Tuesday, April 19, 2016

शव साधना ------ मार्कण्डेय

जीवन के यथार्थ को कलमबद्ध करने का अपना ही सलीका होता है |
मार्कण्डेय जी ने अपनी कहानियो में जो सहजता अपनी लेखनी से ढाला है | उसके चलते कहानी को आम आदमी भी बड़ी ही आसानी से समझ सकता है समाज के विसंगतियो को ........................
शव साधना
............................
घूरे बाबा ने साफी को कमंडल से पानी गिरा कर भिगोया , फिर उसे निचोड़ कर झटकारा और बाए हाथ की हथेली पर फैलाकर अपनी कमरी पर आ बैठे |
घेचू कंडे की आग को अभी मुंह से धधका ही रहा था कि बाबा जोर से खाँस कर चिल्ला पड़े , बम भोले ! '' आवाज दूर -- दूर तक आसमान को छूकर झर पड़ी | पास की बस्ती में कुत्ते झाँव -- झांव -- आँव ...... करके एक स्वर से रोने लगे और चिक -- चिक .किरर . की आवाज करता हुआ चिडियों का एक झुण्ड झरबेरी में हुर्रर से उड़ा और फिर लौट कर वही आ बैठा |
रात का तीसरा पहर |
माघ -- पूस की थारी और चुडइनियो के भीट की झरबेरी के घने , काले झाड |
बाबा इसी में एक दिन चरवाहों को समाधिस्थ मिले थे और उनके इस विस्मय -- जनक अवसारण की बात आग की तरह चारो ओर फ़ैल गयी थी |
' भगवान का एक रूप ही समझो , बाबा को ! घेचू रोज लौट कर सुखी से कहता और बिना कुछ खाए -- पिए खटिया में धँस जाता |
सुखी को पता है कि बाबा लोगो के घरो से आये मोहनभोग और दूध के कटोरे अपने चेलो को देकर कभी -- कभी धुनी की राख ही घोल कर पी लेते है | उसका आदमी लँगोटी फिचता है बाबा की | उसे सिद्धि मिल जायेगी , कुछ दिनों में | पर अभी सिद्धि , इसी उमिर में ! साल ही भर तो हुए मेरे गवने के और अभी न लड़का , न बच्चा | साधू -- सन्यासी की सोहबत बहुत अच्छी नही , जाने क्या मारन -- मोहन कर दे , सुखी को चिंता हो आई |
बाबा न कंकड़ की नन्ही चिलम को हाथ की उंगलियों और होठो में लपेट कर ऐसे खीचा कि कंकड़ दीये की लौ की तरह जल उठा |
फिर झुंझलाए -- से संड्से को उठा कर उन्होंने धुनी में दो बार मारा और आसन से एक कमरी उठा कर पीठ पर डाल ली | शरीर सहित से गनगना रहा था | कंकड़ की गरमी आज जैसे माथे से उतर ही नही रही थी | झबरा धुनी से सता घेचू के पैरो के पास मुँह किये ऊँघ रहा था | बाबा इधर - उधर मेल्हते रहे , फिर संड्से को उठा कर धुनी की आग में डाल दिया | जब संड्सा लाल हो गया , तो उन्होंने उसे उठाया और अपनी पिंडलियों के रोये जलाने लगे | फिर एकाएक चीख पड़े , बम भोले ! बम भोले ! पर घेचू जैसे मिनका ही नही और झबरा आँखे मुलमुला कर रह गया | उधर कुत्ता पे - पे करता भागा और इधर पदमासन लगा कर अकड गये | घेचू हाथ जोड़ कर , ' महाराज -- महाराज कहता हुआ कापने लगा |
सेवक से कोई खता हो गयी भगवान ?
