Wednesday, September 18, 2019

चम्पारण बगावत

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी

चम्पारण बगावत

12 वी रेजिमेंट के सिपाही रंगी खान को 4 जून 1857 को होम्स ने फांसी पर लटका दिया | 23 जुलाई 1857 की शाम से चम्पारण जिले के सुगौली में घुड़सवार पलटन ने बगावत शुरू कर दिया | बागी सैनिको के साथ मेजर होम्स ने चूँकि बहुत जुल्म किये थे , इसलिए घुड़सवार रेजिमेंट के सिपाहियों ने होम्स को ठिकाने लगाने के लिए कसम खा ली थी | 23 जुलाई शाम को जब मेजर होम्स अपनी बीबी दी नासेल और दोस्त डा गार्नर्र के अलावा डाक्टर के लड़के और पोस्टमास्टर विनीट के साथ अपने घर पर चाय पी रहे थे , तभी बागी सिपाहियों ने अचानक हमला करके सभी अंग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया | वहां मौजूद लोगो में सिर्फ होम्स की बेटी ही बच पायी थी | इस हमले में होम्स की बीबी उनके लड़के डा गार्नर और उनके लड़के के आलावा विनीट भी मारा गया | बागी सैनिक होंम्स का सर काटकर अपने साथ ले गये | होम्स और गार्नर के कत्ल के बाद अंग्रेज अफसर बौखला गये और बागी सैनिको को अलावा उनके घर खानदान और मददगारो को ठिकाने लगाने की तैयारी शुरू कर दिया
अंग्रेज अफसरों ने आसपास के अपने मददगार जमींदारों और राजाओं से मदद लेकर अपने घरवालो की कड़ी हिफाजत का बन्दोबस्त किया | सच तो यह है कि होम्स और गार्नर के कत्ल के बाद अंग्रेज डर गये थे और अपना डर छुपाने के लिए पुरे जिले में जानबूझकर आतंक फैला रहे थे | सरकार ने 30 जुलाई 1857 को पटना शाहाबाद , सारण , चम्पारण और तिरहुत में माशर्ल ला लगा दिया |
मेजर होम्स सहित दुसरे सभी अंग्रेज के कत्ल और विद्रोह के लिए घुड़सवार बटालियन को मुजरिम माना गया | कत्ल के बाद चले केस में समद खान नजीबुल्लाह ताम्बे खान , सूबेदार खान और दूसरी बटालियन कालपी के दुलाल खान की पहचान कर ली गयी | मगर इन सभी का ट्रायल होना ताल दिया गया | बाद में 27 अगस्त 1857 को मुरादाबाद के कमिश्नर जो स्पेशल मजिस्ट्रेट की ड्यूटी में थे के सामने ट्रायल हुआ और घुड़सवार बटालियन के इन पांच बागियों को फांसी पर लटका दिया गया |

