Sunday, December 13, 2015

अंहकार ------------------ 13-12-15

अंहकार


वन में एक साधू का आश्रम था | उसने ताप के जरिये अनेक सिद्दिया हासिल की थी | इस वजह से उसके मन में तनिक दम्भ उभर आया था | उसके इस दम्भ को चूर करने  के लिए स्वंय ईश्वर एक महात्मा के वेश में उनके आश्रम पहुचे और बोले -- ' मैंने सूना है कि आपने अनेक सिद्दिया प्राप्त की है ?  साधू ने कहा -- ' जी , आपने ठीक सूना है | मैं इन सिद्दियो के बल पर कुछ भी कर सकता हूँ | ' तब महात्मा ने कहा -- ' क्या आप अपनी सिद्दी के जरिये किसी को भी पलभर में मार सकते है ? ' हाँ - हाँ !' साधू का जबाब था | तभी महात्मा ने देखा कि वही आश्रम के पास से एक हाथी  गुजर रहा था | उन्होंने साधू को सम्बोधित करते हुए कहा -- ' क्या आप इस विशाल प्राणी को अभी मार सकते है ? '
साधू ने मुस्कुराते हुए जबाब दिया -- ' इसमें कौन - सी बड़ी बात है ! यह काम तो मैं चुटकियो में कर सकता हूँ | ' यह कहकर साधू ने जमीन से थोड़ी मिटटी उठाई , उस पर मंत्र फूँका और उसे हाथी की ओर उछल देया | हाथी  तत्काल जमीन पर गिर पडा और थोड़ी देर तडपने के बाद उसके प्राण - पखेरू उड़ गये | महात्मा ने चकित होते हुए साधू से कहा -- वाकई , आपमें तो अपार शक्ति है |
मैंने तो कल्पना भी नही की थी | मुझे क्या पता कि आप वाकई हाथी को मार देंगे |
अब हाथी  की हत्या का पाप मुझे ही लगेगा | ' यह सुनकर साधू बोला -- ' आप व्याकुल ना हो , मैं इसे पुन: जीवित कर सकता हूँ | ' अच्छा , कैसे - कैसे ? महात्मा ने व्यग्र हो पूछा | तब साधू बोला -- आप खुद ही देख ले | ' 
यह कहते हुए साधू ने पहले की तरह पुन: थोड़ी मिटटी उठाई और कुछ मन्त्र पढ़ते हुए हाथी  पर दे मारा | मिटटी पड़ते ही हाथी  पुन: जीवित हो उठा | ' महात्मा हाथी को पुन: जीवित देखकर मुस्कुराए और साधू की ओर देखकर बोले -- ' आप तो कुछ भी  कर सकते है ?
साधू ने छाती फुलाकर कहा -- हाँ - हाँ ! मैं कुछ भी कर सकता हूँ | ' तब महात्मा ने कहा -- किन्तु मुझे आपसे यह पूछना है कि यह जो आपने पहले हाथी को मार दिया , फिर उसे जिला दिया , इससे आपको क्या लाभ मिला ? इससे आपकी स्वंय की कितनी उन्नति हुई ? क्या इससे आप अभी तक भगवान को पा सके ? यदि नही तो फिर इन चमत्कारों का क्या अर्थ है , इन सिद्दियो का क्या प्रयोजन ? इतना कहकर महात्मा वेशधारी भगवान वह से अंतरध्यान हो गये |