' बालक , मन में कही चोर है तेरे ! तन
तो तूने साहब को दे दिया , पर मन तिरिया में बसा है तेरा ... तिरिया विनाश
का घर है | माया से अब छुट्टी ले घेचू , नही तो अब तू साहब का है , उसके
दरबार में आना आसान है , पर जाना मुश्किल है ! ' बाबा बोलते जा रहे है , पर
घेचू की आवाज बन्द हो गयी है | गरम् संड्से में कुत्ते की चमड़ी उचक आई है
और अब धुनी की धधकती आग में जल कर बदबू कर रही है | बाबा का राख में लिपटा
नगा शरीर ठुठ की तरह धरती में गडा है | हर क्षण वह कडा पड़ता जा रहा है |
लोहे की सख्त ठनक - सी उनकी बात धरती को फोड़ कर कर निकलती -- सी लगती है |
घेचू की दुनिया कुम्हार की चाक की तरह तेज चक्कर काट रही है |
' यह मैं
नही बोल रहा , मैं नही ..... ! बाबा नेवले की तरह गर्दन निकालते है और
विस्फारित नेत्रों से घेचू की ओर देख कर कहते है , ' वह चुड़ैल , डाइन ,
कलंकिनी , कुलच्छिनी , कुलटा .......' क्षण भर को वह एका - एक
रुकते है , पर आँखे एकटक घेचू की आँखों में गडी है | फिर कुछ और जोर से तड़क कर बोलते है , ' ले यह आग का अँगीठी अपनी मुठ्ठी में !
घेचू की हथेली आग से सट जाती है , अजीब सी बदबू , पर घेचू टस - से मस नही होता |
' सात समुन्दर पर साहब के देश में तेरा महल बन गया | बोल , सत्त गुरु की !
' इतने धीरे से बोलता है ? ' और एक गरम् सड्सा उसकी पीठ पर चिपक गया | घेचू चिल्ला पडा |
' सत्त गुरु की , महराज ? सत्त गुरु की ! '
'
तूने मेरे कहने पर तिरिया का त्याग तो कर दिया , पर वह साहब की है , उसे
साहब को दे दे ! धरोहर साधू कभी नही धरता | पर साहब भी क्यों लेगा उसे ,
साहब भी .....| ' बाबा चीख उठे , ' वह इस समय उस बनमानुस गडरिये के साथ सो
रही है ! '
' सच महराज ? ' घेचू जैसे होश खोता जा रहा था |
' और
नही तो क्या झूठ बोलेगा , साधू ? यह दिव्य -- दृष्टि सब देख रही , चल --
अचल , सब | देख -- देख , वह दोनों गुल्छरे उड़ा रहे है , हाँ हाँ हाँ $$$ ! '
बाबा की अंगुलिया संकेत के लिए उठी रही और घेचू की आँखे अँधेरे की चट्टान
से टक्कर मारती रही | तभी बाबा ने धुनी से सड्सा निकालकर घेचू के हाथ में
थमाते हुए कहा , ले इसे बालक ! " उनकी आवाज चढती जा रही थी , ' यह साहब का
हथियार है | उसकी पीठ पर इससे एक दाग बना कर उसी के हाथ साहब का दंड वापस
कर और वहा बैठ कर उसके लौटने का इन्तजार कर | परम प्रसाद तेरे पास पहुँच
जाएगा | यह धुनी उसके पापो को जला कर छार कर देगी | इस अँधेरे पर साहब की
सवारी है , घेचू! "
घेचू अगिया -- बैताल की तरह अँधेरे में खो गया |
घूरे बाबा ने गरदन इधर - उधर झटकारी | हाथो को ढीला किया और कमर में बंधी
मूँज की मोटी रस्सी की हुण्डीदार गाँठ खोल दी |
घूरे बाबा की धुनी बुझ गयी , --- दूसरे दिन सुबह गाँव वालो के मुंह पर यही बात थी |
--- शरम की बात है हमारे गाँव के लिए | हम लोग कल लकड़ी नही जुटा सके |
'
बाबा कहते है , कोई राज -- विग्रह होगा या महामारी फैलेगी | तेज की अग्नि
कैसे बुझ गयी ? तुम लोग नादाँन हो , जो लकड़ी की कमी की बात सोच कर पछता
रहे हो | इस धुनी में तो माटी जलती है , हवा जलती है , आकाश जलता है ,
पांचो तत्व जलते है , जिसे यह गुरु का सड्सा छू दे , वही जलकर छार हो जाता
है | घूरे बाबा घूमकर महिला दर्शनार्थियों की ओर देखते है |
- पुत्र की कामना .........! बुझी हुई , भारे -- भारे -- सी , भूखी ...
