Sunday, February 18, 2018

तवायफे -- गदर से पहले -- भाग चार 18-2-18

तवायफे -- गदर से पहले -- भाग चार


प्राचीनकाल के भारत में भी कभी लगभग इसी प्रकार के व्यवसाय से जुडी नारिया हुआ करती थी जिन्हें प्राचीन भाषा में गणिका, पतुरिया नटीनिया , वैश्या आदि कहकर सम्बोधित किया जता था | कालान्तर , देश में उर्दू भाषा के प्रादुर्भाव के साथ गजलो की प्रस्तुती का चलन प्रारम्भ हुआ जिसकी प्रस्तुतकर्ता गणिकाओ को तवायफ कहकर सम्बोधित किया जाने लगा और शारीरिक सम्बन्धो को स्थापित करके जीविकोपार्जन करने वाली वैश्याओ को रंडी शब्द से |
पुरातन समय में लखनऊ एक धार्मिक नगरी हुआ करती थी , जहां चौक क्षेत्र के निकट प्रवाहित गोमती के तट पर यज्ञादि अनुष्ठान सम्पन्न हुआ करते थे | ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में लूटपाट मचाने के उपरान्त जब टर्कीस्तान का महमूद गजनवी सन 1026 - 27 में सिंध के जाटो से युद्ध करता हुआ अपने देश वापस चला गया तो उसकी सेना में कार्यरत परशिया के शेखो और अफगानिस्तान के पठानों का एक समूह लखनऊ आकर बस गया | तेरहवी शताब्दी में बिजनौर से लखनऊ आकर बसे शेखो - पठानों के बर्चस्व के उपरान्त यहाँ कुछ समय के लिए हिन्दुओ के धार्मिक अनुष्ठान ढीले पड़ गये और शासक वर्ग की छत्रछाया में दरगाहो में कव्वालियो की संस्कृति पनपने लगी , जिसमे चौदहवी सदी के अन्त में लखनऊ आकर बसे फकीर हाजी हरमैन मृत्यु 1436 तथा शाह मीना मृत्यु 1479 के नाम उल्लेखनीय है | कालांतर , इन्ही शेखो और पठानों के शासनकाल में ही पंद्रहवी सदी में जयपुर राज्य के राजकीय सम्मान से विभूषित पंडित विष्णु शर्मा नामक एक विद्वान् ने लखनऊ में पदार्पण किया और चौक क्षेत्र में प्रवाहित गोमती नदी के किनारे यज्ञशाला स्थापित करते हुए वहाँ सोमयज्ञ सम्पन्न कराया और उसके उपरान्त उपरोक्त यज्ञशाला अपने पुत्रो को सौपकर स्वंय गोला गोकरन नाथ चले गये | लखनऊ में रुके पंडित विष्णु शर्मा के पुत्र प्रीतिकर शर्मा एवं ओनके पुत्र बुद्धि शर्मा ने भी एक - एक सोमयज्ञ सम्पन्न करवाया | इन यज्ञो में शास्त्र के नियमो के अनुरूप परम्परागत गायन - वादन एवं नृत्यग्नाओ के नृत्य के कार्यक्रम सम्पन्न हुए , किन्तु इन नृत्यों में धार्मिक तत्व निहित थे |
उल्लेखनीय यह है कि यद्दपि उन दिनों शेख और पठान अपने कठोर शासन के लिए प्रसिद्द थे पर उन लोगो ने इन अनुष्ठानो में कही कोई व्यवधान नही डाला | सन्दर्भवश सोमयज्ञ को वाजपेयी यज्ञ भी कहा जाता है | लखनऊ के वाजपेयी कहे जाने वाले लोग इन्ही पंडित विष्णु शर्मा के वंशज हैं |
उस समय तक लखनऊ में तवायफो एवं वैश्याओ की उपस्थिति का कोई संकेत नही मिलता |
लखनऊ तथा उसके आसपास के क्षेत्रो में तवायफो के आगमन का क्रम तब प्रारम्भ हुआ , जब दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के उपर सन 1738 में नादिरशाह का बर्बर आक्रमण हुआ | उनकी निर्दयता से आक्रान्ता साहित्यकार कलाकार , गायन , वादन , संगीतज्ञ ,नर्तकिया आदि सभी दिल्ली छोड़ अन्यत्र भागने लगे | उस समय फैजाबाद में मोहम्मद शाह'रंगीले ' के सैन्य अधिकारी सेनापति मोहम्मद अमीन उर्फ़ बुरहान - उल - मुल्क 1724 - 1739 लखनऊ को शेखो एवं पठानों के चंगुल से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से नियुक्त थे | अत: उस समय वह एवं उनकी शासन व्यवस्था उसी कार्य को सम्पन्न करवाने में व्यस्त थी , जिसके कारण कलाकारों के समूह के साथ दिल्ली से पलायन करने वाली तवायफे अपने समूह के साथ लखनऊ , फैजाबाद , जौनपुर व अन्य क्षेत्रो में इधर - उधर डेरा डालकर अपने गायन , वादन व नृत्य की कला के माध्यम से जीविकोपार्जन करती रही |
सन 1748 में दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले की मृत्यु हो गयी परिणाम स्वरूप सन 1738 में नादिरशाह के क्रूर आक्रमण काल के समय जो तवायफे और संगीतज्ञ अन्यत्र कही पलायन न करके दिल्ली में रुक गये थे उनके साथ बहुत बुरा हुआ | पलायन की इस प्रक्रिया में कुछ तवायफे अपने समूह के साथ प्रश्रय हेतु फैजाबाद के तत्कालीन नवाब सफदर गंज 1739 -1754 के दरबार जा पहुची | किन्तु वहाँ उनको सहारा न मिल सका | उसके उपरान्त जब सत्ता की बागडोर शुजाउद्दौला 1754 - 1775 के हाथो आई तो उन्होंने इन सबको प्रश्रय दे दिया | कमश: शुजाउद्दौला का इन तवायफो के प्रति आकर्षण इतना बढ़ गया कि जब भी वो कही बाहर की यात्रा करते तो तवायफो और उनके संगीतज्ञो को भी अपने साथ ले जाते | यही नही वरन उनके शासनकाल के समय शहर की पूरी रात तवायफो के घुघरूओ की रुनझुन से गुजायमान रहती थी |
सत्ता की बागडोर आसफुद्दौला 1775 - 1798 के हाथो आई और उन्होंने राजपाट के कार्य को फैजाबाद से लखनऊ स्थानातरित करते हुए स्वंय भी लखनऊ में रहने का निर्णय लिया | उनके लखनऊ पहुचते ही न की मात्र फैजाबाद की तवायफे अपनी संगीत मण्डली के साथ लखनऊ पहुच गयी | इस क्रम में पंजाब की अनेक तवायफे भी लखनऊ आकर बस गयी | लखनऊ आने वाली इन सभी तवायफो को उनके मूल स्थान से अधिक सरक्षण एवं सम्मान लखनऊ में मिला | कहा जाता है कि आसफुद्दौला , सन 1795 में अपने पुत्र वजीर अली की बारात में तवायफो के एक बड़े समूह को जिनकी संख्या सैकड़ो में आंकी जाती है , अपने साथ ले गये थे |
क्रमश: तवायफो की घुसपैठ नवाबो के बीच बढती ही चली गयी | महफ़िलो में तवायफो की उपस्थिति उनकी प्रतिष्ठा व गरिमा का प्रतीक बन गया |
नवाब सआदत अली खा 1798 - 1814 के बारे में प्रसिद्ध है कि अपने कार्यालय के कमरे में जहां बैठकर वह अपने राजकीय कार्यो को निपटाते थे , उसके एक ओर तवायफो की चौकी सजी रहती थी | जब नवाब अपने कार्य से थक जाते थे तो तवायफे अपने नृत्य के हाव - भाव प्रदर्शन के माध्यम से उनके दिलो दिमाग को ताजा करती थी | गाजीउद्दीन हैदर 1814 - 1827 के विषय में कहा जाता है ई इन्ही के समय से मोहर्रम के दो महीने व आठ दिनों के बीच मातम के रूप में सोजख्वानी अंदाज में मर्सिया पढ़े जाने की परम्परा की शुरुआत हुई |
नसीरुद्दीन हैदर 1827- 1837 के विषय में तवायफो से सम्बन्धित केवल एक घटना का विवरण मिलता है जिसमे उन्होंने एक पुस्तक में दिए गये राग - रागनियो के अनुरूप 500 तवायफो को सुसज्जित करवाकर प्रत्येक रागनी के लिए तीस दिनों तक अलग अलग नृत्य कार्यक्रम आयोजित करवाया | बाद में मुम्मद अली शाह 1837 - 1842 तथा नवाब अमजद अली 1842 - 1847 के शासनकाल में इन तवायफो को शासन की तरफ से कोई प्रोत्साहन न मिलने के कारन तवायफो का एक बड़ा वर्ग लखनऊ से अन्यत्र कही और पलायन कर गया | जब वाजिद अली शाह 1847 - 1856 ने सत्ता की बागडोर सम्भाली तो तवायफो के साथ सभी संगीतकारों के पाव बारह हो गये तथापि उल्लेखनीय है ई इन तवायफो से सम्बन्ध बनाये रखने की प्रक्रिया में नवाबो ने उसन सबसे एक गरिमामय दुरी अवश्य बनाये रखी |
लखनऊ में नवाबो की सन1775 से1856 के बीच की यात्रा में लखनऊ के चौक क्षेत्र में इन तवायफो एवं वैश्याओ के समूहों के अनेक ठिकाने स्थापित हो गए | चौक , जो कभी धार्मिक क्रित्र्यो का गढ़ माना जाता था उसका एक महत्वपूर्ण क्षेत्र ऐय्याशी के अड्डे के रूप में परिवर्तित हो गया | तथापि नवाबो के समय तवायफो एवं वैश्याओ के उन अड्डो में एक अनुशासन स्थापित रहा |