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Tuesday, September 17, 2019

गजब बनारस

गजब बनारस
जितनी निराली बनारस है .उतने निराले यहाँ के मकान भी .किस गली को किस मकान के अन्दर से पार करना है .वह तो बस बनारसी जान सकता है ।
बनारस के मकान
.....................बनारस के मकानों पर कुछ लिखने से पहले एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ | मेरा मकसद यह नही है की बनारस में कहा ,किस मुहल्ले में कितने किराए पर ,कौन -सा मकान या फ़्लैट खाली है अथवा बिकाऊ है ,इन सब बातो की रिपोर्ट पेश करू | काफी जोर -शोर के साथ अगर तलाश की जाए तो भगवान मिल जायेंगे ,पर नौकरी और मकान नही | आजकल इन बातो का ठेका अखबारों के विज्ञापन मैनजरो ने और हथुआ कोठी के रेंट कंट्रोलर साहब ने ले रखा है |आपके दिमाग में यह ख्याल पैदा हो गया हो की आपका भी बनारस में 'इक बंगला बने न्यारा ' और इस मामले में मैं आपकी मदद करूंगा (मसलन मकान बनवाने के नाम पर सरकार से किस प्रकार कर्ज लिया जा सकता है ,यह सब तिकड़म बताउंगा ) तो आप को गहरा धोखा होगा | मैं तो सिर्फ बनारस के मकानों का भूगोल और इतिहास बताउंगा |
अब आप शायद चौके की मकानों का भूगोल -इतिहास कैसा ? मकान माने मकान |चाहे वह बम्बई में हो या बनारस में | लेकिन दरअसल बात यह नही है | मकान माने महल भी हो सकता है और झोपड़ी भी हो सकती है | बम्बई में एक मकान अपने लिए जितनी जमीन घेरता है ,बनारस में उतनी जमीन में पचास मकान बन सकते है | यह बात अलग है की बम्बई के एक मकान की आबादी बनारस के पचास मकान के बराबर है | दूसरी जगह आप मकान देखकर मकान मालिक के बारे में अंदाजा लगा सकते है | मसलन वह बड़ा आदमी है ,सरकारी अफसर है ,दूकान दार है ,जमीदार है ,अथवा साधारण व्यवसायी है | लेकिन बनारस के मकानों की बनावट के आधार पर मकान -मालिक के बारे में कोई राय कायम करना जरा मुश्किल काम है | मान लीजिये आपने एक मकान देखा ,जिसमे मोटर रखने का गैरेज भी है | खामख्वाह यह ख्याल पैदा हो ही जाएगा की मकान मालिक बड़े शान से रहता है | रईस आदमी है |लेकिन जब आपकी उससे मुलाक़ात हुई तो नजर आया ,गलियों में 'रामदाना के लडुवा,पइसा में चार ' की चलती फिरती दूकान खोले है | राह चलते की शक्ल देखकर आपने नाक सिकोड़ ली ,पर वही आदमी शहर का सबसे सज्जन और कई मकानों का मालिक निकला | इसके विरुद्ध टैक्सी पर चलने वाले सफारी का सूट पहने सज्जन खपरैल के मकान में किराए पर रहते मिलेंगे | बनारस में अन्नपूर्णा मन्दिर की बगल में राममंदिर के निर्माता श्री पुरुषोत्तम दास खत्री जब बाहर निकलते थे तब उनके एक पैर में बूट और दूसरे में चप्पल रहता था | बाहर से भव्य दिखने वाला महल भीतर से खंडहर हो सकता है और बाहर से कण्डम दिखने वाला मकान भीतर महल भी हो सकता है | इसीलिए बनारस के मकानों का भूगोल -इतिहास जानना जरूरी है |
भूगोल ........................
अगर आपने आगरे का स्टेशन बाजार ,लाहौर का अनारकली ,बम्बई का मलाड ,कानपुर का कलक्टरगंज ,लखनऊ का चौक ,इलाहाबाद का दारागंज ,कलकत्ते का नीमतल्ला घाट और पुरानी दिल्ली देखा है तो समझ लीजिये उनकी खिचड़ी बनारस में है | हर माडल के ,हर रंग के और ज्युमेट्री के हर अंश -कोण के मकान यहा है | बनारस धर्मिक दृष्टि से और एतिहासिक दृष्टि से दो भागो में बटा हुआ है |धार्मिक दृष्टि से केदार खंड ,विश्वनाथ खंड और एतिहासिक दृष्टि से भीतरी महाल और भरी अलंग | प्राचीन काल में लोग गंगा किनारे बसना अधिक पसंद करते थे ताकि टप से गंगा में गोता लगाया और खट से घर के भीतर |सुरक्षा -की सुरक्षा और पुन्य मुनाफे में |नतीजा यह हुआ की गंगा किनारे आबादी घनी हो गयी | आज तो हालत यह है की भीतरी महाल शहर का नग न होकर पूरा तिलस्म -सा बन गया है |बहुत मुमकिन है 'चन्द्रकान्ता ' उपन्यास के रचयिता बाबू देवकीनंदन खत्री को भीतरी महाल के तिलस्मो से ही प्रेरणा मिली हो | काश !उन दिनों इम्प्रुमेंट ट्रस्ट होता ,तो हमारे बाप -दादे मकान बनवाने के नाम पर हमारे लिए तिलस्म न बनाते | छड़ी सडको को तंग गलियों का रूप न देते | यदि इम्प्रुमेंट ट्रस्ट जैसी संस्था उन दिनों बनारस में होती तो संभव था बनारस लन्दन या न्यूयार्क जैसा न सही ,मास्को अथवा मेलबोर्न जरुर बन जाता |बुजुर्गो का कहना है की काशी की तंग गलिया और ऊँचे मकान मैत्री भावना के प्रतीक है |भूत-प्रेत की नगरी में लोग पास -पास बसना अधिक पसंद करते थे ताकि वक्त जरूरत पर एक दूसरे की मदद कर सके | मसलन ,आज किसी के घर आटा नही है तो पडोस से हाथ बदाकर माँग लिया ,रुपया उधार माँग लिया ,नया पकवान बना है तो कटोरे में रखकर पडोसी को दे दिया ,कोई सामान मंगनी में मांगना हुआ अथवा सूने घर का केलापन दूर करने के लिए अपने -अपने घर में बैठे -बैठे गप्प लडाने की सुविधा की दृष्टि से भीतरी महाल के मकान बनाये गये है | इससे लाभ यह होता है की चार -पांच मंजिल नीचे न उतरकर सब काम हाथ बढाकर सम्पन्न कर लिए जाते है | कही -कही पड़ोसियों का आपस में इतना प्रेम बढ़ गया की गली के उपर पुल बनाकर आने -जाने का मार्ग भी बना लिया गया है | यही वजह है की भीतरी महाल के मकानों में चोरी की घटनाए नही होती | इस इलाके में रहना गर्व की बात मानी जाती है | बनारस के अधिकाश:रईस -सेठ और महाजन इधर ही रहते है | बाकी कुली - कबाड़ी और उच्क्को के लिए बाहरी अलंग है | लेकिन जब से बनारस की सीमा वरुणा -असी की सीमा को तोडकर आगे बढ़ गयी है | भले ही गर्मी में शिमले का मजा मिले ,पर आधुनिक युग के लोग उधर रहना पसंद नही करते |
इसका मुख्य कारण है यातायात के साधनों में कमी | आधी रात को आपके यहा बाहर से कोई मेहमान आये अथवा सपत्नी बाढ़ बजे रात -गाडी से सफर के लिए जाना चाहे तो बक्सा बीवी के सर पर और बिस्तर स्वंय पीठ पर रखकर सडक तक आइये ,तब कही रिक्शा मिलेगा | भीतरी महाल में रात को कौन कहे ,दिन में भी कुली नही मिलते | गलिया इतनी तंग है की कोई भी गाडी भीतर नही जाती |दुर्भाग्यवश आग लगने अथवा मकान गिरने की दुर्घटना होने पर तत्काल सहायता नही मिलती | हाँ ,यह बात अलग है की मरीज दिखाने के लिए डाक्टरों को ले जाने में सवारी का खर्च नही देना पड़ता |जिस प्रकार एक ही शक्ल के दो आदमी नही मिलते ,ठीक उसी प्रकार बनारस के दो मकान एक ढंग के नही है | कोई छ: मंजिला है तो उसकी बगल एक मंजिला मकान भी है | किसी मकान में काफी बरामदे है तो किसी में एक भी नही है | भीतरी महाल के मकानों का निचला हिस्सा सीलन ,अन्धकार और गंदगी से भरा रहता है पुराने जमाने में बाप -दादों के पास धुआधार पैसा रहा ,औलाद के लिए एक महल बनवा गये | बेचारे औलाद की हालत यह है की राशन की दूकान में गेंहू तौल रहा है | उसे इतनी कम तनख्वाह मिलती है की मरम्मत कराना तू दूर रहा दीपावली पर पूरे मकान की सफेदी तक नही करा पाता |
बनारस में छोटे -बड़े सभी किस्म के म्कान्दारो की इज्जत एक -सी है | कोई बड़ा मकान वाला छोटे मकान वाले की ओर उपेक्षा की दृष्टि से नही देखता | यहा तक की बड़े मकान में रहने वाले अपने मकान से पड़ोस के छोटे मकान झाकर कुछ नही देख सकते | अगर आपने ऐसी गलती की तो दूसरे दिन पूरा परिवार लाठी लेकर आपके दरवाजे पर आ डटेगा ,और सबसे पहले तो शब्दकोश के तमाम शब्दों के द्वारा आपका स्वागत करेगा | अगर आप ताव में आकर बाहर चले आये तो खैरियत नही | इसके बाद भले ही आप 100 पर फोन कीजिये ,थाने में रिपोर्ट लिखवाइए और दावा कीजिये | छोटे मकान -मालिको की इस हरकत से आज -कल लोगो ने उंचा मकान बनवाना छोड़ दिया है | बनारस में दुसरो के मकान में झाकना शराफत के खिलाफ काम समझा जाता है | एक कानून है --हक सफा | अन्य शहरों में यह कानून लागू है या नही ,यह तो नही मालूम ,पर बनारस में इस कानून के जरिये कमजोर पडोसी को परेशान किया जा सकता है | अगर कोई कमान बेच रहा है तो उसे अपने पीछे ,अगल बगल तीनो को इत्त्लाक्र उनसे सलाह लेकर बेचना होगा | वह चुपचाप यह काम नही कर सकता अन्यथा अडगा लगा देने पर वह मकान किसी भी कीमत में नही बिक सकता ...............................इतिहास
काशी के प्राचीन इतिहास से पता चलता है की काशी पहले वरुणा नदी के तट पर थी | इसका निरिक्षण फाह्यान ,हेनच्यांग और अलबैहाकी तक कर गये है | काशी कितना प्राचीन है ,यह तो राम जाने | लेकिन यहा का प्रत्येक मुहल्ला इतिहास से सम्बन्धित है और प्रत्येक मकान ऐतिहासिक है | इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है की सरकार ने जिन मकानों को महत्वपूर्ण समझा है उनके लिए आदेश दिया है की वे मकान गिरने न पावे ,अगल -बगल ,इधर -उधर चारो तरफ से चांड लगाकर उन्हें गिरने से रोका जाए | आज अधिकाश मकान इस हुकम के कारण अपनी जगह पर खड़े है , उन्हें गिरने से रोका जाए | बनारस के दस प्रतिशत मकान जिन्हें नीद आ रही थी ,चांड लगवाने के कारण सुरक्षित है | कुछ भाई लोगो के मकान इस किस्म के है की अगर उनके तीनो तरफ का मकान गिर जाए तो उनका मकान नगा हो जाएगा | कहने का मतलब पडोसी के मकान से ही भाई साहब अपना काम चला लेते है और उनके दबाव में इनके मकान का लिफाफा खड़ा है | बनारस का प्रत्येक मुहल्ला ऐतिहासिक है | मसलन जब दाराशोख यहा पढने आया था तब जहा ठहरा उसका नाम दारानगर हो गया | औरंगजेब आया तो औरंगाबाद बसा गया | नबाब सआदतअली खा बनारस में आकर जहा ठहरे उस स्थान का नाम नबाबगंज हो गया | बुल्ला सिंह डाकू के नाम पर बुलानाला महाल बस गया | मानमंदिर ,मीरघाट ,राजघाट और तुलसीघाट के बारे में सभी जानते है | डाक्टर सम्पूर्णानन्द के मतानुसार अगस्तकुंडा में महामुनि अगस्त्य रहते थे | इस प्रकार देखा जाए तो बनारस का प्रत्येक स्थान पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है | चेतगंज मुहल्ला चेतसिंह के नाम पर बसा तब जगतसिंह को अपने नाम पर मुहल्ला बसाने की सूझी | नतीजा यह हुआ की सारनाथ के धर्मराजिक स्तूप को उखाडकर उन्होंने जगतगंज मुहल्ला बसा डाला |कुछ लोग कहते है ,इसे जगतसिंह ने नही बसाया है ,वे सिर्फ यहा रहते थे |यह मुहल्ला तो बौद्धकालीन वाराणसी की बस्ती है | अब इसका ठीक-ठीक निर्णय तभी हो सकता है जब जगतगंज को खुदवाकर उसकी जांच पुरातत्व वाले करे | बनारस में तीन किस्म के मकान बने है |पथ्थर के बने मकान बौद्धकाल के बाद के है; लखवरिया ईटोवाले मकान बौद्ध युग के पूर्व से मुगलकाल तक के है |नमबरिया ईटो के बने मकान ईस्ट इंडिया कम्पनी से लेकर 14अगस्त सन 1947 ई. तक बने है | आजकल नमबरिया ईटो की साइज नौ गुणा साढ़े चार इंच की हो गयी है | इस साइज की ईटो के बने मकान कांग्रेसी शासनकाल के है | यद्यपि काशी में मुहल्ले और मकान काफी है ,पर हवेली साढ़े तीन ही है | महल कई है | हवेलियों में देवकीनंदन की हवेली ,काठ कि ह्वेली ,कश्मीरीमल की हवेली और विश्वम्भरदास की हवेली काशी में प्रसिद्ध है | इनमे आधी हवेली कौन है ,इसका निर्णय आजतक नही हुआ | पांडे हवेली को हवेली क्यों नही माना जाता ,यह बताना मुश्किल है ,जब की इस नाम से भी एक मुहल्ला बसा हुआ है | यदि आपको भ्रमण का शौक है और पैसे या समय के अभाव से समूचा हिन्दुस्तान देखने में असमर्थ है तो मेरा कहना मानिए ,सीधे बनारस चले आइये | यहा हिन्दुस्तान के सारे प्रांत मुहल्ले के रूप में आबाद है |हिन्दुओं के तैतीस करोड़ देवता काशी वास करते मिलेंगे ,गंगा उत्तर वाहिनी है ,तिलस्मी मुहल्ला है ,ऐतिहासिक मकान है और जो कुछ यहा है ,वह दुनिया के सात पर्दे में कही नही है | बनारस दर्शन से भारत दर्शन हो जाएगा | यहा एक से एक दिग्गज विद्वान् और प्रकांड पंडित है |प्रत्येक प्रांत का अपना -अपना मुहल्ला भी है | बंगालियों का बंगाली टोला ,मद्रासियो तथा दक्षिण भारतीयों का हनुमान घाट ,केदार घाट पंजाबियों का लाहोरिटोला,गुजरातियों का सुतटोला , मारवाड़ियो की नंदनसाहू गली ,कन्नडियो का अगस्तकुंडा ,नेपालियों का बिन्दुमाधव,ठाकुरों का भोजुवीर ,राजपूताने के ब्राह्मणों की रानीभवानी गली ,सिंधियो का लाला लाजपतराय नगर ,मराठियों का दुर्गाघाट,बालाघाट ,मुसलमानों का मदनपुरा अलईपूर ,लल्लापुर और काबुलियो का नयी सडक -बेनिया मुहल्ला प्रसिद्ध है |इसके अलावा चीनी ,जापानी ,सिहली ,फ्रांसीसी ,भूटानी ,अंग्रेज और अमेरिकन भी यहा रहते है | सारनाथ में बौद्धों की बस्ती है तो रेवड़ी तालाब पर हरिजनों की |व्यवसाय के नाम पर भी अनेक मुहल्ले आबाद है |
बनारस की चौपाटी
काशी को दुनिया से न्यारी कहा जाता है और यह सारा 'न्यारापन ' बनारसी चौपाटी -दशाश्वमेध घाट पर खीच आया है ,यह निस्संदेह कहा जा सकता है |
जो बम्बई की चौपाटी की चाट खा आये है ,उन्हें दशाश्वमेध घाट की चौपाटी कहते ज़रा झिझक होती है |ऐसे लोगो को असली बनारसी 'गदाई ' के विशेषण से युक्त करने में कभी कोई संकोच नही होगा |किसी बनारसी को अगर बम्बई में छोड़ दिया जाए तो वह अपने को 'पागल 'समझने को विवश हो जाएगा बस कुछ ही दिनों में | बम्बई में पाश्चात्य चमक भले ही हो ,पर भारतीयता की झलक तो अपने बनारस में ही मिलती है| खैर | यह निश्चित मन से स्वीकारा जा सकता है की बम्बई की चौपाटी का दशाश्वमेध घाट से कोई मुकाबला नही | एक में बाजारू सौन्दर्य है तो दूसरे में शाश्वत |
मुलाहजा फरमाइए ---
सुबह होते ही ,घाट पर मालिश का बाजार गरम हो जाता है | बनारसी के लिए स्नान के पूर्व मालिश का वही महत्व है ,जो आधुनिको के लिए स्नो करीम -पाउडर का | एक रुपया की दक्षिणा में कपड़ो की चौकीदारी ,स्नानोपरांत आईने -कघी की व्यवस्था से लेकर तिलक लगाने तक की सेवा आप यहा उपस्थित घाटिये से ले सकते है | ब्राह्मण का आशीर्वाद फ़ोकट में मिल जाएगा | जरा सामने निगाह उठाइये तो गंगा की छाती पर धीरे -धीरे उस पार की ओर सरकती नौकाये आपका ध्यान तुरंत आकर्षित कर लेंगी | बनारस के 'गुरु 'और रईस शहर में भले मॉल -त्यागना अपराध समझते है ,सो उस पार निछ्द्द्म में निपटान को जाते हुए बनारसी की दिव्य छटा से आपकी आत्मा तृप्त हो जायेगी | ये निपटान -नौकाये ,अधिकतर पर्सनल होती है और इनका दर्शन शाम को भी किया जा सकता है | स्नानार्थियो में कम -से कम सत्तर परसेंट महिलाये होती है ,इसलिए कुछ बीमार किस्म के 'आँख -सकते 'भी दिखाई पड़ेंगे | बनारस की महिलाये जरा मर्दानी किस्म की होती है ,सो ऐसे बीमारों की कत्तई परवाह नही करती | अस्सी और वरुणा -संगम के मध्य में होने के कारण यहा से सम्पूर्ण बनारस की परिक्रमा आप कर सकते है ,इसलिए की काशी का 'रस 'यहा के घाटो में ही सन्निहित है | अब घाट से उपर आइये और देखिये की बनारस कितना कंगाल है ---सडक पर अपनी गृहस्थी जमाए भिखमंगो को देखकर स्वाभाविक है की बनारस के प्रति आपका आइडिया खराब हो जाए , यह अनभिज्ञता और भ्रम का परिणाम है |काशी के भिखमंगो की माली हालत आफिस में कलम रगड़ने वाले सफ़ेद पोश बाबुओं से उन्नीस नही होती | मरने के बाद उनके लावारिस गुदड़ के अन्दर से सरकार को अच्छी -खासी आमदनी हो जाती है | एक बार चितरंजन पार्क के पास एक बूढी भिखारिन जब मरी तब उसके गुदड़ से सात सौ अठ्ठासी रूपये साधे तेरह आने की मोती रकम प्राप्त हुई थी | मेरे कहने का यह मतलब नही की आप उन्हें 'छिपा रईस ' समझ कर उनका जायज हक़ हड़प कर ले | भीख माँगा उनका पेशा है और पेशे का सम्मान करना आपका धर्म है |
शाम को इस बनारसी चौपाटी का वास्तविक सौन्दर्य दिख पड़ता है | कराची की फैश्नप्र्स्ती ,लाहौर की शोखी ,बंगाल की कलाप्रियता ,मद्रास की शालीनता ,गुजरात -महाराष्ट्र सब उमड़ पड़ता है यद्यपि दशाश्वमेध का क्षेत्र बहुत ही सीमित है तथापि गागर में सागर का समा जाना आप खूब अनुभव कर लेंगे | विश्वनाथ गलिवाली नुक्कड़ से सिलसिलेवार स्थित तीन रेस्तरा आपको सर्वाधिक आकर्षित करेंगे | उनके अनुचर मोची से लेकर श्रीमान तक को बिना किसी भेदभाव के भाईसाहब ,चचा ,दादा ,और बहन जी आदि पुनीत संबोधनों से निहाल कर देंगे :भले ही आपकी जेब में एक कप चाय तक की कीमत न हो |उपयुक्त तीनो जलपान घरो का ऐतिहासिक महत्व है | बनारस के इकन्नी ब्रांड से लेकर रूपये ब्रांड तक के साहित्यकार ,शाम को इन्हें अपने आगमन से पवित्र करना अपना कर्तव्य समझते है |थोड़ा प्रयत्न करे तो घाट के किसी अँधेरे कोने में साहित्यकारों की मण्डली किसी गम्भीर साहित्य की समस्या में उलझी मिल जायेगी | यो काशी का ऐसा कोई साहित्यकार आपको नही मिलेगा जो दशाश्वमेध में न जमता हो | अनेक साहित्यक वादों का प्रसार और उनके आपरेशन का थियेटर भी दशाश्वमेध ही है | अधिकतर साहित्य की गोष्ठिया भी यही आयोजित होती है घाट पर शाम को धर्मो की जो धारा लहराती है ,वह अन्यत्र दुर्लभ ही है | कथावाचक रामायण ,महाभारत ,चैतन्य चरितावली ,भागवत आदि की पुनीत कथा से वातावरण को गमका देते है |
इस स्थान की प्रशंसा भारतीयों ने की ही है ,दूसरे देशवालो ने भी इसका गुणगान किया है | प्रसिद्ध पर्यटक श्री जे.बी .एस .हाल्डेन की पत्नी ने कहा है की मुझे यह जगह न्यूयार्क से अच्छी लगती है | एक रुसी पर्यटक ने इसे पेरिस से सुन्दर नगरी कहा है | विश्व स्वास्थ्य संघ के एक अधिकारी ने इसे सारे जहा से अच्छा स्थल माना है | मेरे एक मित्र ,जो लन्दन गये हुए है ,उन्होंने जब स्वेज नहर का दृश्य देखा तब उन्हें बनारस के घाटो के दृश्य याद आ गये | प्राचीन काल में दशाश्वमेध का नाम 'रूपसरोवर 'था | इसके बगल में घोड़ा घाट है | पहले इसका नाम गऊघाट था | काशी की गाये यहा पानी पीने आती थी | गोदावरी -गंगा का संगम -स्थल आज घोड़ाघाट बन गया है | त्रेता युग में दिवोदास ने यहा दस अश्वमेध यज्ञ करवाए थे ,तभी से इस स्थान का नाम दशाश्वमेध घाट हो गया है | आज भी उपर द्शाश्व्मेधेश्वर की मूर्ति है | शायद ही ऐसी कोई राजनितिक पार्टी होगी जिसकी सभा इस घाट पर न हुई हो |खासकर सन 42 के आन्दोलन के पूर्व सभी उपद्रव इसी घाट से प्रारम्भ किए जाते थे | शहर का प्रत्येक जलूस इसी स्थान से सज -धजकर चलता है | शहर की सबसे बड़ी सत्ती (तरकारी बाजार )यही है और महामना मालवीय ने हरिजन -शुद्धि का आन्दोलन इसी घाट से प्रारम्भ किया था | अब प्रदेश के मुखिया की कृपा से इस घाट का पुननिर्माण शुरू हुआ है | निर्माण करे समाप्त हो जाने पर यह निश्चित है की यह स्थान काशी का सर्वाधिक आकर्षक केद्र्स्थल बन जाएगा | बम्बइया चौपाटी को मात देने के लिए उत्तर प्रदेशीय सरकार ने भी एक मार्व्लेस प्लान तैयार करने का निश्चय किया है | राजघाट -सारनाथ सडक के पुल के फाटक बंद करके वरुणा नदी से विशाल ज्झिल निर्मित होगी |शांत वातावरण में इस झील में जल- विहार कितना मनोरम होगा अनुमान ही मन में स्फुरण भर देता है |
बनारस की सीढ़िया
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रांड ,सांड ,सीढ़ी ,सन्यासी |
इनसे बचे तो सेवे काशी ||
पता नही ,कब किस दिलजले ने इस कहावत को जन्म दिया की काशी की यह कहावत अपवाद के रूप में प्रचलित हो गयी | इस कहावत ने काशी की सारी महिमा पर पानी फेर दिया | मुमकिन है की उस दिलजले का इन चारो से कभी वास्ता पडा हो और काफी कटु अनुभव हुआ हो | खैर जो हो , पर सत्य है की काशी आनेवालों का इन चारो से परिचय हो ही जाता है | फिर भी आश्चर्य का विषय यह है की काशी आनेवालों की संख्या बढती जा रही है और जो एक बार यहा आ बसता है ,मरने के पहले टलने का नाम नही लेता ,जबकि पैदा होने वालो से कही अधिक श्मशान में मुर्दे जलाए जाते है | यह भी एक रहस्य है |
इन चारो में सीढ़ी के अलावा बाकी सभी सजीव प्राणी है | बेचारी सीढ़ी को इस कहावत में क्यों घसीटा गया है ,समझ में नही आता| यह सत्य है की बनारस की सीढ़िया (चाहे वे मन्दिर ,मस्जिद ,गिजाघर अथवा घर या घाट -किसी की क्यों न हो ) कम खतरनाक नही है ,लेकिन यहा की सीढियों में दर्शन और आध्यात्म की भावना छिपी हुई है | ये आपको जीने का सलीका और जिन्दगी से मुहब्बत करने का पैगाम सुनाती है | अब सवाल है की कैसे ? आँख मूंदकर काम करने का क्या नतीजा होता है ,अगर आपने कभी ऐसी गलती की है ,तो आप स्वंय समझ सकते है | सीढ़िया आपको यह बताती रहती है की आप नीचे की जमीन देखकर चलिए ,दार्शनिको की तरह आसमान मत देखिये ,वरना एक अरसे तक आसमान मैं दिखा दूंगी अथवा कजा आई है -जानकर सीधे शिवलोक भिजवा दूंगी | काशी की सीढ़िया चाहे कही की क्यों न हो ,न तो एक नाव की है और न उनकी कोई बनावट में कोई समानता है ,न उनके पथ्थर एक ढंग के है ,न उनकी उंचाई -निचाई एक सी है ,अर्थात हर सीढ़ी हर ढंग की है | जैसे हर इंसान की शक्ल जुदा -जुदा है ,ठीक उसी प्रकार यहा की सीढ़िया जुदा -जुदा ढंग से बनाई गयी है | काशी की सीढियों की यही सबसे बड़ी खूबी है | अब आप मान लीजिये सीढ़ी उपर है ,नीचे तक गौर से सारी सीढ़िया आपने देख ली और एक नाप से कदम फेकते हुए चल पड़े ,पर तीसरी पर जहा अनुमान से आपका पैर पढ़ना चाहिए नही पडा ,बल्कि चौथी पर पड़ गया | आगे आप ज़रा सावधानी से चलने लगे तो आठवी सीढ़ी अंदाज से कही अधिक नीची है ,ऐसा अनुभव हुआ | अगर उस झटके से अपने को बचा सके तो गनीमत है ,वरना कुछ दिनों के लिए अस्पताल में दाखिल होना पडेगा | अब आप और भी सावधानी से आगे बड़े तो बीसवी सीढ़ी पर आपका पैर न गिरकर स्थ पर ही पड़ जाता है और आपका अंदाजा चुक जाता है | गौर से देखने पर आपने देखा यह सीढ़ी नही है चौड़ा फर्श है |
खतरनाक सीढ़िया क्यों ?
अब सवाल यह है की आखिर बनारस वालो ने अपने मकान में ,मन्दिर में ,या अन्य जगह ऐसी खतरनाक सीढ़िया क्यों बनवाई ?इसमें क्या तुक है ? तो इसके लिए आपको जरा काशी का इतिहास उलटना होगा | बनारस जो पहले सारनाथ के पास था ,खिसकते -खिसकते आज यहा आ गया है | यह कैसे खिसककर आ गया ,यहा इस पर गौर करना नही है | लेकिन बनारस वालो में एक ख़ास आदत है ,वह यह की वे अधिक फैलाव में बसना नही चाहते ,फिर गंगा ,विश्वनाथ मन्दिर और बाजार के निकट रहना चाहते है | जब भी चाहा दन से गंगा में गोता मारा और उपर घर चले आये | बाजार से सामान खरीदा ,विश्वनाथ -दर्शन किया ,चटघर के भीतर | फलस्वरूप गंगा के किनारे -किनारे घनी आबादी बस्ती गयी | जगह संकुचित ,पर धूप खाने तथा गंगा की बहार लेने और पड़ोसियों की बराबरी में तीन -चार मंजिल मकान बनाना भी जरूरी है | अगर सारी जमीन सीढ़िया ही खा जायेगी तो मकान में रहने की जगह खा रहेगी ? फलस्वरूप ऊँची -नीची जैसे पथ्थर की पटिया मिली , फिट कर दी गयी -लीजिये भैया जी की हवेली तैयार हो गयी | चूँकि बनारसी सीढियों पर चढने -उतरने के आदि हो गये है ,इसलिए उनके लिए ये खतरनाक नही है ,पर मेहमानों तथा बाहरी अतिथियों के लिए यह आवश्यक है |
........................................काशी के घाट
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विश्व की आश्चर्य वस्तुओं में बनारस के घाटो को क्यों नही शामिल किया गया -- पता नही ,जब की दो मील लम्बे पक्तिवार घाट विश्व में किसी नदी -तट पर कही नही है | ये घाट केवल बाढ़ से बनारस की रक्षा नही करते ,बल्कि काशी के प्रमुख आकर्षण केंद्र है | जैन ग्रंथो के अध्ययन से पता चलता है की प्राचीन काल में काशी के घाटो के किनारे -किनारे चौड़ी सड़के थी ,यहा बाजार लगते थे | वर्तमान घाटो की निर्माण -कला देखकर आज भी विदेशी इंजीनियर यह कहते है की साधारण बुद्धि से इसे नही बनाया गया है | रामनगर ,शिवाला ,दशाश्वमेध ,पंचगंगा ,और राजघाट का निर्माण पानी के तोड़ को दृष्टि में रखते हुए किया गया है ताकि रामनगर तट से धक्का खाकर शिवाला में नदी का पानी टकराए ,फिर वह से दशाश्वमेध से मोर्चा ले ,पंचगंगा और अन्त में राजघाट से टक्कर ले और फिर सीढ़ी राह ले | इस कौशलपूर्ण निर्माण का एक मात्र श्रेय राजा बलवंत सिंह को है ,जिन्होंने अपने समकालीन राजाओं की सहायता से बनारस को बाधो से मुक्ति दिला दी ,अन्यथा अन्य शहरों की तरह बनारस को भी बाढ़ बहा ले जाती |
घाटो की सीढियों की उपयोगिता
सीढियों का दृश्य काशी के घाटो में ही देखने को मिलता है चूँकि काशी नगरी गंगा की स्थल से काफी ऊँचे धरातल पर बसी है इसलिए यहा सीढियों की बस्ती है | काशी के घाटो को आपने देखा होगा ,उन पर टहले भी होंगे | लेकिन क्या आप बता सकते है की केदारघाट पर कितनी सीढ़िया ?
सिंधिया घाट पर कितनी सीढिया है ? शिवाले से त्रिलोचन तक कितनी बुर्जिया है ? साफालाने लायक कौन सा घाट अच्छा है ? आप कहेंगे की यह बेकार का सरदर्द कौन मोल ले |
लेकिन जनाब ,हरिभजन से लेकर बीडी बनाने वालो की आमसभा इन्ही घाटो पर होती है | हजारो गुरु लोग इन घाटो पर साफा लगाते है ,यहा कवि- सम्मलेन होते है ,गोष्ठिया करते है ,धर्मप्राण व्यक्ति सराटा से माला फेरते है ,पण्डे धोती की रखवाली करते है ,तीर्थयात्री अपने चदवे साफ़ करवाते है | यहा भिखमंगो की दुनिया आबाद रहती है और सबसे मजेदार बात यह है की घर के उन निकलुओं को भी ये घाट अपने यहा शरण देते है ,जिनके दरवाजे आधीरात को नही खुलते | ये घाट की सीढिया बनारस का विश्रामगृहहै ,झा सोने पर पुलिस चालान नही करेगी | नगरपालिका टैक्स नही लेगी और न कोई आपको छेड़ेगा | ऐसी है बनारस की सीढिया |
सुनील दत्ता ......................भार विश्वनाथ मुखर्जी '' बना रहे बनारस से ""