--- पति की कामना ! .... चपल , लोलुप , पियासी ....
धन की कामना ! उदास , रसहीन , मुर्दा ...
रोग मुक्ति की कामना ! ..... बीमार , पिली -- पिली
बाबा
उखड जाते है | पद्मासन को और भी चुस्त बना लेते है और अपनी नाभि पर दृष्टि
जमा , सुन्न हो जाते है | सब लोग हाथ जोड़ लेते है | --- गये समाधि में
बाबा !
प्राय: ऐसा ही होता है | बाबा बोलते -- बोलते चुप हो जाती है |
धीरे -- धीरे झरबेरी का वह अदभुत निकुन्ज सूना हो जाता है | बस , सडसे के
दाग से पीठ पर लाल -- लाल , लम्बी पट्टी की तरह घाव लिए झबरा और हाथो में
साधू की धुनी का प्रसाद सम्भाले घेचू : गदोरिया फूल कर गुब्बारा हो रही है |
गहरे बुखार में शरीर झुलस रहा है , जैसे जड़ काट कर कोई हरा -- भरा पेड़
जमीन में गाड दिया गया हो और सूरज की तेज रौशनी में उसकी पत्तियाँ , कोमल
टहनिया मुरझा कर लटक गयी हो | साधू इसी को कहते है , जब वह ठुठ की तरह सुख
जाए , धरती से रस - ग्रहण करना बन्द कर दे |
कल की सुबह बाबा ने
सुखी को पहली बार देखा था -- काली भुजंग , बड़ी -- बड़ी आँखों वाली , सलोनी
तिरिया , छरछरा , धनुष की तरह लचीला बदन , साँप की तरह चिकनाई .. और वह
क्या नही देख सकते थे , घूरे बाबा ठहरे , कोई मामूली सन्यासी तो नही | उनके
जलते हुए अंतर में सुखी के मोहक रूप और नशीली आँखों ने आग का सुजा घुसेड
दिया था |
बाबा दिन भर बेचैन रहे | उनके सीने में असख्य चीटिया काट रही
थी और बार -- बार उन्हें अपने गुरु का ध्यान हो आता था , साधू के लिए कुछ
असम्भव नही | वह जो चाहे कर सकता है |
घूरे बाबा का प्रयोग भी सफल हुआ |
घेचू कल रात भुत की तरह दौड़ता हुआ घर पहुँचा था | सुखी चौखट से उठेगी , पैर फैलाए , मोहनी की तरह मदन के लिए जाग रही थी |
हवा
के सर्द झोके सुखी के सीने में आज गुदगुदी पैदा कर जाते थे , इसीलिए पुवाल
की गर्मी में सोकर वह आज की रात भी खोना नही चाहती थी | बाबा के यहाँ कल
सुबह पहली बार गयी थी | पुत्र भी बाबा की कृपा से मिल सकता है | पूरे चार
महीने का बदला वह आज लेती घेचू से , सन्यासी की सोहबत आज उसे खल रही थी ,
लेकिन सहसा इस बालक सन्यासी के हाथ में सड्सा देख कर वह चौकी पड़ी थी | काली
मकोय -- सी पुतली आँखों की विस्तृत सफेदी नाच उठी थी ! क्षण -- भर को
घेचू सहमा था ... पर सात समन्दर पार साहब के देश में तुम्हारा महल बन गया
... देख , देख वह गुलछरे उड़ा रही है ..... और सामने बैठी सुखी के बाल घेचू
की मुठ्ठियों में आ गये थे , निशान तो उसे ....