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार -- आभार हमारा लखनऊ पुस्तक से - लेखक -रामकिशोर बाजपेयी |


प्राचीनकाल के भारत में भी कभी लगभग इसी प्रकार के व्यवसाय से जुडी नारिया हुआ करती थी जिन्हें प्राचीन भाषा में गणिका, पतुरिया नटीनिया , वैश्या आदि कहकर सम्बोधित किया जता था | कालान्तर , देश में उर्दू भाषा के प्रादुर्भाव के साथ गजलो की प्रस्तुती का चलन प्रारम्भ हुआ जिसकी प्रस्तुतकर्ता गणिकाओ को तवायफ कहकर सम्बोधित किया जाने लगा और शारीरिक सम्बन्धो को स्थापित करके जीविकोपार्जन करने वाली वैश्याओ को रंडी शब्द से |
पुरातन समय में लखनऊ एक धार्मिक नगरी हुआ करती थी , जहां चौक क्षेत्र के निकट प्रवाहित गोमती के तट पर यज्ञादि अनुष्ठान सम्पन्न हुआ करते थे | ऐतिहासिक दृष्टि से भारत में लूटपाट मचाने के उपरान्त जब टर्कीस्तान का महमूद गजनवी सन 1026 - 27 में सिंध के जाटो से युद्ध करता हुआ अपने देश वापस चला गया तो उसकी सेना में कार्यरत परशिया के शेखो और अफगानिस्तान के पठानों का एक समूह लखनऊ आकर बस गया | तेरहवी शताब्दी में बिजनौर से लखनऊ आकर बसे शेखो - पठानों के बर्चस्व के उपरान्त यहाँ कुछ समय के लिए हिन्दुओ के धार्मिक अनुष्ठान ढीले पड़ गये और शासक वर्ग की छत्रछाया में दरगाहो में कव्वालियो की संस्कृति पनपने लगी , जिसमे चौदहवी सदी के अन्त में लखनऊ आकर बसे फकीर हाजी हरमैन मृत्यु 1436 तथा शाह मीना मृत्यु 1479 के नाम उल्लेखनीय है | कालांतर , इन्ही शेखो और पठानों के शासनकाल में ही पंद्रहवी सदी में जयपुर राज्य के राजकीय सम्मान से विभूषित पंडित विष्णु शर्मा नामक एक विद्वान् ने लखनऊ में पदार्पण किया और चौक क्षेत्र में प्रवाहित गोमती नदी के किनारे यज्ञशाला स्थापित करते हुए वहाँ सोमयज्ञ सम्पन्न कराया और उसके उपरान्त उपरोक्त यज्ञशाला अपने पुत्रो को सौपकर स्वंय गोला गोकरन नाथ चले गये | लखनऊ में रुके पंडित विष्णु शर्मा के पुत्र प्रीतिकर शर्मा एवं ओनके पुत्र बुद्धि शर्मा ने भी एक - एक सोमयज्ञ सम्पन्न करवाया | इन यज्ञो में शास्त्र के नियमो के अनुरूप परम्परागत गायन - वादन एवं नृत्यग्नाओ के नृत्य के कार्यक्रम सम्पन्न हुए , किन्तु इन नृत्यों में धार्मिक तत्व निहित थे |
उल्लेखनीय यह है कि यद्दपि उन दिनों शेख और पठान अपने कठोर शासन के लिए प्रसिद्द थे पर उन लोगो ने इन अनुष्ठानो में कही कोई व्यवधान नही डाला | सन्दर्भवश सोमयज्ञ को वाजपेयी यज्ञ भी कहा जाता है | लखनऊ के वाजपेयी कहे जाने वाले लोग इन्ही पंडित विष्णु शर्मा के वंशज हैं |
उस समय तक लखनऊ में तवायफो एवं वैश्याओ की उपस्थिति का कोई संकेत नही मिलता |
लखनऊ तथा उसके आसपास के क्षेत्रो में तवायफो के आगमन का क्रम तब प्रारम्भ हुआ , जब दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले के उपर सन 1738 में नादिरशाह का बर्बर आक्रमण हुआ | उनकी निर्दयता से आक्रान्ता साहित्यकार कलाकार , गायन , वादन , संगीतज्ञ ,नर्तकिया आदि सभी दिल्ली छोड़ अन्यत्र भागने लगे | उस समय फैजाबाद में मोहम्मद शाह'रंगीले ' के सैन्य अधिकारी सेनापति मोहम्मद अमीन उर्फ़ बुरहान - उल - मुल्क 1724 - 1739 लखनऊ को शेखो एवं पठानों के चंगुल से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से नियुक्त थे | अत: उस समय वह एवं उनकी शासन व्यवस्था उसी कार्य को सम्पन्न करवाने में व्यस्त थी , जिसके कारण कलाकारों के समूह के साथ दिल्ली से पलायन करने वाली तवायफे अपने समूह के साथ लखनऊ , फैजाबाद , जौनपुर व अन्य क्षेत्रो में इधर - उधर डेरा डालकर अपने गायन , वादन व नृत्य की कला के माध्यम से जीविकोपार्जन करती रही |
सन 1748 में दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह रंगीले की मृत्यु हो गयी परिणाम स्वरूप सन 1738 में नादिरशाह के क्रूर आक्रमण काल के समय जो तवायफे और संगीतज्ञ अन्यत्र कही पलायन न करके दिल्ली में रुक गये थे उनके साथ बहुत बुरा हुआ | पलायन की इस प्रक्रिया में कुछ तवायफे अपने समूह के साथ प्रश्रय हेतु फैजाबाद के तत्कालीन नवाब सफदर गंज 1739 -1754 के दरबार जा पहुची | किन्तु वहाँ उनको सहारा न मिल सका | उसके उपरान्त जब सत्ता की बागडोर शुजाउद्दौला 1754 - 1775 के हाथो आई तो उन्होंने इन सबको प्रश्रय दे दिया | कमश: शुजाउद्दौला का इन तवायफो के प्रति आकर्षण इतना बढ़ गया कि जब भी वो कही बाहर की यात्रा करते तो तवायफो और उनके संगीतज्ञो को भी अपने साथ ले जाते | यही नही वरन उनके शासनकाल के समय शहर की पूरी रात तवायफो के घुघरूओ की रुनझुन से गुजायमान रहती थी |
सत्ता की बागडोर आसफुद्दौला 1775 - 1798 के हाथो आई और उन्होंने राजपाट के कार्य को फैजाबाद से लखनऊ स्थानातरित करते हुए स्वंय भी लखनऊ में रहने का निर्णय लिया | उनके लखनऊ पहुचते ही न की मात्र फैजाबाद की तवायफे अपनी संगीत मण्डली के साथ लखनऊ पहुच गयी | इस क्रम में पंजाब की अनेक तवायफे भी लखनऊ आकर बस गयी | लखनऊ आने वाली इन सभी तवायफो को उनके मूल स्थान से अधिक सरक्षण एवं सम्मान लखनऊ में मिला | कहा जाता है कि आसफुद्दौला , सन 1795 में अपने पुत्र वजीर अली की बारात में तवायफो के एक बड़े समूह को जिनकी संख्या सैकड़ो में आंकी जाती है , अपने साथ ले गये थे |
क्रमश: तवायफो की घुसपैठ नवाबो के बीच बढती ही चली गयी | महफ़िलो में तवायफो की उपस्थिति उनकी प्रतिष्ठा व गरिमा का प्रतीक बन गया |
नवाब सआदत अली खा 1798 - 1814 के बारे में प्रसिद्ध है कि अपने कार्यालय के कमरे में जहां बैठकर वह अपने राजकीय कार्यो को निपटाते थे , उसके एक ओर तवायफो की चौकी सजी रहती थी | जब नवाब अपने कार्य से थक जाते थे तो तवायफे अपने नृत्य के हाव - भाव प्रदर्शन के माध्यम से उनके दिलो दिमाग को ताजा करती थी | गाजीउद्दीन हैदर 1814 - 1827 के विषय में कहा जाता है ई इन्ही के समय से मोहर्रम के दो महीने व आठ दिनों के बीच मातम के रूप में सोजख्वानी अंदाज में मर्सिया पढ़े जाने की परम्परा की शुरुआत हुई |
नसीरुद्दीन हैदर 1827- 1837 के विषय में तवायफो से सम्बन्धित केवल एक घटना का विवरण मिलता है जिसमे उन्होंने एक पुस्तक में दिए गये राग - रागनियो के अनुरूप 500 तवायफो को सुसज्जित करवाकर प्रत्येक रागनी के लिए तीस दिनों तक अलग अलग नृत्य कार्यक्रम आयोजित करवाया | बाद में मुम्मद अली शाह 1837 - 1842 तथा नवाब अमजद अली 1842 - 1847 के शासनकाल में इन तवायफो को शासन की तरफ से कोई प्रोत्साहन न मिलने के कारन तवायफो का एक बड़ा वर्ग लखनऊ से अन्यत्र कही और पलायन कर गया | जब वाजिद अली शाह 1847 - 1856 ने सत्ता की बागडोर सम्भाली तो तवायफो के साथ सभी संगीतकारों के पाव बारह हो गये तथापि उल्लेखनीय है ई इन तवायफो से सम्बन्ध बनाये रखने की प्रक्रिया में नवाबो ने उसन सबसे एक गरिमामय दुरी अवश्य बनाये रखी |
लखनऊ में नवाबो की सन1775 से1856 के बीच की यात्रा में लखनऊ के चौक क्षेत्र में इन तवायफो एवं वैश्याओ के समूहों के अनेक ठिकाने स्थापित हो गए | चौक , जो कभी धार्मिक क्रित्र्यो का गढ़ माना जाता था उसका एक महत्वपूर्ण क्षेत्र ऐय्याशी के अड्डे के रूप में परिवर्तित हो गया | तथापि नवाबो के समय तवायफो एवं वैश्याओ के उन अड्डो में एक अनुशासन स्थापित रहा |

