Wednesday, June 1, 2016

आदिवासी इतिहास के -- सन्दर्भ में 1- 6 - 2016

उज्जैन यात्रा के दौरान अन्य जगहों पर कुछ साथियों से मुलाक़ात हुई , उनसे कुछ आदिवासियों पर जानकारी प्राप्त की उसका थोड़ा सा अंश
आदिवासी इतिहास के -- सन्दर्भ में
आदिवासियों का इतिहास विशिष्ठ है | यहाँ के आदिवासी कबीलों के छोटे - छोटे खुद के राज्य थे | आदिम जीवन - यापन कर रहे थे | गणतांत्रिक सौहाद्ररूप , शान्तिपूर्ण तरीके से इनके समाज की सत्ता चल रही थी | खासकर आलीराजपुर क्षेत्र के आदिवासी राजाओं के अधीन 12 गाँव हुआ करते थे , अभी भी यहाँ के आदिवासी समाज में '' 12 गावीया पटेल '' का बहुत महत्व है | आपस में चोरी , डकैती , अपराध प्रवृत्ति का कोई स्थान नही था |
कन्नौद ........... से आये राजपूत वर्ग ने आदिवासियों के सैकड़ो राजाओं की राज्य सत्ता को छीन लिया | इस संघर्ष में लाखो आदिवासी मारे गये अकेले आदिवासी राजा ज्म्बुरा होडिया के 13.000 साथी मारे गये थे | अब अंदाजा लगाओ कि सैकड़ो आदिवासी राजाओं के राज्य छींटे समय कितने आदिवासियों ने कुर्बानी दी होगी | आली के राजा अलिया भील के नाम से आलीराजपुर नाम पडा था , ऐसा कई जगह पर हमे जान्ने को मिला | काठिया भील से कट्ठीवाड़ा , मोतिया भील से मथवाड़ा , झबु नाइक से झाबुआ , थाना नाइक से थान्दला , बासिया भील से बांसवाडा ( राजस्थान ) मान्या भील से मानगढ़ ( राजस्थान ) सोन्या भील से चोनगढ़ ( गुजरात ) अदि .
भीली स्थान के पुरे क्षेत्र में आदिवासी राजाओं का पूर्ण आधिपत्य था किन्तु इस धरती पर ऐसी कुछ जातिया है , उनका उद्देश्य केवल राज करने का रहता है | ऐसी ही राठौर जाति राज करने के लिए सबसे पहले आलीराजपुर क्षेत्र पे आई थी , हम पहले स्वतंत्रत थे , किन्तु आवेला राठौर वंशो के अधीन यहाँ के आदिवासी गुलाम बन गये . 1357 से 1947 ई. तक 30 शासको ने आलीराजपुर क्षेत्र के आदिवासियों पर राज्य किया , आदिवासियों ने औनिवेशिक जीवन बिताया |
इस दौरान आदिवासियों की अर्थ व्यवस्था , समाज व्यवस्था , रीती रिवाज , तेज त्योहार परम्पराओं में आवेल राजाओं ने खूब हस्तक्षेप किया , सब कुछ अपना जो समाज व्यवस्था थी , नियम एवं कायदे - कानून थे | उन्हें भुला दिए गये , आपस में जब अतिथियों - अजनबियों से हम मिलते थे , तो जुद्दार बोला जाता था , किन्तु अब केवल शादी - विवाह के समय लड़की या लड़के को देव स्थान पर ले जाते है , केवल वहा ही जुहार करने का बच गया है , कुछ लोग ' अवल से के ' ऐसा अभी भी बोलते है |
यह सब भुलाने के पीछे राठौर वंशी राजाओं के 639 वर्ष तक राज करने का मुख्य कारण रहा है , जिन्होंने हमे मार - मर कर राम - राम करना सिखाया असहनीय वेथ - बेबार , मुफ्त के श्रम में बड़े - बड़े किले , राज महल , मंदिर , इमारते खड़ी कर लिई जमीन का लगान इतना था कि , जमीन के के बिना जंगलो पर आधी रात जीवन गुजारना पडा या चोरी छिपे जंगलो में खेती करनी पड़ी , अकाल , भुखमरी के समय में भी जमीन को हड़प कर राजाओ ने अपने सगे सम्बन्धियों ( ठाकुरों ) को दे दी , जो किसान लगान नही दे पाता, उसकी जमीन छिनकर ठाकुरों को दे दी जाती थी , छापरिया , पिपल्यावाट सोंडवा , फुलमाल , अकलवा इसके ज्वलंत उदाहरण है |
इन राजाओ की जेल में इन्हें जानवरों जैसा खाना मिलता था , पुराना कडवा अनाज खुद पीस कर खाते थे , डीएसटी - उलटी से अधिकतर कैदी जेल में ही मर कर खत्म हो जाते थे | 1908 में प्रति कैदी वार्षिक व्यव 30 रूपये था राजवंशियो द्वारा आदिवासी समाज के लोगो के साथ भारी अत्याचार , योनाचार , दमन करने का पूरा सत्य इतिहास ने छुपा रखा है |
आर्यों के आगमन के समय से इस देश के मूल निवासी के साथ धोखा ही धोखा हुआ है | ऋग्वेद काल , महाभारतकाल में असुर , दुष्ट , राक्षस कह कर आदिवासियों को मारा गया | धनुर्विद्या सिखने गये भील एकलव्य द्रोणाचार्य के पास गया तो अंगूठा काट लिया , समुद्र गुप्त , अशोक महान के समय कलिंग युद्द में आदिवासी सरदारों सहित लाखो आदिवासी मारे गये |
हल्दीघाटी की लड़ाई में हल्दू नाम की भील लड़की सबसे पहले मारी जाती है , बिरसा मुण्डा के विद्रोह में भी सैकड़ो आदिवासी मारे गये , खाज्या नैक की लड़ाई में 57 आदिवासी को गोली से भुन दिया जाता है | मानगढ़ पर्वत पर गुरुगोविंद गिरी के मेले में 3500 आदिवासी कत्लेआम कर दिए गये थे | मेवाड़ के राणाप्रताप के उपर जब जन का खतरा आया तो आदिवासी ही उन्हें अपने घरो में छुपा कर रखते थे खतरा टलने के बाद राणाप्रताप रजा बनते है और उनका सेनापति आदिवासी भिल्लू राना बनता है | सरदारपुर के राजपूत राजा बख्तावर सिंह के राज सिंघासन पर खतरा आता है , तो आदिवासी सैनिक ही लड़ाई में अपनी कुर्बानी देकह्र राजस्ता को बचाती है |

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