Tuesday, October 20, 2015

भारत का जवान भटका नही ------- २१-१०-१५

अपना शहर ---

भारत का जवान भटका नही -------
कैथी ( बनारस ) से वापस आने का मन बनाया था की यहाँ से रेल यात्रा करूंगा सो मैंने वल्लभा भाई से बोला इहा से नजदीक तो मऊ पड़ेगा सो रेल यात्रा ठीक होगा इसी बहाने डेढ़ किलोमीटर दूर रजवारी स्टेशन देखने को मिला , स्टेशन तो बहुत पुराना है पहले यह जगह काशी नरेश का बाग़ था बाद में उन्होंने यहाँ की जमीन रेलवे को दे दिया | रजवारी का स्टेशन अब फिर से नए स्वरूप में आने की तैयारी में है बनारस से पसिंजर आने में देर थी वल्लभ भाई भी साथ थे सोचा स्टेशन घूम लूँ इसी दौरान उनसे बात होने लगी नौजवानों पर मैंने बोला कि भाई अज का नौजवान तो भटका नही है देश की बूढी पीढ़ी की राह अचानक व्यर्थ हो गयी है |
हिन्दुस्तान ने पांच हजार सालो में जमीन पर चलने लायक रास्ता नही बनाया , स्वर्ग पर पहुचने के रास्ते खोजे | स्वर्ग पर पहुचने के रास्ते खोजने में हम पृथ्वी पर रास्ता बनाने भूल गये है |
वल्लभ भाई ने पूछा कहा जाता है कि भारत का जवान राह खो बैठा है | उसे सच्ची राह पर कैसे लाया जा सकता है ?
पहली यह बात ही झूठ है कि भारत का जवान राह खो बैठा है | भारत का जवान राह नही खो बैठा है , भारत की बूढी पीढ़ी की राह अचानक आकर व्यर्थ हो गयी है , और आआगे कोई राह नही है | एक रास्ते पर हम जाते है और फिर रास्ता खत्म हो जाता है , खड्डा आ जाता है | आज तक जिसे हमने रास्ता समझा था वो अचंब्क समाप्त हो गया हैऊ , और आगे कोई रास्ता नही है | और रास्ता न हो तो खोने के सिवाए मार्ग क्या रह जाता है ?
भारत का जवान नही खो गया है , भारत ने अब तक जो रास्ता निर्मित किया था , इस सदी में आकर हमे पता चला है कि वह रास्ता है नही | इसलिए हम बराही खड़े हो गये है | रास्ता तो तब खोया जाता है जब रास्ता हो और कोई रस्ते से भटक जाए | जब रास्ता ही न बचा हो तो किसी को भटकने के लिए जिम्मेवार नही ठहराया जा सकता | ज्वान्ब को रास्ते पर नही लाना है , रास्ता बनाना है | रास्ता नही है आज | और रास्ता बन जाये तो जवान सदा रस्ते पर आने को तैयार है , हमेशा तैयार है | क्योकि जीना है उसे , रस्ते से भटककर जी थोड़े ही सकेगा !
बूढ़े रस्ते से भटके , भटक सकते है | क्योकि उन्हें जीना नही है | और सब रस्ते -- भटके हुए रस्ते भी कब्र तक पहुचा देते है | इसी बीच वल्लभ भाई के गाँव के एक सज्जन मिल गये वो उनका हल चल लेने लगे और मैं इधर उधर देखने लगा तभी एक आधुनिक मगरुवा मुझे दिख गया उसके पास मैं चला गया कुछ बात चीत के सिलसिले में उसका पहनावा बड़ा ही रोचक लगा कान में बुँदे और हाथो में ,मोटे कड़े ,पैर में जूता भी कुछ अलग ही था | मैंने उससे पूछा भाई कहा रहते हो उसने बोला गुजरात में काम क्या करते हो बोला बाप दादे के जमाने से मछली का व्यापार है उसी में लगा हूँ कुछ और पूछने पे बताया की गुजरती लोग समुद्री मछली खाना पसंद करते है मैं बोल रहा अब धंधा थोडा मंदा है काहे कउ की अब बड़े व्यापारी लोग इसमें कूद पड़े है तो भी ठीक - ठाक है | मेरी बात अधूरी रह गयी ही सो मैं वापस अ गया और कहने लगा लेकिन्ब जिसे जीना है वह भटक नही सकता | भटकना मज़बूरी है उसकी | जीना है तो रास्ते पर होना पडेगा , क्योकि भटके हुए रस्ते जिन्दगी की मंजिल तक नही ले सकते है | जिन्दगी की मंजिल तक पहुचने के लिए ठीक रास्ता चाहिए इतने में ट्रेन आ गयी और हमने वल्लभ भाई से विदा लिया आने वाले कल के लिए जल्दी ही लौटूंगा कैथी |

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (22-10-2015) को "हे कलम ,पराजित मत होना" (चर्चा अंक-2137)   पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    विजयादशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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