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार -- आभार हमारा लखनऊ पुस्तक से - लेखक -रामकिशोर बाजपेयी |

गदर लहर का रोशन चिराग -- 18-2-18

गदर लहर का रोशन चिराग --

क्रांतिवीर करतार सिंह सराभा
जो कोई पूछे कि कौन हो तुम , तो कह दो बागी है नाम मेरा |
जुल्म मिटाना हमारा पेशा , गदर करना है काम अपना |
नमाज संध्या यही हमारी , और पाठ पूजा सभी यही है ,
धरम- करम सब यही है हमारा , यही खुदा और राम अपना | सराभा
बेशक सराभा के बचपन के बारे में अधिकतर विवरण उपलब्ध नही है , फिर भी यह जरूरी पता लगता है कि करतार सिंह 24 मई 1896 को लुधियाना जिले के गाँव सराभा में सरदार मंगल सिंह और बीबी साहिब कौर के घर पैदा हुआ और कम उम्र में ही उसे ही माँ - बाप की मृत्यु का आघात सहना पडा | उसकी परवरिश की जिम्मेदारी पूरी तरह उसके दादा सरदार बदन सिंह पर आन पड़ी थी | करतार सिंह अपने माँ - बाप का इकलौता पुत्र था | उसकी एक बहन भी थी , जिसका नाम था धन कौर | दादा करतार से बेहद प्रेम करते थे | वह उसे खेती बाड़ी के काम में नही डालना चाहते थे उनकी इच्छा थी कि करतार पढ़ लिख कर किसी अच्छे रोजगार में लग जाए | करतार का गाँव के प्राथमिक स्कूल में दाखिला करवा दिया गया | प्राथमिक शिक्षा के बाद वह गुजरवाल के वर्नैकुलर मिडल स्कूल का विद्यार्थी बना , फिर लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल में जा दाखिला लिया |स्कूल की पढ़ाई के दौरान करतार सिंह साथियो का अगुवा और हरमन प्यारा विद्यार्थी था | चुस्त चालाक भी बहुत था | वह हंसमुख और मसखरे स्वभाव का भी था | उसकी सर्वप्रियता के कारण दूसरे विद्यार्थी उसका साथ पाने के लिए उतावले रहते थे | वास्तव में होनहार चुस्त और होशियार करतार सिंह शुरू से ही नेतृत्व के गुण थे | उसकी इसी योग्यता के कारण उसके साथी उसे 'अफलातु ' कहकर बुलाते थे | 'अफलातु ' कहने का भाव था कि उसमे अजीब और अनहोनी बाते करने की योग्यता और दिलेरी थी | उम्र के अगले पड़ाव में उसने अपने इन्ही गुणों का भरपूर प्रदर्शन किया | कई साथी उसकी फुर्ती और तेजी से प्रभावित होकर मजाक में उसे ' उड़ता साँप' भी कहते थे |
मालवा स्कूल में सातवी कशा में पढ़ते हुए उसने भोलेपन वाली चुस्ती और होशियारी के चलते सोचा कि क्यों झूठा सार्टिफिकेट बनाकर नौवी में दाखिला ले लिया जाए और उच्च शिक्षा का लक्ष्य एक दो साल पहले ही पूरा कर लिया जाए |
उसने मालवा स्कूल से सातवी का सार्टिफिकेट लिया और उसे नौवी का बनाकर आर्य स्कूल में दाखिल हो गया | पहले तो स्कूल वालो को कुछ पता ही नही लगा , बाद में पता लगने पर स्कूल वालो ने एक्शन लेने की सोची तो करतार को भनक लग गयी | आगे की पढ़ाई के लिए वह उड़ीसा में अपने चाचा बख्शीश सिंह के पास चला गया और वहा जाकर दसवी पास करने के बाद कालिज में दाखिला ले लिया | नया से नया ज्ञान हासिल करने की तलब के चलते वे पाठ्य पुस्तके पढने के अलावा और भी बहुत सारा साहित्य पढता रहा था | सार्टिफिकेट में बदलाव करके नौवी में दाखिल होने की कोशिश से उसके स्वभाव के इस पक्ष का पता चलता है कि उसे ऊँची मंजिल छूने की ' कितनी चाहता थी और वह जल्दी से जल्दी बड़ा मुकाम हासिल करने का अभिलाषी था |
चाचा के पास रहकर पढ़ते हुए उसे अंग्रेजी बोलने और लिखने का अच्छा अभ्यास हो गया | वह अंग्रेजी साहित्य पढने में दिलचस्पी लेने लगा | उस समय बंगाल और उड़ीसा आदि इलाको में बहुत हद तक राजनितिक चेतना पैदा हो चुकी थी | सराभा स्कूली पुस्तको के अलावा चूँकि दुसरे साहित्य भी पढता रहता था | इसलिए उस पर इस राजनितिक जागृति का भी प्रभाव पड़ना शुरू हो गया | देश प्रेम और देश सेवा भावना उसके अन्दर कुलबुलाने लगी |