धुनी की आग ही नही ,
कंकड़ की चिलम भी ठंठी पड़ गयी थी उस रात | बाबा का रोम -- रोम गरमाई से
टहक गया था | नस -- नस में चिपक गयी थी | पाप जल कर छार हो गये थे |

आज घेचू मन मारे बैठा है | लोगो के उठकर जाते ही बाबा का ध्यान भंग हो गया और वह कंकड़ की चिलम अपने हाथ ही से खुर - चने लगे है |
' खालिस गाँजा कभी पीया है , घेचू ? रात -- रात भर भजन के लिए तपसी सुखा गाँजा पीते है ' |
' नही , किरपानिधान ! '
' तो आज पियो | धोकर बानाता हूँ गाँजे को ' |
' अपने हाथ से , प्रभु ! लोक में हँसी होगी ! '
बाबा हँसे ' लोक ' में ? . साधू का कोई लोक नही होता | ' और थैली से गाँजे का चिप्पड़ निकाल कर हथेली पर मलने लगे |
'
तेरी तो गदोरी ही ले ली साहब ने , लेकिन वह बहुत कुछ देगा इसके बदले ,
घेचू , बहुत कुछ | सुदामा के दो मुठ्ठी चावल खा कर | ...... बाबा ने चिलम
भर ली और दो बार हवा में झुला कर घेचू के आगे करते हुए कहा , ' तू ही लगा
भोग ! अब थोड़ी ही कसर है तेरे जती होने में ! '
' नही महराज , हम तो चरन -- सेवक है ! ' घेचू के होठ सुख रहे थे और बुखार की ज्वाला में सारा शरीर ताप रहा था |
सूरज की रौशनी झरबेरी की छत पर पसरी हुई थी और कही -- कही किरने निकुंज को बेध रही थी | झबरा अपनी दोनों टांगो पर गरदन फैलाए बाबा का मुँह ताक रहा था | घेचू की दृष्टि रह - रह कर उसकी पीठ के उचरे हुए चमड़े पर टिक जाती थी और सुखी की बड़ी -- बड़ी आँखों का दुःख , क्रोध और विस्मय -- भरा निश्चय . वह अपने मन को दबा कर गाँजे की चिलम हाथ में लेता है , लेकिन मुठ्ठी बंधे तब न ! एह हाथ से चिलम पकड कर हल्की -- सी फूंक लेता है और चिलम बाबा को फेर देता है | बाबा सुररर करके खीचते है | चिलम उलटते है , गाँजा रखते है , फिर खीचते है - लगातार चार चिलम ! फिर घेचू की हथेली अपने हाथो में लेकर फटी -- फटी आँखों से देखते रह जाते है | सहसा सुखी का चेहरा उन्ही हथेलियों में उग आता है और उनका सारा शरीर तमतमा कर अकड जाता है | नारी भोग है ! उन्हें अपने गुरु का ध्यान हो आता है और वह उत्फुल होकर चीखने लगते है , ' सत्त गुरु घेचू ! सत्त गुरु की ............!
घेचू किसी तरह अपने पपडियाहे होठ खोलता है , ' सत्त गुरु की ....|
' आज गढ़ी की बारी है , न घेचू ? ' बाबा पहली बार खाने की बात पूछते है , ' अच्छा भोग आता है उनके यहाँ से | रतनजोत आती ही होगी नौकरों के साथ ! '
' हाँ महाराज , बड़े पुण्यात्मा है , मालिक ! '
' मालिक कहता है बुद्धू , जती हो कर ? मालिक तो अब तू है , तू !'
बाबा की अंगुलियाँ अब घेचू के मुंह के पास पहुँच गयी है | तू चाहे तो रतनजोत तेरी दासी बन जाए , दासी ! '
क्या कहते है प्रभू ! '
' सच कहता हूँ , बुद्धू ! तिरिया और भूय पौरूख की है , पुरुख की ! ' बाबा और कुछ कहते -- कहते रुक जाते है , उन्हें अपनी बीबी का ख्याल हो आया है | -- साहब किस तरह उसे आफिस भेजकर खुद बँगले ही में रुक जाया करते थे और बार -- बार दौरे पर जाने वाले लोगो के साथ उसे भेज दिया करते थे | वह तो उस दिन गाडी छूट जाने के कारण घर लौटा , तो कोठरी में ताला बंद | दूसरे दिन उसे जान से खत्म करा देने की तैयारी , अपनी ही बीबी की सलाह से | लेकिन वाह रे घूरे बाबा ! उनके चेहरे पर प्रतिहिंसा की धूप छिटक आई है | रतनजोत तुम्हे कलेवा लेकर आती है | बड़े -- बड़े घर की तिरिया तुम्हारे तलवे की धुल पोछ कर सन्तान की भीख मांगती है | बाबा इधर -- उधर देखते है | अभी रात की तेल गरम् करने वाली कटोरी धुनी के पास ही पड़ी है | और गर्व पुल -- कित सड्सा
लकड़ी की एक गाँठ के सहारे सीना ताने उठ्घा है | बाबा रात उसे तोड़ कर फेंक देना चाहते थे .... पर सुखी ?
---- अहोभाग्य महाराज , दासी की अर्ज है यह !
बाबा संड्से को उठाकर लकड़ी की झवाई गाँठ को ठोकने लगे | आग की छुरिया छूटने लगी और एक से दूसरी , तीसरी बनती गयी | घेचू आँख उठाकर उपर देखता है , बेल की पत्तिया झुलस चली है और हवा के चलने से कभी -- कभी टूट कर गिर पड़ती है |
घूरे बाबा का यह अनोखा मठ लोक -- प्रसिद्ध है | उनके महातम की कहानिया कही जाती है और एक नही पचीसो उन कहानियों के चश्मदीद गवाह मिल जाते है , जो हर बात को अपने ही आगे हुई बताते है |
बाबा रात को चुडइनिया के तालाब के उपर पलत्थी मार कर बैठ जाते है और डाईने उनके पाँव पखारती है | नही तो थी किसी की हिम्मत उधर झाँकने की रात को ! गढ़ी का छोकरा घोड़ा समेत वही डर कर मर गया | डाईने उसके कलेजे का खून चूस कर पी गयी | अब तो रतन -- जोत रात -- बिरात नौकरों को ले कर बाबा का भोग लगाने पँहुच जाती है |
सुखी रात मठिया में होती है और औरत भक्तो को साधारण मनाही कब रोक सकी है ! बाबा को विघ्न का डर है , इसलिए उन्होंने अपने तेज की वृद्धि के लिए शव -- साधना की भयानक क्रिया प्रारम्भ कर ली है |
बाबा आजकल शव -- साधना कर रहे है | रोज रात मुर्दहवा घाट जा , मुर्दे की लाश पकड कर मन्त्र का जाप करते है | दारु से नहाते है | मुर्दे के माँस का भक्षण करते है | रात को भक्त्त मठिया पर नही जाते |
सवेरे कभी आदमी की खोपड़ी , कभी हाथ -- पाँव की सुखी हड्डी झरबेरी के कोने में पड़ी मिलती है | लोग दंग ! इस त्रिकालदर्शी बाबा का एक वाक्य कुछ -- का कुछ कर सकता है | बड़े -- बड़े ठाकुरों के नौजवान लड़के पेड़ की मोटी -- मोटी सिल्लिया जोराई से ढोते है | बड़े घरो की स्त्रिया बाबा की एक बात के लिए , उनके चरणों की एक धूल कण के लिए तरसती रहती है | दूर -- दूर के लंगड़े -- लूले अपाहिज आते है और बाबा की धुनी की ख़ाक से चंगे होकर लौट जाते है | सूरज डूबते ही डाकिनी का आवाहन होता है और घेचू आसमान की ओर मुंह उठा जोर से तुरही फूंकता है | लोग सन्न हो जाते है | डर के मारे औरते कापती , अपने बच्चो के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती है |
