Thursday, January 24, 2019

हसीद दर्शन का प्रकाश स्तम्भ -------------- बालशेम तोव


हसीद दर्शन का प्रकाश स्तम्भ -------------- बालशेम तोव

बालशेम की कहानियों से जिस हसीद पंथ का निर्माण हुआ वह एक बहुत सुन्दर खिलावट है जो आज तक हुई है | ह्सीदो की तुलना में यहूदियों ने कुछ भी नही किया है | हसीद पंथ एक छोटा -- सा झरना है -- अभी भी जीवित , अभी भी खिलता हुआ |

हसीद की धारा कुछ चंद रहस्यदर्शियो की रहस्यपूर्ण गहराइयो से पैदा हुई | बालशेम उनमे सबसे प्रमुख है | हसीद पंथ का जो भी दर्शन है वह शाब्दिक नही है , बल्कि उसके रहस्यदर्शियो के जीवन में , उनके आचरण में प्रतिबिम्बित होता है | इसलिए उनका साहित्य सदगुरु के जीवन की घटनाओं की कहानियों से बना है | हसीदो के गुरु को जाधिकिम कहा जाता है | हसीदो की मान्यता है कि ईश्वर का प्रकाश स्तम्भ स्वभावत: दिव्य प्रकाश से रोशन है |

बालशेम तोव ह्सीदियो का सर्व प्रथम सदगुरु है | बालशेम तोव असली नाम नही है , वह एक खिताब है जो इजरेलेबन एलिएजर नाम के रहस्यदर्शी को मिला हुआ था |
हसीद परम्परा में उसे बेश्त कहा जाता है | इसका अर्थ है : दिव्य नामो वाला सदगुरु बालशेम एक यहूदी रबाई था जिसके पास गुह्य शक्तिया थी | वह गाँव – गाँव घूमता था और अपनी स्वास्थ्यदायी आध्यत्मिक शक्तियों से लोगो को स्वस्थ करता था | उसने अपनी शक्तिया तब तक छुपा रखी थी जब तक कि खुद को आध्यत्मिक सदगुरु घोषित नही किया | वह किस्से – कहानियों में अपनी बात कहता था | हसीद साहित्य में बहुत गुरु गम्भीर ग्रन्थ नही है | हसीद मिजाज यहूदियों से बिलकुल विपरीत है | यहूदी लोग गम्भीर और व्यवहारिक होते है , और हसीद मस्ती और उन्मादी आनन्द में जीते है | हसीदो को ‘ प्रज्वलित आत्माए “ कहा जाता है |

हसीद कहानियो को बाहर से समझा नही जा सकता , उनके भीतर प्रवेश किया जाता है , तब कही वे समझी जाती है | लगभग दो शताब्दियों तक इजरेल में हसीद कहा निया पीढ़ी – दर – पीढ़ी सुनाई जाती रही | बालशेम कहता था , कहानी इस ढंग से कही जानी चाहिए की वह एक मार्गदर्शन बन जाए | कहानी कहते वक्त बालशेम कूदता –फाद्ता, नाचता था | ये कहानिया बौद्दिक नही है , उसके रोये – रोये प्रस्फुटित होती है | हसीदो का मूल सिद्दांत है --- ऐसा नही है कि परमात्मा है जो कुछ है , परमात्मा ही है | बालशेम परमात्मा के प्रेम से आविष्ट हो जाता था , इतना अधिक की उसकी जबान खामोश हो जाती थी , उसके स्मृति पटल से सब कुछ मिट जाता था | वह रौशनी का एक खाली स्तम्भ हो जाता | बालशेम ने विद्वान् और पंडितो की प्रतिभा को झकझोरा | उसका योगदान यह है कि दींन – दरिद्र साधारण जनों के मुरझाये , कुचले हुए दिलो में दिव्य प्रेम की आग जला सका |
बालशेम बच्चो से बेहद प्यार करता था | दूर – दराज से माँ – बाप अपने बच्चो को बालशेम के पास लाते थे | बालशेम उनका शिक्षक नही , दोस्त बन जाता था | उन्हें उपदेश नही देता , उनके प्राणों में नया जीवन फूंक देता था | उसमे बच्चो जैसी मासूमियत थी | उसकी कोई गद्दी नही थी , न कोई पीठ थी , लेकिन जिस शान के साथ जन साधारण के ह्रदय सिहासन पर विराजमान था , वैसा कोई सम्राट भी कभी नही होगा |