Friday, February 16, 2018

लखनऊ तवायफ व गजल ---- महफिल व मजलिस - भाग तीन 16-2-18

तवायफ व गजल ---- महफिल व मजलिस - भाग तीन


गजल का साहित्यिक अर्थ होता है ''महिला से वार्तालाप ' | चूँकि गजल विधा के उद्भव - काल में महिलाओं का पर्दे में रहना अनिवार्य हुआ करता था , अत: उस समय महिलाओं के प्रति अपने भावोद्गारो की अभिव्यक्ति सीधी भाषा में करने के बजाए किसी सुन्दर लड़के को परिलक्षित करके प्रतीकात्मक रूप में की जाती थी | कालान्तर , सूफियो के प्रभाव में आकर द्वय - अर्थी गजलो के लेखन की परम्परा हुई जिसके अंतर्गत गजल में कहे गये किसी शेर के सम्बोधन को यदि परमेश्वर के प्रति प्रेमाभिव्यक्ति से जोड़कर देखा जाय तो इश्क - ए-मजाजी कहा गया है |
ज्ञातव्य है की भारत में आने से पूर्व पर्शिया और अरब देशो में गजल की परम्परा का पहले से ही चलन था | भारत में गजलो की महफ़िलो का आयोजन 13वी सदी में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के दरबार में ईरानी भाषा एवं ईरानी संगीत विधा के साथ हुआ था जिसके गायक भी ईरानी हुआ करते थे | कालान्तर , हजरत आमिर खुसरो ने गजलो का भारतीयकरण करते हुए महफिले - समा के आयोजन करवाकर उसे भारत में खटाई दिलवाई | प्रारम्भिक काल में गजलो की दो परम्पराए बनी -- प्रथम सूफियाना , जिसे भक्ति संगीत कह सकते है | इस परम्परा के अंतर्गत महफिले समा में कव्वाली गई जाती थी और दूसरी शराब व शबाब को आधार मानती हुई इश्कियाना शायरी जिन्हें तवायफो के रंगीले कोठो की महफ़िलो में मुजरा के रूप में गया जाने लगा | गजल की प्रस्तुती के ये दोनों चलन दिल्ली में मोम्मद शाह 'रंगीले ' ( 1719-1748 ) के शासनकाल में स्थापित हो चुके थे | सम्स्य की मार ने दिल्ली जैसे तत्कालीन तड़क - भड़क वाले वैभवशाली शहर में रहने वाले शहरियों को दिल्ली छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया , जिनमे शहरी तवायफे एवं शायर भी सम्मलित थे | इनमे से अधिकाश पहले चरण में फैजाबाद की ओर कुछ कर गये , जब सन 1738 में नादिरशाह ने दिल्ली में कहर सी स्थिति बना डाली और फिर उसके बाद सन 1748 में मोम्मद शाह रंगीले की मृत्यु के उपरान्त लखनऊ की ओर मुंह किया |
लखनऊ पहुचकर गजलो की प्रस्तुती को एक नयी दिशा तब मिली जब गजलो को गायन व वाध्ययंत्रो से तालमेल बैठाते हुए अदाकारी के साथ एक कलात्मक शैली में प्रस्तुत किये जाने की परम्परा चल निकली | तवायफो द्वारा गजलो की इस प्रकार की शैली में प्रस्तुत किये जाने से गजलो का महत्व और भी अधिक बढ़ गया |
लखनऊ के नबावो ने न की मात्र इन्हें प्रश्रय दिया , वरन इनकी विधा को आगे बढाये जाने का मार्ग प्रशस्त किया | प्रणाम स्वरूप लखनऊ में अनेक तवायफो एवं शायरों की भरमार होती चली गयी | यही नही लखनऊ के कई नवाब शायरी कहने लगे | कला एवं साहित्य के नाम पर लखनऊ मुशायरो एवं मुजरो का केंद्र बनकर रह गया | लखनऊ की शाम रंगीली हो उठी जो शामे - अवध के नाम से सर्वत्र ख्यातिलब्ध हुई | तथापि , लखनऊ के शामे - अवध के पूर्व का भी एक अनकहा इतिहास तो है ही |
शामे - अवध जिसका हम लखनऊ की सांस्कृतिक कीर्ति के रूप में सगर्व बखान करते है , उसे तो वास्तव में लखनऊ की मुजरो की शाम अथवा ऐय्याशो की शाम कहा जाना चाहिए | सहमे - अवध वाला लखनऊ तो वास्तव में लखनऊ के मनचलों , छैल छबीलो , रईसों. श्जादो , पथभ्रष्ट पंथियों का तीर्थ हुआ करता था , जहाँ माथा टिकाने की ललक में ये आशिक मिजाजी लोग तन , मन व धन सब कुछ समर्पित करने को तैयार रहते | अवध की इस शाम ने कलादेवी की उपासना के नाम पर कितनो ही घर तबाह कर दिए होंगे | यह लखनऊ की वह तथाकथित सांस्कृतिक विरासत थी , जिसको विकसित करने के प्रयास में लखनऊ की सादगी एकं सच्चाई से ओर्त्पर्ट धार्मिक संस्कृति को सूली पर चढा दिया गया था .. और कोठो पर जाने वाले संदिग्ध चरित्र के लोगो को सर - माथे पर बैठा लिया गया था | लखनऊ में स्थापित हुए कुछ विशालकाय भवन , जिनमे बने कक्षों को कभी आनन्द विहार कक्षों के रूप में प्रयोग किया गया उन सबकी राष्ट्रीय धरोहर के रूप में पहिचान बन गयी |
तथापि , तवायफो का जीवन मात्र कोठो व दरबारों में गायन व नृत्य के कार्यक्रमों की परिधि तक सीमित न था | वरन इन तंग गलियों के बीच कोठो में बैठकर अवध की शाम को आबाद करने वाली इन तवायफो का मुजरो से परे कुछ धार्मिक जीवन भी था | इन तवायफो का स्थान महफ़िलो के मुजरो से परे मोहर्रम के समय आयोजित मजलिसो में सोजख्वानी की प्रस्तुती के कार्यक्रमों में था | सोज एक पर्शियन शब्द है जिसका अर्थ होता है शोक प्रगट करना |
सोजख्वानी की परम्परा नवाब शुजाउद्दौला ( 1754 - 1775 ) के समय पर्शिया से भारत में आई थी जो लखनऊ में आकार फूली - फली और पल्लवित हुई | इस्लाम में संगीत को स्वीकृति न मिलने के कारण सोजख्वानी की प्रस्तुती की प्रक्रिया में उसके साथ किसी वाद्ययंत्रो का बजाय जाना सर्वथा वर्जित था तथापि उन्हें राग - रागनियो में बाँधकर गाने में किसी का कोई विरोध नही रहा | भारत के शिया समुदाय में सोजख्वानी को धार्मिक संगीत के रूप में स्वीकार कर लिया गया | सन्दर्भवश मुसलमानों के शिया समुदाय में प्रचलित मर्सियागोई , काव्य विधा का एक अंग है जिसमे कर्बला के युद्द क्षेत्र में उनके पुरखे हुसैन साहब के ओजस्वी युद्द कौशल का बखान किया जता है | जब मर्सिया को भारतीय संगीत में निर्धारित राग - रागनियो का पुट देते हुए प्रस्तुत किया जाने लगा तो प्रस्तुती की उक्त शैली को शोजख्वानी खे जाने की परम्परा चल निकली |
मोहर्रम के दिनों में इमामबाड़े के प्रागण में हैदरी चूनावाली के मार्मिक व चमत्कारी सोजख्वानी को सुनने के लिए विशाल जन समुदाय उमड़ पड़ता था , जिनमे महिलाये श्रोताये भी सम्मलित होती थी |
खैर चाहे जो कुछ भी हो , तवायफो व वैश्याओ की जीवन यात्रा दुर्गम , संघर्षपूर्ण एवं दुखदायी रहगी है | भारत की महिलाये इस धंधे को स्वेच्छा व ख़ुशी - ख़ुशी स्वीकार नही करती | कही इन्हें बचपन अथवा यौवनकाल में अपहरण करके लाया जाता है तो , कही बरगला कर | कभी गरीबी की विकटता से घिरे परिवार द्वारा स्वंय अपनी बच्चियों को कोठो के लिए बेचा जाता रहा है , और एक बार कोठे में पहुचने के उपरान्त उनका जीवन कैदियों सा हो जाता है | इस कैदखाने में रहकर इन्हें गायन व नृत्य की कला सीखनी पड़ती है अथवा फिर देह व्यापार में लिपट करवा दिया जाता है ! इनके जीवन की जटिलताये अन्नत है | मुक्ति का कोई मार्ग नही |

सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक - लेखक राम किशोर बाजपेयी

Thursday, February 15, 2018

तवायफ लखनऊ की -- भाग दो 15-2-18

तवायफ लखनऊ की -- भाग दो
तवायफ तथा उनके समकक्षी वर्ग


लखनऊ में आकर बसने वाली तवायफो में कंचनिया , चुनेवालिया , और नागरानियाँ कही जाने वाली तीन श्रेणीयो के नाम प्रसिद्द रहे है | कंचनिया श्रेणी की तवायफो के बारे में कहा जाता है कि ये शुजाउदौला ( १७५४ - १७७५ ) के समय पंजाब और दिल्ली से आकर लखनऊ में बस गयी थी | प्रारम्भ में इनका व्यवसायिक धंधा नाचना , गाना भले ही रहा हो किन्तु बाद में वह देह व्यापार तक सिमित होकर रह गया था | चूने वालियों के सम्बन्ध में कहा जाता है की उनकी आवाज बहुत सुरीली हुआ करती थी | सोज श्रेणी के गायन की प्रस्तुती में इन्हें महारथ हासिल थी | चूने वाली हैदर का सोज प्रस्तुती में इतना नाम था की उसके गले से सोज सुनने के लिए लोग मोहर्रम की प्रतीक्षा में दिन गिनते रहते और मोहर्रम आने पर बड़े इमामबाड़ा के सामने सैकड़ो की संख्या में लोग घंटो खड़े रहकर उसके आने की प्रतीक्षा करते थे | नागरानियो का नाम अति सम्मानित श्रेणी की तवायफो में आता था |
इन श्रेणियों के अतिक्रिकत नाचने - गाने वाली महिलाओं की कुछ अन्य श्रेणियों के नामो का भी उल्लेख्य मिलता है जिनके लखनऊ में आकर बस जाने अथवा मात्र लखनऊ में आते - जाते रहने के सम्बन्ध में विद्वतजन एकमत नही |
डेरेदार : डेरेदार कही जाने वाली तवायफो ने अपनी उत्कृष्ट गायन की प्रस्तुती के माध्यम से लखनऊ में अपनी उपस्थिति जोर - शोर से दर्ज की थी | डेरेदार तवायफो का नाम अन्य तवायफो की अपेक्षा सबसे ऊँची एवं श्रेष्ठ श्रेणी में रखागया था | इन्हें डेरे वालियाँ भी कहा जाता था | ये मूल रूप से पंजाब की रहने वाली थी | कहा जाता है की इस श्रेणी की तवायफो के पुरुष अपनी बहन - बेटियों को अपेक्षित प्रशिक्षण देकर सार्वजनिक रूप से गाने - बजाने के काम में लगा देते थे | कालान्तर , देश - काल व परिस्थितियों के अनुरूप ये अपने आप को ढालती चली गयी और क्रमश: उन लोगो ने समाज में अपना अति विशिष्ट स्थान बना लिया |
डुमनी; जो पर्दानशी औरते महल के अन्दर गायन वादन और नृत्य का कर्म सम्पादित करते हुए अपनी जीविका का निर्वाह करती थी उन्हें डुमनी कहा जाता था | इनकी आवाज दिलकश हुआ करती थी एवं इन्हें संगीत विधा की राग - रागनियो का ज्ञान रहता था | इस श्रेणी की महिलाओं को पुरुषो के सामने आने की अनुमति नही थी |
ढाडी: यु तो डुमनी के पिता या भ्राता को ढाडी कहा जता था किन्तु इतिहास में उपलब्ध अन्य संदर्भो में इन्हें तवायफो से जुदा माना गया कारण की ये तवायफो के कार्यक्रमों के व्यवस्थापक हुआ करते थे | मोहम्मद करम इमाम ढाडीयो , तवायफो और सफरदाइयो ( संगत करने वालो ) को साथ गिनाया है | उनके कथानुसार ढाडी बेहद खब्ती और बेम्जे थे तथा वैश्याओ के गुरु हुआ करते थे | ढाडी लोग अपने आपको डेरेदारवालियों से श्रेष्ट मानते थे |
ढफजन : इस श्रेणी की नारिया ढफ अथवा ढोल बजाते हुए धुर्वपद , सोहेला , वर्षगाठ व विवाह के गीत गाती थी | किसी युग में ये मात्र महिलाओं के बीच ही अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकती थी | किन्तु अकबर के समय से ये सामान्य जन साधारण के बीच भी अपनी कला का प्रदर्शन करने लगी |
गौनाहर : वर्तमान लखनऊ में ढफजन की ये गायिकाये आज भी गौनाहर के नाम से ख्यातिलब्द है | महिलाओं के बीच नाचते - गाते समय ये तवायफो की तरह किसी एक श्रोता महिला की धोती का पल्ला पकड़कर हावभाव दर्शाने और पकडे गये पल्ले को तब तक नही छोडती जब तक की न्योछावर के रूप में इन्हें इनाम न मिल जाए | ये गौनाहरे वास्तव में तवायफ तो नही कही जा सकती किन्तु इनकी कार्यशैली एक दम तवायफो जैसी होती है | अंतर मात्र इतना की ये मात्र महिलाओं के समूह के बीच में ही गाती , बजाती , नृत्य करती है जब की तवायफो को पुरुषो की उपस्थिति से कोई परहेज नही | बदले हुए समय के अनुरूप अब इनकी सेवाए बिरले ही उपलब्द्ध होती है लखनऊ के पुराने मोहल्लो की गलियों व कुचो में इनके कुछ समूह आज भी सामान्य जीवन यापन करते मिल जायेंगे और आश्चर्य की उनके आसपास रहने वाले तक नही जानते की वे गौनाहार समूह से जुडी है |
- सुनील दत्ता -- स्वतंत्र पत्रकार -- समीक्षक

Wednesday, February 14, 2018

लखनऊ की तवायफे - भाग एक 14-2-18

लखनऊ की तवायफे - भाग एक


तवायफ शब्द का उच्चारण करते ही अन्यास नारी का एक विकृत एवं निकृष्ट रूप हमारी आँखों के सम्मुख बरबस आकर खड़ा हो जाता है | कारण की सामान्य अवधारणा के अंतर्गत तवायफ एक ऐसी चरित्रहीन नारी होती है जो अपने जीविकोपार्जन हेतु पुरुषो से शारीरिक सम्बन्ध स्थापन को ही अपना जीवन धर्म मानती हो | किन्तु वास्तव में पुरुषो वास्तव में पुरुषो से शारीरिक सम्बन्ध स्थापन के माध्यम से आय का स्रोत व साधान जुटाने वाली नारियो का वर्ग तवायफो के वर्ग से सवर्था भिन्न है | इस वर्ग की नारियो को सभी समाज में वैश्या समाज उन्हें रंडी शब्द से सम्बोधित करता है |
तवायफे इस वर्ग का प्रतिनिधित्व कदापि नही करती |
वास्तव में तवायफ नारियो का एक ऐसा वर्ग होता था . जो गायन , नृत्य एवं उनके निहित भावो की अभिनीत कला में निपुण होने के साथ व्यवहार कुशल एवं मृदुभाषी भी होती थी | विद्योत्तमा होने के साथ वे वाकपटुता में ऐसी दक्ष की बड़े से बड़े विद्वानों को निरुतर कर दे | साथ ही ये नीतिशास्त्र के व्यवहारिक पक्ष में निपुण होती थी | इनकी विश्वसनीयता ऐसी की लखनऊ के नबावो ,रईसों , एवं बड़े घरानों के बच्चे समाज में उठने बैठने व बातचीत करने की अदब का सलीका सिखने हेतु इनके पास भेजे जाते थे | प्रशिक्षण की इस प्रक्रिया में उनके वहाँ अश्लीलता एवं फूहड़पन का कोई स्थान नही था | पानदान इनकी महफ़िल की शिओभा हुआ करती थी और पीकदान एक अपरिहार्य आवश्यकता |
प्रारम्भिक काल में संगीत के कार्यक्रमों हेतु आयोजित होने वाली महफ़िलो में सिद्धःहस्त गायक लोग उत्कृष्ट श्रेणी के धुर्वपद व धमार के गायन पर्स्तुत किया करते थे | कालान्तर , वे महफ़िलो में ख्याल शैली के गायन पर्स्तुत करने लगे और फिर गजल | तदुपरान्त , इस गजल गायकी को जब किन्ही आयोजनों में पुरुषो के स्थान पर महिलाये व्यवसायिक ध्येय से भावाभिव्यक्ति के साथ गाने लगी तो ऐसी महिला गायिकाओ को तवायफ तथा गायन के ऐसे आयोजनों को मुजरा कहा जाने लगा |