Monday, December 7, 2015

कुरान शरीफ ----------------- 7-12-15

कुरान शरीफ
इस्लाम उस परम्परा का हिस्सा है जिसमे यहूदी और ईसाई धर्म पैदा हुए | उसे इब्राहिम का धर्म कहते है | इब्राहिम का बेटा था इस्माइल | इब्राहिम को दूसरी पत्नी सारा से एक बेटा पैदा हुआ -- इसाक | सारा के सौतेलेपन से इस्माइल को बचाने की खातिर इब्राहिम ईस्माइल को लेकर अरेबिया के एक गाँव मक्का चले गये | उनके साथ एक इजिप्त का गुलाम हगर भी था | इब्राहिम और इस्माइल ने मिलकर काबा का पवित्र आश्रम बनाया | ऐसा माना जाता था कि काबा आदम का मूल आशियाना था | काबा में एक पुराना धूमकेतु गिरकर पत्थर बन गया था | कुरान के जिक्र के मुताबिक़ अल्लाह ने इब्राहिम को हुक्म दिया की काबा को तीर्थ बनाया जाए | काबा में बहुत सी पुरानी मुर्तिया भी थी , जिन्हें अल्लाह की बेटिया कहा जाता था | उन देवताओं को काबा के पत्थर से ताकत मिलती थी |
मुस्लिम परम्परा कहती है कि वह इलाका ' अज्ञान ' के युग में डूबा रहा , क्योकि वह इब्राहिम के दर्शन से दूर हट गया | सदिय गुजरी और उस इलाके में रहने वाली एक जमात में एक लड़का पैदा हुआ जिसका नाम मुहम्मद था | पैदा होने से पहले ही उसके वालिद का इन्तेकाल हो गया , और बचपन में माँ मर गयी | एक चरवाहों की टोली की स्त्री ने उसकी परवरिश की |
महम्मद जैसे ही जवान हुए , अपने चाचा के पास लौट आये और उनके साथ घुमने लगे | सफर के दौरान सीरिया की ओर बढ़ते हुए , एक ईसाई पादरी की नजर उन पर पड़ी और उसने मुहम्मद की गहरी आध्यात्मिकता को पहचान लिया | मुहम्मद और उनके चाचा एक अमीर , खुबसूरत और अक्लमंद स्त्री की सेवा में थे ; जिसका नाम था खादिजा | मुहम्मद ने खादिजा का कामकाज इतने बेहतरीन ढंग से सम्भाला कि खुश होकर खादिजा ने उनसे निकाह कर लिया | उस वक्त मुहम्मद पच्चीस साल के थे और खादिजा चालीस की |
काबा पर चल रही बुतपरस्ती से तंग आकर कुछ लोग इब्राहिम के ' एक ही अल्लाह ' वाले धर्म की अभिप्प्सा कर रहे थे | उन्हें ' हुनाफ ' कहा जाता था | मुहम्मद भी उनमे से एक थे | मुहम्मद का उसूल था कि वह हर साल रमजान के महीने में मक्का के करीब , हेरा की पहाडियों पर अपने परिवार के साथ गुफा में जाकर रहते थे और ध्यान में समय बिताते थे |
मुहम्मद जब चालीस के हुए तब की बात है : रमजान के आखरी दिनों में एक घटना घटी | वे या तो सोये हुए थे या फिर तन्द्रा में थे ; तब उन्होंने एक आवाज सुनी : ' पढ़ " |
उन्होंने कहा , ' मैं पढ़ नही सकता | '
फिर से आवाज आई :पढ़ "
मुहम्मद बोले , ' मैं पढ़ नही सकता
आवाज फिर गरजी , ' पढ़ |
मुहम्मद ने पूछा , क्या पढू
पढ़ : अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान और रहम वाला है |
पढो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया |
आदमी को खून की पुटक से बनाया |
पढो और तुम्हारा रब ही सबसे बड़ा करीम है |
जिसने कलम से लिखना सिखाया |
आदमी को सिखाया जो न जानता था .......
जब वे जग गये तो वे अल्फाज उनके जेहन में ऐसे बस गये मानो दिल पर खुद गये हो |
वे गुफा के बाहर गये और पहाड़ी पर उन्होंने फिर से वही दबंग आवाज सुनी :
‘ ऐ मुहम्मद ! तू अल्लाह का पैगम्बर है और मैं जिब्राईल हूँ | ‘
उन्होंने आँखे उपर उठाई तो उन्हें आदमी की हमशक्ल एक फरिश्ता आसमान और जमीन के बीच खड़ा दिखाई दिया | मुहम्मद स्तब्ध खड़े रह गये | जिधर मुँह करे वही उन्हें फरिश्ता दिखाई देता | आखिर जब फरिश्ता विलीन हुआ , मुहम्मद कापते हुए घर आये | खादिजा ने उन्हें बहुत धीरज बढाया | उसे मुहम्मद की पाक रूह में बहुत भरोसा था |
वह मुहम्मद को अपने चचेरे भाई के पास ले गयी जो बहुत बूढ़े और समझदार थे | उन्होंने फरमाया कि जो फरिश्ता पुराने मोजेस के पास आया था वही मुहम्मद के पास आया है और मुहम्मद अपने लोगो के पैगम्बर चुने गये है |
मुहम्मद की परेशानी की वजह यो समझी जा सकती है कि हुनाफा सच्चे मजहब को कुदरत में ढूढ़ते थे और अशरीरी आत्माओं के साथ होने वाले सम्पर्क पर भरोसा नही रखते थे | मुहम्मद यह नही समझ पा रहे थे कि उनका देखा हुआ फरिश्ता अच्छा है या बुरा | मंत्र फेरने वाले , टोना – टोटका करने वाले , यहाँ तक कि उन दिनों शायर भी अ करते थे कि उन पर जिन्न उतरा है | मुहम्मद विनम्र और खामोश तबियत के शख्स थे : अकेले रहना , मौन और शांत जीवन बिताना पसंद करते थे | पूरी मनुष्य जाति में से उन्ही को चुना जाना , उसके बाद इतने बुलंद पैगाम को लेकर इंसानों का अगुवा बनना .... उनमे डर पैदा हुआ |
