस पीछे आने वाली बैलगाड़ी से दूर पहुचा देता हूँ | ' इस पर कीड़े  ने कहा -- ' आपका आभार मुनिवर , किन्तु श्रमरहित - पराश्रित जीवन विकास के सारे  द्वार बंद कर देता है | मुझे स्वंय ही संघर्ष करने दीजिये | इस संघर्ष में यदि मृत्यु भी हो गयी तो भगवान स्वंय ही मेरे लिए विकास के द्वार खोल देगे | कीड़े के इस कथन ने महर्षि को ज्ञान का नया संदेश दिया |

Friday, October 16, 2015

संसार की सबसे छोटी किताब 16-10-15

अपना शहर – 16-10-15
अपना शहर --
तिलोकी चाय वाले के इहा के बतकही ----
तिलोकी चाय वाले के दुकान पे सुबह की चाय पीने गया ,तो देखा दीप नारायण व बृजेश सिंह बैठे है | पहले से किसी गंभीर विसह्य पे दोनों चर्चा कर रहे थे मुझे देखते ही दीपनरायन ने एक हल्की सी अपने होठो पे मुचकी मारी बड़े मोहक अंदाज में कहा की आवा दादा सबेरे - सबेरे इ कैमरा लेकर कहा निकल गईला आज कौने मगरुवा के देखला मैंने दीप नरायण से बोला आज त गजब बात करत रहे मगरुवा उ कुछ लोगन के समझावत रहे की लोगन चौराहा देखले बाड़ा लोगन इहा के डी एम् साहब चका - चक चमका देहने तबले सरवा वही से जुम्मन मिया बोललस खाक चमका देहने दक्षिण में बड़ा नर्सिंग होम ह अउर उत्तर में नर्सिंग होम ह सब गाँव देहात के लोग जानत हउये ई लोगन मुरदा लोगन से पइसा ले लेवेने अउर त अउर एक ठे चौराहा के उदघाटन प्रगतिशील शायर जावेद अख्तर साहब कये देहने उनके का पता रहे कि लोगन मुरदा रख के पइसा बनावे ने , अब त मुडिया आम गरीबे के कटी ना मगरू भइया ! मगरू ने कहा यार उ सब राज काज ह , आज चल तोहके बताई की पढले - लिखले से का फायदा बा तबले बजरगिया बोललस मगरू भइया एक ठो चिलम के चुस्की हो जाए मगरुवा हँस देहलस अउर बोललस चल सारे बनाव | तभी सप्तपर्णी के सम्पादक समाजसेवी बृजेश सिंह बोले आज शिक्षा की स्थिति एक दम गड़बड़ होती जा रही है भाई साहब मैं तो तब दांग रह गया जब एक हिंदी से एम् ए पास लड़का शुद उच्चारण नही कर पाया न ही एक शब्द ढंग से लिख पाया उसी वक्त गांजे की चुस्की मार कर मगरुवा बोला संपादक जी यह नैतिक दायित्व केकर ह जरा बतावा आप हम त अपने संगियन के शिक्षा पे बता के आवत हइ ला सूना आप सारन अपने बाल - बचचन के पढ़ाव - लिखाव किताबन से दोस्ती कराओ सब लोगन कहेने कि पढ्बे लिखबे होबे नबाब | हाँ पढले से देश दुनिया के खबर मिली सब तरह के ज्ञान बढ़ी किताबन से दोस्ती कईले में बड़ा फायदा बा पहिला तोहरे शब्दावली मजबूत होई ओकरे बाद शब्दन के भंडार बढ़ी अउर लइका कुल इंटेलिजेंट होइए अउर अगर लडकन के दिल पढ़ी में न लगत बा त अपनी माई - बाऊ या बाबा - दादी से कहानी सुने |
कुछ मजेदार बात --
बुक शब्द की उत्पत्ति लाइबर शब्द से हुई है | यह लैटिन भाषा का शब्द है | इस शब्द का उपयोग रोमन लोग , लकड़ी और पेड़ की छाल के बीच पाए जाने वाले प्रदार्थ की पतली परत के लिए करते थे |

