Friday, January 30, 2015

प्रेरणा के स्वर

प्रेरणा के स्वर

एक पुरानी कथा है | एक सम्राट के दरबार में बाहरी देश से आया एक चारण पहुचा | उसने सम्राट की स्तुति में अनेक सुन्दर - सुन्दर गीत प्रस्तुत किये | उन गीतों ने सम्राट के साथ - साथ दरबारियों का भी मन मोह लिया | यह सब उस चारण ने कुछ पाने की लालसा से किया था | जब उसका स्तुतिगान खत्म हुआ तो सम्राट ने खुश होकर सोने की बहुत सी मुहरे उसे भेंट की | इन मुहरो को पाकर चारण बहुत खुश हुआ  | पर जैसे ही उसने इन मुहरो पर नजर डाली उसके भीतर मानो कुछ कौध गया | एक चमक उसकी चेतना में बिखर गयी  | अब उसके चेहरे के भाव बिलकुल बदल गये | उसने आकाश की ओर कृतज्ञता भरी नजरो से देखा | उसे लगा कि मानो आकाश भी मौन स्वर में उसके अंतर्भावो के साथ सहमती जता रहा है | अब उसने मोहरे वही छोड़ दी और नाचने लगा | एक अनूठी कृतज्ञता उसके मुखमंडल पर छा  गई  | उसके हाव - भाव पूरी तरह बदल चुके थे | उन मुहरो को देखकर उसमे ना जाने जैसी क्रान्ति हो गयी थी | अब वह चारण नही रहा , वरन संत हो गया | उसकी अंतर्चेतना में कामना के बजाए प्रेरणा के स्वर गुजने लगे | काफी अरसा गुजरने के बाद एक दिन किसी ने उससे पूछा -- ' क्यों भाई , ऐसा क्या था उन मुहरो में ? क्या वे जादुई थी ? इस पर वो हंसा और बोला -- मुहरे जादुई नही थी | वह वाक्य जादुई था जो उन पर लिखा था | ' कुछ पलो की आत्मनिमग्नता के बाद उसने अपनी बात पूरी की -- '' उन मुहरो पर लिखा था -- जीवन की सभी आवश्यकताओ के लिए परमात्मा पर्याप्त है | '' उसने इस बात का सार समझाते हुए आगे कहा -- जो इस बात को जानते है , वे सभी इस सच की गवाही देते है | जिनके पास सब कुछ है , सारा ऐश्वर है , ईश्वर के बिना वे दरिद्र दिखाई देते है |  वही ऐसे सम्पत्तिशाली भी है , जिनके पास कुछ भी नही , केवल वे संतुष्ट है वो सुखी है | जिन्हें सब पाना है , उन्हें सब छोड़ देना होगा | जो सब कुछ छोड़ने का साहस रखते है , वे स्वंय को पा  लेते है | उनके सामने अनायास ही सत्य उजागर हो जाता है |

Thursday, January 29, 2015

नया भूमि अधिग्रहण विधयेक और उसके मसौदे में संशोधन 30-1-15

नया भूमि अधिग्रहण विधयेक और उसके मसौदे में संशोधन

 ( क्या किसानो के हित में , या किसानो के विरोध में )

इस अन्याय का प्रतिकार भूमि अधिग्रहण का मार सहने वाले किसानो और उससे ग्रामीणों को ही करना होगा | उन्हें भूमि अधिग्रहण और उसके मसौदा को , उसमे किये जाते रहे संशोधनों को स्वंय अपनी चर्चा का तथा विरोध का विषय बनाना होगा
नया भूमि अधिग्रहण विधेयक लोकसभा में पेश किया जा चुका है | इसका मसौदा 29 जुलाई को जारी किया गया था | 5 सितम्बर के समाचार पत्रों में इस मसौदे का वह संशोधित रूप प्रकाशित हुआ , जिसे संसद में पास करवा कर कानून का रूप दिया जाना है | यही कानून , भूमि अधिग्रहण के 1894 के कानून की जगह लेगा | संसद में बहस के बाद यह कानून के रूप में कैसे सामने आता है , यह बाद की बात है | पर दिलचस्प बात यह है कि 29 जुलाई को देशव्यापी राय मशविरे के लिए जारी मसौदे में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव कर दिये गये है | इस बदलाव के लिए सरकार को किसने सलाह दी ? क्या किसानो ने ?एकदम नही | किसानो या किसान संगठनों कि राय तो कही चर्चा तक में नही आई | लेकिन उद्योगपतियों के संगठनों और प्रचार माध्यमी जगत के दिग्गजों कि राय जरुर आती रही | इस संदर्भ में समाचार पत्रों में सूचनाये भी प्रकाशित होती रही | बेहतर है कि किसी भी नतीजे पर पहुचने से पहले मसौदे में दिये गये बदलाव को मोटे तौर पर देख लिया जाए 
1 . 29 जुलाई को जारी किये गये मसौदे में यह कहा गया था कि , खेती योग्य और सिंचित जमीन का अधिग्रहण नही किया जाएगा |लेकिन उद्योगपतियों के संगठनों और उनके समर्थको के खुले दबाव के बाद इसके अधिग्रहण को हरी झंडी दे दी गयी है | बड़े उद्योगपतियों के संगठन "पिक्की " द्वारा मसौदे पर सुझाव के रूप में यह बयान समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ है | हाँ , इस सुझाव में सांत्वना के तौर पर ग्रामीण विकास मंत्री ने विधेयक में यह प्राविधान जोड़ दिया है कि ( लेकिन कितने दिन बाद , यह अनिश्चित है ) उस जिले में उतनी कृषि भूमि का सिंचित भूमि में विकास कर दिया जाएगा |
2--- जुलाई के मसौदे में ग्रामीण इलाको कि जमीन का मुआवजा बाज़ार दर से 6 गुना ज्यादा दिये जाने का प्रस्ताव किया गया था | अब अधिग्रहण के बाद मुआवजे कि रकम अदा करने वाली कम्पनियों , डेवलपरो के दबाव में उसे घटाकर 4 गुना कर दिया गया है | 
3--- तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव - मसौदे में यह प्रस्तावित था कि 5 साल तक अधिग्रहित भूमि का घोषित उद्देश्य के लिए न इस्तेमाल किये जा सकने कि स्थिति में वह जमीन किसानो एवं ग्रामवासियों को लौटा दी जायेगी | लेकिन अब नये संशोधन के अनुसार अब वह जमीन इस्तेमाल न किये जाने के वावजूद जमीन के मालिक किसानो को बिलकुल लौटाई नही जायेगी | अब वह भूमि राज्य भूमि प्राधिकरण के कब्जे में चली जायेगी | कुछ समाचार पत्रों में यह सुचना भी आई थी कि 5 वर्ष कि मियाद को संशोधित करके 10 वर्ष कर दिया जाना है | अर्थात 10 साल तक अधिग्रहित जमीन का इस्तेमाल न होने पर वह राज्य भूमि प्राधिकरण के कब्जे में चली जायेगी | 
इसके अलावा मसौदे के कई अन्य सुझावों में बदलाव किये गये है | जिन्हें हम कानून के रूप में आने के बाद प्रस्तुत करेंगे और उस पर चर्चा भी करेंगे | लेकिन अभी तक मसौदे में किये गये उपरोक्त संशोधनों से यह बात समझना कतइ मुश्किल नही है कि , ये संशोधन किसानो द्वारा नही , बल्कि बड़े उद्योगपतियों , व्यापारियों द्वारा कराए गये है | कयोंकि भूमि अधिग्रहण से सम्बन्धित मसौदे व विधेयक को किसानो को बताने और उनकी राय जान्ने का तो कोई प्रयास ही नही किया गया | 29 जुलाई को पेश किये गये मसौदे का कोई सरकुलर ग्राम सभाओं तक को नही भेजा गया | फिर 26 जुलाई को जारी किये गये मसौदे के केवल एक माह बाद उसे विधेयक या कानून का रूप देने में यह बात स्पष्ट है कि इस मसौदे पर कृषि - भूमि के मालिक से कोई राय नही ली जानी थी | इनकी जगह भूमि अधिग्रहण के घोर समर्थक भूमि लोलुप कम्पनियों के प्रमुखों व डेवलपरो आदि जैसे गैर किसान , धनाढ्य वर्गो की ही राय ली जाने वाली थी | कयोंकि वे ही सत्ता सरकार से अपने हितो में नीतियों , मसौदो , विधेयको को बनाने व लागू करने - करवाने के लिए सत्ता सरकार के इर्द - गिर्द मडराते रहते है | सरकारे भी इन्ही की सुनती है |इनसे ही राय मशविरा करती है | साफ़ बात है कि यह मसौदा भी उन्ही के लिए जारी किया गया था , न कि किसानो तथा अन्य ग्रामीण हिस्सों के लिए | क्या यह कृषि भूमि पर किसानो व अन्य ग्रामवासियों से जुड़े अहम मुद्दे पर उकी अनदेखी करने का अन्याय नही है ? एकदम है | लेकिन इसे कहेगा कौन ? केन्द्रीय सरकार में बैठी पार्टियों ने तो अन्याय किया ही है , लेकिन विरोधी पार्टियों ने भी सरकार पर उस मसौदे के बारे में किसानो से राय मशविरा लेने की कोई बात नही करके उसी अन्याय का साथ दिया है | ज्यादातर प्रचार माध्यमि बौद्धिक हिस्सों ने भी इसी अन्याय का साथ दिया है | इसलिए अब इस अन्याय का प्रतिकार भूमि अधिग्रहण का मार सहने वाले किसानो और उससे ग्रामीणों को ही करना होगा | उन्हें भूमि अधिग्रहण और उसके मसौदो को , उसमे किये जाते रहे संशोधनों को स्वंय अपनी चर्चा का तथा विरोध का विषय बनाना होगा | यह विरोध संगठित रूप और व्यापक रूप में , गाँव स्तर से लेकर देश स्तर पर किये जाने की आवश्यकता हैं | इसके लिए उन्हें अपनी किसान समितियों और महा समितियों को भी जरुर खड़ा करना होगा | ताकि इसके जरिये वे किसान विरोधी नीतियों के विरोध के साथ कृषि विकास , कृषि सुरक्षा की मांग खड़ी कर सके | उसके लिए सरकारों पर बराबर दबाव डाल सकें | हम कब सचेत होंगे जब हमसे सब कुछ छीन जाएगा ?


सुनील दत्ता
पत्रकार

Wednesday, January 28, 2015

तत्वज्ञानी --- 29-1-15

 तत्वज्ञानी ---




सिकन्दर ने सुन रखा था कि भारत विश्व गुरु है वो सुन रखा था की यहाँ पर एक से बढ़कर एक तत्वज्ञानी  मौजूद है  | उसके मन में विचार आया कि ऐसे ही किसी श्रेष्ठ तत्वज्ञानी को उसे अपने देश में लेकर चलना चाहिए | ऐसा सोचने के बाद वह श्रेष्ठ तत्वज्ञानी की तलाश में लग गया | एक दिन उसके सेवको ने आकर बताया कि पास के जंगल में एक  कुटिया में साधू रहता है , जो श्रेष्ठज्ञानी है | यह जानकार सिकन्दर उस जगह पर जा पहुचा  | साधू बेहद सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करता था | किन्तु साधनों का सर्वथा अभाव रहते हुए भी प्रसन्नता और तह्स्विता उसके मुख से स्पष्ट झलक रही थी  | उसे देखकर सिकन्दर को लगा कि यही उस वर्ग का व्यक्ति है , जिसकी उसे तलाश है | सिकन्दर ने साधू को अपने साथ चलने और विपुल ऐश्वर्य भोगने का प्रलोभन दिया | सिकन्दर की बात सुनकर साधू मुस्कुराया और बोला -- इन वस्तुओ की नश्वरता देखकर मैं विवेक पूर्वक बहुत समय पहले ही इन्हें त्याग चुका हूँ | अब इन्हें पाने के लिए प्रकृति का सुरम्य माहौल छोड़कर महलो की कैद में भला क्यों जकडू  ?  साधू का इनकार करना सिकन्दर को अपना अपमान लगा | वह गुस्से से तिलमिला उठा और म्यान से तलवार निकालते हुए साधू से बोला -- तुम्हे मेरे साथ चलना ही होगा | यदि मेरा कहना नही मना तो अभी तुम्हारा सिर धड से अलग कर दूगा | सिकन्दर की यह हरकत देख साधू हँस पडा और बोला -- तुम चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो , लेकिन यह समझ लो कि काल से अधिक बली नही हो | तुम उसके विधान को नही मिटा सकते | यदि मेरा मरना आज ही और तुम्हारी इस तलवार के जरिये ही मरना लिखा है तो उस अमिट को निकट आया देखकर मैं भला डरुंगा क्यों ? बंधन मुक्ति पर प्रसन्न क्यों नही होऊँगा | यह सुनकर सिकन्दर अचंभित रह गया | उसने उस तत्वज्ञानी साधू की मन: स्थिति को लोभ और भय से ऊँचा पाया | वह समझ गया कि साधू को अपने इरादों से डिगाया नही जा सकता  | लिहाजा उसने साधू को अपने साथ ले जाने का विचार छोड़ दिया |

Friday, January 23, 2015

प्रकृति अपने सबसे अनुपम स्वरूप में नजर आती है | 24-1-15

ऋतुराज बसंत -------

प्रकृति अपने सबसे अनुपम स्वरूप में नजर आती है |




पतझड़ और बहार की संधि ऋतु .. शीत व ग्रीष्म को जोड़ने वाला सेतु है बसंत . प्रकृति के श्रृगार का उत्सव है बसंत | माघ के शुकल पक्ष के पांचवे दिन हम बसंत के आगमन पर  बसंत पंचमी उत्सव  के रूप में इसका स्वागत करते है |
पौराणिक कथाओ के अनुसार बसंत चूकी ऋतुओ का राजा  है , इसलिए सारे ऋतुओ ने अपने हिस्से के आठ -- आठ दिन बसंत को दिए .... इस तरह बसंत चालीस दिन की ऋतु मानी जाती है |

बसंत ऋतु से सम्बन्धित कई सारी कथाये है , हमारे साहित्य , संगीत , नृत्य , चित्रकला व विविध कलाओ का समागम है बसंत इसका हर कोना अपने आप महकता रहता है | अगर देखा जाए तो बसंत महज एक ऋतु नही है . यह एक जीवन दर्शन है जीवन शैली है | सर्दी के सीलन भरे अँधेरे दिनों से निकल कर जब प्रकृति सूर्य के आलोक में मुस्कुराती है तो हर कही रंग , सुगंध और सौन्दर्य की सृष्टि होती है | यु ही नही बसंत को ऋतुराज कहा जाता है | ये भवरो के गुंजन , आम के बौराने , फूलो के खिलने और कलियों के चटखने का मौसम है | हल्के - सुहाने दिनों की ऋतु मन - मस्तिष्क को गहरे से प्रभावित करती है ऐसे में साहित्य शिल्पी हो या छाया शिल्पी  व  रंग शिल्पी उनके सृजन मन को तरंगित करती है और वह नये सृजन का कार्य बड़े मोहक अंदाज में करते है | इस खुबसूरत ऋतु में  मानव मन उल्लास  से भर जाता है हृदय के उमंगो को पंख लग जाते है - हल्की - हल्की , सुहानी बयार जैसे शीत के सारे संताप मिटा देती है | प्रकृति को नवाकुरो का उपहार देती है |  पतझड़ से सुनी पड़ी डालियों पर कोपले आने लगती है | मानो प्रकृति ये सन्देश देना चाहती है कि कुछ भी स्थायी नही होता | यदि सर्दी का कठिन दौर आयेगा तो बसंत भी आयेगा ही | चाहे कुछ हो हर वक्त एक -- सा नही होता है |


कला व साहित्य में बसंत

बसंत तो है ही सृजन की ऋतु ... यू ही नही बसंत पंचमी पर कला -- साहित्य की देवी सरस्वती की पूजा होती है  | जब मन तंग में हो , प्रकृति उत्सव के दौर में हो .. तो हम इंसान कैसे इससे अलग रह सकते है ? जीवन का सौन्दर्य उमड़ - घुमड़कर बरसता है और रचता है . अपनी ख़ुशी व्यक्त करता है सुर .. शब्द लय. ताल .. रंग के माध्यम से | हमारे प्राचीन साहित्य में बसंत को कामदेव का स्वरूप कहा गया है वही कामदेव जब गन्नो के धनुष पर . भवरो की पात की डोरी बाँध रंग - बिरंगे फूलो के बाण चढाए निकलता है . तब आम लोगो की तो बिसात ही क्या , देवधि देव महादेव भी उसके प्रभाव से बच नही पाते , कालिदास ने अपने महाकाव्य कुमार सम्भव में इस प्रसंग का विशद वर्णन किया है | कलाकार साहित्य को संगीत , नृत्य और चित्रकला में  ढालते नजर आते है  | कालिदास के साहित्य के चित्र इसी का उदाहरण है | संगीत में भी बसंत अपने पूरे राग - रंग के साथ उपस्थित है |