बहरहाल जैसे – जैसे कुरान का संदेशा , उनके रग – रग में बैठता चला गया वैसे – वैसे उनमे नई ताकत लहराई , उन्हें सौपी गयी जिम्मेदारी का नया अहसास उभरता चला गया | लगभग तेईस साल तक उन पर कुरान की आयते उतरने का सिलसिला जारी रहा | मजेदार वाकया है कि जो पढ़ नही सकता था , उसे पढने का आदेश दिया गया | इस पवित्र किताब को ‘ अलकुरान ‘ कहा गया ; जिसका मतलब है , पढना – उस इंसान का पढ़ना जो पढ़ना नही जानता था |
तकरीबन तीन साल तक मुहम्मद अपना इहलाम अपने परिवार को सम्प्रेषित करते रहे | उनकी सबसे पहली शागिर्द उनकी बीबी खादिजा दूसरा था उनका चचेरा भाई अली , तीसरा अबू बकर ( एक सौदागर ) और चौथा उनका गुलाम झैद| उस दौरान मक्का के लोगबाग तो उन्हें पागल समझते थे | तीसरा साल खत्म होते – होते उन्हें फिर हुक्म हुआ , ‘ उठ और सावधान कर | ‘ तब से मुहम्मद लोगो के बीच जाकर उपदेश देने लगे | वे उन दिनों चल रही मूर्ति पूजा के खिलाफ बोलने लगे कि ‘ रात और दिन , विकास और विनाश , जिन्दगी और मौत , ये शक्तिशाली नियम अल्लाह की ताकत के प्रतीक है , उन्हें छोड़कर क्या मूर्तियों को पूजते फिरते हो ? ‘
बस इस उपदेश से कुरेशो की जमात और मुहम्मद के मानने वालो में चिनगार लगी जो देखते ही देखते आग में भभक उठी | मुहम्मद की शांत और अंतर्मुखी जिन्दगी जंग की बाग्दौद बन गयी | मुहम्मद और उनके मानने वाले बेइन्तहा सताए गये |
कुरान शरीफ इस्लाम का केंद्र बिनु है | कुरान के पहले हिस्सों में एक अल्लाह को कायम किया हुआ है | बाद की आयते सगठन के बारे में और मुस्लिम समूह की समाज व्यवस्था के विषय में है |
जैसे ही मुहम्मद को इलहाम होता था , वे उसे रटते थे और फिर अपने शिष्यों को कठस्थ करने को कहते थे | कुरान को कहने से उन आयतों का संगीत , सौन्दर्य और शक्ति प्रगट होती है | कुरान , कुछ दबी हुई , कुछ उदास आवाज में पढ़ा जाता है , क्योकि उस समय इंसान की जो हालत थी उससे उदास हुए अल्लाह का वह इलहाम है | मुहम्मद कहते थे , जब तुम पढ़ते हो तब रोओं | ‘ कहते है कुरान पढने से तन – मन के सारे जखम भर जाते है , निर्मलता आती है , सब कुछ घुल जाता है , जैसे कोई जादू सा तारी होता है | कुरान में यहूदी और ईसाई इतिहास की कहानिया पायी जाती है | अदम और ईव का किस्सा शुरुआत में ही दर्ज है | वही फरिश्ता जिब्राईल जिसने मुहम्मद को संदेश दिया , मेरी के पास ईसा मसीह के आने का संदेश लेकर गया था |
कुरान शरीफ के पांच वर्ग है :
खुदा क फरमान
जो खुदा ने सुझाया है लेकिन अनिवार्य नही है |
जो खुदा ने कानून औसत ठहराया |
जिसमे खुदा ने इशारा किया कि ठीक नही है , लेकिन उसे करने से मना नही किया |
जो खुदा ने बिल्कुअल मना किया है |
यह किताब कानून की पाश्चात्य धारणा से कही अधिक व्यापक है क्योकि वह जीवन के हर पहलु को छूती है | अधिकतर कानूनों पर मानवीय अदालत अम्ल नही कर सकती थी इसीलिए उसे रब की अदालत पर छोड़ा गया | कुरान शरीर के बुनियादी कानून मुसलमानों के लिए है | खुदाई नूर ने जिस नक्शे को उघाडा है , उसे हर मुस्लिम को निभाने की कोशिश करनी चाहिए |
कुरान के अल्फाज़ अल्लाह के अल्फाज है | ये सत्य के इशारे है |
ओशो का नजरिया -----
कुरान ऐसी किताब नही जिसे पढ़ा जाए , कुरान ऐसी किताब है जिसे गाया जाए | अगर तुम पढोगे तो चुक जाओगे | अगर गाओगे तो इन्शाअल्लाह प् लोगे |
कुरान किसी दार्शनिक या विद्वान् की रचना नही है | मुहम्मद बे पढ़े – लिखे थे | वे अपने नाम के दस्तखत भी नही कर सकते थे , लेकिन खुदा की खुदाई से सरोबोर थे | उनकी मासूमियत की वजह से वे चुने गये और उन्होंने गीत गाना शुरू किया ; और वह गीत है कुरान |
अरेबिक मेरी समझ में नही आती , लेकिन मैं कुरान को समझ लेता हूँ क्योकि कुरान की लय समझता हूँ , और अरेबिक सुरों की लय की खूबसूरती को समझता हूँ | मतलब की फ़िक्र किसे है ? जब तुम एक फूल देखते हो तो क्या मतलब पूछते हो ? फूल होना काफी है | आग की लपट काफी है ; उसकी खूबसूरती ही उसका मतलब है | उसकी अर्थहीनता अगर लयबद्द है तो वही उसका अर्थ है |
कुरान वैसी है | और मैं धन्यवाद देता हूँ कि परमात्मा ने मुझे इजाजत दी ... और ध्यान रहे , कोई परमात्मा नही है , यह सिर्फ कहने का एक ढंग है | कोई मुझे इजाजत नही दे रहा है ... इन्शाअल्लाह इस माला का अंत मैं कुरान से करने जा रहा हूँ – सबसे खुबसूरत , सबसे अर्थहीन , सबसे अर्थपूर्ण लेकिन मनुष्य जाति के इतिहास में सबसे अतार्किक किताब ---
--------------------------- ओशो ------- बुक्स आई हेव लव्ड पुस्तक से