संसार की सबसे बड़ी किताब एटलस है | यह किताब ब्रिटिश म्यूजियम में है , जो कि 5 फीट 10 इंच लम्बी और 3 फीट 6 इंच चौड़ी है | जेफरी चांसर की पुस्तक कैटबरी टेल्स की मूल प्रति 46 लाख 21 हजार 500 पौंड की बिकी है |
इसा कीमती पुसतक की बिक्री लन्दन में8 जुलाई 1998 में हुई थी |
इसकी छपाई इंग्लैण्ड में 1477 में हुई थी |
लेविस कैरोल द्वारा लिखित एलिस एडवेंचर इन वंडरलैंड की किताब के पहले संस्करण की एक प्रति न्यूयार्क में 1.5 मिलियन में नीलाम हुई |
1865 में छपी इसा किताब के पहले एडिशन की आज सिर्फ 22 कापी मौजूद है |
अमेरिका के वाशिगटन डीसी में स्थित द लाइब्रेरी आफ कांग्रेस में 280 लाख किताबे है जिसमे 535 मील लम्बे शेल्फ किताबो को रखने के लिए बने हुए है इसके बाद लन्दन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में जहा 180 लाख किताबे है | का समझनी संपादक जी
संसार की सबसे छोटी किताब का नाम चेमिन डेला क्रुक्स है | इस किताब में 119 पेज है | यह दो इंच ऊँची और 1.33 इंच चौड़ी है |

Thursday, October 15, 2015

काशी के किसानो की दुर्दशा - घूरेलाल की पुकार अखिलेश भइया - मोदी बाबा कहा हउआ

अपना शहर -------

काशी के किसानो की दुर्दशा - घूरेलाल की पुकार अखिलेश भइया - मोदी बाबा कहा हउआ 

   चित्र में घूरेलाल

चेतगंज थाने  के सामने  घूमते  हुए मगरुवा को मुगलसराय क्षेत्र  के गाँव बबुरी का एक सामन्य किसान घूरेलाल फटेहाल मिल गया ,मगरुवा ने देखा वह सडक पर फेके कबाड़ को बीन  रहा है | मगरुवा  अपने उत्सुकता को नही रोक पाया , उसने उसे  अपने पास बुला लिया पूछा कहा घर है कब से यह काम कर रहे हो एक ऐसी वेदना भरी आवाज उसके कानो तक गूंजी की का करी मगरू भइया अधिया पे खेती करत रहनी महाजन के कर्जा से लद गईनी कउनो तरीके से महाजन से फुर्सत मिलल अब बनारस  में पांच बरिस से कबाड़ बीन के दुई बच्चा अउर परानी के  जियावत बानी उहो पे पुलिस और साहब  लोगन जिए न देत हवे | ऐसे न जाने कितने खेतिहर - किसान होंगे आम मजदूर बुनकर होंगे जिनकी रोजी व्यवस्था ने छीनकर कारपोरेट के हाथो में दे दिया | मगरुवा  को  अदम गोंडवी की कुछ लाइने याद आ जाती है |

बज़ाहिर प्यार की दुनिया में जो नाकाम होता है
कोई रूसो कोई हिटलर कोई खय्याम होता है

ज़हर देते हैं उसको हम कि ले जाते हैं सूली पर
यही हर दौर के मंसूर का अंजाम होता है

जुनूने-शौक में बेशक लिपटने को लिपट जाएँ
हवाओं में कहीं महबूब का पैगाम होता है

सियासी बज़्म में अक्सर ज़ुलेखा के इशारों पर
हकीकत ये है युसुफ आज भी नीलाम होता है

Tuesday, October 13, 2015

गंगा आरती में नये भगवान के अवतार ---------- 13-10-15

अपना शहर
साईत खराब --- जुठनालय

गंगा आरती में नये भगवान के अवतार ----------
आज सुबह जुठनालय बैठा था चाय पीने तभी संजय ने पूछा कब आये कल आप हमने बोला भाई रात के तब मैं बोल पड़ा गिरीश बाबा सच कहत रहने यार संजय बाबू खाली चर्चा कये देहले पे इह हाल अगर देख लेबा त का होई अब देखा परसों उ मगरुवा भी अपने बिटिया के लेके गएल रहे बनारस गंगा आरती देखावे अउर इम्तहान कराके लौट आई इहा से जात के सरवा लालगंज में बस के गेयर खराब हो गइल अब उ कंडेक्टर सर्व हमहने के पलटी मरलस दुसरे बस में फ़िलहाल पहुच गईनी ब्व्नारस ओकरे बाद टैम्पू से दशास्वमेध घाट पर उहा देखनी एक चबूतरा झक्क सफेद कुरता - धोती पहिनले छिनरो कजे ईगो पांडा बैठल बा मगरुवा पहुच गईल चबूतरा पे लगल चढ़े सर्व वही से बोलत ह इहा बैठे के खातिर गंगा मइया के पूजा करे के पड़ी अउर दक्षिना चढावे के पड़ी हमऊ भाई न बिटिया के बैठा देहनी अउर लगनी घाट के तरफ देखे सरवा इहा भी झोल बा सब मल्लाह सब नाव लगाके गंगा आरती के मछरी फंसाव थे और उ बबवा सरवा जोह: थ विदेशी पर्यटक कुछ देर बाद कुछ पर्यटक ओकरे चबूतरा पर चढने सर्व कहत ह ओपन यु शु और गिव टेन रूपी पूजा गंगा मैया ओकरे बात पर कउनो पर्यटक ध्यान न देत रहने तब्बे पीछे से एक ठउरा बोललस ऐ सारन से दस ठे कहे कहत हउआ सारन से पचास ठे बोला ओकरे बाद पाण्डवा सरवा जबरदस्ती करे लागल की गिव फिफ्टी रुपया तबले गंगा आरती शुरू हो गएल आरती भाव - विभोर करे वाला रहे पर आरती के आखरी में जब सब देवतन के जयकारा बोलल गएल वही में एक ठे नया भगवान के जोड़ देवल गएल ह यह समय बोली मुरारी बापू की जय का संजय बाऊ इ कौनो नया भगवान आयेल बाने का ------------- लौट्ले के गति इहु से ज्यादा भइल |

