Thursday, December 25, 2014

गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी -------------------- 25-12-14

गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी
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{ गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी मार्च 1931 में गाँधी जी और वायसराय इरविन के बीच हुए समझैते के बाद लिखी गई थी जो हिंदी नवजीवन 30 अप्रैल 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी ]
परम कृपालु महात्मा जी ,
आजकल की ताज़ा खबरों से मालूम होता है कि { ब्रीटिश सरकार से } समझौते कि बातचीत सफलता के बाद आपने क्रन्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखरी मोका देने के लिए कई प्रकट प्राथनाए की है | वस्तुत ; किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना में होने वाला काम नहीं हैं | भिन्न -भिन्न अवसरों कि आवश्यकता का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्ध नीति बदलने के लिए विवश करता हैं |
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान , आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष किया ,न इसे छिपा ही रखा की समझैता न होगा | मैं मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिलकुल आसानी के साथ यह समझ गये होंगे कि आप के द्वारा प्राप्त तमाम सुधारो का अम्ल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले -मकसूद पर पहुच गये हैं | सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले ,तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए कांग्रेस महासभा लाहोर के प्रस्ताव से बंधी हुई हैं | उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझौता सिर्फ काम चलाऊ युद्ध विराम हैं | जिसका अर्थ यही होता हैं कि अधिक बड़े पयमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोडा विश्राम हैं ......किसी भी प्रकार का युद्ध -विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआवो का हैं | लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आप ने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा हैं | इसके वावजूद भी वह प्रस्ताव तो कायम ही हैं | इसी तरह 'हिन्दुस्तानी सोसलिस्ट पार्टी ' के नाम से ही साफ़ पता चलता हैं कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाजवादी प्रजातन्त्र की स्थापना करना हैं | यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नही हैं | जब तक उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो , तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बंधे हुए हैं | परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध .नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे | क्रन्तिकारी युद्ध ,जुदा ,जुदा रूप धारण करता हैं | कभी गुप्त ,कभी केवल आन्दोलन -रूप होता हैं ,और कभी जीवन - मरण का भयानक सग्राम बन जाता हैं | ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए | परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया | निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतीवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नही होता ,हो भी नही सकता |
आप के समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया हैं ,और फलस्वरूप आप के सब कैदी रिहा हुए हैं | पर क्रन्तिकारी कैदियों का क्या हुआ ? 1915 ई . से जेलों में पड़े हुए गदर - पक्ष के बीसो कैदी सज़ा की मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़ रहे हैं | मार्शल ला के बीसों कैदी आज भी जिन्दा कब्रों में दफनाये पड़े हैं | यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का हैं | देवगढ , काकोरी ,मछुआ -बाज़ार और लाहौर षड़यंत्र के कैदी अब तक जेल की चहारदीवारी में बन्द पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं लाहौर ,दिल्ली चटगाँव बम्बई कलकत्ता और अन्य जगहों में कई आधी दर्जन से ज्यादा षड़यंत्र के मामले चल रहे हैं | बहुसंख्य क्रांतिवादी भागते फिरते हैं ,और उनमे कई स्त्रिया हैं \सचमुच आधे दर्जन से अधिक कैदी फांसी पर लटकने कि राह देख रहे हैं | लाहौर षड़यंत्र केस के सजायाफ्ता तीन कैदी , जो सौभाग्य से मशहूर हो गये और जिन्होंने जनता क़ी बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की हैं ,वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नही हैं | उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नही हैं | सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फांसी पर चढ़ जाने से अधिक लाभ होने की आशा हैं |
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते हैं | वे ऐसा क्यों करे ? आपने कोई निश्चित वस्तु की ओर निर्देश नही किया हैं | ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को कुचल देने में नौकरशाही की मदद कर रहे हैं ,और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को राष्ट्रद्रोह . पलायन और विश्वास घात का उपदेश करना हैं | यदि ऐसी बात नही है ,तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते | अपना आन्दोलन बन्द करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्दी की प्रतीति कर लेने का प्रयत्न करना चाहिए था | मैं नही मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं | मैं आप को कहता हूँ कि वस्तु स्थिति ठीक इसकी उल्टी हैं सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं ,और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं ,उसका उन्हें पूरा - पूरा ख्याल होता है और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग कि अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्व का मानते हैं | हालाकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटे रहने के सिवाए और कोई चारा उनके लिए नही हैं |
उनके प्रति सरकार कि मौजूदा नीति यह है कि लोगो की ओर से उन्हें अपने आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है ,उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाये | अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है | ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि - भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी | इसलिए हम आप से प्रार्थना करते है कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओ से बातचीत कीजिये - उनमे से कई जेलों में हैं -और उनके साथ सुलह कीजिये या सब प्रार्थना बन्द रखिये | कृपा कर हित की दृष्टि से इन दो में से कोई एक रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिए | अगर आप उनकी मदद न कर सके ,तो मेहरबानी करके उन पर रहम करे | उन्हें अलग रहने दें | वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं ...
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हो तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल की पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिये | आशा है ,आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्व साधारण के सामने प्रगट करंगे |
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..आपका
अनेको में से एक सुखदेव
                                                                                                ------प्रस्तुती .........सुनील दत्ता

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