Tuesday, July 16, 2019

मोपला आन्दोलन

लहू बोलता भी है ---- जंगे -आजादी -ए-हिन्द को परवान चढाया

मोपला आन्दोलन

मोपला आन्दोलन केरल के मुसलमानों का बहुत मशहूर आन्दोलन है , जो सन 1920 में शुरू हुआ था | मोपला मुसलमानों की वह बिरादरी है , जो अरब से 8वी सदी और उसके बाद भारत आई थी | उन्होंने इसी सर जमीन को अपना मादरे वतन बना लिया | ज्यादातर लोगो ने तो केरल एवं मालाबार के इलाको में मुकामी औरतो से शादी करके वही रहना पसंद किया | मुकामी जुबान में मोपला का मतलब दामाद होता हैं , जिन्हें हिन्दुस्तानी तहजीब में बड़ी इज्जत और वकार से देखा जाता है | बाद में उनकी औलादे भी इसी नाम से जानी गयी | इसके अलावा वहाँ की मुकामी आबादी ने भी बड़ी तादात में इस्लाम कबूल कर लिया | यही वजह है कि आम मुसलमान भी वहाँ इसी नाम से जाना जाता हैं | रवायत है कि जब मुस्लिम दरवेशो का एक काफिला लंका में हजरत आदम के नक्शे - कदम की जियारत के लिए जा रहा था , जो मुखालिफ तेज हवा तूफ़ान की वजह से उनका जहाज मालाबार के शहर कुदान - किलोर (कुंदगानुर ) के साहिल पर पहुच गया | वहां के राजा जेम्रूरन ( सामरी ) ने उनकी बड़ी खातिर की और उनसे उनके धर्म की जानकारी ली | राजा उनके बयानात और बातचीत से इतना असरअंदाज हुआ कि दरवेशो का वह काफिला जब जियारत करके लौटा तो राजा भी अपने राजपाट को अपनी हुकूमत के सरदारों के सुपुर्द करके खुद भी उनके साथ मक्का अरब चला गया और वही उसका इंतकाल हो गया | लेकिन जाने से पहले वह अपनी वसीयत कर गया कि इस्लाम फैलानेवाले व्यापारियों को मालाबार में सौदागरी करके यहाँ की तरक्की करने में मदद की जाए | उसने अपने मातहतों से भी कहा कि मोपले हमारे होकर आये है , लेकिन अब यही के बाशिंदे हैं | उन्हें तब तक प्यार से रखना जब तक की मैं लौटकर न आऊ | तारीखनवीसो के मुताबिक़ जब सामरी गद्दी नशींन होता , तो मुसलमानों जैसे कपडे पहनता और कोई मोपला ही उसके सिर पर राजा का ताज रखता था | यह आपसी इत्तेहाद का नमूना था , जो उस वक्त अंग्रेज अफसरों को रास नही आया | इतिहासकार डा ताराचन्द्र के अनुसार मोपले एक नए मजहब के साथ आये और यहाँ के लोगो को इतना असरदार अंदाज किया कि बड़ी तादात में स्थानीय लोग मुसलमान होने लगे | यहाँ तक की महाराजा जनसल पेरूयल ने भी इस्लाम मजहब अपना लिया | अब आबादी के साथ - साथ मोपलाओ का असर बढने लगा | यह बरतानवी अधिकारियो को खटकने लगा | लिहाजा कोई न कोई बहाना बनाकर अंग्रेजो ने इन पर जुल्म करना शुरू किया | मुकामी जमींदारों को भी चूँकि इनसे खतरा दिखने लगा , इसलिए अंग्रेजो ने इन्हें मोपलाओ के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया | चूँकि जमींदार नम्बूदरी ब्राह्मण हिन्दू थे , इसलिए जमींदारों के जरिये हिन्दुओ को आन्दोलन से हटाने में अंग्रेज कामयाब हो गये | फिर मोपलाओ पर जुल्म बढ़ता गया | अंग्रेजो की नजर में मोपले टीपू सुलतान के माननेवाले थे | मालाबार में देश की आजादी की लड़ाई की इससे पहले कोई नजीर नही मिलती हैं | पहली बार 16 फरवरी 1920 को कुछ कांग्रेसी आंदोलनकारी यहाँ आये थे और सिर्फ हालात देखकर लौट गये | उनके लौटते ही 4 लोग गिरफ्तार कर लिए गये : जिनसे कांग्रेस नेताओं की मुलाक़ात हुई थी | इसमें दो हिन्दू और दो मुसलमान ( मोपले ) थे , जिन्हें जंगे -आजादी का आन्दोलनकारी बताया गया था | इसके बाद से ही यहाँ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ माहौल बनने लगा | इससे पहले कांग्रेस की यहाँ कोई सरगर्मी नही थी , यहाँ तक कि उनका कोई आफिस भी नही था | इसके बाद जंगे - आजादी के कांग्रेस से जुड़े लोग यहाँ खुफिया तरीके से मुकामी लोगो को आन्दोलन की वजह और अंग्रेजो की जुल्मो - ज्यादतियों से आगाह कराने लगे | कांग्रेस नेता अंग्रेजो के जरिये तुर्की के माननेवालो पर की गयी अत्याचार के बारे में