Monday, October 12, 2015

एक मुलाक़ात `-- विद्रोही दादी का शालीन विद्रोही पौत्र 13-10-15

अपना शहर ----- मगरुवा

एक मुलाक़ात `-- विद्रोही दादी का शालीन विद्रोही पौत्र
लिपि को लेकर मैं पहुचा आर्य कन्या कालेज वहा उसका एग्जाम था वो तो एग्जाम देने चली गयी अब समस्या बनी की एक बजे तक कहा बैठा जाए सो मैंने विजय से बोला चल यार बनवारी चाय वाले के यहाँ चलते है वही बैठकी किया जाए कुछ दूर पे ही बडौदा बैंक के नीचे छोटी सी गोमती में पिछले पचास सालो से चाय बेचते आ रहे है हम लोगो के प्यारे बनवारी भइया उनकी भी कहानी अजीब है | वहा पर पहले से बैठा मगरुवा अचानक मेरी तरफ मुडा बोला बड़े दिन बाद आवत हउआ दत्ता बाबू हमने कहा हां यार का करी और सुनावा मगरू भाई मगरुवा बोललस देखत हउआ बनवारी भइया के इहो आजमगढ़ के रहे वाला हउये मेहनगर के जवानी के दिने इह आयेल रहने तब चाय बेचत रहने एक रुपया आज पचास साल बाद उहे चाय बेचत हउये पाच रुपया में बाऊ बतावा एसे कैइसे गुजर करत होइए बनवारी भइया तबले बनवारी भइया बोलने का करी यार मगरू सरवा '' अमीर - गरीब - भिखारी सबकर एकके गती बा बनावे वाला सरवा बुजरो के .. अपने हिसाब से बनइले बा यार इह सब पिछले जन्म के भोग लिखल ह | छेना फारे वालन के अंत उनकर गांड फार के देवेला ऊपरवाला का समझल ला मगरू भइया सरवा चैन कहा मोदी भइया के जमाने में देखत हई बवाले - बवाले बा अभी तलक मूर्ति विसर्जन न भइल देखा अदालत का फैसला देवे ला | मगरुवा लम्बी साँस खीचकर बोला सही बोलत हउआ बनवारी भइया तू अब देख ला काशी में नवरात से विजय दशमी ले कभी सरवा नाटी इमली के भरत मिलाप त कहि वही में मुहरम बा फिर दुसरे दिने नकटईया पर मेला लगी | तभी आ गये वल्लभ भाई उनको देखकर मगरुवा बोल पड़ा का गुरु इत्ते दिन कहा रहला कबो एहर देखत न रहला लगल बतावे मगरुवा दत्ता बाबू वल्लभ भाई कैथी के रहे वाला हउये तोहके पता है इनकर दादी जी गजबे विद्रोही रहनी जाति - बिरादरी से उपर रहनी उ ई सब ना मानत रहनी | वो समय जब पूरा समाज रूढी से जकड़ रहल तब इनकर दादी अपने घर के बर्तन में सब बिरादरी के खाना खिवावे उहे असर वल्लभ भाई के परल बा इहो क्ब्वो गंगा सफाई अभियान कब्बो पर्यावरण त कबो शिक्षा के साथ किसानन के समस्या पे लड्त रहेने मगरुवा बोललस तोहके पता ना होई इनकर गाँव कैथी ऐतिहासिक गाँव ह | ऊहा के मार्कंडेय महादेव बड़ा महत्व रखेने और इनके गाँव से शेरशाह सूरी के जमाने में पक्की सडक बनल रहल मगरुवा की बात सुनकर वल्लभ भाई हँस रहे थे और कहे ना यार सब चलत ह केहू के त आगे आवे के पड़ी ना तबले मगरुवा बोल्लसा गुरु तोहहरे दें बा की एन एच सीधी हो गइल न त कितने गरीबन के घर - सनासर उजड़ जात गुरु तू त विद्रोही दादी के शालीन पौत्र हउआ ------------------- जय हो महादेव

Friday, October 9, 2015

वाह रे जुठनालय तेरी भी कहानी बड़ी अजीब है 9-10-15

अपना शहर
मगरुवा पहुच गया जुठनालय -------


वाह रे जुठनालय तेरी भी कहानी बड़ी अजीब है
अतीत से वर्तमान का संवाद ------
वाह रे जुठनालय तेरी भी कहानी बड़ी अजीब है यह जुठनालय कभी पुराने स्टेट बैंक के पास हुआ करता था पिछले पचास बरस से रैदोपुर में है | जूठन से जब कोई ग्राहक मिठाई की शिकायत करता तो जूठन बड़े प्यार से कह देते थे अरे राजा साहब हमार करेजवा ले ला हो तोहके हम खराब मिठाई खियाईब ----
जुठनालय की पहली टेबल बहुत ही महत्वपूर्ण है यह टेबल अतीत में घटे घटनाओ का साक्षी है उन्ही इतिहास के पन्नो में अतीत से लेकर वर्तमान तक के बातो का सिलसिला चल निकला जब केशव बाबा दिल्ली से आजमगढ़ आये उस संवाद में दीपनारायण के साथ स्वंय मैं भी शामिल था मस्त दिखे केशव बाबा वही पुराणी ठेट मुस्कराहट और अंदाज वही पुराना साथ में उनका पुत्र भी था आजकल वो भी अख़बार में है | संजय ने अतीत को कुरेदा कभी इस टेबल पर दक्षिणपंथी आदरणीय कलराज प्रखर समाजवादी विचारक आदरणीय मोहन सिंह - पूर्व सांसद हर्षवर्धन समाजवादी विचारक के साथ जनसत्ता में सम्पादक रहे श्री रामबहादुर राय समाजवादी धारा के पथिक व वर्तमान में काग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव मोहन प्रकाश काशी हिन्दू विश्विद्यालय के प्रखर अध्यक्ष रहे चंचल भाई , गोरखपुर विश्व विद्यालय के ओजस्वी नेता पूर्व विधायक जगदीश लाल , और अतीत के बचे लोगो में मधु लिमये व जार्ज के सहयोगी रहे विजय नारायण जी प्रयाग विश्व विद्यालय के पूर्व अध्यक्ष बड़े भाई रामाधीन सिंह एवं सर्वोप्रिय आदरणीय बलराम यादव व बड़े भाई यशवत सिंह भी इस मिनी संसद के सक्रिय सदस्यों में रहे है |
मगरुवा ने तपाक से पूछा संजय बाबू तब में आज में का अंतर बा बतावा जरा संजय बड़ी तेज हँसने ओकरे पहिले गिरीश बाबा जे कर्मचारी यूनियन के सयोजक हऊये फट्टे बोल देहने पहली कलराज मिश्र इह बैठत रहने अब राघवेद्र मिश्र बैठत ह पाहिले रामप्यारे उपध्याय बैठते थे अब वेद उपाध्याय पहिले स्व० राधेश्याम यादव बैठते थे अब दीना यादव डेरा जमाते है मगरू तोके पता ह की न इहा एक जनी ऐसन बैठे ने जे के अगर सुबह देख लेएहला तो दुनिया के साईत खराब हो जाई |

