Sunday, October 18, 2015

150 वर्षो की एक कहानी --- बाल साहित्य 19-10-15

अपना शहर --
150 वर्षो की एक कहानी
कल रात अक्टूबर का अहा जिन्दगी अंक पढ़ रहा था उसमे जितेन्द्र द्वारा एक लेख बहुत ही पसंद आया | इस वक्त मेरी सबसे छोटी बेटी श्रुति आई हुई है वो अपनी बड़ी बहनों से ज्यादा गंभीर है |उसने अचानक मुझे पूछा अच्छा बाबा आप बताओ यह बच्चो की कहानी में एक पात्र है ऐलिस आप उसे जानते हो ? संयोग ही था मैं उसी के बारे में पढ़ रहा था मैंने उससे पूछा तुम कैसे जानती हो ? उस पात्र को तब उसने बोला मेरे स्कुल की टीचर बता रही थी उसी ऐलिस को आज भी जिन्दा किये हुए है ''लेविस'' कैरल उसका कुछ अंश आप सबको साझा कर रहा हूँ |
150 वर्षो की एक कहानी
आज जब हम बाल साहित्य की बात करते है , तो बरबस हमारा ध्यान 1862 से पहले के उस साहित्य की ओर चला जाता है , जब वह नीति तथा नैतिकता के बंद गलियारों में कैद था और अक्सर बाल कहानिया यह सीख देने तक सीमित थी कि अच्छे बच्चो को कैसे होना चाहिए और खराब बच्चो को हमेशा अपने बुरे व्यवहार के लिए सजा क्यों मिलती है |
1865 में पहली बार ब्रिटिश साहित्यकार ''लेविस कैरल '' ने अपने पहले उपन्यास '' ऐलिसेज एडवेंचर इन वंडरलैंड ' से उस समय के बाल साहित्य को इन तमाम सीमाओं से बाहर निकाल कर न केवल उसे कल्पना के पंख लगाकर खुले आकाश में विचरण करने के लिए स्वतंत्रत कर दिया ,वरन इस विश्व प्रसिद्द उपन्यास के माध्यम से उन्होंने आधुनिक बाल साहित्य की भी नीव रखी |
4 जुलाई 1862 का वह ऐतिहासिक दिन , जब गणित के एक शर्मीले लेक्चरर चार्ल्स लुटविज डाजसन ( कैरल|का वास्तविक नाम ) अपने आक्सफोर्ड स्थित क्राइस्ट चर्च कालेज के डीन हेनरी लिडेल तथा उनकी तीन नन्ही - मुन्नियो बेटियों - एडिथ , लौरिना तथा ऐलिस के साथ टेम्स नदी में , जो आगे चलकर आईसि नदी में तब्दील हो जाती थी , नौका - विहार के लिए निकले | इस नौका विहार के दौरान ऐलिस ने बाल सहज उत्सुकता के साथ कैरल से कोई कहानी सुनाने का अनुरोध किया | ऐलिस के साथ - साथ उसकी दोनों बहने भी जब इस अनुरोध में शामिल हो गयी , तो फिर भला कैरल उन्हें कैसे निराश कर सकते थे | उन्होंने खुद ऐलिस को ही अपनी कहानी की नायिका बनाते हुए कहानी शुरू की ... वे रहस्य और रोमांच से भरी अपनी कहानी हाथ के हाथ गढ़ते जा रहे थे और बच्चो को सुनाते जा रहे थे | उन तीन बच्चियों के साथ - साथ उनके माता - पिता भी इस अदभुत कहानी में इस कदर खो गये थे कि उनमे से किसी को भी पता ही नही चला कि यह नौका - विहार कब खत्म हो गया था और इस तरह जन्म लिया एक ऐसी अनोखी दास्ताँ ने , जो पिछले डेढ़ सौ सालो से दुनिया भर के अनगिनत बच्चो का मनोरंजन करती आ रही है और जिसके माध्यम से अनजाने में ही कैरल ने आधुनिक बाल - साहित्य के एक गौरवशाली अध्याय की भी शुरुआत कर दी थी |
नौका विहार से लौटने के बाद ऐलिस के साथ - साथ उसके पिता हेनरी लिडेल ने भी डाजसन से अनुरोध किया की वे इस कहानी को उपन्यास का स्वरूप दे , ताकि दुसरे बच्चे भी इस कहानी को पढ़ सके | आखिर डाजसन अपनी इस कहानी को उपन्यास की पांडुलिपि का स्वरूप देने के इस आग्रह को टाल नही पाए , लेकिन उन्हें इसे लिखने में ढाई साल लग गया | उन्होंने न केवल यह कहानी लिखी वरन अपने हाथ से बीच - बीच में इसके चित्र भी बनाये |
खो गयी ऐलिस --
वह ऐलिस , जिसके लिए डाजसन ने नौका -- विहार करते समय यह अमर गाथा गढ़ी थी , बड़ी होकर शादी , परिवार तथा फिर गुमनामी के अँधेरे में कही खो गयी , लेकिन गणित के प्राध्यापक डाजसन के उपन्यास की सात वर्षीय नायिका ऐलिस , जिसने आज से डेढ़ सौ साल पहले एक खरगोश के बिल के मार्ग से एक हैरतअंगेज दुनिया में प्रवेश किया था , जहा एक मशरूम पर बैठा हुक्कापीता कैटरपिलर पूछता है की तुम कौन हो और जो इस अदभुत दुनिया में हैटर , सफेद खरगोश तथा ' आफ विद हिज हैड ' जैसे पात्रो से रूबरू होती है , दुनिया भर के बच्चे , जवान तथा बूढ़े पाठको के दिलो में आज भी ज़िंदा है |

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-10-2015) को "हमारा " प्यार " वापस दो" (चर्चा अंक-20345) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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