Monday, November 19, 2018

किसानो का राजधानी --, मार्च - प्रदर्शन

किसानो का राजधानी --, मार्च - प्रदर्शन

{क्या यह किसानो को उनकी समस्याओं मांगो के प्रति जागरूक , संगठित व आंदोलित कर सकेगा ? }

किसानो की समस्याओं व मांगो को लेकर किये जाते रहे प्रचारों में आते रहे किसान मोर्चो आंदोलनों से सार्थक परिणाम निकलने की कोई आशा नजर नही आ रही है | इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि वर्तमान केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकारों के साथ पिछले 20 - 25 सालो से सत्तासीन रही सभी केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारे कृषि क्षेत्र की उपेक्षा के साथ कृषि व किसान के संकटो , समस्याओं को बढ़ावा देती रही है | इसका परिणाम खेती किसानी में बढती टूटन के साथ देश के विभिन्न भागो में बढ़ते रहे किसान आत्महत्याओं के रूप में हमारे सामने आता रहा है | विपक्ष में बैठी पार्टियों द्वारा कृषि एवं किसानो की समस्याओं संकटों पर रोना - धोना मचाने और फिर उन्ही पार्टियों के सत्ता में आने के बाद कृषि समस्याओं संकटो को नीतिगत एवं योजनाबद्ध रूप से बढाने का काम पिछले 25 सालो से लगातार एवं खुले रूप में किया जा रहा है |
निसंदेह विभिन्न सत्ताधारी पार्टियों की सत्ता सरकारों के कृषि व किसान विरोधी क्रिया - कलाप इन सभी पार्टियों के उच्चस्तरीय नेताओं द्वारा वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्तावों के लागू किये जाने के साथ खुले आम बढाये जाते रहे है | इन नीतियों - प्रस्ताव के अंतर्गत विदेशी एवं देशी पूजी के धनाढ्य मालिको को अधिकाधिक छुट व अधिकार देने के साथ आम किसानो एवं अन्य श्रमजीवी हिस्सों के छुटो अधिकारों को लगातार काटा घटाया जाता रहा है |कृषि लागत के मालो मशीनों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के साथ कृषि उत्पादों के मूल्य भाव बिक्री बाजार को तुलनात्मक रूप में घटाया गिराया जाता रहा है |

कृषि व्यव के लिए कृषि ऋण की मात्रा को सभी पार्टियों की सरकारों द्वारा प्रमुखता से बढ़ावा दिया जाता रहा है |सार्वजनिक या सरकारी सहायता सहयोग बढाये बिना ही कृषि ऋण पर दी जाती व्याज सब्सिडी को तथा कभी कभार कृषि ऋण माफ़ी को ही बड़ी सरकारी सहयाता के रूप में प्रचार किया जाता रहता है | नामी गिरामी किसान सगठनों के नेताओं एवं किसान मार्च आन्दोलन के संयोजको द्वारा भी इन मुद्दों को लेकर गाँवों में रह रहे किसानो को जागरूक व संगठित करने का कोई ठोस प्रयास नही चल रहा है | हाँ , इन किसान सगठनों और संयोजको समितियों के नेताओं द्वारा अपने समर्थक किसान व गैर किसान हिस्सों के साथ मुख्यत: कृषि ऋण माफ़ी एवं कृषि उत्पादों की मूल्य वृद्धि को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में खासकर राजधानी नगरो में जलूस प्रदर्शन जरुर किया जाता रहा है | पिछले दो सालो में दिल्ली मार्च , मुंबई मार्च एवं अन्य राजधानी नगरो में मार्च के साथ विभिन्न प्रान्तों में छिटपुट एवं बहुप्रचारित किसान आंदोलनों का ऐसा ही परीलक्षण होता रहा है | फलस्वरूप आम किसानो के बढ़ते रहे संकटों समस्याओं में तो कोई कमी नही हुई और न वह हो ही सकती थी | पर इन किसान सगठनों एवं संयोजक समितियों के नेताओं का नाम जरुर आगे बढ़ गया | इन आंदोलनों के अगुआ एवं प्रवक्ता के रूप में उनका रूतबा और चढ़ गया | बताने की जरूरत नही कि इन आंदोलनों प्रदर्शनों का यह एक अघोषित लक्ष्य भी रहा है | लेकिन इससे यह बात भी साफ़ है कि इस लक्ष्य के साथ आम किसानो को जागरूक एवं सगठित करने का काम नही हो सकता और हो भी नही रहा है | इसीलिए विभिन्न क्षेत्रो के किसानो के हो रहे बहुप्रचारित मार्चो - प्रदर्शनों को किसानो के वास्तविक आन्दोलन के रूप में देखना तब तक ठीक नही है , जब तक यह आन्दोलन किसानो के व्यापक हितो , समस्याओं एवं मांगो को लेकर उन्हें जागरूक नही करता | इस जागरूकता के साथ किसानो को सगठित करने के काम को प्रमुखता नही देता उसका विस्तार नही करता | इसीलिए इन किसान नेताओं और संयोजको को यह बात भी दिखाई नही पड़ती की आम किसान समुदाय इन आयोजित किसान मार्चो - प्रदर्शनों के जरिये किसान के रूप में सगठित होने कहीं ज्यादा धर्म , जाति, क्षेत्र आदि राजनितिक रुझानो पहचानो , गोलबंदियो में सगठित होता रहा है |इन्ही आधारों पर विभिन्न राजनितिक पार्टियों के साथ समर्थन में खड़ा होकर उनका चुनावी वोट बैंक बनता रहा है | कोई भी समझ सकता है कि किसान समुदाय निजी तौर पर खेती में काम करते हुए तथा अपनी खेती की समस्याओं से जूझते हुए या फिर किसानो के धरना - प्रदर्शन गोष्ठी आदि में भागीदारी निभाते हुए तात्कालिक रूप में भले ही अपनी किसान की पहचान व समस्या को ज्यादा महत्व देता हो , लेकिन राजनितिक , सामजिक रूप में वह अपने धर्म , जाति , क्षेत्र की पहचानो के मुद्दों से कहीं ज्यादा जुड़ता है | उसे ज्यादा महत्व देता है | क्या किसान सगठनों एवं संयोजको समितियों के नेतागण इसे नही जानते ? पूरी तरह जानते है | इसके वावजूद वे किसानो से अपनी खेती किसानी की समस्याओं के साथ अपनाने किसान की पहचान को सर्वाधिक महत्व देने की कोई अपील नही करते | उन्हें किसान के रूप में राजनितिक , सामजिक रूप से जागरूक एवं सगठित करने का कोई प्रयास नही करते है | ऐसा न करना असंगठित विखंडित किये जाने की प्रक्रिया के प्रति घोर उपेक्षा का द्योतक है |अत: किसानो को अपनी समस्याओं के साथ अब किसान की पहचान को प्रमुखता देने के प्रति जागरूक करना , प्रबुद्ध किसानो व किसान समर्थको का सबसे बड़ा दायित्व है | इसे अपनाकर ही किसानो को सगठित एवं आंदोलित किया जा सकता है | इसका कोई शार्टकट रास्ता नही है |
चित्र साभार गूगल से

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-11-2018) को "ईमान बदलते देखे हैं" (चर्चा अंक-3162) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. आभार गुरु जी

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