गया में नजीबो और सिपाहियों की बगावत

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी

गया में नजीबो और सिपाहियों की बगावत

बिहार में गया जेल का फाटक तोड़कर बागी सैनिको ने वहाँ बंद आंदोलनकारियो को आजाद करा लिया था | अंग्रेज अफसरों का मानना था की जेल के मिलाजिमो की मिलीभगत से ही जेल पर हमला कैदियों को आजाद कराया गया हैं | लिहाजा इस इल्जाम में 12 नजीबो और 7 जेल सिपाहियों पर मुकदमा चलाया गया | मजिस्ट्रेट ए.मनी ने ड्यूटी में लापरवाही बरतने के इल्जाम में दफा 14 के तहत शेख कादिर सहित १२ नजीबो को चार साल कैद की सजा सुनाई | बाकी जेल - सिपाहियों में सात को आंदोलनकारियो से मिलीभगत का कसूरवार मानते हुए दफा 16 के तहत नजीब खान और गुलाम अली के साथ फाँसी की सजा दे दी | नजीब खान जेल के सिपाही नही ,बल्कि किसान थे | उन्हें बागी सिपाही होने के शक में गिरफ्तार किया गया था | उनके पास से जो सामन बरामद हुए उनमे ताबे की 74 टोपियो के अलावा , एक तलवार थी , जिस पर खून लगा दिखाया गया था | मजिस्ट्रेटने नजीब खान को फांसी का हुकम दिया मगर उससे पहले बचाव का मौका देते हुए जब उनसे इल्जाम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा -- मैं किसान हूँ मेरे पास अपनी हिफाजत के सिर्फ एक तलवार थी जिस पर कोई निशान नही था | मेरे उपर झूठा इल्जाम लगाया गया हैं | उन्होंने अपने हाथ पैर दिखाते हुए कहा था की आप खुद देखे मैं किसान हूँ | मगर अदालत ने कोई सफाई नही मानी और सजा सुनाकर फांसी पर लटका दिया | नजीब खान के अलावा काशी सिंह भी किसान थे मगर उन्हें भी विद्रोही सिपाही के नाम पर 10 साल की सजा देकर कालापानी भेज दिया गया |
फर्जी मुकदमे : उस दौरान फर्जी मुकदमो में कई लोगो के साथ ऐसा ही हुआ था | अदालती कार्यवाही सिर्फ खानापूर्ति करती थी | उनका मकसद ज्यादा से ज्यादा हिन्दुस्तानियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर आंदोलनकारियो में दहशत पैदा करना था जिस मजिस्ट्रेट ने नजीब खान को सिपाही बताते हुए फांसी की सजा दे दी थी , उसी के अदालत में कुछ और नमूनों का यहाँ जिक्र होना जरूरी हैं |
जफर खान और खान : जफर खान पर मोतिहारी में डाकबंगला लुटने का इल्जाम था और बशारत खान के घर से डाक बंगले का लुटा सामन बरामद होना दिखाया था , जबकि इन दोनों लोगो ने अपनी सफाई में कहा की हम मोतिहारी का डाकबंगला जानते ही नही | जब मजिस्ट्रेट ने सख्ती से पूछा तब इन लोगो ने कहा की क्या वही , जहाँ से चिठ्ठी भेजी जाती है , उसे ही डाकबंगला कहते है ? इस पर अदालत में मजिस्ट्रेट की हंसी होने की वजह से मजिस्ट्रेट ने गुस्से में आकर बिना कुछ सुने फ़ौरन जफर खान को बेदी के साथ पांच साल की सजा सुना दिया और बशारत को तीन साल कैद की जा सुना दिया | इसी तरह कहर खान और हुस्नो खान पर भी बगावत और बागियों का साथ देने का इल्जाम लगा जबकि हुस्नो खान का भाई डोरडा बालियाँ में था | उसी की वर्दी घर से बरामद करके हुस्नो खान को वर्दी रखने के जुर्म में सात साल की सजा इ गयी | गया जिले के आंदोलनकारियो को बगावत में मदद करने उर बागियों को पनाह देने के नाम पर कलक्टर एच .आर .मेडोराक की अदालत में मुकदमा चालाकर 17 लोगो की उल जायदाद जब्त कर नीलामी करके रुपया सरकारी खजाने में जमा कर दिया गया | इस तरह ब्रिटिश सरकार के खजाने में 47.641रूपये जायदाद जब्ती से हासिल हुए थे |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Monday, September 16, 2019