यद्दपि उसके पूर्व भारत के लगभग सभी क्षेत्रो में महिलाओं द्वारा लोक गायन के साथ लोक नृत्य की प्रस्तुती का चलन था किन्तु उसकी पहिचान व्यवसायिक न होकर मात्र सांस्कृतिक कार्यक्रमों के रूप में स्थापित रही |
इधर लखनऊ के नबावो को धुर्वपद व धमार गायन की उपरोक्त शैल्या रास नही आ रही थी , कारण की उपरोक्त गायन शैली या तो संस्कृत भाषा में होते थे या फिर ब्रजभाषा में | आगे चलकर जब ब्रज भाषा में विरचित गायन की ख्याल शैली का पादुर्भाव हुआ तो गायन की उस ख्याल शैली में उन्हें सहजता एवं सहजग्भ्यता का आभाव सा लगा | अत: उर्दू भाषा में विरचित गायन की गजल विधा को वरीयता दी जाने लगी | तभी एक समस्या यह हुई की महफ़िलो में तवायफो द्वारा गजल पर्स्तुती की परम्परा अन्यत्र प्रारम्भ हो चुकी थी जिन्हें मुजरा कहा जाने लगा था | ऐसे आयोजित मुजरो को हे दृष्टि से देखा जाता | अत: लखनऊ के नवाबो ने इसके विकल्प को खोजने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया |
अन्तत: वाजिद अली शाह (१८४७-१८५६ ) के समय ख्याल एवं गजल गायकी के अनुपातिक सम्मिश्रण से बोल बनाव की ठुमरियो का पादुर्भाव हुआ एवं नवाबो के दरबारों में ठुमरी गायन परम्परा का प्रचलन शुरू हुआ | गायन की इस नयी ठुमरी शैली में ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ किन्तु उसके साथ ही बीच - बीच में उर्दू भाषा की गजलो के एकाध शेर पढ़ देने का चलन भी प्रारम्भ हो गया | कोई - कोई ठुमरी गायक विकल्प के रूप में किसी शेर के स्थान पर कोई दोहा पढ़ दिया करते थे | कालान्तर , जब ठुमरी में निहित भावो का अनुवाद नृत्य में हुआ तो उसे नृत्य की कथक शैली कहा जाने लगा |
वैसे तवायफो द्वारा गजल प्रस्तुती की प्रक्रिया में गजल में निहित शब्दार्थ एवं भावार्थ के अनुरूप अपने शरीर के विभिन्न अंगो के संचालन द्वारा भावाभिव्यक्ति की परम्परा तो पहले से ही चलन में थी और तवायफो की यही कला आगे चलकर थ्गुमरी पर भावाभिव्यक्ति करते हुए कथक विधा की सूत्रधार हुई ... सामान्य महफिल में जिसे मुजरा कहा गया , दरबारों में पहुच कर वही कथक ही उत्कृष्ट शैली कही जाने लगी |
वाजिद अली शाह के दरबार में ठुमरी एवं कथक का जमकर प्रयोग हुआ | नवाब वाजिद अली शाह स्वयम नारी पात्रो के साथ इस शैली में मृत्य किया करते थे | जहाँ तक मुजरा में गायन प्रस्तुत करने वाली तवायफो का सम्बन्ध है , उनके गायन की उत्कृष्टता में उनके गुरुजनों द्वारा दिए गये पशिक्षण का बड़ा योगदान रहा है | इन गुरुजनों को त्वाय्फी - संस्कृति में 'उस्ताद जी ' कहकर सम्बोधित किया जाता था | यद्धपि आज की परम्परा में किसी ज्ञानप्रदाता गुर्व्र को सम्मान प्रदान करने की दृष्टि से 'उस्ताद' के आगे जी लगाते हुए उन्हें 'उस्ताद जी ' कहकर सम्बोधित करते है , किन्तु पुरातन परम्परा के अंतर्गत ''उस्ताद जी '' किसी तवायफ अथवा वैश्या के प्रशिक्षक को सम्बोधित करने में प्रयुक्त था |
अपने प्रारम्भिक काल से ही आयोजित मुजरो में सामान्यता तवायफो द्वारा प्रस्तुत गायन के साथ तालमेल बैठाते हुए सारंगी और तबला नामक दो वाद्य यंत्र बजाये जाने की परम्परा रही है | ऐसे कार्यक्रमों जे जुड़े संगीतज्ञो को मिरासी कहे जाने की परम्परा चल निकली |

प्रस्तुती -- सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

साभार - हमारा लखनऊ पुस्तक माला से लेखक राम किशोर बाजपेयी

Tuesday, February 13, 2018

अदालत एक ढकोसला है ; छह साथियो का एलान 13-2-18

नौजवानों के नाम
शहीदे - आजम भगत सिंह का संदेश पुस्तक से

अदालत एक ढकोसला है ;
छह साथियो का एलान



कमिश्नर ट्रिब्यूनल
लाहौर साजिश केस , लाहौर


जनाब ,

अपने छह साथियो की ओर से , जिनमे कि मैं भी शामिल हूँ , निम्नलिखित स्पष्टीकरण इस सुनावी के शुरू में ही देना आवश्यक है | हम चाहते है कि यह दर्ज किया जाए |

हम मुकदमे की कार्यवाही में किसी भी प्रकार भाग नही लेना चाहते , क्योकि हम इस सरकार को न तो न्याय पर आधारित समझते है और न ही कानूनी तौर पर स्थापित | हम अपने विश्वास से यह घोषणा करते है कि ''समस्त शक्ति का आधार मनुष्य है | कोई व्यक्ति या सरकार किसी भी ऐसी शक्ति की हकदार नही है जो जनता ने उसको न दी हो |'' क्योकि यह सरकार इन सिद्धांतो के विपरीत है इसलिए इसका अस्तित्व ही उचित नही है | ऐसी सरकारे जो राष्ट्रों को लुटने के लिए एकजुट हो जाती है उनमे तलवार की शक्ति के अलावा कोई आधार कायम रहने के लिए नही होता | इसीलिए वे वहशी ताकत के साथ मुक्ति और आजादी के विचार और लोगो की उचित इच्छाओं को कुचलती है |
हमारा विश्वास है कि ऐसी सरकारे , विशेषकर अंग्रेजी सरकार जो असहाय और असहमत भारतीय राष्ट्र पर थोपी गयी है , गुंडों , डाकुओ का गिरोह और लुटेरो का टोला है जिसने कत्लेआम करने और लोगो को विस्थापित करने के लिए सब प्रकार की शकतिया जुटाई हुई है | शान्ति व्यवस्था के नाम पर यह अपने विरोधियो या रहस्य खोलनेवाले को कुचल देती है |
हमारा यह भी विश्वास है कि साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साजिश के अलावा कुछ नही | साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथो मनुष्य के और राष्ट्र के हाथो राष्ट्र के शोषण का चरम है | साम्राज्यवादी अपने हितो , और लुटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालयों एवं कानून को कतल करते है , बल्कि भयंकर हत्याकांड भी आयोजित करते है | अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग - जैसे खौफनाक अपराध भी करते है | जहां कही लोग उनकी नादिरशाही शोषणकारी माँगो को स्वीकार न करे या चुपचाप उनकी ध्वस्त कर देने वाली और घृणा योग्य साजिशो को मानने से इनकार कर दे तो वह निरपराधियो का खून बहाने से संकोच नही करते | शान्ति - व्यवस्था की आड़ में वे शान्ति - व्यवस्था भंग करते है | भगदड़ मचाते हुए लोगो की हत्या , अर्थात हर सम्भव दमन करते है |
हम मानते है कि स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है | हर मनुष्य को अपने श्रम का फल पाने - जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र अपने मुल्भुँत प्राकृतिक ससाधनो का पूर्ण स्वामी है | अगर कोई सरकार जनता को उसके मुल्भुँत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नही बल्कि आवश्यक कर्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को समाप्त कर दे | क्योकि ब्रिटिश सरकार इन सिद्धांतो , जिनके लिए हम लड़ रहे है , के बिलकुल विपरीत है , इसीलिए हमारा दृढ विश्वास है कि जिस भी ढंग से देश में क्रान्ति लायी जा सके और इस सरकार का पूरी तरह खात्मा किया जा सके , इसके लिए हर प्रयास और अपनाए गये सभी ढंग नैतिक स्टारआर उचित है | हम वर्तमान ढाँचे के सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रो में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में है | हम वर्तमान समाज को पुरे तौर पर एक नये सुगठित समाज में बदलना चाहते है | इस तरह मनुष्य के हाथो मनुष्य का शोषण असम्भव बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रो में पूरी स्वतंत्रता विश्वसनीय बनाई जाए | जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नही जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नही होता , हम महसूस करते है कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय - संकट में है |
जहां तक शांतिपूर्ण या अन्य तरीको से क्रांतिकारी आदर्शो की स्थापना का सम्बन्ध है , हम घोषणा करते है कि इसका चुनाव तत्कालीन शासको की मर्जी पर निर्भर है | क्रांतिकारी अपने मानवीय प्यार के गुणों के कारण मानवता के पुजारी है | हम शाश्वत और वास्तविक शान्ति चाहते है , जिसका आधार न्याय और समानता है | हम झूठी और दिखावटी शान्ति के समर्थक नही जो बुजदिली से पैदा होती है और भालो और बन्दूको के सहारे जीवित रहती है | क्रांतिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी चरम आवश्यकता से पैदा होता है और आखरी दांव के तौर पर होता है | हमारा विश्वास है कि अमन और कानून मनुष्य के लिए है , न कि मनुष्य अमन और कानून के लिए |
फ्रांस के उच्च न्यायाधीश का यह कहना उचित है कि कानून की आंतरिक भावना स्वतंत्रता समाप्त करना या प्रतिबन्ध लगाना नही , वरन स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना और उसे आगे बढ़ाना है | सरकार को कानूनी शक्ति बनाये गये उन उचित कानूनों से मिलेगी जो केवल सामूहिक हितो के लिए बनाये गये है , और जो जनता की इच्छाओं पर आधारित हो , जिनके लिए यह बनाये गये है | इससे विधायको समेत कोई भी बहार नही हो सकता |
कानून की पवित्रता तक रखी जा सकती है जब तक वह जनता के दिल यानी भावनाओं को प्रकट करता है | जब यह शोषणकारी समूह के हाथो में एक पुर्जा बन जाता है तब अपनी पवित्रता और महत्व को खो बैठता है | न्याय प्रदान करने के लिए मूल बात यह है कि हर तरह के लाभ या हित का खात्मा होना चाहिए | ज्यो ही कानून सामजिक आवश्यकताओ को पूरा करना बंद कर देता है त्यों ही जुल्म और अन्याय को बढाने का हथियार बन जाता है | ऐसे कानून को जारी रखना सामूहिक हितो पर विशेष हितो की दम्भपूर्ण जबरदस्ती के सिवाए कुछ नही है | वर्तमान सरकार के कानून विदेशी शासन के हितो के लिए चलते है और हम लोगो के हितो के विपरीत है | इसलिए इनकी हमारे उपर किसी भी प्रकार की सदाचारिता लागू नही होती |
अत: हर भारतीय की यह जिम्मेदारी बनती है कि इन कानूनों को चुनौती दे और इनका उल्घं करे | अंग्रेज न्यायालय , जो शोषण के पुर्जे है , न्याय नही दे सकते | विशेषकर राजनैतिक क्षेत्रो में , जहां सरकार और लोगो के हितो का टकराव है | हम जानते है कि ये न्यायालय सिवाए न्याय के ढकोसले के है और कुछ नही है
इन्ही कारणों से हम इसमें भागीदारी करने से इनकार करते है और इस मुकदमे की कार्यवाही में भाग नही लेंगे |
5-5-30

जज ने यह नोट किया - यह रिकार्ड में तो रखा जाए लेकिन इसको कापी न दी जाए , क्योकि इसमें कुछ अनचाही बाते लिखी है |