मोपलो को बताते थे वे यह भी बताते कि अंग्रेजी हुकूमत शैतानी हुकूमत है , जिसमे इस्लाम के साथ - साथ आम हिन्दुस्तानी जिसमे हिन्दू भी हैं के साथ क्या - क्या किया ! इसलिए पूरे देश में हिन्दू - मुसलमानों को मिलकर आजादी की जंग लड़नी चाहिए और वे ऐसा कर भी रहे हैं | लिहाजा आप लोग एक जुट होकर अंग्रेजो का मुकाबला करने को तैयार हो जाए | इस प्रचार का काफी असर हुआ , जिसमे होमरूल - लीडर एनी बेसेंट ने हिस्सा लिया था | मौलाना मोहम्मद अली जौहर का मोपलो के साथ साथ सभी हिन्दुओ ने भी जबर्दस्त इस्तेकबाल किया | बाद में इसी काफ्रेंस में महात्मा गांधी और मौलाना शौकत अली भी शरीक हुए थे | इन नेताओं के भाषण के बाद तो जैसे पूरा इलाका आन्दोलनमय हो गया | इतना जोश पैदा हुआ कि जहाँ कांग्रेस का एक भी दफ्तर नही था , वही देखते देखते छोटे बड़े 200 दफ्तर खुल गये और बहुत कम वक्त में 28.000 सदस्य बन गये जिसमे 20.000 तो मुसलमान थे |देश के दूसरे हिस्सों में चलनेवाले स्वतंत्रता - आन्दोलन की तर्ज पर यहाँ भी अब सभाए विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये | अब अंग्रेजो का जुल्म भी शुरू हो गया | जैसे - जैसे जुल्मो ज्यादतिया होती वैसे वैसे आन्दोलन बेकाबू होता गया | फरवरी सब 1921 में कलक्टर ने हाजी कुल्ले अहमद , माधवन नायर के अरनाड वगैरह की कयादत में होने वाले अवामी जलसों पर पाबंदी लगा दी | बाद में अंग्रेजो ने इसे मुकामी सतह पर मुसलमानों का आन्दोलन साबित करके हिन्दू - मुसलमान इख्तिलाफ बढाकर जमींदारों के आदमियों से मिलकर फिरकावाराना मोड़ देने में कामयाब हो गये |
आन्दोलन थोडा कमजोर तो हुआ लेकिन मोपला मुत्तहिद होकर आन्दोलन ,में लग गये | इस बीच अंग्रेजो से लड़ते हुए 100 मोपले मारे गये | पहले के आन्दोलन में 82 गैर - मोपले भी अंग्रेजो के हाथो शहीद हो चुके थे |मोपले आंदोलनकारियो और अंग्रेज हुकूमत के बीच कई झड़पो और आमने - सामने की लड़ाइयो का हवाला मिलता है | उनमे 2 अगस्त सन 1921 को तिरुवरनगादी में पुलिस फायरिंग में 9 मोपले शहीद हुए | उसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने तलाशी के नाम पर मस्जिदों में घुसकर काफी जुल्म किया जिससे मोपला समाज पूरी तरह बेचैन हो गया और अपने अपने इलाको में रोड पर पेड़ो को काटकर डाल दिया | रास्ता बंद होने पर उन्होंने सभी सरकारी इमारतों स्टेशन रेलवे लाइन कचहरी सभी जगह तोड़ फोड़ और आगजनी भी किया जिससे प्रशासन पूरी तरह पंगु हो गया | इस लड़ाई में भी 29 मोपले शहीद हुए | 6 माह की इस बगावत में अंग्रेजो के जुल्म की एक ख़ास वारदात यह थी कि मालापुरम के एम् एस पी ग्राउंड पर मोपले जब सभा कर रहे थे तभी अंग्रेजी पुलिस ने घेर कर उन पर बेतहाशा गोलिया चलाई जिसमे हजारो मोपले शहीद हुए और जो बचे थे , उन्हें अंग्रेजो ने गिरफ्तार करके अंडमान - निकोबार ( कालापानी ) भेज दिया | इस बरबरियत में सैकड़ो लोगो की रास्ते में ही दम घुटने से मौत हो गयी | इसके बाद भडकी हिंसा ने अंग्रेजी सेना को पीछे धकेल दिया | मोपलो ने अब अपनी आजादी का एलान कर दिया और खिलाफत फ़ौज के आलाकमान हाजी कुंजाबयम को राजा घोषित किया जबकि अली मुसायार को काजी बनाया गया | अरनाड व बालबनाड को राजधानी बनाया गया | खिलाफत का झंडा फहराकर मोपला सरकार बना दी गयी | अंग्रेज ने मार्शल - ला लगाकर मोपलो के आन्दोलन को दबाने की कोशिश की , लेकिन उस वक्त वे कामयाब न हो सके | कई महीनों आजाद हुकूमत चली उसके बाद अंग्रेज दोबारा काबिज हुए |
संदर्भ -- सैय्यद शाहनवाज अहमद कादरी --

प्रस्तुती - सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (17-07-2019) को "गुरुसत्ता को याद" (चर्चा अंक- 3399) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    गुरु पूर्णिमा की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete