Thursday, February 19, 2015

विवेकशीलता -------------------------------- 20-2-15

विवेकशीलता


एक गाँव में एक कथावाचक पंडित रहता था | उसके चार बेटे थे और चारो ही बिलकुल नालायक | एक दिन पंडित को एक श्रद्दालु ने कथावाचन के उपरान्त ढेर सारा धन व उपहार देकर विदा किया | यह देख उसके बेटो ने भी कथावाचक बनने की सोची | पंडित ने पुत्रो को समझाया कि इसके लिए पहले घोर अध्ययन जरूरी है , तभी तुम कथावाचन के लायक बन सकोगे | लेकिन पुत्र नही माने और पडोस के गाँव के मुखिया के यहाँ कथा वाचन करने निकल पड़े | पंडित ने यह देख अपने विश्वासपात्र नाई को उनके साथ भेज दिया | पंडित जानता था कि यदि कुछ ऊँच - नीच हुई तो नाई बात को सम्भाल सकता है |
मुखिया के घर पहुचकर उन्होंने कथा कुछ यू प्रारम्भ की | पहला बोला ' राजा पूछेगे तो क्या बोलूंगा | ' दूसरा बोला ' जो तेरी गति सो मेरी गति | ' तीसरे ने कहा -- ' ये चतुराई कितने दिन चले | ' चौथा बोला -- जितने दिन चले , उतने दिन चले | ' मुखिया समेत गांववालों ने उनसे कहा -- कृपया इन बातो का आशय भी बता दे ? इस पर चारो भाई चुप ! यह देखकर मुखिया नाराज हो गया और उसने अपने आदमियों से कहा कि ये पोंगा पंडित हमे मुर्ख बना रहे है | इन्हें पीटकर गाँव से बाहर खदेड़ दो | तब उनके साथ गया नाई बोला -- ' इन चारो ने गूढ़ ज्ञान की बाते कही है | जो आम लोगो की समझ से बाहर है | पहले पंडित के कथन ' राजा पूछेगे तो क्या बोलूँगा का सन्दर्भ है कि सुमंत जब राम से अयोध्या वापस चलने का अनुरोध करने लगे और रामजी ने वापिस जाने से इंकार किया , तब सुमंत ने रामजी से पूछा कि यदि महाराज दशरथ पूछेगे तो मैं क्या जबाब दूंगा ? दूसरे कथन ' जो तेरी गति , सो मेरी गति का अर्थ है कि जब सुग्रीव विभीषण से मिले तो उनसे बोले की तुम्हारी जैसी ही मेरी गति है | तुम भी भाई के मरने के बाद राजा बने और मैं भी | तीसरे और चौथे  पंडित के कथन रावण -- मदोदरी के सम्वाद का हिस्सा है | ये चतुराई कितने दिन चले का तात्पर्य तब से है जब मदोद्दरी ने रावण से पूछा कि सीता को आपने जो यहाँ बंदी बना कर रखा है , ये कब तक चलेगा | तब रावण ने कहा कि ' जब तक चलेगा . तब तक चलेगा ! ये बात मुखिया और गांववालों को भा गयी और उन्होंने चारो को धन देकर गाँव से विदा किया | इस तरह नाई ने अपनी चतुराई से उन चारो की लाज बचाई | इसके बाद उन चारो ने प्रण लिया कि वे दूसरो को उपदेश देने से पहले खुद घोर अध्ययन कर ज्ञानार्जन करेगे |

2 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-02-2015) को "ब्लागर होने का प्रमाणपत्र" (चर्चा अंक-1896) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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