Sunday, December 6, 2015

आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ? 7-12-15

आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ?
छत्रपति शिवाजी अपने कौशल के जरिये दिल्ली के बादशाह के चंगुल से छुट कर लौटे थे | रास्ते में उन्होंने अपना जीवन दाँव पर लगाते हुए एक गाँव को दस्युओ के हाथो लुटने से भी बचाया था | लौटकर आने के बाद उनका यह पहला दरबार था | सिंहासन के दाई ओर अष्ट प्रधानो के ऊँचे और भव्य आसन थे | बायीं ओर सामन्तो की पक्ति थी |
सभी सभासद अपना - अपना स्थान ग्रहण किये हुए थे | शिवाजी के लौटकर आने के बाद कोई गम्भीर समस्या नही आई थी | शत्रु का समाचार न था और नवीन आक्रमण की भी कोई योजना अभी नही थी | यो इन सबके होने पर भी शिवाजी की निष्काम कर्म - वृत्ति उनके मानस पटल पर चिंता की लकीरे नही खीचने देती थी |
सभासदों के बीच चर्चा चल रही थी |
तभी तानाबा ने एक प्रशन पूछा --- ' आखिर जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है ? ' शिवाजी इस प्रश्न का उत्तर देने वाले थे , तभी उन्हें द्वार पर समर्थ गुरु रामदास के आने की सुचना मिली | छत्रपति तुरंत द्वार की ओर दौड़ पड़े | सभासद भी उनके पीछे हो लिए | शिवाजी ने द्वार पर पहुचकर गुरु को प्रणाम किया , उन्हें सम्मानपूर्वक भीतर लेकर आये और अपने राजसिंहासन पर बिठाया | इसके बाद शिवाजी ने समर्थ गुरु से कहा -- ' प्रभु तानाबा जानना चाहते है कि जीवन का असली मतलब क्या है ? अब आप ही इस प्रश्न का समाधान करे | ' समर्थ गुरु ने शांत स्वर में जबाब दिया -- ' गति और शक्ति ! इन दोनों का संयुकत ही जीवन है और उसका मतलब है सतत जागरूकता | ' दरबार में सभी के नेत्र अब भी समर्थ गुरु के मुख पर इस तरह लगे थे कि वे अभी तृप्त नही हुए है | मूक नेत्र भाषा में सबने कुछ और सुनने की प्रार्थना की | समर्थ गुरु उन सबका मंतव्य समझ गये और बोले -- ' जिज्ञासा , पर्यटन , विचार और त्याग का अविरल प्रवाह ही जीवन है | इनमे से किसी के भी मूर्क्षित होने का मतलब है जीवन की रुग्णावस्था | इनकी निवृत्ति में मृत्यु है और पूर्णता में मोक्ष |

Saturday, November 28, 2015

बड़ा कमाल ---- 29-11-15

बड़ा कमाल


एक सनकी राजा  था | एक बार वह अपने वजीर से किसी बात पर नाराज हो गया और उसे जेल की ऊँची मीनार में कैद कर दिया  |  वजीर के लिए बस बचने की एक ही सम्भावना थी कि वह किसी तरह उस गगनचुम्बी मीनार के ऊपरी तल पर बनी खिड़की के रस्ते बाहर निकले |  उस वजीर को जब कैद करके मीनार की तरफ ले जाया जा रहा था , तो लोगो ने देखा कि वह जरा भी चिंतित व दुखी नही है , बल्कि सदा की भाँती आनन्दित और प्रसन्न है | उसकी पत्नी ने रोते हुए उसे विदा दी और पूछा -- ' तुम्हे राजा  ने कैद करने का हुकम दिया है , ' फिर भी तुम प्रसंन्न हो ? यह सुनकर वजीर बोला -- ' इसमें दुखी होने की क्या बात है ? यह कैद तो बस कुछ दिनों की है | यदि तुम मेरा साथ दो तो , मैं चुटकियो में यहाँ से बाहर निकल सकता हूँ | '' इस पर पत्नी बोली -- हाँ - हाँ बताओ , मैं तुम्हारी किस प्रकार मदद कर सकती हूँ ? तब वजीर ने उससे कहा -- रेशम का एक अत्यंत पतला सूत भी मेरे पास पहुचाया जा सकता , तो मैं स्वतंत्रत हो जाउंगा | ' उसकी पत्नी ने बहुत सोचा , लेकिन उस ऊँची मीनार पर रेशम का पतला सूत पहुचाने का कोई उपाए उसकी समझ में नही आया | तभी उसे एक फकीर मिला | फकीर ने उससे कहा -- ' भृग नाम के कीड़े को पकड़ो और उसके पैर में रेशम के धागे को बाँध दो और उसको मुछो  पर शहद की एक बूंद रखकर उसे मीनार पर चोटी की ओर छोड़ दो | उसी रात को यह उपाए किया गया | वह कीड़ा सामने मधु की गंध पाकर उसे पाने के लोभ में धीर - धीरे उपर चढने लगा | उसने अंतत: एक लम्बी यात्रा पूरी कर ली और उसके साथ रेशम का एक छोर मीनार पर बंद उस वजीर कैदी के हाथ में पहुच गया | उस रेशम के पतले धागे के सहारे ही उसकी मुक्ति की राह खुली क्योकि उससे फिर सूत के धागे से डोरी पहुच गयी और फिर डोरी से मोटा रस्सा पहुँच  गया और रस्से के सहारे वह मीनार से निकलकर बाहर आ गया | यह कथा बताती है कि यदि युक्ति से काम लिया जाए तो छोटी - छोटी चीजो के सहारे भी
बड़ा कमाल किया जा सकता है |

Friday, November 27, 2015

मित्रता का महत्व 28-11-15

मित्रता का महत्व


जंगल के बीचो बीच एक बहुत बड़ा सरोवर था  | उसके उत्तरी तट पर एक मोर रहता था | एक दिन जंगल में घूमते हुए एक मोरनी भी वहा आ गयी | मोरनी को देखकर मोर बहुँत खुश हो ज्ञा | एक दिन मौक़ा पाकर उसने मोरनी के समक्ष प्रणय का प्रस्ताव रखा | मोरनी ने उससे कहा -- मैं तुम्हे अपना जीवन साथी बना लूँ , पर मैं यह जनाना चाहती हूँ कि तुम्हारे मित्र कितने है ? इस पर मोर ने कहा --- ' मेरा तो एक भी मित्र नही है | '  यह सुनकर मोरनी ने उसके साथ जोड़ा बनाने से इनकार कर डिया | अब मोर सोचने लगा कि सुखपूर्वक रहने के लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है | उसने सरोवर के पूर्वी तट पर रहने वाले एक शेर , पश्चिमी तट पर रहने वाले कछुए और बगल में रहने वाली टिटहरी ( जो शेर के लिए शिकार का पता लगाने का काम करती थी ) से दोस्ती कर ली | अब मोर एक बार मोरनी के पास पहुचा और उसने अपने मित्रो के नाम गिनाये | यह जान्ने के बाद मोरनी उसके साथ रहने के लिए तैयार हो गयी | अब उन्होंने वही एक पेड़ पर अपना आशियाना बना लिया और सुखपूर्वक रहने लगे | उस पेड़ पर और भी कई पछियो का बसेरा था | कुछ दिन बाद मोरनी ने घोसले में अंडे दीये | एक दिन जंगल में शिकारी आये | उन्हें दिनभर जंगल में भटकने के बाद वावजूद कोई शिकार नही मिला | आखिर शाम को थक - हार कर वे उसी पेड़ की छाया में आकर ठहर गये और सोचने लगे किपेड़ पर चढ़कर अन्डो - चूजो से भूख मिटाई जाए | यह देखकर मोर दम्पत्ति को बेहद चिंता हुई | मोर सहायता के लिए मित्रो के पास दौड़ा | मोर को मुसीबत में देख टिटहरी ने जोर - जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया | शेर समझ गया कि कोई शिकार है | वह उसी पेड़ के नीचे चला जहा शिकारी बैठे थे | इतने में कछुआ भी पानी से निकलकर बाहर आ गया | शेर से डर कर भागते शिकारियों ने कछुए को ले चलने की बात सोची | जैसे ही उन्होंने कछुए को पकड़ने के लिए हाथ बढाया , कछुआ पानी में खिसक गया और शिकारियों के पैर वही दलदल में फंसकर रह गये | इतने में शेर वह आ गया और उन्हें ठिकाने लगा दिया | यह देख मोरनी ने मोर से कहा --- ' मैंने तुम्हारे साथ जोड़ा बनाने से पूर्व मित्रो के बारे में पूछा था | सो बात काम की निकली ना ! यदि आज ये मित्र ना होते , तो हमारी खैर नही थी | ' मोर ने भी उसकी बात से सहमती जताई और जीवन में मित्रता का महत्व समझाने के लिए उसे धन्यवाद दिया |

