Friday, March 13, 2015

आस्था ----- 14-3-15

आस्था -----


भगवान बुद्द ने अपने शिष्यों को आस - पास के क्षेत्र में धर्मचक्र - प्रवर्तन के लिए भेजा परन्तु  किसी को भी विशेष सफलता नही मिली | उल्टे उन्हें कई जगह उपेक्षा , अवमानना का शिकार होना पडा | उन्होंने लौटकर तथागत के समक्ष अपनी व्यथा व्यक्त की |  बुद्द ने अपने मुख्य शिष्यों  को पास बुलाया और कहा -- क्या तुममे से किसी के पास इस समस्या का समाधान है ? इस पर महाकश्यप ने कहा -- ' भगवान , यदि उचित समझे तो मुझे इस सत्कार्य की आज्ञा दे | बुद्द ने प्रसन्न भाव से हामी भर दी | इसके बाद महाकश्यप अपने कुछ विश्वस्त  सहयोगियों को लेकर उन गाँवों की ओर चल दिए , जहा पहले सभी को उपेक्षा मिली थी | इस बात को महीनों बीत गये | महाकश्यप की कोई खोज - खबर नही मिली | एक दिन जब भगवान बुद्द अपने शिष्यों के साथ जैतवन में बैठे हुए थे , तभी ग्रामीणों का एक समूह उनके समक्ष उपस्थित हुआ | उन्होंने फूलो के हार   पहने महाकश्यप को अपने कन्धो पर उठा रखा था | गांववालों ने बुद्द से कहा -- भगवान , आपके द्वारा उपदेशीय  धर्म कितना श्रेष्ठ , महान व जीवनदायी है , यह हमे महाकश्यप के कारण पता चला | तब बुद्द ने उनसे पूछा ' इन्होने किस विधि से तुम्हे उपदेश दिया ? इस पर गाँव के मुखिया ने कहा -- जब ये हमारे गाँव आये तो सभी ने इनकी उपेक्षा की , कटु वचन बोले | परन्तु ये अविचलित रहे | इन्होने अपने साथियो  के साथ वही एक मंदिर में डेरा जमाते हुए हमारी समस्याए जानी , फिर धर्म की सीख  देने के बजाए हमारे गाँव की साफ़ - सफाई में लग गये | घर - घर जाकर इन सबने बीमार लोगो के हाल - चाल पूछे , उनके लिए औषधि की व्यवस्था की | बच्चो की शिक्षा की स्थिति जान उसके बारे में समुचित इंतजाम किया | दिन में ये सभी करते और रात में अपनी साधना में लग जाते | धीरे - धीरे हमारा विश्वास इन पर जागा | हां में बदला और आस्था सहयोग में बदल गयी | फिर सहयोग अपने आप ही श्रद्दा में बदल गयी | हम सबके आग्रह से धर्मोपदेश आरम्भ किया |

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (15-03-2015) को "ख्वाबों में आया राम-राज्य" (चर्चा अंक - 1918) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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