--- अब कोई सिवान में कदम नही रखेगा | मठिया में प्रेत -- साधना करते है , बाबा ! नही तो इतना जस कैसे रहे ! रात को बस बम भोले ----- बम भोले ---- सत्तगुरु की , आवाज सुनाई पड़ती है |
सुखी निखर आई है | कमर की हड्डिया थोड़ी - चौड़ी हो गयी है | आँखों के नीचे का अस्थि -- भाग चिकना हो गया है |
समय के खेल में आदमी कैसा बदल जाता है | सुखी थोड़ा झुक कर चलती है |
मदिरा का भभका चलता है उसके घर | खाने -- पिने की क्या चिंता | दूध से मलाई छान कर नीचे का दूध बाबा के आगे टाल देती है और बचा -- खुचा हलुआ घेचू और कुत्ते को | बाबा उससे डरते है | स्त्रियों को भभूत देते हुए , सुखी पर निगाह पड़ते ही उनका हाथ कापने लगता है , पसीना छूटने लगता है | साहब का चिमटा अब घेचू के हाथ में रहता है | भोग की थाली अब वही ग्रहण करता है | ऐरे -- गैरे रोगियों को अब घेचू के हाथ की भभूत ही चंगा कर देती है | बस , विश्वास नही है तो एक रतनजोत को उस पर और घूरे बाबा यही चाहते है और सुखी बाबा और घेचू दोनों खूब जान गयी है |
झरबेरी के पत्ते पीले होकर गिर गये है | बस , डाले और नुकीली टहनिया , जिनमे काँटे | चाहे फिर नई पत्तियाँ आये और यह दैवी गुंबद ढक जाए उनसे , पर अभी तो इसकी चुभन बनी हुई है |
सुखी चुभ रही है अब , घेचू को भी , जो संन्यास का भोग भोगना सीख गया है , शव -- साधना और माया की खुमारी को समझ गया है और --- रतनजोत तो तेरी दासी हो सकती है , दासी ! --- बाबा की बात उसे याद है और बाबा को भी , जो रतनजोत को अगले जनम के वैधव्य से मुक्ति दिलाना चाहते है |
' रतन , साहब पिछले जनम में तेरे उपर नाराज था , चार जनमो तक लगातार तुम्हे वैधव्य भुगतना है ! बाबा एक दिन रतनजोत से कह रहे थे | पर उसके मठ से बाहर निकलते ही , ' तेरे साहब के बच्चे की ! ढोंग रचता है ! ' सुखी के भरपूर झापड़ से बाबा की दाढ़ी के कुछ राख -- मिश्रित बाल उधड गये थे | घेचू जल्दी -- जल्दी तुरही फूकने लगा था , कही कोई आ ना जाए ! और आधे रास्ते आये लोग लौट गये थे |
--- शव -- साधना ! शव -- साधना ! प्रेतों का वास हो गया मठिया में |
आदमी छड कर मर जाएगा ! बाबा ने तो चुडइनिया की डाईनो को वश में कर लिया है |
फागुन की चुहल दरवाजे पर आ खड़ी हुई है | फसल के मारे सिवान बोझिल हो रहा है | जिसके दो मन होता था , वह दस मन तौल रहा है और बाबा के प्रताप की दुहाई दे रहा है |

--- सच्चे सन्त का यही गुन है | मुठ्ठी -- भर दो तो दौरी भर पाओ ! इस बार ठाकुर जग्य करेंगे | बहुत बड़ा भंडारा दिया जाएगा | मठिया के तहद एक बहुत बड़ा ठाकुर द्वारा बनेगा | गाँव -- गाँव चन्ना जुट रहा है | पर बाबा रुपिया को हाथ से नही छूते|
जती डरता है माया से | धन्य है घूरे बाबा ! ' सुखी लोगो से कहा करती है |
ठाकुर परीक्षा लेंगे , सुखी की बात की ! रतनजोत चांदी का रुपया धरेगी बाबा की कमरी के नीचे | लेकिन सब सुखी की राय से होगा | बाबा के मठ में सुखी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता | इस लिए तुरही बजते ही सुखी अपने बालो को कन्धे से आगे ले आकर लपेटती है , भैरवी बनती है | धुनी की आग खरोंच कर धधकाती है और तडक कर बोलती है , ' सत्त गुरु की ! '