Thursday, October 8, 2015

जो भट्टियों की आग के हरीस थे ------- 9-10-15

अपना शहर --------
मगरुवा आज घर पे ही था आज पंचायत चुनाव की पहली प्रक्रिया शुरू हो गयी है | गाँव के लोगो से उसने सुना बहुत से जगहों पे अभी समय ही नही हुआ है चुनाव कराने का लोग हाईकोर्ट तक गये है | आगे क्या फैसला आता है ,वह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है | विचार करता है मगरुवा यह चुनाव पहले भी होता रहा शहर तक चर्चा बहुत कम होती थी , इसकी गाँव में भी कौड़े पर ही फैसले हो जाते थे , अब आवारा पूजी ने इसे भी बाजार बना दिया , पोस्टर - पम्पलेट दारु - मुर्गा शराब के साथ अब यह चुनाव लड़ा जा रहा है | गाँव में भी चुनाव का कोई मुद्दा नही रह गया है बहुत से लड़ने वालो से मगरुवा ने बात किया उनके पासव न ही विचार है न ही कोई विकास का माडल वो कैसे अपने गाँव को माडल बनायेगे सब चुनाव लड़ने वालो ने कहा भइया अब चुनाव के तरीका बदल गयल हमने चुनाव जीत लेब शायद वो लोग सही बोल रहे थे कल ही अमरउजाला में मगरुवा ने पढ़ा था | पल्हनी क्षेत्र के किसी उम्मीदवार का भतीजा चुनाव से पूर्व गायब है अगर यह राजनीति प्रेरित है तो अब आम आदमी को सोचना जरूरी है की अब गाँव कितना खतरनाक मोड़ पर पहुच रहा है | उसे किसी कविता याद आ जाती है |
हमारे गाँव लुहार अब दरांतियाँ बना के बेचता नहीं
तो जानता है फस्ल काटने का वक्त कट गया सरों का काटने के शक्ल में
शरल में वो जानता है बाँझ हो गई जमीन जब से ले गए नकाब पोश गाँव के मवेशियों को शहर में जो बरमाला सदाएँ के खुश्क खून बेचते है बे-यकीन बस्तियो के दरमियाँ
उदास दिल खमोश और बे-जबाँ कबाड़ के हिसार में सियाह कोयलों से गुफ़्तुगू
तमाम दिन गुज़ारता है सोचता है कोई बात रूह के सराब में
कुरेदता है ख़ाक और ढूँढता है चुप की वादियों से सुर्ख़ आग पर वो ज़र्ब
जिस के शोर से लुहार की समाअतें क़रीब थीं
बजाए आग की लपक के सर्द राख उड़ रही है धूँकनी के मुँह से
राख जिस को फाँकती है झोंपड़ी की ख़स्तगी
सियाह-छत के ना-तवाँ सुतून अपने आँकड़ों समेत पीटते है ंसर
हरारतों की भीक माँगते हैं झोंपड़ी के बाम ओ दर