अहमदाबाद एक नजर -

अहमदाबाद एक नजर -

अहमदाबाद से 8 किलो मी दूर सरखेज क्षेत्र अहमदाबाद की स्थापना से पूर्व यह जगह सरखेज के नाम से विख्यात था | सरखेज एक प्राचीन जगह है कभी इस जगह से साबरमती नदी का प्रवाह इसके पास से बहता था | साबरमती नदी के तटवर्ती में स्थित होने के कारन इसका नाम ''श्रीक्षेत्र '' भी पडा | सरखेज का पहले नाम जरखेज ( फलद्रुप ) था , कारण यहाँ की जमीन बहुत उपजाऊ रही हैं | लेकिन वक्त के साथ ही साथ 'जरखेज ' नामकरण से यह 'सरखेज " नाम में परिवर्तित हो गया | यह क्षेत्र नील की खेती के दुनिया में प्रसिद्ध था |
सन1620 में यहाँ डच लोगो ने फक्ट्री लगाई | यह क्षेत्र गलीचे व हरीपट्टियों व हस्त शिल्प कला लिए भी विख्यात था | आज भी अगर यहाँ पर उत्खनन हो तो अवशेष मिल सकते हैं | यहाँ जो चीजे मिली है वो बताती है की यह क्षेत्र कभी युद्ध क्षेत्र रहा हैं | सरखेज रोजा संकुल का इतिहास ऐतिहासिक रूप से विख्यात रोझा संकुल वर्तमान में स्थित है | वहाँ पर मकबरा नाम का एक छोटा ठान | इसके पीछे का इतिहास जान्ने पर पता चला की यह युद्ध म शहीद हुए सिपाहियों को यही दफनाया गा था तथा बाद में उनकी कब्रगाहो पर मकबरे बनवाये गये | धीरे - धीरे इस क्षेत्र का नाम ''मकबरा '' से मकर्बा ' हो गया | ऐतिहासिक दृष्टि से हजरत शेख गंजबक्श खट्ट मगरीबी ( रह्मत्तुल्लाह अलयह ) का मखबरा स्थित होने से इस स्थल का नाम 'मकबरा ' पडा | भारतीय इतिहासकारों का मत है सरखेज जैसा ऐतिहासिक इमारतो का सुन्दर समन्वय गुजरात के दुसरे क्षेत्र में कही नही हैं | जिसकी वास्तुकला अप्रतिम है , जो हिन्दू -मुस्लिम और जैन शिल्पकला का अदभुत मिश्रण से युक्त हैं |इसे इन्डो -सेरा सैनिक स्थापत्य कला भी कहते हैं | इस संकुल में महल , मस्जिदे , मकबरे , भवनों , तालाबो इत्यादि मौजूद हैं |शहर के शोर्शाराबे से दूर अहमदाबाद की स्थापना में अपना योगदान देने वाले सूफी संत हजरत शेख गंजबक्श खट्ट मगरीबी ( रह्मत्तुल्लाह अलयह ) की दरगाह यही मौजूद होने से यह क्षेत्र साझी विरासत के लिए पूज्यनीय है |इस रोजा संकुल में महान सूफी संत , नाजिमो , सूबेदारों दरबारी अमीरों एवं उमरावो , शायरों के मकबरे मौजूद है | इनमे शहंशाह अकबर के दरबारी शायर गजाली मशहदी , मिर्जा अजीज फोका ,| का मकबरा हैं | इस बात कीपुष्टि खान बहादुर एम् एस कोमिसेरीयट की किताब हिस्ट्री आफ गुजरात भाग एक पेज न 491 में मौजूद है ||

सम्राट औरंगजेब आलमगीर के शहजादे मुहम्मद फर्रुखशिखर के राज्य के समय हिजरी सन ११२५ में ख्वाजा अब्दुल ह्मिद्खान जो अलमदारी के पद पर मौजूद थे वो भी हजरत शेख गंजबक्श खट्ट मगरीबी ( रह्मत्तुल्लाह अलयह ) दरगाह के प्रमुख बन्ने का गौरव प्राप्त किया |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र प्त्कार समीक्षक - भाग एक

Sunday, September 15, 2019

बिहार शरीफ - नवादा बगावत

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी

बिहार शरीफ - नवादा बगावत

1857 की जंगे आजादी की पहली लड़ाई में नवादा के लोग भी अंग्रेजो के खिलाफ बगावत करने में किसी से पीछे नही थे | एक तो यहाँ आरा की बगावत का असर था , दुसरे यहाँ के बहुत से लोग सेना और पुलिस से बगावत करके अपने - अपने गाँव पहुच गये थे , | उन्ही में रामगढ़ बटालियन के इंकलाबी नेता सूबेदार अली भी थे जो बिहार शरीफ के नजदीक चरकोसा गाँव के रहने वाले थे | अंग्रेजो के हेडक्वाटर कलकत्ता से बनारस जाने का यही एक रास्ता था | दुसरा राजगीर तक सडक के किनारे पहाडिया और जंगलात थे , जिनका फायदा उठाकर इंकलाबी अंग्रेजो की गाडियों पर हमला करते और जंगलो में छुप जाते थे | नवादा के डिपुटी मजिस्ट्रेट के बंगले और अदालत में लूटपाट करके आग लगा दी गयी थी | नादिर अली नवादा का मोर्चा सम्भाले हुए थे | इधर राजगीर के मोर्चे पर हैदर अली , मेहँदी अली और हुसैन बख्श खान के साथ हजारो लोग थे | उन्ही के साथ रजवार बागी भी तलवार , भाले और लाठियों को लेकर मोर्चे पर डटकर अग्रेजो का मुकाबला करते रहे | कमिश्नर रैट्रो ने सिख फौजियों के साथ इस इलाके में अचानक भारी तैयारी के साथ धावा बोल दिया | नतीजन जबरदस्त मुकाबला हुआ , जिसमे मेहँदी अली खान और हुसैन बख्श खान मैदाने - जंग में ही शहीद हुए थे | हैदर अली खान ने अपने आपको परगना राजगीर का राजा होने का एलान किया और तीन - चार सौ लोगो को हथियारों से लैस कराकर थाना पहुच गये और आबकारी व जमींदारी की कचहरी पर हमला बोलकर कब्ज़ा कर लिया | जब यह खबर कमिश्नर को मिली तो उन्होंने पूरी तैयारी से राजगीर पहुचकर मोर्चा सम्भाला | आमने - सामने की लड़ाई में आंदोलनकारियो में तीन लोग मारे गये और कई घायल हो गये | हैदर अली समेत 13 आंदोलनकारी जख्मी हालत में गिरफ्तार कर लिए गये | 9 अक्तूबर 1857 को विशेष कमिश्नर ट्राटर ने 1857 एक्ट 16 के तहत हैदर अली को फांसी और 11 लोगो को 14 साल की कैद की सजा का हुकम दे दिया | इन 11 लोगो में मोहम्मद राजगीर के बाशिंदे थे |
हैदर अली की गिरफ्तारी अंग्रेज अफसर के लिए कितनी अहम् थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की कमिश्नर ने थानेदार कलक्टर के राइटर और चौकीदार को 500 रूपये और 200 रूपये का नगद इनाम दिया और दरोगा की तनख्वाह में 150 रूपये का इजाफा कर दिया | साथ ही नवादा - कमिश्नर ने बगावत के केस में जेल की सजा काट रहे आंदोलनकारियो जिनमे हिदायत अली , जुम्मन , फरजन्द अली और पीर अली की जायदाद जब्त करने का भी आदेश दिया |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Friday, September 13, 2019

लहू बोलता भी हैं

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी

रोहिणी की बगावत के बाद पटना का कमिश्नर बहुत डरा हुआ था | उसने एहतियाती कार्यवाही के नाम पर जिले में एक साल के लिए मार्शल ला लागू करके अवं के असलहे जमा करा लिए | अमन कायम करने के नाम पर शहर के असरदार और रईस लोगो को 19 जून 1857 को मीटिंग के बहाने बुलाया और धोखे से तीन रईस मौलवियों को गिरफ्तार कर लिया | उनमे से मौलवी अह्म्दुल्लाह को आन्दोलनकारी और बागी बताकर ताउम्र कैद की सजा पर कालापानी भेज दिया | बाद में मोहम्मद हुसैन को भी कालापानी की सजा हो गयी | इन दोनों लोगो की संन 1865 में जेल में ही मौत हो गयी | तीसरे मौलवी वईजुलहक को 10 साल कैद की सजा हुई | जेल से छूटने के बाद उन्हें और घर वालो को इतना परेशान कर दिया गया था कि वह अपने घरवालो के साथ मक्का चले गये | पटना में ही 22 जून को बगावत की अफवाह फैली | ऐसी अफवाह फैलाने के इल्जाम में तीन लोगो को गिरफ्तार किया गया , जिनमे सैय्यद कुतुबुद्दीन को 23 जून से 6 जुलाई 1857 के बीच किसी दिन फांसी की सजा दे दी और साथ में नरायन सिंह और रामदास को 6 - 6 महीने की सजा दी गयी | इसके अलावा हबीबुल्लाह फैय्याज अली, मिर्जा आगा मुग़ल ,रजब अली ,असगर अली दीन मोहम्मद और सादात अली इन सभी को डंडा - बेडी के साथ 10 साल कैद - बा मशक्कत की सजा हुई | इन लोगो के अलावा सात और गैर मुस्लिम को भी सजा हुई | इसी मामले में दूसरा ट्रायल 13 जुलाई 1857 को हुआ | इसमें घसीटा मिया खान और पैगम्बर बख्श को फांसी के अली पीर बख्श ढपली शेख फकीर को उम्रकैद और अशरफ अली को 14 साल की कैद की सजा हुई |
इसी मामले में तीसरा ट्रायल 8 अगस्त सन 1857 को हुआ जिसमे अशरफ हुसैन को फांसी ; शेख नबी बक्श ,शेख रहमत अली व दिलावर हुसैन को उम्रकैद और ख्वाजा आमिर जान को 14 साल कैद की सजा सुनाई गयी | सिपाही - बगावत के इल्जाम में जिन मुस्लिम शहीदों को सजा दी गयी उसका पूरा विवरण तो कही नही
मिलता मगर ट्रायल टुकडो में हुआ था और जिस लिस्ट से ये नाम मिले है , उनका हवाला बंगाल के अंडर सेक्रेटरी के भारत सरकार के सचिव को दिनाक 3 जून 1859 को लिखे ख़त के जबाब में मेजर जनरल आर जे एच ब्रीच की तरफ से बंगाल सरकार के सचिव को लिखे ख़त में सजा पाए सिपाहियों की लिस्ट में मिलता है | इसमें कुल 29 नाम थे |
शेख लाल मोहम्मद 28वी पैदल सेना 14- 1 - 58 दानापुर उम्र कैद , शेख अशरफ अली सिपाही 28वी पैदल सेना 14-०1- 58 दाना पुर उम्रकैद फैजुल्लाह खान नायक राम्घ्ध लाईट रेजिमेंट डोरडा उम्रकैद अमीर अली खान निजी रामगढ़ लाईट रेजिमेंट डोरडा 5 साल कैद मेरे सुलतान अली सिपाही 32वी पैदल सेना दाना पुर नेयामत अली खान सिपाही 7वी पैदल सेना दानापुर 3 साल कैद
जंगे - आजादी के दौरान पूरे भारत में सिर्फ आरा बिहार ही एक ऐसा शहर था जहाँ पूरे शहर पर बगावत का बाजफ्ता मुकदमा चला था | सन 1859 में यह मुकदमा गवर्मेंट वर्सेज दि टाउन आफ आरा नाम से चला था | दफा 10 के तहत बगावत का इल्जाम पूरे शहर पर था | इस मुकदमे की सुनवाई मजिस्ट्रेट डब्लू जे हर्शेल ने की थी | इस बगावत में काफी इंकलाबी शहीद हुए थे और कितनो को सजाये हुई थी इसका रिकार्ड बहुत कम है | आरा शहर के जिन 16 लोगो को फांसी की सजा हुई थी उनमे गुलाम याहया , अब्बास अली ,बंदे अली बगैरह शामिल थे | ये सभी लोग वीर कुवर सिंह के आन्दोलन में सरगर्म हिस्सेदार थे | गुलाम याहया शहर के बाअसर साहबे हैसियत वकील थे | उन्हें इंकलाबी सरकार में मजिस्ट्रेट बनाया गया था | इसी इल्जाम में उन्हें फांसी की सजा हुई | अब्बास अली ने आन्दोलन के वक्त जेल के दरोगा को गोली मारकर आंदोलनकारियो को रिहा कराया था जिसके इल्जाम में उन्हें फांसी दे दी गयी | तीसरे बंदे अली को सिर्फ बगावत में हिस्सा लेंने के इल्जाम में फांसी की सजा हुई थी |

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Thursday, September 12, 2019

कानून के दरवाज़े पर ----------- फ़्रांज काफ़्का

कानून के दरवाज़े पर ----------- फ़्रांज काफ़्का
कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाज़त मांगता है। मगर वह उसे भीतर प्रवेश की इजाज़त नहीं देता।
आदमी सोच में पड़ जाता है। फिर पूछता है- ‘‘क्या कुछ समय बाद मेरी बात सुनी जाएगी?
‘‘देखा जाएगा” --कानून का रखवाला कहता है- ‘‘पर इस समय तो कतई नहीं!”
कानून का दरवाज़ा सदैव की भाँति आज भी खुला हुआ है। आदमी भीतर झाँकता है।
उसे ऐसा करते देख रखवाला हँसने लगता है और कहता है-- ‘‘मेरे मना करने के बावजूद तुम भीतर जाने को इतने उतावले हो तो फिर कोशिश करके क्यों नहीं देखते ; पर याद रखना मैं बहुत सख़्त हूँ; जबकि मैं दूसरे रखवालों से बहुत छोटा हूँ । यहाँ एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने के बीच हर दरवाज़े पर एक रखवाला खड़ा है और हर रखवाला दूसरे से ज़्यादा शक्तिशाली है। कुछ के सामने जाने की हिम्मत तो मुझ में भी नहीं है।”
आदमी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कानून तक पहुँचने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। वह तो यही समझता था कि कानून तक हर आदमी की पहुँच हर समय होनी चाहिए। फर कोटवाले रखवाले की नुकीली नाक, बिखरी-लम्बी काली दाढ़ी को नज़दीक से देखने के बाद वह अनुमति मिलने तक बाहर ही प्रतीक्षा करने का निश्चय करता है। रखवाला उसे दरवाज़े की एक तरफ़ स्टूल पर बैठने देता है। वह वहाँ कई दिनों तक बैठा रहता है। यहाँ तक कि वर्षों बीत जाते हैं। इस बीच वह भीतर जाने के लिए रखवाले के आगे कई बार गिड़गिड़ाता है। रखवाला बीच-बीच में अनमने अंदाज़ में उससे उसके घर एवं दूसरी बहुत-सी बातों के बारे में पूछने लगता है, पर हर बार उसकी बातचीत इसी निर्णय के साथ ख़त्म हो जाती है कि अभी उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता।
आदमी ने सफ़र के लिए जो भी सामान इकट्ठा किया था और दूसरा जो कुछ भी उसके पास था , वह सब वह रखवाले को ख़ुश करने में खर्च कर देता है। रखवाला उससे सब-कुछ इस तरह से स्वीकार करता जाता है मानो उस पर अहसान कर रहा हो।
वर्षों तक आशा भरी नज़रों से रखवाले की ओर ताकते हुए वह दूसरे रखवालों के बारे में भूल जाता है! कानून तक पहुँचने के रास्ते में एकमात्र वही रखवाला उसे रुकावट नज़र आता है। वह आदमी जवानी के दिनों में ऊँची आवाज़ में और फिर बूढ़ा होने पर हल्की बुदबुदाहट में अपने भाग्य को कोसता रहता है। वह बच्चे जैसा हो जाता है। वर्षों से रखवाले की ओर टकटकी लगाए रहने के कारण वह उसके फर के कॉलर में छिपे पिस्सुओं के बारे में जान जाता है। वह पिस्सुओं की भी ख़ुशामद करता है ताकि वे रखवाले का दिमाग उसके पक्ष में कर दें। अंतत: उसकी आँखें जवाब देने लगती हैं। वह यह समझ नहीं पाता कि क्या दुनिया सचमुच पहले से ज़्यादा अँधेरी हो गई है या फिर उसकी आँखें उसे धोखा दे रही हैं। पर अभी भी वह चारों ओर के अंधकार के बीच कानून के दरवाज़े से फूटते प्रकाश के दायरे को महसूस कर पाता है।
वह नज़दीक आती मृत्यु को महसूस करने लगता है। मरने से पहले वह एक सवाल रखवाले से पूछना चाहता है जो वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उसे तंग कर रहा था । वह हाथ के इशारे से रखवाले को पास बुलाता है क्योंकि बैठे-बैठे उसका शरीर इस कदर अकड़ गया है कि वह चाहकर भी उठ नहीं पाता। रखवाले को उसकी ओर झुकना पड़ता है क्योंकि कद में काफ़ी अंतर आने के कारण वह काफ़ी ठिगना दिखाई दे रहा था।
‘‘अब तुम क्या जानना चाहते हो” --रखवाला पूछता है-- ‘‘तुम्हारी चाहत का कोई अंत भी है?”
‘‘कानून तो हरेक के लिए है” --आदमी कहता है-- ‘‘पर मेरी समझ में ये बात नहीं आ रही कि इतने वर्षो में मेरे अलावा किसी दूसरे ने यहाँ प्रवेश हेतु दस्तक क्यों नहीं दी?”
रखवाले को यह समझते देर नहीं लगती कि वह आदमी अंतिम घडि़याँ गिन रहा है। वह उसके बहरे होते कान में चिल्लाकर कहता है-- ‘‘किसी दूसरे के लिए यहाँ प्रवेश का कोई मतलब नहीं था क्योंकि कानून तक पहुँचने का यह द्वार सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही खोला गया था और अब मैं इसे बंद करने जा रहा हूँ।”
अंग्रेज़ी से अनुवाद: सुकेश साहनी

बना रहे बनारस

बना रहे बनारस( प्राचीन शहर )