क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ? 28-11-15

क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ?
हम आधुनिक युग में जी रहे है | आधुनिक युग की बाज़ार व्यवस्था में जी रहे है | क्योंकि हमारे भोजन - वस्त्र , घर - मकान , शिक्षा - इलाज़ की सभी बुनियादी जरूरते बाज़ार से जुड़ने पर ही मिल पाती है और फिर छोटे - बड़े लाभ - मुनाफे कमाना तो बाज़ार व्यवस्था का अपरिहार्य हिस्सा है और यही बाज़ार व्यवस्था का वास्तविक लक्ष्य भी है | वर्तमान सामाजिक - व्यवस्था को बाज़ार व्यवस्था क्यों कहा जा रहा है ? इसका एकदम सीधा जबाब है कि इस सामाजिक व्यवस्था में राष्ट्र व् समाज के सभी लोगो को खरीद - बिक्री की प्रक्रिया से जुड़ना लाजिमी है | कुछ भी पाने के लिए कुछ बेचना और खरीदना जरूरी है | कुछ बेचे बिना कोई भी कुछ खरीद नही सकता | उदाहरण के लिए मजदूर को अपना भोजन , कपड़ा खरीदने के लिए अपनी श्रमशक्ति को बेचना जरूरी है .अपरिहार्य है | किसानो को अपनी खेती के लिये तथा अपने कपड़े -लत्ते तथा दूसरी जरुरतो के लिए अपने कृषि उत्पाद को या अपने किसी सदस्य की श्रम शक्ति को बेचना जरूरी है | यही स्थिति तमाम छोटे उत्पादकों की है |
इसके अलावा, चिकित्सा , शिक्षा तथा कानून व न्याय के क्षेत्र के लोगो के लिए भी जरूरी है कि वे पहले अपनी बौद्धिक क्षमता को बेचने लायक बने| इसके लिए विभिन्न क्षेत्रो का शिक्षा ज्ञान हासिल करे | फिर अपने शिक्षा ज्ञान का बिक्री - व्यापार करे | चाहे उसका नौकरी के जरिये वेतन आदि के रूप में मूल्य पाए या फिर अपने निजी काम धंधे के जरिये उसका व्यापार करे| अपनी सेवा का कम या ज्यादा मूल्य पाए और फिर उससे अपने जीवन को संसाधनों , सुविधाओं को खरीदे | व्यापारियों , उद्योगपतियों के मालो , सामानों की बिक्री से लाभ - मुनाफे के लिए आवश्यक ही है की वे अपने मालो , सामानों की बिक्री बाज़ार बढाये | इसी लक्ष्य से उत्पादन विनिमय को संचालित करे| यही वह हिस्सा है , जो बाज़ार - व्यवस्था का प्रबल हिमायिती है | उसका संचालक है | इसे आप इस तरह भी कह सकते है कि जंहा व्यापारी , उद्योगपति नही है या छोटे स्तर के है तो वंहा बाज़ार व्यवस्था नही है | अगर कंही व्यापारी व उद्योगपति अत्यंत छोटे स्तर के है तो इस बात का सबूत है कि अभी वंहा छोटे - मोटे बाज़ार तो है , पर बाज़ार व्यवस्था भी नही है | उदाहरण ---- आज से 100 - 200 साल पहले भारतीय समाज में खासकर ग्रामीण समाज में लोगो के आवश्यकताओ कि पूर्ति ग्रामीण समाज में मौजूद श्रम विभाजन से ही पूरी हो जाती थी | किसी ख़ास सामान के लिए ही उन्हें बाज़ार जाना पड़ता था |लेकिन आधुनिक बाज़ार व्यवस्था के आगमन के साथ बाज़ार का यानी खरीद - बिक्री केंद्र का विकास नगर , शहर , कस्बे से होता हुआ हर चट्टी - चौराहे तक फ़ैल गया है | हर आदमी खरीद - बिक्री कि प्रक्रिया से जुड़ गया है और अधिकाधिक जुड़ता जा रहा है |आधुनिक युग कि बाज़ार व्यवस्था ने हर किसी कि महत्ता महानता को चीन लिया है , कयोंकि हर तरह का हुनर , ज्ञान , अनुभव , बिकाऊ माल बन गया है | उसे पाने का लक्ष्य मालो , सामानों कि तरह ही उसकी खरीद - फरोख्त बन गया है |आज कोई आश्चर्य नही कि , मनुष्य का मूल्य उसके गुणों के आधार पर नही बल्कि खरीद - बिक्री की क्षमता के आधार पर किया जा रहा है |इस बाज़ार व्यवस्था का अनिवार्य पहलु यह भी है कि यदि किसी के पास बेचने के लिए कुछ भी नही है या जिसका श्रम - सामान बिकाऊ नही है तो उसके जीने का अधिकार भी नही है |फिर तो वह किसी के सहारे या फिर भीख - दान अथवा ठगी , चोरी के जरिये ही जीवन जी सकता है |बाज़ार व्यवस्था के वर्तमान दौर के विकास में यही हो रहा है |आधुनिक आर्थिक व तकनिकी विकास के दौर में साधारण श्रम और साधारण उत्पादन कि बाज़ार में मांग घटी जा रही है | या तो उनकी बिक्री ही नही हो पा रही है , या फिर उनका मूल्य इतना कम है कि उससे न तो उपभोग के सामानों को खरीदकर श्रम शक्ति का पुनरुत्पादन किया जा सकता है और न ही बढ़ते लागत के चलते उन साधारण मालो , सामानों का ही पुन: उत्पादन किया जा सकता है | साधारण मजदूरों , किसानो ,सीमांत व छोटे किसानो, दस्तकारो तथा छोटे कारोबारियों कि यही स्थिति है| वे बाज़ार में टूटते जा रहे है |
चूँकि वर्तमान दौर की बाज़ार व्यवस्था विश्व - बाज़ार व्यवस्था का एक अंग है | इसका संचालन व नियंत्रण देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से कर रहे है | उसे वे अपने जैसे लोगो के लिए या फिर अपने सेवको के लिए बाज़ार व्यवस्था को बदल रहे है |आम आदमी को उससे बाहर करते जा रहे है |बेकार , बेरोजगार , संकटग्रस्त होकर जीने और मरने के लिए छोड़ते जा रहे है |क्या यह बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण के जीवन- यापन कि उसके बुनियादी हितो कि विरोधी नही है ? क्या जनहित में देश व समाज कि व्यवस्था में जनसाधारण कि आवश्यकतानुसार बदलाव अनिवार्य , अपरिहार्य नही हो गया है ?
क्या इस देश के लोगो को इसपे सोचना नही चाहिए ..............!!
सुनील दत्ता ---- स्वतंत्र पत्रकार -- समीक्षक