जो भट्टियों की आग के हरीस थे
धुएँ के दाएरों से खेंचते थे ज़िंदगी
मगर अजीब बात है हमारे गाँव का लुहार जानता नहीं
वो जानता नहीं कि बढ़ गई हैं सख़्त और तेज़ धार ख़ंज़रों की क़ीमतें
सो जल्द भट्टियों का पेट भर दे सुर्ख़ आग से --- अली अकबर नातिक़

अपनी खुद्दारी को झुकने नही दिया मसान ( श्मशान ) पर लाश फूकने का काम किया ----- 8-10-15

अपना शहर ----



अपनी खुद्दारी को झुकने नही दिया मसान ( श्मशान ) पर लाश फूकने का काम किया -----
मगरुवा आपको ले चलता है पुरानी कोतवाली उससे पहले मैं चलता हूँ बौरह्वा बाबा के स्थान पर यह स्थान नया उदासीन अखाड़े के रूप में जाना जाता है | मगरुवा पहुचता है सोच कर कि आज बाबा के हाथो से बना नए मॉल की चुस्की मारेगा और हुआ भी वही बाबा ने जब आग जलाई वहा का माहौल अलग तरह का बन गया ,पूरा वातावरण सब अलग सा दिखने लगा मगरुवा वहा से उठा और अपने साइकिल से वापस लौट रहा था अपने ठीहे पे ऐसे में उसके मन में इसी शहर का एक चरित्र घूम रहा था बार – बार नेक दिल इन्सान – अन्याय के विरुद्द लड़ने वाला कभी – कभी झूठ भी बोल लेता है कब वो क्या बोलेगा उसे खुद पता नही लेकिन गजब का व्यक्ति अपने सबसे बुरे दिनों में उसने अपने वसूलो को नही छोड़ा उसने ठाना था कुछ भी करूँगा पर अपराध नही करूंगा और उसने अपनी बातो को सिद्द किया | आइये मिलते है उस मेन्टल केस से मैंने इस लिए इस शब्द का प्रयोग किया आज के जमाने में ऐसे आदमी को इसके आलावा कोई और उपाधि समाज नही दे सकता , मेरी जो छोटी सी समझ कहती है आज समाज का चरित्र पूरी तरह से बदल गया है |
नाम है उसका विजय लोग उसे बाबा के नाम से जानते है यह चरित्र यथार्थ में मौजूद है उसकी जुबानी उसकी बानी सुनिए अब वह पेशे से वीडियो फोटोग्राफर है |
विजय ने गाजे की भरी सिगरेट का जब दो कश मारा तो बोल पड़ा अब छक्का मार दिया और अपनी धुनकी में कह दिया की अब का बताई तोहके – का भयल रहे ? कैसे सर में चोट लगी थी लग गया था जब मैं ठीक हो गया तो बाबूजी ने कहा की अब ठीक ठाक हो गये हो अब क्या करोगे ? हमने अपने पापा से एक लेटर लिखवाया कि आप लिख दीजिये की मैं आपका बेटा नही उनसे पत्र लिखवाकर मैं जौनपुर अपनी ससुराल गया वहा का हाल चाल लिया , उसके बाद मैंने अपने ससुर से सारी बाते बताई और कहा कि मैं बनारस जा रहा हूँ ससुर जी ने मुझे चार सौ रूपये दिए और मैं उन रुपयों से अपने जीवन के नए संघर्ष के रस्ते पर निकल गया बनारस पहुचकर मैं मौसा के यहाँ एक सप्ताह रहा और वो पत्र भी दिखाया , तब मौसा ने कहा काम ओम खोजो मैं पूरे शहर में काम खोजने निकला जहा भी जाता वही पर सरवा गारंटी मांगते भला मैं बनारस में कहा से गारंटी देता |
एक दिन मैं हरिश्चन्द्र घाट पहुच गया , वहा बैठ गया सोचने लगा कि क्या करू , जहा – जहा शहर में काम मांगने जा रहा हूँ वह पर जमानत मांग रहे है | मैंने यहाँ तक सोच लिया था की साला अगर होटल में बर्तन भी माजे के पड़ी त उहो काम कर लेब|, मगर भोसड़ी के हमार किस्मत दूसरे दिन पहुच गईनी हरिश्चन्द्र घाट पर एक किनारे बैठ गईनि लगनी सोचे अब का करी समझ में ना आवत रहे उलझन रहे सरवा कौनो मोके कामो ना देत हउये , का करी समझ में इहे आइल की यही मशाने में भोले बाबा के साथे रह लेइ |
साले के का करी कमवे सारे के कमवे ना मिलत रहे , फिर कुछ देर बाद चचा उठनी गईनी इकठे डोमडा के गोमती पर पूछनी काम मिली का उ बोललस इहा के काम कर लेबा काम त ह हमऊ सोचनी चला जियले के खातिर जिन्दगी से लड़े के खातिर इहो काम कईले में कउनो फर्क ना चोरी – चमारी ना न करत हई साले के मुर्दवे फूंके के ह ना एकरी बहिन --- सारे के इहे काम पकड लेइ |
डोमडवा से इह कह के की कल से आ जाइब गयनी मौसा के घरे आपन कपड़ा सपडा ले लेइ मौसा मिल गईने कहनी उनसे काम मिल गयल बा चल थई |
कल से मौसा पूछने कहा मिलल काम बिना जमानत के काम कहा मिल सकत ह बिना जमानत के काम मुरदहवा घाट पर ( हरिश्चन्द्र घाट ) मिल गयल ह मौसी खड़ी रहे वही कहलस ऊहा कम करबा अब हमऊ कहनी त का करी का हमार दादा – परदादा त कउनो फैक्ट्री छोड़ के न गयल हउये की उहा चल जाई मौसी बोलनी जो तोके मन करे जहा मन करे जो ,हमऊ निकल के चल अईनी मुरदहवा घाट पर काम शुरू कइनी , वह से शुरू हुआ फिर मेरे संघर्षो की कहानी का एक नया पन्ना मैं उतना पढ़ा लिखा था नही करता क्या मगरुवा सोचने लगा यहाँ भी व्यापार -------------------------------जहा पर लोग कहते है मुक्ति है बड़े – बड़े ज्ञानी - ध्यानी जोगी – महात्मा यही तो कहते फिरते है आइये आगे बढ़ते है विजय की तरफ मगरुवा त साला पागल है पता नही कब क्या सोचेगा इधर विजय अपनी धुनकी में कहता रहा जानत हउआ हम लगली सोचे चला इहु लाशंन के व्यापार माने मुरदा फुकले में कईसे धंधा करेने सब डोमडवा , एक नये व्यापार के नयी जानकारी घाट के एक डोमडे का नौकर बन गया | जानत हउआ चचा सारा कबो – कबो सोची की ईमानदारी के फल इतना मीठा बा लेकिन इहा भी सारा बेईमनिये बा जहा लोग आके गंगा मइया में तिरोहित होने पता ह तोहके इहा साला महापत्तर के भी कमिशन फिक्स बा एक लाश पर करीब आठ सौ से हजार रुपया मार देवेने कुल , अपने संघर्ष के दिनों को याद करता है बोलता है पता ह तोहके केतना मिलत रहे
ओ मुरदहवा घाट पर पर एक लाश जलाई त पच्चीसव रुपया ,टिकटी लगे बॉस पाच बाँस देहले पर पाँच रुपया अउर लाश के जरले के बाद ओकर बचल बोटा डोमडा के घरे ले पांच बोटा के पन्द्रह रुपया मिलत रहे चचा सब दिन भर में साठ रुपया मिल जाए एक दिन में , मगरुवा का हृदय काप सा गया क्या इसी के लिए हमारे क्रांतिवीरो ने अपने प्राणों की आहुती दी थी मगरुवा सोचता है | उन क्रांतिवीरो को जिनका हम नाम तक नही जानते . जिन्होंने अपना वर्तमान हमारे भविष्य के लिए बलिदान कर दिया |