Thursday, April 19, 2018

बाजारीकरण ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को कलंकित करने का काम किया है ? 19-4-18

बाजारीकरण ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को कलंकित करने का काम किया है ?


पिछले 15-20 सालो से महिला सशक्तिकरण एक बहुचर्चित मुद्दा बना हुआ है | महिलाओं में सुन्दर दीखने - दीखाने का चलन बढ़ता चला जा रहा है | इन सालो में शहरों से लेकर कस्बो तक में व्यूटी पार्लर के बढ़ते सेंटर के साथ नये - नये किस्म के और हर रंग रोगन वाले प्रसाधन के मालो - सामानों का बढ़ता बिक्री बाजार सुन्दर दिखने - दिखाने के इसी चलन को परीलक्षित करता है | इस सन्दर्भ में 8 मार्च के दैनिक जागरण में महिला लेखिका क्षमा शर्मा जी का ''सौन्दर्य केन्द्रित स्त्री विमर्श '' शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ था | लेखिका का कहना है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर औरतो को सुन्दर दिखने और बालीवुड को आदर्श बनाये जाने के कारण भी इन दिनों तमाम उम्र दराज महिलाए भी अपने हाथो , चेहरे और गर्दन की झुरिया मिटवा रही है | औरतो की यह छवि बनाई गयी है कि अगर वे सुन्दर नही है तो किसी काम की नही है | उनका जीवन व्यर्थ है | खुबसूरत दिखने की चाहत कोई बुरी बात नही है , लेकिन सब कुछ भूलकर सिर्फ खुबसूरत दिखने की बात ही अब प्रमुख हो गयी है | ---
महिलाओं को सौन्दर्य के इन उल जुलूल मानको को चुनौती देनी चाहिए थी , मगर ऐसा होते हुए कही दीखता नही | दीखता तो वह है , जिसे स्त्रीवादी नारों में लपेटकर बेचा जाता है और मुनाफ़ा कमाया जा रहा है | --
औरतो का असली सशक्तिकरण उसकी बुद्धि और कौशल से ही हो सकती है , लेकिन जब तक लडकियों को यह सिखाया जाता रहेगा कि तुम्हारे जीवन का मूलमंत्र सुन्दर दिखना भर है , तब तक महिलाओं के सशक्तिकरण की राह आसान होने वाली नही है |
लेखिका ने महिलाओं , लडकियों में सुन्दर दिखाने की बढती प्रवृति को अपने लेख में कई ढंग से उठाया है और उस पर सही व सटीक टिपण्णी तथा आलोचना भी किया है | पर उन्होंने इस प्रवृति व चलन के कारणों व कारको पर लेख में कोई चर्चा नही किया है | फिर उन्होंने इस अंध सौन्दर्यबोध एवं प्रचलन को रोकने के किसी कारगर तरीके को भी नही सुझाया - या बताया है | हाँ यह बात जरुर कही है कि औरत का असली सशक्तिकरण उनके बुद्धिकौशल से ही हो सकता है , न की सौन्दर्य के प्रतिमानों पर खरा उतर कर '|
लेखिका की इस बात में बुद्धि और कौशल के साथ श्रम को भी अनिवार्य रूप से जोड़ा जाना चाहिए | सही बात तो यह है कि पुरुषो व महिलाओं के श्रम ने ही उन्हें और पूरे समाज को सशक्त बनाने का काम किया है | उनके श्रमबल ने ही परिवार और समाज को बुद्धि एवं कौशल के क्षेत्र में भी सशक्त बनाया है | इसके बावजूद श्रम , बुद्धि एवं कौशल को खासकर श्रम व श्रमिक वर्ग की महिला एवं पुरुष को महत्व नही दिया जाता | अधिकाधिक पैसा पाने ,कमाने वाली को कही ज्यादा महत्व मिलता है , जबकि अधिकाधिक श्रम से घर परिवार व समाज को खड़ा करने महिलाओं व पुरुषो को आमतौर पर कोई महत्व नही मिल पाता | वास्तविकता है कि आधुनिक युग में धन - सम्पत्ति , पैसे - पूंजी के साथ उनके द्वारा बढावा दिए जाने वाले मुद्दों - मसलो को ही प्रमुखता मिलती रही है | पैसे , पूंजी तथा उत्पादन बाजार के धनाढ्य मालिको द्वारा नारी सुन्दरता के विज्ञापन प्रदर्शन को बाजार व प्रचार का प्रमुख मामला बना दिया गया है | इसी के फलस्वरूप नारी की दैहिक सुन्दरता और उसके प्रतिमान लडकियों , महिलाओं के आदर्श बनते जा रहे है |
मध्ययुग में सामन्ती मालिको ने नारी और उसकी दैहिक सुन्दरता को अपने भोग - विलास के रूप में अपनाने का काम किया था | उनके चारणों ने वैसे ही वर्णन लेखन को प्रमुखता से अपनाया था | हालाकि उसका असर जनसाधारण पर बहुत कम पडा | लेकिन आधुनिक उद्योग व्यापार के धनाढ्य मालिको ने नारी सुन्दरता को अपने मालो - सामानों के प्रचार विज्ञापन का प्रमुख हथकंडा बना लिया है | उन्होंने पुरुष समाज में नारी की दैहिक सुन्दरता के प्रति बैठे सदियों पुरानी भावनाओं , प्रवृत्तियों का इस्तेमाल अपने मालो - सामानों के विज्ञापनों एवं प्रचारों को बढाने में कर लिया है | बढ़ते माल उत्पादन तथा उसके बिक्री बाजार के साथ नारी सुन्दरता के इस इस्तेमाल का , उसके अधिकाधिक प्रदर्शन का चलन भी बढ़ता जा रहा है | नारी सौन्दर्यबोध के लिए प्रतिमानों के , उन्हें बढाने वाले प्रतिष्ठानों तथा प्रसाधन के ससाधनो की बाढ़ आती गयी है | इसी के साथ नए धंधे के रूप में उच्चस्तरीय फैशनबाजी माडलबाजी को लगातार बढ़ाया जाता रहा है | अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर ब्यूटी क्वीन चुने जाने की चलन सालो साल बढ़ता रहा है | विकसित साम्राज्यी देशो में यह चलन काफी पहले से शुरू हो गया था | इस देश में भी इसका चलन 1980 - 85 के बाद जोर पकड़ता गया है | जैसे - जैसे देश - विदेश की धनाढ्य कम्पनियों को अधिकाधिक छूटे व अधिकार देने के साथ उनके मालिकाने के उत्पादन व बाजार को बढ़ावा दिया जाता रहा है , वैसे - वैसे उन मालो - सामानों के विज्ञापन प्रचार में नारी की दैहिक सुन्दरता का प्रचार बढ़ता रहा है | अर्द्धनग्न रूप में नारी सुन्दरता का प्रचार बढ़ता रहा है | पुरुषो की तुलना में नारियो को माडलों , फिल्मो सीरियलों से लेकर अब आम समाज में कम से कम वस्त्रो के साथ पेश किया जाता है | उपर से नीचे तक फ़ैल रहे या कहिये फैलाए जाते रहे नारी देह की बहुप्रचारित सुन्दरता का इस्तेमाल अब लडकियों , लडको की युवा पीढ़ी को फँसाये रखने के लिए तथा उन्हें जीवन की तथा समाज की गंम्भीर समस्याओं से विरत करने के लिए भी किया जा रहा है | नारी सुन्दरता के साथ यौन सम्बन्धो का खुले रूप में बढाये जाते रहे प्रोनोग्राफी आदि के बढ़ते प्रचारों के जरिये खासकर अल्पव्यस्क एवं युवा वर्ग के लोगो में ''सेक्स का नशा '' बढ़ाया जा रहा है | शराबखोरी एवं ड्रग्स एडिक्शन की तरह इसे एक नशे की तरह आम समाज में उतारा गया है | यह महिला उत्पीडन एवं बलात्कार को बढाने का एक अहम् कारण बनता जा रहा है | इस बात में कोई संदेह नही है कि आधुनिक बाजारवादी जनतांत्रिक युग ने घर परिवार के दायरे में सीमित नारियो को उससे बाहर निकलने का अवसर प्रदान किया है | आधुनिक उत्पादन बाजार , यातायात , संचार , शिक्षा , ज्ञान शासन प्रशासन के क्षेत्रो में तथा अन्य प्रतिष्ठानों कामो , पेशो में भी लडकियों महिलाओं को भागीदारियो करने का अवसर प्रदान किया है | पिता, पति , पुत्र की पहचान से जोड़कर देखी जाने वाली नारी समुदाय को अपने पैरो पर अपनी पहचान के साथ खड़ा होने का गौरव प्रदान किया है | नारी को सशक्त बनाने का काम किया है | लेकिन इसी के साथ आधुनिक युग के बाजारवाद ने उसके अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के धनाढ्य मालिको संचालको ने नारी के जननी होने की युगों पुरानी गरिमा को गिराने और कलंकित करने का भी काम किया है | उसको मातृत्व की गरिमामयी आसन से उतारकर बाजारी विज्ञापन का वस्तु बनाने का काम किया है | उसकी दैहिक सुन्दरता को कम से कम वस्त्रो में प्रदर्शित करके उस देह में विद्यमान उसकी श्रमशीलता और मातृत्व को महत्वहीन करने का भी काम किया है | ''भोग्या नारी '' के रूप में उस पर हमलोवरो से घिरे समाज की असुरक्षित नारी बनाने का काम किया है |
यह स्थिति आधुनिक युग के विभिन्न क्षेत्रो में महिलाओं की बढती भागीदारी के फलस्वरूप उनके बढ़ते अशक्तिकरण का भी ध्योतक है | ज्यादातर महिलावादी संगठन और नारी स्वतंत्रता समर्थक सगठन आधुनिक युग में महिलाओं के बढ़ते अशक्तिकरण पर , उसके दैहिक सौन्दर्य के बाजारवादी एवं धनाढ्य वर्गीय इस्तेमाल पर और इसे बढावा देने वाली बाजारवादी उपभोक्तावादी संस्कृति पर एकदम नही बोलते | उस पर बढ़ रहे हमलो तथा यौन उत्पीडन के लिए कुछ अराजक तत्वों को ही दोषी मानकर मामले को रफा दफा कर देते है | हालाकि यह मामला आधुनिक युग की बाजार व्यवस्था का तथा उसकी उपभोक्तावादी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है | इस संस्कृति और नारी स्वतंत्रता के नाम पर उसे बढ़ावा देने वाले धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों का विरोध किये बिना नारियो का वास्तविक सशक्तिकरण सम्भव नही है |नारी देह की सुन्दरता के बढाये जा रहे बाजारीकरण के साथ नारी सशक्तिकरण सम्भव नही है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - साभार चर्चा आजकल

Wednesday, April 18, 2018

लगातार छले जा रहे है किसान 18-4-18

लगातार छले जा रहे है किसान
14 मार्च के दैनिक जागरण में प्रकाशित अपने ब्यान में केन्द्रीय जल ससाधन मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कहा है कि बड़े बाँध बनाने में मंत्री से लेकर नौकर शाह तक बहुत खुश होते है , लेकिन कमांड एरिया डेवलपमेंट यानी सिचाई के लिए बाँध का पानी खेतो तक पहुचाने के लिए नहर प्रणाली में किसी की रूचि नही है | श्री गडकरी ने आगे कहा कि ''वे बाँध के खिलाफ नही है | लेकिन वे चाहते है कि इससे मिलने वाला शत प्रतिशत जल कृषि उत्पादन को बढाने के काम आये | इसके लिए नहर से लेकर खेतो की नालियों तथा जल के वैज्ञानिक प्रबन्धन पर काम किया जाए ताकि कृषि उत्पादन का बढ़ना निश्चित है | अपने इस ब्यान में उन्होंने अपने मंत्रालय द्वारा त्वरित सिचाई लाभ प्रोग्राम और उसके लिए आवंटित 78000O करोड़ रूपये की 99 परियोजनाओं का भी जिक्र किया | बताने की जरुरत नही है कि सिचाई के लिए घोषित त्वरित एवं दूरगामी परियोजनाए सालो - साल तक लंबित पड़ी रहती है | उनके लिए आवंटित धन को अंशत: व पूर्णत: हजम कर लिया जाता है , मगर वे परियोजनाए आगे नही बढ़ा पाती | इसका सबूत श्री गडकरी के ब्यान में स्पष्ट झलकता है | उन्होंने उसे सिंचाई के लिए बाँधो से कमांड एरिया की नहरों नालियों के विकास में रूचि न लेने की बात कही है | हालाकि यह रूचि लेने का या न लेने का मामला नही है और न ही मामला प्रान्तों के मंत्रियो अधिकारियों तक सीमित ही है | वस्तुत: मंत्रियों , अधिकारियो में सिचाई के विकास विस्तार के प्रति अरुचि व निष्क्रियता कृषि विकास और उसके लिए सरकारी निवेश एवं सार्वजनिक योजनाओं के क्रियान्वन में की जाती रही नियोजित कम - कटौती का नतीजा है | इसे केन्द्रीय जल ससाधन मंत्री बेहतर जानते है उनके लिए यह बात अनजानी नही हो सकती कि 1990 के दशक से ही सार्वजनिक सिंचाई योजनाओं , प्रोग्रामो को हतोत्साहित करते हुए किसानो को सिचाई के लिए स्वंय अपना निजी ससाधन ( अर्थात निजी पम्प सेट ) लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है | नहरों एवं सरकारी ट्युबेलो को विस्तार देने या उसे बनाये रखने का काम भी ठप्प या लगभग खत्म कर दिया गया है | बजट और बजट से इतर घोषित सार्वजनिक सिचाई योजनाओं को मुख्यत: कागजी या बयानबाजी की घोषणाओं में बदल दिया गया है | इन तथ्यों के बाद श्री गडकरी के यह कहने कि गुंजाइश कहाँ रह जाती है कि सिचाई के लिए कमांड एरिया डेवलपमेंट में मंत्रियों एवं नौकरशाहों को कोई रूचि नही है | अगर केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे पहले की तरह सार्वजनिक सिचाई योजनाओं को बढावा देने में लगी रहती तो मंत्रियों व अन्य नौकर शाहों को उसे आगे बढ़ाना पड़ता | उसके विकास में रूचि लेनी पड़ती | बशर्ते की पहले से निर्मित नहर प्रणाली को कारगर बनाये रखा जाता | खेती के सूखने से पहले ही नहरों का सूखापन खत्म किया जाता |
लेकिन जब कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश घटाने के साथ सार्वजनिक सिचाई को काटने घटाने का नीतिगत एवं योजनागत काम किया जाता रहा तब शासकीय प्रशासकीय हिस्सों से तब नहरों एवं सार्वजनिक नलकूपों का कारगर बनाने की कोई उम्मीद नही की जा सकती | सार्वजनिक सिचाई और कमांड एरिया विकास के प्रति मंत्रियों अधिकारियो में रूचि पैदा नही की जा सकती | श्री गडकरी जी के ब्यान में इस अरुचि को आगे करके सभी सरकारों द्वारा पिछले 20 - 25 सालो से कृषि व सार्वजनिक सिचाई में निरंतर की जाती राजी कटौती की सुनियोजित नीतियों व योजनाओं पर पर्दा डालने का कम किया गया है |