ओशो का नजरिया ---

यह ज्ञात नही है कि परम्परागत , सनातन यहूदी धर्म में भी कुछ महान बुद्दत्व प्राप्त सदगुरु पैदा हुए है , कुछ तो बुद्दत्त्व के पार चले गये | उनमे से एक है बालशेम तोव |
तोव उसके शहर का नाम था | उसके नाम का मतलब इतना ही हुआ तोव शहर का बालशेम | इसलिए हम उसे केवल बालशेम कहेगे |
बालशेम तोव ने कोई शास्त्र नही लिखे | रहस्यवाद के जगत में शास्त्र एक वर्जित शब्द है | लेकिन उसने कई खुबसूरत कहानिया कही है | वे इतनी सुन्दर है की उनमे से मैं तुम्हे सुनाना चाहता हूँ | यह उदाहरण सुनकर तुम उस आदमी की गुणवत्ता का स्वाद ले सकते हो |

बालशेम के पास एक स्त्री आई , वह बाँझ थी , उसे बच्चा चाहिए था | वह निरंतर बालशेम के पीछे पड़ी रही |

‘’ आप आशीर्वाद दे तो सब कुछ हो सकता है | मुझे आशीर्वाद दे , मैं माँ का गौरव प्राप्त करना चाहिती हूँ |

आखिरकार तंग आकर --- हाँ , सताने वाली स्त्री से बालशेम भी तंग आ जाते है – वे बोले , बेटा चाहिए या बेटी ? 
‘ निश्चित ही बेटा | “ 
बालशेम ने कहा , ‘ फिर यह कहानी सुनो | मेरी माँ का भी बच्चा नही था और हमेशा गाँव के र्बाई के पीछे पड़ी रहती | आखिर र्बाई बोला , ‘ एक सुन्दर टोपी ले आ | ‘ 
मेरी माँ ने सुन्दर टोपी बनाई और र्बाई के पास ले गयी | वह टोपी इतनी सुन्दर बनी की उसे बनाकर ही वह त्रिपत हो गयी | और उसने र्बाई से कहा ‘ ‘ मुझे बदले में कुछ नही चाहिए | आपको इस टोपी में देखना ही बहुत अच्छा लग रहा है | आप मुझे धन्यवाद न दे , मैं ही आपको धन्यवाद दे रही हूँ | ‘
और मेरी माँ चली गयी | उसके बाद वह गर्भवती हुई और मेरा जन्म हुआ ‘ बालशेम ने कहानी पूरी की |

इस स्त्री ने कहा ‘’ बहुत खूब ‘’ अब कल मैं सुन्दर टोपी ले आती हूँ | दुसरे दिन वह टोपी लेकर आई , बालशेम ने उसे ले लिया और धन्यवाद तक नही दिया | स्त्री प्रतीक्षा करती रही , फिर उसने पूछा , ‘’ बच्चे के बारे में क्या ?
बालशेम ने कहा , ‘ बच्चे के बारे में भूल जाओ | टोपी इतनी सुन्दर है की मैं आभारी हूँ | मुझे धन्यवाद कहना चाहिए | वह कहानी याद है ? उस स्त्री ने बदले में कुछ न माँगा इसलिए उसे बच्चा मिला – और वह भी मेरे जैसा बच्चा | ‘ 
लेकिन तुम कुछ लेने की चाहत से आई हो इस छोटी – सी टोपी के बदले तू बालशेम जैसा बेटा चाहती है ?
कई बाते ऐसी है जो केवल कहानियो द्वारा कही जा सकती है | बालशेम ने बुनियादी बात कह दी : मांग मत , और मिल जाएगा | ‘ ----------------- ओशो

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-01-2019) को "जन-गण का हिन्दुस्तान नहीं" (चर्चा अंक-3227) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. आभार गुरु जी

    ReplyDelete