Monday, November 23, 2015

मानव पूजी से ही होगा सबका विकास 24-11-15

मानव पूजी से ही होगा सबका विकास

स्वस्थ और सुशिक्षित नागरिक ही किसी देश के विकास की जमानत होते है | अर्थशास्त्र की शब्दावली में इसे मानव पूजी कहा जाता है | अर्थशास्त्र में , आम तरीके से उत्पादन के पांच साधन माने जाते है , जिसमे श्रम व पूजी दो महत्वपूर्ण सक्रिय साधन माने गये है | नोबेल पुरूस्कार विजेता अर्थशास्त्री थ्योडोर शुल्त्ज ने 1961 में पहली बार मानव पूजी का तसव्वुर पेश किया | अमेरिकन इकोनामिक रिव्यू के मार्च 1961 के अंक में प्रकाशित उनके आलेख में उन्होंने व्यक्ति की शिक्षा , प्रशिक्ष्ण , कौशल उन्नयन आदि पर किये जाने वाले सभी व्यव उसकी उत्पादकता कार्यकुशलता , तथा आमदनी में वृद्दि करते है | वही मानव पूजी की भूमिका के बारे में नोबल पुरूस्कार से सम्मानित अमेरिका के ही एक और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री गैरी बेकर ने कहा था कि मानव पूजी का आशय दक्षता , शिक्षा स्वास्थ्य और लोगो को प्रशिक्ष्ण से है | यह पूजी है क्योकि ये दक्षताए या शिक्षा लम्बे समय तक हमारा अभिन्न बनी रहेगी | उसी तरह जिस तरह कोई मशीन , प्लाट या फैक्ट्री उत्पादन का हिस्सा बने रहते है | किस्सा कोताह यह है कि सैद्दांतिक रूप से पूजी दो प्रकार है | पहली वो जो मूर्तरूप में दिखाई देती है -- भौतिक पूजी है | इस पूजी का उत्पादन कार्य में प्रत्यक्ष प्रयोग होता है | दूसरी , मानव पूजी जो मूर्तरूप से दिखाई नही देती लेकिन जो उत्पादन की गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों में वृद्दि करती है | उसमे श्रमिक के श्रम कौशल के साथ - साथ , स्वरोजगार करने वाले व उद्यमी का उद्यमिता कौशल भी शामिल होता है | बेकर कोरिया का उदाहरण देते हुए कहते है कि समूचा कोयला उत्तरी कोरिया में है , दक्षिण कोरिया में नही | कोरियाई युद्द से पहले उत्तरी कोरिया - कोरिया का अपेक्षाकृत समृद्द हिस्सा था | आज उत्तर कोरिया आर्थिक रूप से चरमराया गया है | जबकि दक्षिण कोरिया समृद्द लोकतांत्रिक देश के तौर पर उभरा है | मुझे लगता है कि दक्षिण कोरिया की समृद्दी इसीलिए है कि उसने अपनी आबादी की प्रतिभा को प्रोत्साहन देने और उसका उपयोग करने को लेकर खासा प्रयास किया | मतलब यह है कि मानव पूजी वह महत्वपूर्ण सम्पत्ति है , जिसके जरिये भौतिक संसाधनों की कमी के वावजूद प्रगति का रास्ता तेजी के साथ तय किया जा सकता है |
पिछले हफ्ते विश्व आर्थिक मंच यानी डब्लूईएफ द्वारा जारी ह्यूमन कैपिटल रिपोर्ट 2015 के अनुसार , 124 देशो की सूची में भारत मानव पूजी सुचांक में 57.62 अंक के साथ 100वे स्थान पर है | डब्लूईएफ द्वारा तैयार की गयी मानव पूजी रिपोर्ट के अनुसार भारत , न केवल ब्रिक्स देशो - रूस , चीन , ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रिका से नीचे है , बल्कि भारतीय उपमहादीप के उसके पड़ोसी देशो श्रीलंका , भूटान , तथा बाग्लादेश से भी नीचे है | मानव पूजी के दोनों आयामों - शिक्षा और स्वास्थ्य में भारत की हालत पतली है | हाल ही में साख्यिकी और कार्यक्रम कार्यन्वयन मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय ने 71 वे दौरे के सर्वेक्षण के आकडे जारी किये है | इस दौर का सर्वेक्षण ' सामजिक उपयोग शिक्षा ' विषय पर कराया गया था | इन आकड़ो के मुताबिक़ , ग्रामीण इलाको में साक्षरता दर 71 प्रतिशत है , जबकि इसकी तुलना में शहरी इलाको में यह 86 फीसदी है | साथ ही साठ वर्ष और उससे अधिक उम्र वाली साक्षर महिलाओं की तुलना में पुरुषो में अधिक साक्षरता देखी गयी |
यह तो रही सिर्फ साक्षरता की बात | ध्यान रहे , तकनीकी रूप से साक्षर होने में और वास्तविक साक्षर में बड़ा अंतर है | असलियत में अधिसंख्य साक्षर अर्धसाक्षर ही है | उच्च शिक्षा , जो की मानव पूजी का अहम् हिस्सा है , में भारत का प्रदर्शन काफी निराशाजनक है | आंकड़े बताते है कि ग्रामीण इलाको में 4.5 फीसदी पुरुषो और 2.2 फीसदी महिलाओं ने स्नातक या उससे अधिक स्तर की शिक्षा पूरी की है | वही शहरी इलाको में 17 प्रतिशत पुरुषो और 12 प्रतिशत महिलाओं ने इस स्तर तक शिक्षा पूरी की | मतलब साफ़ है आर्थिक विकास की नित - नई सीढिया चढ़ता भारत अभी भी उच्च शिक्षा के मामले में काफी पीछे है |
दूसरी तरफ , स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी कोई तसल्लीबख्श प्रदर्शन नही है | कुछ समय पहले ' सेव द चिल्ड्रन ' की विश्व की माओ की स्थिति पर जारी एक रिपोर्ट में भारत को दुनिया के 80 कम विकसित देशो में 76 वा स्थान मिला है | इस मामले में भारत कई गरीब अफ़्रीकी देशो से भी पीछे है | रिपोर्ट के मुताबिक़ , भारत में हर 140 महिलाओं में से एक पर बच्चे को जन्म के दौरान मरने का जोखिम रहता है | यह आकडा चीन और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशो की तुलना में कही अधिक है | चीन में हर 1500 महिलाओं में एक महिला पर प्रसव के दौरान मौत का खतरा होता है , वही श्रीलंका में यह आकडा 1100 पर एक और म्यामार में 180 पर एक है | ध्यान रहे की संयुक्त राष्ट्र की ' द पावर आफ 1.8 बिलियन ' नामक रिपोर्ट के मुताबिक़ , कुल जनसंख्या के मामले में हलाकि भारत चीन से पीछे है , लेकिन 10 - 24 साल की उम्र के 35.6करोड़ लोगो के साथ भारत सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है | रिपोर्ट में कहा गया है की अपनी बड़ी युवा आबादी के साथ विकासशील देशो की अर्थव्यवस्थाए नई उंचाई पर जा सकती है , बशर्ते वे युवा लोगो की शिक्षा व स्वास्थ्य में भारी निवेश करे |
अगर देश को दीर्घकालिक विकास के पथ पर ले जाना है तो इसके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रो में पहल तो करनी ही होगी | इस साल के बजट आवटन में इन क्षेत्रो को भारी अनदेखी हुई है | जाहिर है कि अगर मानव पूजी निर्माण करना है तो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को और ज्यादा मजबूत और जिम्मेदार बनाना होगा | और ऐतिहासिक तौर पर यह स्वंय - सिद्द तरीका भी है |