बड़ा कौन ? अमेरिका या विश्व व्यापार सगठन ? 18-4-18

बड़ा कौन ?
अमेरिका या विश्व व्यापार सगठन ?
अम्रीका की पाली - पोसी बिल्ली ( डब्लू टी ओ ) पर गुर्राने की हिम्मत कैसे कर सकती है ?
अमेरिका ने चन्द दिन पहले ही दूसरे देशो से अमरीका में होने वाले स्टील व अलमुनियम पर आयात शुल्क बढ़ाकर उस पर लगाम लगाने की घोषणा किया | फलस्वरूप इन देशो के स्टील व अलमुनियम के अमरीकी व्यापार बाजार में कमी आनी स्वाभाविक है | अमरीका ने यह घोषणा अपने देश के स्टील व अलमुनियम उद्योग को सरक्षंण देने के नाम पर किया है | उसकी घोषण से चीन , भारत जैसे देशो के स्टील , अलमुनियम उद्योग और उसका अंतर्राष्ट्रीय निर्यात भी जरुर प्रभावित होगा | इस देश के प्रचार माध्यमो में इस पर चिंता भी की जा रही है | अमरीका के सरक्षणवादी कदम पर इस देश द्वारा तथा कई अन्य देशो द्वारा विरोध जताया गया है | इसे विश्व व्यापार सगठन ( डब्लू टी ओ ) की बैठक में उठाने की बात भी की गयी है | लेकिन अमेरिका और वहाँ के शासन प्रशासन ने उसे अनसुना करते हुए डब्लू टी ओ को ठेंगा दिखा दिया | अमरीका प्रशासन ने डब्लू टी ओ पर यह कहकर हमला कर दिया कि डब्लू टी ओ एक अप्रभावी व्यवस्था है | अमरीका ने डब्लू टी ओ के नियमो , करारो की परवाह किये बिना भारत सहित कई देशो के विरुद्ध कारोबारी जंग की धमकी दी है | 19 मार्च को विश्व व्यापार सगठन के महानिदेशक श्री अजवेदों भारत द्वारा आयोजित दो दिवसीय लघु मंत्री मंडलीय सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली आये हुए थे | भारतीय बड़े उद्योगों के सगठन (सी आई आई) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने अमरीका द्वारा डब्लू टी ओ की अवहेलना तथा आलोचना की चर्चा पर कहा कि अमरीका डब्लू टी ओ का समर्थन करता है | उन्होंने कहा कि सगठन की कार्य प्रणाली को लेकर अमरीका की कुछ चिंताए है | उन्होंने उसे रेखांकित करते हुए कहा कि'अमरीका का कहना है 1995 में डब्लू टी ओ के वजूद में आने के बाद दुनिया में तमाम अहम् बदलाव हुए है | उन्हें देखते हुए इस सगठन में कुछ उन्नयन व सुधार की जरूरत है
ध्यान देने लायक बात है कि डब्लू टी ओ में उन्नयन व सुधार की बात खुद डब्लू टी ओ के महानिदेशक व अन्य पदाधिकारियों ने तथा अन्य सदस्य देशो ने नही बल्कि अमरीका ने ही कहा है | अमरीका ने यह बात डब्लू टी ओ को निष्प्रभावी कहते हुए तथा उसके न्यायाधिशो की नियुक्तिमें व्यधान डालते कही है |
यह है अमरीका और सभी देशो से बराबर का बर्ताव का दावा करने वाले वैश्विक सगठन डब्लू टी ओ में अंतर | विश्व व्यापार सगठन अगर मिमियाता हुआ अमरीका की चिंता को स्वीकार कर रहा है तो अमरीका गुर्राने के अंदाज में उसे निष्प्रभावी बता रहा है | स्वाभाविक है कि इसमें दबना डब्लू टी ओ को ही है | उसे ही अमरीका सुझाव के अनुसार डब्लू टी ओ के न्यायाधिशो की नियुक्ति करना और फिर सगठन के तथा कथित उन्नयन का प्रस्ताव देना है | फिर उसे बहुसंख्यक देशो से स्वीकार करवाना है |
डब्लू टी ओ नाम की संस्था 1995 से पहले अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सगठन को सचालन के लिए बने एक ढीले - ढाले सगठन - गाट ( व्यापार एवं चुंगी पर आम समझौता ) थी उसी सगठन को 1995 से पहले विश्व व्यापार सगठन में बदल दिया गया था | इस सगठन के महानिदेशक के जरिये दिए गये डंकल प्रस्ताव पर सदस्य देशो की सहमती लेने का भी काम किया गया था | क्या यह काम मुख्यत: डब्लू टी ओ के पधाधिकारियो ने किया था ? नही , इस सगठन को आगे करके यह यह काम अमरीका के नेतृत्व में सभी विकसित साम्राज्यी देशो ने किया था | 1989 में सोवियत रूस के पतन के बाद अपने वैश्विक व्यापार एवं वैश्विक प्रभाव प्रभुत्व को बढाने के लिए किया था | फलस्वरूप अमरीका को डब्लू टी ओ पर गुर्राने और डब्लू टी ओ के मिमियाने पर कोई आश्चर्य नही होना चाहिए | आखिर अमरीका की पाली पोसी बिल्ली उसी पर गुर्राने की हिम्मत भला कैसे कर सकती है ?

Monday, April 16, 2018

गिलोटिन प्रणाली से बजट पास -- 16-4-18

गिलोटिन प्रणाली से बजट पास --
देश के प्रधान को आम आदमी की कोई चिन्ता नही -
मार्च के दूसरे सप्ताह में लोक सभा ने केन्द्रीय बजट को बिना किसी चर्चा - बहस के 30 मिनट में पास कर दिया | इसके अंतर्गत 89 .23 लाख करोड़ रूपये की व्यय योजना के साथ वित्त विधेयक एवं विनियोग विधेयक को पास कर दिया गया | बजट में 99 केन्द्रीय मंत्रालयों और विभागों की बजट माँगो के साथ लगभग 200 सशोधनो को भी पास कर दिया | सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा को सदन में बजट के विभिन्न पहलुओ पर किसी चर्चा - माँग तथा सवाल - जबाब का सामना नही करना पडा | क्योकी विपक्ष द्वारा पंजाब नेशनल बैंक घोटाला को लेकर तथा आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने जैसे मुद्दे को लेकर की जाती रही माँगो , हंगामो तथा सत्ता पक्ष द्वारा उसे अनसुना करते रहना के फलस्वरूप लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाई लगातार बाधित होती रही | दोनों सदनों के अध्यक्ष सदन की बैठको को बार - बार स्थगित करते रहे |
सरकार ने इस स्थिति का लाभ उठाकर लोकसभा अध्यक्ष की सहमती के साथ बिना किसी बहस चर्चा के ही बजट पास करवा दिया | हालाकि इसके लिए अभी 5 अप्रैल तक का वक्त था | बिना किसी बहस के संसद में बजट पास करने की इस प्रणाली को गिलोटिन प्रणाली का नाम दिया गया है इस प्रणाली के जरिये इस बार के बजट को लेकर तीन बार का बजट पास किया जा चूका है | 2003 - 2004 भाजपा नेतृत्व की राजग सरकार के कार्यकाल के दौरान तथा 2013-14 में कांग्रेस के नेतृत्व के कार्यकाल के दौरान भी ऐसा ही किया गया था | बिना किसी चर्चा या बहस के या कम से कम चर्चा - बहस के साथ बजट पास करने की यह प्रणाली अचानक नही खड़ी हुई है | यह प्रणाली पिछले 20 - 25 सालो में लगातार चलने वाली एक परिपाटी का रूप धारण कर चुकी है | जबकि इससे पहले खासकर 1990 से पहले बजट के मुद्दों पर , उसमे किये गये सशोधनो पर कई दिनों तक चलते चर्चाओं समाचारों - सूचनाओं के साथ बजट के मुद्दे साधारण पढ़े - लिखे लोगो में भी चर्चा - बहस का मुद्दा बना करता था | लेकिन 1991 - 95 के बाद से इस चलन में बदलाव आता गया | प्रश्न है कि यह बदलाव क्यो आया ? थोड़ी मांग व चर्चा के साथ आनन - फानन में बजट पास करने का चलन क्यो चलाया गया ? क्या इसके लिए लिए सदन में पक्ष विपक्ष के बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर आये दिन खड़ी होती रही हठधर्मिता , विभिन्न मुद्दों को लेकर मचता शोर शराबा आदि ही जिम्मेदार है | निसंदेह: ऐसी स्थितियाँ तथा सता पक्ष और विपक्ष के सासंदों का अराजकतापूर्ण रवैया भी इसके लिए जिम्मेदार है | लेकिन इसका आसली कारण दूसरा है |
वह कारण देश में 1991 में लागू की गयी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों और 1995 में लागू किये गये विश्व व्यापार सगठन के अंतरराष्ट्रीय प्रस्ताव ( डंकल प्रस्ताव के प्राविधानो ) में निहित है | 1995 के बाद से सभी सरकारों द्वारा इन नीतियों एवं प्रस्तावों एवं उसके अगले चरणों अनुसार ही बजटीय प्राविधानो को बनाया व पास किया जाता रहा है | डंकल प्रस्ताव को भी संसद में बिना चर्चा बहस के ही लागू किया गया था | नई आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव को देश के आधुनिक विकास हेतु वैश्विक सम्बन्धो को अधिकाधिक बढाये जाने की आवश्यकता को बताते हुए लागू किया गया था | उसके अनुसार ही देशी व विदेशी निदेशको को अधिकाधिक छूट व अधिकार देने तथा जनसाधारण के हितो को निरंतर काटने घटाने के बजटीय एवं गैरबजटीय प्राविधानो को आगे बढ़ाया जाता रहा है | इन नीतियों तथा प्रस्तावों के प्राविधानो और उसे आगे बढाने के बजटीय एवं गैरबजटीय निर्धारण में मोटे तौर पर सभी सत्ताधारी पार्टिया एक जुट रही है | हालाकि वामपंथी पार्टिया इनको साम्राज्यी एवं पूंजीवादी नीतियों और उसी के अनुसार किये गये बजटीय प्राविधानो कहकर उसका जबानी विरोध करती रहती है | लेकिन उनके वाममोर्चे की सरकार उसे अपने शासन के प्रान्तों में लागू करने में पीछे नही रही | उसे वे अपनी मज़बूरी बताकर नही बल्कि अन्य पार्टियों की तरह ही प्रांतीय क्षेत्र विकास के लिए आवश्यक बताकर लागू करती रही | इन स्थितियों में बजट के मुद्दों को लेकर खासकर बड़े मुद्दों को लेकर चर्चा - बहस का कोई मामला अब नही रह जाता | मुख्यत: इसीलिए बजट पर अब संसद से लेकर समाचार पत्रों एवं अन्य प्रचार माध्यमो में बजट पेश होने के बाद एक दो दिन तक ही चर्चा चलती है , फिर उस पर कोई चर्चा नही चलती | लोगो के बजट में जनहित के मुद्दों की निरंतर की जाती रही उपेक्षा से लोगो का ध्यान हटाने के लिए भी बजटीय प्राविधानो पर चर्चा नही किया जाता है | यही कारण है कि संसद में बजट पेश होने से पहले या पेश होने के तुरंत बाद दुसरे मुद्दों को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया जाता है | उसी हंगामे के बीच थोड़ी - बहुत चर्चा के साथ या बिना चर्चा किये ही बजट पास करने और उसके लिए प्रयुक्त की गयी गिलोटिन प्रणाली का प्रमुख कारण संसद का हल्ला हंगामा नही ,, बल्कि बजट पास करने उसकी चर्चाओं से जनसाधारण का ध्यान हटाने के लिए चलाई जा रही वर्तमान परिपाटी है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार

Saturday, April 14, 2018

लामबंद होता किसान 14-4-18

लामबंद होता किसान

महाराष्ट्र में लगभग 40.000 किसानो ने नासिक से मुंबई तक की 200 किलोमीटर की पदयात्रा करके 11 मार्च को मुंबई की सडको पर मार्च किया | उन्होंने अपनी मांगो को लेकर महाराष्ट्र विधान सभा को घेरने का निश्चय किया था | लेकिन वैसी स्थिति आने से पहले ही महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री ने उनकी कुछ मांगो को मानते हुए और कुछ पर सहानुभूति पूर्वक विचार करके उन्हें मनाने का आश्वाशन देकर वहाँ से विदा किया |
किसानो की इस पदयात्रा आन्दोलन को हिंदी व अंग्रेजी समाचार पत्रों ने कम जगह दी | ज्यादातर समाचार पत्रों ने 11 मार्च को मुंबई में किसानो के पहुचने के बाद ही उसे समाचार के रूप में प्रकाशित किया | यह बड़े प्रचार माध्यमो द्वारा किसानो और उनके आंदोलनों के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैये को ही प्रदर्शित करता है | उनका यह उपेक्षा पूर्ण रवैया इस रूप में भी प्रदर्शित हुआ है कि किसी भी समाचार पत्र ने उनकी सभी मांगो को प्रकाशित नही किया है | इसीलिए उनकी मांगो के बारे में भी पूरी जानकारी नही मिल पाई | मोटे तौर पर उनकी मांगो में हर तरह के कृषि ऋण की माफ़ी , वन अधिकार अधिनियम लागू किये जाने , कृषि उद्पादों के लिए लाभप्रद मूल्य तय किये जाने , स्वामीनाथन आयोग के सुझावों को लागू करने की , नदी जोड़ योजना के जरिये सार्वजनिक सिंचाई को बढावा देने की , विभिन्न परियोजनाओं के लिए कृषि का अधिग्रहण रोकने आदि की मांगे शामिल है | महाराष्ट्र सरकार ने इन मांगो पर विचार कर उसे पूरा करने के लिए छ: माह का समय लिया है | ध्यान देने वाली बात है कि महाराष्ट्र पिछले 7 - 8 सालो से किसानो की आत्महत्या का सबसे अग्रणी प्रान्त बना हुआ है | पर वहाँ की सरकारे इस बात की अनदेखी करती रही है | देश की केन्द्रीय व अन्य प्रांतीय सरकारे भी किसानो के बढ़ते संकटो , समस्याओं की तथा 1995 से उनमे बढ़ते रहे आत्महत्याओं की अनदेखी करती रही है | इन स्थितियों एवं उपेक्षाओ को देखते हुए अब विभिन्न पार्टियों एवं मोर्चो सरकारों द्वारा किसानो को दिए आश्वासन विश्वसनीय नही रह गये है | अभी पिछले साल महाराष्ट्र सरकार द्वारा कर्जमाफी योजना के तहत 340 अर्ब रूपये का पॅकेज घोषित किया गया था | लेकिन उसमे से अब तक केवल 138 करोड़ रूपये के ही कर्जो का माफ़ होना भी इसी का परीलक्षण है |

इसे देखते हुए इस बात की उम्मीद नही कि अगले छ: माह में महाराष्ट्र की सरकार या देश - प्रदेश की अन्य सरकारे किसानो की समस्याओं एवं उनकी मांगो का कोई भी संतोषप्रद समाधान प्रस्तुत करेगी | इसकी उम्मीद इसलिए भी नही है कि देश के तीव्र आर्थिक वृद्धि व विकास के नाम पर कृषि क्षेत्र के महत्व को लगातार घटाया जा रहा है | कृषि भूमि शहरीकरण करने तथा ढाँचागत परियोजनाओं एवं निजी औद्योगिक व्यापारिक क्षेत्र को विकसित करने के नाम पर उसको संकुचित किया जा रहा है | वनों की भूमि पर भी उद्योग व्यापार के धनाढ्य मालिको , माफियाओं द्वारा कानूनी व गैरकानूनी तरीको से कब्जा किया जाता रहा है | कृषि लागत मूल्य को अनियंत्रित रूप से बढने की छुट देते हुए तथा कृषि उद्पादों के मूल्यों पर अधिकाधिक नियन्त्रण करते हुए सरकारों द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी मुख्यत: घोषणाओं तक ही सीमित किया जा चूका है | फलस्वरूप खेती - किसानी के लागत की और जीवन की अन्य आवश्यक आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए किसानो का सरकारी व् महाजनी कर्ज के संकटो में फसना इनकी नियति बन गयी है | इस कर्ज संकट से और कभी - कभार की कृषि ऋण माफ़ी से उन्हें कर्ज की निरंतर बढती आवश्यकता और फिर उसमे बढ़ते फसांन से मुक्ति नही मिल सकती है | कई प्रान्तों में कर्ज माफ़ी की घोषणाओं और उनके थोड़े या ज्यादा क्रियान्वयन के वावजूद किसानो की आत्महत्या जारी है | स्वामीनाथन आयोग भी किसानो के बढ़ते लागत खर्च को घटाने का कोई सुझाव नही प्रस्तुत करता | इसलिए आयोग के सुझावों को मान लेने के बाद भी किसानो का संकट कम होने वाला नही है | यह इसलिए भी कम होने वाला नही है कि कृषि विकास की योजनाओं की नीतियों को आगे बढाने और उसके लिए सरकारी धन के निवेश की प्रक्रिया को 1990 के दशक से ही घटाया जा रहा है | कृषि ऋण की मात्रा को बढाते और उसे लाखो करोड़ में पहुचाते हुए सरकारी निवेश को निरंतर घटा रही है सरकारे | इसलिए किसानो को अब अपने हितो के प्रति कहीं ज्यादा सजग और सगठित व आंदोलित होने की आवश्यकता है | महाराष्ट्र के किसानो ने अपनी पदयात्रा आन्दोलन में इसे प्रदर्शित कर दिया है | लेकिन अभी उसे वहाँ की अखिल भारतीय किसान सभा का एक तात्कालिक प्रयास ही माना जाएगा | हाँ ! यह प्रयास घनात्मक है | क्योकि इसने किसानो की पहचान को जाति - धर्म की पहचान के आगे खड़ा कर उन्हें अपनी मांगो के लिए लामबंद कर दिया है | इसके पीछे कोई राजनीतिक या गैर राजनीतिक सगठन हो या न हो लेकिन अगर यह प्रक्रिया चलती रही तो किसान स्वत: एक व्यापक एक प्रभावकारी आन्दोलन के रास्ते आगे बढ़ जाएगा | लेकिन यह काम निरंतर चलने वाले किसान आन्दोलन का रूप तब तक नही ले सकता , जब तक किसानो की स्थानीय स्तर पर स्थायी समितिया नही बनती | उनमे अपनी समस्याओं पर विचार - विमर्श के साथ उनके समाधान की मांगे नही खड़ी की जाती | अन्य क्षेत्रो की किसान समितियों के साथ उनके अधिकाधिक जुड़ाव व सहयोग को निरंतर बढाते हुए किसान आन्दोलन की रणनीतियो को निर्धारित नही किया जाता | उन रणनीतियो कार्यनीतियो को लेकर आगे बढने का प्रयास होना जरूरी है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - आभार चर्चा आजकल की

Thursday, April 12, 2018

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए- --- जयशंकर गुप्त 12-4-18

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए- --- जयशंकर गुप्त
शार्प रिपोर्टर मिडिया समग्र मंथन के दूसरे दिन लोकतंत्र , ''साहित्य और हमारा समय '' विषय पे लोकबन्धु के सम्पादक समाजवादी चिन्तक जयशंकर गुप्त जी ने अपने बात दुष्यंत के इन लाइनों ने हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगीशर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए शुरुआत करते हुए कहा किइस आजमगढ़ की धरती का बहुत कर्ज है मुझ पर मैं इस कर्ज को उतार नही पाउँगा मैंने डंके की चोट पर कहता हूँ मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ वही बात आपको सुनाता हूँ , आप सबको याद दिलाना चाहता हूँ आज से चार साल पहले माननीय मोदी जी ने कहा था कि राजनीति का अपराधीकरण खत्म करूंगा पर आज संसद में ३६% अपराधी संसद में बैठे जिनके खिलाफ अपराधिक मुकदमे चल रहे है , लेकिन हमारे प्रधानमन्त्री जी को संसद में कोई अपराधी नजर नही आ रहा है इन चार सालो में एक भी अपराधी जिसकी सदस्यता रद्द की गयी क्या ? मुझे तो ऐसा नजर नही आया मैं चुनौती के साथ कहता हूँ आज के समय में कोई स्वंय की चर्चा करता है क्या कभी न्यायपालिका के लोग स्वंय का आत्म मूल्याकन करते है अध्यापक वर्ग स्वंय कभी चिंतन करता है पुलिस कभी स्वंय आत्म मंथन करती है अपने लिए वह क्या कर रही है ? लेकिन पत्रकार आज भी स्वंय के लिए आत्म मंथन करता है तभी यह लोकतंत्र बचा हैउन्होंने आगे कहा कि यही इस देश की ताकत है हम अपना आत्म अवलोकन करना जानते है | क्या मजाक है देश की संसद में बजट का दुसरा सत्र चला ही नही और सब काम सम्पन्न हो गया सरकार यही चाहती है जो कानून अस्तित्व में नही है वो कानून पास हो गया विडम्बना है हमारे देश में लोकतंत्र मजाक बनकर रह गया है यह हाल है हमारे संसद का आज न्यायपालिका का हाल देख ले , यही नही आज जो स्थिति बन रही है यह लोग पूरी मीडिया को अपने कंट्रोल में लेना चाहते है यह जो बोले बीएस मिडिया भी यही बोले लेकिन वो लोग यह भूल रहे है यह देश क्रांतिवीरो का रहा है और आज भी अपनी लेखनी से सच कहने वाले बगावत करते रहेंगे | आज क्या हो रहा है जो सच बोल रहा है या तो उसकी हत्या कर दी जा रही है या तो उसे खरीदने की कोशिश हो रही है | इसी क्रम को आगे बढाते हुए भडास मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह ने कहा दुनिया में इस तकनीक ने बड़ा काम किया है इसी तकनीक का ही कमाल है दुनिया के बड़े - बड़े घोटाले खोलने का पनामा पेपर हो या अन्य घोटाले अंतरराष्ट्रीय रिश्ते डिजिटल मीडिया ने ही बनाये यशवंत सिंह ने कहा अब युद्ध का तरीका बदल गया है अगर आपको लड़ना है तो डिजिटल से युद्ध लादे हमारे स्वंय की आवाज पर कौन प्रतिबंद्ध लगा सकता है हम अपने विचारों को सोशल मीडिया ब्लोग्स के जरिये लड़ेंगे प्रशांत राजा ने कहा कि आज हमारी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है पहले क्या अखबार के मालिकान पहले से बड़े थे नही जब से उन्होंने अपनी नैतिकता बेचीं वो बड़े अमीरों में अ गये आज दैनिक जागरण , भाष्कर , हिन्दुस्तान अन्य बड़े अखबार वो मूल रूप से शुध्ह व्यापार कर रहे हो वो पत्रकारिता नही कर रहे है पर इसी मिडिया से उम्मीद भी है इनमे आज भी बहुत से साथी बहादुरी से पत्रकारिता को उसके आयाम को जिन्दा रखे हुए है | ''आजतक '' के रामकिंकर सिंह ने कहा आज सुन्च्नाओ का दौर ज्यादा है परम्परागत मीडिया सूचनाओं को फ़िल्टर करे जो सुचना आप तक पहुच रही है यह निर्णय तो आपको लेना होंगा उन सूचनाओं पर , देश के लोकतंत्र में बड़ी ताकत है अगर मिडिया इतना ही गलत होता तो देश की जनता आपसे प्रश्नों की बौछार कर देती यह सच है मिडिया बिकी है पर इन्ही में से कुछ लोग ज़िंदा है जब तक मिडिया समग्र मंथन जैसे कार्यक्रम होते रहेंगे तब तक सच माने पत्रकारिता का मानक जिन्दा रहेगा | इसी क्रम को आगे बढाते हुए अखिलेश अखिल ने कहा अगर पत्रकारिता में मिशन नही तो पत्रकारिता नही हो सकती जिसमे पत्रकार के पास मिशन नही , निष्पक्ष नही निडरता नही वो मात्र दलाल हो सकता है वो पत्रकार हो ही नही सकता |अनामी शरण ने कहा कि आज हर आदमी मोबाइल्ची बन गया है पूरा समाज इस नशे का आदि बन गया है यह चाल पूंजीपतियों का है हमारे समाज को नपुंसक बनाने का जब हम चिंतन नही करेंगे तब हम विरोध कैसे करेंगे इसी लिए आम समाज को ऐसे नशे की आदत दाल दो जिसमे चिंतन ही न हो ताकि आम आदमी सत्ता शासन से सवाल ही न करे ,उन्होंने आगे कहा कि संघर्ष छोटे - छोटे शहरों से ही शुरू होता है अब यह युद्ध इसी आजमगढ़ से मिडिया समग्र मथन के द्वारा शुरू हो चूका है मुझे पूरा भरोसा है यह आगे चलकर एक नये आन्दोलन का इतिहास बनेगा |
कार्यक्रम में प्रो ओमप्रकाश ,प्रो ऋषभदेव शर्मा , अतुल मोहन समदर्शी अमर उजाला लखनऊ क्रान्तिकारी अधिवक्ता दीनपाल राय आदि लोगो ने अपने विचार व्यक्त किये |
शार्प रिपोर्टर द्वारा साहित्य , गजल व पत्रकारिता के क्षेत्र में दस लोगो को अवार्ड से नवाजा गया | डा योगेन्द्र नाथ शर्मा ( राहुल सांस्कृत्यायन साहित्य सम्मान ) गिरीश पंकज ( मुखराम सिंह स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) जयशंकर गुप्त ( गुन्जेश्वरी प्रसाद स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) प्रो देवराज (भगवत शरण उपाध्याय स्मृति साहित्य सम्मान ) प्रो ऋषभदेव शर्मा ( विवेकी राय साहित्य सम्मान ) पुण्य प्रसून बाजपेयी ( सुरेन्द्र प्रताप सिंह टी .वी पत्रकारिता सम्मान ) यशवंत सिंह ( विजय शंकर वाजपेयी स्मृति पत्रकारिता सम्मान ) विजय नारायण जी ( शार्प रिपोर्टर लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड ) सतीश रघुवंशी ( शार्प रिपोर्टर युवा पत्रकार सम्मान ) डा मधुर नजमी ( अल्लामा शिब्ली नोमानी स्मृति अदबी अवार्ड ) से समानित किया गया |

