Wednesday, November 14, 2018

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार

क्रान्तितीर्थ काकोरी - भाग चार
नौजवानों का असहयोग आन्दोलन से मोहभंग और क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश
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1915 में दक्षिण अफ्रिका से लौटने के बाद गांधी जी ने भारतवर्ष की राजनीति में भी हलचल पैदा करना शुरू कर दिया था |
उधर 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक के निधन के बाद गांधी जी के हाथ में कांग्रेस की बागडोर आ गयी | दिसम्बर 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में गांधी जी ने घोषणा की कि यदि सब लोग तन - मन - धन से उनके कार्यक्रम को सहयोग दें तो वे एक वर्ष के अन्दर देश को स्वतंत्रत करा सकते है |
गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार को यह अल्टीमेटम दे दिया 31 दिसम्बर 1921 तक भारत को यदि औपनिवेशिक स्वराज नही मिला तो वे सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन शुरू कर देंगे | 31 दिसम्बर आया और चला गया सरकार ने इस अल्टीमेटम की कोई परवाह नही की | परिणाम स्वरूप देशभर में जलूस जनसभाओ और गिरफ्तारिया का दौर चला पडा |
5 फरवरी , 1922 को चौरीचौरा गोरखपुर में शानातिपूर्ण जलूस पर गोली चलाने के कारण लोगो ने थाने में आग लगा दिया जिसमे कई पुलिसकर्मी मारे गये | हिंसा से छुब्ध गांधी जी ने अपना आन्दोलन वापस ले लिया | इसकी देशभर में प्रतिक्रिया हुई | विशेषकर युवाओं की भावना को अत्यधिक ठेस पहुची और वे क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ने के लिए उतावले हो उठे |
इधर क्रान्तिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल ( शचिन दादा ) पुरे उत्तर भारत में विशेषकर उत्तर प्रदेश ( संयुकत प्रांत ) बंगाल और पंजाब में एक शक्तिशाली क्रांतिकारी दल के गठन हेतु अत्यधिक सक्रिय थे | शचिन दादा 1915 में 'बनारस षड्यंत्र केस ' में आजीवन काले पानी के अंतर्गत अंडमान भेज दिए गये थे | प्रथम विश्व युद्ध के बाद आम माफ़ी के सिलसिले में वे 20 फरवरी 1920 को रिहा कर दिए गये | जेल से रिहा होते ही वे बनारस आ गये और पुन: क्रांतिकारी दल को संगठित करने के कार्य में जी जान से जुट गये | पहले कुछ समय तक इन्होने अपने दल का नाम ''यंगमेंस एसोसिएशन'' रखा | शचिन दादा ने 1923 में दिल्ली में कांग्रस अधिवेशन में भाग लेने के बाद अपने क्रांतिकारी दल का नया नाम 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एच आर ए ) रख दिया | देखते ही देखते क्रांतिवीर राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी , जोगेश चन्द्र चटर्जी ,शचीन्द्र नाथ बख्शी .,मन्मथ नाथ गुप्त , मुकुन्दी लाल ,सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य , कुंदन लाल गुप्ता , राजकुमार सिन्हा ,विष्णु शरण दुबलिश ,गोविन्द चरण कर एवं प्रणवेश चटर्जी एच आर ए के प्रमुख सदस्य बन गये | उन दिनों बनारस व शाहजहाँपुर क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र था , जहां शचिन दादा राम प्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्ला खा आदि क्रांतिकारी पहले से ही सक्रिय थे | आगे चलकर प्रणवेश चटर्जी ने बनारस में सक्रिय श्री चन्द्रशेखर आजाद को भी पार्टी से जोड़ा | आजाद ने भी उन दिनों बनारस में संस्कृत का अध्ययन कर रहे युवा उदासीन साधू स्वामी गोविन्द प्रकाश ( श्री राम कृष्ण खत्री ) को पार्टी का सक्रिय सदस्य बनाया | दल की सदस्यता के लिए अपना पूरा समय और आवश्यकता पड़ने पर अपना जीवन उत्सर्ग कर देने को तत्पर रहने की योग्यता निश्चित की गयी थी | नेता का हुकम मानना सबके लिए अनिवार्य था | बिना कमांडर की आज्ञा के वह न कही जा सकता था और न किसी दूसरी संस्था का सदस्य ही हो सकता था | दल से विश्वासघात का दंड पार्टी से निष्कासन या सजाये मौत थी | दल के सदस्यों को हुकम था कि वे अपने राजनीतिक विकास के लिए अध्ययनशील हो और भावी क्रान्ति के लिए सब प्रकार की तैयारी में जुटे | प्रत्येक सदस्य शचीन्द्र नाथ सान्याल की ''बंदी जीवन '' के साथ ही महाराणा प्रताप - छत्रपति शिवाजी - रानी लक्ष्मी बाई - गैरीबाल्डी - मैजिनी व मैक्स्विनी आदि क्रान्तिकारियो की जीवनिया आयरिश क्रान्ति पर किताबे व रौलेट कमिशन की रिपोर्ट अनिवार्य रूप से पढ़ना था |

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (16-11-2018) को "भारत विभाजन का उद्देश्य क्या था" (चर्चा अंक-3157) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आदरणीय तबियत ठीक न होने से आपका आभार भी व्यक्त न कर सका माफ़ी चाहिता हूँ

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