Thursday, August 25, 2016

मुरदन के साथे व्यापार – मगरुवा ---- 25-8-16

अपना शहर मगरुवा –

कल घूमते घूमते राजघाट पहुच गया और चुपचाप एकांत में बैठकर वहा का तमाशा देखने लगा , बहुत से लोग उस दिन आये थे दुनिया से आखरी विदाई लेने अलग अलग परिवारों से उनकी बाते भी बड़ी अजीब लगी |
एक मुर्दा फूंकने आया युवक बोला सरवा जियत रहे त गांड में पैना कइले रहे सारा मरले के बाद भी छ: घंटा लेई जरे में
वही दूसरी तरफ दुसरे मुर्दे के साथ आये घर के लोग उसके बेटे को समझा रहे थे अब त काटा निकल गएल ना अब जल्दी से जल्दी कागज पे आपन नाम चढा ला अउर जमीनिया फलाने के बेचके खूब पइसा बना ला फिर दुकान कर ला –
वही एक तीसरी लाश रखी थी उस लाश के साथ मात्र पांच लोग थे | यह था देश का आम आदमी शायद घर परिवार के रहे होंगे वो आपस में बतिया रहे थे इहा ले त आ गयनी अब लाश कैसे फूक्ल जाई इसी उधेड़ बुन में उलझा था उस परिवार के लोग , तभी मगरुवा बोल पडा राजघाट के मलकिन से कहा उ कउनो प्रबंध कर दीहें , उन लोगो ने उससे जाकर बात किया उसने प्रबंध करा दिया उस आदमी को भी चिता नसीब हो गयी | मगरू मन ही मन सोचने लगा जब वो अपने चाचा को मणिकर्णिका ले गया था वहा उसे देखा और सूना यहाँ अंतिम संस्कार में भी हर जगह कमीशन तय है जिस टिकटि पर आदमी अंतिम यात्रा करता है वह से लेकर अंतिम क्रिया तक में कमिशन ही कमिशन है लाश जलाने वाले को पाँच रुपया टिकटी के बाँस दस रुपया जरले के बाद बचल लकड़ी के बोटा के डोम के घर लेगयेले के पन्द्रह रुपया और जउन पंडित आवे ने उ दुकानदार से पांच रुपया कमिशन लेवेला | गजब होग्येल दुनिया जहा मरले के बाद भी अदमी बेचल जात बा |
अब सूना आजमगढ़ में राजघाट के कहानी इहा के डॉम के पास दुई गो लक्जरियस चार चक्का बा दुई गो एम्बुलेंस है यार सोचन तू बतावा इतना पैसा त एकरे ह और आम आदमी के पास उहके फुक्ले के पैसा ना बा का यही खातिर भगत सिंह , अशफाक उल्ला , चन्द्रशेखर राजगुरु क्रांतिवीर शहादत देहले रहने |

मुरदन के साथे व्यापार – मगरुवा

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (27-08-2016) को "नाम कृष्ण का" (चर्चा अंक-2447) पर भी होगी।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आभार सुशिल जी जी

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