Thursday, December 4, 2014

तुम्हारी स्वतंत्रता अंतिम है ----- 6-12-14

तुम्हारी स्वतंत्रता अंतिम है


आस्कर वाइल्ड की एक छोटी से कहानी




एक आदमी मरा | जिन्दगी में लोग जो करना चाहते है , सब करके मरा | बड़ा पद , बहुत धन , सुन्दर स्तरीय - जो भी मनुष्य की आकाक्षाए -- सभी  पूरी करके मरा | परमात्मा के सामने न्यायालय में उपस्थित किया गया | स्वभावत: परमात्मा नाराज  था | उसने कहा , बहुत पाप किये तुमने | तुम्हारे पास अपने किये गये पापो के लिए कोई उत्तर है ? उस आदमी ने कहा , जो मैं करना चाहता था वह मैंने किया और उत्तरदायी मैं किसी के प्रति नही हूँ | परमात्मा थोडा चौका |

उसने कहा , तुम हिंसा किये , हत्या किये , खून किये ? उस आदमी ने कहा , निश्चित ही | तुमने धन के लिए लोगो की जाने ली ? तुमने व्यभिचार किया , बलात्कार किया ? उस आदमी ने कहा निश्चित ही | लेकिन उस आदमी के चेहरे पर शिकन भी न थी | न अपराध का कोई भाव था | न कोई चिंता थी | परमात्मा थोड़ा बेचैन होने लगा | अपराधी बहुत आये थे , यह कुछ नये ही ढंग का आदमी था | परमात्मा ने कहा , जानते हो , तुम्हारा यह बार - बार कहना कि हाँ निश्चित ही , मैं तुम्हे नर्क भेज दूंगा ! उस आदमी ने कहा , तुम भेज न सकोगे | कयोकी मैं जहा भी रहा , नर्क में ही रहा | अब तुम मुझे कहा भेजोगे ? मैंने नर्क के सिवाए कभी कुछ जाना ही नही , अब तुम हमे और कहा भेजोगे जहा नर्क हो सकता है ?

अब तो परमात्मा के चेहरे पर पसीना झलक आया | कुछ न सुझा न उसे | अब तक के सारे निर्णय , अब तक की लम्बी सनातन से चली आती हुई घटनाए , कोई काम न पड़ी | कोई फ़ाइल सार्थक न मालुम हुई | उसने कहा --- घबडाहट में -- कि फिर मैं तुम्हे स्वर्ग भेज दूंगा | उस आदमी ने कहा , यह भी न हो सकेगा | परमात्मा ने कहा , तुम आखिर हो कौन ? मेरे उपर कौन है , जो मुझे रोक सके तुम्हे स्वर्ग भेजने से ! उस आदमी ने कहा , मैं हूँ
 कयोकी मैं सुख की कल्पना ही नही कर सकता और हर सुख को दुःख में बदल लेने में मैं इतना निंणणात हो गया हूँ | तुम मुझे स्वर्ग न भेज सकोगे | तुम भेजोगे , मैं नर्क बना लूंगा | मैंने सुख का स्वपन भी नही देखा | सुख की कल्पना भी नही कर सकता हूँ , तुम मुझे स्वर्ग कैसे भेजोगे ?


और कहते है , मामला वही अटका हुआ है | परमात्मा सोच रहा है , इस आदमी को कहा भेजे ? नर्क भेज नही सकता , कयोकी नर्क में वह रहा ही है | स्वर्ग भेज नही सकता , कयोकी स्वर्ग भेजने का उपाय नही है |

इस कहानी को ध्यानपूर्वक समझने की जरूरत है | यह किसी और आदमी की कहानी नही , सभी आदमियों की कहानी है | तुम वही भेजे जा सकते हो , जहा तुम जाना चाहते हो | और अगर सुख की तुम्हारे जीवन में स्वपन की भी क्षमता खो गयी है , तो तुम्हे कोई भी स्वर्ग नही दे सकता | स्वर्ग कोई दान नही | स्वर्ग किसी के अनुग्रह से न मिलेगा | अर्जित करना होगा | सुख भी सीखना पड़ता है | सुख का स्वाद भी सीखना पड़ता है | और अगर तुम स्वाद को न जानो , तो सुख पडा रहेगा तुम्हारी थाली में , तुम उसे चख न सकोगे , तुम उसे अपना खून - मॉस - मज्जा न बना सकोगे , वह तुम्हारी रक्त्त की धार में न बह सकेगा , वह तुम्हारे जीवन की रसधार न बनेगी |

और दुःख भी तुम्हारा जीवन ढंग है | तुम्हारे हाथ जो पड़ जाता है , तुम दुःख में बदल देते हो |


जो देखते है दूर और गहरा , उनसे अगर पूछो , जागे हुओ से पूछो , तो वे कहेगे , सुख और दुःख होते ही नही | तुम्ही हो | वही घटना सुख बन जाती है किसी के हाथ में , वही घटना दुःख बन जाती है | कोई उसी घटना को दुर्भाग्य बना लेता है , कोई उसी को सौभाग्य बना लेता है | साड़ी बात तुम पर निर्भर है | तुम आत्यंतिक निर्णायक हो | परमात्मा भी तुम्हे स्वर्ग नही भेज सकता , नर्क नही भेज सकता | तुम जहा होना चाहते हो वही हो और वही रहोगे | तुम्हारी स्वतंत्रता अंतिम है | तुम अपने मालिक हो |




प्रस्तुति --  सुनील दत्ता स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक                                     -- यैस ओशो से साभार

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