मन - भावन बसंत


प्रकृति का प्रभाव इतना अधिक होता है कि वर्ष में परिवर्तित होने वाले मौसम में भी मनुष्य के मन मस्तिष्क को प्रभावित एवं परिवर्तित करते है | शोध से ज्ञात होता है कि वे लोग जो मानसिक समस्याओं से घिरे हुए है बसंत ऋतू में वे बेहतर महसूस करते है |
बसंत ऋतु में रंगों की विविधता भी मानव के व्यवहार और उसके मनोबल को प्रभावित करती है | नीला आसमान , हरी - भरी धरती , रंग - बिरंगे फूल और सुन्दर कलिया यह सब मनुष्य के शरीर और उसकी आत्मा पर सकारात्मक प्रभाव डालते है |

इस बारे में ईरान  के मनोविशेषज्ञ डा इब्राहिमी मुकद्दम का कहना है कि जिस तरह बसंत ऋतू के दौरान हमारे इर्दगिर्द हरा , नीला , लाल और पीले रंग बहुतायत में दिखाई देते है और हमारी आत्मा तथा शरीर पर इन रगों का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है | आकाश का नीला रंग शान्ति , सहमती , स्वभाव में नरमी तथा प्रेम का आभास करता है | हरा रंग सम्बन्ध की भावना तथा आत्म सम्मान की भावना को उंचा रखता है | लाल रंग कामना , उत्साह तथा आशा , विशेष प्रकार के आंतरिक झुकाव को उभारता है | सूर्य का पीले रंग का प्रकाश और कलियों का चटखना  भविष्य के बारे में सकारात्मक सोच तथा कुछ कर गुजरने की भावना उत्पन्न  करती है |

प्रकृति के रंग
यह भी एक वास्तविकता है कि बसंत के सुन्दर मौसम में प्रकृति में फैले संगीत को सुनने से मनुष्य के भीतर विशेष प्रकार के आनन्द का आभास होता है | जैसे पत्तो के आपस में टकराने की आवाज , चिडियों के चहचहाने की आवाजे या फिर बहने वाली नदियों से उत्पन्न होने वाली कल - कल की ध्वनी . कोयल भी इन्ही दिनों में कूकती है रंग - रंग के फूल खिलते है . प्रकृति अपने सबसे अनुपम स्वरूप में नजर आती है |


जीवन का गूढ़ दर्शन


बसंत सिर्फ सौन्दर्य , राग - रंग और मादकता की ऋतू नही है ये जीवन का गूढ़ दर्शन भी देती है | शीत से झुलसे पेड़ो और झरे हुए पत्तो के बाद नई कोपले बसंत में ही आती है |  ये इस बात का प्रतीक है कि जीवन किसी एक बिंदु पर ठहरता नही है | ये चलता रहता है निरन्तर यही निरंतरता एक उम्मीद है | पतझड़ के बाद बसंत आता ही है | बसंत को आना ही होता है | ये सिर्फ प्रकृति पर ही नही , बल्कि हमारे जीवन पर भी लागू होता है | हर दुःख का अंत होता है हर बुरा वक्त गुजरता ही है | बसंत आशा का उत्सव भी है उम्मीद का आधार भी |


प्रकृति और जीवन का सम 


न सर्दी , न गर्मी ऐसा होता है बसंत सर्दी का उतार  और गर्मी की आमद के बीच एक सेतु की तरह आता है | इसी तरह ये बसंत इस बात का संदेश है कि जीवन हर वक्त सुख और दुःख की लहरों पर सवारी नही करता है | ज्यादातर वक्त वह सम पर होता है | यही जीवन है , यही जीवन का सार भी है |

Thursday, January 22, 2015

कर्तव्य में चूक 23-1-15

कर्तव्य में चूक


चीन का एक अमीर च्यांग भेड़ पालने का धंधा करता था | उसके बाड़े में बहुत -- सी भेड़े थी | वह उनके खान - पान का पूरा ध्यान रखता | धीरे - धीरे उसके बाड़े में भेड़े इतनी बढ़ गयी कि उन्हें अकेले संभालना मुश्किल हो गया | उसने भेड़ो का ध्यान रखने के लिए दो लडको को नियुक्त किया | भेड़ो को भी दो हिस्सों में बाट दिया गया और उन लडको को काम दिया गया कि वे अपने - अपने हिस्से की भेड़ो का पूरा ख्याल रखेगे और नियत समय पर मैदान में चराने के लिए ले जायेगे तथा वापस लायेगे | अमीर च्यांग अपनी भेड़ो को उनके भरोसे छोड़ यात्रा पर निकल गया | कुछ दिनों बाद वह जब लौटकर आया तो उसने बाड़े में जाकर भेड़ो का मुआयना किया | वहा पर भेड़ो की स्थिति देख उसे बहुत दुःख हुआ | भेड़े दुबली भी हो गयी थी और उनमे से कुछ मर भी गयी थी | अमीर ने इसके लिए उन चरवाहे लडको को जिम्मेदार ठहराया | उसने इस बात की छानबीन की कि आखिर किस वजह से भेड़ो की इतनी हानि हो गयी | छानबीन से पता लगा कि दोनों लड़के अपने - अपने व्यसनों में लगे रहते थे | एक को जुआ खेलने की आदत थी | जहा कही भी वह जुए की बाजी लगते हुए देखता . वही डाव लगाने के लिए बैठ जाता | इस चक्कर में भेड़े कही से कही जा   पहुचती और भूखी - प्यासी रहते हुए कष्ट पाती | दुसरे लड़के का मामला थोड़ा अलग था | वह पूजा पाठ का व्यसनी था | इस चकर में वह भी भेड़ो पर ज्यादा ध्यान नही देता और अपनी रूचि के काम   में ही लगा रहता | अमीर उन दोनों लडको को पकड़कर एक न्यायाधीश के समक्ष ले गया | न्यायाधीश ने पुरे मामले को गौर - से सूना और दोनों को समान रूप से दण्डित किया | यह सुनकर दूसरा लड़का न्यायाधीश से बोला -- ' माना कि मुझसे चुक हुई | लेकिन मैं इस लड़के की तरह जुआरी तो नही हूँ | मैं तो पूजा - पाठ करने वाला सदाचारी व्यक्ति हूँ | फिर मुझे इसके समान दंड क्यों दिया जा रहा है ? न्यायाधीश ने कहा -- ' माना कि  तुम दोनों के कारणों में भेद है | लेकिन कर्तव्यपालन की उपेक्षा के लिए तुम भी उसके समान दोषी हो | कर्तव्य -- भाव के बगैर जो किया जाता है , वह व्यसन है | व्यसन में जुआ खेला या पूजा की , लेकिन कर्तव्य की उपेक्षा तो की ही | उसी का दंड दिया गया है |

Wednesday, January 21, 2015

नतमस्तक ------- 22-1 -15

नतमस्तक  -------



महान तर्कशास्त्री आचार्य  रामनाथ नवद्दीप के समीप एक छोटी - सी जगह में छात्रो को पढाते थे| उस समय कृष्णनगर के राजा शिवचंद्र थे . जो नीतिकुशल शासक होने के साथ - साथ विद्यानुरागी भी थे | उन्होंने भी आचार्य  रामनाथ की कीर्ति सुनी  | पर यह जानकार उन्हें दुःख हुआ कि ऐसा विद्वान् गरीबी में दिन गुजार रहा है  | एक दिन राजा स्वंय पंडित जी से मिलने उनकी कुटिया में जा पहुचे  | आचार्य  जी ने राजा का यथोचित स्वागत किया | कुशलक्षेम पूछने के बाद राजा ने कहा -- आचार्य  प्रवर , मैं आपकी कुछ मदद करना चाहता हूँ  | यह सुनकर आचार्य  रामनाथ ने जबाब दिया -- राजन भगवत्कृपा ने मेरे सारे अभाव मिटा दिए है | मुझे किसी चीज की आवश्यकता नही | तब राजा बोले - विद्वतवर . मैं घर खर्च के बारे में पूछ रहा हूँ | सम्भव है उसमे कुछ कठिनाई आ रही हो  | राजा की मन: स्थिति जान आचार्य  रामनाथ बोले -- घर खर्च के बारे में गृहस्वामिनी मुझसे अधिक जानती है | आप उन्ही से पूछ लें  | राजा ने साध्वी गृहणी के समक्ष पहुचकर कहा -- ' माता , घर खर्च के लिए कोई कमी तो नही  ? सादगी की मूरत गृहणी ने कहा - ' भला सर्व - समर्थ परमेश्वर के रहते उनके भक्तो को क्या कमी रह सकती है ? ' फिर भी माता ... ' लग रहा था कि राजा कुछ और सुनने के इच्छुक है | तब गृहणी ने कहा -- ' महाराज , वाकई हमे कोई कमी नही है |पहनने को कपडे है | सोने को बिचौना है | पानी रखने के लिए मिटटी का घडा है | भोजन की खातिर विद्यार्थी सीधा ले आते है | कुटिया के बाहर खड़ी चौराई  का साग हो जाता है | भला इससे अधिक की जरुरत भी क्या है ? उस मातृस्वरूपा नारी के ये वचन सुनकर राजा मन ही मन श्रद्दावनत हो गये | फिर भी उन्होंने आग्रह किया -- ' देवी , हम चाहते है कि आपको कुछ गाँवों की जागीर प्रदान करे | इससे होने वाली आय से गुरुकुल भी ठीक  तरह से चल सकेगा और आपके जीवन में भी कोई अभाव नही होगा | ' यह सुनकर गृहणी मुस्कुराई और बोली
' राजन , इस संसार में परमात्मा ने हर मनुष्य को जीवनरूपी जागीर पहले से दे रखी  है | जो जीवन कि इस जागीर को अच्छी तरह से सभालना सीख  जाता है , उसे फिर किसी चीज का अभाव नही रह जाता " यह सुनकर राजा का मस्तक इस संतोषी और श्रुत - साधक आचार्य दम्पत्ति के चरणों में झुक गया  |

Tuesday, January 20, 2015

गंगा उदास हैं .........................बदहवास हैं ------------- 21- 1-15

गंगा उदास हैं .........................बदहवास हैं

 

 


गंगा की बात मत करो गंगा उदास है , वह जूझ रही खुद से और बदहवास हैं ,
न रंग हैं , न रूप हैं , न वो मिठास हैं ,गंगा-जली हैं , जल नही गंगा के पास है |

-कैलाश गौतम

अच्युत चरण तरंगिणी, नवसिरा मारुतिमाल | गंगा माँ हैं वह सब जग की तारणहार हैं | यह गंगा ही हैं जिसमे डुबकी लगाते ही मानव त्रिदेव की श्रेणी में आ जाता हैं , जब सिरपर से गंगाजलधार गिरती है तो वह शिव होता हैं , जब गंगाजल अंजुली में भरता हैं तो वह ब्रम्हा होता हैं और यही जलधार जब चरणों से होके गुजरती है तो वह विष्णु होता हैं | गंगा जिसकी महिमा का बखान करने में समस्त पृथ्वी का कागज़ और जल को स्याही बना दे तो भी कम हैं , वही गंगा जिसके माहात्म्य को बताते हुए सैकड़ो ग्रन्थ लिखे गये आज हमारी आस्था तो वही रही पर गंगा -गंगा न रही | गंगा आज कराह रही हैं | उसका अमृत तुल्य पानी आज रोगों की खान बन गया हैं |न तो उसमे हिमालय के खनिज तत्व नजर आ रहे हैं न ही उसका पानी रोगों के कीटाणुओं को नष्ट कर पा रहा | इसके अलावा आचमन या पीने लायक तो क्या इसका पानी आज नहाने लायक भी नही रह गया है | गंगा आज देश में बहने वाले तमाम छोटे बड़े नालो को मिलाकर एक बड़ा नाला बन कर रह गयी हैं लेकिन गंगा में डुबकी लगाकर पाप धोने की हमारी आस्था बरकरार हैं | बात गंगा की आई है तो एक नजर इस पर भी डाले की गंगा को किसने क्या माना और गंगा से क्या पाया | प्रख्यात इतिहास लेखक अब्दुल फजल ने अपने पुस्तक ' आईने- अकबरी ' में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगा जल ही प्रयोग में लाते थे | इस जल को वह अमृत कहते थे | काशी सुरसरी के इस जल में हिमालय क्षेत्र कि जड़ी - बूटी , ब्राम्ही , रत्न , ज्योति , अष्टवर्ग के अतिरिक्त शिलाजीत जैसे खनिज मिलते हैं | इसलिए हर प्रकार के सम्प्रदाय व धर्म के लोगो के बिना किसी भेदभाव के इसकी उपयोगिता , महत्ता को स्वीकार किया हैं | इब्न -बतूता ने लिखा है कि - मुहम्मद तुगलक भी इस जल को पिता था | वाराणसी ( काशी ) में जांच के दौरान पाया गया कि इस जल में एक विशेष प्रकार के "प्रोटेक्टिव कोलाइड "मिलते है जो अन्य नदियों में कम पाए जाते है | इसलिए हिमालय विजेता एडमंड हिलेरी ने गंगासागर से गंगोत्री तक के धरती से सागर तक अभियान कि देवप्रयाग में समाप्ति पर गंगा को 'तपस्विनी ' संज्ञा दी थी | उसके अनुसार गंगाजल मात्र साधारण जल नही हैं | इतिहासकार ' शारदा रानी ' ने मंगोलिया यात्रा का वर्णन करते हुए लिखा हैं कि वहा के निवासियों ने उन्हें गंगा देश से आई महिला कह कर साष्टांग प्रणाम किया | विश्वविख्यात जल विज्ञानी डॉ हेनफेन ने गंगा जल को विश्व का सर्वश्रेठ जल घोषित किया है |इसमें विभिन्न रोगों के कीटाणुऔ को नाश करने की अदभुत क्षमता हैं | एक बार परीक्षण के रूप में उन्होंने काशी के निकट 'अस्सी नाले ' का जल निकाला , उन्होंने पाया कि इसमें हैजे के असख्य कीटाणु है |उन्होंने उस पानी में गंगाजल मिलाकर लगभग 6 घंटे रखा और पाया कि इसमें हैजे के सभी कीटाणु समाप्त हो गये हैं |फ्रांस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ हैरेंन ने गंगाजल पर वर्षो अनुसन्धान करके अपने प्रयोगों को विवरण शोध पत्रों के रूप में प्रस्तुत किया |उन्होंने आंत्रशोथ व हैजे से मरे अज्ञात लोगो के शवो को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया जहा कीटाणु तेज़ी से पनप सकते थे |डॉ हैरेज को आश्चर्य कि कुछ दिनों बाद इन शवो से आंत्रशोथ व हैजे के ही नही अन्य कीटाणु भी गायब हो गये हैं | उन्होंने गंगाजल से 'वैक्टीरियोफ्ज ' नामक एक घटक निकाला जिसमे औषधीय गुण हैं | इंग्लैण्ड के जाने माने चिकित्सक सीई नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा है कि इस जल में सड़ने वाले वैकटिरिया ही नही होते हैं |उन्होंने महर्षि - चरक को उद्घृत करते हुए लिखा है कि गंगाजल सही मायने में पथ्य हैं |
रुसी वैज्ञानिकों ने काशी व हरिद्वार में स्नान के उपरान्त सन 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के उपरान्त ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं ?गंगाजल कि पाच्कता के बारे में ओरियन्टल इंस्टीटयूट में हस्तलिखित आलेख रहे हैं |
कनाडा के मैक्लीन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ एम् सी हेमिल्टन ने गंगा कि शक्ति को स्वीकारते हुए कहा कि वे जानते किकहा कि वे नही जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहा से और कैसे आये ? सही तो यह है कि चमत्कृत हेमिल्टन वस्तुत:समझ ही नही पाए कि गंगा कि गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए ?आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन , विदेशी यात्री वर्नियर , अंग्रेज सेना के कैप्टन मुर आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व हैं |
भारतीय वांग्मय में काशी के बारे में बताया गया है कि जो व्यक्ति गंगा तट पर मन्दिर अथवा सीढ़ी का उद्धार करता है वह शिव लोक में वास करता हुआ अक्षय सुरक्षा प्राप्त करता है | इसके तट पर गौ , भूमि और स्वर्ण दान करने से पुण्य मिलता हैं | गंगा तट पर वास करने वाले विश्वनाथ कि कृपा से ब्रम्हज्ञान को प्राप्त करता हैं | इनके तट पर श्राद्ध करने से पितरो का उद्धार होता है तथा यहा की मिट्टी धारण करना , सूर्य की किरणों को धारण करने के लिए समान होता है |गंगा के अब न तो वह तट हैं न , वह गंगाजल है | गंगा की पीड़ा को जो समझ रहे हैं वह जरुर बदहवास और परेशान है | इस कड़ी में द्वारिका व ज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती तथा कांची काम कोटिपीठाधीश्वर स्वामी जयेंद्र सरस्वती का नाम महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने अलग - अलग अपने - अपने तरीके से गंगाजल के स्वच्छ व अविरल प्रवाह को लेकर जनमानस को उद्वेलित करने की शुरुआत की हैं | ये लड़ाई आसान नही हैं इसके लिए भगीरथ तप और प्रयास की आज फिर जरूरत हैं यदि हमें गंगा को पाना हैं | वैज्ञानिक आकड़ो पर गौर करे तो गंगाजल में बीओडी से लेकर फिक्व्ल क्वालिफार्म की मात्रा सामान्य रह गयी हैं | इसलिए पीने की बात तो दूर अब उसे आचमन लायक भी नही समझा जा रहा हैं | इसके लिए सभी धर्मो , वर्ग , सम्प्रदायों के लोगो को संकल्प लेना होगा लेकिन यह भी स्पष्ट है की थोथे नारों और बयानबाजी से गंगा का गौरव फिर से नही लौटाया जा सकता है || वह गौरव जिसका वर्जिल व दांते जैसे महान पश्चिमी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख्य किया हैं | सिकन्दर महान जिसके सम्मोहन में बंध गया था | अमेरिका को खोजने वाला कोलम्बस जिसकी तलाश में भटकते हुए मार्ग खो बैठा था | हमे आज एक बार फिर गंगा का वही गौरव लौटाने का संकल्प लेने की जरूरत हैं |
प्रस्तुती------  सुनील दत्ता   ------------------------------------  साभार -राष्ट्रीय सहारा