प्रस्तुती सुनील दत्ता -- स्वतंत्रत पत्रकार - समीक्षक

Monday, February 12, 2018

अछूत समस्या ---------12-2-18

यह लेख जितना उस वक्त मौजू था , आज भी उतना ही मौजू है

अछूत -- समस्या

{ काकीनाड़ा में 1923 में कांग्रेस - अधिवेशन हुआ | मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में आजकल की अनुसूचित जातियों को , जिन्हें उन दिनों 'अछूत 'कहा जाता था , हिन्दू और मुस्लिम मिशनरी संस्थाओं में बात देने का सुझाव दिया |
हिन्दू और मुस्लिम आमिर लोग इस वर्ग - भेद को पक्का करने के लिए धन देने को तैयार थे |
इस प्रकार अछूतों के यह 'दोस्त ' उन्हें धर्म के नाम पर बाटने की कोशिशे करते थे | उसी समय जब इस मसले पर बहस का वातावरण था , 'भगत सिंह ने ' अछूत का सवाल ' नामक लेख लिखा | इस लेख में श्रमिक वर्ग की शक्ति व सीमाओं का अनुमान लगाकर उसकी प्रगति के लिए ठोस सुझाव दिए गये है | भगत सिंह का यह लेख जून , १९२८ के कीर्ति में ' विद्रोही ' नाम से प्रकाशित हुआ था |}
हमारे देश - जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नही हुए | यहाँ अजब - अजब सवाल उठते रहते है | एक अहम् सवाल अछूत - समस्या है | समस्या यह है कि ३० करोड़ की जनसख्या वाले देश में जो ६ करोड़ लोग अछूत कहलाते है , उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ! उनके मंदिरों में प्रवेश से देवगन नाराज हो उठेंगे ! कुए से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा ! ये सवाल बीसवी सदी में किये जा रहे है , जिन्हें कि सुनते ही श्रम आती है |
हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है , लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते है | जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है | उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियो के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी | आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटाकर क्रान्ति के लिए कमर कसी हुई है | हम सदा ही आत्मा - परमात्मा के वजूद को लेकर चिंतित होते तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए है कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा ? वे वेद - शास्त्र पढने के अधिकारी है अथवा नही हा? हम उलाहना देते है कि हमारे साथ विदेशो में अच्छा सलूक नही होता | अंग्रेजी शासन हमे अंग्रेजो के समान नही समझता | लेकिन क्या हमे यह शिकायत करने का अधिकार है ?
सिंध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने , जो बम्बई कौसिल सदस्य है , इस विषय पर १९२६ में खूब कहा --- ''If the Hindu society refuses to allow other human beings , Fellow creatuures so that to attend public schools , and if ... the president of local board representing so many lakhs of people in this houses refuses to allow his fellows and brothers the elementary human right of having water to drink , what right have they to ask for more rights from the bureaucracy ? Before we accuse people coming from other lands , we should see how we ourselves behave toward our own people .... How can should we ask for greater politcal rights when we ourselves deny elementary rights of human beings ..''
वे कहते है कि जब तुम एक इंसान को पीने के लिए पानी देने से भी इनकार करते हो , जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढने नही देते तो तुम्हे क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो ? जब तुम एक इंसान को समान अधिकार देने से भी इनकार करते हो तुम अधिक राजनैतिक अधिकार मागने के कैसे अधिकारी बन गये ?
बात बिलकुल खरी है | लेकिन यह क्योकि एक मुस्लिम ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो , वह उन अछूतों को मुसलमान बनाकर अपने में शामिल करना चाहते है !
जब तुम उन्हें इस तरह पशुओ से भी गया - बीता समझोगे तो वह जरुर ही दुसरे धर्मो में शामिल; हो जायेगे , जिनमे उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे , जहां उनसे इंसानों - जैसा व्यवहार किया जाएगा | फिर यह कहना कि देखो जी , ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुक्सान पहुचा रहे है , व्यर्थ होगा |
कितना स्पष्ट कथन है , लेकिन यह सुनकर सभी तिलमिला उठते है | ठीक इसी तरह की चिंता हिन्दुओ को भी हुई | सनातनी पंडित भी कुछ - न - कुछ इस मसले पर सोचने लगे | बीच - बीच में बड़े 'युगांतकारी ' कहे जाने वाले भी शामिल हुए |
पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय -- जो कि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले अ रहे है -- की अध्यक्षता में हुआ , तो जोरदार बहस छिड़ी | अच्छी नोकझोक हुई | समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवित धारण करने का हक है अथवा नही ? तथा क्या उन्हें वेद - शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है ? बड़े - बड़े समाज - सुधारक तमतमा गये , लेकिन लालजी ने सबको सहमत कर दिया तथा यह दो बाते स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली | वरना जरा सोचो , कितनी श्रम की बात होती | कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है | हमारी रसोई में नि:संग फिरता है , लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है | इस समय मालवीय जी - जैसे बड़े समाज सुधारक , अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या - क्या पहले एक मेहतर के हाथो गले में हार डलवा लेते है , लेकिन कपड़ो सहित स्नान किये बिना स्वंय को अशुद्द समझते है ! क्या खूब यह चाल है | सबको प्यार करनेवाले भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर बना है लेकिन वहाँ अछूत जा घुसे तो वह मंदिर अपवित्र हो जाता है | भगवान रुष्ट हो जाता है ! घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते है ? तब हमारे इस रवैये में कृतघ्नता की भी हद पायी जाती है | जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध करते है उन्हें ही हम दुरदुराते है | पशुओ की हम पूजा कर सकते है , लेकिन इन्सान को पास नही बिठा सकते !
आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है | उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है | देश में मुक्ति - कामना जिस तरह बढ़ रही है , उसमे साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुचाया हो अथवा नही लेकिन एक लाभ जरुर पहुचाया है | अधिक अधिकारों की मांग के लिए अपनी - अपनी कौम की संख्या बढाने की चिंता सभी को हुई है | मुस्लिमो ने जरा ज्यादा जोर दिया | उन्होंने अछूतों को मुसलमान बनाकर अपने बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए | इससे हिन्दुओ के अहम् को चोट पहुची | स्पर्धा बढ़ी | फसाद भी हुए | धीरे - धीरे सिखों ने भी सोचा कि हम पीछे न रह जाए | उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया |
हिन्दू - सिखों के बीच अछूतों के जनेऊ उतरने या केश कटवाने के सवालों पर झगड़े हुए | अब तीनो कौमे अछूतों को अपनी - अपनी ओर खीच रही है | इसका बहुत शोर - शराबा है | उधर ईसाई चुपचाप उनका रूतबा बधा रहे है | चलो , इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है |
इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमे फसाद हो रहे है तथा उन्हें हर कोई अपनी - अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही क्यों न सगठित हो जाए ? इस विचार के अमल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा न हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफी हाथ था | 'आदि धर्म मंडल ' जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम है |
अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो ? इसका जबाब बड़ा अहम है | सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान है तथा न तो कोई जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य - विभाजन से | अर्थात क्योकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है , इसलिए जीवन - भर मैला साफ़ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास का कम पाने का उसे कोई हक नही है , ये बाते फिजूल है | इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कहकर दुत्कार दिया एवं निम्न कोटि के कार्य करवाने लगे | साथ ही यह भी चिंता हुई कि कही ये विद्रोह न कर दें , तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापो का फल है | अब क्या हो सकता है ? चुपचाप दिन गुजारो ! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शांत करा गये | लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया | मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया | आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया | बहुत दमन अन्याय किया गया | आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है |
इसके साठग एक दूसरी गडबडी हो गयी | लोगो के मनो में आवश्यक कार्यो के प्रति घृणा पैदा हो गयी | हमने जुलाहे को भी दुत्कारा | आज कपड़ा बुननेवाला अछूत समझा जाता है | यु पी की तरफ कहार को भी अछूत समझा जाता है | इससे बड़ी गड़बड़ पैदा हुई | ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रूकावटे पैदा हो रही है |
इन तबको को अपने समक्ष रखते हुए हमे चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहे और न समझे | बस , समस्या हल हो जाती | नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है , वह काफी अच्छा है | जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापो के लिए क्षमा - याचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने - जैसा इंसान समझना , बिना अमृत छकाये , बिना कलमा पढाये या शुद्धि किये उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना यही उचित ढंग है | और आपस में खीचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक न देना , कोई ठीक बात नही है |
जब गाँवों में मजदूर - प्रचार शुरू हुआ उस समय किसानो को सरकारी आदमी यह बात समझाकर भडकाते थे की देखो , यह भंगी - चमारो को सर पर चढा रहे है और तुम्हारा काम बंद करावेंगे | बस किसान इतने में भडक गये | उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नही सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबो को नीच और कमिं कहकर अपनी जुटी के नीचे दबाए रखना चाहते है | अक्सर कहा जाता है किवह साफ़ नही रहते | इसका उत्तर साफ़ है -- वे गरीब है | गरीबी का इलाज करो | ऊँचे - ऊँचे कुलो के गरीब लोग भी कोई कम गंदे नही रहते | गंदे काम करने का बहाना भी नही चल सकता , क्योकि माताए बच्चो का मैला साफ़ करने से मेहतर तथा अछूत तो नही हो जाती |
लेकिन यह काम उतने समय तक नही हो सकता जितने समय तक कि अछूत कौमे अपने आप को सगठित न कर लें | हम तो समझते है कि उनका स्वंय को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमो के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना बहुत आशाजनक संकेत है | या तो साम्प्रदायिक भेद का झझंट ही खतम करो , नही तो उनके अधिकार उन्हें दे दो | कौसिलो और असेम्बलियो का कर्तव्य है किवे स्कूल - कालेज , कुए तथा सडक के उपयोग की पूरी स्वतंत्रता उन्हें दिलाये | जबानी तौर पर ही नही , वरन साथ ले जाकर उन्हें कुँओं पर चढाये | उनके बच्चो को स्कुलो में प्रवेश दिलाये | लेकिन जिस लेजिस्लेटिव में बाल - विवाह के विरुद्ध पेश किये बिल तथा मजहब के बहाने हाय - तौबा मचाई जाती है , वहाँ वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते है ?
इसलिए हम मानते है कि उनके जन - प्रतिनिधि हो | वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगे | हम तो साफ़ कहते है कि उठो अछूत कहलाने वाले असली जन - सेवको तथा भाइयो उठो ! अपना इतिहास देखो | गुरु गोविन्द सिंह की फ़ौज की असली शक्ति तुम्ही थे ! सिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके , जिस कारण उनका नाम आज भी ज़िंदा है | तुम्हारी कुरबानिया स्वर्णाक्षरो में लिखी हुई है | तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखो में बढ़ोत्तरी करके और जिन्दगी सम्भव बनाकर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो , उसे हम लोग नही समझते | लैंड -एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नही खरीद सकते | तुम पर इतना जुल्म हो रहा है की मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती है --- उठो ' अपनी शक्ति पहचानो | संगठनबद्ध हो जाओ | असल में स्वंय कोशिशे किये बिना कुछ भी न मिल सकेगा |
'Those who would be free must themselve strike the blow "
स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता चाहनेवालो को यत्न करना चाहिए | इंसान की धीरे धीरे कुछ ऐसी आदते हो गयी है कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है , लेकिन जो उनके मातहत हुई उन्हें है उन्हें वह अपनी जुटी के नीचे ही दबाए रखना चाहतीहै | कहावत है 'लातो के भुत बातो से नही मानते ' अर्थात सन्गठनबद्ध हो अपने पैरो पर खड़े होकर पुरे समाज को चुनौती दे दो |
तब देखना , कोई भी तुम्हे तुम्हारे देने से इनकार करने की जुर्रत न कर सकेगा | तुम दुसरो की खुराक मत बनो | दुसरो के मुंह की ओर न ताको | लेकिन ध्यान रहे , नौकरशाही के झांसे में तुम मत फसना | यह तुम्हारी कोई सहायता नही करना चाहती ,बल्कि तुम्हे अपना मोहरा बनाना चाहती है | यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी ग्फुलामी और गरीबी का असली कारण है | इसीलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना | उसकी चालो से बचना | तब सब कुछ ठीक होगा | तुम असली सर्वहारा हो ... सगठनबद्ध हो जाओ ! तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी | बस गुलामी की जजीरे कट जायेगी | उठो और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो | धीरे धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नही बन सकेगा | सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा कर दो तथा राजनितिक और आर्थिक क्रान्ति के लिए कमर कस लो | तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो , वास्तविक शक्ति हो , सोये हुए शेरो ! उठो , और बगावत खड़ी कर दो |

पर्स्तुती -- सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक