एक बार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और अंग्रेजी के महान कवि विलियम बटलर यीट्स के मध्य इस बात को लेकर चर्चा हो रही थी कि श्रेष्ठ काव्य का सृजन कैसे होता है | महाकवि यीट्स ने श्रेठ काव्य के बारे में अपने विचार रखते हुए बोला --- ' कविता तो एक प्रवाह है , ह्रदय के भावनात्मक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है | कविता में व्यक्ति के मन के भाव प्रगट होते है | दूसरे शब्दों में कहे तो भावनात्मक अवस्था में कविता फूट पड़ती है , इसके स्वर माधुर्य निखरने लगते है और अपनी लय के संग प्रवाहित होने लगते है | इस प्रवाह की लय बनी रहनी चाहिए , तभी श्रेठ कविता का सृजन होता है | ' गुरुदेव ने उनकी बातो से सहमति जताते हुए कहा -- ' तुमने सही कहा मित्र , काव्य तो वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए | किन्तु यहाँ पर मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि जब कवि अपनी चेतना के शिखर पर आरूढ़ होता है तो उस समय कविता रूपी उद्दार उसकी चेतनात्मक लौ को स्पर्श करते है | फिर वहा से कविता नि:सृत होती है , झरनों के समान झरती है | ऐसी कविता के माध्यम से चेतना के उच्च स्तर तक पँहुचा जा सकता है | ऐसी कविता की हरेक पंक्तिया मन्त्र बन जाती है | यदि मैं भारतीय महाकाव्यों की बात करूँ तो ऋग्वेद ऐसा प्रथम महाकाव्य है , जिसकी हरेक रिचाए छंदबद्द एवं मंत्रात्मक है | ' इसके बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यीट्स से सवालिया लहजे में कहा -- ' आप यह तो जानते ही होंगे कि इन ऋचाओं के रचयिता को ऋषि कहा जाता है ? यीट्स बोले -- ' ऋषि ही कवि होते है | इन्हें तो सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है | ' रवीन्द्रनाथ ने कहा -- ' हाँ मित्र , ऋषि विलक्षण कवि होते है , जिनकी दृष्टि प्रकृति के आर - पार होती है | वे द्रष्टा होते है , जो जीव , प्रकृति एवं परमात्मा के दिव्य सम्बन्धो के अनुभव को कहते है | यही दिव्य एवं परम अनुभव छंदबद्द होकर प्रवाहित होता है और अपने सानिध्य में आने वालो को दिव्य ऊर्जा से सरोबोर कर देता है | यही सच्ची एवं श्रेष्ठ कविता है | रामायण . महाभारत व गीता जैसे ग्रन्थ इसी श्रेणी में आते है | ' रवीन्द्रनाथ की बाते यीट्स के ह्रदय में उतर रही थी और वे अनुभव कर रहे थे कि जब तक मनुष्य भावनाओं की श्रेष्ठता तक नही पहुचेगा , तब तक उसके जीवन में समस्वरता नही आएगी और न ही वह किसी काव्य प्रवाह का माध्यम बन सकेगा |
----------------- कबीर
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