बाबा भी सत्त की कहते है , पर धीरे -- से क्योकि सुखी की आँखे लाल हो रही है | अभी -- अभी रतनजोत का हाथ अपने हाथ में लेकर आगामी जीवन से वैधव्य की कहानी फिर से सुनाते हुए उसने बाबा को देख लिया है | बाबा भोग से भी वंचित है सारे दिन |
' जोर से बोल , साहब ! ' सुखी दहांडती है |
' सत्त गुरु की ! ' बाबा की आवाज कापती है और बाये हाथ से सुखी घेचू को झोक देती है ' तुरही फूंक , तुरही ! '
घेचू उठ कर चला गया , तो सुखी ने तडक कर कहा , ले यह अगीठा हाथ में | तेरी परिच्छा है कल ! '
हाँ? साधू के बच्चे , साधू की ! '
बाबा की मुठ्ठी कस जाती है , ओह मालिक ! ' वह चिल्ला पड़ते है तो सुखी कहती है , ' तेरे ही लाभ के लिए है यह | कल रतनजोत एक चाँदी का रुपया धरेगी तेरी कमरी के नीचे ! तू उस पर बैठते ही हाथ झटकारते हुए चिल्ला पड़ना , --- जल गया ! जल गया ! माया ने डस लिया ! अच्छा , भूलना नही ? जोगी हाथ से धन नही छूता और तू तो ईस्सर का अवतार है , इस जवार के लिए | ईस्सर से भी बड़ा , जो मरे हुए को जिला देता है | '
अग्नि -- परीक्षा ने साधू के यश के तम्बू को और उंचा तान दिया है , पर वह घोर ताप में दह रहे है | बाबा को बुखार है ! अचम्भे की बात है ! सुखी तलवे सहलाती है , अजवाइन पिस कर माथे पर चढाती है | लोगो को दर्शन के लिए मना करती है |
' प्रेत से लड़ाई हुई है बाबा की | मानुस ने कही से झाँक कर देख लिया है | साहब नाराज है | शव -- साधना का यही सब तो खतरा है | घेचू महा -- साधना के लिए समुद्र को चला गया | ' सुखी लोगो से कह कर सुबक -- सुबक कर रोती है |
ररोइया चिरई रात -- भर मठिया पर रोती है | गेदुर कीच - कीच करते है और उल्लू अँधेरे के बाण की तरह निर्जन आकाश का सीना चीरते चले जाते है | महारानी सुखी के पाँव बेहद थरथराते है , जैसे पांवो का खून ही चूस लिया हो प्रेत ने | चेहरा पीला पड़ गया है |
चुडइनिया के मठ से , बम भोले , अथवा सत्त गुरु , की आवाज नही सुनाई पड़ती | अब वहा रात के अँधेरे में बाबा सुखी की जांघो पर सिर रखकर , उसकी कमर में हाथ डाले घटो रोते है , ' आखिर गढ़ीवाले कब तक रतनजोत के भागने की बात छिपाएंगे | एक - न एक दिन घेचू के साथ उसके भागने का पता ............|
सुखी अपने तेल में डूबे बाल आँखों से परे करके बाबा की आँखों में देखती है | आँसू चू- चू कर बाबा के जटा -- मंडल में समा जाते है |
' अब थोड़े ही दिन बाकी है | '
' थोड़े ही दिन ? ' बाबा चौकते है |
' हाँ कभी दर्द भी होता है | चलते हुए पाँव कापते है | '
' तो कल कैंची लाना न भूलना | यह लम्बी जटा तो भागने भी न देगी | '
' ठाकुर -- द्वारे का चंदा तो तुम्हारे ही पास --- बस उसे बाँध लेना |
कही दूर देश चलेंगे , सुखी ! "
बात बात पूरी भी नही होती बाबा की और सुखी उनके जटा -- मंडित सिर को बाँहों में घेर कर कस लेती है |..........

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