कुपोषण व भुखमरी का अंत नही 21-1-15

कुपोषण व भुखमरी का अंत नही

विश्व भूख सूचकांक में भारत
सुनील दत्ता
1995 - 96 के बाद से पिछले 16 - 17 सालो में इसमें कोई सुधार नही हुआ | 1996 में  इसके भूख सूचकांक का स्कोर 22.6 था | अब 2012 में इसका 65 वे पायदान पर रहकर इसके सूचकांक का स्कोर 22.9 है
विश्व भूख सूचकांक  में शामिल कुल 79 देशो में भारत 65 वे नम्बर पर है | साफ़ है कि भारत विश्व के भूख से सर्वाधिक पीड़ित देशो में से एक है | केवल 14 देश इससे ज्यादा पीड़ित है | इससे उपर के विकसित , विकासशील व पिछड़े देशो की स्थिति भारत से बेहतर है | भारत के पडोसी देशो में बंगला देश को छोड़कर बाकी सभी देशो की -- लंका , पाकिस्तान , नेपाल की स्थिति भारत से बेहतर है | बांग्ला देश 68 वे नम्बर पर अर्थात भारत से तीन अंक नीचे है तो नेपाल 60 वे नम्बर पर , पाकिस्तान 57 वे नम्बर पर और लंका 37 वे नम्बर से क्रमश: 5 अंक 8 अंक और 28 अंक उपर है | फिर इसके अलावा हर समय चीन के आर्थिक वृद्धि व विकास की तुलना और उसे अपना प्रमुख प्रतियोगी बताने के वावजूद भूख की स्थिति में भारत और चीन की स्थिति में भारी अंतर है | चीन सूची में लगभग भुखमुक्त देश के रूप में दुसरे नम्बर पर है , अर्थात भारत से 63 अंक उपर है |
फिर मामला केवल विश्व भूख सुचाकांक में कितना उपर या नीचे के रैंक या नम्बर का ही नही है , बल्कि उसकी गिरती व चढती दशा का भी है | बहुतेरे देशो का रैंक चढती दिशा का भी है | अर्थात पहले वे विश्व भूख सुचाकांक में काफी निचले पायदान पर थे , पर अब उन्होंने अपने देशो में भूख की स्थिति में कुछ सुधार और वह भी उत्तरोत्तर सुधार हासिल किया है | यहाँ तक कि अफ्रीका के अत्यंत पिछड़े देशो की स्थितियों में भी कुछ सुधार हुआ है | पर भारत की स्थिति में कोई सुधार नही हुआ है | सूचनाओं के अनुसार 1995-- 96 के बाद से पिछले 16 -- 17 सालो में इसमें कोई सुधार नही हुआ है |1996 में इसके भूख सुचाकांक का स्कोर 22.6 था |अब 2012 में इसका 65 वे पायदान पर रहकर इसके सूचकांक का स्कोर 22.9 है |
अहम सवाल है कि देश के बहुप्रचारित  तीव्र आर्थिक वृद्धि व विकास के इस दौर में राष्ट्र में भूख कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ क्यों नही  ?  वह ज्यो का त्यों क्यों कर रह गया |
लेकिन इस सवाल पर आने से पहले यह जान लेना बेहतर रहेगा कि बिश्व भूख सूचकांक के लिए किसी देश में कुपोषित व अल्प पोषित स्थिति का निर्धारण प्रमुखत: देश के बच्चो के औसत से कम वजन ,, तथा शिशु मृत्यु दर की स्थितियों से निर्धारित किया जाता है | बात भी ठीक है , कयोंकि भूख व कुपोषण से नवजात शिशुओ से लेकर 5 -- 6 साल के बच्चो का सर्वाधिक प्रभावित होना एकदम स्वाभाविक है और इसे प्रत्यक्ष: देखा व समझा जा सकता है | कयोंकि गर्भावस्था से लेकर बच्चो की यह प्रारम्भिक अवस्था उनके सर्वाधिक तीव्र शारीरिक वृद्धि एवं मानसिक विकास की होती है | इसीलिए भूख व कुपोषण का प्रभाव भी उन पर सबसे ज्यादा व गहरा होता है | विश्व भूख सूचकांक को  इंटरनेशनल फ़ूड पालिसी रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा तैयार व जारी कराया जाता है | दिलचस्प बात यह भी है कि भूख , कुपोषण के इस व ऐसे अन्य आंकड़ो का वास्तविक इस्तेमाल अब किसी राष्ट्र व समाज से भूख व कुपोषण मिटाने की दिशा में लक्षित नही रह गया है | इसकी जगह उसका वास्तविक इस्तेमाल राष्ट्र व समाज में भूख व गरीबी की इन स्थितियों को दिखाकर ऐसे आर्थिक नीतियों सुधारों को लागू करना हो गया है , जो भूख कुपोषण तथा अभाव गरीबी की समस्याओं से मुक्त धनाढ्य , उच्च एवं सुविधा प्राप्त मध्यम वर्गियो की सेवा कर रही है | उनकी धनाढ्यता उच्च्त; एवं सुख सुविधा को बढाती जा रही है | साथ ही आम समाज में सर्वाधिक निम्न वर्ग को तथा अधिकाँश निम्न मध्यम वर्गियो को बढती महगाई , बेकारी , अभाव , गरीबी , भुखमरी , कुपोषण के गर्त में ढकेलती जा रही है |
यही कारण है कि इस देश में 1995 -- 96 से लेकर 2012 तक के 17 सालो के दौरान आर्थिक वृद्धि एवं विकास की रफ़्तार तेज होने के वावजूद भूख सूचकांक की स्थितियों में कोई बदलाव नही हुआ है |
इस बीच शासकीय एवं प्रचार माध्यमी बयानों प्रचारों के जरिये यह भी समझाया जाता रहा है कि देश के जनसाधारण में मौजूद अभाव भूख एवं कुपोषण को दूर करने के लिए इन आर्थिक सुधारों को लागू किया जाना और इसका फल जनसाधारण तक पहुंचाया जाना जरूरी है | लेकिन यही नही होना था और हुआ भी नही | कयोंकि इन नीतियों प्रस्तावों के जरिये जनसाधारण की स्थितियों में वास्तविक एवं स्थायी सुधार की जगह उसका कटाव -- घटाव होना था और वह होता भी रहा | उसे अधिकाधिक संकटों में ढकेलता जाता रहा | साधनहीन व अधिकारहीन बनाने का काम किया जाता रहा | भूख सूचकांक में भारत की स्थिति की सूचना देते हुए प्रचार माध्यमी विद्वान् यह देना नही भूले है कि इन वर्षो में भारतवासियों की औसत आय दो गुनी हो गयी है | जबकि प्रचार माध्यमी व हुकुमती हिस्से यह बात बखूबी जानते है कि इस औसत में 10% धनाढ्य एवं उच्च वर्ग के खरबपतियों , अरबपतियो व करोडपतियो  की आय तथा 15% मध्यम व्र्गियो के लाखो की आय तथा लगभग 75% जनसाधारण का नगण्य ( हजार या सैकड़ो की आय ) का औसत शामिल है |
इस सच्चाई के वावजूद राजनितिक तथा विद्वान् इस औसत के जरिये समूचे देशवासियों की आमदनी दुगनी बताने से बाज नही आते !! यह जनसाधारण के साथ धोखाधड़ी नही तो और क्या है  ? इनके इस रुख -- रवैये से हुकुमती व प्रचार माध्यमी हिस्सों द्वारा देश में भूख व कुपोषण की स्थितियों पर रोना रोने की सच्चाई को भी समझा जा सकता है | तेज आर्थिक वृद्धि से देश में गरीबी , भुखमरी दूर करने के झूठे प्रचारों को भी समझा जा सकता है | इसे सबूत के रूप में खाद्यान्नों के भंडार भरे रहने के वावजूद उसके वितरण में किये जाने के प्रति उपेक्षा को भी देखा व समझा जा सकता है | फिर इसका सबसे बड़ा सबूत भुखमरी मिटाने के लिए आवश्यक कृषि क्षेत्र पर चौतरफा बढाये जा रहे संकतो से और संकट ग्रस्त होते तथा आत्म हत्या करते किसानो के रूप में भी देखा व समझा जा सकता है |
इस देश के हुक्मरान व प्रचार माध्यमी स्तम्भ भी जानते है कि गरीबो को सस्ता अनाज दे देने मात्र से उनकी कुपोषण व भुखमरी का अंत नही होता है | इसके वावजूद वे इसे व अन्य सामाजिक सेवाओं को ही अभाव व भुखमरी से पीड़ित  जनसाधारण का इलाज मानते व बताते रहे है | लेकिन क्यों ? ताकि अभाव गरीबी भूख एवं कुपोषण से पीड़ित होते जा रहे तथा जनसाधारण को यह लगे कि उनकी समस्याओं पर चिंताए हो रही है | उसके लिए फौरी व दूरगामी समाधान निकालने का प्रयास किये जा रहे है | यह जन शाधारण के साथ गरीबी , भूख , कुपोषण से पीड़ित जन समुदाय के साथ नौनिहालों व बच्चो के साथ की जा रही धोखाधड़ी है | धनाढ्य वर्गीय तथा जनविरोधी नीतियों सुधारों के जरिये जनसाधारण के व्यापक हिस्से को अधिकाधिक गरीबी भुखमरी व कुपोषण की तरफ ढकेलनेकी चलाई जा रही प्रक्रिया है | साथ ही उन्हें भूख , कुपोषण से मुक्त कराने देने के प्रचारों की धोखाधड़ी भी है
-सुनील दत्ता 
पत्रकार

Monday, January 19, 2015

अनूठी दुनिया ----------------------- 20-1-15

प्रकृति ने दुनिया बनाई और लोगो ने उसे टुकडो में बाटकर देश बना लिया . यह दुनिया अनूठेपन से भरी हुई है | विभिन्न देशो की परम्परा और संस्कृति से जुडी चीजे एक बार फिर यूनेस्को की सूची में शामिल हो गयी | तुर्की की आयल रेसलिंग से लेकर नाइजर लोगो का हास्यबोध और ला - गोमेरा की सीटियो की भाषा अनूठी है |
अगर कोई कहे कि फ्रेंच फ्राइज भी किसी देश की धरोहर बन सकते है , तो हैरान होने की जरूरत नही है | यूनेस्को ने बेल्जियम के फ्रेज फ्राइज को जब सांस्कृतिक धरोहर की अपनी सूची में शामिल किया , तो हैरान होना लाजिमी था | हैरान करने वाली ऐसी तमाम चीजे दुनिया भर में मौजूद है . जिनके बारे में हमे जानकारी नही है | बात तुर्की के कहानीकारों की हो या फिर अफ्रिका के अका पिग्मी समुदाय के जनजातीय बंजारों की . दुनिया भर में ऐसे अनूठे सांस्कृतिक समूह बहुत कम बचे है | यूनेस्को ने अपनी सूची में दुनिया भर की 281 सांस्कृतिक धरोहरों को शामिल किया है , ताकि इनके महत्व के बारे में लोगो को बताया जा सके | उत्तर - पूर्वी चीन में कोरियाई मूल के किसानो का नृत्य एक ऐसी धरोहर है , जिसमे समुदाय के बड़े - बूढ़े नई पीढ़ी को किसानी परम्परा सौपते है |
स्पेन में यह परम्परा एक पीढ़ी नृत्य के दौरान उसी तरह के हावभाव और एक्शन किये जाते है , जैसा कि खेती करते वक्त होते है | इसी तरह स्पेन में ला -- गोमेरा द्दीप के लोग अपने बच्चे को सीटी बजाकर बातचीत करने की भाषा विरासत में जरुर सिखाते है | स्पेन में शौकिया तौर पर बनाये जाने वाले ह्युमन टावर भी खूब आकर्षित करते है | जिस तरह महाराष्ट्र के गोविन्दाओ की टोली दही -- हाड़ीफोड़ने के लिए एक दुसरे के कंधे पर खड़े होकर मीनार बनाती है , यह कुछ वैसा ही है | स्पेन में यह परम्परा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सिखाई जाती है |
19 वी सदी के मध्य में काफी बीन्स की ढुलाई करने वाली कोस्टारिका की पारम्परिक बैलगाड़ियो का महत्व अज भी कम नही हुआ है | बैलगाड़िया उस जमाने में शानो - शौकत का प्रतीक होती थी | इसीलिए उनकी बनावट और साज -- सज्जा बेहद ख़ास तरीके से की जाती थी | कहते है , इन बैलगाड़ियो की सजावट की परम्परा 20 वी सदी में शुरू हुई थी |
यहाँ के विभिन्न क्षेत्रो में इन बैलगाड़ियो की सजावट ख़ास तरीके से की जाती थी , जिससे बैलगाड़ी चलाने वाले व्यक्ति का मूल पता चल जाता था | यही नही , बैलगाड़ियो में कई तरह की ग्घ्न्तिया लगी होती थी , जिससे बैलगाड़ी के हिलने - डुलने पर एक ख़ास आवाज आती | एक परम्परा की पहचान रही इन बैलगाड़ियो को बनाने वाले कलाकार आज कम हो रहे है | यही कारण है कि यूनेस्को ने इसे वैश्विक धरोहर की सूचि में शामिल किया है |
इन सबसे अलग नाइजर क्षेत्र में एक भाषाई समूह ऐसा भी है , जो अपने मजाकिया अंदाज के लिए जाना जाता है | यहाँ एक समुदाय के लोग दुसरे समुदाय के लोगो से रिश्तो में मिठास और सहयोग बनाये रखने के लिए मजाकिया लहजे में बात करते है |

----------------------------------------------------------------साभार 14 जनवरी 15 अमर उजाला

Sunday, January 18, 2015

तितली या कठपुतली मत बनिये -महादेवी वर्मा 18-1-15

तितली या कठपुतली मत बनिये -महादेवी वर्मा




हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के शासकीय कन्या महाविद्यालय में दिया गया प्रखर चिंतक -- कवियत्री महादेवी वर्मा का यह व्याख्यान आप को साझा कर रहा हूँ |