Tuesday, April 10, 2018

आज का बुद्धिजीवी वेश्या बन गया है - पूर्व डी जी पी - प्रकाश सिंह 10-4-18

आज का बुद्धिजीवी वेश्या बन गया है - पूर्व डी जी पी - प्रकाश सिंह
आजमगढ़ : आजमगढ़ की धरती बड़ी उपजाऊ है इस धरती से कला मनीषियों के साथ साहित्य के मनीषियों को जन्म दिया है मैं इस धरती पर आया यह मेरा सौभाग्य है मैं इस धरती को प्रणाम करता हूँ उक्त विचार नेहरु हाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार मिडिया समग्र मंथन में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय वर्धा के प्रोफ़ेसर देवराज ने कहा उन्होंने आगे कहा कि यह धरती अदभुत धरती है जहां खड़ी बोली के रचियता आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय , घुमक्कड़ शास्त्र व अनेक भाषाओं के ज्ञाता और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी भूमिका निभाने वाले महाज्ञानी राहुल सांस्कृत्यायन , प्रगतिशील शायर कैफ़ी आज़मी जैसे विभूतियों की है मैं इस मंच से अपील के साथ आपकी सहमती चाहता हूँ कि यहाँ पर आवासीय व शोध स्तर के विश्व विद्यालय की स्थापना होनी चाहिए प्रो देवराज ने कहा कि आज देश की शासन सत्ता समाज के हर क्षेत्र में अपना हस्तक्षेप जारी रखे हुए है जो देश के लिए शुभ संकेत नही है | बाबा साहेब आंबेडकर , डा लोहिया नरेंद्र देव की चर्चा करते हुए कहा कि बाबा साहेब ने कहा था कि ऐसा लोकतंत्र होना चाहिए एक व्यक्ति एक वोट न हो बल्कि एक व्यक्ति एक मूल्य हो व्यक्ति के साथ मूल्य का जुदा होना आवश्यक है लेकिन देश के नेताओं ने पिछले 70 सालो में इसको बदल दिया या मूल्य बदलने की कोशिश में लगातार लगे हुए है लोहिया जी ने सौन्दर्य दृष्टि से मुख्य धारा में बदलने की पैरवी की थी उनका कहना था कि आंतरिक सौन्दर्य यथार्थ , वास्तविक जीवन धारा से जोड़ता है , वह महत्वपूर्ण है आचार्य नरेंद्र देव जी ने कहा था कि विचारों की आवश्यकता है उसके साथ ही विचारों को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए डा देवराज ने आगे कहा कि हमने लोकतंत्र को वोट तंत्र में बदल दिया है जिसके कारण जो लोकतंत्र वास्तविक है ही नही इस व्यवस्था को लोग बदलते चले जा रहे है अगर समय रहते चेता नही गया तो यह लोकतंत्र मात्र नाम का रह जाएगा आज के समय में मिडिया का विस्तार हुआ है पर मिडिया वास्तविक सरोकारों से नजरे चुराता है पत्रकारिता की जो प्रतिबद्धता है राजनीतिक , सामाजिक यथार्थ से मिडिया आज भागता है लोकतंत्र में लोक की भागीदारी कम हुई है जिसके कारण शिक्षा संस्कृति को बहुत बड़ा नुक्सान हो रहा है संस्कृति से ही हमारे जीवन के सारे पक्ष शुरू होते है अब मीडिया परिष्कृत नही रहा गया मीडिया इसमें भी असफल रहा | उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र का भाषा से सम्बन्ध आज कम हुआ है इस मामले में मीडिया का गहरा असर है आज हमारी कला - संस्कृति के साथ भयानक साजिश हो रही है यही कला और संस्कृति मानव चेतना को जगाने का काम करती है | क्रम को आगे बढाते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि कहने को तो देश में लोकतंत्र है पर वो कही नजर नही आता देश के आला अधिकारी और नेता इस लोकतंत्र को कमजोर करने में लगे है , देश की अवाम को इस बात को समझना चाहिए अगर वो अपनी समझदारी नही खोलते है तो एक दिन बस नाम मात्र का लोकतंत्र देश में रह जाएगा पिछले तीन लोकसभा चुनाव का अगर हम आकलन करे तो हम पायेंगे 24% 30% 34% अपराधी लोग देश के उच्च सदन में बैठे है इन अपराधिक पृष्ठ भूमि के लोगो से देश क्या उम्मीद कर सकता है यह जो कुछ भी करंगे सिर्फ अपने लिए यह लोग दिखाने के लिए देश की तरक्की की आशा देते है पर यह लोग अपने धर्म , जाति क्षेत्र से बाहर की सोच रखते ही नही वर्तमान में लोकसभा का चरित्र बदल रहा है | मेरा मानना है अगर ऐसे ही रहा तो हमारा लोकतंत्र के बजाये यह देश क्रिमनल स्टेट बन जाएगा , पूर्व डी जी पी प्रकाश सिंह ने आगे कहा कि ऐसी ससंद किसलिए जहाँ पर कुछ काम नही हो रहा है यहाँ पर बस लोकतंत्र की कब्र खोदने का काम हो रहा है | अगर यही हाल रहा तो एक दिन कोई तानाशाह नेता आएगा और पूरे देश को अपनी मुठ्ठी में कर लेगा इस देश के बौद्धिक वर्ग को इसपे मंथन करना चाहिए पर ठीक इसके उल्टा हो रहा है यह बौद्धिक लोग बौद्धिक वेश्यावृति करने लगे है इन्हें जहाँ से पैसा मिलेगा यह बस उसी का गुणगान करेंगे | अगर लोग नही जगे तो आने वाले समय में भूल जाइए देश की आजादी को साथ ही लोकतंत्र को देश के लोकतंत्र में दीमक लग चूका है अब बारी है इस दीमको को साफ़ करने का , आजादी में हिन्दी मीडिया का महत्वपूर्ण रोल रहा है लेकिन अब पत्रकारिता के चरित्र में बड़ा बदलाव आया है यह चिंता का विषय है इसमें नैतिकता का दायरा सिमट रहा है | अगर मिडिया में खबर छपवानी है तो कुछ दान - दक्षिण दीजिये आपकी खबर छप जायेगी अब मिडिया का ऐसा रोल हो गया है | देश में विकास तो हो रहा है पर कुछ लोग मात्र अपना विकास कर रहे है | आज अगर पत्रकारिता बची है तो मात्र लघु पत्र और पत्रिकाओं के बदौलत समाजवादी विचारक गोपाल राय ने सम्बोधन करते हुए कहा कि मीडिया राजनैतिक सत्ता से प्रभावित रहता है जिसमे 72% खबर इन लोगो की होती है जनता के सरोकारों का हिस्सा मात्र 6% या 7% ही रह गया है राजनैतिक तौर पर सत्ता जो लोकतंत्र पर बोलेगा वही सच माना जा रहा है गाँव को शहर मुर्ख बना रहा है शहरों को महा नगर मुर्ख बना रहा है अब तो आम आदमी को सोचना है कि वो किस लोकतंत्र में जियेगा ?
समाजवादी विचारक विजय नरायण जी ने कहा कि हमने बहुत सेमिनार देखे है पर आज मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ वर्षो बाद आज के सेमिनार में गंभीर और सार्थक चर्चा हुई है इसके लिए शार्प रिपोटर के सम्पादक अरविन्द सिंह और उनका पूरा कुनबा बधाई का हकदार है डा योगेन्द्र नारायण अरुण ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि आज मैं बहुत ही प्रसन्न हूँ की मुझे इस पावन धरती पर आने का सौभाग्य मिला है उन्होंने आगे कहा की लोकतंत्र खतरे में है अगर मिडिया ने अपना चरित्र नही बदला तो हमारा लोकतन्त पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा देश के अवाम को इस बात को समझना होगा वो मात्र किसी नेता के लिए वोट नही है उसका वोट नैतिक मूल्यों का वोट है अभी भी वक्त है सम्भाल जाओ मरते लोकतंत्र को बचाने के लिए आगे आओ |

Tuesday, March 27, 2018

बम का दर्शन -- भगत सिंह 27-3-18

बम का दर्शन -- भगत सिंह


हाल की घटनाए ! विशेष रूप से 23 दिसम्बर , 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन को उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था , उसकी निंदा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित किया गया प्रस्ताव तथा ''यंग इंडिया '' में गांधी जी द्वारा लिखे गये लेखो से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस ने गांधी जी से साठ- गाठ कर भारतीय क्रान्तिकारियो के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया है | जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रान्तिकारियो के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है | या तो जानबूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय में गलत प्रचार होता रहा और उन्हें गलत समझा जाता रहा , परन्तु क्रांतिकारी अपने सिद्धांतो तथा कार्यो की ऐसी आलोचना से नही घबराते है | बल्कि वे ऐसी आलोचना का स्वागत करते है ,क्योकि वे इस बात को स्वर्ण अवसर मानते है कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगो की क्रान्तिकारिरो के मूल - भूत सिद्धांतो तथा उच्च आदर्शो को , जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत है , समझने का अवसर मिलता है आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा की क्रांतिकारी क्या है ? और उनके विरुद्ध किये गये भ्रामक प्रचार से उत्पन्न होने वाली गलतफहमिया से उन्हें बचाया जा सके |

हिंसा या अंहिसा


पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर विचार करे | हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया हैं , और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है , क्योकि इन शब्दों से दोनों ही दलो के सिद्धांतो का स्पष्ट बोध नही हो पाता | हिंसा का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल प्रयोग , परन्तु क्रान्तिकारियो का तो यह उद्देश्य नही है , दूसरी और अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है , वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धांत | उसका उपयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है | अपने - आप को कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अन्त में अपने विरोधी का ह्रदय परिवर्तन सम्भव हो सकेगा | एक क्रांतिकारी जब कुछ बातो को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी माँग करता है , अपनी उस माँग के पक्ष में दलीले देता है , समस्त आत्मिक शक्ति के द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है , उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है , इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल भी प्रयोग भी करता है | उसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारे , परन्तु आप इन्हें हिंसा नाम से सम्बोधित नही कर सकते , क्योकी ऐसा करना कोष में दिए इस शब्द के अर्थ के साथ अन्याय होगा सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह | उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों ? इसके साथ - साथ शारीरिक बल - प्रयोग भी क्यों न किया जाए ? क्रांतिकारी स्वतंत्रता - प्राप्ति के लिए अपना शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों बल - प्रयोग को निषिद्ध मानते है | इसीलिए अब सवाल यह नही है कि आप हिंसा चाहते है या अहिंसा , बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपने उद्देश्य - प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते है , या केवल आत्मिक बल का ? आदर्श क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी | वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्न शील है और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यही नही है कि विदेशी शासको तथा उसके पिट्ठुओ से क्रान्तिकारियो का केवल सशस्त्र संघर्ष हो , बल्कि इस सशत्र संघर्ष के साथ - साथ नई सामजिक व्यवस्था के द्वारा देश के लिए मुक्त हो जाये | क्रान्ति पूंजीवाद , वर्गवाद तथा कुछ लोगो को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी | यह राष्ट्र को अपने पैरो पर खडा करेगी उससे नये राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा | क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानो का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनितिक शक्ति को हथियाए बैठे है |

आतंकवाद

आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक गुलामी तथा धार्मिक रुढ़िवादी बंधन पकडे है और उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है , क्रांतिकारी उसी में प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है | नवयुवक जैसे - जैसे मनोविज्ञान को आत्मसात करता जाएगा वैसे - वैसे राष्ट्र की गुलामी का चित्र उसके सामने स्पष्ट होता जाएगा तथा उसकी देश को स्वतंत्र करने की इच्छा प्रबल होती जायेगी | और उसका यह कर्म तब तक चलता रहेगा जब तक की युवक न्याय क्रोध और क्षोभ से ओरोत -प्रोत हो ये करने वालो की हत्या न प्रारम्भ कर देगा | इस प्रकार देश में आंतकवाद का जन्म होता है | आत्ब्क्वाद सम्पूर्ण क्रान्ति नही और क्रान्ति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नही | यह जो क्रान्ति का एक आवश्यक और अवश्यभावी अंग है | इस सिद्धांत का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रान्ति का विश्लेष्ण कर जाना जा सकता है | आतंकवाद आततायी के मन में भय पैदा कर पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जागृत कर उसे शक्ति प्रदान करता है | अस्थिर भावना वाले लोग को इससे हिम्मत बढती है तथा उनमे आत्मविश्वास पैदा होता है | क्योकी ये किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता की उत्कृष्ट महत्वाकाक्षा का विशवास दिलाने वाले प्रमाण है | जैसे दूसरे देशो में होता आया है , वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रांति का रूप धारण कर लेगा और अन्त में क्रान्ति से ही देश को सामाजिक राजनितिक तथा आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी |


क्रांतिकारी तौर तरीके
तो यह है क्रांतिकारी के सिद्धांत जिनमे वह विशवास करता है और जिन्हें देश के लिए प्राप्त करना चाहता है | इस तथ्य की प्राप्ति के लिए वह गुप्त तथा खुलेआम दोनों ही तरीको से प्रयत्न कर रहा है | इस प्रकार एक शताब्दी से संसार में जनता तथा शासक वर्ग में जो संघर्ष चला आ रहा है वही अनुभव उसके लक्ष्य पर पहुचने का मार्ग दर्शक है | क्रांतिकारी जिन तरीको में विशवास करता है वे कभी असफल नही हुए |

कांग्रेस और क्रांतिकारी

इस बीच कांग्रेस क्या कर रही थी ? उसने अपना ध्येय स्वराज्य से बदलकर पूर्ण स्वतंत्रता घोषित किया | इस घोषणा से कोई भी व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालाएगा की कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा न कर क्रान्तिकारियो के विरुद्ध ही युद्ध की घोषणा कर दी है | इस सम्बन्ध में कनाग्रेस का पहला वार था उसका यह प्रस्ताव जिसमे 23 दिसम्बर 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने के प्रयत्न की निंदा की गयी | इस प्रस्ताव का मसविदा गांधी जी ने तैयार किया था और उसको पारित कराने के लिए गांधी जी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी | परिणाम यह हुआ की 1913 की सदस्य संख्या में वह केवल 31 मतो से पारित हो सका | क्या इस अत्यल्प बहुमत में भी राजनितिक ईमानदारीi थी ? इस सम्बन्ध में हम सरलादेवी चौधरानी का मत ही यहाँ उद्घृत करे | वे तो जीवन भर कांग्रेस की भक्त रही है | इस सम्बन्ध में प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा है -- मैंने महात्मा गांधी के अनुयायियों के साथ इस विषय में जी बातचीत की , उसमे मुझे मालूम हुआ कि वे इस सम्बन्ध में अपने स्वतंत्र विचार महात्मा जी के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा के कारण प्रगट न कर सके , तथा इस प्रस्ताव के विरुद्ध मत देने में असमर्थ रहे , जिसके प्रणेता महात्मा जी थे | जहाँ तक गाँधी जी की दलील का प्रश्न है , उस पर हम बाद में विचार करेंगे | उन्होंने जो दलीले दी है वे कुछ कम या अधिक इस सम्बन्ध में कांग्रेस में दिए गये भाषण का ही वृस्त्रित रूप है |

क्या जनता अंहिसा में विशवास करती है ?

इस दुखद प्रस्ताव में एक बात मार्के की है जिसे हम अनदेखी नही कर सकते वह यह है कि यह सर्वविदित है कि कांग्रेस अहिंसा का सिद्धान्त मानती है और पिछले दस वर्षो से वह उसके समर्थन में प्रचार करती रही है | यह सब होने पर भी प्रस्ताव के समर्थन में , भाषणों में गाली गलौज की गयी | उन्होंने क्रान्तिकारियो को बुजदिल कहा और उसके कार्यो को घृणित | उनमे से एक वक्ता ने धमकी देते हुए यहाँ तक कह डाला की यदि वे ( सदस्य ) गांधी जी का नेतृत्व चाहते है तो उन्हें इस प्रस्ताव को सर्वसम्मती से पारित करना चाहिए | इतना सब कुछ किये जाने पर भी यह प्रस्ताव बहुत थोड़े मतों से ही पारित हुआ यह बात निशंक प्रमाणित हो जाती है , कि देश की जनता पर्याप्त संख्या में क्रान्तिकारियो का समर्थन कर रही है | इस तरह से इसके लिए गांधी ही हमारे बधाई के पात्र है उन्होंने इस प्रश्न पर विवाद खड़ा किया और इस प्रकार संसार को दिखा दिया की कांग्रेस , जो अहिंसा का गढ़ माना जाता है , वह सम्पूर्ण नही तो एक हद तक तो कांग्रेस से अधिक क्रान्तिकारियो के साथ है | इस विषय में गांधी जी ने जो विजय प्राप्त की वह एक प्रकार की हार के बराबर थी और वे ''दिकल्ट आफ दी बम '' लेख द्वारा क्रान्तिकारियो पर दूसरा हमला कर बैठे है | इस सम्बन्ध में आगे कुछ कहने से पूर्व इस लेख पर हम अच्छी तरह विचार करेंगे | इस लेख में उन्होंने तीन बातो का उल्लेख्य किया है | उनका विशवास , उनके विचार और उनका मत | हम उनके विशवास के सम्बन्ध में विश्लेष्ण नही करेंगे , क्योकी विशवास में तर्क के लिए स्थान नही है | गांधी जी जिसे हिंसा कहते है और जिसके विरुद्ध उन्होंने जो तर्क संगत विचार प्रकट किये है ; हम उनका सिलसिलेवार विश्लेष्ण करे |प्रेम का सिद्धांत गाँधी जी सोचते है कि उनकी धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नही गयी है और अहिंसा उनका राजनितिक शस्त्र बन गया है | हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है , उस अनुभव के आधार पर उनकी यह धारणा बनी है , परन्तु उन्हें अपनी इस यात्रा के इस अनुभव में इस भ्रम में नही पड़ना चाहिए | यह बात सत्य है कि कांग्रेस नेता अपने दौरे वही तक सीमित रखता है जहाँ तक डाकगाड़ी उसे आराम तक पहुचा सकती है , जबकि गाँधी जी ने अपनी यात्रा का दायरा वहां तक बढा दिया है जहाँ तक की मोटरकार द्वारा वे जा सके | इस यात्रा में वे धनी व्यक्तियों के ही निवास स्थानों पर रुके | इस यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तो द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गयी उनकी प्रशंसा सभाओ में यदा - कदा अशिक्षित जनता को दिए जाने वाले दर्शनों में बीता , जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते है परन्तु यही बात इस दलील के विरुद्ध है कि वे आम जनता की विचारधारा को जानते | कोई व्यक्ति जन साधारण की विचारधारा को केवल मंचो से दर्शन और उपदेश देकर नही समझ सकता | वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने विभिन्न विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे | क्या गांधी जी ने इन वर्षो में आम जनता के सामाजिक जीवन में भी कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया ? क्या कभी उन्होंने किसी संध्या को गाँव के किसी चौपाल के अलाव के पास बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया ? क्या किसी कारखाने के मजदुर के साथ एक भी शाम गुजारकर उसके विचार समझने की कोशिश की है ? पर हमने यह किया है और इसलिए हम दावा करते है कि हम आम जनता को जानते है | हम गांधी जी को विशवास दिलाते है कि साधारण भारतीय साधारण मानव के समान ही अंहिसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत कम समझता है | संसार का तो यही नियम है - तुम्हारा एक मित्र है , तुम उसे स्नेह करते हो कभी कभी तो इतना अधिक की तुम उसके लिए प्राण भी दे देते हो | तुम्हारा शत्रु है तुम उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध नही रखते हो | क्रान्तिकारियो का यह सिद्धांत नितांत सत्य सरल सीधा है और यह ध्रुव सत्य आदम और हौवा के समय से चला आ रहा है तथा इसे समझने में कभी किसी को कठिनाई नही हुई | हम यह बात स्वंय के अनुभव के आधार पर कह रहे है | वह दिन दूर नही जब लोग क्रन्तिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए हजारो की संख्या में जमा होंगे | गांधी जी घोषणा करते है कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपने आपको पीड़ा देने की प्रणाली से उन्हें यह आशा है कि वे एक दिन विदेशी शासको का ह्रदय परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायी बना लेंगे | अब उन्होंने अपने सामजिक जीवन की इस चमत्कार की 'प्रेम संहिता ' के प्रचार के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया है | वे अडिग विशवास के साथ उसका प्रचार कर रहे है , जैसा कि उनके कुछ अनुयाइयो ने भी किया है | परन्तु क्या वे बता सकते है कि भारत में कितने शत्रुओ का ह्रदय परिवर्तन कर उन्हें भारत का मित्र बनाने में समर्थ हुए है ? वे कितने ओडायरो , डायरो तथा रीडिंग और इरविन को भारत का मित्र बना सके है ? यदि किसी को भी नही तो भारत उनकी इस विचारधारा से कैसे सहमत हो सकता है कि वे इंग्लैण्ड को अंहिसा द्वारा समझा बुझाकर इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेंगे कि वह भारत को स्वतंत्रता दे दें | यदि वायसराय की गाडी के नीचे बमो का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती या तो वायसराय अत्यधिक घायल हो जाते या उनकी मृत्यु हो गयी होती | ऐसी स्थिति में वायसराय तथा राजनितिक दलों के नेताओं के बीच मंत्रणा न हो पाती यह प्रयत्न रुक जाता और उससे राष्ट्र का भला होता | कलकत्ता कांग्रस की चुनौती के बादभी स्वशासन की भीख मागने के लिए वायसराय भवन के आस पास मडराने वालो के ये घृणास्पद प्रयत्न विफल हो जाते | यदि बमो का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु को उचित सजा दे पाता | 'मेरठ ' तथा लाहौर षड्यंत्र और ''भुसावल काण्ड'' का मुकदमा चलाने वाले केवल भारत के शत्रुओ का ही मित्र प्रतीत हो सकती है | साइमन कमिशन के सामूहिक विरोध से देश में जी इकाई स्थापित हो गयी थी , गांधी नेहरु की राजनितिक 'बुद्धिमत्ता ' के बाद ही इरविन उसे छिन्न भिन्न करने में समर्थ हो सका | आज कांग्रेस या उसके चाटुकारों के सिवा कौन जिम्मेदार हो सकता है | इस पर भी हमारे देश में ऐसे लोग है जो उसे भारत का मित्र कहते है |


सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - आभार प्रकाशक _लोक प्रकाशन गृह

