Friday, November 21, 2014

22- 11 - 2014


घुड़सवार ने दिया स्वावलबन का सबक --------------
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एक घुड़सवार कही जा रहा था | रास्ते में उसे पैदल यात्रियों का एक काफिला मिला | घुड़सवार भी धीरे - धीरे उन्ही लोगो के साथ चलने लगा | उनके बीच विभिन्न मुद्दों को लेकर चर्चा चल पड़ी | वे बातचीत करते हुए चले जा रहे थे कि तभी घुड़सवार के हाथ से चाबुक छूटकर जमीन पर गिर पडा | लेकिन घुड़सवार ने किसी से भी चाबुक उठाकर देने के लिए नही कहा | वह घोड़े से उतरा और चाबुक स्वंय उठाकर पुन: सवार हो गया | यह देखकर साथ चल रहे लोगो ने कहा ' अरे भाई साहब आपने इतना क्यों कष्ट किया ? चाबुक तो हम लोग ही उठाकर दे देते | इतने से काम के लिए आप स्वंय  क्यों घोड़े से उतरे ? यह सुनकर घुड़सवार बोला भाइयो आपका यह कहना आपकी सज्जनता का प्रमाण है | लेकिन मैं आपसे सहायता क्यों लेता ? ईश्वर यही कहते है कि जिसका उपकार प्राप्त हो , बदले में जहा तक हो सके हमे भी उसका उपकार करना चाहिए | उपकार के बदले प्रत्युपकार करने की स्थिति हो , तभी उपकार का भार सिर उठाना चाहिए | मैं आपको पहचानता नही , न  न ,तो आप ही मुझे जानते है | राह में अचानक हम लोगो का साथ हो गया है | फिर कब मिलना होगा कुछ पता नही | ऐसी हालत में मैं भला आपके उपकार का भार कैसे उठा सकता था ? इस पर साथ चल रहे लोग बोले -- अरे इसमें उपकार की क्या बात है ? आप जैसे भले आदमी के हाथ से चाबुक नीचे गिर पडा , उसे उठाकर हम दे देते | हमे मेहनत ही क्या होती ? तब घुड़सवार ने कहा -- चाहे  यह छोटी - सी बात या छोटा सा काम ही क्यों न हो पर मैं लेता तो आपकी सहायता ही न! मेरा यह मानना है कि छोटे - छोटे कामो में भी दुसरो की मदद लेने की आदत पड़ जाती जाती है | इससे आगे चलकर मनुष्य अपने स्वावलबी स्वभाव को खोकर पराधीन बन जाता है | जब तक कोई विपत्ति न आये या आत्मा की उन्नति के लिए आवश्यक न हो , तब तक केवल आराम के लिए किसी से भी किसी तरह की सहायता नही लेना चाहिए |

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (23-11-2014) को "काठी का दर्द" (चर्चा मंच 1806) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपका आशीर्वाद बना रहे बाबूजी

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