मुझे पता नही था की आप के बीच आना है दिन भर घुमती रही अन्त में यही आई हूँ तो बहुत थकी हूँ | आप से बहुत बात करना चाहती थी लेकिन बंधुओ ने मौका नही दिया | अब आप से इतना कहना चाहती हूँ की भारत का भविष्य आपके हाथ में है , लडको के हाथ में नही है
हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे यहा लड़की को बहुत सहना होता है |
लेकिन हमारी संस्कृति ने हमे बहुत शक्ति दी है | देखिये , ब्रह्मा के चार मुँह है , सो कोई नही जानता उनको क्यों बनाया क्योंकि चार मुँह से हो सकता है , चार तरह की बात करते रहे होंगे | बनाया तो सरस्वती को है | सरस्वती एक बात करती है | हमारे ज्ञान की अधिष्ठात्री है |हाथ में वीणा लिए हुए है , पुस्तक लिए हुए है , अक्ष माला लिए हुए है | समय , हर क्षण का प्रतीक है वो | और समयके लिए सृजन का प्रतीक है |
आप देखिये , ऐश्वर्य मिलता है घर मिलता है , लेकिन अगर घर में पत्नी न हो , बहन न हो ,माँ न हो तो कैसा घर है | वास्तव में वह लक्ष्मी है | शिव उस के मस्तक पर है | शवेताबरा
है , सब को मंगलमय रखती है और जब आसुरी शक्तिया ध्वस्त करने लगती है तो वह आसुरी शक्तियों पर आरूढ़ होती है , तब वह सिंहवाहिनी होती है , दुर्गा होती है | बड़ी शक्ति है उसमे | प्रारम्भ में संस्कृति ने हमे महत्व दिया , लेकिन समाज ने धीरे -- धीरे हमारा महत्व छीन लिया , कब छीन लिया ? जब आप कमजोर बनी , सिर्फ लक्ष्मी रह गई , सम्पत्ति बन गई |
आप जो नए युग की नारी है , आप को बड़ा काम करना है | अपनी शक्ति को पहचानना है | सम्पत्ति होना अस्वीकार कर दो | सामान है क्या आप?सब आप को सामान मानते है और अगर पति न रहे , तो जैसे खिलौना फेंक देता है बच्चा , ऐसे स्त्री को फेंक देते है | कानून ने हमे बहुत अधिकार दिए है | लेकिन कानून पात्रता नही देगा | पात्रता आप से आएगी | हमारा युग बड़ा कठिन था | हमे लड़ाई लड़नी पड़ी | पुलिस की लाठियों के सामने , गोलियों के सामने खड़े रहे और फिर पढने के लिए चारो ओर भटकते रहे | आप को सब सुविधाए है | इस लिए आप देश को बनाइए जैसा आप बनाएगी , वैसा देश बनेगा | तो आप इस भारत की धरती की तरह , जैसे सीता को भूमिजा कहते है , वैसे भूमिजा है आप आप सीता बनिये | मान लिया की राम रक्षा करने गये थे | वन में चले गये थे की रक्षा करंगे , लेकिन रावण के यहा रक्षा कौन करता था सीता की ? वह तो राम लक्ष्मण नही थे | उन्हें पता नही था | ढूढ़ रहे थे | सीता ने अपने वर्चस्व से , अपनी शक्ति से अपनी रक्षा की | रावण उसको अपने प्रासाद में भवन में नही ले जा सका | अशोक वाटिका में रखा |
और उसकी शक्ति देखिये | अग्नि परीक्षा दी उसने | और उसका तेजस्वी रूप देखिये | जब राम ने कहा , लव -- कुश बड़े हो और राम , लव -- कुश से हार गये तो उन्होंने सीता से कहा की अब अयोध्या की महारानी होइए और अयोध्या चलिए | सीता ने इनकार कर दिया | राम ने कहा प्रजा के सामने सिर्फ परीक्षा दे दीजिये | अस्वीकार कर दिया उसने |
कोई माता अपने पुत्रो के सामने परीक्षा देती है ? अपने सतीत्व के लिए ? नही देती है | तो सीता ने अस्वीकार कर दिया और राम ने जब बहुत कहा तो सीता ने धरती में प्रवेश कर लिया |
अब उस की शक्ति देखिये | वो चाहती तो राम के हाथ पाँव जोडती , अयोध्या की रानी हो जाती , लेकिन उसने नही होना चाहा | ऐसा पति जो किसी के कहने से , पति का कर्तव्य भूल जाए , उसके साथ क्यों जायेगी ? नही गई वह | सो मैं बार -- बार कहती हूँ | सीता बनो , तुम्हारा उत्तर होना चाहिए , हम तो सीता है ही हम तो धरती की पुत्री है | स्वंय शक्ति रखती है | वह आप का घर बनाती है | आपको सुख देती है | आपको मंगलमय बनाती है | कितने रूपों में पुरुष को सहयोग देती है | वह पति को कितना आत्मत्याग सिखाती है | पुत्र को कितना तेजस्वी बनाती है | वह तो मानव जीवन की निर्मात्री है | जीवन की श्रुति है वह | बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसकी गोद में आएगा , छाए राम हो कृष्ण हो बुद्ध हो, किसी माता की गोद में किसी माता के आंचल की छाया में बड़ा होगा | उसकी आँखों के सपने अपने आप को देखेगा | वह उसे अंगुली पकड कर चलना सिखाएगी | आप अपने को छोटा मत समझिये |
आपके भी कुछ कर्तव्य है | हमने देखा , आधुनिका बनने के लिए , लडकिया घंटे भर घुघराले बाल बनाएगी | आँखों में काजल लगाएगी , होठ रंगेगी , चेहरा रंगेगी | एक जगह हम गये तो रंगे चेहरे वाली लडकिया सामने बैठी थी | हमने कहा , पहले मुँह धोकर आओ , हम तो पहचान नही पाती आप को |
आदमी तो आदमी है न | वह आपको कठपुतली बना देता है | आप लड़के को कोई खिलौना दे दीजिये तोडकर देखेगा | लेकिन लड़की घर बसाएगी , गृहस्थी बसाएगी , घरौदा बनाएगी , उसमे गुड्डे -- गुड्डी बैठाएगी | उनका व्याह रचाएगी , यानी यह सब कुछ जानती है | छोटी लड़की भी | और लड़के को देखिये तो उसकी टांग तोड़ देगा , सर फोड़ देगा | पुरुष का स्वभाव ही आक्रामक है | अगर स्त्री उसे सयम नही सिखाएगी तो फिर वह सयम से नही रहता || हमारे युग के एक बड़े व्यक्ति ने कहा की राष्ट्र स्वतंत्र नही होगा , यदि उसकी नारी जो शक्ति है वो स्वतंत्र नही होगी | जितनी कला है वह आप के पास है | जितनी विद्या है , वह आप के पास है | आप तितली या कठपुतली मत बनिये | साक्षात शक्ति स्वरूपा है आप | आप शक्ति को पहचानिए और देश को बनाइए | मेरी मंगलकामना आपके साथ है |
- सुनील दत्ता
आभार-लोक गंगा पत्रिका

क्रान्तिकारियो महापुरुषों को जातीय आधार में बाटना खतरनाक है ...... 18-1-15

क्रान्तिकारियो महापुरुषों को जातीय आधार में बाटना खतरनाक है ......

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की सीढिया चढ़ रहे बच्चो के प्रति उनके अभिभावकों और शुभचिंतको का खुश होना एक दम स्वाभाविक है | सफलता की खुशियों में घर परिवार से लेकर मित्रो परिचितों आदि की किसी न किसी रूप में भागीदारी भी जरुर होती है | यह सब स्वाभाविक रूप से पहले भी चलता रहा है और अब भी चल रहा है | हां इन खुशियों का आज जैसा प्रचार माधय्मी प्रदर्शन पहले एक दम नही था |क्योंकि आज से 20 -- 25 साल पहले तक न ही ऐसे प्रचार माध्यम थे और न ही उन सफलताओं का श्रेय अपने कोंचिंग सेंटर या संस्थान को दिलाने लोग थे | बताने की जरूरत नही की ये लोग घर परिवार या मित्र मण्डली से अलग होते हुए भी ऐसे प्रदर्शनों में सबसे आगे रहते है ताकि प्रतिभागियों की सफलता का इस्तेमाल अपने कोचिंग विजनेस के विकास विस्तार में कर सके | इसके अलावा अब सफलता की खुशियों के आयोजनों में एक नए चलन की भी शुरुआत हो गयी है | विभिन्न जातीय संगठनों और उनके पदाधिकारियों द्वारा अपनी जाति के सफल युवको \ युवतियों को सामाजिक रूप से सम्मानित करने की नयी परम्परा चलने लग गयी है परिवारजनों के साथ कोंचिंग सेंटर के टीचर आदि का ऐसे अवसरों पर शामिल होना तो फिर भी किसी बच्चे की सफलता में उनके योगदान का एक परिलक्षण होता है | इसे सफलता प्राप्त किए बच्चे अक्सर अपने माता -- पिता व टीचरों के योगदान के रूप में कबूलते है | पर विभिन्न जातियों के जातीय संगठनों द्वारा अपनी जाति के सफल प्रतिभागियों के सम्मानित किए जाने वाले आयोजनों का कोई औचित्य नही है | अगर कोई औचित्य है तो , शुद्ध रूप से इस्तेमाली है | वह जातीय संगठनों को बढावा देने के लिए इन प्रतिभागियों और उनकी सफलताओं का इस्तेमाल मात्र है | सच्चाई यह है की किसी सफल प्रतिभागी को सफलता की उंचाइयो पर पहुचाने में केवल उसी के धर्म या जाति के लोगो का उसी जाति के टीचरों का या फिर प्रतिभागियों को विभिन्न रूप में मिले अन्य सेवाओं में उसी धर्म जाति के लोगो का हाथ नही होता है | वर्तमान दौर में तो ऐसा कदापि संभव नही है | किसी को सफलता दिलाने में बहुतेरे ज्ञात , अज्ञात लोगो का नीचे से उपर तक के लोगो का हाथ होता है | इसका सम्बन्ध उसके धर्म व जाति या आगे बढकर कहे तो उसके क्षेत्र व राष्ट्र के लोगो तक सीमित नही रहता | उदाहरण आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का लगभग समूचा ज्ञान मुख्यत: यूरोपीय वैज्ञानिकों , विद्वानों खोजकर्ताओं की देन है | इसे हम नकार नही सकते है | इसी तरह से प्रत्यक्ष रूप में परिवार के लोगो , शुभचिंतको टीचरों के योगदान को भी नही नकार सकते लेकिन किसी धर्म जाति विशेष के धार्मिक या जातीयता संगठन के योगदान को जरुर नकारा जा सकता है क्योंकि वह कोई ऐसा योगदान है ही नही | अगर किसी जाति विशेष के साथ उदाहरण दलित जातियों के साथ किसी हद तक ऐसा कुछ रहा भी है तो अब वह उस रूप में बहुत कम है और वह लगातार घटता जा रहा है | इसके वावजूद सफल प्रतिभागियों को लेकर अपने जातीय गौरव , जातीय कल्याण उथान का प्रदर्शन करने में मंचो पर विभिन्न जातियों के अनपढ़ या कम शिक्षित लोग मौजूद रहते है | ऐसे में लोग स्वंय भी जातीय संगठनों द्वारा बन्दन, अभिनन्दन हासिल किए रहते है | यही काम अब जातीय संगठनों के मंचो से स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीदों , क्रान्तिकारियो के साथ किया जाने लगा है | जाति के नाम पर उनकी स्मृतिया मनाने का काम किया जा रहा है | इसके जरिये उन्हें अपनी जाति के ( न की समूचे राष्ट्र व समाज के ) क्रांतिकारी नेता के रूप में परिलक्षित करने का काम किया जा रहा है | यह क्रान्तिकारियो को याद करना तथा उनका अभिनन्दन करना नही है | उनके कद को बढाना भी नही है | बल्कि उन्हें जातीयता के खांचे में डालकर उनके राष्ट्रीय कद को छोटा या संकुचित कर देना है | आखिरकार उनके त्याग , बलिदान विशिष्ट जातीय हितो के दायरे में कदापि सीमित नही होते | वे व्यापक होते है | राष्ट्र व व्यापक समाज के हित में होते है |
सफल प्रतिभागियों के बारे में भी यह बात इस रूप में कही जा सकती है की वे किसी जाति या धर्म के सदस्य के रूप में सफलताए नही अर्जित करते | बल्कि समाज की व्यापक उपलब्धियों के आधार पर तथा विभिन्न धर्म व जाति के लोगो के शाह्ता सहयोग से सफलता पाते रहते है | अत: उन्हें अपने धर्म जाति के रूप में गौरवान्वित करने की चल रही यह परम्परा कत्तई ठीक नही है | बल्कि सफल प्रतिभागियों के या किन्ही क्षेत्र में सफलता अर्जित किए व्यक्तियों के स्वस्थ व जनतांत्रिक विकास की विरोधी है और उसे ग्रसित करने वाली भी है |
-सुनील दत्ता ...........

Friday, January 16, 2015

संसदीय समितियों का सच 17-1-15

संसदीय समितियों का सच



1993 में वैश्वीकरणवादी नीतियों के भारी विरोध के दौर में सांसद निधि तथा संसदीय समितियों के निर्माण आदि ने विरोधी पार्टियों को इन नीतियों का विरोध छोडकर उनका समर्थक बनाने का काम किया था | संसद समितियों के बनने का प्रमुख कारण भी यही है |
विभिन्न मुद्दों , विवादों को लेकर संसदीय समितियाँ बारम्बार चर्चा में आने लगी हैं | अभी हाल में जन लोकपाल विधेयक पर भी संसदीय समिति पुन: चर्चा में आई है | सरकार ने सिविल सोसायटी के सामने जन लोकपाल के सुझाव को संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव किया था |लेकिन अन्ना हजारे के नेतृत्त्व में सिविल सोसायटी के लोग इसे संसद की स्थायी समिति की जगह सीधे संसद में पेश करने की बात उठाते रहे थे | उस दौरान समाचार -पत्रों में ( दैनिक जागरण 28 अगस्त ) संसदीय समितियों के गठन और कार्य - प्रणाली की चर्चा के साथ यह बात भी कही गयी कि सरकार जिस बिल को लटकाना चाहती है , उसे उस मामले से सम्बन्धित समिति के पास भेज देती हैं और बहुतेरे विधेयको को संसदीय समिति में भेजे बगैर संसद से पास करवा लेती हैं | फिर संसदीय समिति के सुझाव को मानना सरकार व संसद के लिए बाध्यकारी भी नही हैं |
इस समय भी संसदीय समितियों के पास कई विधेयक काफी समय से लम्बित पड़े हुए हैं | फिर संसदीय समितियों के लिए किसी विधेयक पर अपना सुझाव व निर्णय देने कई कोई समय सीमा भी नही है | इन संसदीय समितियों के गठन का इतिहास महज 18 साल पुराना है | इसका गठन 1991 में अन्तराष्ट्रीय नयी आर्थिक नीतियों अर्थात उदारीकरणवादी , निजीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी नीतियों को लागू किए जाने के दो साल बाद 1993 में किया गया था |इस समय विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से सम्बन्धित 24 संसदीय समितिया मौजूद हैं |इन संसदीय समितियों में सभी दलो और पार्टियों का प्रतिनिधित्व है |कई संसदीय समितियों के अध्यक्ष , विरोधी पार्टियों के नेतागण है |संसदीय समितियों में ,संसद के विधेयको पर चर्चा सलाह के लिए चूकी सभी संसदीय पार्टियों का प्रतिनिधित्व रहता है , इसलिए इन समितियों को लघु - संसद भी कहा जाता जाता है | संसदीय समितियों का यह विशेषाधिकार है कि, ये जनता से , उसके विभिन्न हिस्सों से और सम्बन्धित विषय के जानकार विशेषज्ञों से किसी विचाराधीन मुद्दों पर राय ले सकती हैं | इस राय - मशविरे के बाद संसदीय समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद के सामने पेश करती हैं | संसदीय समितियों की रचना और कार्य प्रणाली से उपरोक्त सच्चाई यह बात स्पष्ट रूप से साबित करती है कि न तो सरकार हर विधेयक को या किसी विधेयक को संसदीय समितियों के पास भेजने के लिए बाध्य हैं और न ही किसी विधेयक पर संसदीय समितियों की किसी राय को मानने के लिए ही बाध्य है |लेकिन तब तो संसदीय समितियों का कोई उल्लेखनीय महत्व ही नही बनता |यह सही भी है | संसदीय विधेयको को दुरुस्त करने , परिपूर्ण करने और फिर उसे लागू करने और फिर उसे लागू करने या नकार देने के रूप में संसदीय समितियों की कोई अग्रणी आवश्यक अथवा अपरिहार्य भूमिका नही है |लेकिन किसी काम या विधेयक को लटकाने में संसदीय समितिया एक कारगर हथियार जरुर हैं | सरकार ऐसे विधेयको को सम्बन्धित संसदीय समिति को भेज देती हैं और फिर राय मशविरे के साथ संसद में पेश की जाने वाली अपनी रिपोर्ट को लम्बे समय के लिए लटका देती हैं |तब क्या संसदीय समितियों के नाम की लघु - संसद का निर्माण मुख्यत: विभिन्न मुद्दों या विधेयको को लटकाने के लिए ही किया हैं ? यह बात आधी - अधूरी ही सच है | क्योंकि असली सच्चाई तो 1993 के दौर से जुडी है |यह वह दौर था , जब 1991 में नयी आर्थिक नीतियों के लागू किए जाने के बाद उसको राष्ट्र विरोधी , जन विरोधी बताकर उसका संसद से सडक तक विरोध हो रहा था | इसके चलते उन नीतियों के अंतर्गत नये - नये विधेयको , कानूनों को संसद में पास करने में भारी अडचने आने लगी थी | इन्ही अडचनों को दूर करने के लिए दो - तीन प्रमुख काम किए गये | एक तो 1993 में ही अपने - अपने क्षेत्र के विकास के नाम पर ( सांसदों , विधायको में कमीशनखोरी के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाली ) सांसद निधि दीये जाने कि घोषणा कर दी गयी | दूसरे , सांसदों के वेतन भत्तो आदि में वृद्धि कर दी गयी और की जाती रही है | तीसरे संसदीय समितिया बनाकर विरोधी पार्टियों के नेताओं को भी उसकी सदस्यता , अध्यक्षता दे दी गयी | इसके जरिये उनके संसदीय अधिकारों में वृद्धि कर दी गयी | इन व अन्य संसदीय बदलावों के फलस्वरूप भी जन विरोधी विदेशी आर्थिक नीतियों के प्रति 1991 से खड़ा हुआ संसदीय विरोध भी 1995 - 96 तक आते - आते दब गया | सभी संसदीय पार्टिया इन नीतियों को केंद्र से लेकर प्रान्तों तक लागू करने में जुट गयी | एक दूसरे के साथ केन्द्रीय शासन -सत्ता में मोर्चाबद्ध होकर नीतियों के अगले चरण से जुड़े विधेयको , कानूनों को पास कराती रही | ये थी संसदीय समितियों के बनने की परिस्थितिया और उसके कारण | इसलिए अब जबकि सभी संसदीय पार्टिया उन नीतियों और उससे जुड़े विधेयको कानूनों को आगे बढाने में जुट गयी है , तब संसदीय समितिया मुख्यत:किन्ही गैर जरूरी विधेयको को लटकाने के एक माध्यम के रूप में ही नजर आ रही है | लेकिन 1993 में गैर कांग्रेसी सांसदों को इन नीतियों का पक्षधर बनाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं , और वह आज भी जारी हैं|