जिस प्रकार हिन्दु धर्म कितना प्राचीन है पता नही चलता ठीक उसी प्रकार काशी कितनी प्राचीन है ,पता नही लग सका |
यद्धपि बनारस की खुदाई से प्राप्त अनेक मोहरे ,ईट,पथ्थर ,हुक्का ,चिलम और सुराही के टुकडो का पोस्मार्टम हो चुका है फिर भी सही बात अभी तक प्रकाश में नही आई है |जन -साधारण में अवश्य काशी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है |कहा जाता है कि सृष्टि कि उत्पत्ति के पूर्व काशी को शंकर भगवान अपने त्रिशूल पर लादे घूमते -फिरते थे |जब सृष्टि कि उत्पत्ति हो गयी तब इसे त्रिशूल से उतारकर पृथ्वी के मध्य में रख दिया गया |
यह सृष्टि कितनी प्राचीन है ,इस सम्बन्ध में उतना ही बड़ा मतभेद है जितना यूरोप और एशिया में या पूर्वी गोलार्द्ध में है |सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में एक बार प्रसिद्ध पर्यटक बर्नियर को कौतूहल हुआ था |अपनी इस शंका को उसने काशी के तत्कालीन पंडितो पर प्रगट की,नतीजा यह हुआ कि उन लोगो ने अलजबरा कि भांति इतना बड़ा सवाल लगाना शुरू किया जिसे देखकर बर्नियर कि बुद्धि गोल हो गयी |फलस्वरूप उसका हल बिना जाने उसने यह स्वीकार कर लिया कि काशी बहुत प्राचीन है |इसका हिसाब सहज नही |अगर हजरत कुछ दिन यंहा और ठहर जाते टी सृष्टि कि प्राचीनता के सम्बन्ध में सिर्फ उन्हें ही नही ,बल्कि उनकी डायरी से सारे संसार को यह बात मालूम हो जाती |चूँकि पृथ्वी के जन्म के पूर्व काशी कि उत्पत्ति हो गयी थी इसलिए इसे 'अपुनभर्वभूमि ' कहा गया है |एक अर्से तक शंकर के त्रिशूल पर चक्कर काटने के कारण 'रुद्रावास 'कहा गया |प्राचीन काल में यंहा के जंगलो में भी मंगल था ,इसीलिए इसे 'आनंदवन 'और 'आनन्द-कानन ' कहा गया |इन्ही जंगलो में ऋषि -मुनि मौज -पानी लेते थे ,इसीलिए इसे 'तप: स्थली 'कहा गया | तपस्वियों की अधिकता के कारण यंहा की भूमि को 'अविमुक्त -क्षेत्र 'की मान्यता मिली |
इसका नतीजा यह हुआ की काफी तादाद में लोग यंहा आने लगे |उनके मरने पर उनके लिए एक बड़ा श्मशान बनाया गया | कहने का मतलब काशी का 'नाम 'महाश्मशान ' भी हो गया |
प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह पता चलता है कि काश्य नामक राजा ने काशी नगरी बसाई :अर्थात इसके पूर्व काशी नगरी का अस्तित्व नही था |जब काश्य के पूर्व यह नगर बसा नही था तब यह निश्चित है कि उन दिनों मनु कि सन्ताने नही रहती थी ,बल्कि शंकर के गण ही रहते थे |हमे प्रस्तरयुग ,ताम्रयुग ,और लौहयुग कि बातो का पता है |हमारे पूर्वज उत्तरी ध्रुव से आये या मध्य एशिया से आये ,इसका समाधान भी हो चुका है |पर काश्य के पूर्व काशी कहा थी ,पता नही लग सका |
काशी की स्थापना
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काश्य के पूर्वज राजा थे इसीलिए उन्हें राजा कहा गया है अथवा काशी नगरी बसाने के कारण उन्हें राजा कहा गया है ,यह बात विवादास्पद है |ऐसा लगता है की इन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नही मिला ,फलस्वरूप ये नाराज होकर जंगल में चले गये |वहा जंगल आदि साफ़ कर एक फर्स्ट क्लास का बंगला बनवाकर रहने लगे |धीरे -धीरे खेती -बारी भी शुरू की |लेकिन इतना करने पर भी स्थान उदास ही रहा |नतीजा यह हुआ की कुछ और मकान बनवाये और उन्हें किराए पर दे दिया |इस प्रकार पहले -पहल मनु की संतानों की आबादी यहाँ बस गयी |आजकल जैसे मालवीय नगर ,लाला लाजपत नगर आदि बस रहे है ठीक उसी प्रकार काशी की स्थापना हो गयी |
ऐसा अनुमान किया जाता है की उन दिनों काशी की भूमि किसी राजा की अमलदारी में नही रही वरना काश्य को भूमि का पत्ता लिखवाना पड़ता ,मालगुजारी देनी पड़ती और लगान भी वसूल करते |चूँकि इस नगरी को आबाद करने का श्रेय इन्ही को प्राप्त हुआ था ,इसीलिए लोगो ने समझदारी से काम लेकर इसे काशी नगरी कहना शुरू किया |आगे चलकर इनके प्रपौत्र ने इसे अपनी राजधानी बनाया कहने का मतलब परपोते तक आते -आते काशी नगरी राज्य बन गयी थी और उस फर्स्ट क्लास के बंगले को महल कहा जाने लगा था |इन्ही काश्य राजा के वंशधर थे -दिवोदास |सिर्फ दिवोदास ही नही ,महाराज दिवोदास |कहा जाता है की एक बार इन पर हैहय वंश वाले चढ़ आये थे |लड़ाई के मैदान से रफूचक्कर होकर हजरत काशी से भाग गये | भागते -भागते गंगा -गोमती के संगम पर जाकर ठहरे |अगर वहा गोमती ने इनका रास्ता न रोका होता तो और भी आगे बढ़ जाते |जब उन्होंने यह अनुभव किया की अब पीछा करने वाले नही आ रहे है तब वे कुछ देर के लिए वही आराम करने लगे |जगह निछ्द्द्म थी |बनारसवाले हमेशा से निछ्द्द्म जगह जरा अधिक पसंद करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने वही डेरा डाल दिया |कहने का मतलब वही एक नयी काशी बसा डाली | कुछ दिनों तक चवनप्रास का सेवन करते रहे ,दंड पेलते रहे और भांग छानते रहे |जब उनमे इतनी ताकत आ गयी की हैहय वंश वालो से मोर्चा ले सके ,तब सीधे पुरानी काशी पर चढ़ आये और बात की बात में उसे ले लिया |इस प्रकार फिर काशीराज बन बैठे |हैहय वालो के कारण काशी की भूमि अपवित्र हो गयी थी ,उसे दस अश्वमेघ यज्ञ से शुद्ध किया और शहर के चारो तरफ परकोटा बनवा दिया ताकि बाहरी शत्रु झटपट शहर पर कब्जा न कर सके |इसी सुरक्षा के कारण पूरे 500 वर्ष यानी 18 -20 पीढ़ी तक राज्य करने के पश्चात इना वंश शिवलोक वासी हो गया |
काशी से वाराणसी
इस पीढ़ी के पश्चात कुछ फुटकर राजा हुए | उन लोगो ने कुछ कमाल नही दिखाया ,अर्थात न मंदिर बनवाए ,न स्तूप खड़े किए और न खम्भे गाड़े |फलस्वरूप ,उनकी ख़ास चर्चा नही हुई |कम -से -कम उन भले मानुषो को एक -एक साइनबोर्ड जरुर गाढ़ देना चाहिए था | इससे इतिहासकारों को कुछ सुविधा होती |
ईसा पूर्व सातवी शताब्दी में ब्रम्हदत्त वंशीय राजाओं का कुछ हालचाल ,बौद्ध -साहित्य में है ,जिनके बारे में बुद्ध भगवान ने बहुत कुछ कहा है ,लेकिन उनमे से किसी राजा का ओरिजनल नाम कही नही मिलता |
पता नही किस्मे यह मौलिक सूझ उत्पन्न हुई की उसने काशी नाम को सेकेण्ड हैण्ड समझकर इसका नाम वाराणसी कर दिया | कुछ लोगो का मत है की वरुणा और अस्सी नदी के बीच उन दिनों काशी नगरी बसी हुई थी ,इसीलिए इन दोनों नदियों के नाम पर नगरी का नाम रख दिया गया ,ताकि भविष्य में कोई राजा अपने नाम का सदुपयोग इस नगरी के नाम पर न करे |इसमें संदेह नही की वह आदमी बहूदूरदर्शी था वरना इतिहासकारों को ,चिठ्ठीरसो को और बाहरी यात्रियों को बड़ी परेशानी होती |
लेकिन यह कहना की वरुणा और असी नदी के कारण इस नगरी का नाम वाराणसी रखा गया बिलकुल वाहियात है ,गलत है और अप्रमाणिक है | जब पद्रहवी शदाब्दी में यानी तुलसीदास जी के समय ,भदैनी का इलाका शहर का बाहरी क्षेत्र माना जाता था तब असी जैसे बाहरी क्षेत्र को वाराणसी में मान कैसे लिया गया ? दूसरे विद्वानों का मत है की असी नही ,नासी नामक एक नदी थी जो कालान्तर में सुख गयी ,इन दोनों नदियों के मध्य वाराणसी बसी हुई थी ,इसलिए इसका नाम वाराणसी रखा गया |यह बात कुछ हद तक काबिलेगौर है लिहाजा हम इसे तस्दीक कर लेते है |
भगवान बुद्ध के कारण काशी की ख्याति आधी दुनिया में फ़ैल गयी थी | इसलिए पड़ोसी राज्य के राजा हमेशा इसे हडपना चाहते थे | जिसे देखो वही लाठी लिए सर पर तैयार रहने लगा |नाग ,शुंग और कण्व वंश वाले हमेशा एक दूसरे के माथे पर सेंगरी बजाते रहे | इन लोगो की जघन्य कार्यवाही के प्रमाण -पत्र सारनाथ की खुदाई में प्राप्त हो चुके है |
ईसा की प्रथम शताब्दी में प्रथम विदेशी आक्रामक बनारस आया | यह था -कुषाण सम्राट कनिष्क | लेकिन था बेचारा भला आदमी | उसने पड़ोसियों के बमचख में फायदा जरुर उठाया पर बनारस के बहरी अलंग सारनाथ को खूब सवारा भी | कनिष्क के पश्चात भारशिवो और गुप्त सम्राटो का रोब एक अरसे तक बनारस वालो पर ग़ालिब होता रहा | इस बीच इतने उपद्रव बनारस को लेकर हुए की इतिहास के अनेक पृष्ठ इनके काले कारनामो से भर गये है |मौखरी वंश वाले भी मणिकर्णिका घाट पर नहाने आये तो यहाँ राजा बन बैठे | इसी प्रकार हर्षवर्द्धन के अन्तर में बौद्ध धर्म के प्रति प्रेम उमड़ा तो उन्होंने भी बनारस को धर दबाया | आठवी शताब्दी में इधर के इलाके में कोई तगड़ा राजा नही था ,इसीलिए बंगाल से लपके हुए पाल नृपति चले आये | लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रतिहारो ने उन्हें खदेड़ दिया और स्वंय 150 वर्ष के लिए यहा जम गये | कन्नौज से इत्र की दूकान लेकर गाह्डवाले भी एक बार आये थे | मध्य प्रदेश से दुधिया छानने के लिए कलचुरीवाले भी आये थे |कलचुरियो का एक साइनबोर्ड कर्दमेश्वर मंदिर में है | यह मंदिर यंहा 'कनवा 'ग्राम में है | यही बनारस का सबसे पुराना मंदिर है | इसके अलावा जितने मंदिर है सब तीन सौ वर्ष के भीतर बने हुए है |
वाराणसी से बनारस
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अब तक विदेशी आक्रमक के रूप में वाराणसी में कनिष्क आया था | जिस समय कलचुरी वंश के राजा गांगेय कुम्भ नहाने प्रतिष्ठान गये हुए थे ,ठीक उसी समय नियालतगिन चुपके से आया और यहा से कुछ रकम चुराकर भाग गया | नियालतगिन के बाद जितने विदेशी आक्रमक आये उन सबकी अधिक कृपा मंदिरों पर ही हुई | लगता है इन लोगो ने इसके पूर्व इतना उंचा मकान नही देखा था | देखते भी कैसे ? सराय में ही अधिकतर ठरते थे जो एक मंजिल से ऊँची नही होती थी | यहा के मंदिर उनके लिए आश्चर्य की वस्तु रहे | उनका ख्याल था की इतने बड़े महल में शहर के सबसे बड़े रईस रहते है ,इसलिए उन्हें गिराकर लूटना अपना कर्तव्य समझा | नियालतगिन के बाद सबसे जबर्दस्त लुटेरा मुहम्मद गौरी सन 1914 ई. में बनारस आया | उसकी मरम्मत पृथ्वीराज पांच -छ बार कर चुके थे ,पर जयचंद के कारण उसका शुभागमन बनारस में हुआ | नतीजा यह हुआ की उस खानदान का नामोनिशान हमेशा के लिए मिट गया | सन 1300 ई ,में अलाउद्धीन खिलजी आया | उसके बाद उसका दामाद बाबर्कशाह आया ,जिसे 'काला पहाड़ ' भी कहा गया है |सन 1494 ई. में सिकन्दर लोदी साहब आये और बहुत कुछ लाद ले गये | जहागीर ,शाहजहा और औरंगजेब की कृपा इस शहर पर हो चूकि है | फरुखासियर और ईस्ट इंडिया कम्पनी की याद अभी ताजा है | पता नही ,इन लोगो ने बनारस को लुटने का ठेका क्यों ले रखा था ? लगता है ,उन्हें लुटने की यह प्रेरणा स्वनामधन्य लुटेरे महमूद गजनबी से प्राप्त हुई थी | संभव है, उन दिनों बनारस में काफी मालदार लोग रहा करते थे अथवा ये लोग बहुत उत्पाती और खतरनाक रहे हो |इसके अलावा यह संभव है की बनारस वाले इतने कमजोर रहे की जिसके में आया वही दो धौल जमाता गया | खैर कारण चाहे जो कुछ भी रहे हो बनारस को लुटा खूब गया है ,इसे धार्मिक और इतिहास के पंडित दोनों ही मानते है | बनारस को लुटने की यह परम्परा फरुखसियर के शासनकाल तक बराबर चलती रही |इन आक्रमणों में कुछ लोग यहा बस गये | उन्हें वाराणसी नाम श्रुतिकटु लगा ,फलस्वरूप वाराणसी नाम घिसते -घिसते बनारस बन गया |जिस प्रकार रामनगर को आज भी लोग नामनगर कहते है | मुगलकाल में इसका नाम बनारस ही रहा |

बनारस बनाम मुहम्मदाबाद
औरंगजेब जरा ओरिजनल टाइप शासक था | सबसे अधिक कृपा उसकी इस नगर पर हुई | उसे बनारस नाम बड़ा विचित्र लगा | कारण बनारस में न तो कोई रस बनता था और न यहा के लोग रसिक रह गये थे | औरंगजेब के शासनकाल में इसकी हालत अत्यंत खराब हो गयी थी | फलस्वरूप उसने इसका नाम मुहम्मदाबाद रख दिया |
मुहम्मदाबाद से बनारस
मुगलिया सल्तनत भी 1857 के पहले उखड़ गयी | नतीजा यह हुआ की सात समुन्द्र सत्तर नदी और सत्ताईस देश पार कर एक हकीम शाहजहा के शासनकाल में आया था ,उसके वंशधरो ने इस भूमि को लावारिस समझकर अपनी सम्पत्ति बना ली | पहले कम्पनी आई ,फिर यहा की मालिकन रानी बनी | रानी के बारे में कुछ रामायण प्रेमियों को कहते सुना गया है की वह पूर्व जन्म में त्रिजटा थी | संभव है उनका विश्वास ठीक हो |ऐसी हालत में यह मानना पडेगा की ये लोग पूर्व जन्म में लंका में रहते थे अथवा बजरंगबली की सेना में लेफ्ट -राईट करते रहे होंगे | गौरांग प्रभुओ की 'कृपा से ' हमने रेल ,हवाई जहाज ,स्टीमर ,मोटर ,साइकिल देखा | डाक -तार ,कचहरी और जमीदारी के झगड़े देखे | यहा से विदेशो में कच्चा माल भेजकर विदेशो से हजारो अपूर्व सुन्दरिया मंगवाकर अपनी नस्ल बदल डाली |
ये लोग जब बनारस आये तब इन्होने देखा --यहा के लोग बड़े अजीब हैं | हर वक्त गहरे में छानते है ,गहरेबाजी करते है और बातचीत भी फराटे के साथ करते है | कहने का मतलब हर वक्त रेस करते है |नतीजा यह हुआ की उन्होंने इस शहर का नाम 'बेनारेस' रख दिया |
बनारस से पुन:वाराणसी
ब्राह्मणों को सावधान करने वाले आर्यों की आदि भूमि का पता लगानेवाले डाक्टर सम्पूर्णानन्द को यह टेढा नाम पसंद नही था | बहुत दिनों से इसमें परिवर्तन करना चाहते थे पर मौक़ा नही मिल रहा था |लगे हाथ बुद्ध की 2500 वी. जयंती पर इसे वाराणसी कर दिया | यद्धपि इस नाम पर काफी बमचख मची ,पर जिस प्रकार संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश बन गया ,उसी प्रकार अब बनारस से वाराणसी बनता जा रहा है |
भविष्य में क्या होगा ?
भविष्य में वाराणसी रहेगा या नही ,कौन जाने | प्राचीनकाल की तरह पुन:वाराणसी नाम पर साफा -पानी होता रहे तो बनारस बन ही जाएगा इसमें कोई संदेह नही | जिन्हें वाराणसी बुरा लगता हो उन्हें यह श्लोक याद रखना चाहिए ---------
ख़ाक भी जिस जमी का पारस है ,
शहर मशहूर यही बनारस है |
पांचवी शताब्दी में बनारस की लम्बाई आठ मील और चौड़ाई तीन मील के लगभग थी | सातवी शताब्दी आते -आते नौ -साढे नौ मील लम्बाई और तीन -साढे तीन मील चौड़ाई हो गयी |
ग्यारहवी शताब्दी में ,न जाने क्यों इसका क्षेत्रफल पांच मील में हो गया | इसके बाद १1881 ई. में पूरा जिला एक हजार वर्ग मील में हो गया | अब तो वरुणा -असी की सीमा तोडकर यह आगे बढती जा रही है ; पता नही रबड़ की भाति इसका घेरा कहा तक फ़ैल जाएगा | आज भी यह माना जाता है की गंगा के उस पार मरने वाला गधा योनी में जन्म लेते है ,जिसके चश्मदीद गवाह शरच्चन्द्र चटर्जी थे | लेकिन अब उधर की सीमा को यानी मुगलसराय को भी शहर बनारस में कर लेने की योजना बन रही है | अब हम मरने पर किस योनी में जन्म लेंगे ,इसका निर्णय शीघ्र होना चाहिए ,वरना इसके लिए आन्दोलन -सत्याग्रह छिड़ सकता है | बनारस में शहरी क्षेत्र उतना ही माना जाता है जहा की नुक्कड़ पर उसके गण अर्थात चुंगी अधिकारी बैठकर आने -जाने वालो की गठरी टटोला करते है | इस प्रकार अब बनारस शीघ्र ही मेयर के अधिकार में आ जाएगा |
सुनील दत्ता ..........साभार विश्वनाथ मुखर्जी की पुस्तक ""बना रहे बनारस से ""