Monday, March 26, 2018

इण्डिया विन्स फ्रीडम - 26-3-18

इण्डिया विन्स फ्रीडम

भारत विभाजन के गुनहगार -- डा राम मनोहर लोहिया
भारत की आजादी के साथ जुडी देश - विभाजन की कथा बड़ी व्यथा - भरी है | आजादी के सुनहरे भविष्य के लालच में देश की जनता ने देश -विभाजन का जहरीला घूंट दवा की तरह पी लिया , लेकिन प्रश्न आज तक अनुत्तरित ही बना हुआ है कि क्या भारत - विभाजन आवश्यक था ही ? इस सम्बन्ध में मौलाना अबुलकलाम आजाद ने अवश्य लिखा है और उन्होंने विभाजन की जिम्मेदारी तत्कालीन अन्य नेताओं पर लादी है | डा राम मनोहर लोहिया ने विभाजन के निर्णय के समय होने वाली सभी घटनाओं को प्रत्यक्ष देखा था और उन्होंने देश विभाजन के कारणों और उस समय के नेताओं के आचरण पर बड़ी निर्भीकता से विश्लेष्ण किया है |
इंडिया विन्स फ्रीडम -
विश्लेषण - डा लोहिया
मौलाना आजाद की किताब , थोडा - थोड़ा करके ही शै , पर मैंने पूरी पढ़ी है | उसके परिक्षण के समय , | जिससे बड़े पैमाने पर लाभ ही हो सकता है |
एक खूब स्थायी प्रभाव जो पुस्तक ने मुझ पर छोड़ा है , वह है समुदायों और राष्ट्रों के आचरण के सम्बन्ध में | समुदाय और राष्ट्र अक्सर अपनी ही वास्तविकता और व्यापक हितो को समझ पाने में असमर्थ रहते है और सहज रूप में वे सम्वेदनशील तथा अल्प फलदायक नतीजो के पीछे बह जाते है | मौलाना आजाद ने कही भी स्पष्ट रूप से इसकी चर्चा नही की है | जब वे बोल कर किताब लिखवा रहे थे , तब वे इसके प्रति सतर्क न रहे होंगे | लेकिन इस बात में कोई शंका नही कि मौलाना आजाद एक बढ़िया मुसलमान थे और मिस्टर जिन्ना इतने बढ़िया मुसलमान न थे फिर भी भारत के मुसलमानों ने ऐसे व्यक्ति की अगुवाई के लिए चुना जो उनके हितो को अच्छी तरह साध न सका | गोयाकि उस समय एक और मुसलमान था जो इन दोनों से महान था , लेकिन वह जन्म व विशवास से मुसलमान न था न कि राजनीति में | मौलाना आजाद ने उसकी चर्चा लगभग नीचता पूर्वक की है और यह कोई आश्चर्य की बात नही | मौलाना आजाद को मिस्टर जिन्ना से बढ़िया मुसलमान कहने में , मेरा तात्पर्य उनकी धार्मिकता से तनिक भी नही है , न इससे की इस्लाम के सिद्धांतो को किस सीमा तक उन्होंने समझा है या अपने जीवन में - आचरण में उनको उतरा है | मेरा सम्बन्ध केवल इसी हद तक है जहां तक उन्होंने भारत के मुसलमानों का हित - साधन किया है | दोनों ने बाहर से बहुत मुखर होकर , खुलकर और शायद आंतरिक लालसा से भी समस्त भारतीय जन के हितो से अलग हटकर मुस्लिम हितो को समझने का प्रयत्न किया | मौलाना मुस्लिम हितो के मिस्टर जिन्ना से अधिक अच्छे सेवक थे | लेकिन मुसलमानों ने उनकी सेवा को ठुकरा दिया | यह बात मुझे तब कौधि जब मैंने अंतिम समय से पहले वाले ब्रिटिश प्रस्ताव पर मौलाना आजाद के वक्तव्य को दूसरी बार पढ़ा और जो पुस्तक में अन्यत्र उद्घृत है | तब ब्रिटेन ने एक विधान प्रस्तावित किया था जिसमे प्रान्तों को अधिकतम स्वायत शासन स्वीकृत था | असल में , तब भारत की केन्द्रीय सरकार के पास केवल प्रतिरक्षा , विदेश निति और यातायात तथा ऐसे ही अधिकार जो प्रांत उसे सौपना पसंद करते , के अलावा और कुछ न रहता | फिर प्रान्तों को विभिन्न श्रेणियों में पुनर्गठित किया जाता जैसे उत्तर - पूर्वी या उत्तर - पश्चिमी | श्री आजाद स्वंय भी ब्रिटिश वायसराय के साथ इस प्रस्ताव का जनक होने का दावा करते है | अन्ततोगत्वा प्रस्ताव ठुकरा दिया गया था | इस पर श्री आजाद का वत्क्तव्य और अभिव्यक्ति दोनों की स्पष्टता का आदर्श नमूना है | वह दृढ़ता पूर्वक कहते है कि भारत में विभाजन की योजना मुस्लिम हितो के लिए हानिकारक होगी | जिन प्रान्तों में मुसलमानों का बहुमत है वहाँ उन्हें इससे कुछ ठोस न मिल सकेगा , मुकाबले उसके जो अधिकतम प्रांतीय स्वायत्त शासन के विधान के अंतर्गत उन्हें मिल सकेगा | इससे भारत के बड़े भाग के मुस्लमानो से बहुत कुछ छीन जाएगा और वहाँ वे प्रभावपूर्ण आवाज के बिना ही रह जायेंगे | बाद की घटनाओं ने उनकी बात को सत्य साबित किया है | भारत के विभाजन ने यदि अधिक नही तो मुसलमानों का उतना ही अहित किया है जितना हिन्दुओ का | यद्दपि मौलाना आजाद का वक्तव्य कुछ अधिक तर्कपूर्ण , कुछ अधिक स्पष्ट है जो सम्भवत ऐसे आदमियों की पहचान है जो दुसरे रूपों में तो प्रतिभा सम्पन्न होते है पर इतने बड़े नही होते की घटनाओं को मोड़ दे सके | अधिकतम प्रांतीय स्वायत्त का यह प्रस्ताव निश्चित रूप से मुसलमानों के हितो की रक्षा आश्चर्यजनक सीमा तक करता | सम्भवत इससे उनके अंहकार या महानता की लालसा को भी संतोष न मिलता , जो दो ऐसे आवेग है जिनमे परस्पर एक दुसरे से भेद कर पाना कठिन है | इसके परिणाम स्वरूप हिन्दुओ और मुसलमानों के बीच काफी संघर्ष भी हो सकता था और दोनों में किसी एक की स्थित नैराश्य की भी हो सकती थी यद्दपि आवश्यक नही कि वह इतनी अधिक होती की जिस पर विजय पाना असम्भव होता | अपने वक्तव्य में श्री आजाद न तो मनुष्य की निर्बलता के प्रति सतर्क है और न स्थिति की वास्तविकता के ही ! वे विलक्ष्ण रूप से मुस्लिम हित की सुरक्षा की अपनी कामना के प्रति विवेकशील है | भारत के मुसलमान अपने इस विवेकशील नेता का अनुसरण करके अपने हितो के लिए अच्छा करते , किन्तु न कर सके , यही तो मानव का अभिशाप है | मनुष्य सदा ही सारहीन महानता के पीछे दौड़ता है जो उसे छलती है वह लगातार स्वंय निर्मित झूठे भय से व्याकुल रहता है | काल्पनिक भय और सारहीन महानता की चक्की के इन दो पाटो के बीच वह पीस कर दुर्घटना का शिकार होता है जो प्राय शानदार नही होती | भारत का विभाजन एक जघन्य दुर्घटना थी | यद्दपि परिणाम भयानक था और अनेक महान दुर्घटनाओ की अपेक्षा अधिक ही प्राणियों को इसमें नष्ट होना पडा | यदि भारत का मुस्लिम अपने स्वार्थ - हित को समझने में असमर्थ था तो हिन्दू समुदाय या समस्त भारतीय जन की बात ही क्या ? इसमें कोई शक नही कि हिन्दुओ में भी विवेक की उतनी ही कमी थी और इसलिए समस्त जनता में भी | बहुत बड़ी तादात में लोगो में यह तो आज भी कम है | यह एक साधारण भ्रान्ति फैली है कि यदि एक योजना द्वारा मुस्लिम हितो की रक्षा हो जाती है तो स्वाभाविक रूप से वह हिन्दुओ और दुसरे हितो को आघात पहुचायेगी | जनता के बीच बने विभिन्न समुदाय बहुधा इस भ्रान्ति के शिकार होते है | वे सिद्धांत रूप में मानते है कि एक समुदाय के हित दुसरो के विपरीत होते है | अवश्य ही यह कुछ स्थलों पर सत्य भी हो सकता है ? पर दुसरो के लिए आंशिक सत्य और पूर्णत: असत्य | देश के विभाजन के पूर्व वास्तव में हिन्दू या मुस्लिम हित क्या था , और आज तक क्या है ? घनिष्ठ जांच के लिए की हिन्दू या मुसलमान हित जैसा तब था या जैसा आज है , संसदीय सरकारी या व्यापारी हितो के क्षेत्र से और साधारण आर्थिक एवं सामूहिकता के कुछ उदाहरण कोई भी चुन सकता है निसंदेह किसी एक गणतंत्र राज्य के दो राष्ट्रपति नही हो सकते , न एक चुनाव क्षेत्र के दो संसद सदस्य इस झगड़े के हल के लिए रास्ता खोजने के निश्चय ही दुनिया के कुछ राष्ट्रों में प्रयत्न किये गये है | उनका सविधान जिम्मा लेता है , जैसे राष्ट्रपति का पद एक समुदाय का और प्रधानमन्त्री का पद दुसरे समुदाय का , लेकिन ऐसा हल एक या दुसरे समुदाय को असंतुष्ट रखेगा और एक दुसरे के अधिकार प्रभावकारी होने से एक या दुसरे के मन में जलन भी पैदा हो सकती है | कोई भी निर्भीकता से कह सकता है की श्री आजाद के सुझाव से कम से कम शुरू की स्थिति में हिन्दुओ के इस सीमित और संसदीय हित को नुक्सान पहुच सकता है |
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Sunday, March 25, 2018

भारत विभाजन के गुनहगार -- भाग दो - डा राम मनोहर लोहिया

भारत विभाजन के गुनहगार -- भाग दो - डा राम मनोहर लोहिया

जमातो और सामाजिक गुटों के अंतर्गत राजनितिक , आर्थिक और सामाजिक कारणों का मूल स्रोत कही और से आता है , धार्मिक प्रतिको व कल्पनाओं से | निश्चित रूप से ऐसे सामजिक सुधार सामूहिक भोजो या अंतरजातीय विवाहों द्वारा होने चाहिए और आर्थिक सुधार सर्व - रोजगार या राष्ट्रीयकरण या समानता द्वारा राजनितिक सुधार पिछड़ी जातियों व जमातो के निश्चित प्रतिनिधित्व द्वारा | इन सुधारों के बिना पृथकवादी भावना की समस्या का अंत न होगा , बल्कि यह समस्या किसी न किसी रूप में बनी रहेगी | धर्म तथा इतिहास के तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक गौर करना होगा | यही वे तथ्य है जो आदमी के दिमाग व मन को सत्ता बनाते है | धर्म के पैगम्बरों और ईश्वरो में पूर्ण समानता तब तक नही लाई जा सकती जब तक नास्तिकवाद और धार्मिक अराधना को न तोड़ा जाए | जो भी प्राप्त होगा वह समानता के निकट होगा | विभिन्न धार्मिक ज्ञान के लिए पर्याप्त शिक्षा और मानसिक स्तर को बढाने के बाद ही राम और मोहम्मद को एक जैसी उंचाई पर रखना सम्भव होगा | इसके लिए एक दुसरे के विश्वासों के प्रति आदरभाव और समझदारी पैदा करना होगा | इस जागरण के लिए ऐतिहासिक और धार्मिक ज्ञान आवश्यक तथा सर्वश्रेष्ठ साधन है | जो शक्ति पृथकता में महत्वपूर्ण है वह है इतिहास के प्रति ख़ास दृष्टि | गुट और जमात का निर्माण मूलरूप से इस कारण होता है कि वे घटनाओं के प्रति क्या दृष्टिकोण रखते है | भारत के हिन्दू व मुसलमान एक ही इतिहास के प्रति भिन्न - भिन्न दृष्टिकोण रखते है | ऐसे हिन्दू विरले ही है जो एक मुसलमान शासक या इतिहास पुरुष को अपने पुरखे के रूप में स्वीकार करे | उसी तरह ऐसा मुसलमान भी विरला ही होगा जो किसी हिन्दू इतिहास - पुरुष को अपना पुरखा माने , इतिहास के ऐसे शोधकर्ता की भी कमी नही है जिन्होंने सभी मुस्लिम शासको और आक्रमणकारियों की सूचि एक साथ इतिहास के एक पन्ने पर लिख दी है |
 शायद आज या जब भारत का बटवारा हुआ था , तब हिन्दू - मुस्लिम जैसी कोई समस्या न होती यदि हिन्दू और मुसलमान एक साथ इतिहास की एक जैसी व्याख्या करने में समर्थ होते और शान्ति से रहना सीखे होते | ब्रिटिश राज ने ऐसा कुछ नही किया जो पहले न रहा हो | एक ही इतिहास के प्रति हिन्दू और मुसलमान - दृष्टिकोण भिन्न रहे है , अतीत में भी आज भी और उनके स्वरूप तथा चरित्र में पृथकता का यही मुख्य कारण रहा है | भारत के मुसलमान अपनी उत्पत्ति गजनवी और गोरी जैसे लुटेरो से समझते है | ऐसी गलती समझ के भीतर एक झूठी आत्म संतुष्टि का तत्व होता है , वही इतिहास के तत्व - ज्ञान द्वारा और भी पुष्टि पा जाता है जब हर बार आक्रमण को प्रगति का बढ़ा हुआ कदम समझा जाता है | निश्चित रूप से समाज में ठहराव या घोर पतन हो रहा होगा जब कोई आक्रमण हुआ होगा | उसी तरह निश्चय ही हर नई शक्ति में चाहे वह किसी आक्रमणकारी द्वारा लाई गयी हो , बुराई के साथ मिली कोई अच्छाई रही होगी | किसी भी आक्रमण के नतीजे की जाँच , कमजोरी पर शक्ति की विजय के साथ अच्छाई व बुराई के बीच पैदा हुई हलचल और नयेपन से की जानी चाहिए | कोई भी राष्ट्र जो इस दृष्टि के भिन्न किसी अन्य दृष्टि से इतिहास का अध्ययन करता है वह सतत आक्रमणों का शिकार होता है और इस रूप में भारत विश्व में सबसे उपर है |
मुसलमानों ने चूँकि गजनवी और गोरी को अपना पूर्वज माना है वे स्वंय अपनी आजादी और अपने राज्य की रक्षा करने में असमर्थ रहे है | भारत का मध्यकालीन इतिहास जितना हिन्दू और मुसलमानों के युद्ध का इतिहास रहा है , उतना ही वह मुसलमान और मुसलमान के युद्ध का भी है | आक्रमणकारियों ,मुसलमान , देशी मुसलमान से लड़ा और उन पर विजयी हुआ | पाँच बार देशी मुसलमान अपनी आजादी की रक्षा करने में असमर्थ रहे | वे लोग नादिरशाह और तैमुर जैसो द्वारा कत्लेआम के शिकार हुए | मुग़ल तैमुर ने देशी पठानों को क़त्ल किया और ईरानी नादिरशाह ने देशी मुगलों को कत्ल किया | ऐसी कौम जो आक्रमणकारियों और कत्ल करने वालो को अपना पूर्वज माने वह स्वतंत्रता की अधिकारी नही और उसका आत्मगौरव झूठा है क्योकि उनकी धारावाहिक एक रूपता नही रही न उन्होंने उसे बना कर रखा ही | आक्रमणकारी जो समय के फैलाव के साथ देशवासी बन जाते है , वे राष्ट्र का एक अंग बन जाते है और इस सत्य को मान्यता मिलनी चाहिए | एक की माँ के प्रति किये गये बलात्कार को न मानना एक चीज है और उसके परिणाम को स्वीकार करने से इन्कार करना दूसरी चीज , मुसलमानों ने बलात्कार और उसके नतीजे दोनों को मानने की भूल की है और हिन्दुओ ने किसी को न मानने की भूल की है | हिन्दू अपनी माँ की रक्षा करने में असमर्थ रहा और उसने अपनी दुर्बलता पर आये अपने क्रोध को अपने सौतेले भाई पर लादने का आसन रास्ता खोज निकला | फिर कालान्तर में वही सौतेला भाई देशवासी बन जाता है और भविष्य में इसी रोग का शिकार बनता है | मानसिक रूप से वह इतना अधम हो जाता है कि अपनी दुर्बलता को पराक्रम समझने की गलती कर बैठता है इतिहास के अध्ययन का एक और ढंग है , जो वस्तु स्थित को अधिक स्पष्ट करता है | वह रजिया , शेरशाह , जायसी और रहीम के साथ विक्रमादित्य , अशोक , हेमू और प्रताप को मुसलमान व हिन्दू समान रूप से पूर्वज बताता है | इसी तरह हिन्दू और मुसलमान समान रूप से गजनवी , गौरी और बाबर को लुटेरे और अत्याचारी आक्रमणकारी के रूप में पहचानेगे और पृथ्वीराज , सांगा और भाऊ को भारत की भूल व दुर्बलता के प्रतीक के रूप में देखेंगे | मैंने जानबूझकर ऐसे लोगो का नाम चुने है जो व्यक्तिगत रूप से बहादुर थे पर सामूहिक रूप से निर्बुद्धि , जिनके कारण देश में हार और समर्पण की लम्बी परम्परा कायम हुई | व्यक्तिगत रूप में कायर लोग देश की आजादी के लिए इतने खतरनाक नही होते जितने ऐसे बहादुर और मुर्ख योद्धाओं में मैं भामा शाह जैसे लोगो के नाम लूंगा और लुटेरो तथा अत्याचारियों में अमीरचंद जैसो का | इतिहास के वास्तविक अध्ययन से सांगा एक बहुत छोटे और मनबुद्धि दरबारियों के नायक के रूप में दिखेगा जिनके कमजोर हाथो में देश की स्वतंत्रता की रक्षा का भार था और प्रताप ने बुझते अंगारों से आजादी की मशाल जलाने का प्रयत्न किया था | मानसिंह और अकबर ऐसे क्षेत्र के थे जहाँ आजादी और गुलामी का मिलन होता है , जहां एक आक्रामक देशवासी बनने का प्रयत्न करता है और जिसकी धूर्तता को महानता कहा जाता है |अकबर और जहाँगीर के अलावा लगभग सभी मुगलों के समय पृथकवाद पनपा जब कि पठान हिन्दुओ के अधिक निकट आये | हिंदी काव्य क्षेत्र में जायसी और रहीम किसी भी हिन्दू से अधिक चमकदार नक्षत्र थे | वास्तव में रहिमन ऐसा नाम है जो इस्लाम के भारतीयकरण का प्रतीक है | यह रुसी मुसलमानों जैसा नाम है जिनका नाम ''ओव '' या ''इन'' जोड़ कर परम्परागत रूप में बदला गया अथवा इंडोनेशिया मुसलमान जिनका हिन्दू नाम धर्म परिवर्तन के बाद भी बना ही रहा | मैं नही कह सकता कि अपने व्यक्तिगत परिवेश में जोधाबाई कहाँ तक राष्ट्रीय समीपता की प्रतीक बन सके | मुझे 1857 के लगभग हुई एक कवित्री ''ताजू'' का नाम सुनाई पडा है जो जन्म से मुसलमान और पेशे से रंगरेज थी , जिसकी कृष्ण भक्ति की कविताएं मीरा के भक्ति - गीतों के जोड़ की थी | इससे लगता है कि यह जैसे इतिहास का नियम हो कि समीपता के काम छोटी जाति व अर्द्धशिक्षित लोगो ने ही किये है और पृथकता का काम शासको तथा अधिक शिक्षित उच्च जाति के लोगो ने |अक्सर मैंने हिन्दू चोटी और मुस्लिम दाढ़ी हटाने तथा धार्मिक प्रतीक वाले कपड़ो , नाम और रहन - सहन से दूर हटने की बात कही है , क्योकि इसे मैं समीपता लाने का प्रथम प्रयास मानता रहा हूँ | प्रथम प्रयास के रूप में भी यह काम लगभग असम्भव है , जब तक मानसिक बदलाव का भी प्रयत्न न किया जाए | किसी व्यक्ति का बाहरी स्वरूप उसके आंतरिक चरित्र की प्रतिछवि है | विचार आदत और आत्मगौरव के आधार का प्रतिबिम्ब उसका बाह्य रूप ही है | यदि इतिहास को अधिक ईमानदारी और समझदारी से पढ़ा गया होता या धार्मिक पैगम्बरों को अच्छी तरह समझा गया होता तो इसके चमत्कारी परिणाम होते और हिन्दू - मुसलमान अपने बाह्य रूपों में इतने एक होते कि अलग अलग पहचाने तक न जाते , साथ ही उनके दिमाग भी बहुत मिले होते |दिमाग की बनावट से ही शान्ति और एकता तथा इतिहास और धर्म के प्रति सही समझदारी , साथ ही झगड़े भी जन्म लेते है | ऐसी शान्ति तथा एकता की दिमागी बनावट में मस्जिद के सामने बाजे और गोहत्या जैसे प्रश्न अपने आप सुलझ जाते |निश्चय ही मैं समझता हूँ आशा करता हूँ दुनिया लम्बे अरसे तक अनिश्चित काल तक दुराचारी नही बनी रहेगी | भारत केभीतर हिन्दू व मुसलमान के बीच शारीरिक व सांस्कृतिक एकता होगी और इसके सद्प्रिनाम स्वरूप अथवा साथ ही साथ पाकिस्तान और भारत मिलकर हिन्दुस्तान बनेगा , यही कामना है और प्रार्थना है और सम्भावना भी _ राम मनोहर लोहिया
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

Saturday, March 24, 2018

भारत विभाजन के गुनहगार -- डा लोहिया 24-3-18

जन्मदिन पर विशेष --

भारत विभाजन के गुनहगार - डा राम मनोहर लोहिया ----- भाग एक


मौलाना आजाद कृत 'इंडिया विन्स फ्रीडम ' के परीक्षण की जो बात मेरे मन में उठी , उसे जब मैंने लिखना शुरू किया तो वह देश के विभाजन का एक नया वृत्तांत बन गया | यह वृत्तांत हो सकता है वाह्य रूप में , संगतवार व कालक्रमवार न हो , जैसा कि दूसरे लोग इसे चाहते , लेकिन कदाचित यह अधिक सजीव व वस्तुनिष्ट बन पड़ा है | इसको लिखते वक्त इसमें स्पष्ट हुए दो लक्ष्यों के प्रति मैं सतर्क हुआ | एक , गलतियों और झूठे तथ्यों को जड़ से धोना और कुछ विशेष घटनाओं और सत्य के कुछ पहलुओ को उजागर करना और दूसरा उन मूल कारणों को रेखांकित करना जिनके कारण विभाजन हुआ | इन कारणों में मैंने आठ मुख्य - कारण गिनाये है | एक - ब्रितानी कपट ,दो- , कांग्रेस नेतृत्व का उतारवय तीन -, हिन्दू - मुस्लिम दंगो की प्रत्यक्ष परिस्थिति चार - जनता में दृढ़ता और सामर्थ्य का अभाव , पांच - , गांधी जी की अहिंसा छ : - मुस्लिम लीग की फूटनीति , सात - आये हुए अवसरों से लाभ उठा सकने की असमर्थता और आठ - , हिन्दू अंहकार |
श्री राजगोपालाचारी अथवा कम्यूनिस्टो की विभाजन समर्थक नीति और विभाजन के विरोध के कट्टर हिंदूवादी या दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नीति को विशेष महत्व देने की आवश्यकता नही | ये सभी मौलिक महत्व के नही थे | ये सभी गंभीर शक्तियों के निर्थक और महत्वहीन अभिव्यक्ति के प्रतीक थे | उदाहरण विभाजन के लिए कट्टर हिन्दुवाद का विरोध असल में अर्थहीन था , क्योकि देश को विभाजित करने वाली प्रमुख शक्तियों में निश्चित रूप से कट्टर हिन्दुवाद भी एक शक्ति थी | यह उसी तरह थी जैसे हत्यारा , हत्या करने के बाद अपने गुनाह मानने से भागे |
इस सम्बन्ध में कोई भूल या गलती न हो | अखण्ड भारत के लिए सबसे अधिक व उच्च स्वर में नारा लगाने वाले , वर्तमान जनसंघ और उसके पूर्व पक्षपाती जो हिन्दुवाद की भावना के अहिंदू तत्व के थे , उन्होंने ब्रिटिश और मुस्लिम लीग की देश के विभाजन में सहायता की , यदि उनकी नियत को नही बल्कि उनके कामो के नतीजो को देखा जाए तो स्पष्ट हो जाएगा | एक राष्ट्र के अंतर्गत मुसलमानों को हिन्दुओ के नजदीक लाने के सम्बन्ध में उन्होंने कुछ नही किया | उन्हें एक दूसरे से पृथक रखने के लिए लगभग सब कुछ किया | ऐसी पृथकता ही विभाजन का मूल - कारण है | पृथकता की नीति को अंगीकार करना साथ ही अखण्ड भारत की भी कल्पना करना अपने आप में घोर आत्मवंचना है , यदि हम यह भी मन ले कि ऐसा करने वाले ईमानदार लोग है | उनके कृत्यों को युद्ध के सन्दर्भ में अर्थ और अभिप्राय माना जाएगा जब कि वे उन्हें दबाने की शक्ति रखते है जिन्हें पृथक करते है | ऐसा युद्ध असम्भव है , कम से कम हमारी शताब्दी के लिए और यदि कभी यह सम्भव भी हुआ तो इसका कारण घोषणा न होगी | युद्ध के बिना , अखंड भारत और हिन्दू मुसलमान पृथकता की दो कल्पनाओं का एकीकरण विभाजन की नीति को समर्थन और पाकिस्तान को संकट कालीन सहायता देने जैसा है | भारत के मुसलमानों के विरोधी पकिस्तान के मित्र है | जनसंघी और हिन्दू नीति के सभी अखण्ड भारतवादी वस्तुत पाकिस्तान के सहायक है | मैं एक असली अखंड भारतीय हूँ | मुझे विभाजन मान्य नही है | विभाजन की सीमा रेखा के दोनों और ऐसे लाखो लोग होंगे , लेकिन उन्हें केवल हिन्दू या केवल मुसलमान रहने से अपने को मुक्त करना होगा , तभी अखण्ड भारत की आकाक्षा के प्रति वे सच्चे रह सकेंगे | दक्षिण राष्ट्रवादिता की दो धाराए है , एक धारा ने विभाजन के विचार को समर्थन दिया , जबकि दूसरी ने इसका विरोध किया | जब ये घटनाए घटी तब उनकी नाराज व खुश करने की शक्ति कम न थी , लेकिन वे घटनाए फलहीन थी | महत्वहीन | दक्षिण राष्ट्रवादिता केवल शाब्दिक या शब्दहीन विरोध कर सकती थी , इसमें सक्रिय विरोध करने की ताकत न थी | अत: इसका विरोध समर्पण अथवा राष्ट्रवादी विचार जिसने विभाजन में मदद की , उसने थोड़ी भिन्न भूमिका भी अदा की , इस सत्य के वावजूद कि इसके भाषणों में असली राष्ट्रवादी बुरी तरह उब चुके थे | इस भाषण बाजी में प्रभाव की शक्ति न थी | दोष उसमे इसी का न था भारतीय जनता व भारतीय राष्ट्रवाद की पलायन वृत्ति , पंगुत्व , भग्नता और आत्मशक्ति की कमी का भी दोष था | दक्षिण राष्ट्रवादिता ने विभाजन का समर्थन और विरोध दोनों किया , यह उनके मूल - वृक्ष की निष्पर्ण शाखाए थी | मुझे कभी - कभी आश्चर्य होता है कि क्या देशद्रोही लोग भी कभी इतिहास बनाने में कोई मौलिक भूमिका अदा करते है | ऐसे लोग
तिरस्करणीय होते है , इसमें कोई संशय नही , लेकिन वे क्या महत्वपूर्ण लोग हैं , मुझमे इसमें शक है | ऐसे देशद्रोहियों के काम अर्थहीन होंगे , यदि उन्हें पूरे समाज के गुप्त विश्वासघात का सहयोग न मिले|- तर्क के रूप में | मैं तो कम्युनिस्ट - विश्वासघात के इस कपटी पहलू को क्षणिक मानता हूँ जिसका लोगो पर कोई प्रभाव नही है लेकिन दूसरे देशद्रोही ऐसे भाग्यशाली नही है | अच्छा तो यह होगा की कम्यूनिस्टो की अन्दुरुनी जांच कर के पता लगाया जाए कि जब उन्होंने विभाजन का समर्थन किया तब उसके मन में क्या था | सम्भवत भारतीय कम्यूनिस्टो ने विभाजन का समर्थन इस आशा से किया था की नवजात राज्य पकिस्तान पर उनका प्रभाव रहेगा , भारतीय मुसलमानों में असर रहेगा और हिन्दू मन दुर्बलता के कारण उनसे मन फटने का की भारी खतरा न होगा , लेकिन उनकी योजना गलत सिद्ध हुई सिवा थोड़े क्षेत्र को छोड़कर जहाँ की उन्होंने भारतीय मुसलमानों में कुछ छिटपुट प्रभाव स्थल बनाये और हिन्दुओ में अपने लिए क्रोध न उबरने दिया | इस तरह उन्होंने अपने साथ अधिक धूर्तता नही की और साथ ही देश के लिए भी कोई लाभदायक काम नही किया | अपने स्वभाव से कम्यूनिस्टो दावपेंच का स्वरूप ऐसा है कि यह तभी जनता में शक्ति ला सकता है जब उनकी सफलता हो अन्यत्र लाजिमी तौर पर यदि सफलता न मिले तो जनता को कमजोर करने में ही वे सहयाक होते है | राष्ट्रीयता में आत्मविश्वास रूस के लिए निर्थक है , इसका प्रचार - महत्व तो जारकालीन रूस में ही समाप्त हो गया था | साम्यवाद तो पृथकवाद है जब यह शक्तिहीन रहता है अपने शत्रु को कमजोर करने के लिए सशक्त राष्ट्रीयता का सहारा लेता रहता है जब यह राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करता है तब वह पृथकवादी नही रहता साम्यवाद कोरिया और वियतनाम में एकतावादी है और जर्मनी में पृथकवादी अधिकतर लोग प्रत्यक्ष उदाहरण देखते है अनुमान पर राय नही बनाते | जब साम्यवाद के एकतावादी शक्तिदायक उदाहरण दिखाने की आवश्यकता होती है तब सोवियत रूस और वियतनाम के उदाहरण रखे जाते है और जब स्वतंत्रता की भावना का उदाहरण रखना होता है तब भारत और जर्मनी का उदाहरण रखा जाता है | इस बात का पेंच कही और है | साम्यवाद के लिए कामगार राज्य के सिद्धांत के अलावा कोई अन्य सिद्धांत माने नही रखता , ऐसा सिद्धांत लाजिमी तौर पर किसी भी राष्ट्र को कमजोर करता है कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर | इसी सिद्धांत ने भारतीय राष्ट्र को सदैव कमजोर बनाया है | लेकिन आशामय भविष्य की आशा में इनके अनुचर इस तथ्य के प्रति अंधे बने रहे , साथ ही भारतीय जनता भी अंधी बनी रही हैं , जिसका कारण साम्यवादी कपट नही , बल्कि राष्ट्रवादी या लोकसत्तवादी शक्तियों की मूल भूत कमजोरी रही है | मैं नही समझता कि जो कराण मैंने गिनाये है इनके अलावा भी देश विभाजन के अन्य कोई मौलिक कारण रहे है | हिन्दू - मुस्लिम प्रश्न को लेकर देश की जिस परिस्थिति का निर्माण हुआ है उससे दो महत्व के तथ्य सामने आये है | हिन्दू - मुस्लिम रिश्तो के पिछले आठ सौ वर्षो में हिन्दू और मुसलमान दोनों लगातार पृथक भाव और समीपता के लुका - छिपी खेल के शिकार हो रहे है जिससे एक राष्ट्र के प्रति उनकी भावनात्मक एकाग्रता खंडित रही है , साथ ही भारतीय जन का यह स्वभाव भी परिस्थिति के साथ घुलने - मिलने और सहनशीलता तथा समर्पण की कला को इस हद तक सीख गया है कि दुनिया में कहीं भी परतंत्रता को विश्व - भाईचारे या राजनीतिक कपट का इस प्रकार पर्याय नही माना गया | मूलरूप से इन्ही दो तथ्यों द्वारा हिन्दू - मुस्लिम समस्या को प्रेरित किया गया है | इनके बिना , ब्रिटिश कुटिल नीति अथवा कांग्रेस नेतृत्व के उतारवय का कारण इतिहास की दृष्टि से महत्वहीन होता और उसका जो कडुवा फल मिला वह कदापि नही मिलता | स्वतंत्र भारत में भी हिन्दू - मुसलमानों में पृथक - भावना बनी रही है | मुझे शक है कि विभाजन - पूर्व के मुकाबले आज यह पृथक - भाव अधिक है | पृथक - भावना ने ही विभाजन को जन्म दिया और इसलिए अपने आप यह भावना पूरी तरह नही मिट सके | परिणाम में ही कारण भी घुल मिल गया | आजादी के इन वर्षो में मुसलमानों को हिन्दुओ के निकट लाने का कोई न कोई प्रयत्न किया गया न उनकी आत्मा से पृथकता का बीज समाप्त करने का ही प्रयत्न किया गया | कांग्रेसी सरकार के अक्षम्य अपराधो में विशेष उल्लेखनीय अपराध यही है -- पृथक - भावना वाली आत्माओं को निकट लाने में असफलता - बल्कि इस काम के प्रति बेमन से किया गया असफल प्रयास | इस अपराध के पीछे भावना रही - वोट - प्राप्ति की इच्छा और बहुरंगी समाज ( कास्मोपालिटन ) का तत्वज्ञान | देश के लगभग सभी राजनितिक तत्व विशेषकर वे जो धर्म - निरपेक्ष का दंभ भरते है , इसके शिकार रहे | वोट प्राप्ति का यह धंधा दीर्घकाल तक चल सकता है | जो भी इस दिशा में सफलता के लालची है वे पतन की प्रतियोगिता से बच नही सकते | एक समय के बाद सुबुद्धि आ सकती है , लेकिन अभी न तो वह समय आया है न वह सुमार्ग ही स्पष्ट है | अभी तक धर्म निरपेक्ष पार्टियों ने भी हिन्दू व मुसलमान का अलग - अलग आव्हान करने की हिम्मत नही दिखाई जो उन्हें कुविचारो व बुरी आदतों से मुक्त कर सके | ऐसी स्वार्थी लालच के लिए बहुरंगी समाज - ज्ञान सहारा बनता है | ऐसे लोग समस्या के अलग समाधान व प्रयत्न की कभी आवश्यकता नही समझे | उन्होंने समझ रखा है कि औद्योगीकरण और आधुनिक अर्थ - नीति , हिन्दू - मुस्लिम पृथक भावना को समाप्त कर देगी , यह मूर्खतापूर्ण विश्वास उद्योगीकरण और वोट - प्राप्ति की लालच का मिला जुला परिणाम है जिसने विभाजन व आजादी के इतने वर्षो के बाद यह स्थिति बनाई है कि तथाकथित राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक पार्टिया भी मुस्लिम लीग से गठबंधन कर बैठी और समस्त देश में मुस्लिम लीगी तथा पृथकवादी रोग से मुक्त होकर फिर रोगी होने की दशा बन गयी है | देश विभाजन के बारह वर्ष बाद भी कांग्रेसवाद और प्रजा - समाजवाद ने फिर एक दुसरे पृथक वादी दुष्करम को अंगीकार करने की विवशता का अनुभव किया |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