-सुनील दत्ता - स्वतंत्र  पत्रकार - समीक्षक

Tuesday, January 13, 2015

'' हम भूखे है , हम भूखे है '' -------- संसार की पहली हड़ताल -- 14- 1 - 15

संसार की पहली हड़ताल --
'' हम भूखे है , हम भूखे है ''
( हड़ताल मजदूरो का अत्यंत प्रभावशाली हथियार है , जिसकी शुरुआत आज से लगभग तीन हजार दो सौ वर्ष पूर्व रेमसे राजवंश के शासनकाल में हुई थी | इस लड़ाई में न केवल कामगारों की जीत हुई , बल्कि देखते - ही देखते यह पूरे देश में मजदूरो की शक्ति बनकर उभरी |
संसार की सबसे पहली हड़ताल आज से लगभग तीन हजार दो सौ वर्ष पूर्व हुई थी | जब विकसित उद्योग अस्तित्व में नही आये थे | यह हड़ताल 1170 ई. पूर्व मिस्र में हुई थी , जहा उस समय रेमसे राजवंश चल रहा था | 1200 से 1085 ई पूर्व रेमसे -- तृतीय से रेमसे - नवम का काल रहा है |
यह देखना रोचक होगा कि उस समय श्रमिक की परिभाषा में कौन - कौन - से कामगार आते थे और उनकी कार्य दशाये , जो हडतालो का मूल कारण होती है , कैसी थी ! श्रमिको के क्रमानुसार फोरमैन, क्लर्क , नक्शानवीस, वास्तुशिल्पी ,पेंटर ,खनक ,राजमिस्त्री और अकुशल मजदुर आते थे |
ये राजा , जमीदारो और पुरोहितो द्वारा महल मंदिर और समाधियो के निर्माण कार्य में लगाये जाते थे | राजा के यहाँ सुनार , सराफ , बुनकर और बढ़ई भी काम करते थे | सेना को रथ , कवच , नाव आदि बनवाने के लिए लुहार , बढ़ई और श्रमिको की आवश्यकता पड़ती थी |
कामगारों की स्थिति किसानो से बेहतर थे | ये किसान भी नील नदी में बाढ़ आ जाने पर , खेतो से पानी निकलने और सूखने तक मजदूरी करते थे | श्रमिको के घर कच्ची ईटो के बने होते थे | '' राजाओं ' की घाटी "" के पास डीईर - एल - मेडीनेह में एक ऐसा गाँव भी था जहा पांच सौ सालो से केवल वे ही श्रमिक और उनके वंशज रहते चले आये थे , जो सिर्फ राजाओं की समाधिया बनाने और उन्हें अलंकृत करने का काम करते थे |
श्रमिको की कार्य दशाये दुष्कर नही थी | काम की पालिया दस - दस दिन की होती थी | छुट्टी देने के नियम उदार थी | बीमारी होने पर ही नही उसके लक्षणों के आधार पर ही छुट्टी मिल जाती थी |
बीमारी की परिभाषा विस्तृत थी | अभिलेखों में एक मामला दर्ज पाया गया है कि एक कामगार को इसलिए छुट्टी दे दी गयी , क्योकि वह बीबी द्वारा पिटाई किये जाने के कारण शरीर दर्द से पीड़ित था |
वेतन का भुगतान वस्तु रूप में होता था | मुद्रा का प्रचलन न होने के कारण वेतन रोटी , बीयर , फलियों , प्याज , सूखे मांस , वसा और नकम के रूप में दिया जाता था | कामगारों की श्रेणियों निर्धारित थी और उसी के अनुसार उन्हें वस्तु या वस्तुए वेतन के रूप में मिलती थी |
लगभग 1170 ई पु में सरकार लगातार दो महीने तक वेतन नही दे पाई | यह वह समय था , जब मिश्र राजवंश का सितारा डूबने लगा था और राजकोष खाली हो चला था | वेतन खाद्य वस्तुओ के रूप में होता था इस कारण श्रमिको द्वारा अधिकतर वस्तुओ का संग्रह नही किया जा सकता था | अत: रोज कुआ खोदकर पानी पीने वाली बात थी | अचानक एक दिन थेबीज में नेक्रोपोलिस के कामगारों ने अपने औजार फेंक दिए और '' हम भूखे है , हम भूखे है '' चिल्लाते हुए काम छोड़कर बाहर निकल आये | वे रेमसे - द्दितीय के समाधि -- मंदिर तक पहुचे और उसकी दीवार के बाहर जूते हुए खेतो की मेड पर बैठ गये |
तीन अधिकारी उन्हें समझाने आये , उन्हें आश्वासन दिए और काम पर लौटने को कहा | पर भूखा पेट कोई उपदेश नही सुनता | अत: वे नही माने | अगले दिन उन्होंने जलूस निकाला | तीसरे दिन श्रमिक फिर हड़ताल पर रहे और जलूस के रूप में मंदिर के अहाते में पहुच गये | वे सयमित थे पर वेतन भुगतान की अपनी मांग पर डटे रहे | एक महीने बाद सरकार के कान पर जू रेगी और श्रमिको को तीस दिन के वेतन के रूप में राशन दिया गया | जिसे लेकर भी उन्होंने हड़ताल नही तोड़ी | उसके बाद आठ दिन हड़ताल और चली | जब उन्हें दूसरे महीने का भी वेतन मिल गया तभी वे काम पर लौटे |
राजकोष की स्थिति खराब होने के कारण कुछ समय बाद फिर वेतन का भुगतान बंद हो गया | फिर हड़ताल हुई , परन्तु इस बार उन्हें कोई भी अधिकारी आश्वासन देने नही आया | अत: श्रमिको को इस आशंका ने ग्रसित कर लिया कि हड़ताल चाहे कितने दिन चले उन्हें वेतन मिलने वाला नही | सरकार की उपेक्षा के कारण हड़ताल से सयम और अनुशासन के तत्व विलीन हो गये | श्रमिक घोर निराशा में डूब गये | अत: अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए वे समाधि स्थलों पर लूटपाट करने लगे और उससे मिली वस्तुओ के बदले अनाज प्राप्त करने लगे | यह कार्य सरकारी अधिकारियों की शह पर होता था , जो लुट में से अपना हिस्सा लेकर इस और से अपनी आँखे मुड़ते रहते थे | इस प्रकार राजा की उपेक्षा के कारण वे असंतुष्ट कामगार लुटेरे तक बन गये |
                            लेखक - सुधीर निगम साभार - अहा ! जिन्दगी जनवरी  15 अंक से

94 साल बाद खत्म हुआ निष्कासन - 14-- 1 - 15

94 साल बाद खत्म हुआ निष्कासन -




ये शायद ही किसी कालेज में होता हो कि वह बर्खास्त किये गये छात्र को वापस बहाल कर दे , लेकिन हर कालेज से निकाला  छात्र राष्ट्रीय हीरो नही होता | 94 साल बाद कोलकाता के प्रेसीडेंसी कालेज ने सुभाष चन्द्र बोस के निष्कासन को खत्म  कर दिया |
उनके ये कार्यवाही एक ब्रिटिश टीचर पर हमला करने के आरोप में की गयी थी | दरअसल हमला सुभाष ने नही किया था , लेकिन कालेज प्रशासन के सामने उन्होंने आरोपित छात्रो का बचाव जरुर किया था | दरअसल अग्रेज प्रोफ़ेसर की अभद्रता से कालेज के छात्र परेशान थे | वह कई बार उन्हें अपमानित करने वाली हरकते कर चुका था | लिहाजा एक दिन कुछ छात्र ने उस पर बल प्रयोग कर दिया | काफी हंगामा मचा , जिस विभाग के छात्रो ने ये किया था , सुभाष उस विभाग के छात्र प्रतिनिधि थे | उन्होंने कालेज प्रशासन के सामने उन स्थितियों का असरदार ढंग से तर्क रखा , जिसमे ये सब हुआ | फिर स्थितिया कुछ ऐसी हुई कि सरकार ने कालेज के प्रिसिपल को ही बर्खास्त कर दिया , पर उसने जाते -- जाते कुछ छात्रो को काली सूचि में डालकर उन्हें  रेस्टिकेट करने की सिफारिश कर दी | अब प्रेसिडेसी कालेज अपनी इस गलती को सुधार रहा है | कालेज में न केवल सुभाष की अर्धप्रतिमा लगाई जायेगी , बल्कि उनका सम्मान भी किया जाएगा | नेता जी कालेज के बेहद मेधावी छात्रो में थे | उन्होंने बंगाल में मैट्रिक परीक्षा में मेरिट लिस्ट में दूसरे नम्बर पर रहते हुए कोलकाता के प्रेसिडेंसी कालेज में प्रवेश लिया था | हालाकि इस कालेज से निष्कासित किये जाने के बाद कोलकाता विश्व विद्यालय ने उन्हें दूसरे कालेज में प्रवेश की अनुमति दे दी थी | उन्हें स्कोटिश कालेज में दाखिला मिला था और उन्होंने 1919 में दर्शन शास्त्र से मास्टर डिग्री  की परीक्षा में विश्व विद्यालय में दूसरी पोजीशन हासिल की थी |

Monday, January 12, 2015

स्वर्णमुकुट ------------------------- 13-1-15

स्वर्णमुकुट

आज हम विश्व के महान वैज्ञानिको को भूलते जा रहे है | जिन्होंने इस आधुनिक जीवन में आधुनिक संसाधनों , सुविधाओं , मालो सामानों और सेवाओं का उपयोग तथा उपभोग के लिए आविष्कार किये | हमे यह याद रखना चाहिए कि उन सबके खोज आविष्कार में विश्व के महान वैज्ञानिकों ने अपना जीवन लगा दिया | उन महान कार्यो के लिए अदम्य कर्मठता व त्याग के साथ उन्होंने अपना सारा जीवन उस उद्देश्य को समर्पित कर दिया |

आज उन्ही खोजो -अविष्कारों  के फलस्वरूप विकसित हुए संसाधनों से देश दुनिया की धनाढ्य  कम्पनिया अरबो -- खरबों कमाती जा रही है | विडम्बना यह कि उन खोजो -- अविष्कारों के फलस्वरूप बने आधुनिक मालो -- सामानों मशीनों सेवाओं पर देश -- दुनिया की दिग्गज कम्पनियों का नाम व ट्रेड मार्क तो है पर उनकी खोज आविष्कार करने वाले वैज्ञानिको का कही कोई नाम नही है | लोग कम्पनियों को जानते है पर उसे खोजने वाले वैज्ञानिकों को नही जानते | यह उन महान वैज्ञानिकों के प्रति घोर उपेक्षा व कृतघ्नता का परिलक्षण है | यह परिलक्षण न केवल धनाढ्य कम्पनियों द्वारा ही नही किया जा रहा है , बल्कि उनके उपभोग से सुख -- सुविधा भोगते जा रहे समाज खासकर आम प्रबुद्ध समाज द्वारा भी किया जा रहा है |
प्राकृतिक विज्ञान के पितामह कहे जाने वाले सर्वथा योग्य महान वैज्ञानिक आर्कमिडिज का जन्म ईसा से 287 से पहले यूरोप के सिसली नगर में हुआ था | उस समय वह के राजा ने देवताओं को भेट चढाने के लिए एक स्वर्ण मुकुट तैयार करवाया | मुकुट बहुत सुन्दर था | पर राजा को यह सन्देह हो गया कि इस स्वर्णमुकुट में मिलावट की गयी है | इसकी जांच के लिए उन्होंने अपने खोजी प्रतिभा के लिए प्रसिद्धि पाए आर्कमिडिज को बुलाकर मुकुट को बिना तोड़े ही उसमे किसी मिलावट की जानकारी का कार्यभार दे दिया |आर्कमिडिज दिन  --  रात इस समस्या को सुलझाने के चिन्तन मनन में लग गये | एक दिन उसी चिन्तन में वे सार्वजनिक स्नानागार में पानी से भरे टब में नहाने के लिए गये | उनके टब  में जाते ही पानी का एक हिस्सा बाहर बह गया | उसे देखकर वे तुरन्त इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यदि कोई वस्तु किसी द्रव  में डुबोई जाय तो उसके भार में होने वाले कमी वस्तु द्वारा हटाए गये द्रव के भार के बराबर होती है | अपने इस वैज्ञानिक निष्कर्ष से आर्कमिडिज इतने प्रफुल्लित हुए कि टब  से बाहर निकल कर यूरेका -- यूरेका ( पा लिया -- पा लिया ) कहकर दौड़ते हुए अपने घर की ओर भागे |
इसी सिद्दांत को खोजकर उन्होंने पानी से भरे बर्तन में पहले मुकुट को डुबोया | फिर मुकुट के भार के बराबर सोना डुबोया | दोनों बार विस्थापित पानी के भर में अन्तर को देखकर उनोहे मुकुट को बिना तोड़े यह बता दिया कि इसमें मिलावट की गयी है |आर्कमिडिज का यह खोज आज भी वस्तुओ का आपेक्षित घनत्व मापने के लिए प्रयोग किया जाता है | इसी आधार पर आर्कमिडिज ने वस्तुओ के तैरने का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया | आर्कमिडिज ने ही सबसे पहले लीवर का सिद्धांत प्रस्तुत किया | लीवर और घिरनियो द्वारा वे माल से भरे जहाज को अकेले ही किनारे तक उठा लाये |
आर्कमिडिज  ने अपनी खोजो को लेकर कई पुस्तके भी लिखी | उसमे '' आन दि स्फीयर एण्ड सिलेन्डर '' मेजरमेन्ट आफ दि सर्किल '' आन फ्लोटिंग बाडीज '' आन बैलेन्सज एण्ड लीवर्स |

