Sunday, February 22, 2015

भगतसिंह फांसी के समय -- 22-2-15

भगतसिंह फांसी के समय --
लाहौर जेल के चीफ वाडर सरदार चतर सिंह ने बताया कि 23 मार्च , 1931 को शाम तीन बजे ,जब उसे fफाँसी का पता चला तो वह भगतसिंह के पास गया और कहा कि "मेरी केवल एक प्राथना है कि अंतिम समय में वाहे गुरु का नाम ले ले और गुरुवाणी का पाठ कर ले '|
भगत सिंह ने जोर से हंस कर कहा 'आप के प्यार को शुक्रगुजार हूँ |लेकिन अब जब अंतिम समय आ गया में ईश्वर को याद करू तो वह कहेगा कि में बुजदिल हूँ |सारी उम्र तो उसे याद नहीं किया और अब मौत सामने नजर आने लगी हैं तो ईश्वर को याद करने लगूँ| इसलिए यही अच्छा होगा कि मैंने जिस तरह पहले अपना जीवन जीया हैं ,उसी तरह अपना अंतिम समय भी गुजारूं | मेरे उपर यह आरोप तो बहुत लगायेंगे कि भगत सिंह नास्तिक
था और उसने ईश्वर में विश्वास नही किया ,लेकिन यह आरोप तो कोई नही लगायगा कि भगतसिंह कायर व बेईमान भी था और अंतिम समय उसके पैर लड़खड़ाने लगे |'
(भगतसिंह - प्रो ० दीदार सिंह , पन्ना 346 ) दूसरे व्यक्ति ,जो अंतिम दिन भगतसिंह से मिले ,वे उनके परामर्शदाता वकील प्राणनाथ मेहता थे |एकदिन पहले भगतसिंह ने लेलिन
की जीवनी की मांग की थी , सो अंतिम दिन मेहता जी लेलिन की जीवनी भगतसिंह को दे गये |
आखरी पलो तक वे बड़ी निष्ठा और एकाग्रचित से लेलिन की जीवनी पढ़ रहे थे | जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने आये तो उन्होंने कहा 'ठहरो एक क्रांतिकारी के दूसरे क्रांतिकारी से मिलने में बाधा न डालो | और फिर 23 मार्च 1931 को संध्या समय सरकार ने उनसे साँस लेने का अधिकार छीनकर अपनी प्रतिहिंसा की प्यास बुझा ली |अन्याय और शोषण के विरुद्ध विद्रोह करने वाले तीन तरुणों की जिन्दगिया जज्लाद के फंदे ने समाप्त कर दी | फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए भगतसिंह ने अग्रेज मजिस्ट्रेट को सम्बोधित करते हुए कहा 'मजिस्ट्रेट महोदय आप वास्तव में बड़े भाग्यशाली हैं कयोकि आपको यह देखने का अवसर प्राप्त हो रहा हैं कि एक भारतीय क्रन्तिकारी अपने महान आदर्श के लिए किस प्रकार हँसते -हँसते मृत्यु का आलिगन करता हैं |फांसी से कुछ पहले भाई के नाम अपने अंतिम पत्र में उसने लिखा था ,मेरे जीवन का अवसान समीप है प्रात; कालीन प्रदीप टिमटिमाता हुआ मेरा जीवन -प्रदीप भारत के प्रकाश में विलीन हो जायेगा |हमारा आदर्श हमारे विचार सारे संसार में जागृती पैदा कर देंगे |फिर यदि यह मुठ्ठी भर राख विनष्ट हो जाये तो संसार का इससे क्या बनता बिगड़ता है |जैसे -जैसे भगतसिंह के जीवन का अवसान समीप आता गया देश तथा मेहनतकश जनता के उज्जवल भविष्य में उसकी आस्थ गहरी होती गयी | मुर्त्यु से पहले सरकार सरकार के नाम लिखे एक पत्र में उसने कहा था ,' अति शीघ्र ही अंतिम संघर्ष के आरम्भ की दुन्दुभी बजेगी | उसका परिणाम निर्णायक होगा | साम्राज्यवाद और पूजीवाद अपनी अंतिम घडिया गिन रहे हैं |हमने उसके विरुद्ध युद्ध में भाग लिया था और उसके लिए हमे गर्व हैं
....सुनील दत्ता

4 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (24-02-2015) को "इस आजादी से तो गुलामी ही अच्छी थी" (चर्चा अंक-1899) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. शहीदे आज़म भगतसिंह पर अच्‍छी और सार्थक रचना प्रस्‍तुत की है।

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  3. aap logo ke shukrgujar hai aapne apne vichar diye

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  4. काश आज ऐसे सच्चे देशभक्तों की कुर्बानियों को याद कर देशभक्ति उस समय जैसे देखने को मिल पाती !!
    ..बहुत सुन्दर अनुकरणीय प्रस्तुति ..

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