Thursday, June 27, 2019

तहरीके - जिन्होंने जंगे - आजादी - ए- हिन्द को परवान चढाया --- भाग - दो

तहरीके - जिन्होंने जंगे - आजादी - ए- हिन्द को परवान चढाया

फकीर आन्दोलन --
भाग - दो

पागल् पंथी आन्दोलन
पागलपंथी आन्दोलन के नेता करमशाह सुंसंग परगना में सन 1775 से बसे थे | उनके मानने वालो में हिन्दू , मुसलमान , गारो और हाजंग शामिल थे | शाह ने इन सबको साथ मिलाकर एक तंजीम बनाई थी , जो अंग्रेज - हमनवा जमींदारों पर हमला करते थे | सन 1813 में करमशाह के इंतकाल के बाद आपके बेटे टीपू शाह ने कमान संभाली | टीपू शाह ने सन 1825 में शेरपुर के जमींदार पर हमला बोलकर वहां कब्जा करके अपनी आजाद सरकार बनाई | हुकूमत चलाने के लिए जज ,कलेक्टर , मजिस्ट्रेट भी मोक्रर्रर कर दिए और सन 1831 तक आजाद सरकार का कार्य किये | सन 1831 में अंग्रेजी सेना ने इनका सफाया कर दिया | बाद में सन 1852 में जिन्द में टीपू शाह का इंतकाल हो गया उसके बाद तंजीम बिखर गयी और आन्दोलन अपने आप खत्म हो गया |

करबन्दी आन्दोलन
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पूर्वी बंगाल के हाजी शरीयतुल्लाह ने करबंदी आन्दोलन को शुरू किया था | पहले इन्होने इस्लाम में सुधार के लिए मुहीम चलाई | बाद में जमींदारों के जुल्मो ज्यादती के खिलाफ लड़ाई का आगाज किया | वह सियासी व समाजी बदलाव करने की बात करते थे | उनका मकसद अंग्रेजो से आजादी दिलाकर पूर्वी बंगाल में इस्लामी हुकूमत कायम करना था | उन्होंने काफी लोगो को अपने साथ मिला लिया था | इस बीच हाजी साहब का इंतकाल हो गया तो आपकी गद्दी आपके बेटे मोहम्मद मोहसिन को मिली जो बाद में दादू मियाँ के नाम से मशहूर हुए | दादू मिया ने आन्दोलन सम्भाला और जमींदारों के खिलाफ उसे जारी रखा | जबरदस्ती लगान - वसूली बंद करा के उन्होंने गाँव अदालते कायम की , जो मुकामी कामकाज देखती थी | इस लड़ाई में अंग्रेज सीधे तौर पर न लड़कर जमींदारों की मदद में खड़े होते थे | यह करबंदी आन्दोलन बीच - बीच में रुक रुक कर सन 1838 - 1857 तक चला | इस आन्दोलन को बंगाल के जंगे आजादी के नेता सैय्यद अहमद शहीद की तंजीम की मदद भी मिली और उससे ताकत भी मिलती रही | ये लोग जालिम जमींदारों के खिलाफ बहुत बहादुरी से लड़े और अवाम पर होने वाले जुल्म और जबरन वसूली को रुकवा दिया | यह आन्दोलन नील की खेती के आन्दोलन के शुरू होने के बाद खत्म हो गया | इस तंजीम के लोग नील -बागान के आन्दोलन में लग गये |

मुबारिजुद्दौला की बगावत
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सैय्यद अहमद रायबरेलवी के मुस्लिम तबलीग और जेहाद तहरीक के वक्त दक्खिन सूबे में मुबारिजुद्दौला उनके नुमाइंदे और शागिर्द बने | इन्होने पुरे साउथ - इंडिया में इस आन्दोलन को फैलाया और अंग्रेजो के खिलाफ छोटे राजाओं और जमींदारों को तैयार करके अंग्रेजी फौजों से टक्कर ली | काफी जंगी साजो सामान भी इकठ्ठा करके वह अंग्रेजो को कई मोर्चो पर चुनौती देते रहे | बाद में ब्रिटिश रेजिडेंट ने निजाम की रजामंदी से मुबारिजुद्दौला को गिरफ्तार करके गोलकुंडा के किले में नजरबंद कर दिया | मुकदमा चला , जिसमे इन्हें और इनके साथियो को ब्रिटिश हुकूमत खत्म करने असलहा इकठ्ठा करने और युद्ध का झंडा उठाने का मुजरिम बनाया | सजा के तौर पर आपको गोलकुंडा किले में आजन्म कैद की सजा हुई | इनके सभी साथियो को भी सजा मिली | सन 1854 के दौरान सजा ही ब्रिटिश हुकूमत को ललकारने वाला बहादुर शाहजदा हमेशा हमेशा के लिए दुनिया से विदा हो गया | मुबारिजुद्दुला को रईसुल मुसलमीन के खिताब से नवाजा गया था |

2 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29 -06-2019) को "जग के झंझावातों में" (चर्चा अंक- 3381) पर भी होगी।

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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    ….
    अनीता सैनी

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