एक युद्ध के बाद ईसा पूर्व 212 सदी में आर्कमिडिज  का गृह नगर रोम के कब्जे में आ गया | आर्कमिडिज  बहुत दुखी हुए | 75 वर्ष की उम्र में आर्कमिडिज  अपने घर में बैठे जमीन पर कुछ ज्यामितीय आकृतिया बना रहे थे | तभी कुछ सशत्र रोमन सिपाही उनके घर में घुस गये | वे अपने काम में इतने तल्लीन थे कि उन्हें सिपाहियों के आने का कुछ पता ही नही चला और वे अपने काम में लगे रहे | जब सिपाही उनकी ओर बढ़े तो वे अचानक बोल उठे -- '' इन आकृतियों को मत बिगाडिये| इतना सुनते ही सिपाही ने अपना भाला उनके शरीर में भोक दिया | आर्कमिडिज  की तत्काल मृत्यु हो गयी | उनकी कथा अमर है | उनके खोज और आविष्कार अमर है | क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को मानव समाज को आगे बढाने के लिए समर्पित कर दिया न्योछावर कर दिया था |


-सुनील दत्ता
पत्रकार

Sunday, January 11, 2015

अदभुत किरदार ------ 12- 1 - 15


 टीपू सुलतान



क्या कभी हिंदोस्ता की तवारीख से सम्राट अशोक या अकबर महान का नाम हटाया जा सकता है ? क्या कभी महाराष्ट्र के इतिहास से छत्रपति सिवाजी महाराज के नाम को गायब किया जा सकता है ? इनका जबाब सभी एक सुर से दे सकते है '' नही '' जाहिर है चंद नाम किसी सूबे , किसी देश के इतिहास से इस कदर जुड़ जाते है कि उन्हें अलग करना असम्भव होता है | शायद यही बात टीपू सुलतान के बारे में कही जा सकती है , जो ब्रिटिश पूर्व हिंदोस्ता का एक मात्र ऐसा शासक था जो अंग्रेजो के विरुद्द लड़ते - लड़ते मैदाने जंग में शहीद हुआ | यह विडम्बना ही है कि चंद दक्षिणपथी सगठनों को यह बात रास नही आती और वह उनके योगदान को सक्रीण नजरिये से देखते है | यहाँ तक कि उसे भी धर्म या सम्प्रदाय के चश्मे से देखने की कोशिश करते है | कर्नाटक सरकार द्वारा टीपू जयंती मनाने के प्रस्ताव को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाये हिंदूवादी सगठनों की तरफ से सामने आई है उसके बारे में यही कहा जा सकता है | निश्चित ही यह पहली बार नही है कि इस तरह का विरोध किया गया | दो साल पहले कर्नाटक के श्रीरंगपट्टनम में जहा टीपू वीरगति को प्राप्त हुए थे , बन रहे एक विश्व विद्यालय को उनके नाम पर बनाने को लेकर भी तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर भी विरोध किया गया था | इतना ही नही जिन दिनों कर्नाटक में जनता दल ( एस ) के साथ भा ज पा सत्ता में साझेदारी कर रही थी तब इन्ही सगठनों ने कर्नाटक के इतिहास से टीपू सुलतान का नाम हटाने का प्रस्ताव रखा था | यह अच्छी बात है कि हिंदोस्ता की जनता की स्मृतियों में टीपू सुलतान आज भी एक ऐसे शासक के तौर पर मौजूद है जो बेहद दूरदर्शी थे और जिन्होंने उपनिवेशवाद के खतरे को बहुत पहले भाप लिया था | 20 नवम्बर 1750 को देवनहल्ली में जन्मे और 4 मई 1799 को अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनममें अग्रेजी सेना के हाथो शहीद हुए टीपू सुलतान उन शासको में शुमार किये जाते थे जो अपने समय से बेहद आगे थे | वह पढ़े - लिखे होने के साथ - साथ काबिल सेनानी थे | वह एक अच्छे कवि तथा भाषाशास्त्री भी थे | मैसूर के पहले चर्च निर्माण उन्होंने ही करवाया था | उनकी सेना में अधिकतर लोग हिन्दू थे | चर्चित वृन्दावन गार्डेस का निर्माण उन्होंने ही करवाया , सडको , सार्वजनिक इमारतो और केरल के किनारे बन्दरगाहो का निर्माण उनके ही शासनकाल में हुआ | मैसूर के प्रथम और द्दितीय युद्द में अग्रेजी सेना को भारी नुक्सान उठाना पडा था और इसके चलते एक अजेय सेना होने का अंग्रेजो का मिथक टूट गया | टीपू सुलतान हिन्दू - मुस्लिम एकता के जबर्दस्त हिमायती थे | उन्हें नई --- नई खोजो में दिलचस्पी रहती थी | यह अकारण नही है कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अबुल कलाम ने अपने व्याख्यान में उन्हें ' विश्व में पहली बार राकेट विज्ञान विकसित करने सुभाष गताडे क्या कभी हिंदोस्ता की तवारीख से सम्राट अशोक या अकबर महान का हटाया जा सकता है ? क्या कभी महाराष्ट्र के इतिहास से छत्रपति सिवाजी महाराज के नाम को गायब किया जा सकता है ? इनका जबाब सभी एक सुर में दे सकते है '' नही '' | जाहिर है चंद नाम किसी सूबे किसी देश के इतिहास से इस कदर जुड़ जाते है कि उन्हें अलग करना असम्भव होता है | शायद यही बात टीपू सुलतान के बारे में कही जा सकती है , जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब तक रहा जंग करता रहा |
साभार ----- काशीवार्ता (वाराणसी ) दस जनवरी २०१५

संत की सीख 12 - 1 - 15

संत की सीख




नदी किनारे एक मल्लाह रहता था | वह यात्रियों को बिठाकर नदी के उस पार ले जाता और इससे होने वाली आमदनी से उसके परिवार का खर्चा  चलता था | मल्लाह मनमौजी किस्म का था | वह लोगो को नदी पार कराने के लिए बिना किराया तय किये ही बैठा लेता और उस पार उतारने पर उनसे पैसा माँगता , जिसको लेकर कई बार झन्झट हो जता | मल्लाह गुस्से में आकर कटु शब्द भी बोल देता , जिससे उसकी मुसाफिरो के हाथो आये दिन पिटाई भी होती | एक दिन एक संत उसकी नाव में नदी के उस पार जाने के लिए सवार हुए |  मल्लाह की श्थिति के बारे में जान उन्होंने उसे रास्ते में दो शिक्षाए दी | एक तो यह है कि यात्रियों को नाव में चढाने से पहले ही किराया से लिया जाए या तय कर लिया जाए और दूसरी बात , वह बात - बात में आवेश में न आया करे | इसी तरह बातचीत करते - करते रास्ता कट गया | नाव से उतरने पर मल्लाह ने संत से किराया माँगा इस पर संत ने कहा -- वत्स हम जो संत है | हमारे पास कोई रुपया -- पैसा नही जो हम तुम्हे दे सके | हालाकि मैंने तुम्हे जो शिक्षाए दी है , वे भी कम मूल्यवान नही  | यदि तुम उन पर अमल करो तो तुम्हारा जीवन बदल जाएगा | यह सुनकर मल्लाह बोला -- ' मुझे शिक्षा नही पैसा चाहिए
 उसके बगैर मैं आपको यहाँ से नही जाने दूंगा
 ' मल्लाह का गुस्सा बढने लगा | इतने में वहा मल्लाह की पत्नी भोजन लेकर आई | संत को देखकर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने पति को समझाते हुए बोली --- ये बहुत ग्यानी संत है | राजा भी इन्हें बहुत मान देते है | इनसे झगड़ना ठीक नही है | यह सुनकर मल्लाह का क्रोध और भड़क गया और उसने थाली सहित भोजन उठाकर नदी में फेंक दिया | समाचार रजा तक पहुचा | उन्होंने सैनको को भेजकर मल्लाह को बंदी बनाते हुए कारागार में डलवा दिया और उसकी नाव भी जब्त कर ली | संत ने जाकर उसे छुडाया और उसे समझाते हुए कहा -- '' मैंने तुम्हे जो दो सीखे दी है , तुम उन पर चलकर तो देखो | इससे तुम्हे आर्थिक लाभ होगा और तुम्हारा जीवन भी सुखी हो जाएगा | मल्लाह की समझ में अब वे शिक्षाए आई और वह उनके अनुसार आचरण करते हुए सुखी जीवन व्यतीत करने लगा |

Saturday, January 10, 2015

शिक्षा -------- देश के आवाम के सामने बड़ा प्रश्न 11-1-15

शिक्षा -------- देश के आवाम के सामने बड़ा प्रश्न



राष्ट्रीय पाठ्य चर्चा की रूप रेखा 2005 को बने करीब दस साल पूरा हो चूका है | नई सरकार नया  दस्तावेज बनाने की जुगत में है , लेकिन दुर्भाग्य है कि अभी तक यह दस्तावेज पूरी तरह से धरातल पर नही उतर पाया है | सरकारी स्कूलों में तो इस दस्तावेज द्वारा सुझाए गये बहुत सारे सुझाव को कार्यरूप में परिणित करते हुए शिक्षण के तरीको में कुछ परिवर्तन देखे भी गये है | एन सी आर टी सहित विभिन्न राज्यों ने इस दस्तावेज के आलोक में अपनी पाठ्य पुस्क्तो का पुनर्लेखन भी किया है | बहुत बेहतर पाठ्य पुस्तके तैयार की गयी है , लेकिन निजी क्षेत्र के अधिकाश विद्यालय ऐसे है , जहा इस दस्तावेज का नाम तक नही पहुचा है | एन सी ऍफ़ 2005 की बात करने पर बहुत सारे शिक्षक पूछ बैठते है कि यह क्या है  ?  इससे स्पष्ट होता है कि निजी क्षेत्र के विद्यालयो को शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे नये परिवर्तनों से कुछ लेना - देना नही है | यहाँ तक देखा गया है कि वे सरकारी पाठ्य पुस्तको तक को लागू नही करते | कही प्रबन्धन द्वारा मज़बूरी में भी लागू की गयी है तो शिक्षको द्वारा उनका बहुत कम इस्तेमाल किया जाता है | अधिकाश विद्यालयो में प्राइवेट प्रकाशनों द्वारा तैयार किताबे लगाई जाती है | ये किताबे न केवल महगी होती है , बल्कि इनको तैयार करते हुए शिक्षा के सिद्दांतो और बाल मनोविज्ञान का भी ध्यान नही रखा जाता है | ये किताबे बच्चे को ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढाने की अपेक्षा ज्ञान प्रदान करने पर अधिक बल देती है | इस तरह शिक्षा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज स्कूलों तक ही सीमित होकर रह गया है , जबकि आज निजी क्षेत्रो के विद्यालयो  का दिन - प्रतिदिन विस्तार होता जा रहा है | लगभग पचास प्रतिशत बच्चे निजी विद्यालयो में पढ़ते है | एक और विडम्बना है कि सरकारी स्कूलों तक इस दस्तावेज की समझ तो पहुच रही है , लेकिन वहा  भौतिक व मानवीय ससाधनो की स्थिति इतनी खराब है कि वे चाह कर भी इसको ठीक से लागू नही कर सकते | एन सी ऍफ़ 2005 शिक्षा का एक ऐसा दस्तावेज है जिसको अब तक का सबसे प्रगतिशील दस्तावेज माना जाता है | इस दस्तावेज को प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो यशपाल के नेतृत्व में देशभर के शिक्षाविदो , साहित्यकारों , समाजशास्त्रियो , वैज्ञानिकों आदि ने लगभग दो वर्ष चली लम्बी प्रक्रिया के बाद तैयार किया | यह दस्तावेज वर्ष 1988 और 2000 के दस्तावेजो से इस रूप में भिन्न है कि इसे एन सी आर टी के आंतरिक समूह के द्वारा न तैयार कर एक राष्ट्रीय संचालन समिति द्वारा तैयार किया गया जिसमे लगभग 35- 36 लोग थे | इसके अलावा 21 फोकस समूह थे जिनमे प्रत्येक में 13 - 14 सदस्य लोग थे | इस तरह करीब 400 लोग प्रत्यक्ष और अनेको लोग अप्रत्यक्ष रूप में शामिल हुए | इसमें राष्ट्रीय सहमती की झलक मिलती है | यह दस्तावेज शिक्षा कैसी होनी चाहिए , क्यों होनी चाहिए , उसके सरोकार क्या है , और उसे कैसे बच्चो तक ले जाया जाना चाहिए इन तमाम प्रश्नों का विस्तार से उत्तर देता है | शिक्षा में बने अब तक के सारे दस्तावेजो और प्रयोगों का निचोड़ है यह दस्तावेज | इस दस्तावेज में सामाजिक न्याय , समानता , वैज्ञानिक नजरिये और बहुलतावादी समाज पर विशेष बल दिया गया है | यह नागरिक को एक सचेत , विवेकशील और स्वतंत्र प्राणी मानता है और उसे इस बात की स्वतंत्रता देता है कि राष्ट्र कैसा बनाये | एन सी ऍफ़ २००५ के पांच मार्गदर्शक सिद्दांत है -- ज्ञान को स्कुल के बाहरी जीवन से जोड़ना , पढ़ाई को रटन्त प्रणाली से अलग करना . पाठ्य चर्चा का इस तरह सम्वर्धन कि वह बच्चो को चहुमुखी विकास का असवर मुहैया करवाए बजाए इसके कि वह पाठ्य पुस्तक - केन्द्रित बन कर रह जाए , परीक्षा को अधिक लचीला बनाना और कक्षा को जीवन से जोड़ना | इन सभी सिद्दांतो की आज अधिकाश निजी स्कुलो में क्या स्थिति है यह किसी से छुपा नही है | वह इन सिद्दांतो की खुलेआम धज्जिया उड़ाई जा रही है | आज भी इन स्कुलो में ज्ञान स्कुल की चारह्दीवारी में कैद है | स्कुल के बाहरी जीवन से उसका कोई सम्बन्ध नही है | सूचनाओं तथ्यों और जानकारियों को रटना  , महेश चन्द्र पुनेठा राष्ट्रीय पाठ्य चर्चा की रूपरेखा 2005 को तैयार हुए लगभग एक दशक पूरा होने जा रहा है | नई सरकार नया दस्तावेज बनाने की जुगत में है लेकिन दुर्भाग्य है कि अभी तक यह दस्तावेज पूरी तरह से धरातल पर नही उतर पायी है | सरकारी स्कूलों में तो इस दस्तावेज द्वारा सुझाए गये बहुत सारे सुझावों को कार्यरूप में परिणित करते हुए शिक्षण के तरीको में कुछ परिवर्तन देखे भी गये है | शिक्षा  के नियमो को लेकर आम समाज के सामने यह एक बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है की आने वाले समय में हम अपने बच्चो को कैसी पद्दति से शिक्षा दे सकेगे ?


सुनील दत्ता ----

Friday, January 9, 2015

भूमि अधिग्रहण पर विश्व बैंक का किसान विरोधी सुझाव

भूमि अधिग्रहण पर विश्व बैंक का किसान विरोधी सुझाव


दैनिक जागरण एक जून  14 के अंक में " खेती की खतरनाक खरीद के नाम से प्रकाशित लेख में कृषि नीतियों के विशेषज्ञ लेखक देवेद्र शर्मा ने एक महत्त्वपूर्ण सुचना दी है | यह कि , 2008 में विश्व बैंक ने अपनी विश्व विकास रिपोर्ट में यह कहा है कि - " भूमि बहुत  महत्त्वपूर्ण संसाधन है , किन्तु वह ऐसे लोगो के ( यानी किसानो ) के हाथो में संकेंद्रित है , जो उनका कुशलता से उपयोग नही कर पा रहे है | इसलिए भूमि को बड़े संसाधन को उन लोगो के दे दिया जाना चाहिए जो उसका कुशलता से उपयोग कर सके | लेखक ने इसका मतलब स्पष्ट करत हुए कहा कि विश्व बैंक के सुझावों के अनुसार भूमि संसाधन का कुशलता पूर्वक उपयोग करने कि क्षमता पूंजी विहीन , अभाव ग्रस्त , किसानो के पास नही बल्कि आधुनिक संसाधनों से सम्पन्न धनाढ्य लोगो के ही पास है | इसलिए किसानो कि खेती अर्थात विशालकाय कम्पनियों द्वारा संचालित नियर्त्रित खेती में बदल दिया जाना चाहिए | लेखक ने आगे बताया है की इन्ही सुझावों के अनुसार काम भी किया जा रहा है | किसानो को जमीन से बेदखल करने और उसे धनाढ्य हिस्सों को सौपने की प्रक्रिया लम्बे समय से चलाई जा रही है | इस देश में ही नही बल्कि अन्य पिछड़े देशो में भी ये ही प्रक्रिया चलाई जा रही है |
पड़ोसी देश चीन में भी वंहा की सरकार द्वारा भूमि - अधिग्रहण के जरिये भारी संख्या में किसानो की कृषि भूमि से बेदखली किया है | यह सब देश की जनतांत्रिक कंही जाने वाली सत्ता - सरकार द्वारा धनाढ्य एवं उच्च तबको के हितो , स्वार्थो की अन्धाधुन पूर्ति के लिए एकदम नग्न रूप में किसानो विरोधी , जनविरोधी चरित्र अपना लेने का सबूत है की विश्व बैंक के सुझावों के अनुरूप ही सत्ता - सरकारे कृषि भूमि को किसानो से छीनकर  उसका अधिकाधिक कुशलता से उपयोग करने वाली धनाढ्य कम्पनियों को सौपने को तैयार है | हमारे देश के कई विद्वान एवं उच्च स्तरीय अर्थशास्त्री भी यही  बात कर रहे है | जाहिर सी बात है कि विद्वान अर्थशास्त्रीयो  की यह बात उनकी अपनी सोच नही है | बल्कि वह धनाढ्य कम्पनियों की वकालत मात्र ही है | यह वकालत प्रचार माध्यमी जगत में भी इस रूप में चलती रही है कि , " विकास के लिए जमीन कि आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता |
उद्योग , वाणिज्य , व्यापार , यातायात , संचार आदि के विकास विस्तार के लिए जमीनों की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | तीव्र विकास के वर्तमान दौर में भूमि और कृषि भूमि के अधिकाधिक अधिग्रहण की आश्यकता से इनकार नही किया जा सकता | इन पाठो , प्रचारों के साथ किसानो से जमीने चिनकर उन्हें धनाढ्य कम्पनियों के देने में विश्व बैंक , देश व् विदेश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री गण देश की केन्द्रीय प्रांतीय सरकारे तथा प्रचार माध्यम जगत के बहुसख्यक हिस्से एक जुट है | इनके पीछे देश - दुनिया के धनाढ्य कम्पनिया खड़ी है और उनका वरदहस्त इनके उपर है | आधिनिक विकास के लिए किसानो और गावो की विनाश करना इनका प्रमुख लक्ष्य बन गया है |
अत : किसानो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरोध में जगह - जगह चलाया जा रहा आन्दोलन केवल ' अपनी जमीन बचाओ ' अपना गाव बचाओ ' आन्दोलन के रूप में खत्म  नही हो जाना चाहिए | बल्कि यह देश - प्रदेश के गाव बचाओ किसान बचाओ के रूप में आगे बढ़ जाना चाहिए | प्रदेश व्यापी , देश व्यापी हो जाना चाहिए अधिकाधिक संगठित एवं एकताबद्ध हो जाना चाइये | फिर इस विरोध को भूमि अधिग्रहण के विरोध तक ही सीमित  नही रहना चाहिए | बल्कि सरकार के जरिये भूमि का मालिकाना पा रही कम्पनियों के विरोध के रूप में भी आगे बढना चाहिए | चुकी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वैश्वीकरणवादी निजीकरण वादी नीतियों का अहम हिस्सा है | इन नीतियों के तहत निजी लाभ मालिकाना बढाने की छुट पाते रहे धनाढ्य एवं उच्च तबको के कृषि भूमि पर मालिकाने का बढ़ाव विस्तार है | इसलिए किसानो एवं ग्रामवासियों को इस बात को जरुर जानना समझना चाहिए की भूमि अधिग्रहण के विरोध के लिए वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी नीतियों का विरोध अत्यंत आश्यक है | अपरिहार्य है |खाद्यानो की बढती महगाई की मार सहते जा रहे गैरकृषक जन साधारण हिस्से को भी इस विरोध इस विरोध में किसानो के साथ होना चाहिए ............... जागो -जागो कब तक सोते रहोगे लोगो .........

' थका पिसा मजदूर वही दहकान वही है |
कहने को भारत , पर हिन्दुस्तान वही है ||
सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार -- समीक्षक 

व्यवस्था ने आत्महत्याएं करवा दीं 9-1-15

व्यवस्था ने आत्महत्याएं करवा दीं

बुन्देलखण्ड में सैकड़ो किसानो द्वारा आत्महत्या
{ ये आत्महत्याए केवल सरकारों की उपेक्षा के ही परिणाम नही है , बल्कि देश में बीस सालो से लागू वैश्वीकरणवादी नीतियों तथा डंकल प्रस्तावों जैसे नीतिगत बदलाव के भी परिणाम है | }
16 जून 14 के 'दैनिकजागरण ' में बुन्देलखण्ड में सैकड़ो किसानो के आत्महत्या की सूचना दी गयी है | साथ ही यह भी सूचना दी गयी है कि हाईकोर्ट ने इस सम्बन्ध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के पश्चात केंद्र व राज्य सरकार से एक माह में इन आत्महत्याओं के बारे में स्पष्टीकरण माँगा है | न्यायालय ने कृषि ऋण वसूली के मामले में उत्पीडन कारवाई पर रोक लगा दी है | पिछले आठ - दस सालो से विभिन्न प्रान्तों से किसानो कि आत्महत्याओं की सूचनाये आती रही है | सरकारी एवं गैरसरकारी आकड़ो के अनुसार अब तक आत्महत्या कर चुके किसानो की कुल संख्या ढाई लाख से उपर पहुच चुकी है | इनमे से ज्यादा किसान महाराष्ट्र , कर्नाटक व आंध्र प्रदेश से रहे है | यह भी सुचना है कि इन प्रान्तों में आत्महत्या कर रहे अधिकतर किसान व्यावसायिक खेती करते रहे है बाज़ार में कृषि उत्पादनों की गिरती मांग और गिरते मूल्य - भाव के कारण किसानो के उपर खेती के लिए उठाये गये कर्जो का बोझ बढ़ता रहा | उसे न दे पाने और प्रताड़ित किये जाते रहने के फलस्वरूप ही उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया | व्यावसायिक खेती में लगे ज्यादातर किसानो के आत्महत्या की यही कहानी है | जाहिर सी बात है उनकी आत्महत्या के लिए बढती कृषि लागत तथा कृषि उत्पादों की अनिश्चित व डावाडोल बिक्री बाज़ार के साथ कर्ज़ देने वाली सरकारी व गैरसरकारी संस्थाए भी जरुर जिमेदार है | सरकारी कर्ज़ की अदाएगी न होने पर आर ० सी ० कटने , किसानो को जेल भेजने जैसी कारवाई तथा माइक्रोफाइनेंस व प्राइवेट महाजनों के और भी ज्यादा जालिमाना उत्पीडन की कारवाइयो कि खबरे व सूचनाये भी आती रही है | अब किसानो की आत्महत्याओं का सिलसिला झारखंड . छत्तीसगढ़ और बुन्देलखण्ड जैसे पिछड़े और खेती के अविकसित इलाको में बढ़ रहा है | झारखंड से भी किसानो की आत्महत्या की खबरे पिछले कई सालो से ये खबरे आती रही है कही वंहा वर्षा की कमी के साथ - साथ सिंचाई के साधनों की भारी कमी - किल्लत विद्यमान है | हर साल फसलो का खासा हिस्सा सूखे की भेट चढ़ता रहा है | इन खबरों पर भी सरकारों का जबाब कभी - कभार के पैकेजों के अलावा भारी उपेक्षा व निष्ठुरता का भाव रहा है | सिचाई की बेहतर व स्थाई व्यवस्था को बढावा देने का कोई भी पुख्ता काम सरकार द्वारा नही होता रहा | इसके फलस्वरूप भी सैकड़ो किसान गरीबी , भुखमरी के संकटों में फंसते रहे | हर तरह से निराश होकर भी वे ख़ुदकुशी के लिए मजबूर होते रहे |
उच्च न्यायालय ने सैकड़ो की संख्या में हुई किसानो के आत्महत्याओं पर केंद्र व प्रांत सरकारों को स्पष्टीकरण का नोटिस तो जारी किया है , परन्तु एक माह का समय देने के साथ | इसके बाद अदालती कार्यवाई शुरू होगी | बहसों के बाद किसी फैसले के रूप में पूरी भी हो जायेगी | लेकिन जीवन के गम्भीर संकटों में फंसी किसानो व खेतिहर मजदूरों की जिन्दगिया उसका इन्तजार नही कर सकती | फिर अगर बुंदेलखंड के किसानो के हित में कोई फैसला आ भी जाता है तो किसानो के आत्महत्या के रोके जाने का कोई रास्ता निकलने वाला नही है | क्योंकि वे रास्ते उसी केन्द्रीय - प्रांतीय बिधायिका व कार्यपालिका को ही निकालना है जो आज तक अन्य प्रान्तों में और इस प्रांत में भी किसानो की बढती समस्याओं के प्रति उपेक्षा व निष्ठुरताका भाव दिखाती आ रही है | उनकी समस्याओं का स्थाई समाधान खोजने की जगह विकास के नाम पर उनकी उपजाऊ जमीनों को भी उनसे छीनकर उनका अधिग्रहण करती जा रही है | किसानो की समस्याओं को हटाने - मिटाने की जगह किसानो को ही हटाती - मिटाती जा रही है | पिछले दस - पन्द्रह सालो से कृषि व किसानो के इन संकटों को नीतिगत रूप से बढाती रही केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारों से यह उम्मीद नही की जा सकती है कि , आत्महत्याओं कि खबरों से या न्यायालयी हस्तक्षेपो से सरकारे बुंदेलखंड के पिछड़े पन को दूर करने का प्रयास करेगी |उल्टे यह लगभग सुनिश्चित है की अब झारखंड , बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाको में किसानो की आत्महत्याओं का बढ़ता सिलसिला पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े इलाको में भी बढ़ जाएगा | क्योंकि ये आत्महत्याए केवल सरकारों की उपेक्षा के परिणाम नही है , बल्कि देश में बीस सालो से लागू वैश्वीकरण नीतियों तथा डंकल प्रस्तावों जैसे नीतिगत बदलावों के भी परिणाम है | इन नीतिगत बदलावों का देश दुनिया के धनाढ्य व उच्च हिस्से तथा सत्ता - सरकारे पूरे देश पर लागू करने में लगी हुई है | 70% जनसाधारण से आम किसानो व मजदूरों से उनकी जीविका तथा जीवन के बुनियादी अधिकारों को यह व्यवस्था उनसे छिनती जा रही है साथियो आगे आइये यह समस्या सिर्फ किसानो कि ही नही है बल्कि आमजन की है |
सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Wednesday, January 7, 2015

शालीनता ---- ------------------------- 8-1-15

शालीनता ----




रूस में आस्पेस्की नामक एक महान विचारक हुए है | एक बार वे संत गुरजियफ से मिलने उनके आवास पर पहुचे | दोनों के बीच विभिन्न  विषयों को लेकर चर्चा चल पड़ी | बातचीत के दौरान आस्पेस्की ने संत गुरजियफ़ से कहा -- वैसे तो मैंने गहन अध्ययन और अपने अनुभव के  जरिये   अर्जित कर लिया है , पर मैं कुछ और भी जानना चाहता हूँ | क्या आप मेरी इसमें मदद कर सकते है ? गुरजियफ़ जानते थे कि आस्पेस्की अपने विषय के प्रकांड विद्वान् है . जिसका किंचित उन्हें दंभ भी है , अत: सीधी बात करने से कोई प्रयोजन सिद्द नही होगा | उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद एक कोरा कागज उठाया  और उसे आस्पेस्की की ओर बढाते हुए बोले -- यह अच्छी बात है कि तुम कुछ सीखना चाहते हो | लेकिन मैं कैसे समझू कि तुमने अब तक क्या -- क्या सीख  लिया है और क्या नही सीखा  है | अत: तुम ऐसा करो कि जो कुछ भी जानते हो और जो नही जानते हो उस  दोनों के बारे में इस कागज पर लिख दो | जो तुम पहले से ही जानते हो उसके बारे में तो चर्चा करना फिजूल है और जो कुछ तुम नही जानते , उस पर ही चर्चा करना उचित होगा | बात एकदम सरल थी . लेकिन आस्पेस्की के लिए बहुत कठिन हो गयी | उसका ज्ञानी होने  का अभिमान चूर - चूर हो गया | आस्पेस्की आत्मा और परमात्मा जैसे विषय के बारे में तो बहुत जानते थे , लेकिन तत्व - स्वरूप और भेद - अभेद के बारे में उन्होंने सोचा तक नही था | गुरजियफ़ की बात सुनकर वे सोच में पड़ गये | काफी देर सोचने के बाद भी उन्हें कुछ नही सुझा | आखिरकार उन्होंने वह कोरा कागज ज्यो का त्यों गुरजियफ़ के चरणों में रख दिया और बोले -- महोदय मैं तो कुछ भी नही जानता | आज आपने मेरी आँखे खोल दी | आस्पेस्की के विनम्रता पूर्वक कहे गये इन शब्दों से गुरजियफ़ बेहद प्रभावित हुए और बोले -- ठीक है , अब तुमने जानने योग्य पहली बात जान ली है कि तुम कुछ नही जानते | यही ज्ञान की प्रथम सीढी है | अब तुम्हे कुछ सिखाया और बताया जा सकता है | सार यह है कि रीते घड़े   को भरा जानकर सम्भव है , लेकिन अंहकार से परिपूर्ण घड़े  में तो बूंद भर ज्ञान नही भरा जा सकता | हम स्वंय को रीता बनाना सीखे तभी तो  ज्ञानार्जन के लिहाज से सुपात्र बन सकेगे |

Tuesday, January 6, 2015

दुनिया के सात अनोखे त्यौहार 7-1-15

बच्चो आज आपको ले चलता हूँ एक अलग दुनिया में जहा विश्व में अनेक तरह के त्यौहार अलग - अलग ढंग से मनाये जाते है |



दुनिया के सात अनोखे त्यौहार
यह दुनिया कितनी विवधताओ से भरी है लोग जिन्दगी को अपनी तरह से देखते है अपनी तरह से जीते है जीने के ढंग भी अलग - अलग होते है |
दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्मो के तीन सबसे बड़े त्यौहार दीपावली , क्रिसमस और ईद है | जो दुनिया भर में बहुत हर्षोउल्लास के साठ मनाये जाते है | लेकिन दुनिया में ऐसे और भी त्यौहार है जो बिलकुल अनोखे है | इन्ही त्योहारों में से कुछ इस तरह है ......
''ह्डाका मसूरी ''
जापान का साइदाजी क्षेत्र जहा '' हडाका मसूरी "' नाम का अनोखा त्यौहार मनाया जाता है | यह त्यौहार इसलिए अनोखा है कयोकि इस त्यौहार के दौरान लोग बिना वस्त्र के रहते है | यह 21 फरवरी को मनाया जाता है | कहते है इस त्यौहार पर जापानी पुरुष अपने आपको शुद्द करने के लिए कपडे त्याग देते है ये सडको पर आते है और ' वर्शोई ' नामक शब्द को जोर - जोर से चिल्लाते है जिसका अर्थ होता है ' शानदार ' आधी रात के बाद स्थानीय पूजा घर से शिंगी नामक लकड़ी के टुकड़े फेके जाते है , जो लोग इन्हें प्राप्त कर लेते है वह अपने आप को बहुत ही शुभ मानते है |
आरेंज फेस्टिवल ---
इटली के इवरिया इलाके में आरेंज फेस्टिवल या संतरा त्यौहार मनाया जाता है | यह त्यौहार 25 - से 28 फरवरी के बीच मनाये जाने वाले इस त्यौहार के दौरान लोग सेना का रूप रखकर खड़े होकर संतरे फेंकते है | इस त्यौहार के पीछे एक रोचक कहानी है अगर संक्षेप में बोले तो 12 वी सदी में यहाँ की युवा लडकियों को शाही सैनिक उठा ले जाते थे | इस बात का विरोध करने के लिए यहाँ के लोगो ने जन आन्दोलन किया और विजय प्राप्त की | यह त्यौहार तभी से मनाया जाने लगा |
बन्दरों को खाना खिलाना ---
हर वर्ष 25 नवम्बर को थाईलैंड के लोबतुरी प्रांत के प्रा प्राग साम योट मंदिर में बंदरो को खाना खिलाया जाता है | थाईलैंड के लोग इस त्यौहार के जरिये भगवान श्री राम को श्रद्दा - सुमन अर्पित करते है | उनका मानना है कि बन्दरों को खाना खिलाने से हनुमान जी प्रसन्न हो जाते है |
चीज ( मक्खन ) का त्यौहार --
यह त्यौहार मई के आखरी सोमवार के दिन इंग्लैण्ड के ग्लोस्टरशायर क्षेत्र की कूपर्स हिल पर मनाया जाता है | इस तरह की दौड़ आयोजित की जाती है | जो जीतता है उसे परम्परागत तौर पर एक ग्लुस्टर डबल चीज दी जाती है | दौड़ प्रतियोगिता में छोटे पहाडो पर चढना होता है | इस दौरान रास्ते में चीज बिछाई जाती है जिसके चलते और काफी फिसलन हो जाती है | कई लोग गिरते है चोट आती है लेकिन लोगो का उत्साह कम नही होता है |
ला टॉमटिया ----
अगस्त के आखरी बुद्दवार के दिन स्पेन के ब्युनोंन में टमाटर उत्सव मनाते है हजारो की संख्या में लोग सडको पर उतरते है और एक दूसरे पर टमाटर फेंकना शुरू करते है लोगो के बीच युद्द करते है और कपडे तक फाड़ दिए जाते है |
बैल से संघर्ष ----
स्पेन का एक और विचित्र त्यौहार ह्पेम्प्लोन शहर में जुलाई 7 से 14 के बीच यह त्यौहार मनाया जाता है | लोग बैलो के आगे दौड़ते है उन्हें बुल रिंग में लाने का प्रत्यं करते है | यह दुरी करीब 800 मीटर की होती है | और पूरी प्रक्रिया 2 - 3 मिनट में समाप्त हो जानी चाहिए | लेकिन ऐसा नही होता इस बीच बैल रास्ते में ही भड़क जाते है और लोगो पर हमला कर देते है |

फुटकर दुकानदारी में विदेशी कम्पनियों को छूट, जैसी नीतियों और सुधारों के संदर्भ में ) 7-1-15

सुनील दत्ता
( फुटकर दुकानदारी में विदेशी कम्पनियों को छूट, जैसी नीतियों और सुधारों के संदर्भ में )
फिर खुदरा व्यापार में छूट देने के लिए तो अमेरिका व अन्य विकसित साम्राज्यी देशों की सरकारें पिछले दो — तीन सालों से चौतरफा दबाव डालती आ रही हैं| सत्ता पक्ष व विरोध पक्ष के नेताओं से इस संदर्भ में बातचीत करती रही हैं| इनके अलावा देश की धनाढ्य कम्पनियाँ भी अपने विदेशी सहयोगियों के लिए फुटकर दुकानदारी में छूट के अधिकार की माँग करती आ रही हैं|
फुटकर दुकानदारी में विदेशी निवेश को छूट के साथ अन्य नीतिगत सुधारों की घोषणाओं के लिए केन्द्रीय सरकार और प्रधान मंत्री की हिम्मत को दाद दी जा रही है| प्रचार माध्यमों में आम तौर पर प्रधान मंत्री द्वारा देर से लेकिन मजबूती से उठाये कदम को सराहा जा रहा है| उद्योगपति और उनके सगठनों द्वारा खुलकर और पूरी तरह से सरकार के समर्थन में ब्यान दे रहे हैं| विदेशी धनाढ्य हिस्सों व प्रचारों ने खासकर अमेरिका के संचार पत्रों एवं उद्योग समूहों ने भारत सरकार द्वारा खुदरा और विमानन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी को पिछले दो दशकों में सबसे बड़ा सुधार बताया है|
विपक्ष के नेताओं ने विरोध व्यक्त किया है| दर असल उन्होंने विरोध नही किया है, बल्कि विपक्ष होने की मजबूरी गाया है| फिर उनका थोड़ा बहुत प्रदर्शित होने वाला यह विपक्षीय विरोध तो ”भारत बंद” के आयोजन के साथ ही लगभग समाप्त हो गया है| रहा सहा जुबानी विरोध भी जुबानी विरोध तक ही सिमट कर हवा हो गयी है| ठीक उसी तरह जैसे कोयला खदानों के आवंटन में घपले — घोटाले को लेकर संसद के पूरे मानसून सत्र में मचा हल्ला, हंगामा तथा भाजपा द्वारा प्रधानमन्त्री के इस्तीफे की माँग आदि, सरकार द्वारा डीजल मूल्य वृद्धि, गैस सिलेन्डर की नियंत्रित मूल्य वृद्धि तथा इन नीतिगत सुधारों की नई घोषणाओं के साथ हवा हो गया है| जब राजनितिक पार्टियों एवं गैर राजनितिक संगठनों से लेकर आम समाज के पढ़े लिखे मध्यम वर्गीय हिस्से के वर्षों से पसंदीदा बने आर्थिक भ्रष्टाचार के मामलों को प्रचार माध्यम के झोंकों से फैलाया और फिर उड़ाया जा सकता है तो सरकार के नीतिगत फैसलों की चर्चा तो फिलहाल और भी टिकने वाली नहीं है क्योंकि उसे लेकर कोई भी पार्टी संगठन टिकने या अनशन — आन्दोलन करने वाला नहीं है| फिर वह इसलिए भी टिकने वाली नहीं है, क्योंकि उसके समर्थन में देश — दुनिया के धनाढ्य वर्ग व कम्पनियाँ तथा उनके प्रचार माध्यमी सेवक समर्थक मजबूती से और काफी पहले से डटे हुए हैं| लम्बे समय से नीतिगत सुधारों को आगे बढ़ाने की माँग करते रहे हैं| देश की तीव्र आर्थिक वृद्धि के लिए इसे अत्यंत आवश्यक बताते रहे हैं| अगर विपक्षी पार्टियाँ इन मुद्दों को लेकर अपनी विपक्ष की ( न कि विरोध की ) राजनीति करती कुछ दिखाई भी पड़ रही है तो भ्रष्टाचार विरोधी जनहितैषी संगठनों की तो कहीं — कहीं कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है| आम समाज का सुशिक्षित हिस्सा तो पहले से ही नीतिगत मामलों पर आम तौर से शाँत बना रहता है| शाँत रहकर उन नीतिगत नीतियों से अपने निजी या अपने वर्गीय फायदे नुकसान का आकलन करता रहता है|
अगर इन स्थितियों के वावजूद देश में फुटकर दुकानदारों व्यापारियों को विपक्षी पार्टियों द्वारा किये जा रहे विरोध से कहीं कोई उम्मीद हो तो उन्हें नीतिगत सुधारों के पिछले 20 सालों के अनुभवों से सबक लेना चाहिए| इन 15 — 20 सालों के अनुभव हमारे सामने हैं| 1991 में शुरू किये गये नीतिगत बदलावों — उदारवादी, विश्ववादी, निजीवादी, कहे जाने वाले बदलावों के विरोध में विरोधी पार्टियों ने देश इस पर विदेशी प्रभुत्व व गुलामी के खतरे के साथ आम जनता के शोषण लूट के बढ़ने का भी खतरा बताया व प्रचारित किया था| इसे बताते हुए प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने कुछ दिनों में ही वह विरोध भ्रष्टाचार और मन्दिर मस्जिद आदि के विवादों में हवा — हवाई हो गया| फिर 1996 — 97 तक आते — आते तो सारी पार्टियाँ उन्हीं नीतियों को आर्थिक सुधार कह कर लागू करने में लग गयीं| उसे आगे बढ़ाने में जुट गयीं| इन सुधारों के अगले चरण के साथ खड़ी हो गयीं| अगर किसी पार्टी पार्टियों ने उन नीतियों का जबानी और यदा कदा प्रचार माध्यमी विरोध जारी रखा तो केन्द्रीय शासन सत्ता में चढ़कर या उसका समर्थक व साझीदार बनकर अथवा प्रांतीय सरकारों में चढ़कर उन नीतियों को लागू करने का ही काम किया| उन नीतियों के कुछ मुद्दों से अपना विरोध जताते हुए भी उसे आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को जारी रखने का काम किया|
अब नये घोषित नीतिगत सुधारों के बारे में भी यही होना है| केन्द्रीय सरकार द्वारा 13 सितम्बर को घोषित सुधारों पर होते रहे विरोध का भी वही परिणाम आना है| इन नई घोषणाओं में केंद्र सरकार ने मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में 51 % निवेश की छूट दे दी है| वैसे विदेशी कम्पनियों को एकल ब्रांड खुदरा व्यापार में 100 % की छूट नवम्बर सी ही मिली हुई थी| उसे रोकने का भी कोई कारगर विरोध नहीं चला| अब उसे अगली सीढ़ी पर पहुंचा दिया गया है| यहाँ पर भी विरोध के इस बुलबुले का फुस्स हो जाना तय है, जैसा कि वह भी हो चुका है| केन्द्र से लेकर कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों ने विदेशी निवेशकों को मल्टी ब्रांड खुदरा व्यापार में आने की हामी भर दी है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार समेत कई अन्य गैर कांग्रेसी शासित राज्यों की सरकारों ने उसे अपने प्रदेश में लागू न करने के लिए कहा है या उस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है |
जाहिर सी बात है कि यह देश में नये नीतिगत बदलाव लाये जाने और उसे लागू करने का वास्तविक विरोध नहीं है| यह तो पार्टीबाजी वाला सत्ता स्वार्थी विरोध है क्योंकि देश के केन्द्र और कांग्रेस शासित प्रान्तों में उसके लागू होने के बाद देर — सबेर उसका अन्य प्रान्तों में लागू होना भी एकदम तय है| वह इसलिए भी कि केन्द्रीय सरकार से लेकर विभिन्न पार्टियों की प्रांतीय सरकारों का भी सारा जोर ”देश — प्रदेश” के आर्थिक विकास पर है| आर्थिक वृद्धि व विकास के नाम पर देश व प्रदेश में देशी व विदेशी निवेशक कम्पनियों को बढ़ावा देने पर है| उन्हें अधिकाधिक छूटें व अधिकार देने पर है| भले ही उसके परिणाम आम जनता के लिए विनाशकारी ही साबित हों, जैसा कि बढ़ती महंगाई, बेकारी रोजी रोजगार के बढ़ते संकटों के रूप में साबित भी हो रहे हैं|
फिर खुदरा व्यापार में छूट देने के लिए तो अमेरिका व अन्य विकसित साम्राज्यी देशों की सरकारें पिछले दो — तीन सालों से चौतरफा दबाव डालती रही हैं| सत्ता पक्ष व विरोध पक्ष के नेताओं से इस संदर्भ में बातचीत करती रही हैं| इनके अलावा देश की धनाढ्य कम्पनियाँ भी अपने विदेशी सहयोगियों के लिए फुटकर दुकानदारी में छूट का अधिकार की माँग करती आ रही हैं| लम्बित आर्थिक सुधारों की वकालत के साथ फुटकर दुकानदारी में इस आर्थिक सुधार की तो खासतौर पर वकालत करती रही हैं| इसके बाद केन्द्रीय व प्रांतीय सरकार को, सत्ता पक्ष या विपक्ष में बैठे हुए उच्च स्तरीय राजनेताओं को अथवा उच्च प्रचार माध्यमी विद्वानों को इस बात से क्या मतलब रह जाता है कि इससे फुटकर दुकानदारी में लगे 25 करोड़ जनसाधारण हिस्से की रोजी प्रभावित होगी| उनका खासा हिस्सा टूट कर बर्बाद हो जाएगा| पिछले बीस सालों में टूटती खेतियों, दस्तकारियों व बहुतेरे छोटे उद्यम, छूटती नौकरियों के वावजूद ये सभी धनाढ्य व उच्च तथा हुक्मती व गैर हुक्मती हिस्से इन आर्थिक सुधारों का समर्थन, खासकर व्यवहारिक समर्थन करते रहते हैं | आत्महत्या करते मजदूरों, किसानों, बुनकरों की रिपोर्टों के वाबजूद पूरी निष्ठुरता से उन्हीं नीतियों व प्रस्तावों को आर्थिक सुधारों के रूप में लागू करते और आगे बढाते रहे हैं| तब फुटकर दुकानदारी और दुकानदारों का भी इन नये नीतिगत हमलो से बचाव होने वाला नहीं है| फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में नये आर्थिक सुधार की यानी फुटकर दुकानदारों के विनाश की और देशी व विदेशी धनाढ्य फुटकर व्यापारिक कम्पनियों के बधाव व फैलाव की गाड़ी रुकने वाली नहीं है| नई नीतिगत घोषणाओं के जरिये देश के विकास की नहीं अपितु दुकानदारों के विनाश की गाड़ी को हरी झंडी दिखा दिया गया है|
सरकार की नीतिगत आर्थिक सुधारों की दूसरी घोषणाओं में विमानन उद्योग में 49 % प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ( एफ. डी. आई . ) की मंजूरी डायरेक्ट टूहोम जैसी प्रसारण सेवाओं में एफ डी आई की अधिकतम सीमा 49 % से बढ़ाकर 74 % तक करने की मंजूरी तथा पावर एक्सचेंज में 49 % एफ डी आई को हरी झंडी मिल गयी है|
इसके अलावा सरकार निजी क्षेत्र की औद्योगिक कम्पनियों के खराब प्रदर्शन के वावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की चार कम्पनियों — हिन्दुस्तान कापर के 9.59 % आयल इंडिया के 10 % एम् एम् टी सी के 9.53 % तथा नाल्को के 12 .15 % विनिवेश की अर्थात इन्हें निजी कम्पनियों के मालिको को बेचने की मंजूरी भी दे दी है| सरकार के इन नीतिगत सुधार के कदमों का कैसा स्वागत — समर्थन हो रहा है, उसे देखने के लिए किसी भी प्रसिद्ध समाचार पत्र के सम्पादकीय लेखो को पढ़ लेना ही काफी है| वैसे भी जाने माने अर्थशात्रियों की टीका — टिप्पणी में आम तौर पर इन फैसलों का समर्थन ही हो रहा है| विरोधी पार्टियाँ ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश की सपा — बसपा आपस के तमाम विरोध के बावजूद केन्द्र सरकार को समर्थन देने में जुटी हुई हैं| तृणमूल कांग्रेस द्वारा इन मुद्दों पर केन्द्रीय सरकार पर समर्थन वापसी के लिए कांग्रेस पर कोई दबाव इसलिए भी नही पड़ा कि केन्द्रीय सरकार को टिकाने में सपा ताल ठोककर खड़ा हो गयी है| बसपा चुप रहकर पहले से ही केन्द्रीय सत्ता की सहयोगी पार्टी बनी रही| भाजपा स्वयं इन आर्थिक नीतियों की और उसे आगे बढ़ाने की घनघोर समर्थक रही है| लिहाजा उसका विरोध महज विपक्ष का ही विरोध है, जिसे सत्तापक्ष में जाते ही गायब हो जाना है| अन्य पार्टियों की स्थितियों भी कमोवेश इसी तरह की है|
लिहाजा इन आर्थिक सुधारों का उसी तरह से डीजल मूल्य वृद्धि, गैस सिलेन्डर के नियंत्रित मूल्य वृद्दि का भी विरोध कहीं से भी वास्तविक विरोध नहीं है| अभी तक सुनाई पड़ रहा विरोध दरअसल विरोध की नहीं बल्कि विपक्षी संसदीय व प्रचार माध्यमी विरोध प्रदर्शन की अर्थात खोखले व दिखावटी विरोध पक्ष की यह भूमिका सत्ता पक्ष में बनने तक निभानी पड़ती है| इसकी अभिव्यक्ति की उसे पूरी स्वतंत्रता मिली रहती है| इसके सबूत हम आर्थिक सुधारों के संदर्भ में पहले ही प्रस्तुत कर आये हैं|
इसलिए इन वैश्वीकरणवादी नीतियों प्रस्तावों के तथा नये नीतिगत सुधारों के विरोध में अब निचले हिस्से को खासकर आम फुटकर, दुकानदारों समेत पहले से ही इसके भुक्तभोगी बने मजदूर किसान, टूटते हुए छोटे उद्यमियों और बेरोजगार बने नौजवानों आदि को ही आगे आना होगा| उन्हें देशी विदेशी धनाढ्य हिस्सों पर कड़े नियंत्रण वाली नीतियों के लिए सत्ता सरकारों पर दबाव बनाना होगा|

सुनील दत्ता लेखक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।