Saturday, September 7, 2019

लहू बोलता भी हैं

लहू बोलता भी हैं -- सैय्यद शाहनवाज कादरी
स्वदेशी आन्दोलन -
स्वदेशी आन्दोलन का मकसद था ब्रिटेन में बने सामानों का बाईकाट करना और भारत में बने सामानों को बढावा देकर ब्रिटेन को नुकसान पहुचाना | इससे हिन्दुस्तानियों को अपने रोजगार का मौक़ा भी मिला | उसी दौरान बंगाल के बटवारे के खिलाफ माहौल गरम होने लगा था | बंगाल के आसपास ये दोनों आन्दोलन एक साथ चले | इससे अंग्रेजी हुकूमत को काफी नुक्सान हुआ | इस आन्दोलन की कामयाबी को देखते हुए इसके लिए बनाई गयी कमेटियो को महात्मा गांधी के कहने पर जंगे - आजादी के मूवमेंट को तेज करने के लिए कांग्रेस के साथ शामिल कर दिया गया | इस आन्दोलन को मौलाना अबुल कलाम आजाद , अरविन्द घोष , रविन्द्र नाथ टैगोर बाल गंगाधर तिलक की मुश्तरका कयादत माना जाता है | दिल्ली और आस - पास के इलाको में सैय्यद हैदर रजा की कयादत ने इस आन्दोलन को बखूबी अंजाम दिया | यह आन्दोलन सन 1905 -- 1911 तक चला |
होमरूल मूवमेंट
अंग्रेजो ने काग्रेसी नेताओं और आंदोलनकारियो को यह यकीन दिलाया था कि पहली जंगे - अजीम में अगर भारत के लोग मदद करते है , तो जंगे - अजीम के बाद ब्रिटेन भारत को आजाद कर देगा | इस लालच में उस वक्त कांग्रेस और बाकी तंजीमे फँस गयी जो जंगे - आजादी का हिस्सा थी | इस पर पूरी कमेटी दो हिस्सों में बटती दिखाई देने लगी | एक गुट इससे मानने पर अड़ा हुआ था , लेकिन दुसरा इसे ब्रिटेन की चालबाजी मानता था इसीलिए इसे मानने से इनकार करके आन्दोलन का दूसरा रास्ता खोजने पर जोर देता था | यही होमरूल मूवमेंट की वजह बनी | सन 1915 - 1916 के बीच होमरूल लीग बनी | पुणे में होमरूल लीग की कयादत बाल गंगाधर तिलक ने की जबकि मद्रास में होमरूल लीग एनीबेसेंट की कयादत में बनी | बाद में ये दोनों ही कांग्रेस के साथ मिल गयी | इस आन्दोलन का मकसद असलहो या खून - खराबे के बिना ही स्वराज्य हासिल करना था | इस आन्दोलन में मुसलमानों ने अहम् किरदार निभाया था | हालाकि यह आन्दोलन भी और आंदोलनों की तरह बहुत असरदार नही रहा |
मेरठ बगावत के एक महीने बाद -
देवघर बिहार के रोहिणी में 12 जून 1857 को पांचवी देशी घुड़सवार सेना के कुछ जवानो ने बगावत कर दी | बिहार सूबे में सन 1857 की यह पहली वारदात थी | बागी सैनिको ने नौकरशाहों से बदला लेने के तहत मेजर मैकडोनाल्ड के घर रात 9 बजे हमला बोलकर वहां मौजूद लेफ्टिनेंट सर नार्मन लेसली और डाक्टर ग्रांट को तलवार से जख्मी करके मार डाला | इस हमले में बुरी तरह घायल मेजर मैकडोनाल्ड बच गया | इस अचानक के हमले से अंग्रेज अफसर बौखला गये | सेना की जांच में बागी सैनिको की कयादत करने वालो के रूप में जो नाम सामने आया , वह मेजर इमाम खान का था | वक्ती तौर पर इमाम खान तो पकड में नही आये , लेकिन उनके साथ के तीन सैनिक सलामत अली , अमानत अली और शेख हारून गिरफ्तार कर लिए गये जिन्हें मेजर मैकडोनाल्ड ने खुद ही कोर्ट - मार्शल किया और सरकार से आडर्र लिए बिना ही उन्हें फाँसी देने का हुकम दे दिया | मेजर ने तीनो क्रांतिवीरो को हाथी पर खड़ा करके पेड़ पर लटकाने के लिए खुद ही उनके गर्दन में रस्सी बाँधी और हाथी को दौड़ा दिया | इस तरह उन तीन क्रांतिवीरो की शहादत हुई | लेकिन हर कोशिश के बाद भी मेजर इमाम खान को अंग्रेज गिरफ्तार नही कर पाए | सरकार ने उनकी गिरफ्तारी पर इनाम का एलान भी कर रखा था | मेजर इमाम खान ने कुछ और सैनिको को साथ लेकर देवघर में लेफ्टिनेंट एस .सी .ए. कपूर के घर पर हमला बोलकर कपूर और असिस्टेंट कमिश्नर आर .ई. रोनाल्ड को मौत के घाट उतार दिया और बंगले में आग लगा दिया | इस हमले में मौजूद तीसरा अफसर ले .रैनी घायल हालात में बच निकला | उसे दो सैनिक डोली में बैठाकर दूर एक गाँव में लेकर गये , जहाँ पर उन्ही सैनिको की मदद से रैनी अपने हेडक्वाटर पहुचा | मेजर इमाम खान के बारे में इसके बाद कहीं कोई खबर नही मिलती | बिहार में सन 1857 की बगावत की कुछ किताबो में सिर्फ एक जगह मेजर इमाम खान को गोली मारे जाने की बात कही गयी लेकिन तारीख और महीना वहां अंदाजन जुलाई सन 1857 लिखा गया हैं |
भागलपुर में भी क्तुबर सन 1857 में सैनिको की बगावत की खबर फैली | अंग्रेजी फ़ौज के अफसर शहादत अली का कत्ल हुआ , लेकिन उसके बगावत को दबा दिया गया | इस कत्ल के इल्जाम में भागलपुर के ही अहदु खान , वुद्घु खान , बहादुर खान , याद अली गिरफ्तार किये गये | बगावत में शामिल होने और अंग्रेज अफसर के कत्ल के इल्जाम में चारो को 10 व 12 अक्तूबर सन 1857 को फांसी दे दी गयी | इसी केस में पांच गैर मुस्लिम सैनिको को भी फाँसी की सजा हुई थी |
मुंगेर जिले के मोहनपुर गाँव में पठान जमींदारों ने अगस्त सन 1857 में अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ बगावत कर दी | उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करके कचहरी पर हमला किया और सरकारी दस्तावेजो को लूटने के साथ ही वहां आग लगा दिया | इस बगावत के इल्जाम में दस लोग गिरफ्तार हुए उनके उपर मुकदमा चलाया गया , जिसमे करीम खान की पुलिस पिटाई से जेल में ही मौत हो यी | रज्जू खान को उम्रकैद की सजा हुई | इन पठानों के साथ एंव पांच और गैर मुस्लिम कारिंदों पर ही मुकदमा चला और उनमे से दो को 14 - 14 साल और दो को को 9-9 साल की सजा हुई |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार -समीक्षक

Friday, August 30, 2019

आज भी कबीर की धार मौजूद हैं - दार्शनिक विनोद मल्ल

आज भी कबीर की धार मौजूद हैं - दार्शनिक विनोद मल्ल
पिछले दिनों इंदौर के जाल सभागार में स्वरागिनी जन विकास समिति के तत्वाधान में बुद्ध व कबीर नये संदर्भ में नये तथ्यों के साथ विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया | कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ आरम्भ हुआ सर्व प्रथम स्वरागिनी संगीत संस्था द्वारा उनके छात्रो द्वारा कबीर के पदों की प्रस्तुती की गयी , इसके बाद सेमीनार की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार - सीनियर फोटोजर्नलिस्ट सुनील दत्ता ''कबीर द्वारा किया गया , विषय प्रवर्तन करते हुए सुनील दत्ता कबीर ने कहा किकबीर की आवाज कामगारों की आवाज थी कबीर जिस युग में आये उस जमाने में उन्होंने देखा कि पूरी व्यवस्था एक विशेष तरह के मोर्चे के साथ जनशोषण कर रही है | जनशोषण के लिए उस समय के शक्तिशाली लोगो ने कानून से भी बड़ा कानून बना रखा था जिसे धर्म कहा जाता था | धर्म की आड़ में खड़े हो जाने के कारण शोषक वर्ग अपनी चालाकी को दैवी - विधान से जोड़ देता था | आकस्मिक नही था कि कबीर को इस चालाक लोक - वेद - समर्थित दैवी - विधान के खिलाफ आवाज उठानी पड़ी | जिन लोगो के पक्ष में पत्थर , पानी अर्थात मुर्तिया और तीर्थ खड़े थे उनके खिलाफ कबीर को कविता का शस्त्र खड़ा करना पडा ; जिन लोगो के पक्ष में किताबे , मंदिर - मस्जिद लैस थे उन लोगो के खिलाफ कबीर को साधू शब्दावली की सहायता से मुकाबला करने वाला संयम स्थिर करना था | 

जिन लोगो ने अपने हितो की रक्षा के लिए पुरोहित , शेख और मुल्ले तैयार कर रखे थे उनके विपक्ष में कबीर ने अपने घर में जुलाहा , मजदुर का कार्य करते हुए श्रम की ताकत से लड़ाई शुरू की | मिथकीय स्तर पर यह लड़ाई राम - रावण की लड़ाई थी , रथी और विरथ की लड़ाई | शोषक वर्ग के शिक्षितों , साधन सम्पन्नो के खिलाफ यह एक गरीब कामगार की लड़ाई थी | सेमीनार आगे बढाते हुए दिल्ली से आये दार्शनिक -लेखक -सिनेमा निर्देश कृष्ण कल्कि जी ने कहा कि कृष्ण और कबीर को जोड़ते हुए कहा कि दोनों के माथे पर बँधी मोरपंखी पर मत जाइये, कृष्ण और कबीर दोनों में हमारी परम्परा और लोक-चेतना बे-ओर-छोर का अपार अन्तर मानती-आँकती आयी है. कहाँ कृष्ण, जो राजमहलों के अभिजात्य सोपानों से कभी नीचे न उतरे... जिनकी राजधानी भी अथाह सागर तक को चुनौती देती रही— और कहाँ कबीर, जिनकी झोपड़ी अपने ज़माने के आम लोगों से बदतर... और वह भी कसाइयों की शहर-बाहर की बस्ती में : खुद कहते हैं वह— "कबिरा तेरी झोपड़ी गलकट्टों के पास" ! जहाँ एक ओर कृष्ण अपने समय में राजाओं के भी राजा की भूमिका निभाते रहे, वहीं दूसरी ओर कबीर दबे-कुचले लोगों को साथ लेकर जीवन-भर जन-चेतना की ऐसी अलख जगाते रहे जो सदियों बाद तक राजसत्ता को अपनी निरंकुश राह में रोड़े की तरह चुभती रही. जहाँ एक ओर कृष्ण भगवत्ता को धरती पर उतारे जाने की प्रतिमा बनकर उभरते हैं, वहीं दूसरी ओर कबीर भगवत्ता की हर प्रतिमा को ताउम्र तोड़ते दिखायी पड़ते हैं. ज़ाहिरन, कृष्ण और कबीर एक नाव के मुसाफिर नहीं हैं; दोनों में दूरी बहुत है, अन्तर बहुत और विषमताएं भी बहुत. दोनों ने हालाँकि आत्मिक स्तर पर अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर को जिया, दोनों ने हालाँकि वैयक्तिक स्तर पर प्रेम के ढाई आखर को अपनी साँसों की गरमी दी— लेकिन लोक के स्तर पर, समाजी परिवेश के स्तर पर, दोनों की भूमिका में और दोनों के अभिगम्य में ज़मीन-आसमान का अन्तर था. इसीलिए हमारी परम्परा ने— जिनमें केवल दार्शनिक और विद्वान ही नहीं, बल्कि आम लोग भी शामिल हैं— उन सब ने कृष्ण और कबीर दोनों को एक-साथ याद करने से हमेशा परहेज़ किया है. मानते हालाँकि वे सब भी कृष्ण और कबीर दोनों को हैं, लेकिन चर्चा दोनों की अलग-अलग ही करते रहे हैं— गोया कि कबीर के साथ जुड़कर कृष्ण की भगवत्ता पर कोई धब्बा लग जायेगा, या फिर कृष्ण के साथ नाम जुड़ने से कबीर की कबीरीयत कुछ कमतर हो जायेगी !

लेकिन तर्कशीलता का वह अंकुर चूंकि तब तक मानव-सभ्यता के लिए नया-नया था, कोमल था, इसलिए उसकी रक्षा के लिए हालाँकि आगे चलकर स्वयं कृष्ण को पुरातनता की पिटी-पिटायी लकीरों के साथ थोड़े-बहुत समझौते भी करने पड़े, लेकिन फिर भी उन लकीरों में भी उन्होंने उस समय तक की तर्कशीलता का समावेश करते हुए उन्हें नया रूप ज़रूर दे दिया, जो कि तब तक के लिहाज से पाखण्ड-शून्य थे
वैज्ञानिक दृष्टि से लबरेज़ बुद्ध ने विश्व के जन-मानस पर भी बहुत गहरा असर डाला है. उनकी समता-मूलक, मध्यम-मार्गीय और तर्कनिष्ठ वैचारिकी ने दुनिया के तमाम देशों में सच को सच की तरह ही पहचानने और परखने की कुव्वत पैदा की है; ढोंग-ढकोसलों को परे हटाकर हताश आदमी को होशपूर्ण इंसान बनानेवालों की जमात तैयार की है— भले ही जिस भारत-भूमि पर उनका प्रादुर्भाव हुआ था, वहाँ से तो कालान्तर में उनके माननेवालों की जमातें उखड़ गयीं... या तमाम किस्म के छल-छद्म-कौशलों का इस्तेमाल करके साज़िशन उखाड़ दी गयीं, क्योंकि तर्कशीलता को आचरण की सभ्यता बनानेवाली उन जमातों का सामना यहाँ उन दकियानूस पोंगापंथियों से था जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए तब इसे उस कोटि का एक ऐसा युद्ध मानकर लड़ रहे थे, जिसकी नंगी सच्चाई को बयान करते हुए 'रश्मिरथी' में दिनकर ने कहा है कि— "सत्य ही युद्ध में जय के लिए नहीं केवल बल चाहिए; कुछ बुद्धि का भी घात, छल-छद्म-कौशल चाहिए". ऐसी ही कायराना साजिशों पर अमल करके उस युद्धक मानसिकता के कर्णधारों ने बुद्ध की तर्कशील वैचारिकी के बल से संपन्न शान्तिपूर्ण जमातों का सालों-साल हर तरह से दमन किया; हज़ारों-हज़ार विहारों को जला डाला; अनगिनत भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन जैसा कि सूली पर चढ़ाये जाते वक़्त जीसस ने कहा था कि "हे पिता ! इन्हें क्षमा कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं"— मतलब यह कि जीसस के शरीर को मिटाने से जीसस की वैचारिकी नहीं मिटती, उसी तरह बुद्ध के माननेवालों के संगठित कत्लेआम से भी बुद्ध की आधारभूत तर्कशीलता मिट तो नहीं सकी... उल्टे, जन-जन के ज़ेहन में वह पैठ ज़रूर गयी. लोगों के दिल-दिमाग में तब स्वाभाविक रूप से तमाम ऐसे सवाल खदबदाने लगे, जो पीढ़ियों तक उनके मन को प्रतिरोध के जज़्बे से भरने का कारण बने. प्रतिरोध की यह आग सुलगती गयी तमाम तरह के पाखंडों के खिलाफ, विभेदकारी गैर-बराबरी के खिलाफ, कर्मकांडों के कांइयापन के खिलाफ, अंधविश्वासों की बे-दिमागी के खिलाफ, ऊँच-नीच व छुआ-छूत की बीमार भावना के खिलाफ, पाठ-पूजा व शिक्षा-दीक्षा पर कुछ लोगों के एकाधिकार के खिलाफ, सच्चे-झूठे आसमानी देवताओं के खिलाफ, ज़मीनी ओझाओं के खिलाफ, भय-प्रलोभनों पर टिकी धरम-पोथियों के खिलाफ, पुरोहितों के ज़ालिम जकड़जालों के खिलाफ, धर्म के नाम पर जारी शोषण के खिलाफ... गरज़ यह कि व्यवस्था और प्रतिष्ठान के हर उस तौर-तरीके के खिलाफ लोगों के मन में तब दिनों-दिन बढ़ता प्रतिरोध प्रज्जवलित होने लगा, जो हर बीतती पीढ़ी के साथ धमनियों के रक्त को कुछ और गरमाता भी गया. प्रतिरोध की यह ज्वाला, जो तर्कशील चेतना से उपजी थी, कबीर तक आते-आते प्रखर हो चुकी थी. चौदहवीं सदी के अंतिम वर्षों में जब कबीर का प्रादुर्भाव हुआ था, उस समय न केवल देश की सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा-सी गयी थी बल्कि आस्था के सबरंगी फूल भी अपनी सुगंध से छीजने लगे थे.
 दक्षिण-भारत के कुछ हिस्सों में तो राज-व्यवस्था फिर भी स्थिति को सँभाले रखने के लिए सचेष्ट थी, लेकिन बाकी भारत में जन-जीवन की हालत चौतरफा बरबादी के साथ गोया होड़ कर रही थी. अनाचार उन दिनों अपने चरम पर था और सदाचार रसातल में. तंत्र के अत्याचारी शिकंजे में बेबस पड़ा लोक अपने हाल पर बिलख रहा था. व्यवस्था शीर्षासन कर रही थी. जनहितों की बलि दी जा रही थी. मुक्ति दिलाने का वायदा करनेवाला भगवान खुद मन्दिर में नज़रबंद था और बस मुट्ठी-भर लोगों को ही दर्शन देने पर मज़बूर भी. खुदाई सोयी पड़ी थी, अजानें भी उसे जगा नहीं पा रही थीं. पण्डितों और मुल्लाओं की तूती बोल रही थी. धर्म पर हावी था पाखण्ड. आडम्बर ही पूजा जा रहा था. मेहनतकशी निन्दित थी और विलास की मठाधीशी सम्मानित. योगी ढोंगी थे और सिद्ध नकली. पुजारी व्याभिचारी थे और संत मक्कार. वर्तमान संत्रस्त था और भविष्य अन्धकारपूर्ण.ज़माने की हालत देखकर अन्धकार उन दिनों हर आम आदमी की आँखों में भी छाने लगा था. अब चूंकि तर्कशील चेतना की जाग्रत् कसौटी थी | इस सेमीनार के क्रम को आगे बढाते हुए गुजरात पुलिस के ए.डी.जी दार्शनिक - च्निताक श्री विनोद मल्ल ने कहा कि जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हुए महानुभाव ने शिरकत की श्री कृष्ण कल्कि ने कबीर और बुद्ध के दार्शनिक पहलू पर बात करते हुए आज के समय में कबीर की प्रासंगिकता पर बात की आज के समय में जिस तरीके से समाज में कर्मकांड का फैलाव हो रहा है उसका विरोध करने की आवश्यकता है और यह प्रेरणा हमें कबीर से मिलती है श्री विनोद मल्ल आईपीएस जो बुद्ध से कभी तक संस्था के प्रमुख हैं उन्होंने भारत की दार्शनिक विरासत को विविधता और बहुलता बाद से परिपूर्ण बताएं हमारे देश की संस्कृति अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के सम्मिश्रण और विकास और अंतर प्रभाव से बनी हुई है और हमें उस पर गौरव करना चाहिए आज बुध का मध्यम वर्ग समाज को संवाद की तरफ ले जाने की प्रेरणा देता है और सारे आपसी मामले बातचीत से हल करने के लिए रास्ता दिखाता है कबीर का ब्रह्म सारे मानव की बराबरी पर जोर देता है और यह बताता है कि जात पात और धर्म पर आधारित भेदभाव आज के समाज के लिए अच्छे नहीं हैं और उनको दूर करने की आवश्यकता है | उन्होंने आगे कहा की अपने बात की शुरुआत विनोद मल्ल ने मालवा की गौरवपूर्ण इतिहास के साथ शुरू की जो की विविधता से भरी हुई है। उन्होंने इस प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों को भी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दी थी ।मालवा पक्षेत्र में कबीर की एक अत्यंत समृद्ध परंपरा है और कबीर के गाने बजाने वाले लोग कबीर के संदेशों का प्रचार प्रसार जनमानस में करते रहते हैं। भारत एक विविधता पूर्ण देश है जिसका इतिहास विविधता से भरा हुआ है। हजारों वर्षों से भारत में अलग-अलग धर्म और संस्कृतियों के लोग एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे से सीखते हुए, एक समृद्ध साझा संस्कृत का निर्माण किए। हमारे महापुरुषों महावीर, बुद्ध, नागार्जुन शंकराचार्य ,कबीर ,तुलसी ,नामदेव गुरु नानक, विवेकानंद और गांधी ने हमारी परंपरा के तत्वों को जाना और पहचाना। इन्हीं तत्वों को लेकर स्वतंत्रता संग्राम में हम आगे बढ़ते रहे। महावीर और बुद्ध के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए अपनाया और इसीलिए हिंदुस्तान का स्वतंत्रता संग्राम दुनिया के दूसरी आजादी की लड़ाईयों से बिलकुल अलग सा दिखता है। अगर हम गांधी, नेहरू, पटेल, अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जैसे लोगों के विचार सुने और देखें, वो विचार जो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन में बार-बार रखे गए, तो हम पाएंगे कि भारत का इतिहास विविधता और बहुसंस्कृतिवादी परंपरा को लेकर के आगे बढ़ता है।
अगर हम भारत की धार्मिक परंपरा की बात करें तो हम पाएंगे कि भारतवर्ष में सभी धर्म के लोग मौजूद हैं और सभी धर्म एक दूसरे की इज्जत करते हैं । वे एक दूसरे से सीखते हुए आगे बढ़ते देखे जा सकते हैं ।इस्लाम का एकेश्वरवाद और वेदांत का अद्वैत ब्रह्म एक दूसरे से करीब दिखता है। इसीलिए भारत में जहां एक तरफ इस्लाम में सूफी परंपरा आगे बढ़ती है वहीं पर हिंदू धर्म में भक्तिकाल विकसित होता है। सूफी परंपरा दक्षिण एशिया की अनूठी परंपरा है। वेदांत की परंपरा में भी रामानुज के ईश्वर की हर व्यक्ति अपने तरीके से आराधना कर सकता है। सबसे खास बात यह है कि आराधना करने का कोई एक रास्ता नहीं होता । जो जिस तरीके से चाहे उस तरीके से ईश्वर की आराधना कर सकता है ।इसीलिए भारतीय परंपरा में धर्म के साथ संगीत, नृत्य और कविता बहुत ही बारीकी से जुड़े हुए हैं । ईश्वर के रूप को लेकर के दो परंपराएं भारत में मौजूद रही हैं - सगुण और निर्गुण। व्यक्ति की अपनी आजादी है कि वह सगुण परंपरा से ईश्वर की आराधना करना चाहता है या निर्गुण परंपरा से। जहां सूर और तुलसी, कृष्ण और राम को लेकर एक मजबूत सगुण परंपरा की रचना करते हैं और महाकाव्यों का निर्माण करते , हैं वहीं कबीर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं और अपने सीधे-साधे दोहों से समाज की कुरीतियों पर आक्रमण करते हैं। कबीर दास के निर्गुण हमारी संगीत परंपरा में जनमानस में गहरे तक प्रवेश कर चुके हैं। आज का यह कार्यक्रम उसी परंपरा की कड़ी को आगे बढ़ाता हुआ कार्यक्रम है जिसमें माननीय अंजना जी, बनारस से आए हुए ताना-बाना के कलाकार और मालवा प्रदेश के प्रतिष्ठित कलाकार आज आपके सामने संगीत प्रस्तुत करने वाले हैं।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि विश्व में कहीं भी इतनी समृद्ध परंपरा कभी नहीं रही है। ज्यादातर धर्मों में ईश्वर एक पूजा गृह या एक किताब तक सीमित हो जाता है । जब कि भारतीय परंपरा में ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, सर्वत्र बिखरा हुआ है। अलग-अलग रूपों में है और संगीत, कविता ,नृत्य, मंदिर और कई बार जंगलों में नदियों में खुली जगहों में भी लोग ईश्वर की आराधना करते हुए देखे जा सकते हैं। बुद्ध से कबीर तक आंदोलन आज से करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को सहेजना तथा इसके विविधता पूर्ण , बहुसंस्कृतिवादी परंपरा को मजबूती प्रदान करना है जिससे हम अपने संविधान में लिखे हुए बराबरी, न्याय और आजादी के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचा सकें। आज का प्रयास उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है कार्यक्रम को आगे बढाते हुए स्वरागिनी संस्था के सचिव श्री महेश यादव इ नेतृत्व में कबीर सुर साधिका श्रीमती अंजना सक्सेना जी द्वारा कबीर के गाया गया , इसके बाद कबीर मठ से आये तानाबान के साथियो ने कबीर के पदों पर नये प्रयोग के संग प्रस्तुती दी जिसके चले साभागर में बैठे सारे श्रोता कुछ समय के लिए कबीर मय हो गए | कार्यक्रम में शहीद मेला के संयोजक इ राज त्रिपाठी को उनके इस कार्य के लिए सम्मानित किया गया , इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकार -सीनियर फोटो जर्नलिस्ट , एक्टिविस्ट सुनील दत्ता कबीर , दिल्ली से आये कृष्ण कल्कि जी के साथ दार्शनिक -चिन्तक श्री विनोद मल्ल को संस्था द्वारा सम्मानित किया गया | अंत में स्वरागिनी संस्था की अध्यक्षा श्रीमती अंजना सक्सेना द्वारा आभार व्यक्त किया गया |