साभार भारत विभाजन के गुनहगार - लेख डा राम मनोहर लोहिया
अनुवादक --- ओंकार शरद

Monday, March 19, 2018

स्वाधीनता संग्राम में मुस्लिम भागीदारी - भाग छ:

स्वाधीनता संग्राम में मुस्लिम भागीदारी - भाग सात

अंग्रेजो ने राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन को कमजोर करने के लिए फूट डालने का खेल खेला -
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के तुरंत बाद भारतीय मामलो के तत्कालीन मंत्री लार्ड वुड ने लन्दन में बैठकर भारत में अंग्रेजी शासन के प्रमुख लार्ड एलगिन को लिखे पत्र में स्वीकार किया -- '' हमने एक पक्ष को दूसरे पक्ष के खिलाफ खडा करके भारत में अपनी सत्ता को बनाये रखा है और हमे ऐसा करते रहना चाहिए | लिहाजा , हमे सभी लोगो में मौजूद साझे अहसास को रोकने के लिए वह हर काम करना चाहिए , जिसे हम कर सकते है "| इस रणनीति को प्रभावी रूप से अमल में लाने के लिए औपनिवेशिक शासक और उनके भारतीय पिठ्ठूओ ने यह बताते हुए दो राष्ट्रों का सिद्धांत दिया कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग - अलग राष्ट्रों से सम्बन्ध रखते है , क्योंकि उनका अलग - अलग धर्मो से ताल्लुक है | ''बाटो और राज करो'' की अपनी नीति को आगे बढाते हुए उन्होंने साम्प्रदायिक और अलगाववादी रुझानो को बढ़ावा दिया , जिससे की विभिन्न धर्मो के लोगो को एक दूसरे के साथ भिड़ाया जा सके | उन्होंने प्रांतवाद को बढ़ावा दिया , जातीय ढाँचे का दोहन किया और इसके अलावा उर्दू के उपर हिंदी के आधिपत्य के मुद्दे को उठाया | इससे हिन्दुओ और मुस्लिमो के बीच साम्प्रदायिक कटुता और मनमुटाव की शुरुआत हुई | उन्होंने ऐसे इतिहासकारों को तरजीह दी , जिन्होंने भारतीय इतिहास को इस रूप में प्रस्तुत किया जिससे साम्प्रदायिक भावनाओं को बढ़ावा मिले | इलियट , डासन, मैलकाम, ब्रिग्स और एलफिस्टन जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों और नौकरशाहों को इस काम पर लगाया गया और उन्हें इतिहास की ऐसी पुस्तके लिखने के लिए निर्देशित किया गया जो अंग्रेजो के पक्ष में जनमानस तैयार कर सके और यह बताये कि उनका शासन 'अत्याचारी मुस्लिम शासन " के मुकाबले बहुत अच्छा था | उदाहरण के तौर पर जेम्स मिल कि "' हिस्ट्री आफ ब्रिटिश इंडिया '' जिसे तीन भागो -- हिन्दू सभ्यता , मुस्लिम सभ्यता और ब्रिटिश काल -- में बात गया है को सरक्षण प्रदान किया गया मिल ने तर्क पेश किया कि हिन्दू सभ्यता गतिहीन और पिछड़ी थी , मुस्लिम मामूली रूप से बेहतर थे और ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता प्रगति की चालक शक्ति थी यह भारत में सुधार के लिए परिवर्तन को कार्यान्वित कर सकती थी | ठीक इसी समय विलियम हन्टर जैसे अधिकारियो ने ''इन्डियन मुस्लिम्स '' लिखी जिसमे मुस्लिमो को पृथक राष्ट्रीयता के रूप में वर्गीकृत किया गया , और उनके विकास के लिए उठाये जानेवाले कदमो को विस्तार से स्पष्ट किया गया | इन किताबो ने मुस्लिमो और मुस्लिम शासको के बारे में गलतफहमी पैदा करने और गलत धारणाये फैलाने के लिए विभाजनकारी भूमिका अदा की | इसी प्रकार वे भारतीय इतिहास - लेखन को इस कदर प्रभावित करने में सफल रहे , जिसके चलते डा यदुनाथ सरकार को नाईट की उपाधि दी गयी | उसने चार जिल्दो के अध्ययन ''मुग़ल साम्राज्य का पतन '' में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ध्येय की भलीभांति सेवा की | इतिहास के रुढ़िवादी सम्प्रदाय की अलगाववादी सोच पर प्रकाश डालते हुए आर सी मजुमदार लिखते है -- '' इन इतिहासकारों को इस बात का एहसास न था कि प्राचीन और मध्ययुग के दौरान भारत की राजनीति किसी अन्य जगह की राजनीति जैसी ही थी तथा शासको के आर्थिक और राजनीतिक हितो की पूर्ति करने का काम करती थी .. विशिष्ठ और पृथक हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियो की झूठी अवधारणा प्रस्तुत करके इतिहास के प्रति साम्प्रदायिक सोच ने विभाजनकारी रुझानो को जन्म दिया | धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भी ऐसा असर डाला .. कुछ नेताओं ने हिन्दू राष्ट्रवाद के बारे में , विदेशियों '' के रूप में मुस्लिमो के बारे में , हिन्दू हित की रक्षा करने के बारे में बात करना शरू कर दिया .. इस प्रकार से हिन्दू और मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने एक दूसरे पर असर डाला और एक दूसरे को सहारा दिया ''| इस साम्प्रदायिक सिद्धांत ने आगे उस समय और भी ठोस रूप ग्रहण कर लिया जब 1906 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई | दूसरी तरफ , अंग्रेजो ने मौजूदा भारतीय जनता पार्टी ,आर एस एस बजरंग दल व अन्य के पुरखे ''हिन्दू महा सभा '' जैसे अतिवादियो की मदद की | इस सब ने लोगो की दो पृथक भावनाओं को जन्म दिया | इसके बाद इसने प्रांतीयता फैलाने के लिए भी अधिक समय नही लिया | इस प्रकार अंग्रेजो ने भारतीयों को दो हिस्सों हिन्दुओ - एवं मुस्लिमो में बाट दिया | वी.डी महाजन कहते है ''भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान ही हिन्दू - मुस्लिम दंगे हुए और वह भी उन इलाको में जहाँ पर राष्ट्रवादी आन्दोलन मजबूत था | 1889 और 1894 के बीच तक़रीबन 90 हिन्दू हिन्दू - मुस्लिम दंगे हुए | उनमे से अकेले बंगाल में इस प्रकार के 44 दंगे हुए उत्तर -पश्चिमी प्रान्तों एवं अवध में 9 दंगे , मद्रास में 17 और पंजाब में एक दंगा हुआ | जहां कही भी ज्यादा राजनितिक गतिविधि थी ब्रिटिश सरकार ने वही इन दंगो को बढ़ावा दिया , ताकि हिन्दू और मुस्लिम झगड़ा शुरू कर सके और राष्ट्रवादी आन्दोलन के लिए संघर्ष को धक्का लगे | ऐसी निराशाजनक स्थिति के वावजूद इस बात का उल्लेख्य करना जरूरी है कि तत्कालीन बंगाल प्रांत के मुस्लिमो ने अच्छी - खासी संख्या में बंगाल विभाजन का विरोध किया था - जिसे हिन्दुओ और मुस्लिमो में आगे और भी फूट डालने के लिए ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की तरफ से उठाये गये एक और चालाकी भरे कदम के रूप में लिया गया | '' बंगाल विभाजन के खिलाफ आन्दोलन से सम्बन्धित सरकारी अभिलेखागार के दस्तावेज साबित करते है कि समूचे पूर्वी बंगाल के विभिन्न जिलो में बड़ी संख्या में जन - समुदाय की बैठके आयोजित की गयी थी " 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता में एक बड़ी सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया , जिसका मौलवी हिसीबुबुद्दीन अहमद ने अनुमोदन किया | इसके फलस्वरूप , तथ्यात्मक प्रमाण के वावजूद एकांगी इतिहास लेखन ने राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतीय मुस्लिमो की गौरवशाली भूमिका को काफी हद तक दरकिनार कर दिया |
प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक
लेखक डा पृथ्वी राज कालिया - अनुवादक - कामता प्रसाद